Tuesday, November 6, 2018

दीपोत्सव पर चाइनीज दियो से उखड़ती कुम्हारी कला

असत्य पर सत्य का प्रतीक पाँच दिवसीय दीपोत्सव पर्व की शुरुआत कल धनतेरस के साथ हो गयी है और घरों प्रतिष्ठानों को रोशन करने की शुरूआत हो चुकी है। सनातन धर्म में धनतेरस को आयुर्वेद के जनक भगवान धनवंतरी का प्राकट्य दिवस माना गया है और पूरी दुनिया में उनकी जयंती मनाई जाती है। भगवान धनवंतरी का अवतरण समुद्र मंथन के दौरान हाथ में अमृत कलश लिये हुये हुआ था और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। हाथ में घड़ा होने के कारण ही सभी धनतेरस के दिन बर्तनों की खरीद को शुभ मानते हैं और इस अवसर हर गरीब अमीर अपनी औकात के मुताबिक खरीद फरोख्त करके इस दीपोत्सव की शुरुआत करता  है। पांच दिवसीय दीपोत्सव का मुख्य पर्व कल बड़ी दीपावली के रूप में मनाया जायेगा।इस दीपोत्सव के दौरान घर मंदिर दूकान खेत खलिहान हर जगह दीप जलाने की परम्परा है। कुछ लोगों का मत है कि दीपोत्सव का मुख्य पर्व भगवान राम के लंका से वापसी पर उनका स्वागत अयोध्यावासियों द्वारा अयोध्या को रोशनी से जगमगा कर मिष्ठान एवं आतिशबाजी गोला पटाखे दाग किया गया था।इस पर्व की खास बात यह है कि इसमें मिट्टी से बने दियों एवं बर्तनों को विशेष महत्व दिया गया है और बिना मिट्टी के बर्तनों के पूजा अर्चना नहीं हो पाती है। इसीलिये लाख इलेक्ट्रॉनिक रोशनी के बावजूद कम से कम पांच मिट्टी के दिये जरूर जलाये जाते हैं। इतना ही नहीं खेत खलिहानों में बिजली से रोशनी नहीं बल्कि मिट्टी के दिये जलाकर किया जाता है। यह मिट्टी के दिये खेत खलिहान ही नहीं बल्कि मनुष्य जीवन से जुड़े कूड़ाघर यानी घूर तक पर जलाकर रखे जाते हैं। इन मिट्टी के दियो को जलाकर विभिन्न स्थानों पर रखने से पहले उन्हें धुलकर पवित्र स्थान पर रखा जाता है और पहले मुख्य दिये को जलाकर उसकी पूजा की जाती है। इसके बाद इसी मुख्य दिये से छोटे दिये जलाकर विभिन्न स्थानों पर रखा जाता है। मान्यता है कि इन दियो को विभिन्न जीवन से जुड़े स्थानों पर रखकर उस जगह को उस जगह को जागृत किया जाता है। मिट्टी के बर्तनों के सहारे जीवन यापन करने वाले कुम्हार जाति के हमारे भाई अपने साल भर के खाने की व्यवस्था इसी दीपोत्सव के माध्यम से करते हैं। जीविका से जुड़े इन दियो एवं भूड़का भुड़की आदि मिट्टी के बर्तनों को तैयार करने का काम महीनों पहले से कर देते हैं और इन्हें इसी दीपोत्सव में बेच देते हैं। अबतक ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को दिये खरीदने के लिये कहीं जाना नहीं पड़ता था और कुम्हार परिवार के लोग खुद घर घर देने आते थे और बदले में पैसे के साथ उन्हें खाने के लिए चावल आटा दाल एवं सब्जी "सीधा" भी दिया जाता था।यह परम्परा ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बरकरार है लेकिन दियो आदि की बिक्री कम हो गयी है।अबतक देशी बिजली की झालर मंहगी पड़ती थी इसलिये गरीब लोग खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में इन मिट्टी के दियो को प्राथमिकता दी जाती थी क्योंकि यह सस्ते पड़ते थे। अब जबसे चाइनीज झालर आदि सजावटी सामान सस्ते दामों में मिलने लगी हैं तबसे गाँवों में जहाँ बिजली है वहाँ पर घरों मंदिरों आदि की सजावट दिये की जगह सतरंगी झालरों से होने लगी है। चीन निर्मित झालरों एवं इलेक्ट्रिक सामानों के हमारे यहां पर आ जाने से दीपोत्सव की रौनक तो जरूर बढ़ गयी है लेकिन इस पर्व के सहारे अपनी आजीविका चलाने वाली एक बिरादरी विशेष के चेहरे से रौनक गायब होने लगी है। कुम्हारी कला धंधे से जुड़े लोग हर साल दिलो में खुशहाली के बड़े बड़े अरमान संजोए कस्बों बाजारों चौराहों मुहल्लों में दीपावली से जुड़े मिट्टी के बर्तनों का ढेर लगा कर बैठते हैं लेकिन चाइनीज इलेक्ट्रॉनिक सजावटों सामानों के सामने इन्हें महत्व नहीं देता है।इस सबके बावजूद आज भी इन मिट्टी के दियो की प्रासंगिकता बनी हुयी है और इलेक्ट्रॉनिक सस्ते सामानों के मिट्टी के दियो की खरीददारी जरूर करता है।चीन हमें आजादी मिलने के बाद से ही दुश्मन मानता है और हमारे दुश्मनों को पनाह देकर हमारे देश को क्षति पहुंचाने के लिए गतिशील बना हुआ है और वह बदनियती से ऐसे समय युद्ध कर चुका है जबकि आजादी के बाद हमारा देश अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। उसकी निगाह आज भी हमारी सरहद पर लगी रहती है और अपनी दादागीरी से हमारी सरजमीं को हड़पने की कोशिश करता रहता है।हर साल हम चीन के बने दीपावली से जुड़े सामानों के बहिष्कार करने की बड़ी बड़ी लच्छेदार बातें तो करते हैं लेकिन कभी चीन निर्मित सामानों का बहिष्कार नहीं कर पाते हैं।आजकल बाजार में चीन का बना हर सामान धड़ल्ले से बिक रहा है और कुल खपत का करीब साठ फीसदी सामान चीन का बना बिक रहा है।अगर सिर्फ छः महीने के लिए हम सभी देशवासी चीनी सामानों का पूर्ण बहिष्कार कर दे तो वह अपनी औकात में आ सकता है लेकिन हम स्वदेशी आंदोलन तो करते हैं लेकिन सामान चीनी ही इस्तेमाल करते हैं। दीपोत्सव के इस पर्व पर हर देशवासी का धर्म बनता है कि वह अपने कुम्हारी कला से जुड़ी लोगों के चेहरों पर पर्व की खुशी बिखरने के चीनी इलेक्ट्रॉनिक सामानों की जगह देशी सजावटी सामानों के साथ मिट्टी के दीयों की खरीददारी करकर राष्ट्र भक्ति का परिचय दे। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् /गुडमार्निंग / नमस्कार / अदाब / शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः --------/ ऊँ नमः शिवाय।।
           भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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