Sunday, July 22, 2018

लोकतंत्र के मंदिर में अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर हुए ड्रामे पर विशेष

लोकतंत्र में राजनेता लोकतंत्र का पोषक संरक्षक एवं संवर्धक होता है और उसका जीवन एवं चरित्र मर्यादित एवं प्रेरणादायक होता है।यहीं कारण है कि हमारे तमाम राजनेताओं का उदाहरण एवं मिशाल राजनीति में समय समय पर दी जाती है।कहते हैं कि जैसा राजा होता है उसी के अनुकूल उसकी प्रजा होती है और जनता राजा के आचरण कार्यशैली का अनुसरण करती है। यहीं कारण है कि राजा यानी राजनेता को बहुत कुछ त्याग करना पड़ता है ताकि वह जनता के लिए प्रेरणास्रोत बन सके।लोकतंत्र में विधानसभा सभा विधान परिषद, लोकसभा एवं राज्यसभा की अपनी गरिमा होती है शायद इसीलिए इन सदनों को भगवान का मंदिर भी कहा जाता है। यहाँ पर राजनेता जैसा व्यवहार आचरण करता है उसका संदेशा पूरे देश एवं प्रदेश में जाता है और उनके समर्थक उसका अनुश्रवण करते हैं।आजादी के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुये अभी सात दशक भी पूरे नहीं हुये हैं लेकिन इतने ही दिनों में हमारा लोकतंत्र राजनेताओं की राजनैतिक महत्वाकांक्षा के चलते मजाक सा बन गया है और मंदिर रूपी सदन राजनैतिक बहुरूपिये राजनेताओं के अड्डे बनते जा जा रहे हैं। सदन में पक्ष विपक्ष जनहित में चर्चा कम करता है और अपने हित में ज्यादा करता है। इतना ही नहीं वह सदन में अपनी राजनीति चमकाने बढ़ाने और सत्ता तक पहुंचने के लिए जूता चप्पल और कुर्सी फेंककर वाकयुद्ध की जगह महाभारत तक करने में गुरेज नहीं करते हैं। परसों कुछ इसी तरह का ड्रामा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान देखने को मिला जिससे एक बार भी लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मान मर्यादाएं धूल धूसरित हो गयी। सभी जानते हैं कि सत्तारूढ़ भाजपा के पास सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए पर्याप्त संख्या बल है इसके बावजूद अविश्वास प्रस्ताव लाना समझ से बाहर है।इस अविश्वास प्रस्ताव से विपक्षी महागठबंधन सरकार को भले ही नहीं हरा सके लेकिन विपक्षी महागठबंधन एवं सरकार में शामिल दलों की औकात का पता जरूर चल गया है। यह सही है कि अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर पक्ष और विपक्ष को अपनी बात कहने का और चर्चा में आने का सुनहरा अवसर जरूर मिल जाता है। परसों लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुयी चर्चा से भी सिर्फ राजनेताओं को अपनी बात देशवासियों तक पहुंचाने का लाभ हुआ है लेकिन जितना लाभ हुआ है उतनी ही सदन की गौरवमयी गरिमा कंलकित भी हुयी है। लोकसभा के इतिहास में शायद पहली बार दो बड़े नेताओं में आँख मारने, गले मिलने और प्रधानमंत्री से कुर्सी से उठने का इशारा किया गया है।सभी जानते हैं कि आँख मारकर बात करने वाले को लोग अच्छी निगाह से नहीं देखते हैं और इसे बचकानी हरकत मानते हैं।यहीं कारण है कि लोकसभाध्यक्ष को इस कृत की निंदा करते हुए इसे सदन की गरिमा के विपरीत कहना पड़ा। एक बात तो सही है कि कांग्रेस के राहुल गांधी जी ने चर्चा के दौरान सदन में जिस तीखे तेवर के साथ सरकार पर हमला बोला वह अपने आप में ऐतहासिक था और सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। उन्होंने प्रधानमंत्री को चौकीदार से भागीदार बताया तो प्रधानमंत्री ने अपने को चौकीदार और भागीदार दोनों बताते हुए पलटवार किया। राहुल जी ने प्रधानमंत्री पर जुमले की स्ट्राइक करने का आरोप लगाया तो प्रधानमंत्री भी नहीं चूके और उन्होंने झटपट इसे सेना का अपमान बता दिया। इसी तरह  पप्पी झप्पी एवं वार प्रतिवार में लोकसभा का कीमती पूरा दिन गुजर गया तथा सरकारी खजाने का लाखों करोड़ों कार्यवाही पर खर्च हो गया और हुआ वहीं हुआ जिसे सभी पहले से जानते थे। राजनैतिक पिपासा पूरी करने के लिये लोकतांत्रिक मूल्यों मर्यादाओं व्यवस्थाओं के विपरीत आचरण एवं व्यवहार करना लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई उचित नहीं है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

No comments:

Post a Comment