Friday, June 8, 2018

जाने क्या है जनेऊ धारण का महत्व भोला नाथ मिश्रा की कलम से

मनुष्य जीवन में यज्ञोपवीत संस्कार एवं जनेऊ धारण करने का बहुत महत्व होता है और यज्ञोपवीत संस्कार के पहले मनुष्य को संस्कार विहीन अपवित्र माना जाता है।यज्ञोपवीत के समय जो जनेऊ धारण किया जाता है वह छियानबे अंगुल के सूती धागा से बनाया जाता है।इस छियानबे अगुंल धागे का जनेऊ चौसठ कलाओं एवं बत्तिस विद्याओं में मर्मज्ञ होने का प्रतीक माना जाता है। विद्याओं में चार वेद, छः अंग, छः दर्शन, तीन सूत्र ग्रंथ और नौ अरण्यक आदि आती हैं जबकि चौसठ कलाओं में वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्यिक कला,दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढाई,आभूषण निर्माण, कृषि, आदि आते हैं।इतना ही नहीं जनेऊ के तीन धागे मनुष्य जीवन के तीन कर्ज पितृ ऋण देव ऋण और  ऋषिऋण के साथ सत्व,रज और तम के प्रतीक माने जाते हैं। इसलिए मनुष्य जीवन के लिये यज्ञोपवीत संस्कार का विशेष महत्व दिया गया है और यज्ञोपवीत संस्कार एवं जनेऊ धारण करने के बाद माना जाता है कि मनुष्य संस्कारित है और गलत भष्ट आचरण से दूर है। यज्ञोपवीत मनुष्य को इंसानियत की राह पर वैदिक धार्मिक मर्यादाओं पर जीवन जीने की कला सिखाती है और चरित्रवान एवं संयमित बनाती है।जिस तरह से जीवन में गुरु का विशेष महत्व होता है उसी तरह यज्ञोपवीत संस्कार का महत्व होता है।पहले बच्चे को जब पाठशाला भेजने से पहले गुरूकुल भेजा जाता था तो पहले उस बच्चे का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता था। यज्ञोपवीत होने के बाद ही बच्चे को आधुनिक संसारिक शिक्षा के लिए पाठशाला भेजा जाता था। मनुष्य शरीर पर पड़ा हुआ नौ लरियो एवं तीन बटे धागे का जनेऊ हमेशा मनुष्य को कर्तव्यों का बोध कराता तथा सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा देता रहता है। जनेऊ हमेशा पवित्रता का अहसास दिलाती और मार्ग दर्शक की भूमिका निभाती है इसीलिए इसे अपवित्र एवं खंडित होने से बचाया जाता है। लघु शंका एवं शौच के समय इसकी पवित्रता बनाये रखने के लिए इसीलिए इसे कान चढ़ाकर फंदा लगाकर अपवित्र क्षेत्र से ऊपर ले आया जाता है।माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से सूर्य नाड़ी जागृति होती है और कान में लपेटने से पेट एवं रक्तचाप संबन्धी समस्याओं का निदान होता है। इसी तरह माना जाता है कि जेनेऊ पीठ के मध्य रीढ़ जिसे विद्युत प्रवाहिका कहते हैं उसे नियन्त्रित करती है जिससे काम क्रोध मद लोभ नियन्त्रित होता है। जनेऊ धारण करने का वैज्ञानिक आधार भी बताया गया है और माना जाता है कि जेनेऊ दायें कान की उस नस को दबाती है जो सीधे अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है जिससे मलमूत्र त्याग करने में मदद एवं शुक्राणुओं से रक्षा करती है।इतना ही नहीं वैज्ञानिक मानते हैं कि रात में आने वाले बुरे स्वप्न भी जनेऊ धारण कर लेने से आना बंद हो जाते हैं। इसीलिए जनेऊ की स्वच्छता बनाये रखने के लिए छः माह में बदलते रहना चाहिए और गंदी जनेऊ नहीं धारण करनी चाहिए। जनेऊ धारण वह हर व्यक्ति कर सकता है जो संयमित संस्कारित धर्मानुरागी पवित्र वैदिक  जीवन जीना चाहता है।इसमें जाति धर्म सम्प्रदाय आड़े नहीं आता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः --------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

No comments:

Post a Comment