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Thursday, 30 April 2020

09:07

खाटू श्रीश्यामजी मेले में उमड़ती है भक्तों की भीड़, जानिये मंदिर की महिमा और इतिहास -के सी शर्मा





श्याम बाबा की कहानी महाभारत काल से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे तथा पान्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी।

हमारे देश में बहुत से ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक है राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले का विश्व विख्यात प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर। यहां फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्याम बाबा का विशाल वार्षिक मेला भरता है जिसमें देश-विदेशों से आये करीबन 25 से 30 लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं। खाटू श्याम का मेला राजस्थान के बड़े मेलों में से एक है।


इस मंदिर में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की श्याम यानि कृष्ण के रूप में पूजा की जाती है। इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है उन्हें श्याम बाबा का नित नया रूप देखने को मिलता है। कई लोगों को तो इस विग्रह में कई बदलाव भी नजर आते हैं। कभी मोटा तो कभी दुबला। कभी हंसता हुआ तो कभी ऐसा तेज भरा कि नजरें भी नहीं टिक पातीं। श्याम बाबा का धड़ से अलग शीष और धनुष पर तीन बाण की छवि वाली मूर्ति यहां स्थापित की गई। कहते हैं कि मन्दिर की स्थापना महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से की थी।

श्याम बाबा की कहानी महाभारत काल से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे तथा पान्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त कर तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध हुये। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया जोकि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।

कौरवों और पाण्डवों के मध्य महाभारत युद्ध का समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुयी। जब वे अपनी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे तब मां को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। महाभारत के युद्ध में भाग लगने के लिये वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर धनुष व तीन बाणों के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की और अग्रसर हुये। सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हंसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकश में ही आयेगा। यदि उन्होंने तीनों बाणों को प्रयोग में ले लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनों खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।

तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था। तब बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये वर्ना ये आपके पैर को चोट पहुंचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी मां को दिये वचन दोहराते हुये कहा कि वह युद्ध में निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर पक्ष की तरफ से भाग लेगा। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।


ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप में आने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।


उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिये एक वीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यकता होती है। उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे बड़े वीर की उपाधि से अलंकृत कर उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है। श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।


युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी खींचाव-तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है। उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जोकि शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली दुर्गा श्रीकृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।

श्रीकृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ होगा। ऐसा माना जाता है कि एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वत: ही बहा रही थी बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रकट हुआ। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था। मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर 1720 ई0 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर ने उस समय अपना वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठापित की गयी थी। मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बनी है।


खाटू श्याम मन्दिर की बहुत मान्यता होने के उपरान्त भी यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहता है। मन्दिर में स्थान की कमी के कारण मेले के अवसर पर श्रद्धालुओं को दर्शन करने में आठ से दस घंटों तक का समय लग जाता है। मन्दिर ट्रस्ट निजी हाथों में होने से मन्दिर का विस्तार नहीं हो पा रहा है। सरकार को तिरूपति मन्दिर की तरह से यहां के प्रबन्धन का जिम्मा लेकर सरकारी स्तर पर कमेटी बनाकर यहां होने वाली आय को नियंत्रित कर उसी से यहां का समुचित विकास करवाना चाहिये।


Saturday, 15 February 2020

14:45

जानिए श्वेतार्क गणपति पूजन विधान-के सी शर्मा




गणेश प्रतिमाओं का दर्शन विभिन्न मुद्राओं में होता है लेकिन प्रमुख तौर पर वाम एवं दक्षिण सूण्ड वाले गणेश से आमजन परिचित हैं। इनमें सात्विक और सामान्य उपासना की दृष्टि से वाम सूण्ड वाले गणेश और तामसिक एवं असाधारण साधनाओं के लिए दांयी सूण्ड वाले गणेश की पूजा का विधान रहा है।

तत्काल सिद्धि प्राप्ति के लिए श्वेतार्क गणपति की साधना भी लाभप्रद है। ऐसी मान्यता है कि रवि पुष्य नक्षत्र में सफेद आक की जड़ से बनी गणेश प्रतिमा सद्य फलदायी है।

*श्वेतार्क गणपति*

शास्त्रों में श्वेतार्क के बारे में कहा गया है- "जहां कहीं भी यह पौधा अपने आप उग आता है, उसके आस-पास पुराना धन गड़ा हो सकता है। जिस घर में श्वेतार्क की जड़ रहेगी, वहां से दरिद्रता स्वयं पलायन कर जाएगी। इस प्रकार मदार का यह पौधा मनुष्य के लिए देव कृपा, रक्षक एवं समृद्धिदाता है।

तन्त्र शास्त्र में श्वेतार्क गणपति की पूजा का विधान है। यह आम लक्ष्मी व गणपति की प्रतिमाओं से भिन्न होती है। यह प्रतिमा किसी धातु अथवा पत्थर की नहीं बल्कि जंगल में पाये जाने वाले एक पोधे को श्वेत आक के नाम से जाना जाता है।

इसकी जड़ कम से कम 27 वर्ष से जयादा पुरानी हो उसमें स्वत: ही गणेश जी की प्रतिमा बन जाती है। यह प्रक्रति का एक आश्चर्य ही है। श्वेत आक की जड़ (मूल ) यदि खोदकर निकल दी जाये तो निचे की जड़ में गणपति जी की प्रतिमा प्राप्त होगी। इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से साधक को धन-धान्य की प्राप्ति होती है। यह प्रतिमा स्वत: सिद्ध होती है। तन्त्र शास्त्रों के अनुसार ऐशे घर में यंहा यह प्रतिमा स्थापित हो , वंहा रिद्धी-सिद्ध तथा अन्नपूर्णा देवी वास् करती है।

 इसलिए सफेद मदार की जड़ कहीं से भी प्राप्त करें उस पर लाल सिंदूर का लेप करके उसे लाल वस्त्र पर स्थापित करें। यदि जड़ गणेशाकार नहीं है, तो किसी कारीगर से आकृति बनवाई जा सकती है। शास्त्रों में मदार की जड़ की स्तुति इस मंत्र से करने का विघान है-

चतुर्भुज रक्ततनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो।
करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधिनाभंराशि चूùडमीडे।।

गणेशोपासना में साधक लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। नेवैद्य में गुड़ व मूंग के लड्डू अर्पित करें। "ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्" मंत्र का जप करें। श्रद्धा और भावना से की गई श्वेतार्क की पूजा का प्रभाव थोड़े बहुत समय बाद आप स्वयं प्रत्यक्ष रू प से अनुभव करने लगेंगे।

श्वेतार्क की प्रतिमा रिद्धी-सिद्ध की मालिक होती है जिस व्यक्ति के घर में यह गणपति की प्रतिमा स्थापित होगी उस घर में लक्ष्मी जी का निवास होता है तथा जंहा यह प्रतिमा होगी उस स्थान में कोई भी शत्रु हानी नहीं पहुंचा सकता। इस प्रतिमा के सामने नित्य बैठकर गणपति जी का मूल मन्त्र जपने से गणपति जी के दर्शन होते हैं तथा उनकी कृपा प्राप्त होती है।

श्वेतक आक की गणपति की प्रतिमा अपने पूजा स्थान में पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करें  ' ओम गं गणपतये नम:' मन्त्र का प्रतिदिन जप करे जप के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह जप करें तो जप कल में ही साधक की हर मनोकामना गणपति जी पूरी करते हैं।

व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा  की स्थापना करें।

स्वास्थ्य और धन के लिए श्वेत आर्क गणपति: श्वेतार्क वृक्ष से सभी परिचित हैं। इसे सफेद आक, मदार, श्वेत आक, राजार्क आदि नामों से जाना जाता है । सफेद फूलों वाले इस वृक्ष को गणपति का स्वरूप माना जाता है । इसलिए प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जहां भी यह पौधा रहता है, वहां इसकी पूजा की जाती है । इससे वहां किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती। वैसे इसकी पूजा करने से साधक को काफी लाभ होता है।

 अगर रविवार या गुरूवार के दिन पुष्प नक्षत्र में विधिपूर्वक इसकी जड़ को खोदकर ले आएं और पूजा करें तो कोई भी विपत्ति जातकों को छू भी नहीं सकती। ऐसी मान्यता है कि इस जड़ के दर्शन मात्र से भूत-प्रेत जैसी बाधाएं पास नहीं फटकती। अगर इस पौधे की टहनी तोड़कर सुखा लें और उसकी कलम बनाकर उसे यंत्र का निर्माण करें , तो यह यंत्र तत्काल प्रभावशाली हो जाएगा। इसकी कलम में देवी सरस्वती का निवास माना जाता है। वैसे तो इसे जड़ के प्रभाव से सारी विपत्तियां समाप्त हो जाती हैं।

यह आपके अंगूठे से बड़ी नहीं होनी चाहिए। इसकी विधिवत पूजा करें। पूजन में लाल कनेर के पुष्प अवश्य इस्तेमाल में लांए। इस मंत्र ‘‘ ऊँ पंचाकतम् ऊँ अंतरिक्षाय स्वााहा ’’ से पूजन करें और इसके पश्चात इस मंतर

‘‘ ऊँ ह्रीं पूर्वदयां ऊँ ही्रं फट् स्वाहा ’’ से 108 आहुति दें।

 लाल कनेर के पुष्प शहद तथा शुद्ध गाय के घी से आहुति देने का विधान है। इसके बाद 11 माला जप नीचे लिखे मंत्र का करें और प्रतिदिन कम से कम 1 माला करें। ‘‘ ऊँ गँ गणपतये नमः ’’ का जप करें । अब ’’ ऊँ ह्रीं श्रीं मानसे सिद्धि करि ह्रीं नमः ’’ मंत्र बोलते हुए लाल कनेर के पुष्पों को नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें।

धार्मिक दृष्टि से श्वेत आक को कल्प वृक्ष की तरह वरदायक वृक्ष माना गया है। श्रद्धा पूर्वक नतमस् तक होकर इस पौधे से कुछ माँगन पर यह अपनी जान देकर भी माँगने वाले की इच्छा पूरी करता है। यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की इच्छा शुद्ध होनी चाहिए।

ऐसी आस्था भी है कि इसकी जड़ को पुष्प नक्षत्र में विशेष विधिविधान के साथ जिस घर में स्थापित  किया जाता है वहाँ स्थायी रूप से लक्ष्मी का वास बना रहता है और धन धान्य की कमी नहीं रहती। श्वेतार्क के ताँत्रिक, लक्ष्मी प्राप्ति, ऋण नाशक, जादू टोना नाशक, नजर सुरक्षा के इतने प्रयोग हैं कि पूरी किताब लिखी जा सकती है।

थोड़ी सी मेहनत कर आप भी अपने घर के आसपास या किसी पार्क आदि में श्वेतार्क का पौधा प्राप्त कर सकते हैं। श्वेतार्क गणपति घर में स्थापित   करने से सिर्फ गणेश जी ही नहीं बल्कि माता लक्ष्मी और भगवान शिव की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है । सिद्धी की इच्छा रखने वालों को 3 मास तक इसकी साधन करने से सिद्धी प्राप्त होती है। जिनके पास धन न रूकता हो या कमाया हुआ पैसा उल्टे सीधे कामों में जाता हो उन्हें अपने घर में श्वेतार्क गणपति की स्थापना करनी चाहिए।

 जो लोग कर्ज में डूबे हैं उनके लिए कर्ज मुक्ति का इससे सरल अन्य कोई उपाय नहीं है। जो लोग ऊपरी बाधाओं और रोग विशेष से ग्रसित हैं इसकी पूजा से वायव्य बाधाओं से तुरंत मुक्ति और स्वास्थ्य में अप्रत्याशित लाभ पा सकते हैं। जिनके बच्चों का पढ़ने में मन न लगता हो वे इसकी स्थापना कर बच्चों की एकाग्रता और संयम बढ़ा सकते है। पुत्रकाँक्षी यानि पुत्र कामना करने वालों को गणपति पुत्रदा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।

श्वेतार्क गणेश साधना: हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को अनेक रूप में पूजा जाता है इनमें से ही एक श्वेतार्क गणपति भी है । धार्मिक लोक मान्ताओं में धन, सुख-सौभाग्य समृद्धि ऐश्वर्य और प्रसन्नता के लिए श्वेतार्क के गणेश की मूर्ति शुभ फल देने वाली मानी जाती है।

श्वेतार्क के गणेश आक के पौधे की जड़ में बनी प्राकृतिक बनावट रूप में प्राप्त होते हैं । इसे पौधे की एक दुर्लभ जाति सफेद श्वेतार्क होती है जिसमें सफेद पत्ते और फूल पाए जाते हैं इसी सफेद श्वेतार्क की जड़ की बाहरी परत को कुछ दिनों तक पानी में भिगोने के बाद निकाला जाता है तब इस जड़ में भगवान गणेश की मूरत दिखाई देती है।

इसकी जड़ में सूंड जैसा आकार तो अक्सर देखा जा सकता है । भगवान श्री गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि के दाता माना जाता है । इसी प्रकार श्वेतार्क नामक जड़ श्री गणेश जी का रूप मानी जाती है श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है । श्वेतार्क की जड़ श्री गणेशजी का रूप मानी जाती है।

 श्वेतार्क सौभाग्यदायक व प्रसिद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है । श्वेतार्क की जड़ को तंत्र प्रयोग एवं सुख-समृद्धि हेतु बहुत उपयोगी मानी जाती है । गुरू पुष्प नक्षत्र में इस जड़ का उपयोग बहुत ही शुभ होता है । यह पौधा भगवान गणेश के स्वरूप होने के कारण धार्मिक आस्था को और गहरा करता है।

श्वेतार्क गणेश पूजन: श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा को पूर्व दिशा की तरफ ही स्.थापित करना चाहिए तथा श्वेत आक की जड़ की माला से यह गणेश मंत्रों का जप करने से सर्वकामना सिद्ध होती है । श्वेतार्क गणेश पूजन में लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करनी चाहिए।

नेवैद्य में लडडू अर्पित करने चाहिए ‘‘ ऊँ वक्रतुण्डाय हुम् ’’ मंत्र का जप करते हुए श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के श्रद्धा व भक्ति भाव के साथ श्वेतार्क की पूजा कि जानी चाहिए पूजा के प्रभावस्वरूप् प्रत्यक्ष रूप से इसके शुभ फलों की प्राप्ति संभव हो पाती है।

 तन्त्र शास्त्र में भी श्वेतार्क गणपति की पूजा का विशेष बताया गया है । तंत्र शास्त्र अनुसार घर में इस प्रतिमा को स्ािापित करने से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती है । इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से भक्त को धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मी जी का निवास होता है । इसके पूजन द्वारा शत्रु भय समाप्त हो जाता है । श्वेतार्क प्रतिमा के सामने नित्य गणपति जी का मंत्र जाप करने से गणेशजी का आर्शिवाद प्राप्त होता है तथा उनकी कृपा बनी रहती है।

श्वेतार्क गणेश महत्व: दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के साथ ही श्वेतार्क गणेश जी का पूजन व अथर्वशिर्ष का पाठ करने से बंधन दूर होते हैं और कार्यों में आई रूकावटें स्वत: ही दूर हो जाती है । धन की प्राप्ति हेतु श्वेतार्क की प्रतिमा को दीपावली की रात्रि में षडोषोपचार पूजन करना चाहिए।

श्वेतार्क गणेश साधना अनेकों प्रकार की जटिलतम साधनाओं में सर्वाधिक सरल एवं सुरक्षित साधना है । श्वेतार्क गणपति समस्त प्रकार के विघनों के नाश के लिए सर्वपूजनीय है । श्वेतार्क गणपति की विधिवत स्थापना  और पूजन से समस्त कार्य साधानाएं आदि शीघ्र निर्विघं संपन्न होते है।

श्वेतार्क गणेश के सम्मुख मंत्र का प्रतिदिन 10 माला जप करना चाहिए तथा ‘‘ ऊँ नमो हस्ति - मुखाय लम्बोदराय उच्छिष्ट - महात्मने आं क्रों हीं क्लीं ह्रीं हूं घे घे उच्छिष्टाय स्वाहा ’’ साधना से सभी इष्ट कार्य सिद्ध होते हैं।

श्वेतार्क गणेश प्रतिष्ठा पूजा विस्तृत विधि

द्विराचम्य प्राणायामं कृत्वा। इष्टकुलस्वाम्यादि देवतानां फल-तांबूलानि प्रदानं कृत्वा। ज्येष्ठां नमस्कृत्य।

ॐ श्रीमन्महागणपतये नम:॥
इष्ट,कुल,ग्राम,वास्तु,गुरू देवताभ्यो नम:॥
सुमुखश्चैकदंतश्च……॥

पूजा संकल्प

श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य….शालिवाहनशके मन्मथ नामसंवत्सरे, दक्षिणायने, वर्षा ऋतौ, भाद्रपद मासे, शुक्लपक्षे, चतुर्थ्यां तिथौ (रात्री १०:१९पर्यंत), बृहस्पति वासरे, स्वाती (उत्तररात्री १:३१पर्यंत) दिवस नक्षत्रे, तुला (अहोरात्र) स्थिते वर्तमाने चंद्रे, सिंह स्थिते श्रीसूर्ये (दु.१२:१८नंतर कन्या), सिंह स्थिते श्रीदेवगुरौ, वृश्चिक स्थिते श्रीशनैश्चरौ, शेषेशु ग्रहेषु यथायथं….. शुभपुण्यतिथौ….॥
मम आत्मन: श्रुतिस्मृति-पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं….अमुक …गोत्रोत्पन्नाय अमुक…शर्माणं अहं अस्माकं सकलकुटुंबानां सपरिवाराणां द्विपद-चतुष्पद-सहितानां क्षेम स्थैर्य आयु: आरोग्य ऐश्वर्य अभिवृद्धी अर्थं,समस्त मंगल अवाप्ति अर्थं,समस्त अभ्युदय अर्थं,अभीष्ट कामना सिद्धी अर्थंच प्रतिवार्षिक विहितं {पार्थिवसिद्धिविनायक} देवता प्रीत्यर्थं यथाज्ञानेन यथामिलित उपचार द्रव्यै: पुरुषसूक्त/पुरणोक्तमंत्रै: प्राणप्रतिष्ठापन पूर्वक ध्यानआवाहनादि षोडश उपचार पूजन अहं करिष्ये॥ आदौ निर्विघ्नता सिद्ध्यर्थं महागणपति स्मरणं, शरीर शुद्ध्यर्थं षडंगन्यासं कलश, शंख, घंटा, दीप पूजनं च करिष्ये॥

॥प्राणप्रतिष्ठा॥

अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्म-विष्णू-महेश्वरा ऋषय:। ऋग्यजु:सामाथर्वाणि च्छंदासि। पराप्राणशक्तिर्देवता आं बी
जम्। -हीं शक्ति:। क्रों कीलकम्। अस्यां मृन्मयमूर्तौ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोग:॥

॥ॐ आं -हीं क्रों॥ अं यं रं लं वं शं षं सं हं ळं क्षं अ:॥ क्रों -हीं आं हंस: सोहं॥
अस्यां मूर्तौ १ प्राण २ जीव ३ सर्वेंद्रियाणि वाङ् मन:त्वक् चक्षु श्रोत्र जिव्हा घ्राण पाणि पाद पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा॥
ॐ असुनीते…ॐ चत्वारिवाक्…॥
गर्भाधानादि १५ संस्कार सिद्ध्यर्थं १५ प्रणवावृती: करिष्ये॥
रक्तांभोधिस्थ… तच्चक्षुर्देवहितं…॥ अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणा:क्षरंतु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥

देवस्य आज्येन नेत्रोन्मीलनं कृत्वा।
प्राणशक्त्यै नम:। पंचोपचारै: संपूज्य॥
१ ध्यानं,आवाहनं

एकदंतं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजं।
पाशांकुशधरं देवं ध्यायेत्सिद्धिविनायकं॥
ॐ सहस्रशीर्षा…
आवाहयामि विघ्नेश सुरराजार्चितेश्वर।
अनाथनाथ सर्वज्ञ पूजार्थं गणनायक॥

२ आसन
ॐ पुरुषएवेदं…
नानारक्तसमायुक्तं कार्तस्वरविभूषितम्।
आसनं देवदेवेश प्रीत्यर्थं प्रतिगृह्यताम्॥

३ पाद्यं
ॐ एतावानस्य…
पाद्यं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो।
भक्त्या समर्पितं तुभ्यं लोकनाथ नमोस्तु ते॥

४ अर्घ्य
ॐ त्रिपादूर्ध्व…
नमस्ते देव देवेश नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते जगदाधार अर्घ्यं न: प्रतिगृह्यताम॥

५ आचमन
ॐ तस्माद्विराळ…
कर्पूरवासितं वारि मंदाकिन्या:समाहृतम्।
आचम्यतां जगन्नाथ मया दत्तं हि भक्तित:॥

६ स्नान
ॐ यत्पुरुषेण…
गंगादिसर्वतीर्थेभ्यो मया प्रार्थनया हृतम्।
तोयमेतत्सुखस्पर्शं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

॥पंचामृतस्नान,पंचोपचारपूजा,अभिषेक॥

मांगलिक स्नान
ॐ कनिक्रदत्…
तैलेलक्ष्मीर्जलेगंगा यतस्तिष्ठति वै प्रभो।
तन्मांगलिकस्नानार्थं जलतैले समर्पये॥

ॐ तदस्तुमित्रा… सुप्रतिष्ठितमस्तु॥

७ वस्त्र
ॐ तंयज्ञंबर्हिषि…
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम्।

८ यज्ञोपवीत
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत:…
देवदेव नमस्तेतु त्राहिमां भवसागरात्।
ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण परमेश्वर॥

९ गंध
ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऋच:…
श्रीखंडं चंदनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चंदनं प्रतिगृह्यताम्॥

अक्षतास्तंडुला:शुभ्रा:कुंकूमेन विराजिता:।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
हरिद्रा स्वर्णवर्णाभा सर्वसौभाग्यदायिनी।
सर्वालंकारमुख्या हि देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
हरिद्राचूर्णसंयुक्तं कुंकुमं कामदायकम्।
वस्त्रालंकारणं सर्वं देवि त्वं प्रतिगृह्यताम्॥
उदितारुणसंकाश जपाकुसुमसंनिभम्।
सीमंतभूषणार्थाय सिंगूरं प्रतिगृह्यताम्॥

परिमलद्रव्य
ॐ अहिरिवभोगै:…
ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे।
नानापरिमलद्रव्यं गृहाण परमेश्वर॥

१० फुले,हार,कंठी
ॐ तस्मादश्वा…
माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मया हृतानि पूजार्थं पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम्॥
करवीरैर्जातिकुसुमैश्चंपकैर्बकुलै:शुभै:।
शतपत्रैश्चकल्हारैरर्चयेत् परमेश्वर॥

॥अथ अंग पूजा॥
गणेश्वराय नम:-पादौ पूजयामि॥
विघ्नराजाय नम:-जानुनी पू०॥
आखुवाहनाय नम:-ऊरू पू०॥
हेरंबाय नम:-कटिं पू०॥
लंबोदराय नम:-उदरं पू०॥
गौरीसुताय नम:-स्ननौ पू०॥
गणनायकाय नम:- हृदयं पू॥
स्थूलकर्णाय नम:-कंठं पू०॥
स्कंदाग्रजाय नम:-स्कंधौ पू०॥
पाशहस्ताय नम:-हस्तौ पू०॥
गजवक्त्राय नम:-वक्त्रं पू०॥
विघ्नहत्रे नम:-ललाटं पू०॥
सर्वेश्वराय नम:- शिर:पू०॥
गणाधिपाय नम:-सर्वांगं पूजयामि॥

अथ पत्र पूजा:
सुमुखायनम:-मालतीपत्रं समर्पयामि॥(मधुमालती)
गणाधिपायनम:-भृंगराजपत्रं॥(माका)
उमापुत्रायनम:-बिल्वपत्रं॥(बेल)
गजाननायनम:-श्वेतदूर्वापत्रं॥(पांढ-यादूर्वा)
लंबोदरायनम:-बदरीपत्रं॥(बोर)
हरसूनवेनम:-धत्तूरपत्रं॥(धोत्रा)
गजकर्णकायनम:-तुलसीपत्रं॥(तुळस)
वक्रतुंडायनम:-शमीपत्रं॥(शमी)
गुहाग्रजायनम:-अपामार्गपत्रं॥(आघाडा)
एकदंतायनम:-बृहतीपत्रं॥(डोरली)
विकटायनम:-करवीरपत्रं॥(कण्हेरी)
कपिलायनम:-अर्कपत्रं॥(मांदार)
गजदंतायनम:-अर्जुनपत्रं॥(अर्जुनसादडा)
विघ्नराजायनम:-विष्णुक्रांतापत्रं॥(विष्णुक्रांत)
बटवेनम:-दाडिमपत्रं॥(डाळिंब)
सुराग्रजायनम:-देवदारुपत्रं॥(देवदार)
भालचंद्रायनम:-मरुपत्रं॥(पांढरा मरवा)
हेरंबायनम:-अश्वत्थपत्रं॥(पिंपळ)
चतुर्भुजायनम:-जातीपत्रं॥(जाई)
विनायकायनम:-केतकीपत्रं॥(केवडा)
सर्वेश्वरायनम:-अगस्तिपत्रं॥(अगस्ति)

११ धूप,अगरबत्ती
ॐ यत्पुरुषंव्यदधु:…
वनस्पतिरसोद्भूतो गंधाढ्यो गंधउत्तम:।
आघ्रेय:सर्वदेवानां धूपोयं प्रतिगृह्यताम्॥

१२ दीप,निरांजन
ॐ ब्राह्मणोस्य…
आज्यंच वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश सर्वक्षेमसमर्थ भो:॥

१३ नैवेद्य,प्रसाद
ॐ चंद्रमामनसो…
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरू।ईप्सितं मे वरं देहि परत्रं च परां गतिम्॥
शर्कराखंडखद्यानी दधिक्षीरघृतानिच।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतं।
कर्पूरैलासमायुक्तं तांबूलं प्रतिगृह्यताम्॥
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो:।
अनंतपुण्यफलद मत:शातिं प्रयच्छ मे॥
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥
फलेन फलितं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम्।
तस्मात्फलप्रदानेन सफलाश्च मनोरथा:॥

दूर्वायुग्म पूजा
गणाध्यक्ष महादेव शिवपुत्राभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश गणाधिप नमोऽस्तुते॥
ॐ गणाधिपायनम:-दूर्वायुग्मं समर्पयामि॥

पतिर्गणानां सर्वेषामम्बिकागर्भसम्भव।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश उमापुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ उमापुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

भक्तानां स्मरणादेव सर्वाद्यक्षयकृद्विभु:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश अघनाश नमोऽस्तुते॥
ॐ अघनाशनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

नृपाणां युद्धसमये भजतामभयप्रद।
दूर्वापूजां गृहाणेश विनायक नमोऽस्तते॥
ॐ विनायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

जनितो देवतार्थाय तारासुतवधो विभु:।
दूर्वापूजां गृहाणेश ईशपुत्र नमोऽस्तुते॥
ॐ ईशपुत्रायनम:-दूर्वायुग्मं०॥

स्कन्दावरज भूतेश लम्बोदर गजानन।
दूर्वायुग्मं गुहाणेश सर्वसिद्धिप्रदायक॥
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

राक्षसानां विनाशाय दूतायुधधरोभव।
दूर्वापूजां गृहाणेश एकदन्त नमोनम:॥
ॐ एकदंतायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

उमामहेश्वरं दृष्ट्वा कृतोऽसौ गजवक्त्रक:।
दूर्वायुग्मं गृहाणेश इभवक्त्र नमो नम:॥
ॐ इभवक्त्रायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

मूषकोत्तममारुह्य जिता देवा सुराहवे।
दूर्वापूजां गृहाणेश नमो मूषकवाहन॥
ॐ आखुवाहनायनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

अग्निर्भू:बाहुलेयश्च गुरुमुख्यो भवप्रभो।
दूर्वापूजां गृहाणेश कुमारगुरवे नम:॥
ॐ कुमारगुरवेनम:-दूर्वायुग्मं ०॥

गणाधिप नमस्तेस्तु उमापुत्राघनाशन।
विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक॥
एकदंतेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन।
कुमारगुरवे तुभ्यं पूजनीय:प्रयत्नत:॥
एकैकेन तु नाम्ना तु दत्वैकं सर्वनामभि:।
तत:स्वर्णमयं पुष्पं विघ्नेशाय समर्पयेत्॥
दूर्वामेकां समर्पयामि॥

ॐ श्रियेजात:
चंद्रादित्यौच धरणी विद्युदग्निस्तथैवच।त्वमेव सर्व ज्योतींषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम्॥

१४ प्रदक्षिणा
ॐ नाभ्याआसी…
यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च।
तानि तानि विनश्यंति प्रदक्षिण पदे पदे॥

१५ नमस्कार
ॐ सप्तास्यासन्…
नमस्ते विघ्नसंहर्त्रे नमस्ते ईप्सितप्रद।
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गणनायक॥

१६ प्रार्थना
ॐ यज्ञेनयज्ञम…
विनायकगणेशान सर्वदेवनमस्कृत।
पार्वतीप्रिय विघ्नेश मम विघ्नान्निवारय॥
आवाहनं न जानामि……
यस्यस्मृत्या……

अनेन मया यथाज्ञानेन कृतषोडशोपचार पूजनेन तेन श्रीसिद्धिविनायक:प्रीयताम्

Tuesday, 28 January 2020

08:32

जाने अरिष्ट शनि शांति में पीपल पूजा का महत्त्व



*जाने अरिष्ट शनि शांति में पीपल पूजा का महत्त्व*


जब किसी इंसान पर शनिदेव की महादशा चल रही होती है तो उसे पीपल की पूजा का उपाय जरूर बताया जाता है।
कई बार मन में यह सवाल उठता है कि ब्रम्‍हांड के सबसे शक्तिशाली और क्रूर ग्रह शनि का क्रोध मात्र पीपल वृक्ष की पूजा करने से कैसे शान्‍त हो जाता है।?

आज हम आपको बताने जा रहे हैं शनि और पीपल से सम्‍बंधित वह पौराणिक कथा जिसके बारे में आपने शायद ही पहले कभी सुना हो।
पुराणों की माने तो एक बार त्रेता युग मे अकाल पड़ गया था । उसी युग मे एक कौशिक मुनि अपने बच्चो के साथ रहते थे । बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि अपने बच्चो को लेकर दूसरे राज्य मे रोज़ी रोटी के लिए जा रहे थे ।
रास्ते मे बच्चो का पेट न भरने के कारण मुनि ने एक बच्चे को रास्ते मे ही छोड़ दिया था । बच्चा रोते रोते रात को एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गया था तथा पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगा था। तथा पीपल के पेड़ के फल खा कर बड़ा होने लगा था। तथा कठिन तपस्या करने लगा था ।

एक दिन ऋषि नारद वहाँ से जा रहे थे । नारद जी को उस बच्चे पर दया आ गयी तथा नारद जी ने उस बच्चे को पूरी शिक्षा दी थी तथा विष्णु भगवान की पूजा का विधान बता दिया था।
अब बालक भगवान विष्णु की तपस्या करने लगा था । एक दिन भगवान विष्णु ने आकर बालक को दर्शन दिये तथा विष्णु भगवान ने कहा कि हे बालक मैं आपकी तपस्या से प्रसन्न हूँ । आप कोई वरदान मांग लो।
बालक ने विष्णु भगवान से सिर्फ भक्ति और योग मांग लिया था । अब बालक उस वरदान को पाकर पीपल के पेड़ के नीचे ही बहुत बड़ा तपस्वी और योगी हो गया था।

एक दिन बालक ने नारद जी से पूछा कि हे प्रभु हमारे परिवार की यह हालत क्यो हुई है । मेरे पिता ने मुझे भूख के कारण छोड़ दिया था और आजकल वो कहा है।

नारद जी ने कहा बेटा आपका यह हाल शानिमहाराज ने किया है । देखो आकाश मे यह शनैश्चर दिखाई दे रहा है । बालक ने शनैश्चर को उग्र दृष्टि से देखा और क्रोध से उस शनैश्चर को नीचे गिरा दिया । उसके कारण शनैश्चर का पैर टूट गया । और शनि असहाय हो गया था।

शनि का यह हाल देखकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए । नारद जी ने सभी देवताओ को शनि का यह हाल दिखाया था । शनि का यह हाल देखकर ब्रह्मा जी भी वहाँ आ गए थे । और बालक से कहा कि मैं ब्रह्मा हूँ आपने बहुत कठिन तप किया है।

आपके परिवार की यह दुर्दशा शनि ने ही की है । आपने शनि को जीत लिया है । आपने पीपल के फल खाकर जीवंन जीया है । इसलिए आज से आपका नाम पिपलाद ऋषि के नाम जाना जाएगा।और आज से जो आपको याद करेगा उसके सात जन्म के पाप नष्ट हो जाएँगे।

तथा पीपल की पूजा करने से आज के बाद शनि कभी कष्ट नहीं देगा । ब्रह्मा जी ने पिपलाद बालक को कहा कि अब आप इस शनि को आकाश मे स्थापित कर दो । बालक ने शनि को ब्रह्माण्ड मे स्थापित कर दिया ।

तथा पिपलाद ऋषि ने शनि से यह वायदा लिया कि जो पीपल के वृक्ष की पूजा करेगा उसको आप कभी कष्ट नहीं दोगे । शनैश्चर ने ब्रह्मा जी के सामने यह वायदा ऋषि पिपलाद को दिया था।

उस दिन से यह परंपरा है जो ऋषि पिपलाद को याद करके शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उसको शनि की साढ़े साती , शनि की ढैया और शनि महादशा कष्ट कारी नहीं होती है ।
शनि की पूजा और व्रत एक वर्ष तक लगातार करनी चाहिए । शनि कों तिल और सरसो का तेल बहुत पसंद है इसलिए तेल का दान भी शनिवार को करना चाहिए । पूजा करने से तो दुष्ट मनुष्य भी प्रसन्न हो जाता है।
तो फिर शनि क्यो नहीं प्रसन्न होगा ? इसलिए शनि की पूजा का विधान तो भगवान ब्रह्मा ने दिया है।
जय महादेव।

Monday, 21 October 2019

19:34

पिता का समाज और पुत्रों के नाम पत्र



लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली। 

चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है।

पिता सेना में कर्नल के पद से रिटार्यड हुए । वे लखनऊ के एक पॉश कॉलोनी में अपनी पत्नी के साथ रहते थे। उनके दो बेटे थे। जो सुदूर अमेरिका में रहते थे। यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि माता-पिता ने अपने लाड़लों को पालने में कोई कोर कसर नहीं रखी।बच्चे सफलता की सीढ़िंया चढते गए। पढ़-लिखकर इतने योग्य हो गए कि दुनिया की सबसे नामी-गिरामी कार्पोरेट कंपनी में उनको नौकरी मिल गई।संयोग से दोनों भाई एक ही देश में, लेकिन अलग-अलग अपने परिवार के साथ रहते थे। 

एक दिन अचानक पिता ने रूंआसे गले से बेटों को खबर दी। बेटे! तुम्हारी मां अब इस दुनिया में नहीं रही । पिता अपनी पत्नी की मिट्टी के साथ बेटों के आने का इंतजार करते रहे। एक दिन बाद छोटा बेटा आया, जिसका घर का नाम चिंटू था। 

पिता ने पूछा चिंटू! मुन्ना क्यों नहीं आया ? मुन्ना यानी बड़ा बेटा।पिता ने कहा कि उसे फोन मिला,और कह पहली उडान से आये !! 

धर्मानुसार बडे बेटे का मुखाग्नि लगाने की सोच से वृद्व फौजी ने जिद सी पकड़ ली। 

छोटे बेटे के मुंह से एक सच निकल पड़ा। उसने पिता से कहा कि मुन्ना भईया ने कहा कि - मां की मौत में तुम चले जाओ। पिता जी मरेंगे,तो मैं चला जाऊंगा।

कर्नल साहब (पिता) कमरे के अंदर गए। खुद को कई बार संभाला फिर उन्होंने  चंद पंक्तियो का एक पत्र लिखा। जो इस प्रकार था- 

*प्रिय बेटो !!*
मैंने और तुम्हारी मां ने बहुत सारे अरमानों के साथ तुम लोगों को पाला-पोसा। दुनिया के सारे सुख दिए। देश-दुनिया के बेहतरीन जगहों पर शिक्षा दी। जब तुम्हारी मां अंतिम सांस ले रही थी,तो मैं उसके पास था। वह मरते समय तुम दोनों का चेहरा एक बार देखना चाहती थी और तुम दोनों को बाहों में भर कर चूमना चाहती थी। तुम लोग उसके लिए वही मासूम मुन्ना और चिंटू थे। उसकी मौत के बात उसकी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने लिए मैं था। मेरा मन कर रहा था कि काश तुम लोग मुझे ढांढस बधाने के लिए मेरे पास होते। मेरी मौत के बाद मेरी लाश के पास तुम लोगों का इंतजार करने के लिए कोई नहीं होगा। सबसे बड़ी बात यह कि मैं नहीं चाहता कि मेरी लाश निपटाने के लिए तुम्हारे बड़े भाई को आना पड़े। इसलिए सबसे अच्छा यह है कि अपनी मां के साथ मुझे भी निपटाकर ही जाओ। "मुझे जीने का कोई हक नहीं क्योंकि जिस समाज ने मुझे जीवन भर धन के साथ सम्मान भी दिया, मैंने समाज को असभ्य नागरिक दिये।" हाँ अच्छा रहा कि हम अमरीका जाकर नहीं बसे, सच्चाई दब जाती !!

मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरे मैडल तथा फोटो बटालियन को लौटाए जाए तथा घर का पैसा नौकरों में बाटा जाऐ। जमा-पूँजी आधी वृद्ध सेवा केन्द्र में तथा आधी सैनिक कल्याण में दी जाये।
        -तुम्हारा पिता                               

कमरे से ठांय की आवाज आई। कर्नल साहब ने खुद को गोली मार ली।

यह क्यों हुआ,किस कारण हुआ?कोई दोषी है या नहीं।मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना।यह काल्पनिक कहानी नहीं सत्य घटना है। 

*हम बदलेंगे,युग बदलेगा*