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Thursday, 23 April 2020

05:48

हथेली के यह पर्वत बदल देते हैं आपका भाग्य



के सी शर्मा
'सूर्य' तथा 'गुरू'(बृहस्पति) का बलवान होना परमावश्यक है ।

 गुरू धर्म, दर्शन, राजनीति तथा उच्चाधिकार से सम्बन्धित माना गया है ! तथा सूर्य राज्य-प्रशासन तथा शासनादि से सम्बन्धित ग्रह हैं !

जब हथेली में सूर्य तथा गुरू परिवत विकसित(ऊपर को उभरे हुए) हों, तथा भाग्य रेखा भी प्रबल हो, तो व्यक्ति प्रशासन में उच्चाधिकारी(मंत्री आदि) होता है !

 सूर्य पिता का कारक ग्रह है ! हथेली में सूर्य पर्वत विकसित हो, तो पिता का सुख मिलता है,
किंतु अविकसित अथव् दोषयुक्त हो, तो पिता का सुख पिराय: नहीं मिलता है तथा पिता कष्टमय स्थिति में ही रहते हैं !

सूर्य पर्वत शनि पर्वत की तरफ झुका हो अथवा शनि पर्वत सूरिय की ओर झुका हुआ हो, अथवा दोनो आपस में मिले हों, तो पिता से मत्भेदादि लगे रहते हैं तथा पिता का सुख प्राय: प्राप्त नहीं होता है !

विकसित गुरू पर्वत व्यक्ति को मह्तवाकाँक्षी बनाता है !  ऐसे व्यक्ति की इच्छाएँ बहुत ही अधिक बढ़ी-चढ़ी होती हैं !

सूर्य-शनि पर्वत का परस्पर झुकावादि हड्डियों तथा दिल से सम्बन्धित कष्ट भी देता है ! ऐसे व्यक्ति को "हार्ट अटैक" का भय बना ही रहता है !

हथेली में गुरू तथा सूर्य पर्वत दोनो ही विकसित हों, तो व्यक्ति उचिच तथा प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेता है !

गुरू पर्वत बहुत अधिक विकसित (ऊपर क उठा हुआ) हो, तो व्यक्ति अहंकारी प्रवृति का होता है तथा स्वयँ के सामने किसी को कुछ नहीं समझता है !

यदि दोनो पर्वत अविकसित(दबे हुए) हो, तो व्यक्ति का जन्म साधारण कुल में ही होता है आरम्भिक जीवन प्राय: अभावादि में ही व्ययतीत होता है !

सूर्य पर्वत अविकसित हो, तो व्यक्ति को यश पिराप्त नहीं होता है, भलाई करने पर भी बुराई ही मिलती है ! सूर्य पर्वत पर रेखाओं द्वारा काटपीट हो रही हो, तो बदनामी कराती हैं !

स्त्री की हथेली में गुरू पर्वत पर 'क्राॅस' चिह्न हो, तो उसे अच्छी ससुराल मिलती है ! ऐसी स्त्री का प्राय: 'प्रेम विवाहा" होता है !

स्त्री की हथेली में सूर्य तथा गुरू पर्वत विकसित हों, तो वह सभ्य-कुलीन, सुसंकृत घराने से सम्बन्ध रखती है, पति की उन्नति में सहायक होती है तथा ऐसी स्त्री का ससुराल प्रतिष्ठित तथा उच्चस्तरीय होता है !

गुरू पर्वत पर 'क्राॅस' चिह्न हो, तो बदनामी देता है !
                       
गुरू पर्वत स्त्री के सुहाग अर्थात पति का भी कारक है ! स्त्री की कुंडली में यदि गुरू पर्वत अविकसित अथवा दबा हुआ हो, तो पति सुख की कमी रहती है !
अविवाहित कन्या की हथेली में गुरू दबा हुआ हो, तो विवाहा में अन्यावश्यक विलम्ब उत्पन्न होता है तथा सगाई आदि टूटने का भी योग बनता है !

स्त्री की हथेली में गुरू पर्वत बहुत अधिक उभरा हुआ हो अर्थात विकसित हो, तो ऐसी स्त्री बहुत अहंकारी तथा अन्य व्यक्ति को स्वयँ के समक्ष तुच्छ समझती है !

Saturday, 29 February 2020

09:06

जानिए, हस्तरेखा का सिद्धांत-के सी शर्मा



जानिए, हस्तरेखा का सिद्धांत-के सी शर्मा

हस्तरेखा का मुख्य सिद्धांत यह है की फलादेश करते समय व्यक्ति के लिंग, देश, काल और जाती/धर्म का ध्यान रखना आवश्यक है, क्यों की व्यक्ति के जीवन पर इनका विशेष प्रभाव होता है ! अब मान लीजिये आप किसी महिला का हाथ देखते है और उस महिला के हाथ में तलाक का योग स्पष्ट है, लेकिन वह महिला एक ऐसे समाज से है जहा पर तलाक का अर्थ सिर्फ मृत्यु है तो अब ऐसे में आपका फलादेश सर्वथा गलत साबित होना ही है ! आप को यहाँ पर तलाक का ना कह कर सिर्फ इतना कह कर अपनी बात ख़त्म कर देनी चाहिए की आपका वैवाहिक जीवन संतोषजनक नहीं होना चाहिए !

हम सभी का भाग्य एक दूसरे से अलग होता है लेकिन हाथ में रेखाए सीमित होती है इसलिए एक ही योग के कई अर्थ होते है !

हथेली में पाए जाने वाली खडी रेखा हमेशा अच्छी होती है व आड़ी रेखा हमेशा बुरी होती है ! यदि खडी रेखा किसी भी मुख्य रेखा के साथ या किसी भी पर्वत पर पाई जाती है तो वो उसका प्रभाव बड़ा देती है इसके ठीक विपरीत यदि आड़ी रेखा किसी मुख्य रेखा को काट देती है या किसी पर्वत पर पाई जाती है तो उसका प्रभाव कम कर देती है !

यदि हाथ की तीनो मुख्य रेखा दोषमुक्त/स्पष्ट हो तो व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता प्राप्त होती है लेकिन अगर ये तीनो मुख्य रेखाये दोषयुक्त, कटी-फटी द्वीपयुक्त हो तो व्यक्ति को सफलता के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है !

हाथ कौन सा देखे?

हमारे मस्तिस्क में ये सवाल सबसे पहले आता है की हमको व्यक्ति का कौन सा हाथ देखकर फलादेश करना चाहिए, सीधा या उल्टा हाथ?

कुछ विद्वानों का मत है की स्त्रियो और बच्चो का उल्टा हाथ और पुरषों का सीधा हाथ देखना चाहिए !कुछ विद्वानों का मत है की कामकाज करने वाली महिलायों का भी सीधा हाथ ही देखना चाहिए व उन पुरुषो का बाया हाथ देखना चाहिए जो आत्मनिर्भर नहीं होते !कुछ विद्वानों का मत है की जिस हाथ से व्यक्ति काम करता है या व्यक्ति जिस हाथ को ज्यादा उपयोग में लाता है उस हाथ को देख कर ही फलादेश करना चाहिए !

इस विषय पर विद्वानों का मत अलग-अलग है ! हस्तरेखा शास्त्री को दोनों ही हाथो की रेखाओ को बराबर का महत्व देना चाहिए ! व्यक्ति के जीवन में आये उतार चढाव का फलादेश कर के पता करे की आपकी बात किस हाथ से सटीक मिल रही है, उसी हाथ को प्राथमिकता दे ! एक अच्छे हस्तरेखा शास्त्री को चाहिए की वो दोनों ही हाथो का निरिक्षण करने के पश्चात ही फलादेश करे !

गुरु मुद्रिका

प्राय: गुरु मुद्रिका सभी व्यक्तियों के हाथो में होती है लेकिन अधिकत्तर टूटी हुई व कटी हुई होती है ! गुरु मुद्रिका बहुत ही कम व्यक्तियों के हाथो में स्पष्ट और दोषमुक्त होती है !
गुरु पर्वत को अर्धचन्द्राकार घेरती हुई रेखा को गुरु मुद्रिका कहते है ! गुरु मुद्रिका के होने की वजह से व्यक्ति को अध्यात्म व ज्योतिष जैसे विषय में रुचि होती है !
दोहरी गुरु मुद्रिका के होने पर व्यक्ति के अन्दर विशेष गुण आ जाते है व्यक्ति सामने वाले की मन की बात पड़ लेता है ! ऐसे व्यक्तियों की अंतर्दृष्टि बहुत तेज़ होती है !
गुरु मुद्रिका वाले व्यक्तियों का वैवाहिक जीवन अच्छा नहीं होता है !
यदि गुरु मुद्रिका को आड़ी रेखा काट दे तो व्यक्ति को मानसिक तनाव रहता है !

स्वास्तिक चिन्ह

यदि व्यक्ति के हाथ स्वास्तिक का चिन्ह है तो वह निर्धन परिवार में जन्म लेने के पश्चात भी बहुत प्रगति करता है !

स्वास्तिक चिन्ह होने पर व्यक्ति को भूमि से लाभ होता है !

दमा व श्वास रोग

यदि हृदय रेखा और मस्तक रेखा आपस में बहुत नजदीक आ जाय अर्थात चतुष्कोण (हृदय रेखा और मस्तक रेखा का मध्य भाग) बहुत सकरा हो जाय तो व्यक्ति को दमा व श्वास रोग होने की सम्भावना होती है !

यदि जीवन व मस्तक रेखा के प्रारंभ में एक बड़ा द्वीप हो तो व्यक्ति को श्वास रोग होने की सम्भावना रहती है !

यदि स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप हो व उस द्वीप को मस्तक रेखा काट रही हो तो व्यक्ति को श्वास का रोग होता है !

यदि चतुष्कोण में वर्ग हो तो व्यक्ति को दमा होता है !

धनाड्य व दरिद्र योग

यदि हाथ में अच्छी भाग्यरेखा व साथ ही अच्छी सुर्य रेखा भी हो तो व्यक्ति निसंदेह अपने जीवन में सुख-सिमृधि का आनंद लेता है व इसके विपरित्त यदि हाथ में भाग्यरेखा व सुर्य रेखा का आभाव हो तो व्यक्ति को जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है !

धनाड्य व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा का उदय चन्द्र/केतु पर्वत से होता है और वह शनि पर्वत पर निर्दोष समाप्त होती है ! भाग्य रेखा दोषमुक्त होनी चाहिये ना की कटी-फटी होनी चाहिए अर्थात उसको कोई भी अवरोध रेखा नहीं काटती हो ! भाग्य रेखा के साथ ही अच्छी निर्दोष सूर्य रेखा भी होनी चाहिए ! यदि हाथ में ऐसी भाग्य रेखा और सूर्य रेखा है तो निसंदेह व्यक्ति विलासिता का जीवन व्यतीत करने वाला होगा !

जो व्यक्ति जन्मकाल से अमीर होता है उसके अंगुष्ठ के प्रथम व दिव्तीय पर्व के मध्य आँख (द्वीप) बनी हुई होती है !

दरिद्र व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा व सूर्य रेखा का प्राय: अभाव ही होता है ! दरिद्र व्यक्ति के हाथ में रेखाओ का जाल बना होता है ! जिस व्यक्ति के हाथ में रेखाओ का जाल बना हुआ होता है उस व्यक्ति को जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ! भाग्य रेखा व सूर्य रेखा प्रभावहीन हो जाती है ! रेखाओ के मकडजाल बन जाने के कारण जीवन में पग-पग पर बाधाये आती रहती है !

अर्थात, भाग्य रेखा व सूर्य रेखा जितनी निर्दोष व स्पष्ट होगी व्यक्ति को उतनी सफलता मिलेगी और भाग्यरेखा व सूर्य रेखा जितनी दोषयुक्त होगी व्यक्ति को उतनी ही कठिनाइया उठानी पड़ेगी !

चिकित्सक व समाजसेवक योग

यदि भाग्य रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारंभ होती है व बुध पर्वत पर खडी रेखाए हो जो हृदय रेखा की तरफ जाय तो व्यक्ति समाजसेवक, डॉक्टर व नर्स इत्यादि कार्य करने वाला होता है !

मित्र व शत्रु रेखाए

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में मित्र व शत्रु होते है ! आइये, हस्तरेखा से जानते है की आपके शत्रु अधिक है या मित्र !

हमारी उंगलियों पर पर्व बने हुए होते है यदि आप ध्यानपूर्वक इन पर्वो के मध्य में देखेंगे तो पायेंगे की कई खड़ी व आड़ी रेखाए बनी हुई होती है ! खड़ी रेखाए मित्रो का प्रतीक है व आड़ी रेखाए दुश्मनों का प्रतीक है ! अर्थात यदि आपकी उंगलियों के पर्वो के मध्य अधिक आड़ी रेखाए है तो आपके हितेषी कम ही होंगे व बुरा चाहने वाले अधिक होंगे ! इसके विपरीत यदि खड़ी रेखाए अधिक है व आड़ी रेखाए कम है तो आपके हितेषी अधिक होंगे ! यदि उंगलियों के पर्वो पर खड़ी और आड़ी रेखाओ का आभाव है तो व्यक्ति का जीवन बाहरी दुनिया से कटा हुआ होता है अर्थात न दुश्मन और न ही दोस्त !

यदि उच्च मंगल से कोई आड़ी रेखा आकर आपकी भाग्य रेखा को काट देती है तो समझ लीजिए की आपको जीवन में निश्चित ही किसी से धोखा मिलेगा या आपका दुश्मन आपको नुक्सान पहूचायेगा ही ! ऐसे दुश्मन प्राय "आस्तीन के साँप" की तरह होते है जो वक्त मिलने पर धोखा दे देते है !

यदि भाग्य रेखा और सूर्य रेखा को शुक्र पर्वत से आती हुई आड़ी रेखा काट देती है तो इसका अर्थ ये की परिवार वालो का विरोध या परिवार वालो की वजह से ही धनहानि व मानहानि का सामना करना पद सकता है है ! यदि रेखा शुक्र पर्वत से निकल कर भाग्य रेखा से मिल रही है तो व्यक्ति को परिवार वालो की मदद मिलती है !

हस्तरेखा और कारावास /सन्यास

यदि जीवन रेखा के अंत (निम्न शुक्र पर्वत) में जीवन रेखा से जुड़ा हुआ वर्ग या क्रोस है तो व्यक्ति को कारावास की सजा होती है या फिर व्यक्ति सन्यास ले लेता है !

हस्तरेखा में कारावास के और भी योग बताये गए है !

हस्तरेखा में मांगलिक दोष

जिस प्रकार कुंडली में यदि मंगल ग्रह प्रथम, चतुर्थ , सप्तम, अष्ठम व बाहरवे भाव में हो तो व्यक्ति मांगलिक होता है उसी प्रकार हस्तरेखा में भी मांगलिक योग बताये गए है !

यदि विवाह रेखा की दूरी हृदय रेखा से बहुत दूर हो या कनिष्का ऊँगली (छोटी ऊँगली) के बिलकुल समीप हो तो व्यक्ति मांगलिक होता है !

यदि विवाह रेखा से कोई शाखा निकल कर नीचे की ओर जाय तो व्यक्ति मांगलिक होता है !

यदि निम्न मंगल से कोई रेखा निकल कर बुध पर्वत तक जाय या विवाह रेखा को काट दे तो व्यक्ति मांगलिक होता है !

मांगलिक योग होने पर विवाह देर से होता है या फिर वैवाहिक जीवन संतोषजनक नहीं होता है !

त्रिशूल चिन्ह

यदि हाथ में किसी भी रेखा पर त्रिशूल पाया जाता है तो वह उस रेखा के गुणों को दुगना कर देता है ! यदि त्रिशूल सूर्य रेखा पर पाया जाता है तो व्यक्ति को अपार सफलता मिलती है ! परन्तु यदि त्रिशूल की शाखा दोषयुक्त है तो त्रिशूल के प्रभाव में कमी आ जाती है !

विवाह आयु की गणना का तरीका

कनिष्का (छोटी ऊँगली) के तीसरे पर्व की जड़ में एक बिंदु लगा दे व दूसरा बिंदु हृदय रेखा पर सामने लगा दे अब इन दोनों बिन्दुओ को एक सीधी रेखा से खीचकर मिला दे ! अब आप इस दूरी को 60 वर्ष का मान लीजिये ! अब यदि इस दूरी के ठीक मध्य में एक बिंदु लगा दे तो वो 30 वर्ष की आयु होगी ! अब यदि मध्य बिंदु और हृदय रेखा की दूरी के ठीक मध्य एक और बिंदु लगा दिया जाय तो वो 15 वर्ष की आयु होगी ! इसी प्रकार यदि मध्य बिंदु और कनिष्का ऊँगली के जड़ के बिंदु की दूरी के ठीक मध्य में एक बिंदु लगा दिया जाय तो वो 45 वर्ष की आयु होगी ! इसी प्रकार आप बिंदु लगा कर एक-एक वर्ष का अनुमान निकाल सकते है !

अब आप बहुत आसानी से अनुमान लगा सकते है की व्यक्ति का विवाह किस आयु में होना चाहिए ! यदि विवाह रेखा मध्य बिंदु से नीचे है तो आप बता सकते है की विवाह 30 वर्ष की आयु से पहले होना चाहिए उसी प्रकार यदि विवाह रेखा मध्य बिंदु के ऊपर है तो आप बता सकते है की विवाह 30 वर्ष के पश्चात ही होगा !

यहाँ पर इस बात का ध्यान रखना होगा की विवाह रेखा वो ही मानी जायगी जो स्पष्ट और लम्बी हो ! आपको इसके लिए काफी हाथो का परीक्षण करना होगा क्योकि जैसा मैं पहले बता चुका हूँ की "हस्तरेखा का मुख्य सिद्धांत यह है की फलादेश करते समय व्यक्ति के लिंग, देश, काल और जाती/धर्म का ध्यान रखना आवश्यक है, क्यों की व्यक्ति के जीवन पर इनका विशेष प्रभाव होता है" ! आप खुद जानते है की विवाह को लेकर प्रत्येक देश, जाती, धर्म व समाज में विभिन्नता पाई जाती है !

हाथ में विवाह के अन्य योग भी होते है !