Thursday, September 13, 2018

लंदन में दिए गए विजय माल्या के बयान से मचा कोहराम

  किसी भी देश को प्रगति की बुलंदियों तक पहुंचाने में सरकार के बाद कारोबारियों एवं उद्योगपतियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहीं कारण है कि राजनैतिक दलों के नेताओं एवं उद्योगपतियों का चोली दामन का साथ होता है और दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं। इतना ही नहीं दोनों अपनी मित्रता को मजबूती देने के लिये समय समय पर एक दूसरे की मदद भी करते रहते हैं।किसान का कर्जा भले ही यदाकदा होता हो वह भी सभी छोटे बड़ों का माफ नहीं हो पाता है लेकिन उद्योगपतियों का कर्ज हर साल माफ होता है।इतना ही नहीं उन्हें उद्योग स्थापित करने या कारोबार करने के लिये जमीन एवं धन भी उपलब्ध कराती है। एक समय वह था जबकि लोग टाटा बिड़ला डालमिया जैसे उद्योगपतियों का सम्मान करते थे क्योंकि वह भी देशवासियों के शुभचिंतक थे और आजकल के माल्या नीरव मोदी मेहुल जैसे बैकचोर नही थे।इस समय विजय माल्या नीरव मोदी मेहुल भारतीय राजनीति के केन्द्र बिंदु बने हुये हैं और उनको लेकर देश ही नहीं बल्कि दुनिया में चर्चा हो रही है क्योंकि दोनों करोड़ों अरबों का चूना देश को लगाकर देश से भाग चुके है। दोनों भारत से भागकर शान से भारतीय राजनीति में तूफान खड़ा कर रहे हैं। अभी कल लंदन में एक अदालत में प्रत्यारोपण के मामले की सुनवाई के बाद बाहर निकलकर भगोड़े शराब कारोबारी माल्या ने पत्रकारों से बात करते हुये एक नया धमाका कर दिया है जिससे लोकसभा चुनाव के तैयारी दौर में एक बार पुनः तूफान मच गया है और सरकार जबाब नहीं दे पा रही है।बैकों अरबों खरबों का चूना लगाने वाले माल्या ने अपना पैतरा बदलते हुये कहा कि वह भागकर नहीं बल्कि वित्त मंत्री से मिलकर उनसे बताकर लंदन आया है।उसने कहा कि वह लंदन भागने की नियत से नहीं बल्कि जनेवा में पूर्व निर्धारित एक बैठक में भाग लेने आया था। उसने कहा कि वह बैंकों से समझौता करके कर्ज अदायगी करना चाहता था इसके लिये उसने कर्नाटक उच्च न्यायालय में मुकदमा भी दायर किया था।माल्या के बयान के बाद विपक्षी दलों का सरकार पर हमला शुरू हो गया है जबकि वित्त मंत्री की सफाई इस बात को सच साबित करती है कि उसकी मुलाकात लोकसभा के सेंट्रल हाल में वित्त मंत्री से चलते चलते हुयी थी लेकिन उन्होंने उसकी बात को अनसुनी करके उसके आफर को ठुकरा दिया था। माल्या नें पिछली कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में सरकार नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री की मदद से बैंकों से कर्ज लिया था। सरकार बदलने के बाद माल्या भाजपा सरकार का खास ही नहीं हो गया था बल्कि सासंद बन गया था। देश छोड़कर लंदन भागने से पहले वित्त मंत्री से मिलकर एवं बताकर जाना गंभीर मामला है हालांकि वित्त मंत्री उसके आरोपों का जोरदार खंडन कर रहे हैं। माल्या कारोबारी होने के साथ कांग्रेस एवं भाजपा दोनों का खास था तथा राज्यसभा का सदस्य भी था मतलब वह सरकार के लिये अजनबी नहीं बल्कि अपना खास सदस्य था अगर ऐसा नहीं होता तो वह राज्यसभा सदस्य नही बन पाता।इधर जैसे सरकार पर शनि लग गये और वह चारों तरफ से घिरती जा रही है। राफेल विमान सौदा हो चाहे एससी एसटी एक्ट हो चाहे माल्या नीरव मोदी की फरारी हो हर मसले इस समय सरकार के गले की हड्डी बने हुये है।
            भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी

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