Friday, June 7, 2019

सत्ता प्राप्ति के लिए सिद्धान्तों और वसूलों को कुर्बान कर स्वार्थ पूर्ति करते राजनीतिक दल

सभी जानते हैं कि लोकतंत्र में प्रजातांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए जनता द्वारा चुने गए राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों से बहुमत  के आधार पर सरकार बनती है। यह भी सभी जानते हैं कि हर राजनीतिक दल की अपनी एक अलग विचारधारा और अपनी एक अलग सोच एवं संस्कृति होती है। यह भी सब जानते हैं कि सभी राजनीतिक दलों की सत्ता तक पहुंचने की प्रबल चाह होती है और वह इस चाहत को पूरा करने के लिए आज के बदलते परिदृश्य में सारी नीतियों रीतियों एवं सिद्धांतों को बलायें ताख रखने से भी गुरेज नहीं करते हैं।सत्ता प्राप्ति के लिए राजनैतिक वसूलों सिद्धांतों की तिलांजलि देकर बनने वाले यह राजनैतिक गठबंधन अधिकांशतः टिकाऊ या दीर्घकालिक नहीं होते हैं। राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के उद्देश्य मात्र से बनने वाले यह क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के गठबंधन उद्देश्य पूर्ति न होने पर पानी के बुलबुले की तरह क्षण भर में टूटकर चकनाचूर हो जाते हैं। राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर आजादी के बाद से कई बार गठबंधन की सरकारें बन बिगड़ चुकी हैं लेकिन हर गठबंधन की सरकार में सहयोगी दल अपने अपने उद्देश्य पूर्ति के लिए बराबर दबाव बनाते रहते हैं।वर्तमान सत्तारूढ़ भाजपा हो चाहे उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस हो दोनों गठबंधन के आधार पर पिछले लम्बे अरसे बाद राजनैतिक सफर तय कर रहे हैं।अभी पिछले लोकसभा चुनावों में सत्तारूढ़ दल के गठबंधन को नेस्तनाबूद करके सत्ता के गलियारे तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक महागठबंधन की परिकल्पना की गई थी जो पूरी नहीं हुयी लेकिन समाजवादी पार्टी,राष्ट्रीय लोक दल एवं बसपा का एक संयुक्त गठबंधन बनाया गया था।सभी जानते हैं कि जातीय समीकरण के आधार पर उत्तर प्रदेश को बसपा सपा एवं रालोद की राजनैतिक सरजमी माना जाता है और तीनों में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा बना रहता है ।यही कारण था कि सत्तादल भाजपा को सत्ता से हटाकर सत्ता तक पहुंचने के स्वार्थ के वशीभूत होकर राजनैतिक आकाओं की स्वार्थवादी नीति को चुनाव में मतदाता भगवान ने नाकार कर जातिवाद की जकड़ती जड़ को काटने का प्रयोग किया है जो स्वागत योग्य है और इसके लिये जागरूक मतदाता बधाई के पात्र हैं।आजादी के बाद समाज के समाजिक ढांचे को जिस तरह जाति धर्म सम्प्रदाय में विभक्त कर दिया गया है उसके खात्मे के लिये मतदाताओं द्वारा पिछले लोकसभा चुनावों में दिया गया जनादेश जरूरी हो गया था।लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए सिर्द बना दिखने वाला दो विपरीत कार्यशैली एवं विचार धाराओं वाला   राजनैतिक गठबंधन चुनाव परिणाम आने के बाद स्वार्थ सिद्धि न होने के बाद टूटने की कगार पर है और इससे जुड़े तीनों दलों ने बिखर कर आगामी विधानसभा उपचुनावों में  अलग अलग लड़ने का ऐलान कर दिया है।सभी जानते हैं कि पिछले बीते चुनाव में महागठबंधन बुरी तरह पराजित हो गया है और उनका जातीय फार्मूला नेस्तनाबूद हो गया है।गठबंधन के सहारे वजूद में आई बसपा की प्रमुख बहन जी ने कहा है कि सपा के वोट बिखर गये जिसकी वजह से हार हुयी है जबकि तीन दिन पहले सपा के संस्थापक अनुभवी मंझे हुये राजनैतिज्ञ नेता जी के नाम से सम्मानित मुलायम सिंह यादव चुनाव के पहले भी इस गठबंधन के खिलाफ थे और चुनाव के बाद सपा प्रमुख बने बेटे को फटकार लगा चुके हैं।अखिलेश यादव भी इसे वैज्ञानिक असफल प्रयोग बताकर अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है।चुनाव के दौरान भाजपा द्वारा की गई घोषणा मतगणना होने के एक सप्ताह बाद फलीभूत हो रही हैं और गठबंधन टूटने की कगार पर आकर आम लोगों में चर्चा का विषय बन गया है। सभी जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में सपा एवं बसपा दोनों के बिके माने जाने वाले वोटरों का समूह टूटकर धराशायी हो गया है और नया राजनैतिक परिदृश्य उभरकर सामने आया है।पिछले2014 के लोकसभा चुनाव में एक अच्छी पहचान रखने वाली सपा इस चुनाव में फुटपाथ पर आ गई है क्योंकि उनके गठजोड़ से जुड़ी जातियों एवं सम्प्रदायों का वोट नहीं मिला और वह भाजपाई हो गये हैं जबकि पिछले चुनाव में कुड़ी साफ करने वाली बसपा के दर्जनों सासंद इस चुनाव में जीत गये हैं।मतलब साफ है कि बसपा को सपा मतदाताओं का समर्थन मिला लेकिन सपा को बसपा समर्थक वोटरों का समर्थन नहीं मिला है लेकिन बसपा इसे मानने को तैयार नहीं है।वैसे गठबंधन बनाकर काम निकलने के बाद उसे तोड़ देना बषपा का पुराना इतिहास रहा है।गठबंधन बनाने के समय अगर सपा प्रमुख अखिलेश ने अपने पिता और पार्टी के जन्मदाता मुलायम सिंह यादव की बात मानकर बसपा से गठजोड़ न किया होता तो शायद आज इतनी बुरी दुर्दशा नहीं होती और बसपा को वजूद में वापस लौटने का अवसर नहीं मिलता। धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात/वंदेमातरम/गुडमार्निंग/नमस्कार/अदाब/शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुवः स्वः-----/ऊँ नमः शिवाय।।।

   भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रायसनेहीघाट, बाराबंकी यूप

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