जाने भगवान के अवतार का अत्यंत गोपनीय आध्यात्मिक रहस्य कथा-के सी शर्मा


बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। 
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥

भावार्थ:-ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे (अज्ञानमयी, मलिना) माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और (बाहरी तथा भीतरी) इन्द्रियों से परे हैं। उनका (दिव्य) शरीर अपनी इच्छा से ही बना है (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं)॥

 "वेदोक्त अभ्यास से विमुख (बिप्र), अनाचार से युक्त दैवीय गुण वाले (सुर), भेद बुद्धि उपासना में फंसे (संत) पुरुषों, और अत्याचार, पाप से दबी पृथ्वी (धेनु) के उत्थान के लिए निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा ने मानवी अवतार लिया है। 

अपनी ही इच्छा शक्ति से, विराट प्रकृति के समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर, अपना दिव्य सगुण साकार रूप बनाया है। माया के तीनों गुणों सत, रज, तम से निर्लेप रहते हुवे भी, उसके वशीभूत सा हुवा लीला करता दिखता है।"

विश्लेषण :-  "बिप्र" :- जो केवल वेदोक्त अचार का पालन करने वाला वेद का अभ्यासी है। उसे विप्र की संज्ञा दी गयी है। यही विप्र आगे सदाचार की सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण अर्थात जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता" भी होता है।

"धेनु" :- जिस प्रकार गौ अपने बछड़े का पालन करती है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी मनुष्यों सहित ८४ लाख योनियों के जरायुज, अण्डज, स्वदेज, उदि्भज जीवों को माता के समान पालन-पोषण करती है। रहने को स्थान और खाने को अन्न देती है। यहाँ पृथ्वी माता को धेनु शब्द से कहा गया है।

"सुर" :- तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता आदि दैविय गुणों से युक्त को सुर की संज्ञा दी गयी है।

"संत" :- ईश्वर के भक्त, साधु, संन्यासी, विरक्त, महात्मा को संत की संज्ञा दी गयी है। यही संत सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर आत्मज्ञानी / ब्रह्मज्ञानी कहलाते है।

"हित" :- बिप्र, धेनु, सुर, संत इन चारों शब्दो में पूरा चराचर जगत (समष्टि जगत) समा जाता है। हित अर्थात जब चराचर जगत का पतन होने लगता है। तब उनके उत्थान के लिए धर्म की स्थापना करना।

"लीन्ह मनुज अवतार" :- निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा या जीवनमुक्त सत्ता का अपनी उच्च स्थिति में स्थित रहते हुवे भी नीचे की सगुण साकार मानवी रूप में अभिव्यक्त होना।

"निज" :- प्रकृति के किसी भी बंधन में न होते हुवे भी अपनी स्वयं की मर्जी से।

"इच्छा" :- 'परब्रह्म की इच्छा शक्ति' या 'परमात्म ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) में स्थित पुरुष का दृढ़ निश्चय' सरल शब्दो में 'इच्छा शक्ति' दो शब्दों से मिल कर बनी है। दृढ़ निश्चय + ब्रह्मचर्य। "दृढ़ निश्चय" अर्थात ऐसा निश्चय जो किसी भी परिस्थिति में न बदले। और "ब्रह्मचर्य" अर्थात "ब्रह्म के समान आचरण" अर्थात निर्लेप / उदासीन / साक्षी / तटस्थ / निष्काम भाव से रहना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है।

(साधक, जिज्ञासु, भक्त इसी ब्रह्म आचरण की सिद्धि के लिए बाहर के ब्रह्मचर्य अर्थात विवाह न करना, त्याग, संयम, संतोष, तप आदि साधन करते है। और उनमें से कुछ तो अपने साधन को ही ब्रह्मचर्य समझ लेते है। जबकि शास्त्र, भीतर के ब्रह्म आचरण (ज्ञान में स्थिति) को ही ब्रह्मचर्य कहता है। फिर विवाह करे, चाहे शास्त्रोचित भोग भोगे, बाहर से सब कुछ करता हुआ भी भीतर से निर्लेप ही रहता है।)

"निर्मित तनु" :- प्रत्येक मनुष्य का अपना-अपना संस्कार (प्रकृति) और प्रारब्ध होता है। जिसको व्यष्टि कहते है। यही व्यष्टि सामूहिक रूप से समष्टि कहलाती है। परब्रह्म परमात्मा अवतार के समय, यही विराट समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर अपना सगुन साकार मानवी रूप बनाते है।

"माया गुन गो पार" :- माया के तीनों गुण सत, रज और तम से परे (निर्लेप / उदासीन / तटस्थ) होते हुवे भी माया के बीच रहना।

भूमिका :-  सृष्टि के आदि में केवल एक अद्वितीय सर्वशक्तिमान सचिदानंद परब्रह्म परमात्मा ही था। उसने इच्छा की "मैं एक से अनेक हो जाऊ" और वही ब्रह्मा बन के उत्पत्तिकर्ता, विष्णु बन के पालनकर्ता और महेश (शिव) बन के प्रलयकर्ता हुवा। 

उनकी ही इच्छा से क्रमिक विकास होते-होते, विविधता भरी जीव-ईश्वर, नाम-रूप सृष्टि प्रकाश में आयी। उसने ही जीवों के कल्याण के लिए वेदों को प्रगट किया। वेदों के ज्ञान के अनुसरण से जीव धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ सिद्ध करता हुवा पुनः अपने आदि स्वरुप ब्रह्म को उपलब्ध हो जाता है।

व्याख्या :-  इस सृष्टि में ८४ लाख एक योनियाँ है। और उनमे से भी सर्वश्रेष्ट मनुष्य योनि है। और जब मनुष्यों में भी श्रेष्ट, धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले विप्र, सुर और संत अपने-अपने वार्णाश्रम के धर्म से कर्तव्य विमूढ़ होने लगते है।

 दंभ, दिखावा, शास्त्र विरुद्ध आचरण से धर्म का ह्रास होने लगता है। धर्म के मार्गदर्शक सदाचारी ब्राह्मणों, आत्मज्ञानियों का आभाव होने लगता है। संपूर्ण मानव जाति सहित विराट प्रकृति जब अंधकार रूपी तमोगुण की और अग्रसर होने लगती है। चराचर जगत को आश्रय देने वाली पृथ्वी जब चारो और फैलते अनाचार, अत्याचार, पापाचार के बोझ से त्राहि - त्राहि करने लगती है। 

तब पृथ्वी माता (प्रकृति माता) की करुण पुकार (प्रार्थना) पर, उनके उत्थान के लिये निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा / जीवनमुक्त सत्ता अपने सगुण साकार मानवी रूप को अभिव्यक्त करती है। और अपने मार्गदर्शन से वेदों के अंत, वेदान्त के द्वारा जानने मे आने वाले परम सत्य, अद्वैत रूप उस अभेद ब्रह्म (आत्मा / तत्व / जीवनमुक्त स्थिति) का रहस्य खोलती है। जिस ऊँचाई पर भक्त-भगवान, गुरु-शिष्य, मालिक-दास, प्रकृति-पुरुष, जीव-ईश्वर, आदि सारे भेद समाप्त हो जाते है। 

और केवल "एक अद्वितीय सर्वशक्तिमान सचिदानंद परब्रह्म परमात्मा" ही जानने में आता है। "ईश्वर अंश जीव अविनाशी" होने के कारण साधारण जीव भी धर्म का अनुसरण कर, प्रत्यक्ष ज्ञान की इस पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है। जिस प्रकार समुंद्र से अलग हुई पानी की बूंद पुनः समुंद्र में मिल कर समुंद्र रूप ही हो जाती है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्म को जानकर जीव भी ब्रह्म रूप (अपने आदि स्वरुप को प्राप्त) हों जाता है।

जब-जब पृथ्वी पर ऐसा समय आता है। जब पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य अपने संस्कारो से गिरते ही चले जाते है। संस्कारो के गिरने से धर्म की हानि होने लगती है। और अनिष्ट प्रारब्ध बलवान हो जाता है। और मनुष्य चाह (इच्छा) कर भी अपने पुरुषार्थ से ऊपर नहीं उठ पाता है।

 व्यष्टि जगत के पतन से सामूहिक विराट समष्टि संस्कार भी तेजी से तमोगुण के प्रभाव में आने लगता है। और सृष्टिकर्ता के निर्धारित समय के पूर्व ही प्रलय जैसी स्थिति बन जाती है। तब सर्वशक्तिमान जीवनमुक्त सत्ता अपना हस्तक्षेप कर अपनी उपस्थिति दर्शाती है। और अपनी ही इच्छा शक्ति से इस विराट समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर अपना दिव्य सगुण साकार (पूर्ण ब्रह्म) मानवी रूप बनाती है। वेदों का अनुसरण करने वाली बुद्धि, सत्य, धर्म, मर्यादा, की साक्षात् मूर्ति ऐसी अवतारी सत्ताऐ, समष्टि के प्रचंड इष्ट-अनिष्ट प्रारब्ध को अपने ऊपर ले लेती है।

 "कभी कृष्ण बनके, छः - छः भाइयों की हत्या, माता-पिता को कारावास, आसुरी शक्तियों के षडयंत्र, महाभारत युद्ध और अपने ही वंश के नाश का साक्षी बनती है। और कभी राम बन के वनवास, पत्नी वियोग, रावण युद्ध भी देखती है। माया के तीनों गुणों सत, रज और तम से परे (निर्लेप) होते हुवे भी माया के वशीभूत से हुवे प्रवृत्ति करती दिखती है। और विपरीत परिस्थितियों के बीच, अपने पुरुषार्थ से समष्टि प्रारब्ध को काट कर, विराट प्रकृति के संस्कारो कोे सतोगुण तक उठा देतीे है।

 रस्सी के दो विपरीत सिरे की तरह समष्टि और व्यष्टि जगत एक दूसरे को प्रभावित करता है। इसलिए समष्टि के ऊपर उठने से व्यष्टि जगत भी पीछे-पीछे ऊपर उठ जाता है। और पृथ्वी पर फिर से वैदिक धर्म की स्थापना हो जाती है। लीला काल में भक्तों, ज्ञानियों की बात ही क्या, सब कुछ जानते हुवे ब्रह्मा जी जैसे भी भ्रम में पढ़ जाते है। कि सर्वशक्तिमान भगवान होते हुवे भी, कही चोरी कर रहे है। तो कही झूठा खा रहे है। कही रास कर रहे है। तो कही पत्नी वियोग में आंसू बहा रहे है। कही गुरु बन के ज्ञान सुनाते है। और कही स्वयं शिष्य बन के बैठ जाते है।

ऐसी जीवनमुक्त सत्ताएं जब पृथ्वी पर अवतार लेती है। तो भक्त इन्हें भगवान, शिष्य इन्हें जगतगुरु, प्रजाजन इन्हें संत और ज्ञानीयों को अपनी ही आत्मसत्ता के रूप में जानने में आते है। और बाद में विद्वानजन इनकी महिमा जान के 22, 23, 24.. करके अवतारों की संख्या बढ़ाते रहते है।