Sunday, September 9, 2018

एससी एसटी एक्ट में एकतरफा संशोधन से देश भर में मचा संग्राम

समाज में सभी वर्गों धर्मो सम्प्रदायों के छोटे बड़े अमीर गरीब न्यायी अन्यायी लोग रहते हैं।जिस तरह से बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है उसी तरह सबल निर्बल को अपना शिकार बनाता है और इन दोनों की कोई जाति धर्म नहीं होता है। कभी कोई समाज एक जैसी विचारधारा का नहीं होता है बल्कि उसमें भी विभिन्न विचारधारा के अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग रहते हैं। इसलिये समाज में किसी जाति अथवा धर्म के लोगों को एक जैसा देखना उचित नहीं है क्योंकि कोई जाति समुदाय नहीं बल्कि उसमें कुछ लोग ही बुरे अन्यायी अत्याचारी कट्टरपंथी नहीं होते है। इसी तरह कोई समाज दलित पिछड़ा अन्यायी नहीं होता है बल्कि उसमें से कुछ लोग ही दलित शोषित अत्याचारी होते हैं और कुछ लोग ही इनके साथ जुल्म ज्यादती करने वाले होते हैं।आजादी के बाद समाज में सबसे निचले पायदान पर जीवन यापन करने वालों को मुख्य समाजिक धारा से जोड़ने के लिए एक निश्चित अवधि के लिये आरक्षण का लाभ दिया गया था जो आज भी वोट की राजनीति के बल पर जारी है।राजनीति का प्रतिफल है कि आज समाज अगड़े पिछड़े और दलित में बंट गया है। कौन दलित है कौन बैकवर्ड और सवर्ण है इसका निर्धारण राजनीति करने लगी है फलस्वरूप समाजिक समरसता एवं एकता अखंडता तार तार होने लगी है।समाज के दबे कुचले अति गरीब कहे जाने वालों लोगों को समाजिक उत्पीड़न से बचाने के लिये कड़े कानून के रूप में एससी एसटी एक्ट बनाया गया था।दुर्भाग्य कहा जायेगा  यह कानून भी गंदी राजनीति का शिकार हो गया और इसकी आड़ में राजनैतिक रोटियां सेंकी जाने लगी। राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये इसमें पीड़ित को सहायता देने की व्यवस्था की गई जिसका कुछ लोगों ने जमकर फायदा उठाया और धन की लालच मे बेगुनाह लोगों को इसमें फंसाकर अपना उल्लू सीधा कर लिया गया। इसके दुरपयोग को देखते हुये ही बसपा प्रमुख बहन जी ने अपने कार्यकाल में इसे व्यवहारिक बना दिया था और बिना सच्चाई परखे मुकदमा दर्ज करने पर रोक लगा दी थी। हमारा देश लोकतांत्रिक गणराज्य है इसलिए इसमें सभी को बराबर का अधिकार मिला हुआ है इसलिये किसी को भी सजा देने की प्रक्रिया शुरू करने के पहले आरोपों की प्रथमदृष्टया पुष्टि जरूरी होती है। यह सही है कि न्याय देना पुलिस का नहीं बल्कि अदालत का कार्य है लेकिन आरोपी बनाने से आरोप की प्रारंभिक जाँच न्यायहित में होती है क्योंकि पुलिस की कार्यवाही किसी सजा से कम नहीं होती है। सभी जानते हैं कि अदालती प्रक्रिया इतनी भयावह होती है कि पेशी पर जाते जाते जीवन गुजर जाता है और दामहानि कामहानि दोनों होती है।पिछले महीनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस एससी एसटी एक्ट की समीक्षा करते हुये इसे व्यवहारिक एवं न्यायप्रिय बनाया गया था जिसे लेकर खूब राजनैतिक हल्ला मचा और हिंसक भारत बंद आंदोलन हुआ।इसके बाद सत्तादल ने अपने को दलित विरोधी की जगह दलित हितैषी साबित करने के लिये सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये लोकसभा में विधेयक पेश करके एक्ट के पुराने स्वरूप को बहाल करना पड़ा। सरकार के इस कदम से दलित वर्ग सरकार से खुश हुआ या नहीं हुआ लेकिन सवर्ण जरूर सरकार से बिदककर नाराज हो गया और उसने भी अहिंसक भारतबंद करके सरकार को साँसत में डाल दिया।बचीखुची कसर सुप्रीम कोर्ट में जनहित में सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते हुये नोटिस जारी करके पूरी कर दी है।सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के बाद सरकार की स्थिति साँप छछूंदर वाली हो गयी है और उसे एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ खंदक दिखाई पड़ने लगा है।उनकी पार्टी के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को जनाक्रोश का सामना ही नही करना पड़ा है बल्कि एक कांग्रेसी महिला नेता ने उनके विरुद्ध एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तारी करने की माँग तहरीर देकर की है। भाजपा ने अपने राजनैतिक जीवन में ऐसा दाँव खेला है जो उलटकर उसी के गले की हड्डी बन गया है और उसके साथ जुड़ा सवर्णों का बड़ा तबका अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निंग / अदाब / नमस्कार / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः ---------/ ऊँ नमः शिवाय।।।
          भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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