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Monday, 7 October 2019

नगरीय निकाय चुनाव को लेकर कमलनाथ सरकार के अरमान पड़े ठंडे




भीपाल मध्य प्रदेश में इस बार नगरीय निकाय चुनाव में महापौर एवं नगर पालिका अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होना है। इस संबंध में राज्य सरकार ने अध्याधेश में बदलाव कर दिया है। हालांकि अध्यादेश को अभी तक राजभवन ने मंजूरी नहीं दी है। वहीं अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का विरोध कर रही भाजपा ने राज्यपाल लालजी टंडन को ज्ञापन सौंपकर महापौर चुनाव की प्रत्यक्ष प्रक्रिया को यथावत रखने की मांग की है। नगरीय निकाय चुनावों से जुड़े विधेयकों (बिल) को लेकर गवर्नर को भेजे गए दो अध्यादेश में से एक को राज्यपाल लालजी टंडन ने मंजूरी दे दी। महापौर के अप्रत्यक्ष चुनाव से जुड़े अध्यादेश को फिलहाल रोक दिया है। वहीं जिस एक अध्यादेश को मंजूरी दी है, वह पार्षद प्रत्याशी के हलफनामे से जुड़ा है। यदि किसी भी प्रत्याशी ने हलफनामे में गलत जानकारी दी तो विधानसभा चुनाव की तरह उन्हें 6 माह की सजा और 25 हजार रुपए का जुर्माना हो सकता है। राज्य निर्वाचन आयोग के अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया संबंधी प्रस्ताव को पिछले महीने कैबिनेट ने मंजूरी दी थी। जिसके तहत प्रदेश में महापौर का चयन निर्वाचित पार्षदों द्वारा किया जाना है। इसी तरह नगर पंचायत अध्यक्षों का निर्वाचन भी पार्षदों द्वारा होना है। इस प्रक्रिया का भाजपा विरोध कर रही है। इस संबंध में भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर निकाय चुनाव की अप्रत्यक्ष प्रक्रिया को मंजूरी नहीं देेने की अपील की है। बीजेपी नेताओं ने  उनसे कहा कि प्रत्यक्ष निर्वाचन से महापौर और नपाध्यक्ष का चुनाव होने से दल बदल नहीं होगा। खरीद फरोख्त जैसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलेंगी। पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, महापौर आलोक शर्मा, विधायक कृष्णा गौर और देवास महापौर सुभाष शर्मा ने राज्यपाल को बताया कि प्रदेश सरकार संविधान के विरुद्ध अप्रत्यक्ष रूप से महापौर और नपाध्यक्ष का निर्वाचन कराने की मंशा रखती है। एेसा हुअा तो यह फैसला संविधान के 74 वें संशोधन के खिलाफ होगा। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से आग्रह किया कि वे सरकार के महापौर, नपाध्यक्ष और नगर पंचायत अध्यक्ष के अप्रत्यक्ष निर्वाचन की कार्यवाही का अनुमोदन न करें।

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