Monday, February 25, 2019

आंगनबाड़ी की समस्याएं और मुख्यमंत्री के निर्णय पर विषेस

         सम्पादकीय

जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि वंश परिवार वृद्धि में  जननी के रूप में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।यह नारीशक्ति जीवन में तमाम उत्तरदायित्वो का निर्वाहन बखूबी करते हुए को अगली पीढ़ी  को आगे बढ़ाने में इतनी निशक्त जर्जर हो जाती है कि वह कभी कभी ममतत्व के समय कुपोषण का शिकार होकर कभी-कभी जान पर खेल जाती है। गर्भवती माताओं को कुपोषण से बचाने तथा उनके पेट में पल रहे गर्भ को स्वस्थ रखने कै ही नहीं बल्कि बच्चा पैदा होने के बाद  शिशु और मां दोनों के लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के साथ साथ उनके शिशुओं यानी  छोटे बच्चों को एकत्र करके उन्हें स्वस्थ शिक्षित बनाने के उद्देश्य से  प्रदेश में समाज कल्याण विभाग  बाल विकास परियोजना चलाई जा रही है।सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना को मूर्ति रूप में देने के लिए आंगनबाड़ी केंद्र पिछले 80 के दशक से गांव गांव चलाए जा रहे हैं। गांव में इन्हें मूर्त रूप देने का कार्य करने के लिए आंगनबाड़ी एवं सहायकाओं द्वारा किया जा रहा है। आंगनबाड़ी केन्द्र की बड़ी दीदी के रूप में जहां केन्द्र पर मुखिया की भूमिका निभाती है तो वहीं उनकी सहायिका छोटी दीदी के रूप में  घर घर से बच्चों को  केन्द्र पर एकत्र करने  में अहम भूमिका निभाती हैं। आंगनबाड़ी केंद्र प्रत्येक ग्राम पंचायत में  एक नहीं बल्कि जनसंख्या के आधार पर एक ही ग्राम पंचायत में कई केंद्र  हैं। इसलिए इनका जुड़ाव सीधे आम जनमानस से होता है और सरकार की विभिन्न योजनाओं को इनके माध्यम से चलाया जाता है। यही कारण है कि राज्य एवं केंद्र सरकार  की तमाम गांव से जुड़ी योजनाओं के संचालन में इनका सहयोग लिया जाता है यह दोनों बड़ी दीदी और छोटी दीदी सरकार के सारे कामकाज सरकारी कर्मचारी की तरह जिम्मेदारी से करती हैं इसके बावजूद सरकार इन्हें अपना कर्मचारी नहीं मानती है। आंगनबाड़ी अपने संगठन के माध्यम से पिछले कई वर्षों से अपने को सरकारी कर्मचारी घोषित करने के साथ साथ मानदेय के रूप में मिलने वाले अपने  मेहनताना में वृद्धि आदि करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रही हैं। लेकिन दुख की बात है कि इन पर जिम्मेदारियों का बोझ तो बढ़ाया जाता रहा लेकिन इनकी दुर्दशा की तरफ किसी  ने ध्यान नहीं दिया। इधर लोकसभा चुनाव के मद्देनजर योगी सरकार ने इन आंगनबाड़ियों एवं उनकी सहायकाओ को भले ही वेतन में वृद्धि करके उन्हें तोहफा के रूप में उनकी एक मांग को पूरी कर दिया है।सरकार का यह फैसला आंगनबाड़ी एवं उनकी सहायिकाओं के लिए दर्द पर मरहम लगाने जैसा स्वागत योग्य एवं सराहनीय फैसला है लेकिन जिस वजूद की लड़ाई अब तक वह लड़ रही थी वह पूरी नहीं हुई है ।यही कारण है की सरकार के इस फैसले से जितनी खुशी उन्हें होनी चाहिए उतनी नहीं हो पा रही है क्योंकि आंगनबाड़ी  अपने वजूद के सामने इस फैसले को कोई विशेष महत्व ही दे रही हैं। उसका कहना है कि अगर हमें तोहफा देना ही था तो ऐसा देते जो मरते दम तक याद रहता और अपने को सरकारी कर्मचारी होने का गर्व हो जाता। सरकार के इस फैसले पर उत्तर प्रदेश आंगनबाड़ी कर्मचारी संघ के एक वरिष्ठ नेता ने भी कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया कुछ समाचार पत्रों में दी है। इसके बावजूद आंगनबाड़ी संघ सरकार के फैसले का स्वागत किया है लेकिन वजूद की लड़ाई शुरू रखने का फैसला भी किया है। सरकार के फैसले से आंगनबाड़ी और उनका संगठन भले ही पूरी तरह संतुष्ट न हुआ हो लेकिन एक बात तो सच तो है ही  कि उन्हें मानदेय वृद्धि से एक भारी राहत मिली है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।।सुप्रभात/वंदेमातरम/गुडमार्निंग/नमस्कार/अदाब/शुभकामनाएं।।ऊँ भूर्भुवः स्वः------/ऊँ नमः शिवाय।।।
     भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी

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