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Monday, 27 April 2020

17:29

गरीब मजदूर बेरोजगार को भोजन देने में नाकाम रही सरकार... - कामरेड संजय नामदेव



कामरेड संजय नामदेव ने कहा कि कोरोना महामारी के चलते  समूचा देश सहित मध्य प्रदेश विगत एक माह से लॉकडाउन है प्रदेशवासी घरों में कैद हैं ऐसे हालातों पर प्रदेश का गरीब मजदूर मध्यमवर्गीय परिवार बेसहारा अनाथ विकलांग भूमिहीन खेतिहर मजदूर  अंत्योदय योजना पात्र बीपीएल धारी फेरीवाले रिक्शा चालक ठेला चालक कुली बीड़ी श्रमिक भूमिहीन कोटवार बढ़ई वाहन मिस्त्री कुटीर उद्योग मजदूर मंदबुद्धि व्यक्ति मत्स्य  पालनकर्ता मजदूर  छोटे कर्मचारी एवं घुमक्कड़ जातियों के  लोगों के पास आज रोटी का संकट है जिसके चलते केंद्र सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 मार्च को देश के 80 करोड़ नागरिकों के लिए 3 महीने तक मुक्त भोजन दिए जाने की घोषणा किया था  केंद्रीय वित्त मंत्री के घोषणा उपरांत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यही घोषणा किया था लेकिन  कोरोना महामारी फैले  एक माह हो गया है शासकीय गोदामों में गेहूं चावल सड़ रहा है लेकिन अभी तक सरकार ने  15 फ़ीसदी  भी पात्र व्यक्तियों को खाद्यान्न  उपलब्ध कराने में नाकाम रही है केंद्र एवं प्रदेश सरकार पर यह आरोप लगाते हुए कहा कि देश के कमजोर पीड़ित लोगों को भूख से बचाने दान भी देशवासी कर रहे हैं रोजगार भी जनता का खराब है घरों में जनता ही कैद है खाने का पैकेट देश के समाजसेवी बांट रहे हैं तो फिर सरकार जंग लड़ने की बात कैसे कर रही हैं समझ से परे है आज  कोरोना महामारी में जो दानवीर  पीएम फंड में रुपए दान किए हैं वह देश की  137 करोड़ जनसंख्या पर वितरित किया जाए तो प्रति व्यक्ति एक लाख रुपए  से अधिक आता है लेकिन आज नागरिकों के पैसे पर  व्यापक भ्रष्टाचार किया जा रहा है आज भूख से  पीड़ित व्यक्तियों को प्रदेश के अंदर सड़ा गेहूं एवं किनकी युक्त चावल का वितरण किया जा रहा है उनके थाली से दाल एवं सब्जी गायब है  सरकार के पोस्टिक आहार देने की घोषणा सिर्फ दस्तावेजों तक सीमित है  सीएम  से सवाल करते हुए कहा कि गरीब का पेट क्या मात्र रोटी व चावल से भरेगा क्या ऐसे भोजन  से उसके शरीर को पोषक तत्व मिलेंगे  तो  फिर आप दर्जनों व्यंजन रूपी थाली का उपयोग क्यों करते हैं  यदि सच्चे जनसेवक हैं तो आप भी रोटी और चावल का मात्र उपयोग करें और  रोजाना मीडिया के माध्यम से अपनी थाली को प्रदेश की जनता के सामने सार्वजनिक करें  अन्यथा जनता के सच्चे सेवक होने का ढिंढोरा पीटना बंद करें l

Sunday, 27 October 2019

07:37

क्या हमारे देश में भी कभी ऐसे राजनेता होंगे



के सी शर्मा का लेख

हो ची मिन्ह (Ho Chi Minh) वियतनाम के राष्ट्रपति के रूप में भारत आए और सभी पार्टी के नेताओं के प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में उनसे मिलने आए।

हो ची मिन्ह ने सभी नेताओं से पूछा, "आपका काम क्या है?"

"राजनीति" सभी नेताओं ने यही उत्तर दिया।

"आप मुख्य रूप से क्या कर रहे हैं?" हो ची मिन्ह फिर से पूछा।

"राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हैं।"

जब नेताओं ने ऐसा जवाब दिया, तो वियतनामी नेता ने फिर से पूछा, *"नहीं, मैं आपसे पूछता हूं कि आप अपनी आजीविका के लिए क्या करते हैं?"

इस सवाल पर, नेताओं को कोई जवाब नहीं सूझा

फिर हो ची मिन्ह ने कहा:
"मुख्य रूप से मैं एक किसान हूं। सुबह मैं अपने खेत में जाता हूं। जमीन पर काम करने में कुछ घंटे बिताता हूं। फिर मैं केवल राष्ट्रपति के रूप में अपने कर्तव्यों को करने के लिए कार्यालय जाता हूं।"

*क्या भारत में कभी ऐसे राजनेता होंगे?*


सालों पहले, टाटा रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए एक शोध से पता चला कि छह लाख लोगों के पास हमारे देश में मुख्य आजीविका के रूप में "राजनीति" है।

(अब कल्पना करें कि यह कितना गुणा हो गया है)।
भारत में, ग्राम पंचायत के 2,920,000 सदस्य हैं। पंचायत वार्ड में 10 लोगों की अवधारणा पर 3 मिलियन या उससे और अधिक लोगों की "राजनीति"  आजीविका के रूप में है।)

टैक्सपेयर के रूप में अब हम क्या कर सकते हैं? इसके बारे में सोचें।


हम कम से कम एक राजनेता को तो जानते ही हैं। उन्हें इस संदेश को पास करें। पता नहीं वे इससे शर्मिंदा होंगे या नहीं?परन्तु कुछ सोचने को मजबूर हो जायेंगे!!
ऐसा नहीं है कि उन्हें कोई मजदूरी का काम करना चाहिए!! हां इतना ज़रूर कि उन्हें कुछ काम तो करना ही चाहिए और अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व जीवन यापन हेतु कुछ तो आय अर्जित करें।
ये करदाता के पैसे से कबतक ऐश करते रहेंगे?