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Wednesday, 9 October 2019

भगवान उनके भक्त और प्रेम




संपादकीय
के सी शर्मा
एक गांव में भोली-भाली गरीब लड़की पंजिरी रहती थी। वह भगवान मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। भगवान मदनमोहन भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे।वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ।
वह दूसरे दिन ही उन्हें वह चीज भेंट कर आती, पर वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती। वह रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती।
दूध वह नगर में दूसरे लोगों को भी देती। लेकिन मदनमोहन जी को दूध अपनी ओर से देती।उसके पैसे न लेती।

इस प्रकार वह दूध बेच कर अपनी जीवन नैय्या चलाती थी। लेकिन वह गरीब पंजिरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे मिलते कि दो वक्त का खाना भी खा पाये।

अतः मंदिर जाते समय पास की नदी से थोड़ा सा जल  दूध में सहज रुप से मिला लेती । फिर लौटकर अपने प्रभु की आराधना में मस्त बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती।

कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं ,नित नए रुप में प्रकट होते,कभी प्रत्यक्ष में और वह पंजिरी संसार की सबसे धनी स्त्री हो जाती।

लेकिन एक दिन उसके सुंदर जीवन क्रम में रोड़ा आ गया। दूध में जल के साथ-साथ एक छोटी मछली दूध में आ गई और संयोगवश वह मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।

दूध डालते समय मंदिर के गोसाई की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने दूध वापस कर पंजिरी को खूब डांटा फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया।

पंजिरी पर तो आसमान टूट पड़ा ।रोती-बिलखती घर पहुंची-" ठाकुर मुझसे बड़ा अपराध हो गया ।क्षमा करो ,पानी तो रोज मिलाती हूं ,तुमसे कहां छिपा है ।ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो।

लेकिन, प्रभु आज तक तो तुमने कोई आपत्ति कि नहीं प्रेम से पीते रहे ,हां मेरा दोष था कि पानी छानकर नहीं मिलाया । लेकिन दुख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाई ने पानी मिलाने पर मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ ना बोले।

ठाकुर अगर यही मेरा अपराध है तो में प्रतिज्ञा करती हूं कि ऐसा काम आगे ना करूंगी और अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार न करोगे तो मैं यहीं प्राण त्याग दूंगी।

तभी पंजिरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया-"माई ओ माई ।उठी दरवाजे पर देखा तो द्वार पर एक सुदर्शन किंतु थका-हारा भूखा-प्यासा एक युवक कुटिया में झांक रहा है।

"कौन हो बालक"

 मैया बृजवासी हूं मदन मोहन के दर्शन करने आया था। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए और रात भर सोने की जगह दे दो तो बड़ा आभारी रहूंगा।"

पंजिरी के शरीर में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। "कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है। ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मेरे जीवन में ऐसा जादू बिखेर दिया।दूर से आए हो क्या भोजन करोगे।"

"दूध के सिवा कुछ लेता नहीं ।तनिक दूध दे दो वही पी कर सो जाऊंगा।" दूध की बात सुनते ही पंजिरी की आंखें डबडबा आयी, फिर अपने आप को संभालते हुए बोली-
"पुत्र दूध तो है पर सवेरे का बासी है, जरा ठहरो अभी गाय को सेहला कर थोड़ा ताजा दूध दूह लेती हूं।"

"अरे मैया नहीं नहीं ।उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूं दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया ।अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दूहते रहना।"

डबडबायीआंखों से बोली" थोडा पानी मिला हुआ दूध है, पर उसमें मछली आ गई थी।" "अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या? जल्दी से कच्चा दूध छान कर ऐसे ही दे दो वरना मैं यही दम तोड़ दूंगा।"

पंजिरी को आश्चर्य हुआ कि कैसी बात कर बैठा यह युवक,दौड़ी-दौड़ी गई झटपट दूध दे दिया। इधर दूध पीकर युवक का चेहरा खिल उठा।                       

"मैया कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूं ही ना जाने क्या-क्या कह रही थी ,अब तो मेरी आंखों में नींद उतर आई है इतना कहकर युवक वही सो गया।

पंजिरी अकेली हो गई है तो दिन भर की कांति, दुख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आंखों में नींद कहां।

जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढा दी।
रात के अंतिम प्रहर जो आंख लगी कि कृष्ण कन्हैया को सामने खड़ा पाया।

मदन मोहन भगवान ने आज फिर से स्वप्न मे दर्शन दिए और बोले,"यह क्या मैया, मुझे को मारेगी क्या?

गोसाई की बात का बुरा मान कर रूठ गयी। खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने का कह रही हो।

मैंने तो आज तुम्हारे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर के कुछ खा पी ले और देख दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूं, उसी से मुक्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।

गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो, क्या हुआ?वह तो जल्दी हज़म हो जाता है।अब उठो और भोजन करो। पंजिरी हड़बड़ाकर के उठी देखा बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।

सचमुच भेस बदल कर कृष्ण कन्हैया ही कुटिया में पधारे थे। पंजिरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन को भोग लगाकर के साथ आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।

थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजिरी ने देखा कि कृष्ण कन्हैया उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।

इधर मंदिर के पट खुलते ही पुजारी ने मदन मोहनजी को देखा तो पाया की प्रभु फटी ओढ़नी ओडे़ आनंद के सागर में डूबे हैं। पुजारी समझ गये कि  प्रभु तुमने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य मेरी समझ में नहीं आ रहा है।

लीलाउद्घाटन के लिए पंजिरी मंदिर के द्वार पर पहूंची। खड़ी होकर पुजारी जी से कह रही थी,"गुसाई महाराज देखो तो प्रभु की लीला और माया,पीतांबर मेरे घर छोड़ आये  है और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।

कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था ,लेकिन भूखा प्यासा मेरा कन्हैया दूध के लिये घर आ गया।"

पुजारी देवी के सामने बैठ गए। "भक्त और भगवान के बीच मेंने क्या कर डाला ,भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला देवी मुझे क्षमा कर दो "पंजिरी के चरणों में रो-रो कर कह रहे थे पुजारी।

लेकिन उनका भक्ति सागर था जो भक्त में भगवान के दर्शन पाकर निर्बाध बह चला था।पंजिरी भी क्या कम भावावेश मे थी ।आनंद भक्ति के सागर मे हिलोरे लेती हुई कह रही थी।

"गुसाई जी देखी तुमने बाल गोपाल की चतुराई अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।लो भक्तों को सम्मान देना तो की पुरानी इनकी पुरानी आदत है।"

मूर्ति में विराजमान कन्हैया धीरे-धीरे मुस्कुरा कर कह रहे थे अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहां!!

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