मन चंगा तो कठौती में गंगा"-के सी शर्मा



*"मन चंगा तो कठौती में गंगा"-के सी शर्मा*


"शरीर को आत्मा से पवित्र होने की जरूरत है न कि किसी पवित्र नदी में नहाने से।
अगर हमारा हृदय और आत्मा शुध्द है तो हम पूरी तरह से पवित्र हैं चाहे हम घर में ही क्यों न नहायें..."

ऐसे थे संत शिरोमणि रविदास जी।
उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों और ढोंग को हमेशा चुनौती दी।
           
बनारस में गंगा किनारे  जन्मे श्री रविदास की महानता का अंदाज़ा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा लिखित पद, भक्ति-गीत और दूसरे लेखन के 41 पद पाँचवे सिक्ख गुरु अर्जन देव जी ने गुरुग्रंथ साहिब में संकलित की है।

राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी मीरा ने तो संत रविदास के अध्यापन से बेहद  प्रभावित थीं। उन्होंने संत रविदास को अपना गुरु माना था। मीरा अपने गीतों में कहती हैं कि,

"गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी,
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।"

संत रविदास को पंडित शारदा नंद ने तमाम सामाजिक विरोधों के बाद भी अपना शिष्य बनाया था। पढ़ाई के दौरान संत रविदास गुरु शारदानंद के पुत्र के मित्र बन गये। बताया जाता है कि दोनों लुका-छिपी का खेल रहे थे। अपने मित्र को खोजने की बारी रविदास की थी कि अंधेरा हो गया। अगले दिन खेल पूरा करने का वचन देकर रविदास घर चले गये। जब वे अगले दिन पाठशाला लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके गुरु और गुरुमाता रो रहे हैं। जब उन्होंने गुरु शारदानंद से रोने की वजह पूछी तो पता चला कि बीती रात उनके मित्र की मृत्यु हो गयी है। रविदास अपने मित्र के शव पहुंचे और कहा-उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त। ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है। रविदास जी के ये शब्द सुनते ही उनका मित्र फिरसे जी उठा। संत रविदास दैवीय शक्तियों से समृद्ध थे। वे कुष्ठ रोग का भी उपचार कर दिया करते थे।

संत रविदास कहते थे कि "ईश्वर ने इंसान को बनाया है न कि इंसान ने ईश्वर को।" उनका कहना था कि इस धरती पर सभी के अधिकार समान हैं। उस समय समाज में ऊंच-नीच और अस्पृश्यता का बोलबाला था। संत रविदास बहुत बहादुरी से सभी भेदभाव को स्वीकार करते और लोगों को वास्तविक मान्यताओं और जाति के बारे में बताते थे। संत शिरोमणि रविदास कहते थे कि कोई भी इंसान अपने जाति-धर्म के लिये नहीं जाना जाता। इंसान की पहचान उसके कर्मों से होती है।

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै ‘रैदासा’॥

अर्थात रविदास जी ईश्वर को अपना अभिन्न अंग मानते थे और ईश्वर के बिना जीवन की कल्पना भी नही करते थे।