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Wednesday, 1 July 2020

17:15

गणपति उत्सव पर लगा कोरोना का ग्रहण, नहीं बैठेंगे लालबाग में बड़े गणपति

हकीकत का आईंना
महाराष्ट्र में जानलेवा कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए इस साल मुंबई के लालबाग में गणपति उत्सव नहीं मनाया जाएगा. गणेशोत्सव की जगह इस साल यहां आरोग्य उत्सव मनाया जाएगा. लालबाग राजा गणपति मंडल ने कहा कि मुंबई में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. बता दें कि इस साल गणेशोत्सव 22 अगस्त से शुरू हो रहा है.

दरअसल, पूरे देश में मुंबई सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित शहरों में है. इसी के मद्देनजर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सभी मंडलों को आदेश दिया था कि इस साल गणपति उत्सव हर साल की तरह न मनाया जाए, क्योंकि इसमें बड़ी तादाद में लोग जमा होते हैं. साथ ही उन्होंने कहा था कि गणपति की मूर्ति की ऊंचाई 4 फीट तक ही रखी जाए.

सरकार के इस निर्णय के बाद बाकी गणपति मंडलों ने दो मूर्तियां बनाने का फैसला किया है. एक बड़ी मूर्ति बनाई जाएगी और एक छोटी. पूजा सिर्फ छोटी मूर्ति की ही की जाएगी. लेकिन लालबाग राजा मंडल की एक ही मूर्ति है. यहां छोटी मूर्ति नहीं है, इसलिए पूजा भी बड़ी मूर्ति की ही की जाएगी.

लालबाग मंडल के अधिकारियों ने कहा है कि गणपति की लंबाई कम नहीं की जा सकती है. इतना ही नहीं, अगर छोटी मूर्ति भी लाई जाती है तो उसके लिए भी बड़ी तादाद में लोग जमा होंगे. ऐसे में लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए इस साल न ही कोई मूर्ति होगी, न ही मूर्ति विसर्जन किया जाएगा.

आरोग्य उत्सव मनाया जाएगा
लालबाग गणपति मंडल ने लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए न सिर्फ मूर्ति विसर्जन रोक दिया है बल्कि दूसरी तरफ ये भी फैसला किया है कि इस दौरान कोरोना प्रभावित लोगों के लिए काम किया जाएगा. लालबाग मंडल इस बार गणपति उत्सव को आरोग्य उत्सव के तौर पर मनाएगा. इसके तहत प्लाज्मा थेरेपी को प्रमुखता दी जाएगी, साथ ही कोरोना से मौत के मुंह में समाए पुलिसकर्मियों के परिवार की मदद की जाएगी.

बता दें कि गणपति मंडल कोरोना वायरस के संकटकाल में पहले से ही हेल्थ कैंपेन चला रहा है. इसके तहत जनता क्लीनिक चलाए जा रहे हैं और ब्लड डोनेशन कैंपेन भी चलाया जा रहा है. मंडल के अधिकारियों का कहना है कि लालबाग राजा अपने लोगों को स्वस्थ देखना चाहते हैं, यही वजह है कि इस साल न कोई मूर्ति होगी, न ही विसर्जन होगा.

Sunday, 14 June 2020

16:49

जानिए, क्या है विज्ञान भैरव तंत्र-के सी शर्मा


एक अद्भुत ग्रंथ है भारत मैं। और मैं समझता हूं, उस ग्रंथ से अद्भुत ग्रंथ पृथ्‍वी पर दूसरा नहीं है।
 उस ग्रंथ का नाम है, विज्ञान भैरव तंत्र। छोटी सी किताब है। इससे छोटी किताब भी दुनियां में खोजनी मुश्किल है। कुछ एक सौ बारह सूत्र है। हर सुत्र में एक ही बात है। पहले सूत्र में जो बात कह दी है, वहीं एक सौ बारह बार दोहराई गई है—एक ही बात, और हर दो सूत्र में एक विधि हो जाती है।

पार्वती पूछ रहीं है शंकर से,शांत कैसे हो जाऊँ? आनंद को कैसे उपलब्‍ध हो जाऊँ? अमृत कैसे मिलेगा? और दो-दो पंक्‍तियों में शंकर उत्‍तर देते है। दो पंक्‍तियों में वे कहते है, बाहर जाती है श्‍वास, भीतर जाती है श्‍वास। दोनों के बीच में ठहर जा, अमृत को उपलब्‍ध हो जाएगी।

 एक सूत्र पूरा हुआ। बाहर जाती है श्‍वास, भीतर आती है श्‍वास, दोनों के बीच ठहरकर देख ले, अमृत को उपलब्‍ध हो जाएगा।
पार्वती कहती है। समझ में नहीं आया। कुछ और कहें। शंकर दो-दो में कहते चले जाते है। हर बार पार्वती कहती है। नहीं समझ में आया। कुछ और कहें। फिर दो पंक्‍तियां। और हर पंक्‍ति का एक ही मतलब है, दो के बीच ठहर जा। हर पंक्‍ति का एक ही अर्थ है, दो के बीच ठहर जा। बाहर जाती श्‍वास, अंदर जाती श्‍वास। जन्‍म और मृत्‍यु, यह रहा जन्म यह रही मृत्‍यु। दोनों के बीच ठहर जा। पार्वती कहती है, समझ में कुछ आता नहीं। कुछ और कहे।
एक सौ बारह बार। पर एक ही बात दो विरोधों के बीच में ठहर जा। प्रतिकार-आसक्‍ति–विरक्‍ति, ठहर जा—अमृत की उपलब्धि। दो के बीच दो विपरीत के बीच जो ठहर जाए वह गोल्‍डन मीन, स्‍वर्ण सेतु को उपलब्‍ध हो जाता है।
यह तीसरा सूत्र भी वहीं है। और आप भी अपने-अपने सूत्र खोज सकते है। कोई कठिनाई नहीं है। एक ही नियम है कि दो विपरीत के बीच ठहर जाना, तटस्‍थ हो जाना। सम्‍मान-अपमान, ठहर जाओ—मुक्‍ति। दुख-सुख, रूक जाओ—प्रभु में प्रवेश। मित्र-शत्रु,ठहर जाओ—सच्चिदानंद में गति।
कहीं से भी दो विपरीत को खोज लेना ओर दो के बीच में तटस्‍थ हो जाना। न इस तरफ झुकना, न उस तरफ। समस्‍त योग का सार इतना ही है। दो के बीच में जो ठहर जाता,वह जो दो के बाहर है, उसको उपलब्‍ध हो जाता है। द्वैत में जो तटस्थ हो जाता, अद्वैत में गति कर जाता है। द्वैत में ठहरी हुई चेतना अद्वैत में प्रतिष्‍ठित हो जाती है। द्वैत में भटकती चेतना, अद्वैत में च्‍युत हो जाती है।
।ओशो।
।।हरि ॐ तत्सत्।।

Sunday, 7 June 2020

17:21

जानिए कहाँ है विद्याशंकर मंदिर और जाने उसकी महत्ता के सी शर्मा


 विद्याशंकर मंदिर (कर्नाटक) में 12 स्तम्भ हैं,
जिस पर सौर चिन्ह बनें हुए हैं। हर सुबह जब सूर्य की किरणें मंदिर में प्रवेश करती हैं तो वे वर्ष के वर्तमान मास का संकेत देने वाले एक विशेष स्तम्भ से टकराती हैं...है ना आश्चर्य...।

 लेकिन कुछ लोग अज्ञानता के अंधकार में अंधे होकर और मूर्खता के मद में चूर होकर, हिंदू संस्कृति का उपहास उड़ाते हैं और उन लोगों की जानकारी के लिए बता दूं कि इस मंदिर का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के दौरान हुआ था और विजयनगर साम्राज्य मध्यकालीन भारत का सबसे विशाल हिंदू साम्राज्य था और हैरत की बात ये है की मलेच्छ सेना में कभी भी इस साम्राज्य से सीधे टकराने का साहस नहीं हुआ। 
 ये विजयनगर वही हिन्दू साम्राज्य है, जिसे हराने के लिए भारत की समस्त मुस्लिम शक्ति इकट्ठा होकर एक संघ में परिवर्तित हो गई थी और तद-उपरांत उन्होंने इस साम्राज्य पर आक्रमण किया और आश्चर्य देखिए उसके बाद भी मुस्लिम इस साम्राज्य को हरा नहीं पाएं...सिर्फ कुछ समय के लिए इस साम्राज्य की शक्ति सीमित कर दी। सिर्फ कुछ समय के लिए
 क्योंकि आगे चलकर इसी साम्राज्य में कृष्णदेव राय राजा बने और उसकी महानता, शौर्य, पौरूष, औजस्व और पराक्रम का अंदाज हम बाबर की आत्मकथा से लगा सकते हैं।
 16वीं शताब्दी में जब बाबर भारत आया तो वो लिखता हैं "इस समय भारत में 2 काफिर रियासतें हैं और 5 मुस्लिम रियासतें हैं, इनमें सबसे शक्तिशाली दक्षिण का राजा कृष्णदेव राय हैं और उसे हराने  योग्य शक्ति मुझमें नहीं है।"
 इस कथन से बाबर की विवश्ता और बेबसी दोनों का पता चलता हैं।
 और ध्यान रखिएगा... ये मध्यकालीन भारत की बात हैं, जिस समय इस्लामिक शक्ति अपने चरम पर थी।
 लेकिन...इसके बाद भी कुछ लोग हिंदू संस्कृति का और हिन्दू सभ्यता का उपहास उड़ाते हैं...वो सभी दुरात्मा बस ये बता दे कि और किस धर्म में हिन्दू (सनातन) धर्म से अधिक करूणा, दया, शौर्य, साहस, पराक्रम, औजस्व और कर्तव्यपरायणता रही हैं।

Tuesday, 2 June 2020

12:09

जानिए,स्वामी करपात्री जी महाराज के जीवन पर विशेष-के सी शर्मा

हकीकत का आईंना

आइए दोस्तों आज आप लोगों को एक सत्य घटना सुनाते हैं, घटनाक्रम थोड़ा लंबा है लेकिन दिलचस्पी बनाए रखें, आपके लिए इस लेख में बहुत कुछ जानने योग्य है...

स्वामी करपात्री जी महाराज का मूल नाम श्री हर नारायण ओझा था।

वे हिन्दू दसनामी परम्परा के भिक्षु थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम हरीन्द्रनाथ सरस्वती था किन्तु वे “करपात्री” नाम से ही प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे।

वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति ‘फोटोग्राफिक’ थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रुप में लिखा हुआ है। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गई।

"अखिल भारतीय राम राज्य परिषद" भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधान सभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।

जब इंदिरा गांधी वादे से मुकर गयी--

इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था। करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती।

इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी।

गौ हत्या निषेध आंदोलन--

और जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों की इस मांग को ठुकरा दिया जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी, जिसे ”गोपाष्टमी” भी कहा जाता है।

इस धरने में मुख्य संतों के नाम इस प्रकार हैं- शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री महाराज और रामचन्द्र वीर।
राम चन्द्र वीर तो आमरण अनशन पर बैठ गए थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिसमें कई साधू मारे गए।
इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ”गुलजारी लाल नंदा” ने अपना त्याग पत्र दे दिया, और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था।
लेकिन संत ”राम चन्द्र वीर” अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है। यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था।

इंदिरा के वंश पर श्राप--

लेकिन खुद को निष्पक्ष बताने वाले किसी भी अखबार ने इंदिरा के डर से साधुओं पर गोली चलने और राम चंद्र वीर के बलिदान की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी, सिर्फ मासिक पत्रिका “आर्यावर्त” और “केसरी” ने इस खबर को छापा था। और कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका “कल्याण” ने गौ अंक में एक विशेषांक प्रकाशित किया था, जिसमे विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी।
और जब मीडिया वालों ने अपने मुहों पर ताले लगा लिए थे तो करपात्री जी ने कल्याण के उसी अंक में इंदिरा को सम्बोधित करके कहा था-

“यद्यपि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है, फिर भी मुझे इसका दुःख नही है। लेकिन तूने गौ हत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है, वह क्षमा के योग्य नहीं है। इसलिये मैं आज तुझे श्राप देता हूँ कि-

”गोपाष्टमी” के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा”,

“आज मैं कहे देता हूँ कि गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का भी नाश होगा..!“

श्राप सच हो गया--

जब करपात्री जी ने यह श्राप दिया था तो वहाँ “प्रभुदत्त ब्रह्मचारी“ भी मौजूद थे। करपात्री जी ने जो भी कहा था वह आगे चल कर अक्षरशः सत्य हो गया।
इंदिरा के वंश का गोपाष्टमी के दिन ही नाश हो गया। सुबूत के लिए इन मौतों की तिथियों पर ध्यान दीजिये--

1- संजय गांधी की मौत आकाश में हुई, उस दिन हिन्दू पंचांग के अनुसार गोपाष्टमी थी।

2- इंदिरा की मौत घर में हुई, उस दिन भी गोपाष्टमी थी।

3- राजीव गांधी मद्रास में मरे, उस दिन भी गोपाष्टमी ही थी।

गोली चलने के दिन स्वामी करपात्री जी ने उपस्थित लोगों के सामने गरज कर कहा था कि- "लोग भले इस घटना को भूल जाएँ, लेकिन मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।
गौ हत्यारे के वंशज नहीं बचेंगे, चाहे वह आकाश में हो या पाताल में हों या चाहे घर में हो या बाहर हो, यह श्राप इंदिरा के वंशजों का पीछा करता रहेगा।"

फिर करपात्री जी ने राम चरित मानस की यह चौपाई लोगों को सुनायी--

“।। संत अवज्ञा करि फल ऐसा, जारहि नगर अनाथ करि जैसा ।।"
12:05

जब ग्रहों को करना हो अपने अनुकूल तो करें यह उपाय के सी शर्मा



सुबह  ब्रह्म मुहूर्त में उठे!

निम्नलिखित कार्य करे उस दिन के लिए आप के सभी ग्रह अनुकूल हो जायेंगे और दिन भर एक दिव्य शक्ति की अनुभूति होती रहेगी!
 
सुबह उठ कर सबसे पहले अपने "माँ बाबू जी " के चरण सपर्श करे उस दिन के लिए "सूर्य चन्द्र" बहुत ही शुभ फल देंगे रोजाना शुभ फल चाहते हो तो रोज यह कार्य जरूर करें!

एक गिलास गर्म पानी पियें जल(चन्द्र) का यह प्रवाह आपके शरीर की सारी नसों को खोल देगा! 

दांत साफ़ करके घर से निकल कर सैर करने जाए और घास पर नंगे पाँव चले इससे आप का "बुध" बलवान होगा!

सैर पर आप अपनी पत्नी को भी ले जाएँ "पत्नी" साथ होगी तो सुबह की सैर का "लुत्फ़" ही कुछ और होगा (थोडा सा रोमानी हो जाए )दिन भर स्फूर्ति रहेगी तो "शुक्र" का रोमांस भी आप के साथ होगा!

घर से जब चले तो साथ में कुछ खाने का सामान "Bread" वगैरह लेकर जाएँ कई बार रास्ते में आवारा "कुत्ते" मिलतें है उन्हें Bread खाने को दे जिससे आप का "केतु" भी अनुकूल होगा क्योंकि "कुत्ता जाति को माना गया है दरवेश ,इसकी प्रार्थना करती प्रभु के घर प्रवेश "!

पन्द्रह बीस मिनट कसरत करें, जिम जाते हैं तो आप का "मंगल" आप को चुस्त दरुस्त रखेगा!

नहाने से पहले सरसों के तेल की मालिश करें "शनि" की कमी भी दूर हो जायेगी! 

नहाने के बाद श्रद्धा अनुसार पूजा पाठ से "गुरु" भी active हो जायेंगे! 

भगवान् सूर्य को जल दे "राहू" के दोष भी शांत होते हैं! 
आज कल गर्मियाँ हैं गली मोहल्ले में सुबह सफाई कर्मचारी झाड़ू लगाने आता है उसे ठंडा पानी पिलाए या कुछ खिला दे "राहू" की आशीष भी मिल जायेगी! 

अगर आप यह प्रतिदिन "नियम" से करेंगे तो जीवन में एक "अनुशासन" आएगा तो समझ ले "सूर्य" भी अनुकूल हो गया क्योंकि वक़्त की पाबंदी सीखनी है तो "सूर्य" से सीखें,सूर्य सभी ग्रहों के दोषों को हर लेता है।
12:02

जब चीन ने अपने छात्रों पर चलवा दिए थे टैंक-के सी शर्मा

हकीकत का आईंना


जानिए,जब चीन ने अपने छात्रों पर चलवा दिए थे टैंक-के सी शर्मा


   
साल 1989 का एक जून इतिहास में दर्ज एक ऐसा ही दिन था जब चीन में लोकतंत्र की लोकतांत्रिक मूल्यों की ऐसी हत्या की गई थी जिससे सारी दुनिया स्तब्ध रह गई थी। इसी दिन तियानमेन चौक पर प्रदर्शन कर रहे अपने छात्रों को चीन की सेना ने टैंकों से रौंद दिया था
 
यूं तो इतिहास के आईने में हर एक क्षण बेशकीमती होता है और अपने साथ कोई न कोई ऐसी बात रखता है जिससे आने वाली पीढ़ी उसे याद रख सके। साल 1989 का इतिहास में दर्ज एक ऐसा ही साल था जब लोकतांत्रिक मूल्यों के विषय में हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में चर्चाएं जारी थीं। यह वही साल है जब पूर्वी जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी का पतन होने के साथ ही बर्लिन की दीवार गिरा दी गई और इसके साथ ही पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण की शुरुआत हो चुकी थी।

यह वही साल 1989 है जब दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद वाली सरकार ने पहली बार राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू की थी जो एक साल बाद नेल्सन मंडेला की रिहाई के बाद समाप्त हुई। 
साल 1989 में ही हिंदुस्तान में हुए आम चुनाव में पहली बार किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था।

कुल मिलाकर देखें तो, साल 1989 में हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में लोकतंत्र का वास्तविक रूप दिखाई दे रहा था लेकिन इसी साल चीन में लोकतंत्र की ऐसी हत्या की गई कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह गयी थी।

दरअसल, अप्रैल 1989 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और सुधारवादी नेता हू याओबांग की मृत्यु हो गई थी। हू याओबांग चीन के रुढ़िवादियों और सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीति के विरोध में थे और हारने के कारण उन्हें पद से हटा दिया गया था।

हू याओबांग की छवि पूरे देश में एक महानतम सुधार उदारवादी नेता के रूप में थी। लोकप्रिय नेता की मृत्यु के बाद चीनी छात्रों ने उन्हीं की याद में 17 अप्रैल को बीजिंग के तियानमेन चौक पर शोक सभा आयोजित की थी। इस शोक सभा में छात्रों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी एवं तानाशाही समाप्त करने तथा अधिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता देने की मांग भी छात्रों के एजेंडे में शामिल हो गई।

17 अप्रैल को आयोजित शोक सभा को छात्रों समेत स्थानीय लोगों का भी सहयोग प्राप्त हुआ और यह सभा कब आंदोलन में बदल गई पता ही नहीं चला। शुरुआत में जिस सभा में थोड़ी सी संख्या में सिर्फ़ छात्र थे, वहां अब अन्य छात्रों और स्थानीय लोगों के सहयोग के बाद छात्र 'आंदोलनकारी' हो गए थे।

आंदोलनकारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी पूरा तियानमेन चौक 'जन-शक्ति' से भर चुका था। 10 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी राजनीतिक आज़ादी की मांग को लेकर तियानमेन चौक पर इकट्ठा हो चुके थे। इस आंदोलन को चीन के वामपंथी शासन के इतिहास में इसे सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन कहा जाता है, यह प्रदर्शन कई शहरों और विश्वविद्यालयों तक फैल गया था। आंदोलनकारी छात्र तानाशाही समाप्त करने और स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की मांग कर रहे थे।

प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या के कारण हालात सरकार के काबू से बाहर हो गए थे। शीर्ष नेता देंग श्याओपिंग ने चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया और सेना को कूच करने का आदेश भी थमा दिया, लेकिन छात्रों की संख्या और साहस इतना अधिक था कि छात्रों ने बैरीकेट्स लगाकर सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया ऐसी स्थिति में अधिकारियों को मजबूरन सेना को वापस आने का आदेश देना पड़ा।

चूंकि चीन की सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ में थी, इसलिए वे सत्ता का विरोध सहन नहीं कर सके और 3 जून को एक बार फिर सेना बीजिंग में प्रवेश कर जाती है। सेना के बीजिंग में प्रवेश की ख़बर आंदोलन में शामिल छात्रों तक पहुंच चुकी थी, ऐसे में कुछ छात्रों ने आगे बढ़कर सेना का विरोध करने का निश्चय किया। चूंकि इन छात्रों ने पिछली बार बैरीकेट्स लगाकर सेना को वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया था, इसलिए उन्हें लगा कि वे इस बार भी कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इस बार सेना के हाथों में आदेश था जनता के विरोध को किसी भी तरीके से कुचलने का। चीनी सेना लगातार आगे बढ़ रही थी, छात्र भी बढ़ चढ़कर विरोध जता रहे थे। इसी दौरान मक्सीडी अपार्टमेंट के पास छात्रों का विरोध प्रदर्शन तीव्र होता देख सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिससे 36 प्रदर्शनकारी छात्र कम्युनिस्ट सरकार की खूनी होली का शिकार हो गए।

36 छात्रों की निर्मम हत्या के बाद आंदोलन कुछ क्षण के लिए तो शांत हुआ लेकिन यह तूफ़ान से पूर्व की शांति थी, अभी सेना मक्सीडी अपार्टमेंट के पास ही रुक गई थी। अगली सुबह आंदोलन एक बार फिर तीव्र हो गया। छात्रों के आंदोलन के इस रूप को यदि प्रचंड कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा, लेकिन यह प्रचंडता कम्युनिस्ट सरकार और उसके सैनिकों को नागवार गुजरी 4 जून को सेना एक बार टैंकों के साथ आगे बढ़ रही थी लेकिन आंदोलनकारी छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं थे। सेना के टैंकों ने आगे बढ़ते हुए छात्रों को रौंदना शुरू कर दिया, एक के बाद एक लाशें बिछती चली गईं लेकिन बेदर्द कम्युनिस्ट सरकार और उसके सैनिकों का दिल नहीं पिघला।

साल 1989 के जून माह की 3 और 4 तारीख़ को कम्युनिस्ट सरकार ने तियानमेन चौक पर छात्रों के खून से 'लाल सलाम' लिख दिया था। कम्युनिस्ट सरकार ने इस घिनौनी हरकत के बाद जो मरने वालों की संख्या के जो आंकड़े जारी किए गए वे बेहद ही हैरान करने वाले थे।

3 जून को तो सिर्फ़ 36 लोग मारे गए थे लेकिन चार जून की रात बीजिंग की सड़कों पर टैंक दौड़ रहे थे, गोलियों की तड़-तड़ करती आवाज़ें बता रहीं थीं कि कम्युनिस्टों के 'लाल सलाम' ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, लेकिन चीनी सरकार लगातार कह रही थी कि मरने वालों की संख्या मात्र 200 है।

हालांकि चीन का यह झूठ दुनिया के सामने तब आया जब ब्रिटिश पुरालेख ने पिछले साल एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि 4 जून की रात बीजिंग के तियानमेन चौक में 10,000 से ज्यादा लोग कम्युनिस्ट सरकार की खूनी होली के शिकार हो गए थे। इतना ही नहीं गत वर्ष टोरंटो यूनिवर्सिटी और हांगकांग यूनिवर्सिटी ने भी एक दस्तावेज प्रकाशित किया था जिसमें दावा किया गया कि चीन ने इस खूनी होली को दुनिया से छिपाने के लिए 3,200 से ज्यादा सबूत मिटा दिए थे।

चीन ने पूरी दुनिया को यही बताया कि वहां सिर्फ़ 200 जान ही गईं थीं। आज तियानमेन चौक की घटना के 31 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी अगर चीनी मीडिया या विदेशी मीडिया उस जगह पर जाने का विचार नहीं कर सकती, क्योंकि चीन ने तियानमेन चौक में मीडिया के जाने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। आज चीन में तियानमेन चौक संबंध में बात करना भी अपराध श्रेणी में आता है। चीनी सरकार नहीं चाहती कि कोई भी इस मुद्दे पर बात करे, यही कारण है कि चीन की नई पीढ़ी को उसकी सरकार द्वारा किए गए दुर्दांत घटनाक्रम की जानकारी नहीं है।

चाइनाज़ सर्च फ़ॉर सिक्योरिटी के लेखक और चीनी मामलों के जानकार एंड्रयू नाथन कहते हैं कि "तियानमेन चौक की घटना के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार और मजबूत हो गई है। तियानमेन चौक में आंदोलनकारियों के एकत्रित होने के बाद से चीन ने अपने पुलिस सिस्टम में आमूल चूल परिवर्तन किए हैं। एंड्रयू आगे कहते हैं कि 'तियानमेन चौक में हुई हिंसा के बाद जिस तरह से अनेक देशों ने चीन पर प्रतिबंध लगाए उससे लगा कि चीन की साम्यवादी सरकार टूट जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।'

चीन में हत्याओं का दौर वहां कम्युनिस्टों के हाथों में सत्ता आते ही शुरू हो गया था जो कि अब तक बदस्तूर जारी है, कभी माओ तो कभी देंग श्याओपिंग तो कभी शी जिनपिंग सभी ने सिर्फ़ तानाशाही और हत्याओं के बल पर ही अपनी ताक़त को मजबूत किया है जो कि कम्युनिस्ट विचारधारा का मूल उद्देश्य है।

आज चीन में लोकतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है, शी जिनपिंग वहां के राष्ट्रपति हैं जो कि अपनी आख़िरी सांसों तक राष्ट्रपति रहेंगें। वहां न तो अब चुनावों का कोई महत्व रह गया है और न ही अभिव्यक्ति का। चीन की कम्युनिस्ट सरकार न तो वहां किसी को अपनी आज़ादी से कुछ भी पढ़ने देती और न ही कुछ भी बोलने की आज़ादी देती। यदि कोई भी व्यक्ति चीनी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करता है तो उसका वही हश्र होता है जो तीन दशक पहले तियानमेन चौक में हुआ था।

Monday, 1 June 2020

19:27

जानिए,धन और धर्म दोनों का मनुष्य जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है-के सी शर्मा

मनुष्य की चाल केवल धन से ही नहीं बदलती अपितु धर्म से भी बदल जाती है। 
जब धन होता है तो अकड़ कर चलता है और जब धर्म होता है तो विनम्र होकर चलने लगता है।

जीवन में धन अथवा संपत्ति आती है तो अहंकार भी अपने आप आ जाता है और जीवन में धर्म अथवा सन्मति आती है तो विनम्रता भी अपने आप आ जाती है। 
जीवन में संपत्ति आती है तो मनुष्य कौरवों की तरह अभिमानी हो जाता है और जीवन में सन्मति आती है तो मनुष्य पाण्डवों की तरह विनम्र भी बन जाता है।

जब धर्म किसी व्यक्ति के जीवन में आता है तो वह अपने साथ विनम्रता जैसे अनेक सद्गुणों को लेकर आता है। विनम्रता धर्म की अनिवार्यता नहीं अपितु धर्म का स्वभाव है। 
धर्म के साध विनम्रता ऐसे ही सहज चले आती है, जैसे फूलों के साथ खुशबु और दीये के साथ प्रकाश।

संपत्ति आने के बावजूद भी जो उस लक्ष्मी को नारायण की चरणदासी समझकर उसका सदुपयोग करते हुए अपने जीवन को विनम्र भाव से जीते हैं, सचमुच इस कलिकाल में उनसे श्रेष्ठ कोई साधक नहीं हो सकता।