Friday, July 6, 2018

देश के सरकारी स्कूलों का गिरता स्तर जिम्मेदार कौन

  शिक्षा मनुष्य जीवन में पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाती है और भूले भटके दिशाहीन लोगों को एक नयी राह दिखाकर मनुष्य को मनुष्यता की राह पर चलने की प्रेरणा प्रदान करने वाली मानी जाती है। शिक्षा का महत्व आदिकाल से रहा है और हर युग काल में शिक्षा को मनुष्य जीवन का आधार माना गया है। यह सही है कि आजादी के बाद से शिक्षा क्षेत्र में विस्तार तथा शिक्षित लोगों का प्रतिशत बढ़ा है और उत्तरोत्तर उसमें वृद्धि होती जा रही है। बढ़ती आबादी के साथ ही शिक्षा का भी विस्तारीकरण हो रहा है और शिक्षा दान न होकर व्यवसाय का आधार बन गयी है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गाड़ी पटरी पर न आने से व्यवसायिक शिक्षा को बढ़ावा मिल रहा है और शिक्षा बाजार में शिक्षा नीलाम होने लगी है।जिसके पास पैसा नहीं है वह इस व्यवसायिक शिक्षा का लाभ चाहकर भी नहीं उठा पाता है। सरकारी शिक्षा इधर कुछ इस कदर बदनाम और लाचार हो गयी है कि वह आमलोगों से दूर होती जा रही है। सरकार परिषदीय प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों की बेहतरी के लिए करोड़ों अरबों रुपये खर्च कर रही है इसके बावजूद लोग इन सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे का नाम लिखाने के लिये तैयार नहीं हो रहे हैं और हर साल नये शिक्षा सत्र के मौके जागरूकता अभियान चलाकर हर स्तर पर प्रयास किये जाते हैं। सरकारी प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता सुधारने के लिए गतवर्षो उच्च न्यायालय की इलाहाबाद पीठ ने एक फैसला किया था कि सभी सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों राजनेताओं के बच्चों को इन सरकारी स्कूलों में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाय। न्यायालय के इस फैसले का अनुपालन आजतक नहीं हो सका है जबकि फैसला शिक्षा के गिरते स्तर को संभालने का नायाब नुस्खा है। सोचने वाली बात है कि कोई भी जिम्मेदार जब अपने बच्चों को इन विद्यालयों में पढ़ाने के लिए तैयार नहीं है तो आमजनता कैसे तैयार हो सकती है। यही कारण है कि आज गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला भी सरकारी प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में अपने बच्चे का दाखिला कराना बेइज्जती समझता है। सरकार इन विद्यालयों की दशा और दिशा बदलने में दशकों से जुटी है और गाँव गाँव स्कूल खोलकर बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुफ्त पुस्तकें मुफ्त ड्रेस जूता चप्पल और दोपहर का भोजन मीनू के अनुसार दे रही है।बच्चों का दाखिला कराने के लिए शिक्षक घर घर जाते हैं और जागरूकता रैली और गोष्ठियां करनी पड़ती है। इसके बावजूद चालीस से डेढ़ दो सौ से अधिक बच्चों की संख्या कहीं नहीं रहती है।इनमें से आधे से अधिक बच्चे सिर्फ खाना कपड़ा की लालच में आते हैं और आधे कभी कभार ही आते हैं। इन परिषदीय विद्यालयों का आधुनिकीकरण तेजी से हो रहा है और स्कूल परिसर में सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं चुनावी सुविधा के लिए तमाम स्कूलों का विद्युतीकरण कराया जा चुका है जो स्कूल अबतक विद्युतीकृत नहीं हो सके हैं उनके लिए योगीजी ने बीड़ा उठाया है। सरकार की योजना सभी प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के विद्युतीकरण कराने की है।सरकार की विद्युतीकरण योजना का लाभ स्कूलों में तभी मिलेगा जबकि स्कूलों में पंखा कूलर लगाये जाय और गर्मी से बच्चों का बचाव हो सके। सरकारी विद्यालयों की बेहतरीन के लिये उसका विद्युतीकरण उतना जरूरी नहीं है जितना कि शैक्षिक व्यवस्था को सुधारना जरूरी है।हर कक्षा में घंटा विषयवार पढ़ाई के लिए पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था सबसे पहले जरूरी है। शिक्षा की बेहतरी के लिए शिक्षकों की तैनाती बच्चों की संख्या नहीं बल्कि कक्षावार घंटावार होनी जरूरी है। एक शिक्षक कार्यालय उपयोग के लिए स्कूल में अलग से होना चाहिए जो विभागीय या गैर विभागीय बैठकों में शामिल होकर अन्य बाहरी सरकारी कार्यों का निष्पादन करें। प्रधानाचार्य को बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार बनाकर सहयोगी शिक्षकों की शैक्षिणिक गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। इन सरकारी स्कूलों का विद्युतीकरण कराने से पहले सरकार को पढ़ाई की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए कक्षा और घंटावार शिक्षकों की तैनाती के साथ ही स्कूल खुलने के एक पखवाड़े के अंदर बच्चों को कापी किताब ड्रेस जूता सबकुछ उपलब्ध कराने की जरूरत है। स्कूलों के विद्युतीकरण से निश्चित ही एक शैक्षिक क्रांति आ सकती है बशर्ते इसका सदपयोग किया जाय क्योंकि जमाना डिजिटल इंडिया का आ गया है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः -------/ ऊँ नमः शिवाय।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

No comments:

Post a Comment