Sunday, June 3, 2018

दस दिवसीय किसान आंदोलन से क्या बदलेगा कुछ

  भारत कृषि प्रधान देश है जहाँ पर साठ फीसदी लोग खेती किसानी से जुड़े हुए हैं।इनमें से चालीस फीसदी ऐसे किसान हैं जो छोटे एवं मध्यम वर्ग के किसान हैं। दो हेक्टेअर तक के किसान घाटे की खेती करते हैं और हमेशा परेशान रहते हैं तथा बिटिया बेटा की शादी ब्याह व मकान का निर्माण खेत बेचकर कर पाते हैं। दो हेक्टेअर से कम भूमि वाले किसानों की खेती परिवार का पेट भरने तक सीमित रहती है और वह अनाज बेचकर बीज खाद और दैनिक उपयोग के सामान के अतिरिक्त खेती से कुछ नही फायदा उठा पाते हैं।दैवीय आपदा किसानों के लिए अभिशाप बन जाती है और उनकी कमर को तोड़कर भिखमंगा बना देती है।सरकार कभी कभार कर्ज के बोझ तले दबे बेवश बेमौत खुदकशी करने वाले किसानों का कर्ज माफ कर देती है लेकिन उसमें शर्त लग जाने से इस कर्जमाफी का लाभ पूरी तरह नहीं मिल पाता है। कर्जमाफी जैसी मूलभूत समस्याओं एवं सरकारी किसान विरोधी नीतियों को लेकर परसों पहली जून से किसान एकता मंच और राष्ट्रीय किसान महासंघ के बैनर तले देश के एक सौ बहत्तर किसान संगठनों ने दूध फल और सब्जियों की आपूर्ति रोककर गाँवबंद आन्दोलन शुरू कर दिया है। इस दस दिवसीय देश व्यापी आंदोलन के अंतिम दिन भारत बंद का आवाह्वान किया गया है। इस दस दिवसीय आंदोलन के तहत किसान दूध सब्जी फल आदि अपनी उपज की आपूर्ति शहरों में नहीं करेगें लेकिन ग्रामीणों के हाथ बेचने का सिलसिला जारी रहेगा।किसान आंदोलन के चलते राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में इसका कम ज्यादा असर दिख रहा है। आंदोलन कोई भी हो वह जोरजबरदस्ती ने स्वेच्छा से होता है।इधर आंदोलन को सफल करने के लिये आगजनी लूटपाट तोड़ फोड़ और अराजकता पैदा करना इधर फैशन बनता जा रहा है। किसान आंदोलन के नाम पर भी जबरस्ती की शिकायतें आने लगी है जो उचित नहीं है। यह सही है किसान विभिन्न समस्याओं से घिरा हुआ है जिनका निदान सरकार को सर्वोच्च प्राथमिकता से कराना चाहिए। किसान संगठनों को अपनी मांग मनवाने के लिए दूध सब्जियों और फल को सड़क पर फेंकवा देना उचित नहीं है। फल और सब्जी ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें ज्यादा समय तक संरक्षित नहीं किया जा सकता है साथ ही गाढ़ी कमाई को फेंककर पूजीं गंवाना हर किसान के वश की बात नहीं है। आंदोलन कर रहे किसानों को कुछ समय पहले महाराष्ट्र में हुये ऐतिहासिक आंदोलन से सीख लेनी चाहिए जिसमें शहर के  नागरिकों ने किसानों का खैरमकदम किया था। किसान को अन्नदाता भगवान कहा जाता है और भगवान सबका पेट भरता जरूर है। इसके बावजूद अभी मोदी सरकार ने किसानों के विभिन्न समस्याओं के निदान की दिशा में कदम बढ़ाये हैं और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के प्रति सकारात्मक रूख अपना रही है। इसके बावजूद कहावत है कि जबतक अंधे की आँखों में रोशनी नहीं आती है तबतक उसे विश्वास नहीं पड़ता है।किसान सगंठनों द्वारा की जा रही सभी किसानों की कर्जमाफी की माँग उचित नहीं है लेकिन दो हेक्टेयर तक वाले किसानों की दुर्दशा पर सरकार को गौर करना होगा।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ---------/  ऊँ नमः शिवाय।।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।।

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