Sunday, July 29, 2018

पाकिस्तानी संसदीय चुनाव और बदलता ताज-भोला नाथ मिश्रा

  पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि बुधवार को हुये आम चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं हासिल हुआ है और क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान अहमद खान नियाजी की पार्टी तहरीक ए इंसाफ सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरकर सामने आई है लेकिन अपने दम पर सरकार बनाने की हैसियत नहीं है। यह तय है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए अन्य दलों का सहयोग लेना पड़ेगा क्योंकि सरकार बनाने के लिए उनके पास दस पांच नही बल्कि सैकड़ो सासंदों की जरूरत है। इमरान खान की पार्टी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग नवाज दूसरे स्थान पर है जबकि पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पुत्र बिलावल भुट्टो की पार्टी तीसरे पायदान पर है। सबसे अधिक सीटें जीतने के नाते इमरान खान की पार्टी ने अन्य दलों से तालमेल बिठाकर समर्थन हासिल करने की कवायद तेज कर दी है। पाकिस्तान में हुये संसदीय चुनावों में इमरान खान की पार्टी भले ही सबसे अव्वल बनकर उभरी हो लेकिन उसके लिये सरकार बना पाना आसान नहीं दिखता है और चुनाव में हेराफेरी के आरोपों के मध्य वहाँ के राजनैतिक विश्लेषकों को देश में अनिश्चितता बने रहने का खतरा दिखाई दे रहा है। यह भी संभव है कि इमरान खान के खिलाफ उन्हें सत्ता में आने से रोकने के लिए अन्य सभी दल मिलकर एक मंच पर आ जाय। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में वहीं पार्टी सरकार बनाकर चला सकती है जिसे वहां की सेना एवं गुप्तचर एजेंसी आएसआई ही नहीं बल्कि जिसे वहाँ के आतंकवाद समर्थक मुल्ला मौलवी चाहते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी पार्टी ने उनकी इच्छा के विपरीत कदम उठाया है उसकी सरकार का तख्ता पलट करके खुद सत्ता की कमान संभाल ली जाती है। इसीलिए भले ही इमरान खान की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी हो लेकिन उसे सरकार बनाने के बाद इच्छानुसार कार्य करने का अवसर नहीं मिलेगा और जो सहयोगी दल चाहेंगे वहीं करना पड़ेगा। यह बात अलग है कि इमरान खान सभी चुनाव परिणाम आने के पहले ही अपने को भावी प्रधानमंत्री मानकर अपनी प्राथमिकताएँ गिनाने लगे हैं और प्राथमिकताओं की फेहरिस्त के अंत में भारत से दोस्ताना सम्बंध रखने का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन शायद वह भूल रहे हैं कि जिस दिन उन्होंने भारत से दिली दोस्ती की उसी दिन उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतरना पड़ सकता है क्योंकि वहाँ के अधिकांश दल भारत विरोधी मानसिकता रखते हैं और आतंंकियों के प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोगी एवं संरक्षक होते हैं। इमरान अपनी प्राथमिकताओं को गिनाते समय पाकिस्तान के असली राजनैतिक एजेंडे को नही भूले और काश्मीर पर भी अपना नजरिया पेश किया है।इमरान खान पहले ऐसे प्रधानमंत्री होगें जो परम्परागत राजनैतिक परिवार से नहीं हैं। इसके पहले तक उनकी छबि एक मंजे जुझारू क्रिकेटर के रुप में रही है लेकिन इसके साथ ही उनका रुप तालिबान समर्थक भी रहा है। चुनाव के दौरान उन्होंने अपने भाषणों में भारत विरोधी आग उगली और भारत विरोधियों के साथ गलबहियाँ करके चुनाव लड़ा है। इतना ही नहीं उनका समर्पण सेना और गुप्तचर एजेंसी के प्रति सकारात्मक लग रहा है जो भविष्य के लिए उचित नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया मानती है कि सेना और गुप्तचर एजेंसी इमरान को प्रधानमंत्री के रुप में देखना चाहती है और इसके वह कुछ भी करने के लिये तैयार हैं। यहीं कुछ वजहें हैं जिनके कारण इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसी खास बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि कहावत है कि-" बापत पूत परापत घोड़ा बहुत नही थोड़ा थोड़ा"। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः----------/ ऊँ नमः शिवाय।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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