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Tuesday, 14 July 2020

15 जुलाईउत्कट स्वाभिमानी जयदेव पाठक जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



संघ के वरिष्ठ जीवनव्रती प्रचारक श्री जयदेव पाठक का जन्म 1924 ई. की जन्माष्टमी वाले दिन हिण्डौन (राजस्थान) के ग्राम फाजिलाबाद में श्रीमती गुलाबोदेवी की गोद में हुआ था। उनके पिता का श्री जगनलाल शर्मा अध्यापक थे। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तो उनकी माताजी का देहांत हो गया। 
हिण्डौन से कक्षा सात उत्तीर्ण कर वे जयपुर आ गये और 1942 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक किया। उन दिनों भारत छोड़ो आंदोलन का जोर था। अतः वे उसमें शामिल हो गये। इससे घर वाले बहुत नाराज हुए। इस पर जयदेव जी ने घर ही छोड़ दिया। वे इतने उत्कट स्वाभिमानी थे कि उसके बाद फिर घर गये ही नहीं।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे निकटवर्ती गांव और नगरों में प्रचार के लिए जाते थे। उस समय उन्हें न भोजन की चिन्ता रहती थी, न विश्राम की। कई बार तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही सोकर वे रात बिता देते थे। जब वह आंदोलन समाप्त हुआ, तो देशभक्ति की वह आग उन्हें संघ की ओर खींच लाई और फिर वे तन-मन से संघ के लिए समर्पित हो गये।
1942 में जयपुर में संघ का काम ‘सत्संग’ के नाम से चलता था। चार अपै्रल, 1944 को जयदेव जी ने पहली बार इसमें भाग लिया। उन दिनों श्री बच्छराज व्यास नागपुर से प्रान्त प्रचारक होकर राजस्थान आये थे। जयदेव जी उनसे बहुत प्रभावित हुए और अति उत्साह के साथ संघ शाखाओं के विस्तार में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल दिये। उनके अत्यधिक उत्साह से कई लोगों को शक हुआ कि वे खुफिया विभाग के व्यक्ति हैं; पर क्रमशः शंका के बादल छंट गये और 1946 में वे प्रचारक बन कर कार्यक्षेत्र में कूद गये।
प्रथम प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद संघ भीषण आर्थिक संकट में आ गया। ऐसे में प्रचारकों को यह कहा गया कि यदि वे चाहें, तो वापस लौटकर कोई नौकरी या काम धंधा कर सकते हैं। अतः जयदेव जी भी 1950 में अध्यापक बन गये; पर उनके मन में तो संघ बसा था। अतः सरकारी नौकरी के अतिरिक्त शेष सारा समय वे शाखा विस्तार में ही लगाते थे। बारह वर्ष तक अध्यापन करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और फिर से प्रचारक बन गये।
प्रचारक जीवन में वे उदयपुर व डूंगरपुर में जिला प्रचारक तथा उदयपुर, जयपुर, सीकर व भरतपुर में विभाग प्रचारक रहे। इस बीच दो वर्ष उन पर राजस्थान प्रान्त के बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी भी रही। खूब प्रवास करने के बावजूद वे स्वभाव से बहुत मितव्ययी थे। अपने ऊपर संगठन का एक पैसा भी अधिक खर्च न हो, इसकी ओर उनका बहुत आग्रह एवं ध्यान रहता था।
1974 से 2002 तक उन पर राजस्थान में विद्या भारती और शिक्षक संघ के संगठन मंत्री का काम रहा। 28 वर्ष के इस कालखंड में उन्होंने राजस्थान शिक्षक संघ को राज्य का सबसे बड़ा और प्रभावी संगठन बना दिया। आदर्श विद्या मंदिरों की एक बड़ी श्रृंखला के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही है। जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण प्रवास में कठिनाई होने लगी, तब भी वे राजस्थान में विद्या भारती के मार्गदर्शक के नाते संस्था की देखभाल करते रहे।
जयदेव जी के मन में एक घंटे की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी। प्रतिदिन शाखा जाने का जो व्रत उन्होंने 1944 में लिया था, उसे आजीवन निभाया। परम पवित्र भगवा ध्वज को वे ईश्वर का साकार रूप मानते थे। अतः शाखा से लौटकर ही वे अन्न-जल ग्रहण करते थे। ऐसे कर्मठ एवं स्वाभिमानी प्रचारक का15 जुलाई, 2006 को निधन हुआ।

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