Monday, April 1, 2019

पति की हत्या के बदले बाहुबली सांसद अतीक अहमद का राजनीतिक कैरियर खत्म कर चुकी है पूजा पाल

पूजा पाल के पति राजू पाल की हत्या हुई और उसके बाद अतीक अहमद का सियासी करियर खत्म हो गया.
28 मार्च, 2019. समाजवादी पार्टी की उम्मीदवारों की एक लिस्ट आई. इस लिस्ट में उन्नाव से सपा ने जिसे प्रत्याशी बनाया है, उनका नाम है पूजा पाल. बीएसपी की दो बार की विधायक और मरहूम राजू पाल की पत्नी. उस राजू पाल की, जिनकी 25 जनवरी, 2005 को इलाहाबाद में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. और इसका इल्जाम आया था बाहुबली सांसद अतीक अहमद और उनके छोटे भाई अशरफ पर25 साल से विधायक रहे अतीक बन गए सांसद और शुरू हो गई दुश्मनीइलाहाबाद शहर. साल 2004. लोकसभा का चुनाव होने वाला था. समाजवादी पार्टी ने इलाहाबाद शहर पश्चिमी के लगातार पांच बार के विधायक रहे अतीक अहमद को फूलपुर से लोकसभा का उम्मीदवार बना दिया. तब तक अतीक अहमद पर बाहुबली का तमगा लग चुका था. अतीक चुनाव लड़े और जीत गए. इलाहाबाद शहर पश्चिमी की सीट खाली हो गई. अब वहां पर उपचुनाव होना था इलाहाबाद शहर पश्चिमी से लगातार पांच बार विधायक रहे अतीक अहमद सांसद का तमगा पाने से पहले बाहुबली बन गए थे.
अतीक अहमद ये सीट अपने घर में रखना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने अपने छोटे भाई अशरफ को इस सीट से उम्मीदवार बना दिया. तब सपा और बीएसपी के बीच 36 का आंकड़ा था. सरकार सपा की थी. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और मायावती ने राजू पाल को उम्मीदवार बना दिया. राजू पाल का इतिहास भी कुछ पाक साफ नहीं था. चुनाव लड़ने के लिए जब राजू को टिकट मिला, तो उसपर हत्या, हत्या की कोशिश समेत कुल 25 केस दर्ज थे. नतीजा आया तो 25 साल के बाद अतीक का किला ध्वस्त हो चुका था. बीएसपी के राजू पाल ने सपा के उम्मीदवार और अतीक अहमद के छोटे भाई अशरफ को करीब चार हजार वोटों से हरा दिया था. और इस हार ने राजू पाल को अतीक अहमद के निशाने पर ला दिया अतीक अहमद और उनके गुर्गों को चुनाव हारने की टीस सालने लगी थी. अक्टूबर, 2004 में राजू पाल विधायक बने थे. इसके डेढ़ महीने के बाद ही 21 नवंबर को राजू पाल पर उनके ऑफिस के पास बमबाजी की गई, फायरिंग भी हुई, लेकिन राजू पाल बच गए. इसके करीब एक महीने बाद 28 दिसंबर को भी उनकी गाड़ी पर फायरिंग की गई, लेकिन वो बच गए. राजू पाल ने कहा कि सांसद अतीक अहमद से जान का खतरा है, वो बार-बार हमला करवा रहे हैं, लेकिन पुलिस ने उन्हें सुरक्षा नहीं दी 25 जनवरी, 2005. विधायक राजू पाल स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल के पोस्टमॉर्टम हाउस में थे. उनके गांव के ही एक छात्र की हत्या हो गई थी. शाम के करीब 3 बजे वो पोस्टमॉर्टम हाउस से घर के लिए निकले. दो गाड़ियों का काफिला था. एक क्वॉलिस में वो खुद बैठे थे और उसे ड्राइव कर रहे थे. पीछे एक स्कॉर्पियो थी. दोनों ही गाड़ियों में एक-एक बॉडीगार्ड बैठे थे. शहर के व्यस्ततम बालसन चौराहे पर नेहरू पार्क के पास जैसे ही राजू पाल की क्वॉलिस पहुंची, पहले से घात लगाए बदमाशों ने फायरिंग शुरू कर दी. राजू पाल ने गाड़ी आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन तबतक एक और गाड़ी उनकी गाड़ी का रास्ता रोक चुकी थी और फायरिंग शुरू हो गई थी. राजू पाल को कई गोलियां लगीं, जिसके बाद फायरिंग करने वाले फरार हो गए. पीछे की गाड़ी में बैठे समर्थकों ने राजू पाल को एक टेंपो में लादा और अस्पताल की ओर लेकर भागे. इस दौरान फायरिंग करने वालों को लगा कि राजू पाल अब भी जिंदा है. एक बार फिर से टेंपो को घेरकर फायरिंग शुरू कर दी गई. करीब पांच किलोमीटर तक टेंपो का पीछा किया गया और गोलियां मारी गईं. अंत में जब राजू पाल जीवन ज्योति अस्पताल पहुंचे, उन्हें 19 गोलियां लग चुकी थीं. डॉक्टरों ने उनको मरा हुआ घोषित कर दिया.
राजू पाल की हत्या के बाद उपचुनाव में बीएसपी ने पूजा पाल को उम्मीदवार बना दिया था.
राजू पाल की हत्या के बाद उपचुनाव में बीएसपी ने पूजा पाल को उम्मीदवार बना दिया था.
राजू पाल की मौत की खबर के तुरंत बाद शहर में दंगे जैसी हालत हो गई. अगले दिन 26 जनवरी थी. शहर में पुलिस फोर्ट भी थी, लेकिन वो दंगा रोकने में नाकाम रही. जगह-जगह पर आगजनी और बमबाजी हुई. पुलिस जब राजू पाल की डेड बॉडी को लेकर स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल में पोस्टमॉर्टम के लिए पहुंची तो राजू पाल के समर्थक डेड बॉडी लेकर भाग गए. किसी तरह से पुलिस ने देर रात को बॉडी बरामद की, पोस्टमॉर्टम करवाया और फिर दारागंज में अंतिम संस्कार कर दिया राजू पाल की हत्या के आरोप में पुलिस ने सांसद अतीक अहमद और अतीक के भाई अशरफ के अलावा सात और लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया. उपचुनाव हुए. 10 दिन पहले ही राजू पाल के साथ शादी कर उनके घर आईं पूजा पाल को बीएसपी ने उम्मीदवार बना दिया. सपा से उम्मीदवार बने राजू पाल की हत्या के मुख्य आरोपी अशरफ. नतीजा आया तो अशरफ जीत गए थे. पूजा पाल हार गईं करीब 13 हजार वोटों से 2007 में फिर से विधानसभा के चुनाव हुए. पूजा पाल को फिर से बीएसपी ने उम्मीदवार बनाया. सपा के उम्मीदवार बने अशरफ. नतीजे आए तो पूजा पाल ने अशरफ को करीब 10 हजार वोटों से मात दी थी. और अशरफ ही क्यों, पूजा पाल ने तो फिलवक्त यूपी के उपमुख्यमंत्री रहे केशव प्रसाद मौर्य को भी तीसरे नंबर पर धकेल दिया था 2012. समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव चेहरा बन चुके थे. विधानसभा चुनावों के लिए सड़क पर उतरकर पार्टी का प्रचार कर रहे थे. और अखिलेश का ही प्रभाव था तमाम कोशिशों के बावजूद अतीक अहमद की सपा में वापसी नहीं हो पाई थी. अतीक की जगह पर सपा ने ज्योति यादव को उम्मीदवार बना दिया था. बीएसपी से मैदान में थीं पूजा पाल. और जब नतीजा आया, तो अतीक अहमद को उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनैतिक मात मिल चुकी थी. अतीक उस सीट से करीब 9 हजार वोटों से चुनाव हार चुके थे, जिस सीट से वो लगातार 25 साल तक विधायक रहे थे.
2017 में विधानसभा के चुनाव होने थे. बीएसपी की विधायक पूजा पाल के बीजेपी में जाने की अफवाह उड़ने लगी थी. और इसी बीच बीजेपी ने इस सीट से लाल बहादुर शास्त्री के नाती सिद्धार्थ नाथ सिंह को उम्मीदवार घोषित कर दिया. पूजा पाल फिर से बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ने उतरीं. नतीजे आए तो सिद्धार्थ नाथ सिंह जीत गए थे. पूजा पाल तीसरे नंबर पर थीं. दूसरे पर सपा की ऋचा सिंह थीं, जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का छात्रसंघ चुनाव जीतकर चर्चा में आई थीं. पूजा पाल हार गईं. और इस हार के बाद ही पूजा पाल ने क्षेत्र में अपनी सक्रियता खत्म कर दी. करीब एक साल बाद 21 फरवरी, 2018 को बीएसपी की ओर से एक प्रेस रीलिज़ जारी की गई. प्रेस रीलिज़ जारी की थी इलाहाबाद-मिर्जापुर मंडल के जोनल कोऑर्डिनेटर अशोक कुमार गौतम ने. लिखा था-2017 के चुनाव के बाद पूजा पाल अपने क्षेत्र में नहीं गईं. पार्टी कार्यकर्ताओं का फोन उठाना बंद कर दिया. पार्टी की बैठकों और सभाओं में शामिल नहीं हुईं. इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए पार्टी अध्यक्ष मायावती के निर्देश पर पूजा पाल को पार्टी से बाहर किया जाता है.”
बीएसपी की इस घोषणा के करीब एक साल एक महीने के बाद सपा की एक प्रेस रीलिज़ जारी होती है और इसमें लिखा है कि उन्नाव से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी हैं पूजा पाल. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बीएसपी से निकाली गईं पूजा पाल को अखिलेश यादव ने अपने पाले में ले लिया. इसके लिए 2014 के लोकसभा चुनाव की ओर जाना होगा भाई अशरफ की हार से बौखलाए हुए अतीक अहमद खुद चुनावी मैदान में उतर गए.2014 में अतीक अहमद सपा के टिकट पर श्रावस्ती से चुनावी मैदान में उतरे थे राजू पाल की हत्या के बाद अतीक अहमद फरार हो गए थे. सांसद होने के बाद भी पुलिस ने उनपर इनाम घोषित कर रखा था. दबाव मुलायम सिंह पर भी था, तो उन्होंने दिसंबर, 2007 में अतीक को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. अतीक को सरेंडर करना पड़ा. 2012 में जब अखिलेश यादव ने सत्ता संभाली तो अतीक को सपा में फिर से राह दिखी. लेकिन अखिलेश अड़े रहे. पर मुलायम के आशीर्वाद से अतीक फिर से पार्टी में आ गए. 2014 में सुल्तानपुर से टिकट भी पा गए, लेकिन विरोध हो गया. सीट बदलकर श्रावस्ती दी गई और वो फिर से हार गए.2017 में अतीक अहमद को सपा ने कानपुर कैंट से विधानसभा चुनाव लड़ने को कहा. लेकिन अखिलेश यादव अड़ गए. अतीक को किसी भी कीमत पर पार्टी से बाहर करने के लिए. फिर 1 जनवरी, 2017 आई. मुलायम को हटाकर अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. और इसी के साथ अतीक अहमद का करियर खत्म हो गया. अतीक पार्टी से निकाल दिए गए. अतीक को अर्श से फर्श पर पटकने के इस क्रम में मायावती और अखिलेश के साथ ही पूजा पाल का भी हाथ रहा था. पूजा पाल से टकराने के बाद अतीक अहमद कभी कोई चुनाव जीत नहीं पाए. 2017 में जब केशव प्रसाद मौर्य यूपी के उपमुख्यमंंत्री बन गए और फूलपुर की सीट उन्होंने खाली कर दी, तो अतीक फूलपुर से उपचुनाव लड़े.  निर्दलीय. और फिर से हार गए अखिलेश यादव को भी इस बात का बखूबी इल्म है. कि अतीक अहमद की सल्तनत को अकेले पूजा पाल ने चुनौती दी थी. अतीक अखिलेश को फूटी आंख नहीं सुहाते हैं. अतीक के लिए पिता मुलायम से भी अखिलेश की अनबन हो चुकी है. और यही वजह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए जब सपा और बीएसपी का गठजोड़ हुआ तो अखिलेश यादव ने पूजा पाल पर दांव लगाया है. अखिलेश ने अपने खाते से पूजा पाल को उन्नाव का उम्मीदवार बना दिया।

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