Monday, August 6, 2018

आज के दौर में मित्रता की बदलती परिभासा

कल मित्रता दिवस था और दुनिया भर में तमाम लोगों ने इस मौके पर अपनी मित्रता और मित्रों को याद करके एक दूसरे पर न्यौछावर हुये।  व्हाट्सएप से जुड़ी मित्रता में तो सुबह से देर रात तक बधाती और शुभकामनाएं देने का दौर चलता रहा।मित्र दो तरह के माने जाते है जिनमें एक मित्रता क्षणिक और दूसरी आजीवन होती है। आजीवन मित्रता स्वार्थरहित जबकि क्षणिक स्वार्थों से परिपूर्ण होती है। मित्रता करना और उसे निभाना कोई खिलवाड़ नहीं होता है बल्कि कहा गया है कि  "जो न मित्र दुख होय दुखारी ताहि बिलोकत पातक भारी"।जो मित्र के दुख में दुखी नहीं होता है उसको देखने मात्र से पाप लग जाता है इसीलिए मित्र का स्थान माता पिता से भी ऊँचा दिया गया है। मित्र के आगे दुनिया बेकार होती है इसीलिए मित्र से दिल की वह बातें होती हैं जो माता पिता पुत्र आदि से नहीं हो सकती है।  इसीलिए मित्र को ईश्वर का दूसरा स्वरूप कहा गया है क्योंकि असली मित्र दुख में बिना बुलाये मित्र का संरक्षक बनकर आ जाता है।भगवान श्रीकृष्ण एवं सुदामा जी की दोस्ती तमाम असमानता के बावजूद आदिकाल से असली दोस्ती का उदाहरण बनी हुयी है।दोस्ती देखनी है तो भगवान श्रीकृष्ण को देख लीजिए जिन्होंने मित्र के दुख को देखकर जब दुखी होकर जब मित्र को देने लगे तो तीनों त्रिलोक न्यौछावर करने पर आमादा हो गये और यह भी भूल गये कि वह कहाँ रहेगें? मित्रता देखनी है तो महाबली हनुमान और सुग्रीव की देखो जिन्होंने दुख में साथ ही नही दिया बल्कि साक्षात ईश्वर से उनकी मुलाकात ही नहीं दोस्ती करा दी। मित्रता जाति धर्म सम्प्रदाय की मोहताज नहीं होती है और " न हिन्दू बनेगा न मुस्लिम बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा" के सिद्धांत पर फलती फूलती एवं परवान चढ़ती है। हमारे एक मित्र मनोज वर्मा और एक अताउल्ला भाई हैं जो विपरीत मजहब के बावजूद कक्षा छः से अबतक मित्रता के बंधन में बधे महाविद्यालय चला रहा रहे हैं तथा दोस्ती की मिशाल बने हुये हैं। मित्रता निभाना बच्चों का खेल नहीं होता है और मित्र के लिये प्राण न्यौछावर कर दिये जाते है। एक समय था जबकि मित्र की जरूरत पड़ने पर जेवर गहने गिरवी रखकर पैसा ले लेने के लिये घर के अंदर ले जाकर बिना गवाही सबूत के दे दिये जाते थे लेकिन अब समय बदल रहा है और मित्रता स्वार्थ से लबरेज होती जा रही है। बदलते समय में बहुत कम लोग ऐसे होगें जो बिना किसी स्वार्थ के दोस्ती निभा रहे हैं डवरना किसी शायर ने कहा है कि-" दोस्ती और इस जमाने में, आप जनाब किस जमाने की बात करते हैं"। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।।ऊँ भूर्भुवः स्वः----------/ ऊँ नमः शिवाय।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार / समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।।

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