Thursday, June 14, 2018

लोकतंत्र में ग्राम स्वराज की कल्पना मौजूदा हालात में असफल

  लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता के बीच जाकर जनता के दुखदर्द को जानकर उसका निवारण करना सरकार का परम कर्तव्य एवं दायित्व होता है। सभी जानते हैं कि देश और सरकार की आत्मा गाँवों में बसती है और देश एवं सरकार की असली छबि गाँव में दिखाई पड़ती है।लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रणाली में "ग्राम स्वराज" की कल्पना लोकतंत्र के स्थापना के समय ही की गई थी जो आजतक पूरी तरह फलीभूत नहीं हो सकी है। माना जाता है कि देश की मजबूती के लिए गाँवों का मजबूत होना जरुरी होता है और आजादी के बाद से ही गाँवों को मजबूती एवं खुशहाल बनाने की कवायद की जा रही है।यह सही है कि आजादी के बाद गाँवों की सूरत एवं सीरत में भारी बदलाव आया है लेकिन ग्राम स्वराज की कल्पना साकार रूप धारण नहीं कर सकी है।ग्राम स्वराज की दिशा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल हमेशा यादगार रहेगी क्योंकि उनके ही कार्यकाल में ग्राम विकास की सारी सरकारी सहायता सीधे ग्राम पंचायतों के बैंक खाते में आने लगी थी और महात्मा गांधी रोजगार योजना का शुभारंभ हुआ था। ग्राम स्वराज की दिशा में ग्राम पंचायतों को मजबूत तो किया गया है लेकिन गाँव की समस्याएं गाँव में ही निस्तारित नहीं हो पा रही है और लोगों को थाना ब्लाक तहसील कोर्ट कचेहरी दौड़ना पड़ रहा है। ग्राम पंचायतें रातोंरात भाग्य बदलने में तो सक्षम हो गयी हैं लेकिन ग्राम स्वराज की परिकल्पना मूर्ति रूप नही ले सकी है। गाँवों विकास की योजनाओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है और योजनाओं का लाभ गरीब लोगों को नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश में भाजपा की अगुवाई वाली योगीजी की सरकार ने एक बार फिर ग्राम स्वराज का राग अलापना ही नहीं शुरू कर दिया है बल्कि इस दिशा में अभियान शुरू कर दिया है।इस अभियान के तहत ग्राम स्वराज का स्वप्न उतना साकार नहीं हो रहा जितना भाजपा सरकार का साकार हो रहा है।सरकार का भी सपना उतना साकार नहीं हो पा रहा है जितने की उम्मीद की गई है। सरकार ग्राम स्वराज अभियान के तहत इस समय गाँवों में  रात-दिन सुबह-शाम चौपालें लगा रही है और सरकारी योजनाओं की प्रगति एवं क्रियान्वयन में अधिकारियों की भूमिका का पता लगाकर आमलोगों में साबित करना चाहती है कि उससे बड़ा उसका कोई दूसरा हमदर्द नहीं है। योगीजी जी का ग्राग स्वराज अभियान उनकी सोच के अनुरूप मूर्ति रूप नही ले पा रहा है और अभियान औपचारिकता में बदलता जा रहा है।मात्र दो तीन घंटे की सरकारी देखरेख में आयोजित चौपाल में सिर्फ औपचारिकता ही पूरी हो सकती है उसे यथार्थ रुप नहीं दिया जा सकता है। अधिकांश चौपालें भाषण एवं आँकड़ेबाजी तक सीमित रह जाती हैं और जनभावनाओं की  भागीदारी होती है और न ही गाँव का भ्रमण करके जनता से सीधे संवाद कायम करके उनका दुखदर्द ही जानने का प्रयास किया जा रहा है। हजारों लाखों एक चौपाल पर खर्च हो जाते हैं लेकिन फायदा टके का नहीं हो पा रहा है और इन पंचायतों में आमजनता का जुड़ाव नही हो पा रहा है।कुछ जगहों पर लोग पंचायत में बड़ी तमन्ना लेकर आते हैं और भाषण और आँकड़ेबाजी सुनकर लौट जाते हैं। जब तक कि विकास कार्यों की हकीकत की जनता के मुँह से जानकारी नहीं ली जायेगी तबतक सरकारी योजनाओं एव समस्याओं की असली तस्वीर सामने नहीं आ सकती है और न ही ग्राम स्वराज अभियान की परिकल्पना ही पूरी की जा सकती है।योगीजी का ग्राम स्वराज अभियान निश्चित तौर पर जनता के मध्य जाकर उनसे जुड़ने का अभिनव प्रयोग है लेकिन इस अभियान को गति देने में लगे लोग अभियान को परवान नहीं चढ़ा पा रहे हैं। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -----------/ ऊँ नमः शिवाय
            भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी

No comments:

Post a Comment