Saturday, January 12, 2019

मीडिया रिपोर्टर प्रेस परिषद लड़ेगा पत्रकारों की लड़ाई

रामा नन्द तिवारी
नई दिल्ली। समाज सेवियों एवं पत्रकारों को संगठित करके देश से भ्रष्टाचार खत्म करने में "मीडिया रिपोर्टर्स प्रेस परिषद" भ्रष्टाचार के खिलाफ वैधानिक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो रहा है। हांलाकि देश में इस तरह के हजारों संगठन बने हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर कार्य नहीं होने के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सफल नहीं हो पायें हैं। जिसका एक कारण वर्ग-भेद भी है अर्थात इन संगठनों में या तो सिर्फ पत्रकारों को जोड़ा गया है या फिर केवल समाजसेवियों को ही। वैसे तो समाजसेवी एवं पत्रकारों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। क्योंकि दोनों का लक्ष्य प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से समाज से बुराईयों को खत्म करना ही है। किन्तु दोनों ही वर्गों में आपसी तालमेल न होने के कारण कार्यसिद्धि तक नहीं पहुंच पाये हैं। "मीडिया रिपोर्टर्स प्रेस परिषद" में पत्रकार एवं समाजसेवी दोनों को ही स्थान दिया गया है। पत्रकार एवं समाज सेवी दोनों ही एक - दूसरे पूरक भी हैं।   आज भ्रष्टाचार पूरे देश में महामारी की तरह फैला हुआ है। इससे कोई भी विभाग अछूता नहीं हैं। यहां तक कि शासन सत्ता की कमान सभांलने वाली राजनैतिक पार्टियां भी इससे अछूती नहीं है। चुनाव के समय टिकट के बदले करोड़ों रूपये लेने वाली पार्टियों सें भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। एक ओर पार्टी से टिकट लेने पर रिश्वत देना तो दूसरी ओर वोट के बदले नोट देने वाले विधायक और सांसद भला भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या लड़ाई लडेगें ? सबसे पहले तो वे भ्रष्टाचार में स्वंय लिप्त होकर अपना खर्चा पूरा करने की जुगत में ही रहेंगे। फिर इतनी मेहनत से कुर्सी मिलने के बाद कमाई की ओर ही ध्यान जाता है। ऐसे में इन नेताओं से भ्रष्टाचार को खत्म करने की आशा करना चील के घोंसले में मांस ढूढ़ने के बराबर ही हैं।  सुना है थाना/चौकी एवं कोतवालियों में भी ठेके देकर चार्ज दिया जाता है। जब किसी थाना का जार्ज पाने वाला थानेदार अपने उच्चाधिकारियों को लाखों देकर थानेदारी हासिल करता है। तो क्या उससे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही किये जाने की बात की जा सकती है। भ्रष्टाचार में लिप्त विभागों की बात करें तो पुलिस विभाग का नाम सबसे आगे आता है। क्योंकि इस विभाग में कोई भी विवाद अथवा वारदात घटित होने पर सबसे पहले तो पीड़ित का मुकदमा लिखने में ही हीलाहवाली करके रकम ऐंठी जाती है और फिर मुकदमा लिखने के बाद विवेचना के समय अपराधिक धाराओं को कम व ज्यादा करने के लिए आरोपी से सौदा किया जाता है। परिणाम यह होता है। कि यदि आरोपी ने 50 हजार नगद विवेचक को दे दिये तो आईपीसी की धारा 308 के स्थान पर 323 या 324 ही रह जाती है अर्थात प्राणघातक हमला मामूली चैटों तक ही सीमित रह जाता है। इतना ही नहीं! यदि आरोपी 50 हजार के स्थान पर दारोगा जी को 1 लाख रूपये की रिशवत दे दे तो मात्र शान्ती भंग जैसी मामूली धाराओं में चालान कर दिया जाता है। विवेचना के नाम पर रिश्वत लेने वाला वह दारोगा अपने आकाओं तक हिस्सा पहुंचाने की बात भी बताता है। कुछ तथाकथित मीडिया कर्मी भी दरोगा जी के साथ शाम को पैक लगाने एवं अपनी बाईकों में पेट्रोल भरवाने से ही दारोगा जी के दोस्त बनकर अपनी क़लम को सियाही में दुबाने की बजाए मदरा में वोर कर खबर लिखते हैं तो क्यां उनकी क़लम से सच्चाई लिखे जाने की उम्मीद की जा सकती है  भ्रष्टाचार के इसी चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए "मीडिया रिपोर्टर्स प्रेस परिषद" सच्चे व सभी प्रकार की मीडिया के पत्रकार एवं ईमानदार समाज सेवियों को संगठित करके देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ वैधानिक जंग लड़ने की तैयारी कर रहा है। संगठन के ईमानदार व कर्मठ सिपाही भारत के प्रत्येक राज्य में पत्रकारों एवं समाज सेवियों के घर-घर जाकर उन्हे जागरुक करके समाज व देशहित के कार्य में लग चुके हैं। मीडिया रिपोर्टर्स प्रेस परिषद नाम का यह संगठन देशव्यापी समाज की कुरीतियों, कुप्रथाओं को समाप्त करने के साथ ही सच्चे व ईमानदार पत्रकारों व समाजसेविओं के उत्पीड़न रोकने एवं पत्रकारों के खिलाफ षड़यन्त्र रचने वाले भ्रष्टाचारियों को कानूनी सिकजों में फसाने के उद्देष्य से अग्रसर हो रहा है। फिलहाल संगठन को भारत सरकार से पंजीकृत कराया  जा चुका है। यह जानते हुए भी कि इस कार्य में देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने का स्वप्न देखना, रेत पर घर बनाने के समान है। लेकिन भारतीय सेना की कर्मठता की तर्ज पर हर कदम आगे की ओर ही बढ़ाया जायेगा। फिर परिणाम कुछ भी हो। क्योंकि हमारा देश का फौजी जब सीमा पर जाता है तो उसे कश्मीर  जैसे माहौल में पत्थर भी खाने पड़ते है। किन्तु देश की रक्षा के ठोस इरादे रखने वाले पत्थरों से पिटने के बाद भी देश की रक्षा का कार्य नहीं छोड़ते। फिर चाहें उन्हें किनती ही कुर्बानियां क्यों न देनी पड़े।

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