9 नवंबर हमारे रियल हीरो डॉ लक्ष्मीमल जी के जन्मदिवस दिवस पर विशेष




के सी शर्मा ईश्वर सबको कुछ न कुछ प्रतिभा देकर भेजता है; पर कुछ लोग उसे  अपने परिश्रम से और अधिक तराश लेते हैं। डा. लक्ष्मीमल सिंघवी ऐसे ही प्रतिभावान पुरुष थे, जिन्होंने लेखन, सम्पादन, राजनेता, सांसद, अधिवक्ता से लेकर समाजसेवा आदि सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया।

डा. सिंघवी का जन्म 9 नवम्बर, 1931 (दीपावली) को हुआ था। उन्होंने भारत में राजस्थान, प्रयाग, कोलकाता, दिल्ली, उस्मानिया, आन्ध्र, तमिलनाडु और जबलपुर विश्वविद्यालय सहित अमरीका के हावर्ड, कारनेल, ब्रेकले तथा इंग्लैण्ड के कैम्ब्रिज, आक्सफोर्ड, एडिनबर्ग, वेस्ट मिन्स्टर आदि विश्वविद्यालयों में शिक्षा पायी। व्यवसाय के रूप में वकालत को अपनाने के बाद वे भारत के सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता परिषद के कई बार अध्यक्ष रहे।

डा. सिंघवी ने सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन न्यास की स्थापना भी की। वे भारत ही नहीं तो वैश्विक स्तर पर विधि एवं मानवाधिकार से जुड़े अनेक अध्ययन एवं शोध संस्थानों के संस्थापक रहे। विधि क्षेत्र के अनेक अध्ययन दलों का उन्होंने नेतृत्व किया। उनके सुझाए गये अनेक उपाय अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किये गये। भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त शब्दों का प्रचलन डा0 सिंघवी ने ही प्रारम्भ और स्वीकृत कराया।

भारत विकास परिषद, रोटरी क्लब आदि सैकड़ों समाजसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध डा. सिंघवी राजनीति में भी सक्रिय थे। उन्होंने 1962 से 1967 तक लोकसभा में निर्दलीय सांसद के रूप में जोधपुर का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद वे 1998 से 2004 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

इण्डिया इण्टरनेशनल सेण्टर के आजीवन न्यासी एवं संस्थापक अध्यक्ष डा. सिंघवी 2003 तथा 2004 में आयोजित प्रथम एवं द्वितीय ‘भारतीय प्रवासी दिवस’ आयोजनों के भी अध्यक्ष रहे। 9 जनवरी को प्रतिवर्ष मनाये जाने वाले इस दिवस को वे भारत और विदेशों में रह रहे भारतीयों के बीच सेतु मानते थे।

ब्रिटेन में उच्चायुक्त के नाते उनका सात वर्ष का कार्यकाल सदा याद किया जाएगा। उनके प्रयास से अनेक भारतीय धरोहरें वापस भारत लायी जा सकीं। वे प्रिन्स चार्ल्स को पूजा के लिए हिन्दू मन्दिर भी ले गये। उन्हें ब्रिटिश संसद भवन वेस्टमिन्स्टर में एक दिन के लिए ब्रिटेन के झण्डे के साथ भारत के तिरंगे झण्डे को फहराने में सफलता मिली।

उन्होंने वहाँ श्री अटल बिहारी वाजपेयी का एकल कविता पाठ भी धूमधाम से कराया। ब्रिटिश शासन ने उन्हें अपने देश में विधि एवं न्याय का प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑनरेरी बेंचर एण्ड मास्टर ऑफ दि मिडिल टेंपल’ प्रदान किया।

गोहत्या रुकवाने के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में बहस की। इससे गोवंश में गाय के साथ ही बछड़े, बछड़ी, बैल आदि को भी शामिल किया गया। साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अप्रतिम था। देश-विदेश के सैकड़ों साहित्यिक आयोजनों एवं न्यासों से वे जुड़े थे। इनके द्वारा उन्होंने जहाँ एक ओर कालजयी लेखक व कवियों का साहित्य प्रकाशित कराया, वहीं नये रचनाकारों की कृतियों को भी प्रकाश में लाये।

अन्तिम दिनों में वे ‘साहित्य अमृत’ मासिक पत्रिका के सम्पादक थे। 2007 में न्यूयार्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन की आयोजन समिति में भी वे थे; पर स्वास्थ्य खराबी के कारण वहाँ जा नहीं सके। इस पर उन्होंने अपना हस्तलिखित वक्तव्य वहाँ भेजा। भारत और भारतीयता के इस मनीषी राजदूत का देहान्त छह अक्तूबर, 2007 को हुआ।