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Wednesday, 3 June 2020

12:26

जानिए क्या है इस मुस्लिम देश से भगवान गणेश का नाता क्यों लगी है नोट पर इनकी फोटो-के सी शर्मा


 
हिन्दू धर्म में गणेश को सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले पूजा जाता है.  भारत में गणेश को बुद्धि, धन, समृद्धि का भगवान माना जाता है. आज हम आपको बताते हैं गणेश जी के बारे में एक ऐसी खास बात जो बहुत ही कम लोग जानते हैं. क्या आपने कभी गणेश जी की तस्वीर नोटों पर छपी देखी है. शायद नहीं देखी हो, लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश है जहां के नोट पर गणेश की तस्वीर विराजमान है. आइए आपको बताते हैं आखिर क्यों वहां के नोट पर विराजमान हैं गणपति जी...

दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया के नोट पर गणपति छपे हैं. यहां की करेंसी भी भारत की मुद्रा की तरह ही प्रचलित है. यहां रूपियाह चलता है. आपको बता दें कि इंडोनेशिया में करीब 87.5 फीसदी आबादी इस्लाम धर्म को मानती है. वहां सिर्फ 3 फीसदी हिन्दू आबादी है. वहां, 20 हजार के नोट पर भगवान गणेश की फोटो है. दरअसल, भगवान गणेश को इंडोनेशिया में शिक्षा, कला और विज्ञान का देवता माना जाता है.
12:24

जानिए,बुध प्रदोष व्रत परिचय एवं प्रदोष व्रत विस्तृत विधि-के सी शर्मा

 

प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है।

ऎसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए।

यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है।

*प्रदोष व्रत की महत्ता:-*

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा।

उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है।

*व्रत से मिलने वाले फल:-*

अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है।

जैसे,  सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है. सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है. जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है. व बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है।

गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है. शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है. अत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।

*व्रत विधि:-*

सुबह स्नान के बाद भगवान शिव, पार्वती और नंदी को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। फिर गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग और इलायची चढ़ाएं। फिर शाम के समय भी स्नान करके इसी प्रकार से भगवान शिव की पूजा करें। फिर सभी चीजों को एक बार शिव को चढ़ाएं।और इसके बाद भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजन करें। बाद में भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। इसके बाद आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। जितनी बार आप जिस भी दिशा में दीपक रखेंगे, दीपक रखते समय प्रणाम जरूर करें। अंत में शिव की आरती करें और साथ ही शिव स्त्रोत, मंत्र जाप करें। रात में जागरण करें।

*प्रदोष व्रत समापन पर उद्धापन:-* 

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

*उद्धापन करने की विधि:-* 

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. "ऊँ उमा सहित शिवाय नम:" मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है।

हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है। और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है।

*बुध प्रदोष व्रत कथा:-*

सूत जी बोले- “बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत से सर्व कामनाएं पुर्ण होती हैं। इस व्रत में हरी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए । शंकर भगवान की आराधना धूप, बेल-पत्रादि से करनी चाहिए।”व्रत कथा
एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ । विवाह के दो दिनों बाद उसकी पत्‍नी मायके चली गई । कुछ दिनों के बाद वह पुरुष पत्‍नी को लेने उसके यहां गया । बुधवार जो जब वह पत्‍नी के साथ लौटने लगा तो ससुराल पक्ष ने उसे रोकने का प्रयत्‍न किया कि विदाई के लिए बुधवार शुभ नहीं होता । लेकिन वह नहीं माना और पत्‍नी के साथ चल पड़ा । नगर के बाहर पहुंचने पर पत्‍नी को प्यास लगी । पुरुष लोटा लेकर पानी की तलाश में चल पड़ा । पत्‍नी एक पेड़ के नीचे बैठ गई । थोड़ी देर बाद पुरुष पानी लेकर वापस लौटा उसने देखा कि उसकी पत्‍नी किसी के साथ हंस-हंसकर बातें कर रही है और उसके लोटे से पानी पी रही है । उसको क्रोध आ गया । वह निकट पहुंचा तो उसके आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा । उस आदमी की सूरत उसी की भांति थी । पत्‍नी भी सोच में पड़ गई । दोनों पुरुष झगड़ने लगे । भीड़ इकट्ठी हो गई । सिपाही आ गए । हमशक्ल आदमियों को देख वे भी आश्‍चर्य में पड़ गे । उन्होंने स्त्री से पूछा ‘उसका पति कौन है?’ वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई । तब वह पुरुष शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा- ‘हे भगवान! हमारी रक्षा करें। मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने सास-श्‍वशुर की बात नहीं मानी और बुधवार को पत्‍नी को विदा करा लिया । मैं भविष्य में ऐसा कदापि नहीं करूंगा।’ जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अन्तर्धान हो गया। पति-पत्‍नी सकुशल अपने घर पहुंच गए। उस दिन के बाद से पति-पत्‍नी नियमपूर्वक बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत रखने लगे।

            
12:22

पूजा का असली महत्त्व जाने के सी शर्मा की कलम से

    
ये  लड़की  कितनी नास्तिक  है ...हर  रोज  मंदिर के  सामने  से  गुजरेगी  मगर अंदर  आकर  आरती  में शामिल  होना  तो  दूर, भगवान  की  मूर्ति  के  आगे हाथ  तक  नहीं  जोड़ेगी , मंदिर  के  सामने  से  गुजर कर  कोचिंग  जाती  नेहा  को देख कर  लीला  ने  मुंह बिचकाकर  कहा  तो  पुष्पा  ने  भी  हाँ  में  हाँ  मिलाई -सही  कह  रही  हो  भाभी, ऐसा  भी  क्या  घमंड  कि  जो भगवान   के  आगे  भी  सर  न  झुका  सके. ....
यह  लीला और  पुष्पा  के  दिनचर्या  का हिस्सा  था  रोज  शाम  को मंदिर  जाना  वहीं  से  अपनी कोचिंग  क्लास  पढ़ने  के लिए  जाने  वाली  नेहा  पर फिकरे  कसना  और  गप्पे लादकर  घर  वापस  आ जाना ..

पर  आज  की  शाम  रोज  की तरह  नहीं  थी  . आज मंदिर प्रांगण  में  कहीं  से  कोई पगली  आकर  दो  घंटे  से पड़ी  थी  उसके  बाल  बिखरे हुए  थे, रूखा  सा  बदन, बेजान  चेहरा  और  भूख  से सूखी  मरी  काया  वाली 'पगली'  की  प्रसव  पीड़ा उसकी  दीनता  को  और दयनीय  बना  रही  थी  .

कोई  भी  उसे  सहारा  देना तो  दूर, पर  उसके  पास  तक  जाने  में  संकोच  महसूस  कर  रहा  था . आते जाते  सब  लोग  उसे  घृणित नजरों  से  देख  रहे थे ... लीला , पुष्पा  और  उनकी सहेलियों  को  चर्चा  का  एक नया  विषय  मिल  गया था .... अब  क्या  होगा  दीदी...
ये पगली  का  प्रसव  तो  लगता है  मंदिर  के  प्रांगण  में  ही  हो जायेगा"  लीला  ने  कथित चिंता  व्यक्त  की ... 

"होगा  क्या, ऐसे  में  तो  मंदिर  को  सूतक  लग जायेगा  पंडित  जी  फिर  कुछ  विशेष  अनुष्ठान  करके इस  स्थान  को  पवित्र  करेंगे  पुष्पा  ने  अपना  अनुभव बघारा ...

तभी  वहां  से  नेहा  गुजरी ...
पगली  को  देखकर  उसकी प्रतिकिया  क्या  होगी, ये जानने  के  लिए  व्याकुल लीला , पुष्पा  और  उसकी सहेलियों  ने  उसके  हाव  भाव  पर  गौर  करना  शुरू किया  नेहा  एक  क्षण  को ठिठकी, फिर  कुछ  सोचकर अपने  बैग  से  फ़ोन  निकाल कर  कहीं  पर  कॉल  किया  फिर  पास  की  एक  दुकान  से  पानी  की  बोतल खरीदकर, पगली  के  पास जाकर  धीरे  धीरे  उसके  मुँह में  पानी  डाला  .

नेहा  ने  अपना  दुपट्टा निकालकर  पगली  के चीथड़ों  से  लिपटे  अर्धनग्न बदन  पर  ओढ़ा  दिया  इतने में  साइरन  बजाती  हुई  एक एम्बुलेंस  आई . नेहा  ने एम्बुलेंस  के  कर्मचारियों  की सहायता  से  पगली  को गाड़ी  में  बिठाया  और  उसे लेकर  सरकारी  नर्सिंग  होम की  ऒर  चल  दी .. 

जाने  से  पहले  उसने  लीला और  पुष्पा  को  ऐसे  देखा मानो  वो  उनसे  पूछ  रही  हो, "मूर्ति  की  सेवा  और  उस  मूर्ति  को  साकार  करने वाले  इंसान  की  सेवा  में  से ज्यादा  जरूरी  क्या है..... 

ईश्वर  का  नाम  दिन  रात  लो  और  मजबूर  बेहसहारा जरूरत  मंद  को  अनदेखा कर  दो ... इससे  क्या  ईश्वर खुश  हो  जाएंगे ...
नहीं  मित्रों  कभी  नहीं   याद  रखिए किसी  जरूरतमंद  की  मदद  करके देखिए  यकीन  मानिए  दिल को  सुकून  मिलता  है  और ऐसे  कर्मो  से  ईश्वर  अपने भक्तों  से  खुश  भी  होते  है और  यही  होती  है असली  पूजा।
12:20

जानिए अशोक वृक्ष की क्या है महत्ता के सी शर्मा



जानिए अशोक वृक्ष की क्या है महत्ता के सी शर्मा*

अशोक का अर्थ है किसी भी तरह के शोक से मुक्त। अशोक का पेड़ आपने आसपास देखा होगा। 
इस पेड़ की छाया में बैठने से दुख-संताप से मुक्ति मिलती है। आयुर्वेद में भी इसका अत्यधिक महत्व माना गया है।
 शास्त्रों के अनुसार, अशोक का पेड़ बहुत पवित्र व लाभकारी होता है। मान्यता है कि अशोक का वृक्ष जिस स्थान पर उगता है वहां दुख अौर अशान्ति का नाश हो जाता है। 
इस पेड़ में औषधीय गुणों के साथ-साथ ज्योतिषय गुण भी होते हैं। 
मांगलिक एवं धार्मिक कार्यों में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। वास्तुनुसार अशोक का वृक्ष घर में लगाना अत्यंत लाभकारी है। 

अशोक के पत्तों को वंदनवार के रूप में मुख्य द्वार पर लगाने से नकारात्मक शक्तियां घर में प्रवेश नहीं कर पाती।

जब भी घर में कोई मांगलिक उत्सव मनाया जाए या कोई त्यौहार हो या कोई विवाह आदि कार्यक्रम हो तो अशोक के पत्तों की वंदनवार लगाएं। वंदनवार ऐसे लगाए कि उसके नीचे से निकलने वाले लोगों के सिर पर वह स्पर्श होती रहे। वंदरवार अधिक ऊपर नहीं लगाई जाना चाहिए। इसके प्रभाव से घर परिवार में सुख और शांति बढ़ती है। कार्यों में सफलता मिलती है।

कार्यो में शीघ्र सफलता पाने के लिए किसी भी शुद्ध मुर्हूत में अशोक वृक्ष की जड़ को निकाल लें। जड़ को निकाल उसे स्वच्छ जल अथवा गंगा जल से शुद्ध करके। अपने पूजा के स्थल में माँ दुर्गा के मन्त्र से 108 बार जाप करें। इसके बाद इस मूल जड़ को लाल कपड़े या लाल धागें में शरीर पर धारण करने से कार्यो में शीघ्र ही सफलता मिलने लगती है। इसकी मूल जड़ को शुद्ध करके तकिये के अन्दर रखने से वैवाहिक जीवन में परस्पर प्रेम रहता है।

अशोक के पेड़ पर यदि प्रतिदिन जल चढ़ाया जाये तो उस गृह में माँ भगवती कृपा विद्यमान रहती है। उस मकान में रोग, शोक, गृह कलेश अशान्ति आदि समस्यायें न के बराबर रहती है। इस पेड़ पर जो जातक नित्य जल अर्पित करता है। उस पर माँ लक्ष्मी की कृपा बरसती है। प्रत्येक शुक्रवार को अशोक के वृक्ष के नीचे घी एवं कपूर मिश्रित दीपक जलाने से घर में नकारात्मबक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती है।

जो भी जातक निरन्तर व्यवसाय में हानि उठा रहे एवं उनका व्यवसाय बन्द होने की कगार पर है। वह जातक निम्न प्रयोग करके लाभ प्राप्त कर सकते है। अशोक वृक्ष के बीजों को प्राप्त कर उन्हें स्वच्छ करके धूप व अगरबत्ती दे और आँखे बन्द करके अपनी समस्या से मुक्ति देने की प्रार्थना करें तद्नन्तर इन बीजों में से एक बीज को किसी ताबीज में भरकर अपने गले में धारण कर लें। शेष बीजों को धन रखने के स्थान पर रख दें। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को करना अति उत्तम रहेंगा।

किसी भी शुभ मुर्हूत में अशोक के पेड़ की जड़ को पूर्व निमन्त्रण देकर निकाल लायें। उस समय आप मौन रहें। घर में लाकर इसे गंगा जल से शुद्ध करके तिजोरी या धन रखने के स्थान रखें। इस प्रकार का उपाय करने से उस घर में धन की स्थिति पहले की अपेक्षा काफी सुदृढ़ हो जाती है।

जो लोग देवी मां के भक्त हैं और माता की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं वे अशोक के वृक्ष में प्रतिदिन जल चढ़ाएं। जल चढ़ाते समय देवी मंत्रों का जप करना विशेष लाभदायक रहता है। इस उपाय से देवी कृपा प्राप्त होती है और किस्मत साथ देने लगती है।

यदि किसी घर में पति-पत्नी के बीच तनाव रहता हो, लड़ाई-झगड़े अधिक होते हो तो अशोक के 7 पत्ते घर में देवी-देवताओं की प्रतिमा के सामने रखें। जब भी पत्ते मुरझा जाए तो दूसरे सात पत्ते रख दें। जो पत्ते सुख जाते हैं या मुरझा जाते हैं उन्हें पीपल के वृक्ष की जड़ों में डाल देना चाहिए। इस तरह 40 दिन करे। इस उपाय से पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है।
12:16

जानिए धर्म क्या है -के सी शर्मा



धर्म क्या है? श्रीमद भगवद गीता में बड़ा ही सुंदर प्रश्न अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से पूछते हैं कि धर्म क्या है?

अर्जुन पूछते है – धर्म क्या है? 
धर्म की व्याख्या क्या है? 
इस बात का निर्णय कौन करता है? 
हे मधुसूदन! वो कौन है जो धर्म का विधान बनाते हैं?

कृष्ण बोले- हे अर्जुन! हर प्राणी अपने धर्म का विधान स्वयं बनता है।

अर्जुन पूछते हैं- मैं समझा नहीं केशव!

कृष्ण कहते हैं- देखो पार्थ! धर्म का जो विधान किसी दूसरे ने बनाया हो वो तुम्हारा धर्म नहीं हो सकता। तुम्हारा धर्म वही है जिसे तुमने स्वयं बनाया हो। जिसे तुम्हारी आत्मा ने स्वीकार किया हो। धर्म व्यक्तिगत चीज है। जिसका फैसला व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है।

अर्जुन कहता है- मैं, मैं अब भी नहीं समझा केशव!

भगवान कृष्ण कहते हैं- देखो पार्थ! मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ। किसी के गाँव पर डाकू हमला करके गाँव की लड़कियों का अपहरण कर रहे हैं। उसी समय किसी का पिता मृत्यु सैया पर पड़ा जीवन की अंतिम सांस ले रहा है और पुत्र से बार बार पानी का एक एक घूंट मांग रहा है। उस समय उस व्यक्ति का क्या धर्म है? वो मरते हुए पिता के कंठ में अंतिम समय गंगा के जल की बून्द बून्द टपकाता हुआ अपने पुत्र धर्म का पालन करे या उसके गाँव की लड़कियों पर जो संकट आ गया है उनकी रक्षा के लिए तलवार उठाकर उन डाकुओं का मुकाबला करे और आवश्यक हो तो जान भी देकर अपने गाँव की इज्जत बचाये। इसका निर्णय कोई दूसरा कैसे कर सकता है। इसको धर्म का दोराहा या धर्म संकट भी कहते हैं। ऐसी परिस्थिति में वो व्यक्ति क्या करे? उसका फैसला कोई बाहर वाला नहीं कर सकता। ये निर्णय उसी को लेना होता है कि उस समय उसका प्रथम धर्म क्या है? उस समय उसकी आत्मा जो आवाज दे वही उसका धर्म है। इसलिए हे अर्जुन! हर प्राणी का धर्म व्यक्तिगत होता है।

जो इस आत्मा को मरने वाला समझता है या जो इसे मारने वाला समझता है वो दोनों ही अज्ञानी है। क्योंकि आत्मा न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जा सकता है। इसलिए किसी के मरने या मारने का शोक किये बिना तू अपना कर्तव्य कर। तेरा धर्म युद्ध करना है। तू अपना धर्म समझकर युद्ध कर।
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कुहू स्कूल परिवार का परिण्डा बांधों अभियान का सिलसिला जारी


सवाई माधोपुर/गंगापुर सिटी@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। जिले के गंगापुर सिटी उपखंड मुख्यालय पर वैश्विक संकट कोरोना महामारी के चलते सरकार द्वारा लागू लॉकडॉउन के दौरान गंगापुर शहर में कई सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं व भामाशाहों द्वारा गरीब, असहाय लोगों व पशु-पक्षियों की सहायता के लिए अनेकों पुण्यार्थ कार्यों को बहुत लंबे समय से किया जा रहा है।
इसी क्रम में कुहू इंटरनेशनल विद्यालय परिवार के सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं द्वारा ब्राह्मण समाज अध्यक्ष व विद्यालय प्रबंध निदेशक हेमन्त शर्मा व प्रधानाचार्य मिथलेश शर्मा के मार्गदर्शन से कुहू इंटरनेशनल विद्यालय परिवार सदस्य सभी शिक्षकों के द्वारा परिण्डा अभियान कार्यक्रम के तहत गंगापुर शहर में रेल्वे कॉलोनी स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर पहुँचकर परिसर में स्थित वृक्षों पर परिण्डा बाँधा गया। साथ ही पंचेश्वर हनुमान मंदिर, सवाईमाधोपुर रोड़ स्थित उघाड़मल बालाजी, चूलीगेट मोक्षधाम, हायर सैकण्डरी उद्यान, बन्दरिया बालाजी, भोमिया बालाजी पर बेजुवान पक्षियों को पानी पीने के लिए परिण्डे बाँधे गए।
समाजसेवी व मीडिया प्रभारी धनेश शर्मा ने बताया कि विद्यालय परिवार के सभी शिक्षकों द्वारा सर्वप्रथम सेवा कार्यों के अंतर्गत परिण्डे बाँधने का कार्य शुरुआत में किया गया, जिसमें शहर में स्थित सार्वजनिक स्थानों में उद्यानों, मन्दिरों, मोक्षधामों और कई सार्वजनिक स्थानों पर कुल 41 परिण्डे बाँधने का लक्ष्य को ध्यान में रखकर परिण्डे बाँधे गए। इन स्थानों के आस-पास निवास करने वाले विद्यालय परिवार के शिक्षक या किसी जिम्मेदार व्यक्ति को उक्त परिण्डों में पानी भरने का आग्रह कर जिम्मेदारी दी गई। परिण्डा कार्यक्रम के बाद विद्यालय परिवार के शिक्षकों द्वारा गायों को हरा चारा, पशु-पक्षियों को चुग्गा-दाना, असहाय लोगों की सहायता, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करवाना तथा अन्य पुण्यार्थ के कार्यों को कोरोना महामारी के चलते व उसके बाद विद्यालय परिवार के सदस्यों द्वारा समय-समय पर अच्छी प्रकार से तन-मन व धन के द्वारा आपसी सहयोग से सम्पन्न किया जाएगा।
समाजसेवी वार्ड 17 निवासी शर्मा ने बताया कि बेजुवान पक्षियों को भी इस लॉकडाउन के दौरान दाना-पानी की व्यवस्था किया जाना अति आवश्यक कार्य है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु परिण्डे बाँधने का कार्यक्रम किया गया। इस अवसर पर विद्यालय प्रबंध निदेशक हेमन्त शर्मा, विद्यालय प्रभारी विचित्र बिडला, भरतलाल शर्मा, विजय वैष्णव, विष्णु सिंह, गजेन्द्र शर्मा, अनिल शर्मा, सूर्यकांत चतुर्वेदी, हिमांशु शर्मा, अरविन्द आर्य, शुभम शर्मा, हेमंत शर्मा, विवेक पाठक, अजेंद्र पाल जादौन, पवन गुर्जर व विद्यालय परिवार के गणमान्य शिक्षकगण उपस्थित रहे।
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आम जन के सफर के लिए तैयार राजस्थान रोडवेज़ बस3 जून से 200 से अधिक मार्गों पर दौड़ेंगी रोडवेज़ बसे।

सवाई माधोपुर @ रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। लॉक डाउन 5.0 में छूट मिलने के बाद अब तीन जून से राजस्थान में 200 रूटों पर रोडवेज बसें चलने लगेगी। मंगलवार को रोडवेज ने इन रुटों का चार्ट जारी कर दिया है,
इसके अनुसार, विभिन्न डिपों से इन बसों का संचालन किया जाएगा. इसमें बसों को सेनेटाइज करने के निर्देश दिए गए हैं. ज्यादातर बसें जयपुर डिपो से ही संचालित की जाएगी. रोडवेज के एमडी नवीन जैन ने बताया कि बुधवार से ही राजस्थान रोडवेज़ अंतर्राज्यीय बस सेवा भी शुरू कर देगा. पहले चरण में फिलहाल हरियाणा के लिए ही यह सेवा शुरू होगी, लेकिन जल्द ही इस सेवा का विस्तार किया जाएगा. रोडवेज एमडी ने सभी आगार प्रबंधक को आदेश जारी कर कोरोना को लेकर जारी सभी गाइडलाइंस का पालन करने के निर्देश दिए हैं.

ऑनलाइन टिकट बुक कराने पर 5 फीसदी कैशबैक मिलेगा
बुधवार से 100 नए रूटों पर शुरू हो रहीं बसों को लेकर एक अच्छी खबर यह है कि अब बसों में यात्रा करने के लिए सिर्फ़ ऑनलाइन टिकिट लेने की अनिवार्यता नही है.
यात्री काउंटर से या बस में परिचालक से भी टिकिट ले सकेंगे. सिर्फ ऑनलाइन टिकिट के विकल्प के कारण ग्रामीण क्षेत्र के यात्रियों को काफी परेशानी हो रही थी.
ऑनलाइन टिकटिंग को बढ़ावा देने के लिए रोडवेज ने कैशबैक ऑफर भी लॉन्च किया है. ऑनलाइन बुकिंग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रोडवेज ने ऑनलाइन टिकट बुक कराने पर 5 प्रतिशत कैश बैक देने की योजना बनाई है. लेकिन यह कैश बैक केवल रजिस्टर्ड यूजर को ही मिलेगा. इसके लिए आपको टिकट बुक करने से पहले वेबसाइट पर रजिस्टर्ड करना होगा.
यात्रियों के लिए अच्छी खबर यह भी है कि अब बस में 30 सवारी होने के आदेश को भी वापस ले लिया है. अब बस में सभी सीटों के अनुसार 52 यात्री सफर कर सकेंगे. हालांकि बस में खड़े हो कर यात्रा करने पर रोक रहेगी.
रुट पर बस को भेजने से पहले उसे पूरी तरह से सेनेटाइज किया जाएगा. वहीं क्षमता के अनुसार ही बस में यात्री बैठाए जाएंगे.
बस स्टैंड पर पूछताछ खिड़की, टिकट विंडो और परिचालक को वॉशेबल ग्लब्ज़, फेश शील्ड और मास्क पहनना अनिवार्य किया जाएगा. इन 100 नए मार्गों पर बसें चलाने के बाद रोडवेज जल्द ही मार्गों की संख्या बढ़ाएगा, अगले सप्ताह से 200 रूट्स पर बसों का संचालन किया जाएगा.

Tuesday, 2 June 2020

18:57

शैक्षिक नवाचार: सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए अब टीवी क्लास।

जयपुर/ सवाई माधोपुर @रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा । राजस्थान राज्य में वैश्विक महामारी कोरोना के चलते लगातार जारी लॉकडाउन के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई में नुकसान न हो, इसको ध्यान में रखते हुए शिक्षा विभाग की ओर से ऑनलाइन पढ़ाई के बाद अब रेडियो एवं टीवी के माध्यम से पढ़ाई के नवाचार अपनाए जा रहे हैं। इसके अनुकूल परिणाम भी सामने आ रहे हैं।

शिक्षावाणी के बाद शिक्षा दर्शन से लाभ
रेडियो के शिक्षा वाणी प्रोग्राम के बाद एक जून से टीवी के माध्यम से शुरू किए गए शिक्षा दर्शन प्रोग्राम से सरकारी स्कूल के विद्यार्थी और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबंधित विद्यालयों के विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। इस कार्यक्रम के माध्यम से जयपुर जिले के लगभग 3 हजार से अधिक विद्यालयों के विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं।
दूरदर्शन पर शुरू हुआ शैक्षिक प्रसारण
विद्यार्थियों को निरन्तर शैक्षणिक विषयवस्तु से जोड़े रखने एवं उन तक सहज-सरल माध्यम से शिक्षण सामग्री की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा विभाग की ओर से दूरदर्शन में शिक्षा दर्शन कार्यक्रम का प्रसारण शुरू किया गया है।
पहली से 12वीं कक्षा तक होगी पढ़ाई
इसके अंतर्गत कक्षा 1 से 12 तक के सरकारी स्कूल के विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे है। कक्षा 9 से 12 तक के लिए दोपहर 12.30 से 2.30 बजे तक तथा कक्षा 1 से 8 के लिए 3.00 बजे से 4.15 तक का स्लॉट निधार्रित किया गया है।
सवा तीन घंटे का रोजाना प्रसारण
दूरदर्शन चैनल (डी.डी. राजस्थान) पर शिक्षा दर्शन कार्यक्रम का सोमवार से शनिवार तक शिक्षा विभाग द्वारा 3 घंटे 15 मिनिट का शैक्षणिक प्रसारण किया जा रहा है इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों को विज्ञान, गणित समेत अन्य विषयों की भी पढ़ाई करवाई जा रही है।
इंटरनेट का विकल्प बनी टीवी पर कक्षाएं
शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा दर्शन कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्र के उन बच्चों के लिए फायदेमंद है, जिनके पास इंटरनेट की व्यवस्था नहीं है। वे अब सीधे दूरदर्शन के माध्यम से पढ़ाई कर सकते हैं। गौरतलब है कि आकाशवाणी के शिक्षा वाणी कार्यक्रम के माध्यम से भी प्रतिदिन 55 मिनट की पढ़ाई विद्यार्थियों को करवाई जा रही है।
दानदाताओं के नाम खुले विद्यालयों पर निर्देश
शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने राज्य के विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं के विकास के लिए भामाशाहों को प्रेरित करने पर जोर दिया है। उन्होंने शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे गांव, ढाणी में दानदाताओं के नाम से बने विद्यालयों के भामाशाहों को पत्र लिखकर सतत उनसे संपर्क रखें तथा शिक्षा क्षेत्र में उनका सहयोग लेकर विद्यालयों के सुदृढ़ीकरण, वहां आधारभूत सुविधाओं के विकास को सुनिश्चित करें।
ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्यादान कोष की समीक्षा
डोटासरा मंगलवार को यहां शिक्षा संकुल में 'ज्ञान संकल्प पोर्टल एवं मुख्यमंत्री विद्यादान कोष योजना की समीक्षा बैठक में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने मुख्यमंत्री ज्ञान संकल्प पोर्टल और मुख्यमंत्री विद्यादान कोष योजना के तहत जिलेवार भामाशाहों से मिलने वाले सहयोग की समीक्षा करते हुए कहा कि विद्यालयों के विकास के लिए प्रवासी राजस्थानियों को प्रेरित किए जाने की जरूरत है।
18:40

3 जूनबुन्देलखण्ड का शेर छत्रसाल जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


झाँसी के आसपास उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की विशाल सीमाओं में फैली बुन्देलखण्ड की वीर भूमि में तीन जून, 1649 (ज्येष्ठ शुक्ल 3,विक्रम संवत 1706) को चम्पतराय और लालकुँवर के घर में छत्रसाल का जन्म हुआ था। चम्पतराय सदा अपने क्षेत्र से मुगलों को खदेड़ने के प्रयास में लगे रहते थे। अतः छत्रसाल पर भी बचपन से इसी प्रकार के संस्कार पड़ गये।

जब छत्रसाल केवल 12 साल के थे, तो वह अपने मित्रों के साथ विन्ध्यवासिनी देवी की पूजा के लिए जा रहे थे। रास्ते में कुछ मुस्लिम सैनिकों ने उनसे मन्दिर का रास्ता जानना चाहा। छत्रसाल ने पूछा कि क्या आप लोग भी देवी माँ की पूजा करने जा रहे हैं ? उनमें से एक क्रूरता से हँसते हुए बोला- नहीं, हम तो मन्दिर तोड़ने जा रहे हैं। यह सुनते ही छत्रसाल ने अपनी तलवार उसके पेट में घोंप दी। उसके साथी भी कम नहीं थे। बात की बात में सबने उन दुष्टों को यमलोक पहुँचा दिया।

बुन्देलखण्ड के अधिकांश राजा और जागीरदार मुगलों के दरबार में हाजिरी बजाते थे। वे अपनी कन्याएँ उनके हरम में देकर स्वयं को धन्य समझते थे। उनसे किसी प्रकार की आशा करना व्यर्थ था। एकमात्र शिवाजी ही मुगलों से टक्कर ले रहे थे। छत्रसाल को पता लगा कि औरंगजेब के आदेश पर मिर्जा राजा जयसिंह शिवाजी को पकड़ने जा रहे हैं, तो वे जयसिंह की सेना में भर्ती हो गये और मुगल सेना की कार्यशैली का अच्छा अध्ययन किया।

जब शिवाजी आगरा जेल से निकलकर वापस रायगढ़ पहुँचे, तो छत्रसाल ने उनसे भेंट की। शिवाजी के आदेश पर फिर से बुन्देलखण्ड आकर उन्होंने अनेक जागीरदारों और जनजातियों के प्रमुखों से सम्पर्क बढ़ाया और अपनी सेना में वृद्धि की। अब उन्होंने मुगलों से अनेक किले और शस्त्रास्त्र छीन लिये। यह सुनकर बड़ी संख्या में नवयुवक उनके साथ आ गये।

उधर औरंगजेब को जब यह पता लगा, तो उसने रोहिल्ला खाँ और फिर तहव्वर खाँ को भेजा; पर हर बार उन्हें पराजय ही हाथ लगी। छत्रसाल के दो भाई रतनशाह और अंगद भी वापस अपने भाई के साथ आ गये। अब छत्रसाल ने दक्षिण की ओर से जाने वाले मुगलों के खजाने को लूटना शुरू किया। इस धन से उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति में वृद्धि की। एक बार छत्रसाल शिकार के लिए जंगल में घूम रहे थे, तो उनकी स्वामी प्राणनाथ से भेंट हुई। स्वामी जी के मार्गदर्शन में छत्रसाल की गतिविधियाँ और बढ़ गयीं। विजयादशमी पर स्वामी जी ने छत्रसाल का राजतिलक कर उसे‘राजाधिराज’ की उपाधि दी।

एक बार मुगलों की शह पर हिरदेशाह, जगतपाल और मोहम्मद खाँ बंगश ने बुन्देलखण्ड पर तीन ओर से हमला कर दिया। वीर छत्रसाल की अवस्था उस समय 80 वर्ष की थी। उन्हें शिवाजी का वचन याद आया कि संकट के समय में हम तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे। इसे याद कर छत्रसाल ने मराठा सरदार बाजीराव पेशवा को सन्देश भेजा। सन्देश मिलते ही बाजीराव ने तुरन्त ही वहाँ पहुँचकर मुगल सेना को खदेड़ दिया। इस प्रकार छत्रसाल ने जीवन भर मुगलों को चैन नहीं लेने दिया।

जिन महाकवि भूषण ने छत्रपति शिवाजी की स्तुति में ‘शिवा बावनी’लिखी, उन्होंने ही ‘छत्रसाल दशक’ में आठ छन्दों में छत्रसाल की वीरता और शौर्य का वर्णन किया है। आज भी बुन्देलखण्ड के घर-घर में लोग अन्य देवी देवताओं के साथ छत्रसाल को याद करते हैं। -  
छत्रसाल महाबली, 
करियों भली-भली।।
18:38

मोक्षधाम को स्वर्ग बनाओ मुहिम' सफलता की ओर अग्रसर

सवाई माधोपुर/गंगापुर सिटी@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। जिले के गंगापुर सिटी उपखंड मुख्यालय पर' मोक्षधाम को स्वर्ग बनाओ मुहिम' सफलता की ओर अग्रसर है। जिस प्रकार सर्व समाज के नागरिकगण तन-मन और धन से आगे आकर इस मुहिम को सफल बनाने का बीड़ा उठा चुके हैं, आगामी दिनों में यह मुहिम सफ़ल होती नजऱ आ रही है। मंगलवार को सुबह सर्वसमाज के नागरिकगण मोक्षधाम में एकत्रित हुए। इसके बाद अध्यक्ष पद को लेकर विचार-विमर्श किया गया और सबकी आपसी सहमति से शैलेंद्र शर्मा को अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद समिति के गठन व वरिष्ठ मार्गदर्शक मंडल को लेकर विचार-विमर्श किया गया। सर्वसहमति से समिति का गठन किया गया। समिति को महूकलाँ विकास समिति नाम दिया गया। आगामी दिनो में नव निर्वाचित अध्यक्ष के द्वारा वरिष्ठ मार्गदर्शक मंडल, पदाधिकारी व कार्यकारणी सदस्यों का विस्तार किया जाएगा।
महूकलाँ विकास समिति अध्यक्ष शैलेंद्र शर्मा ने बताया की आगामी दिनों में मोक्षधाम में विकास रूपी पंख लगाने के लिए सर्व सहमति से निर्णय लिया गया कि जब तक मोक्षधाम एक हरे-भरे बगीचे में नहीं बदल जाता तब तक महूकलाँ विकास समिति आपसी सहयोग से 365 दिन मोक्षधाम ज़ीर्णोद्धार कार्य में लगी रहेगी। मोक्षधाम में पानी की समस्या को दूर करने के लिए महूकलाँ तिराहे से मोक्षधाम के लिए नल कनेक्शन किया जाएगा, जिसमें लगभग 600 फिट पाइप व नल कनेक्शन सम्बंधित अन्य सामान की आवश्यकता होगी। इसलिए अध्यक्ष ने मोक्षधाम में नल कनेक्शन के लिए नल मिस्त्री को जि़म्मेदारी सौंपी। मोक्षधाम में लगभग 90 पट्टियां चढ़ी हुई है। अनुपयोगी सभी पट्टियों को आपसी सहयोग से बुधवार को उतारने का काम किया जाएगा।
अध्यक्ष ने सभी का आभार प्रकट किया तथा महूकलाँ के लोगों से इस नेक और पुण्य कार्य में आगे आकर बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के लिए आग्रह भी किया।
18:36

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बदनाम करने की साजिश, विपक्षी लोगों के दिमाग का दिवालियापन-आशा मीणा

सवाई माधोपुर @रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा । सवाई माधोपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रही एवं पूर्व प्रधान आशा मीणा ने पूर्व मुख्यमंत्री  वसुंधरा राजे सिंधिया को कोरोना संक्रमण काल के दौरान पोस्टरों के माध्यम से दुष्प्रचार कर बदनाम करने की साजिश को विपक्षी लोगों के मानसिक दिवालियापन की करतूत बताया है। मीणा ने कहा कि हाल ही में कूटरचित पोस्टर के माध्यम से किन्हीं लोगों द्वारा राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर जिस तरह बेमौके छिपकर वार किया है, उनकी यह हरकत बेहद घटिया, निंदनीय, कायराना और मानसिक दिवालियापन की प्रतीक है। बेदाग राजनीतिज्ञ श्रीमती वसुंधरा राजे को बदनाम करने और उन्हें निष्क्रिय या नीचा दिखाने की गरज से की गई ऐसी कुचेष्टाओं से उनका राजनीतिक कद कतई छोटा नहीं होगा। राजस्थान की यशस्वी मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा जी पर छिपकर वार करने वाले राजनीतिक शत्रुओं का यह वार और प्रहार निष्फल साबित हुआ है। प्रदेश के आमजन तक उनकी गहरी पैठ, प्रदेशवासियों का उनके प्रति प्यार और विश्वास, आत्मीय जुड़ाव और लोकप्रियता को भला कौन नहीं जानता? झालावाड़ से 5 बार सांसद और चार बार विधायक रह चुकी वसुंधरा राजे का देश-प्रदेश की राजनीति में कोई सानी नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जी  को कोरोना काल में प्रदेशवासियों के स्वास्थ्य की बहुत चिंता है और वे इस दुष्काल में आमजन की हरसंभव सेवा, सहायता और रक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं।


राजनीति के महानायक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भाजपा संगठन के दिशा निर्देशन में, प्रदेश भाजपा नेतृत्व की राय और सहमति से एवं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मार्गदर्शन में पार्टी के कार्यकर्ता इस प्रदेश को कोरोना संकटकाल से बचाने में जी-जान से जुटे हुए हैं। विपक्षी चाहे कुछ भी दुष्प्रचार करते रहें, वसुंधरा राजे जी पार्टी संगठन के कार्यकर्ताओं के जरिए प्रदेश की जनता के बारे में नियमित फीडबैक लेती रही हैं। वे नियमित रूप से फोन एवं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यकर्ताओं से निरंतर संपर्क में हैं।  वे संगठन एवं प्रदेश के हालात का फीडबैक लेती रहती हैं । उन्हें प्रदेश की जनता की बहुत फिक्र है। वे अपने स्तर पर राज्य एवं केंद्र सरकार तक जनता की बात पहुंचा रही हैं।

यशस्वी पूर्व मुख्यमंत्री आदरणीय वसुंधरा राजे की जन-सेवा की प्रेरणा से कोविड-19 में लॉकडाउन के दौरान मुझे भी जन सेवा का अवसर मिला। माननीय प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर, श्रीमती वसुंधरा राजे की प्रेरणा व प्रोत्साहन से, भाजपा प्रदेश नेतृत्व के मार्गदर्शन में कोरोना संक्रमण काल में मुझे भी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ  समय-समय पर कोरोना वॉरियर्स का सम्मान करने का अवसर मिला। इस दौरान गरीब, जरूरतमंद,  किसान - मजदूर, प्रवासी श्रमिकों की यथासंभव यथा - सामर्थ्य सेवा सहायता की। जरूरतमंद लोगों की सेवा और सम्मान की भावना से विधानसभा क्षेत्र सवाई माधोपुर में स्थित पांचों भाजपा मंडल व जिला संगठन को साथ लेकर उनके द्वारा चिन्हित पात्र व जरूरतमंदों को पांचों मंडलों में आवश्यकता अनुसार सूखा 2100 राशन किट वितरित किए गए। इन राशन किट में 10 किलो आटा, 1 लीटर खाद्य तेल, 1 किलो चीनी, 1 किलो चावल, 1 किलो नमक, 100 - 100 ग्राम हल्दी, मिर्च, धनिया शामिल था। इसी सेवा अभियान के दौरान 2000 मास्क, 5000 हैंड सैनिटाइजर, 3100 गमछे व महिला सफाई कर्मियों को 100 स्टॉल वितरित किए गए। कोरोना वॉरियर्स के रूप में चिकित्सकों, सफाई कर्मियों, पुलिस कर्मियों, नर्सेज, प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों को पुष्प देकर, फूल माला पहनाकर उन्हें सम्मानित कर उनका उत्साह वर्धन किया गया। उन्हें मास्क, सैनिटाइजर व गमछे वितरित किए गए। मैंने भी सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए सरकारी कांटे पर, अनाज मंडी में पल्लेदारों, किसानों, सब्जी मंडी में 500 सब्जी विक्रेताओं, 250 ठेले व थड़ी लगाने वालों को मास्क, तौलिए एवं सैनिटाइजर वितरित किए। बेघर, बेसहारा, गरीब व मजदूरों के लिए सवाई माधोपुर एवं जयपुर की कच्ची बस्तियों में 10 दिन तक प्रतिदिन 500 फूड पैकेट पुलिस के माध्यम से एवं भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा वितरित कराए गए, ताकि कोई व्यक्ति भूखा न सोए। संचालित रसोइयों में स्वयं की कृषि उपज गेहूं एवं सरसों से आटा व तेल मसाले के साथ आर्थिक सहयोग भी किया गया। जो भाजपा एवं वसुंधरा जी के मार्गदर्शन में हुआ है। जिस तरह मैं वसुंधरा राजे जी की प्रेरणा और निर्देशन में संगठन हित में कार्य कर रही हूं, उसी तरह पूरे प्रदेश के कार्यकर्ता उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर संगठन हित में एकजुट होकर सेवारत हैं।
18:34

बजरी के अवैध भंडारण एवं खनन के खिलाफ कार्रवाई 1000 टन का बजरी स्टॉक किया जब्त।

सवाई माधोपुर@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। बजरी के अवैध खनन, निर्गमन, परिवहन एवं भंडारण के खिलाफ विभिन्न विभागों की संयुक्त टीम द्वारा कार्रवाई करते हुए लगभग एक हजार टन बजरी का अवैध स्टॉक जब्त किए गए।  
सहायक खनि अभियंता ललित मंगल ने बताया कि मंगलवार को खनिज विभाग, राजस्व विभाग, पुलिस विभाग की संयुक्त रूप से की गई कार्रवाई में चौथ का बरवाडा उपखंड क्षेत्र के देवली सारसोप एवं एैंचेर में अवैध बजरी के स्टॉक जब्त किए गए। उन्होंने बताया कि देवली सारसोप में लगभग 700 टन तथा ऐंचेर में 300 टन के करीब बजरी का स्टॉक जब्त करने के साथ ही अवैध बजरी खनन, परिवहन के खिलाफ भी संयुक्त कार्रवाई की जा रही है।
18:31

शेष रहे स्ट्रीट वेण्डर नगर परिषद सवाई माधोपुर एवं गंगापुर सिटी से करें सहायता राशि प्राप्त

सवाई माधोपुर@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। कोविड-19 महामारी के तहत राज्य सरकार के द्वारा 2 हजार 500 रूपये की सहायता राशि प्रदान की जा रही है।
सहायक श्रम आयुक्त शिवचरण मीना ने बताया कि नगर परिषद सवाई माधोपुर में कुल स्वीकृति 535 स्ट्रीट वेण्डरों में से कुल 276 पात्र स्ट्रीट  वेण्डरों को भुगतान कर दिया गया है तथा 220 स्ट्रीट वेण्डर अपात्र पाये गये और शेष 39 स्ट्रीट वेण्डरों के मोबाईल नम्बर स्विच ऑफ एवं कार्यस्थल पर उपलब्ध नहीं पाये गये। उन्होंने बताया कि इसी प्रकार नगर परिषद गंगापुर सिटी में कुल स्वीकृति 1087 स्ट्रीट वेण्डरों में से कुल 494 पात्र स्ट्रीट वेण्डरों को भुगतान कर दिया गया तथा 205 स्ट्रीट वेण्डर अपात्र पाये गये एवं शेष 385 स्ट्रीट वेण्डर नगर परिषद सवाई माधोपुर व गंगापुर सिटी में उपस्थित होकर सहायता राशि प्राप्त कर सकते हैं।
12:09

जानिए,स्वामी करपात्री जी महाराज के जीवन पर विशेष-के सी शर्मा

हकीकत का आईंना

आइए दोस्तों आज आप लोगों को एक सत्य घटना सुनाते हैं, घटनाक्रम थोड़ा लंबा है लेकिन दिलचस्पी बनाए रखें, आपके लिए इस लेख में बहुत कुछ जानने योग्य है...

स्वामी करपात्री जी महाराज का मूल नाम श्री हर नारायण ओझा था।

वे हिन्दू दसनामी परम्परा के भिक्षु थे। दीक्षा के उपरान्त उनका नाम हरीन्द्रनाथ सरस्वती था किन्तु वे “करपात्री” नाम से ही प्रसिद्ध थे, क्योंकि वे अपने अंजुली का उपयोग खाने के बर्तन की तरह करते थे।

वे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य थे। स्वामी जी की स्मरण शक्ति ‘फोटोग्राफिक’ थी, यह इतनी तीव्र थी कि एक बार कोई चीज पढ़ लेने के वर्षों बाद भी बता देते थे कि ये अमुक पुस्तक के अमुक पृष्ठ पर अमुक रुप में लिखा हुआ है। धर्मशास्त्रों में इनकी अद्वितीय एवं अतुलनीय विद्वता को देखते हुए इन्हें ‘धर्मसम्राट’ की उपाधि प्रदान की गई।

"अखिल भारतीय राम राज्य परिषद" भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी। इसकी स्थापना स्वामी करपात्री ने सन् 1948 में की थी। इस दल ने सन् 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थी। सन् 1952, 1957 एवम् 1962 के विधान सभा चुनावों में हिन्दी क्षेत्रों (मुख्यत: राजस्थान) में इस दल ने दर्जनों सीटें हासिल की थी।

जब इंदिरा गांधी वादे से मुकर गयी--

इंदिरा गांधी के लिये उस समय चुनाव जीतना बहुत मुश्किल था। करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती।

इंदिरा ग़ांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें जो अंग्रेजो के समय से चल रहे हैं। लेकिन इंदिरा गांधी मुसलमानों और कम्यूनिस्टों के दवाब में आकर अपने वादे से मुकर गयी थी।

गौ हत्या निषेध आंदोलन--

और जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संतों की इस मांग को ठुकरा दिया जिसमे सविधान में संशोधन करके देश में गौ वंश की हत्या पर पाबन्दी लगाने की मांग की गयी थी, तो संतों ने 7 नवम्बर 1966 को संसद भवन के सामने धरना शुरू कर दिया। हिन्दू पंचांग के अनुसार उस दिन विक्रमी संवत 2012 कार्तिक शुक्ल की अष्टमी थी, जिसे ”गोपाष्टमी” भी कहा जाता है।

इस धरने में मुख्य संतों के नाम इस प्रकार हैं- शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री महाराज और रामचन्द्र वीर।
राम चन्द्र वीर तो आमरण अनशन पर बैठ गए थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने उन निहत्ते और शांत संतों पर पुलिस के द्वारा गोली चलवा दी जिसमें कई साधू मारे गए।
इस ह्त्या कांड से क्षुब्ध होकर तत्कालीन गृहमंत्री ”गुलजारी लाल नंदा” ने अपना त्याग पत्र दे दिया, और इस कांड के लिए खुद को सरकार को जिम्मेदार बताया था।
लेकिन संत ”राम चन्द्र वीर” अनशन पर डटे रहे जो 166 दिनों के बाद उनकी मौत के बाद ही समाप्त हुआ था। राम चन्द्र वीर के इस अद्वितीय और इतने लम्बे अनशन ने दुनिया के सभी रिकार्ड तोड़ दिए है। यह दुनिया की पहली ऎसी घटना थी जिसमे एक हिन्दू संत ने गौ माता की रक्षा के लिए 166 दिनों तक भूखे रह कर अपना बलिदान दिया था।

इंदिरा के वंश पर श्राप--

लेकिन खुद को निष्पक्ष बताने वाले किसी भी अखबार ने इंदिरा के डर से साधुओं पर गोली चलने और राम चंद्र वीर के बलिदान की खबर छापने की हिम्मत नहीं दिखायी, सिर्फ मासिक पत्रिका “आर्यावर्त” और “केसरी” ने इस खबर को छापा था। और कुछ दिन बाद गोरखपुर से छपने वाली मासिक पत्रिका “कल्याण” ने गौ अंक में एक विशेषांक प्रकाशित किया था, जिसमे विस्तार सहित यह घटना दी गयी थी।
और जब मीडिया वालों ने अपने मुहों पर ताले लगा लिए थे तो करपात्री जी ने कल्याण के उसी अंक में इंदिरा को सम्बोधित करके कहा था-

“यद्यपि तूने निर्दोष साधुओं की हत्या करवाई है, फिर भी मुझे इसका दुःख नही है। लेकिन तूने गौ हत्यारों को गायों की हत्या करने की छूट देकर जो पाप किया है, वह क्षमा के योग्य नहीं है। इसलिये मैं आज तुझे श्राप देता हूँ कि-

”गोपाष्टमी” के दिन ही तेरे वंश का नाश होगा”,

“आज मैं कहे देता हूँ कि गोपाष्टमी के दिन ही तेरे वंश का भी नाश होगा..!“

श्राप सच हो गया--

जब करपात्री जी ने यह श्राप दिया था तो वहाँ “प्रभुदत्त ब्रह्मचारी“ भी मौजूद थे। करपात्री जी ने जो भी कहा था वह आगे चल कर अक्षरशः सत्य हो गया।
इंदिरा के वंश का गोपाष्टमी के दिन ही नाश हो गया। सुबूत के लिए इन मौतों की तिथियों पर ध्यान दीजिये--

1- संजय गांधी की मौत आकाश में हुई, उस दिन हिन्दू पंचांग के अनुसार गोपाष्टमी थी।

2- इंदिरा की मौत घर में हुई, उस दिन भी गोपाष्टमी थी।

3- राजीव गांधी मद्रास में मरे, उस दिन भी गोपाष्टमी ही थी।

गोली चलने के दिन स्वामी करपात्री जी ने उपस्थित लोगों के सामने गरज कर कहा था कि- "लोग भले इस घटना को भूल जाएँ, लेकिन मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।
गौ हत्यारे के वंशज नहीं बचेंगे, चाहे वह आकाश में हो या पाताल में हों या चाहे घर में हो या बाहर हो, यह श्राप इंदिरा के वंशजों का पीछा करता रहेगा।"

फिर करपात्री जी ने राम चरित मानस की यह चौपाई लोगों को सुनायी--

“।। संत अवज्ञा करि फल ऐसा, जारहि नगर अनाथ करि जैसा ।।"
12:07

जानिए गुरुजनों से प्राप्त शिक्षाओ के आधार पर जन्मना ब्राह्मण के कर्तव्य- के सी शर्मा

जानिए गुरुजनों से प्राप्त शिक्षाओ के आधार पर जन्मना ब्राह्मण के कर्तव्य- के सी शर्मा


1. जन्मना ब्राह्मणों को कभी भी, किसी से भी, कोई भी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जब से जन्मना ब्राह्मणों ने अपेक्षा करना शुरू किया है तभी से समस्या है। 
जन्मना ब्राह्मण को तो निस्पृह भाव से स्वयं को समाज के दंद-फंद से दूर रखकर अपनी आजीविका की व्यवस्था और रामभजन करना चाहिए।

2. आजीविका चयन में जन्मना ब्राह्मणों को प्रयास यही करना चाहिए कि आजीविका का साधन ऐसा हो जिसमें हिंसा और पराश्रयता कम से कम और धर्म, संपूर्ण समाज और राष्ट्र सबकी सेवा अधिक से अधिक हो सके।

3. संग्रह अत्यावश्यक है अतः जन्मना ब्राह्मणों को ज्ञान और ग्रन्थों के संग्रह को प्रथम वरीयता देना चाहिए और वस्तुओं तथा धन का भी उतना संग्रह अवश्य करना चाहिए जिससे परिवार का काम चलता रहे और समाज में भी औसत सम्मानजनक स्थिति बनी रहे। ज्ञान और साहित्य संग्रह में ब्राह्मणों को जितना अधिक हो सके लोभ करना चाहिए और धन के विषय में अधिकतम सन्तोषी होना चाहिये।

4. जन्मना ब्राह्मणों को स्वाभिमानी, मितव्ययी, विनम्र और दिखावे से दूर रहना चाहिए। यथासंभव स्वावलंबी और सादगी पूर्ण जीवन जीना चाहिए। सप्रयास ऐसे व्यसनों से बचना चाहिए जो समाज पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

5. ब्राह्मण को अभिवादन शील होना चाहिए। प्रयास पूर्वक पहले अभिवादन स्वयं ब्राह्मण करें और यदि अन्य व्यक्ति द्वारा जन्मना ब्राह्मण को अभिवादन किया जाए तो समुचित सम्मान प्रकट करते हुए विनम्रता पूर्वक अपने इष्टदेव को बारम्बार सपष्ट उच्चारण पूर्वक स्मरण करें।
यदि कोई किसी भी रूप में सम्मान दर्शाए भी तो उसके सम्मान के प्रतिउत्तर में हाथ जोड़कर शिर झुकाकर अपने इष्टदेव के नाम की जोर जोर से जयकार करनी चाहिए। किंतु कोई आपका सम्मान करें ऐसी अपेक्षा करने पर ब्राह्मणों के संचित पुण्य नष्ट होने लगते हैं।

6. जन्मना ब्राह्मणों को मनोरंजन के नाम पर की जाने वाली कोई भी फ़ूहड़ हरकतों से सदा दूर रहना आवश्यक है। हो सकता है कि तत्काल में किसी को बुरा लगे, इस स्थिति में भी क्षमा याचना पूर्वक उन कार्यक्रमों से हट जाना चाहिए जहां धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर फ़ूहड़ नाचकूद या हास्य होने की संभावना हो।

7. ब्राह्मण के वंश में जन्म का अर्थ यही है कि उस परब्रह्म परमात्मा ने आपको धर्म और राष्ट्र की सेवा के लिए भेजा है। सेवा का कार्य त्याग, समर्पण और सहनशीलता की अपेक्षा रखता है।

8. जन्मना ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक जड़-चेतन में ईश्वर को प्रकट मानकर सबके प्रति आदर रखें, आदर प्रकट करें।

9. जन्मना ब्राह्मणों को चाहिए कि धार्मिक और सामाजिक विषयों में सेवक धर्म का पालन करें और केवल योग्य व्यक्तियों द्वारा विधिपूर्वक पूछे गए प्रश्नों के युक्तियुक्त उत्तर शास्त्र प्रमाण सहित प्रस्तुत करें। जिन विषयों पर अधिकार नहीं है वहां अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित कर अपने असमर्थ होने हेतु क्षमा मांग लें। यदि ब्राह्मण प्रशासक या नियंता बनने का प्रयास करेंगे तो विवादित बनेंगे ही।

10. ब्राह्मण के लिए उचित है कि यदि धर्म या राष्ट्र की हानि की संभावना प्रतीत हो तो उचित क्रोध अवश्य प्रदर्शित करें। किंतु किसी के प्रति मन में वैर भाव न रखें।

11. ब्राह्मण को पिशुनवृत्ति (चुगलखोरी) किसी भी स्थिति में नहीं करनी चाहिए और कभी भी किसी के रहस्यों अथवा कमजोरियों को ज्ञात होने पर कहीं भी प्रकट नहीं करना चाहिए।

12. ब्राह्मण को सत्यवक्ता और स्पष्टवक्ता होना ही चाहिये किंतु सहसा नहीं बोलना चाहिए। उचित अवसर पर बोलने से पूर्व अच्छी तरह सोचविचार करके सीमित, उचित और अनुकूल शब्दों में अपनी बात रखनी चाहिए।

13. शास्त्रों, सन्तों, गुरुजनों, तीर्थों, स्त्रियों, वृद्धजन और गौमाता की निंदा कदापि नहीं करनी चाहिए, प्राणभय उपस्थित होने पर भी इनके प्रति अनुचित शब्दों की चिंतन तक नहीं करना चाहिए फिर कहने की तो बात ही क्या है।

गुरुदेव कहते हैं ब्राह्मण होना प्रभु की बहुत बड़ी कृपा है, लेकिन इसे पाकर निभाना सरल काम नहीं।

मुझे स्वयं ये शिक्षाये अपने जीवन में देर से मिल पाई या संभवतः समझने में देर हुई, और अभी तक भी इन्हें पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया। तथापि जितना कर पाया उतने में सुखी हूं। आगे प्रयास जारी हैं।
12:05

जब ग्रहों को करना हो अपने अनुकूल तो करें यह उपाय के सी शर्मा



सुबह  ब्रह्म मुहूर्त में उठे!

निम्नलिखित कार्य करे उस दिन के लिए आप के सभी ग्रह अनुकूल हो जायेंगे और दिन भर एक दिव्य शक्ति की अनुभूति होती रहेगी!
 
सुबह उठ कर सबसे पहले अपने "माँ बाबू जी " के चरण सपर्श करे उस दिन के लिए "सूर्य चन्द्र" बहुत ही शुभ फल देंगे रोजाना शुभ फल चाहते हो तो रोज यह कार्य जरूर करें!

एक गिलास गर्म पानी पियें जल(चन्द्र) का यह प्रवाह आपके शरीर की सारी नसों को खोल देगा! 

दांत साफ़ करके घर से निकल कर सैर करने जाए और घास पर नंगे पाँव चले इससे आप का "बुध" बलवान होगा!

सैर पर आप अपनी पत्नी को भी ले जाएँ "पत्नी" साथ होगी तो सुबह की सैर का "लुत्फ़" ही कुछ और होगा (थोडा सा रोमानी हो जाए )दिन भर स्फूर्ति रहेगी तो "शुक्र" का रोमांस भी आप के साथ होगा!

घर से जब चले तो साथ में कुछ खाने का सामान "Bread" वगैरह लेकर जाएँ कई बार रास्ते में आवारा "कुत्ते" मिलतें है उन्हें Bread खाने को दे जिससे आप का "केतु" भी अनुकूल होगा क्योंकि "कुत्ता जाति को माना गया है दरवेश ,इसकी प्रार्थना करती प्रभु के घर प्रवेश "!

पन्द्रह बीस मिनट कसरत करें, जिम जाते हैं तो आप का "मंगल" आप को चुस्त दरुस्त रखेगा!

नहाने से पहले सरसों के तेल की मालिश करें "शनि" की कमी भी दूर हो जायेगी! 

नहाने के बाद श्रद्धा अनुसार पूजा पाठ से "गुरु" भी active हो जायेंगे! 

भगवान् सूर्य को जल दे "राहू" के दोष भी शांत होते हैं! 
आज कल गर्मियाँ हैं गली मोहल्ले में सुबह सफाई कर्मचारी झाड़ू लगाने आता है उसे ठंडा पानी पिलाए या कुछ खिला दे "राहू" की आशीष भी मिल जायेगी! 

अगर आप यह प्रतिदिन "नियम" से करेंगे तो जीवन में एक "अनुशासन" आएगा तो समझ ले "सूर्य" भी अनुकूल हो गया क्योंकि वक़्त की पाबंदी सीखनी है तो "सूर्य" से सीखें,सूर्य सभी ग्रहों के दोषों को हर लेता है।
12:02

जब चीन ने अपने छात्रों पर चलवा दिए थे टैंक-के सी शर्मा

हकीकत का आईंना


जानिए,जब चीन ने अपने छात्रों पर चलवा दिए थे टैंक-के सी शर्मा


   
साल 1989 का एक जून इतिहास में दर्ज एक ऐसा ही दिन था जब चीन में लोकतंत्र की लोकतांत्रिक मूल्यों की ऐसी हत्या की गई थी जिससे सारी दुनिया स्तब्ध रह गई थी। इसी दिन तियानमेन चौक पर प्रदर्शन कर रहे अपने छात्रों को चीन की सेना ने टैंकों से रौंद दिया था
 
यूं तो इतिहास के आईने में हर एक क्षण बेशकीमती होता है और अपने साथ कोई न कोई ऐसी बात रखता है जिससे आने वाली पीढ़ी उसे याद रख सके। साल 1989 का इतिहास में दर्ज एक ऐसा ही साल था जब लोकतांत्रिक मूल्यों के विषय में हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में चर्चाएं जारी थीं। यह वही साल है जब पूर्वी जर्मनी में कम्युनिस्ट पार्टी का पतन होने के साथ ही बर्लिन की दीवार गिरा दी गई और इसके साथ ही पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण की शुरुआत हो चुकी थी।

यह वही साल 1989 है जब दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद वाली सरकार ने पहली बार राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू की थी जो एक साल बाद नेल्सन मंडेला की रिहाई के बाद समाप्त हुई। 
साल 1989 में ही हिंदुस्तान में हुए आम चुनाव में पहली बार किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था।

कुल मिलाकर देखें तो, साल 1989 में हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में लोकतंत्र का वास्तविक रूप दिखाई दे रहा था लेकिन इसी साल चीन में लोकतंत्र की ऐसी हत्या की गई कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह गयी थी।

दरअसल, अप्रैल 1989 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और सुधारवादी नेता हू याओबांग की मृत्यु हो गई थी। हू याओबांग चीन के रुढ़िवादियों और सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीति के विरोध में थे और हारने के कारण उन्हें पद से हटा दिया गया था।

हू याओबांग की छवि पूरे देश में एक महानतम सुधार उदारवादी नेता के रूप में थी। लोकप्रिय नेता की मृत्यु के बाद चीनी छात्रों ने उन्हीं की याद में 17 अप्रैल को बीजिंग के तियानमेन चौक पर शोक सभा आयोजित की थी। इस शोक सभा में छात्रों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी एवं तानाशाही समाप्त करने तथा अधिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता देने की मांग भी छात्रों के एजेंडे में शामिल हो गई।

17 अप्रैल को आयोजित शोक सभा को छात्रों समेत स्थानीय लोगों का भी सहयोग प्राप्त हुआ और यह सभा कब आंदोलन में बदल गई पता ही नहीं चला। शुरुआत में जिस सभा में थोड़ी सी संख्या में सिर्फ़ छात्र थे, वहां अब अन्य छात्रों और स्थानीय लोगों के सहयोग के बाद छात्र 'आंदोलनकारी' हो गए थे।

आंदोलनकारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी पूरा तियानमेन चौक 'जन-शक्ति' से भर चुका था। 10 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी राजनीतिक आज़ादी की मांग को लेकर तियानमेन चौक पर इकट्ठा हो चुके थे। इस आंदोलन को चीन के वामपंथी शासन के इतिहास में इसे सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन कहा जाता है, यह प्रदर्शन कई शहरों और विश्वविद्यालयों तक फैल गया था। आंदोलनकारी छात्र तानाशाही समाप्त करने और स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की मांग कर रहे थे।

प्रदर्शनकारियों की बढ़ती संख्या के कारण हालात सरकार के काबू से बाहर हो गए थे। शीर्ष नेता देंग श्याओपिंग ने चीन में मार्शल लॉ लागू कर दिया और सेना को कूच करने का आदेश भी थमा दिया, लेकिन छात्रों की संख्या और साहस इतना अधिक था कि छात्रों ने बैरीकेट्स लगाकर सैनिकों को आगे बढ़ने से रोक दिया ऐसी स्थिति में अधिकारियों को मजबूरन सेना को वापस आने का आदेश देना पड़ा।

चूंकि चीन की सत्ता कम्युनिस्टों के हाथ में थी, इसलिए वे सत्ता का विरोध सहन नहीं कर सके और 3 जून को एक बार फिर सेना बीजिंग में प्रवेश कर जाती है। सेना के बीजिंग में प्रवेश की ख़बर आंदोलन में शामिल छात्रों तक पहुंच चुकी थी, ऐसे में कुछ छात्रों ने आगे बढ़कर सेना का विरोध करने का निश्चय किया। चूंकि इन छात्रों ने पिछली बार बैरीकेट्स लगाकर सेना को वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया था, इसलिए उन्हें लगा कि वे इस बार भी कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इस बार सेना के हाथों में आदेश था जनता के विरोध को किसी भी तरीके से कुचलने का। चीनी सेना लगातार आगे बढ़ रही थी, छात्र भी बढ़ चढ़कर विरोध जता रहे थे। इसी दौरान मक्सीडी अपार्टमेंट के पास छात्रों का विरोध प्रदर्शन तीव्र होता देख सेना ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिससे 36 प्रदर्शनकारी छात्र कम्युनिस्ट सरकार की खूनी होली का शिकार हो गए।

36 छात्रों की निर्मम हत्या के बाद आंदोलन कुछ क्षण के लिए तो शांत हुआ लेकिन यह तूफ़ान से पूर्व की शांति थी, अभी सेना मक्सीडी अपार्टमेंट के पास ही रुक गई थी। अगली सुबह आंदोलन एक बार फिर तीव्र हो गया। छात्रों के आंदोलन के इस रूप को यदि प्रचंड कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा, लेकिन यह प्रचंडता कम्युनिस्ट सरकार और उसके सैनिकों को नागवार गुजरी 4 जून को सेना एक बार टैंकों के साथ आगे बढ़ रही थी लेकिन आंदोलनकारी छात्र पीछे हटने को तैयार नहीं थे। सेना के टैंकों ने आगे बढ़ते हुए छात्रों को रौंदना शुरू कर दिया, एक के बाद एक लाशें बिछती चली गईं लेकिन बेदर्द कम्युनिस्ट सरकार और उसके सैनिकों का दिल नहीं पिघला।

साल 1989 के जून माह की 3 और 4 तारीख़ को कम्युनिस्ट सरकार ने तियानमेन चौक पर छात्रों के खून से 'लाल सलाम' लिख दिया था। कम्युनिस्ट सरकार ने इस घिनौनी हरकत के बाद जो मरने वालों की संख्या के जो आंकड़े जारी किए गए वे बेहद ही हैरान करने वाले थे।

3 जून को तो सिर्फ़ 36 लोग मारे गए थे लेकिन चार जून की रात बीजिंग की सड़कों पर टैंक दौड़ रहे थे, गोलियों की तड़-तड़ करती आवाज़ें बता रहीं थीं कि कम्युनिस्टों के 'लाल सलाम' ने हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है, लेकिन चीनी सरकार लगातार कह रही थी कि मरने वालों की संख्या मात्र 200 है।

हालांकि चीन का यह झूठ दुनिया के सामने तब आया जब ब्रिटिश पुरालेख ने पिछले साल एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि 4 जून की रात बीजिंग के तियानमेन चौक में 10,000 से ज्यादा लोग कम्युनिस्ट सरकार की खूनी होली के शिकार हो गए थे। इतना ही नहीं गत वर्ष टोरंटो यूनिवर्सिटी और हांगकांग यूनिवर्सिटी ने भी एक दस्तावेज प्रकाशित किया था जिसमें दावा किया गया कि चीन ने इस खूनी होली को दुनिया से छिपाने के लिए 3,200 से ज्यादा सबूत मिटा दिए थे।

चीन ने पूरी दुनिया को यही बताया कि वहां सिर्फ़ 200 जान ही गईं थीं। आज तियानमेन चौक की घटना के 31 साल हो चुके हैं लेकिन आज भी अगर चीनी मीडिया या विदेशी मीडिया उस जगह पर जाने का विचार नहीं कर सकती, क्योंकि चीन ने तियानमेन चौक में मीडिया के जाने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। आज चीन में तियानमेन चौक संबंध में बात करना भी अपराध श्रेणी में आता है। चीनी सरकार नहीं चाहती कि कोई भी इस मुद्दे पर बात करे, यही कारण है कि चीन की नई पीढ़ी को उसकी सरकार द्वारा किए गए दुर्दांत घटनाक्रम की जानकारी नहीं है।

चाइनाज़ सर्च फ़ॉर सिक्योरिटी के लेखक और चीनी मामलों के जानकार एंड्रयू नाथन कहते हैं कि "तियानमेन चौक की घटना के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार और मजबूत हो गई है। तियानमेन चौक में आंदोलनकारियों के एकत्रित होने के बाद से चीन ने अपने पुलिस सिस्टम में आमूल चूल परिवर्तन किए हैं। एंड्रयू आगे कहते हैं कि 'तियानमेन चौक में हुई हिंसा के बाद जिस तरह से अनेक देशों ने चीन पर प्रतिबंध लगाए उससे लगा कि चीन की साम्यवादी सरकार टूट जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।'

चीन में हत्याओं का दौर वहां कम्युनिस्टों के हाथों में सत्ता आते ही शुरू हो गया था जो कि अब तक बदस्तूर जारी है, कभी माओ तो कभी देंग श्याओपिंग तो कभी शी जिनपिंग सभी ने सिर्फ़ तानाशाही और हत्याओं के बल पर ही अपनी ताक़त को मजबूत किया है जो कि कम्युनिस्ट विचारधारा का मूल उद्देश्य है।

आज चीन में लोकतंत्र के नाम पर कुछ भी नहीं बचा है, शी जिनपिंग वहां के राष्ट्रपति हैं जो कि अपनी आख़िरी सांसों तक राष्ट्रपति रहेंगें। वहां न तो अब चुनावों का कोई महत्व रह गया है और न ही अभिव्यक्ति का। चीन की कम्युनिस्ट सरकार न तो वहां किसी को अपनी आज़ादी से कुछ भी पढ़ने देती और न ही कुछ भी बोलने की आज़ादी देती। यदि कोई भी व्यक्ति चीनी सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करता है तो उसका वही हश्र होता है जो तीन दशक पहले तियानमेन चौक में हुआ था।
12:00

सत्य क्या है - वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा का विशेष लेख

१-ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म को सत्य, ज्ञान, अनन्त और ब्रह्म कहा गया है।
२--सत्य की प्रत्यक्ष मूर्ति सूर्यदेव हैं।वे सत्य का विस्तार करते हैं - -- सत्यं ततान सूर्य:।
३-- यह पृथ्वी सत्य के आधार पर ठहरी हुई है--स्त्येनोत्तमिता भूमि:।
४-- धर्म के १०८ अवयवों में किसी एक के अनुकरण से सिद्धता आती है वह " सत्य " है।
५-- सत्य ज्ञानेन्द्रिय का प्रत्यक्ष विषय है।यह केवल वाणी (वाक् तत्त्व) का विषय मात्र नहीं है।
६-- सत्य भी कभी विकर्म होने से पाप का कारक होता है।जीवन रक्षक असत्य धर्म होता है तथा वह सत्य से गुरुतर होता है।
७--सत्य मौन से अधिक पुण्यकारी होता है।
८--सत्य जब व्यवहार का आधार बनता है तो मुकदमे नहीं होते हैं।इसे कहते हैं--सत्येकताना पुरुषा: ।
९--सत्य के अन्वेषण से ही न्याय  को आधार मिलता है।सत्याश्रित निर्णय ही न्याय होता है।
१०-- सत्य को स्थापित करने हेतु दण्ड धर्म का विधान अनिवार्य होता है।
११--जिस देश में जितना सत्य फैलेगा उतना ही FIR कम होगा। अतः कचहरी वाले उपभोक्ता के लिए सत्य कष्टकारी होता है।
यद्यपि सत्य की प्रतिष्ठा के लिए ही न्यायालय बने होते हैं।
यदि न्यायालयों से सत्य पराजित होकर निकलने लगे तो वे न्यायस्थल विश्रामशाला मात्र हो जायेंगे।
        सत्य को हम कहाँ तक उतारना चाहते हैं ?
 यह विषय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उच्च पद पर बैठे व्यक्ति के लिये सत्य का अपलाप, गोपनीयता के लिए सत्य का पिधान( ढक्कन से बन्द करना)आदि विषय जटिल होते हैं। साथ ही अप्रिय सत्य के उद्गार को प्रिय सत्य में परोसने की शैली ( ट्रेनिंग) का प्रतिपादन अति अनिवार्य होता है।
 परुष सत्य को दबा कर मृदुल पर दृढ़ सत्य की स्थापना ध्येय होना चाहिए।हम सत्य को धरती के वातावरण में कैसे उतारें इस पर स्पष्ट रुचिकर प्रस्तुति होनी चाहिये।
11:57

जाने सुंदरकांड का धार्मिक महत्त्व के सी शर्मा

सुंदर कांड वास्तव में हनुमान जी का कांड है । हनुमान जी का एक नाम सुंदर भी है । सुंदर कांड के लिए कहा गया है -
सुंदरे सुंदरे राम: सुंदरे सुंदरीकथा ।
सुंदरे सुंदरे सीता सुंदरे किम् न सुंदरम् ।।

सुंदर कांड में मुख्य मूर्ति श्री हनुमान जी की ही रखी जानी चाहिए । इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि हनुमान जी सेवक रूप से भक्ति के प्रतीक हैं, अत: उनकी अर्चना करने से पहले भगवान राम का स्मरण और पूजन करने से शीघ्र फल मिलता है । कोई व्यक्ति खो गया हो अथवा पति - पत्नी, साझेदारों के संबंध बिगड़ गए हों और उनको सुधारने की आवश्यकता अनुभव हो रही हो तो सुंदर कांड शीघ्र में कहा गया है -

सकल सुमंगलदायक, रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं, भवसिंधु बिना जलजान ।।

अर्थात् श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का यानी सभी लौकिक एवं परलौकिक मंगलों को देने वाला है, जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर को तर जाएंगे ।

सुंदरकांड में तीन श्लोक, साठ दोहे तथा पांच सौ छब्बीस चौपाइयां हैं । साठ दोहों में से प्रथम तीस दोहों में विष्णुस्वरूप श्री राम के गुणों का वर्णन है । सुंदर शब्द इस कांड में चौबीस चौपाइयों में आया है । सुंदरकांड के नायक रूद्रावतार श्रीहनुमान हैं । अशांत मन वालों को शांति मिलने की अनेक कथाएं इसमें वर्णित हैं ।

इसमें रामदूत श्रीहनुमान के बल , बुद्धि और विवेक का बड़ा ही सुंदर वर्णन है । एक और श्रीराम की कृपा पाकर हनुमान जी अथाहसागर को एक ही छलांग में पार करके लंका में प्रवेश भी पा लेते हैं । बालब्रह्माचारी हनुमान ने विरह - विदग्ध मां सीता को श्रीराम के विरह का वर्णन इतने भावपूर्ण शब्दों में सुनाया है कि स्वयं सीता अपने विरह को भूलकर राम की विरह वेदना में डूब जाती है । 

इसी कांड में विभीषम को भेदनीति, रावण को भेद और दंडनीति तथा भगवत्कृपा प्राप्ति का मंत्र भी हनुमान जी ने दिया है । अंतत: पवनसुत ने सीता जी का आशिर्वाद तो प्राप्त किया ही है, राम काज को पूरा करके प्रभु श्रीराम को भी विरह से मुक्त किया है और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित भी किया है । 

इस प्रकार सुंदरकांड नाम के साथ साथ इसकी कथा भी अति सुंदर है । अध्यात्मिक अर्थों में इस कांड की कथा के बड़े गंभीर और साधनामार्ग के उत्कृष्ट निर्देशन हैं । अत: सुंदरकांड आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक सभी दृष्टियों से बड़ा ही मनोहारी कांड है ।

सुंदरकांड के पाठ को अमोघ अनुष्ठान माना जाता है ऐसा विश्वास किया जाता है कि सुंदरकांड के पाठ करने से दरिद्रता एवं दुखों का दहन, अमंगलों संकटों का निवारण तथा गृहस्थ जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है । पूर्णलाभ प्राप्त करने के लिए भगवान में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना जरूरी है
11:55

महर्षि याज्ञवल्क्य अवतरण दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


 शुल्क यजुर्वेद प्रवर्तक, याज्ञिक सम्राट, महान दार्शनिक एवं विधिवेत्ता महर्षि याज्ञवल्क्य की जयन्ती कार्तिक शुक्ल द्वादशी को मनाई जाती है। जो हिन्दू परम्परा में ‘‘योगेश्वर द्वादशी’’ के नाम से जानी जाती है। महर्षि याज्ञवल्क्य के पिता का नाम ब्रह्मरथ (वाजसनी और देवरथ नाम से भी जाने जाते हैं) और माता का नाम देवी सुनन्दा था। पिता ब्रह्मरथ वेद-शास्त्रों के परम ज्ञाता थे। माता ऋषि सकल की पुत्री थी।
 महर्षि याज्ञवल्क्य यज्ञ सम्पन्न कराने में इतने निष्णात थे कि उनको याज्ञिक-सम्राट कहा जाता है। यज्ञ सम्पादन में उनकी इस सिद्ध- हस्तता के कारण ही उनका नाम ‘‘याज्ञवल्क्य’’ पड़ा। याज्ञवल्क्य शब्द स्वयं दो शब्दों का योग है- याज्ञ और वल्क्य अर्थात् यज्ञ सम्पादन कराना जिनके लिए वस्त्र बदलने के समान सहज और सरल था।
 महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियां थीं, मैत्रेयी और कात्यानी। मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। महर्षि याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी के मध्य अनश्वरता पर हुए प्रसिद्ध संवाद का बृहदारण्य कोपनिषद् में उल्लेख मिलता है। महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नि कात्यायनी, जो ऋषि भारद्वाज की पुत्री थीं, इनसे इनके तीन पुत्र थे- चन्द्रकान्त, महामेघ और विजय ।
 एक बार राजा जनक को ब्रह्मविद्या जानने की इच्छा हुई। इसके लिए उन्होने एक शास्त्रार्थ का आयोजन किया जिसमें यह शर्त रखी गयी कि जो भी ब्रह्मविद्या का परम ज्ञाता होगा उसे स्वर्ण मण्डित सींगों वाली एक हजार गायें दी जायेंगी। इस शास्त्रार्थ में महर्षि याज्ञवल्क्य के अलावा कोई भी भाग लेने का साहस नहीं जुटा पाया। उनसे ब्रह्मविद्या विषयक बहुत से प्रश्न पूछे गये। जिनका उन्होंने बड़ी सहजता व सटीकता से उत्तर दिया और अन्त में शास्त्रार्थ में विजयी हुए और राजा जनक के गुरूपद्भाक् रहे।
 इन्होनें ही प्रयाग में ऋषि भारद्वाज को श्रीराम के पावन चरित्र का श्रवण कराया था। जिसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने श्रीरामचरितमानस में किया है।

 महर्षि याज्ञवल्क्य, उनके आध्यात्मिक गुरू एवं उनकी पत्नियों- कात्यायनी व मैत्रेयी की मूर्तियां स्थापित हैं। इसी प्रकार दक्षिण अरकोट जिले में कुड्डालोर के पास सोर्नावूर में बंगलूर शहर में एवं वाराणसी में महर्षि याज्ञवल्क्य के मन्दिर है।
 महर्षि याज्ञवल्क्य का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में अतुल्य एवं महत्वपूर्ण योगदान।

 महर्षि याज्ञवल्क्य शुक्ल यजुर्वेदकार रहे हैं। शतपथ ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद् ईशोपनिषद, याज्ञवल्क्य स्मृति, प्रतिज्ञासूत्र, योग याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थ महर्षि याज्ञवल्क्य के हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को अमूल्य योगदान है।
11:52

इंशान कैसा होना चाहिए- वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा का विशेष लेख



"यह सवाल मैंने अलग अलग इंसानों से पूछा और जवाब कुछ इस तरह थे,,,,,
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सब से पहले यह सवाल किया महिला से कि "इन्सान कैसा होना चाहिए"
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महिला का जवाब-खुबसूरत, मुझे देखो सब मुझे पसंद करते है और मुझसे दोस्ती करना चाहते है क्योकि मैं खुबसूरत हूँ।
जवाब सुन कर मैंने सोचा- ज़िन्दगी गुजार दी तन के अहंकार में।
..
फिर यह सवाल किया व्यापारी से क़ि "इन्सान को कैसा होना चाहिये"
व्यापारी का जवाब-धनवान, मुझे देखो सब मुझे पसंद करते है और मेरे जैसा बना चाहते है क्योकि मैं धनी हूँ।
जवाब सुन कर मैंने सोचा-जिंदगी गुजार दी धन के अहंकार में।
..
फिर यह सवाल किया पंडित जी से क़ि "इन्सान को कैसा होना चाहिये"
पण्डित जी का जवाब-ज्ञानी, मुझे देखो सब मुझे पसंद करते है और मेरे जितना विद्वान बना चाहते है क्योकि मैं ज्ञानी हूँ।
जवाब सुन कर मैंने सोचा-जिंदगी गुज़ार दी ज्ञान के अहंकार में।
..
फिर यह सवाल किया एक बच्ची से क़ि "इन्सान कैसा होना चाहिए"
बच्ची का जवाब- -- मेरी माँ जैसा क्योकि वो खुद से और सब से ज्यादा प्यार मुझे
करती है खुद भूखी सो सकती है पर मुझे भूखा देख भी नहीं सकती।
मेरी माँ को सब बदसूरत निर्धन और अनपढ़ कहते है। वो फिर भी मुस्कुराते रहती है और मुझसे ज्यादा किसी की परवाह नही करती खुद की भी नहीं।
यह जवाब सुन कर मैं कुछ सोच न सका और समझ गया के ज़िन्दगी माँ के प्यार के बिना अधूरी है ओर शायद इसलिय कहते है के भगवान हर जगह हमारे लिए
नही हो सकता तभी उसने माँ बनाई,,,,,
..
दोस्तों आज का इन्सान चाहता है के उसके पास कुछ न हो पर तन मन धन जरुर हो। 
मगर सच तो यह है कि ज़िन्दगी माँ के प्यार के बिना अधूरी है।