Friday, August 17, 2018

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई को विशेष श्रद्धांजलि

कल हमारे बीच से एक ऐसा चमकता सूरज अस्त हो गया जिसकी बुनियाद मानवता पत्रकारिता समाजिकता समाजसेवा एवं राष्ट्रप्रेम पर टिकी थी।आज के बदलते राजनैतिक परिवेश में पूर्व प्रधानमंत्री कीचड़ में खिले कमल के फूल जैसे थे जिन्हें पक्ष विपक्ष हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई के साथ देश की जनता अपना नेता एवं हितैषी मानती थी। वह पिछले दो महीने से ज्यादा समय से एम्स अस्पताल जिन्दगी और मौत से संघर्ष कर रहे थे। कल शाम पांच बजकर पांच मिनट पर वह हम सभी देशवासियों को हमेशा हमेशा के लिये अकेला छोड़कर चले गये। उन्होंने मरने से पहले कहा था कि "मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं"। अटल बिहारी बाजपेयी तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे और राजनीति की नयी इबारत लिखकर हमारे बीच से चले गये।वह अस्वस्थता के चलते इधर वह लम्बें समय से सार्वजनिक जीवन से दूर थे। वह डिमेंशिया नामक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे तथा वह 2009 से ही  व्हीलचेयर पर थे। देशवासियों ने उन्हें अंतिम बार 2015 में 27 मार्च को तब देखा था जब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भारत माता के इस सच्चे सपूत को भारत रत्न से सम्मानित करने उनके आवास पर गये थे।दो महीने पहले बाजपेयी का स्वास्थ ज्यादा खराब हो गया था और यूरिन में इन्फेक्शन के चलते 11 जून को उन्हें एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन की खबर.से पूरा देश शोक में डूब गया है और लोगों का मानना है कि ऐसा व्यक्तित्व न पहले हुआ है और न ही भविष्य में होने की उम्मीद है। बाजपेयी के निधन से देश की राजनीति के एक सुनहरे युग का अंत हो गया है। ऐसा दौर जिसमें राजनीतिक मतभेद को मनभेद में बदलने की इजाजत नहीं होती थी। बाजपेयी जी लंबे समय तक नेता विपक्ष रहें फिर भी वह सभी दलों के नेता उनका सम्मान करते थे और समय समय पर उनसे राय मशविरा लेते रहते थे।विपक्ष में रहते हुये भी उन्हें कई बार देश की तरफ से विदेश जाने का अवसर मिला और चाहे जवाहरलाल नेहरू रहे हो चाहे इंदिरा गांधी रही हो सभी उनका सम्मान करते थे।यहीं कारण था कि तेइस दलों के गठबंधन ने उन्हें अपना मान लिया था।वह तीन बार प्रधानमंत्री रहे लेकिन उनकी लोकप्रियता किसी पद पर उनके होने या न होने की मोहताज नहीं थी।उनकी स्वीकार्यता जितनी उनकी पार्टी के अंदर थी उससे ज्यादा अन्य राजनैतिक दलों के भीतर थी।उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन की खबर सुनने के बाद सभी दलों के लोग उन्हें देखने पहुंचे। बाजपेयी जी देश की सक्रिय राजनीति में पांच दशक से ज्यादा समय तक ध्रुव तारा की तरह चमकते रहे और उनके व्यक्तित्व पर अंगुली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं हुयी। उन्होंने अपना पहला लोकसभा चुनाव 1952 में लड़ा लेकिन पहली जीत उन्हें 1957 में मिली थी। तब से 2009 तक वे लगातार संसदीय राजनीति में बने रहे और 1977 में वे पहली बार मंत्री बने थे।इसके बाद वह 1996 में पहली बार 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने थे इसी तरह 1998 में उन्हें एक बार फिर पीएम बनने का मौका मिला था लेकिन उनकी यह सरकार भी सिर्फ 13 महीने ही चल पायी थी। इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन के बहुमत वाली सरकार बनी और बाजपेयी  जी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया।वह सन् 1991, 1996, 1998,1999 और 2004 में व लखनऊ से लगातार लोकसभा सदस्य चुने गये थे और उनके समर्थकों में हिन्दू मुसलमान दोनों थे। मुसलमान उनके विदेश मंत्री के कार्यकाल को आज भी याद करते हैं।हम आज अपने हजारों लाखों सुधीपाठकों की तरफ मानवता के पुजारी कलम के धनी स्वच्छ राजनीति में विश्वास रखने वाले इंसानी देवता को शत शत नमक वंदन अभिनंदन करते उनकी आत्मा की शांति एवं द्रवित देशवासियों व उनके परिजनों को साहस प्रदान करने के लिये ईश्वर से कामना करते हैं।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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