Thursday, July 11, 2019

देवलोक से आई कामधेनु स्वरूपा गाय और आवारा गोवंशीय पर विशेष

एक समय था जबकि गाय के कमाऊँ पुत्र को भगवान शिव की सवारी नंदी मानकर पूजा जाता था और वह बदले में अपनी मेहनत से किसानों का घर धन्य धान्य से भर देते थे जिससे उनका और उनके पालक का पेट भरता था। कहावत थी कि "या धन बाढ़ै नदी के काछा या धन बाढ़ै  गऊ के बाछा"। इसी तरह हम गाय को देवता स्वरूप जीवनदायिनी मानकर उसकी पूजा अर्चना करते हैं और वह बदले में वह अमृत रूपी अपना दूध हमें प्रदान करती थी। जब गाय या बछड़ा बूढ़ा हो जाता था तब भी लोग उसे कसाई के हाथ बेचना पसंद नहीं करते थे और कहते थे कि हमारे खूंटे पर ही मर जाएगा तो बेहतर होगा क्योंकि इसने जिंदगी भर हमें कमाया खिलाया है। एक समय वह भी था जब गाय को गोधन माना जाता था जिसके बारे में कहा गया है कि-" गोधन गज धन बाजधन और रतन धन खान जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान "। आज जबकि हम पहले की अपेक्षा अधिक पढ़ लिख समझदार हो गए हैं लेकिन इस समय  हम अपनी संस्कृति को भूल कर देव लोक से कामधेनु के रुप मिली  गाय और उसकी संतान को काम निकलने के बाद त्याग देने की परंपरा शुरूआत कर दी है। इस नयी प्रथा के चलते आज प्रदेश में किसानों के सामने एक विषम समस्या खड़ी हो गई है और कुछ लोगों का गुनाह पूरे समाज को प्रभावित कर रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग हो चाहे राजमार्ग मार्ग या गली गलियारा हो चाहे गांव  गली शहर खेत खलिहान या फिर तहसील थाना ब्लॉक हो हर जगह गाय के बछड़ों को इधर उधर भटकते भिड़ते मार खाते और जान से जाते देखे जा सकते हैं।इनसे किसान भी परेशान शहरी भी परेशान और सभी के लिए आज यह गाय के बछड़े  दुश्मन बने हुए हैं। गाय पालने वाले लोगों ने गाय और उनके बछड़े को दूध छोड़ने के बाद भगाकर आवारा बनाने की नयी परम्परा शुरू कर दी है। सरकार द्वारा इन्हें पूज्य मानकर इनका वध कराने की जगह इन्हें सरकारी संरक्षण प्रदान करने का संकल्प लेते हुए हर विकास खंडों इन आवारा छुट्टा पशुओं के रहने खाने के लिये  गोवंश आश्रय केंद्र खोले जा रहे हैं। जहां पर इन आवारा घूम रहे गोवंशीय पशुओं को सरकारी खर्चे पर रखना शुरू हो गया है। सवाल इस बात का है कि अगर इन्हें छोड़ने का क्रम इसी तरह से जारी रहा तो इनके लिए व्यवस्था करना सरकार के लिए भी समस्या नही बन जाएगा। इस समस्या के समाधान के लिए गो पालकों को धर्मनिष्ठ कर्तव्यनिष्ठ  होना होगा और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना होगा। अगर उन्हें गाय पालने का शौक है तो उनके बच्चों और उन्हें संरक्षित करने का उनका धर्म भी निभाये। इस समय सड़कों पर घूम रहे अच्छी विभिन्न नस्लों के बछड़े सांड़ बनकर  घूम रहे हैं। अच्छी किस्म के बछड़े अच्छे किस्म की गाय पालने वालों के ही हो सकते हैं आम लोगों के नही हो सकते हैं।  आज तमाम लोग सरकारी अनुदान लेने के लिए  गोशालाएं  चला रहे हैं उनसे पूंछना चाहिए कि उनके यहाँ  जो बछड़े पैदा होते हैं वह कहां जाते हैं? वैसे सरकार द्वारा गांवों में सर्वे करवाकर पशुओं की गणना कराई गई है लेकिन गोशालाओं के संचालकों के यहाँ गणना नहीं की गई है जबकि सबसे ज्यादा बछड़े या सांड़ अच्छी किस्म की गाय पालने वालों के यहाँ से निकलते हैं।।अब तो लोग अब अपनी गाय एवं उनकी संतानों को छोड़ने लगे। जब तक यह दोनों  गोपालक अपने धर्म एवं उत्तरदायित्व का निर्वाहन नहीं करते हैं तब तक इस समस्या का समाधान को पाना कठिन है।इधर कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां पर लोग अपने गाय एवं बछड़ों को  आश्रय आश्रम भेजने के लिए लेकर आने लगे हैं। किसानों ही नहीं आम नागरिकों की जान के दुश्मन बने छुट्टा गाय बछड़ा एवं  सांड की समस्या के निदान के लिए कानून बनाकर इस मनमानी पर रोकना जरूरी हो गया है। धन्यवाद।। सुप्रभात/ वंदेमातरम/ गुडमॉर्निंग/ नमस्कार/ आदाब/ शुभकामनाएं।।
भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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