Thursday, July 19, 2018

भीड़तंत्र द्वारा हत्या की बढ़ती प्रवत्ति पर विषेस

  लोकतंत्र में भीड़ का बहुत महत्व माना जाता है लेकिन महत्व तभी तक रहता है जबतक भीड़ लोकतांत्रिक मर्यादा में रहती है। इधर भीड़ की कारगुजारियां लोकतांत्रिक दायरे से दूर होकर संविधान को धूलधूसरित करने पर आमादा है और आये दिन भीड़ के कारनामे सामने आते रहते हैं।भीड़ का अनियंत्रित होकर हिंसक होना लोकतंत्र एवं देश के भविष्य के लिए कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। इधर जगह जगह भीड़  घेरकर पीट पीटकर लोगों की जान ले रही है और भीड़ की आड़ में अराजकता फैलाकर जंगलराज कायम किया जा रहा है।चाहे उत्तर प्रदेश हो पश्चिम बंगाल बिहार कर्नाटक मणिपुर काश्मीर आदि हो, हर जगह अनियंत्रित भीड़ लोगों की जान ले रही है। स्थिति इतनी बिगड़ गयी है कि हिंसक भीड़ पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।सुप्रीम कोर्ट ने बड़े साफ शब्दों में कहा है कि भीड़तंत्र को कानून की अनदेखी कर भयानक कृत्य करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है और न ही सरकार लोगों की चीख पुकार को नजंरदाज कर सकती है। हालात ऐसे हैं कि तत्काल ठोस एवं मजबूत कार्यवाही की जरूरत है ताकि लोगों का विश्वास एवं संवैधानिक भरोसा बना रहे और सबको साथ लेकर चलने की समाजिक संरचना एवं धर्म निरपेक्षता बरकरार बनी रहे। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस ज्वलंत समस्या पर कुछ दिशा निर्देश भी जारी किये हैं और लोकसभा से भी कहा है कि वह भीड़तंत्र द्वारा पीट पीट कर मारने पर एक अलग से कानून बनायें ताकि ऐसे कृत्य करने वालों को सबक सिखाई जा सके।यह ऐतिहासिक फैसला मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ द्वारा सुनाया गया है। अदालत ने सख्ती के साथ इस सम्बंध में की गयी कार्यवाही की अमली रिपोर्ट भी चार सप्ताह के अंदर तलब की है।मामले की सुनवाई जारी है और अगली सुनवाई आगामी 20 अगस्त को होगी। जिस तरह हिंसक भीड़ की घटनाएं बढ़ रही है उसे देखते हुए इस पर रोक लगना राष्ट्रहित में होगा और तभी देश का धर्मनिरपेक्ष चेहरा और लोकतांत्रिक मर्यादा बरकरार रह सकती है।हम अपनी न्यायपालिका को बधाई देना चाहते हैं कि उसने देश में भीड़तंत्र द्वारा की जारी अमानवीय व्यवहार पर रोक लगाने की पहल की है क्योंकि पीट पीट कर जान से मार डालने की घटनाओं में इधर कुछ इजाफा हो गया है।दुख तो इस बात का है कि हमारी सरकारें वोट की राजनीति के चलते भीड़ के नंगानाच को रोकती नही हैं बल्कि रोकने रोकने का ड्रामा करती हैं। अच्छा तो यह होता कि इसी चालू लोकसभा सत्र के दौरान ही इस सम्बंधित में सरकार को विधेयक पेश करके पारित करा लिया जाय क्योंकि शुभ कार्य में विलम्ब अच्छा नहीं होता है। जबतक विधेयक पास नही होता है तबतक सरकार का दायित्व बनता है कि वह तबतक सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करके भीड़ द्वारा पीट पीट कर मारने की प्रथा को समूल समाप्त करने की कोशिश करे। अपने देश में भीड़तंत्र की हिंसा कोई पहली बार नहीं हुयी है बल्कि कई राज्यों में आज भी बरकरार यथावत चल रही है। भीड़ कभी हिंसक नहीं होती है बल्कि उसे चंद स्वार्थी लोग हिंसक बना देते है और भीड़ की आड़ में अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। ऐसे स्वार्थी लोगों की पहचान करना आसान नहीं होता है क्योंकि इनकी भी संख्या इस समय कम नही है इसीलिए भीड़ इनके बारे में समझ नही पाती है कि उन्हें ललकारने उकसाने वाला हमारे बीच के साथी हैं या बाहरी स्वार्थी है। भीड़ अपना कमाल गाँव स्तर से लेकर राजधानी तक दिखाती है और कभी चोर के नाम पर कभी पकन्ना बच्चा चोर के नाम पर तो कभी जाति धर्म सम्प्रदाय के नाम तो कभी न्याय अन्याय के नाम पर लोगों को पीट पीट कर मार डालती है। देश में सभी लोगों को शांति सुरक्षा और समानता का अधिकार दिलाना सरकार का कर्तव्य बनता है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -----------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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