Saturday, July 7, 2018

लखनऊ विश्वविद्यालय में हुए हिंसक प्रदर्शन में पुलिस का ढुलमुल रवैया आया सामने

  प्रशासन के सफल क्रियान्वयन एवं शांति सौहार्द बनाये रखने में पुलिस की महती भूमिका होती है क्योंकि पुलिस इकलौती सरकारी सुरक्षा एजेंसी होती है जिसका जुड़ाव शासन प्रशासन और आम नागरिकों से होता है। पुलिस की कार्यशैली सरकार की छबि को बनाती भी है और बिगाड़ती भी है इसलिए पुलिस को रातदिन चौकस सजग एवं ईमानदार रहना पड़ता है।यह सही है कि आज के बदलते परिवेश में बिना पुलिस का मन मुंह पाये समाज में गलत कार्य करने की हिम्मत किसी में भी नहीं है और गुनाह तभी होता है जब हमारी पुलिस गुनहगारों से गलबहियां करने लगती है।पुलिस की जरा सी लापरवाही शिथिलता मनमानी सरकार के अस्तित्व को खतरे में डालकर जंगलराज कायम कर देती है।ऐसा नहीं है कि किसी समुदाय अथवा विभाग में सभी एक विचारधारा एवं सोच के लोग रहते हो असलियत तो यह है कि हर जगह अच्छे बुरे लोग रहते हैं। हमारी पुलिस में भी एक से बढ़कर एक सजीले रणबांकुरे जाँबाज ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ पुलिस कर्मी मौजूद हैं जिनके दम पर पुलिस का अकबाल बुलंद हैं। समाज के कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो मंदिर माने जाते हैं और वहाँ पर पुलिस की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए लेकिन समय का फेर है कि आज भगवान का मंदिर हो चाहे माँ भारती का मंदिर शिक्षा सदन हर जगह पुलिस की जरूरत पड़ने लगी है। उच्च शिक्षा सदन तो पिछले कई दशकों से गुंडागर्दी अराजकता और राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के माध्यम बने हुए हैं और गुरू शिष्य परम्परा तार तार हो रही है।इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि उच्च शिक्षा सदनों में वह सारे कार्य होने लगे हैं जो शिक्षा मंदिर में नहीं होने चाहिए। शिक्षा सदनों के छात्र हर राजनैतिक दल से जुड़कर यूनिवर्सिटी में पढ़ते कम राजनीति ज्यादा करते हैं।लखनऊ विश्वविद्यालय की अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है और एक समय वह भी था जबकि लोग अपने को लखनऊ यूनिवर्सिटी का पढ़ा होना बताने में गर्व महसूस करते थे। इधर लखनऊ विश्वविद्यालय शिक्षा सदन की जगह राजनीति का अखाड़ा बन गया है और अभी दो दिन पहले जो कुछ वहाँ पर हुआ उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती है। परास्नातक में दाखिले की माँग को लेकर जो नंगा नाच सदन से निलम्बित एवं निष्कासित छात्रों द्वारा किया गया उससे शिक्षा सदन की गरिमा कंलकित और गुरू शिष्य परम्परा खंडित हुयी है। जिस तरह की हाथापाई और पथराव कुलपति के साथ किया गया उसकी जितनी निंदा की जाय उतनी कम है। कुलपति की जान तो बच गयी लेकिन उन्हें बचाने के चक्कर में एक दर्जन शिक्षक घायल हो गये। कुलपति ने सपा से जुड़े कुछ छात्र नेताओं पर हंगामा बवाल कराने का आरोप लगाया है। विश्वविद्यालय परिसर में इतनी बड़ी घटना बगल में पुलिस के मौजूद रहती हुये हो घटित हो जाना पुलिस के लिए शर्म की बात है। यहीं कारण है कि इस मामले में पुलिस की भूमिका को स्वतः अखबारों के माध्यम से संज्ञान में लेते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को कल अपने समक्ष तलब कर चुकी है। अगर सहयोगी शिक्षक कुलपति के बचाव में नहीं पहुंच जाते तो निश्चित ही कोई अप्रिय घटना हो सकती थी। पुलिस की घोर लापरवाही पर स्पष्टीकरण माँगते हुये हाईकोर्ट ने पूँछा है कि जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने घटना होने के अंदेशे की सूचना पहले से दे रखी थी तो पुलिस तत्काल घटना स्थल पर क्यों नहीं पहुंची? उच्च न्यायालय के कड़े रूख के बाद आला अधिकारियों की कुम्भकर्णी नींद टूटी है और झटपट वहाँ के पुलिस उपाधीक्षक का तबादला गैर जिला और संबधित चौकी के प्रभारी को निलंबित करके इसकी जाँच आईजी पुलिस को सौंप दी गई है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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