Sunday, June 10, 2018

देश से लुप्त होते देशी प्रजाती के बीज और हाईब्रिड के बढ़ते प्रचलन चिंता का विषय

  आजकल धान की नर्सरी लगाने का कार्य तेजी से चल रहा है और बीज की दूकानों पर धान के बीज खरीदने वालों की भीड़ लगी है।एक समय था जबकि बीज जल्दी खरीदना नहीं पड़ता था बल्कि घर का बीज ही बोने एवं नर्सरी डालने के काम आ जाता था लेकिन उस समय आज वाला हाईब्रिड बीज नहीं होता था जबकि प्रजातियाँ सभी तरह की होती थी। हाँ इतना जरूर था कि इन घरेलू अथवा देशी बीजों की पैदावार उतनी नहीं थी जितनी आजकल के हाईब्रिड बीज की है। जबसे हाईब्रिड का जमाना आ गया है तबसे हमारी मूल देशी प्रजातियाँ लुप्त होने लगी हैं और हर बार बीज खरीदना पड़ता है। हाईब्रिड बीजों के उत्पाद का इस्तेमाल दूबारा बीज के रूप में नहीं किया जा सकता है इसलिए हर बार खरीदना किसान की मजबूरी बन गया है।हाईब्रिड बीज से उत्पादित अनाज भले ही कम मूल्य पर बिकता हो लेकिन हाईब्रिड बीजों के मूल्य दस गुना अधिक होते हैं। हाईब्रिड बीजों के नाम पर आज तमाम कम्पनियां बीज उत्पादित करके उन्हें बेचने में जुटी हैं और किसानों को आकर्षित करने के लिए करोड़ों रुपये उसके प्रचार प्रसार पर खर्च कर किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। कोई भी कम्पनी अपने बीज को दूसरी कम्पनी के बीज से कमजोर नहीं बल्कि सबसे उत्तम बताती है।इस समय किसान को धान की नर्सरी डालने के लिए एक मोटी रकम का इंतजाम करना पड़ रहा है।अब तो सरकार भी इन्हीं कम्पनियों के बीज अनुदान पर किसानों को उपलब्ध कराने लगी है लेकिन सरकार की इस नयी बीज नीति का लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा है।अबतक सरकारी गोदाम पर अनुदानित बीज सीधे मिल जाता था लेकिन अब बीज लेने वालों को पहले आनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है।बीज के पूरे दाम देने पड़ते हैं और अनुदान राशि के लिए इंतजार करना पड़ता है।किसान पैसे से ही कमजोर होता है और उसके लिये दो ढाई तीन रूपये किलो में खरीदना बहुत कठिन होता है।कच्चा एक बीघा खेत के लिये कम से कम दो किलो बीज की जरूरत पड़ती है क्योंकि जितने पौध एक साथ खेत में रोपे जायेगें उतने ही किलो बीज की जरूरत होती है। किसान धीरे धीरे हाईब्रिड बीजों पर निर्भर होता जा रहा है और अपने मूल बीजों को गायब करता जा रहा है जो अपने हाथ अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।अगर एक साल या एक सीजन बीज बनाने वाले हड़ताल कर दें तो किसान विकल्प के अभाव में फुटपाथ पर आ सकता है।वैसे अबतक किसानों को सरकार के विभिन्न राजकीय बीज उत्पादन एवं शोध केन्द्रों से उत्पादित देशी उन्नतशील बीज सस्ते मूल्य पर बीज मिल जाता था लेकिन आजकल वह भी मंहगा हो गया है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -----/ ऊँ नमः शिवाय।।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।


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