Monday, October 8, 2018

पितृपक्ष के अमावस्या को श्राद्ध करने से होती है विशेष फल की प्राप्ति

गोन्डा ब्यूरो पवन कुमार द्विवेदी
पितृपक्ष को महालय पर्व भी कहा जाता है । इस पर्व एक एक दिन तीर्थ-स्थलों की तरह पवित्र है । महालय का अर्थ भी महान घर से है । यानी हमारा घर महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पितृलोक से पितर आते हैं और उनके प्रति जब सन्तान श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं तो पूरे वर्ष भर वे अपनी छाया प्रदान करते हैं । शास्त्रों में देवताओं के पूजन से ज्यादे श्रेष्ठ बताते हुए ऋषियों ने 'देव कार्यात् अपि सदा पितृ कार्यं विशिष्यते' का उल्लेख किया है ।  धर्मशास्त्रों में देवपूजा से ज्यादे पितृदेव पूजा से लाभ, सुख-समृद्धि, यश-गौरव की प्राप्ति का उल्लेख है । पितृपक्ष में प्रत्येक दिन तर्पण एवं श्राद्ध का विधान है लेकिन अमावस्या का श्राद्ध अति फलदायी है । सिर्फ चतुर्दशी तिथि में अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटना तथा अकाल मृत्यु प्राप्त पितरों के लिए निर्धारित किया गया है । इस प्रकार महालय पर्व पर पितरों की तिथि पर श्राद्ध करने वाले  अमावस्या को भी श्राद्ध करते हैं तो वह अति उत्तम है । ऋषियों ने 'अमावस्या आदि तिथौ श्राद्धम अकरणे नरकं गमनं' श्लोक उन लोगों के लिए कहा जिनके पितरों ने उन्हें पढ़ा लिखा के योग्य बनाया, साधन से सम्पन्न किया, वे यदि कृतज्ञता नहीँ प्रकट करते तो नरक में जाते हैं । स्पष्ट भी है कि जो अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ नहीं वह किसी के लिए कृतज्ञ नहीं हो सकता । अगर होता भी है तो परिस्थिति विशेष के चलते दिखावा है । ऐसे ऐसा व्यक्ति एक न एक दिन अलग थलग पड़ कर जीते जी नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य होता है । जबकि 'श्रद्धात परतरं न अन्यत  श्रेयस्करं उदाहृतं' श्लोक से यह दर्शाया गया है कि श्राद्ध से दूसरा कल्याण देने वाला मार्ग कहीं नहीं है । महाभारत ग्रन्थ में भी भीष्म पितामह ने श्राद्ध की महिमा कही है । सलिल पाण्डेय ने बताया कि इसके विपरीत जो श्राद्ध करते है उनके लिए 'महालये तु फलभूमेति पृथ्वीचंद्रोदय:' कहा गया है । श्राद्ध कर्म का समय कुतप काल मध्याह्न 12 से अपराह्न तीन बजे तक सर्वोत्तम माना गया है, इसलिए 8 अक्टूबर को ही पितृश्राद्ध करना चाहिए । क्योंकि इस दिन चतुर्दशी तिथि सूर्योदय में है लेकिन पूर्वाह्न 10.38 से अमावस्या तिथि लग जा रही है । दूसरे दिन 9 अक्टूबर को अमावस्या पूर्वाह्न 9.30 तक है । मध्याह्न में नहीं है ।  शास्त्रों के अनुसार नाना का श्राद्ध प्रतिपदा में हो सकता है, इसलिए जिन्हें पिता, पितामह का श्राद्ध नहीं करना है । उनके पिता जीवित हैं तो वे 9 अक्टूबर को अपराह्न में भी नाना पक्ष के लिए श्राद्ध कर सकते हैं । जहां तक पिंडदान नहीं केवल दान की बात है वह 9 अक्टूबर को करना चाहिए ।
      प्राप्त जानकारी के अनुसार  श्राद्धकर्त्ता को चाहिए कि वह इस कार्य में दीनहीन न बने क्योंकि अपनी संतानों को दीनहीन देखकर पितरों को कष्ट मिलता है । यदि दान करना है तो जो अन्न, मिष्ठान्न, वस्त्र खुद धारण नहीं कर सकता, वह वस्तु कदापि दान न दे क्योंकि इससे कृपा के बजाय कोप ही प्राप्त होगा । गोग्रास निकाले तो कुत्ते, कौवा को पत्ते में रखकर और गाय को अपने हाथ से खिलाए । पुरोहित से भोजन की क्वालिटी के बारे में पूछे नहीं । रिश्वत, छल-धोखा से प्राप्त धन से श्राद्ध निष्फल बताया है । लोहे के पात्र की जगह अन्य धातु के बर्तन में भोजन कराना चाहिए । यथा संभव वटुकों को एक दो दिन पूर्व निमंत्रित करना चाहिए । इसके अलावा ऐसे पुरोहित जो कई जगह श्राद्ध का भोजन करते हैं, उन्हें भी श्राप लगता है । अतः इसे पुरोहितों से बचना चाहिए । श्राद्धकर्ता को भी इस दिन अपनी रसोई को छोड़कर अन्यत्र भोजन नहीं करना चाहिए ।

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