Thursday, August 23, 2018

कामियाबी की कभी न खत्म होने वाली अंधी दौड़ दौड़ता इन्शान-रामजी पांडेय

हम सभी के जीवन में कुछ न कुछ नया पाने के लिए कोई न कोई नयी इच्छा हमेशा अाशा दिलाती रहती है कि यदि मैं यह प्राप्त कर लूँगा तो बस सुखी हो जाऊँगा अौर हमारा मन पूरी तरह से उसी में डूबा रहता है । इसको सन्तुष्ट करने के लिए हम बस एक अौर नयी दौड़ शुरु कर देते हैं ।एक अौर एेसी नयी दौड़ शुरु करने से पहले हम भूल जाते हैं कि एेसी अनेक दौड़ें हम पहले भी इसी अाशा में लगा चुके हैं कि दौड़ के अंत में मैं सुखी हो जाऊँगा, क्या एेसा हुअा भौतिक जगत् की किसी भी वस्तु को प्राप्त कर यह अाशा करना कि वह वस्तु मुझे हमेशा के लिए सुख प्रदान करेगी, बहुत बड़ी भूल है । इस जगत् की सभी वस्तुअों द्वारा प्राप्त किया जाने वाला सुख केवल कुछ ही समय के लिए ही टिकता है । यही इस भौतिक जगत् का स्वभाव है भौतिक जगत् का सुख बहुत ही सीमित होता है अौर बहुत थोड़ी अवधि का होता है । इसलिए इस सुख को प्राप्त करने के लिए हमें निरन्तर अन्धी दौड़ में भागना ही पड़ता है अौर यह दौड़ कभी खत्म नहीं होती क्योंकि किसी भी वस्तु को प्राप्त करने के लिए हम जब दौड़ लगाते हैं तो सोचते हैं कि इस दौड़ के बाद जब मुझे वह वस्तु प्राप्त होगी तो मैं सुखी हो जाऊँगा किन्तु उस वस्तु की प्राप्ति के बाद जब हमें सुख प्राप्त नहीं होता तो हम फिर किसी अन्य वस्तु को प्राप्त कर उससे सुखी होने की अाशा में नई दौड़ प्रारम्भ कर देते हैं अौर नई-नई दौड़ों का यह सिलसिला इसी अाशा में कि मैं एक दिन सुखी हो जाऊँगा, चलता ही रहता है क्या अापने कभी छोटे बच्चों को समुद्र के किनारे रेत के घर बनाते हुए देखा है? बहुत ही मेहनत के साथ बच्चे घण्टों तक मेहनत करके घर बनाते हैं अौर जब समुद्र की लहरें उसे बहाकर ले जाती हैं तो बच्चें काफी हताशा अौर निराशा का अनुभव करते हैं किन्तु पास में बैठे उनके माता-पिता अपने बच्चों की इस रेत के घर से जुड़ी अासक्ति पर हँसते हैं । अौर वे यह नहीं समझ पाते कि उनकी स्वयं की इस भौतिक जगत् में हमेशा के लिए सुखी होने की योजनायें भी बच्चों के रेत के घर के समान ही हैं जो केवल कुछ समय के लिए सुख प्रदान कर सकती हैं अौर उसके उपरान्त फिर से सबकुछ करना पड़ता है ।सिकन्दर ने एक बार किसी साधु से मिलने की इच्छा व्यक्त की अौर उसके सैनिक उसकी इस इच्छा की पूर्ति हेतु एक साधु के पास पहुँचे । साधु ने नम्र स्वभाव में एक भौतिकवादी राजा से मिलने को मना कर दिया । यह सुनकर क्रुद्ध सेनापति ने सिकन्दर तक यह बात पहुँचायी अौर स्वयं सिकन्दर क्रोध में साधु के सामने अा गये ।तुम अालसी, तुम्हारे अन्दर मेरी अाज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत । मैं तुम्हें सही सबक सिखाऊँगा साधु ने नम्र स्वभाव में कहा, अाप मेरी गलती क्षमा करें । क्या मैं जान सकता हूँ कि अाप कौन हैं अौर अपने जीवन में क्या करते हैं सिकन्दर ने उत्तर दिया, मैं महान् सिकन्दर हूँ जो पूरी दुनिया को जीतने निकला हूँ ।साधु ने पूछा जब अाप पूरी दुनिया पर कब्जा कर लोगे तो क्या करोगे मैं एक एेसा महल बनाऊँगा जैसा पहले किसी ने न देखा हो ।अौर उसके बाद क्या करोगेतब मैं विश्व की सौ सबसे अधिक सुंदर स्त्रियों से विवाह करूँगा ।अौर उसके बाद प्रत्येक स्त्री से एक पुत्र उत्पन्न कर पूरे विश्व को सौ पुत्रों में विभाजित करूँगा अौर महाराज उसके बाद अाप क्या करेंगे
उसके बाद मैं शान्ति से अाराम करूँगा साधु ने मंद मुस्कान में राजा की अोर देखा अौर कहा, यदि अन्तत: अाप वही शान्ति पाना चाहते हैं तो मेरे साथ अा जाअो, मैं तो गाँव के बाहर पूरी शान्ति में अपना जीवन व्यतीत करता हूँ क्या हम भी कभी न समाप्त न होने वाली इस अन्धी दौड़ में शामिल तो नहीं हो गये हैं अौर इस भौतिक जगत् की भ्रामक वस्तुअों से सुख पाने का व्यर्थ प्रयास तो नहीं कर रहे हैं? क्या हम इस दौड़ द्वारा शान्ति, सुख एवं संतुष्टि का अनुभव कर पाते हैं
यदि हम भौतिक जगत् की वस्तअों से उसकी अाशा करते हैं तो वह तो कभी नहीं हो पायेगा क्योंकि उन वस्तुअों में हमें पूरी तरह से सुखी एवं संतुष्ट करने की क्षमता ही नहीं है ।
लेखक
रामजी पांडेय

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