Saturday, June 23, 2018

छत्तीसगढ़ में पुलिस के परिजनों के धरना प्रदर्शन पर विशेष

लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर नागरिक को बोलने यानी अभिव्यक्ति करने की आजादी दी गयी है और लोकतंत्र में हर व्यक्ति जुल्म ज्यादती और अपने हक के लिये महात्मा गांधी जी के बताये रास्ते पर अहिंसात्मक चलकर धरना प्रदर्शन सभा आदि कर सकता है।यह आजादी पुलिस फोर्स और फौज में लागू नहीं होती है तथा यहाँ पर अनुशासन के नाम पर जुबान पर ताला लगा हुआ होता है। पुलिस एवं फौज दोनों स्थानों पर अभिव्यक्ति के अधिकार शिथिल हो जाते हैं और यहाँ पर कोई किसी समस्या को लेकर धरना प्रदर्शन बयानबाजी जैसी कोई हरकत नहीं कर सकता है।इससे पहले कुछ राज्यों में पुलिस आंदोलन एवं सैनिक विद्रोह हो चुके हैं।हर बार इन विद्रोहों के कारणों पर गौर न करके इसे कुचलने के ही प्रयास किये गये हैं। कहते हैं कि उत्पीड़न अन्याय एवं बर्दाश्त की अंतिम सीमा बगावत का जन्म देती है इसलिए बगावत से बचने के लिए समस्याओं को स्वतः संज्ञान में लेने की जरूरत है। पुलिस आंदोलन के इतिहास में पहली बार छत्तीसगढ़ की पुलिस के समर्थन में परिजनों की अगुवाई में धरना प्रदर्शन आंदोलन शुरू किया गया है। बेटा पुलिस में डियुटी कर रहा है और बाप बेटे की समस्याओं के लिए धरना प्रदर्शन कर रहा है।अभी यह धरना प्रदर्शन जिला मुख्यालयों पर हो रहा है लेकिन राज्य मुख्यालय पर आगामी 25 जून को धरना प्रदर्शन करने की अनुमति माँगी गई है। पुलिस की समस्याओं के लिए उनके परिजनों के संगठित धरना प्रदर्शन आंदोलन से वहाँ की रमन सरकार सकते में आ गयी है और इस आंदोलन को कुचलने के लिए-" खेत खाय गदहा औ मारे जाय जुलाह " वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।यहाँ पर सवाल यह उठ रहा है कि पुलिस अनुशासन के चलते पुलिस कर्मी अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकता है तो क्या उसके परिजन भी ऐसा नहीं कर सकते हैं? और अगर परिजन आंदोलन कर रहे हैं तो क्या उसके लिए उनके घर के सैनिक को दोषी माना जा सकता है? छत्तीसगढ़ में आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस कर्मियों के परिजनों को नहीं मनाया जा रहा है बल्कि उनके घर के सैनिक को नोटिस जरूर थमा दी गई है। छत्तीसगढ़ में तीन हजार से ज्यादा पुलिस कर्मियों को यह नोटिसें दी जा चुकी हैं इनमें सिपाही दरोगा इंस्पेक्टर सभी शामिल हैं।बाप भाई परिवार की गलतियों की सजा उनके सैनिक बेटों को देने की जगह उनकी उन समस्याओं के निदान की जरुरत है जिसके चलते आज परिजनों को आंदोलन करने की जरूरत पड़ी।वहाँ के डीजीपी एएन उपाध्याय ने स्पष्ट कहा है कि आंदोलन से भत्ता नहीं बढ़ता है और अनुशासन इसका प्रमुख अंग है।उन्होंने नहीं स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुलिस कर्मियों का दायित्व बनता है कि वह अपने परिवारों को ऐसे किसी भी आंदोलन से दूर रखें। उन्होंने कहा कि कुछ रिटायर्ड पुलिस कर्मी इस आंदोलन को हवा दे रहे हैं और वह नहीं जानते हैं कि अनुशासन भंग करने वालों को बर्खास्त कर दिया जायेगा। डीजीपी उपाध्याय जी ने वही कहा है जो पुलिस विभाग के रेगुलेशन में अनुशासन तोड़ने वाले के बारे में कहा गया है। लेकिन पुलिस प्रमुख होने के नाते वह अपने पुलिस परिवार के मुखिया भी है इसलिए उनका यह भी दायित्व बनता है कि पुलिस कर्मियों की समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर समीक्षा करके सुलझाया जाय ताकि आंदोलन करने की नौबत ही न आये। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ----------/ ऊँ नमः शिवाय।।।

           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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