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Saturday, 7 March 2020

07:06

जाने क्या है वैदिक होली का महत्व



*जाने क्या है "भारतीय धरोहर वैदिक होली"-के सी शर्मा*


होलिका दहन करने की परंपरा कारण
गाँव- गाँव को संक्रमित रोगों  से बचाने का था
भारतवर्ष में होलिका दहन इन्हीं कारणों से होता था ताकि...
होलिका दहन से निकला वायु पूरे गांव को लाभान्वित कर सके।
होलिका दहन से पूरे गाँव का वातावरण ’सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम’ हो सके।
होली सृष्टि के प्रारम्भ होने के साथ ही शुरू हो चुका था

क्योंकि इसका मूल कारण कोई व्यक्ति विशेष या #घटना विशेष नहीं है,

इसका मूल कारण है नई फसल का आगमन और उस फसल के स्वागत के लिए किसान #उत्सव मनाता है।

होलिका_दहन के लिए पहले यज्ञ करना चाहिए।

इसकी सामग्री विशेष रूप से तैयार की जानी चाहिए।
इस माह के पश्चात्  वातावरण में कीट का प्रकोप प्रारंभ हो जाता है।
इसके परिणामस्वरूप नई बीमारियां अपना रूप दिखाने लगती हैं।
इसलिए यज्ञ सामग्री ऐसी हो जिसके द्वारा कीटाणुओं का नाश हो।
होलिका दहन हवन सामग्री में

गाय के सूखे गोबर,
गाय का घी,
कपूर, कपूर कचरी,
नीम_पत्ते,
नागरमोथा,
सुगंध_कोकिला,
सोमलता_जायफल,
जावित्री,
जटामांसी,
अगर,
तगर,
चिरायता,
  हल्दी,
गिलोय व
गूगल
जौ,
तिल
आदि जड़ी-बूटियों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया जाए।

विभिन्न प्रकार के औषधीय जड़ी-बूटियाँ आदि सामग्री डालने से इनके अंदर के रसायन भी सूक्ष्म रूप में निकलते हैं जो पूरे गांव को वायु के कण के रूप में पोषण व सुगन्ध प्रदान करते हैं।

शायद गांव की बाहर मुहाने में यह होलिका दहन करने की परंपरा इन्हीं कारणों से थी ताकि इन से निकली हुई वायु पूरे गांव को लाभान्वित कर सके।

पूरे गाँव का वातावरण ’सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम’ हो सके।

इस यज्ञ में लकड़ी का प्रयोग न करें तो अच्छा होगा।

होलिका दहन हवन की आँच में जौ एवं गेंहू की बालियां भून लें।

होलिका दहन के बाद दूसरे दिन होलिका की राख को शरीर पर मला जाता था।

गाय के गोबर की यह राख यानी
भस्म एंटीबैक्टीरियल एंटीफंगल और एंटीवायरल होती है।

यह राख मानव शरीर के समस्त चर्म रोगों को समाप्त करने की शक्ति रखती है
और
मानव शरीर के चमड़ी में होने वाले रंध्र (सूक्ष्म छेद) को खोल देती है।

इन्हीं रन्ध्रों से हमारी चमड़ी बाहर के ताप और हवामान को ग्रहण करता है और पसीना निकालने के लिए का उपयोग करता है।

वर्ष में एक बार इस भस्म को हमारे शरीर में अच्छे से लगा लेने से शरीर के अंदर की नकारात्मक उर्जा भी समाप्त होती है।

गौ के गोबर के उपलों की राख को शरीर पर मलने से शरीर शुद्ध होता है, इसमें छिपा बैक्टीरिया नष्ट होता है,

चर्म_रोग ठीक होते हैं और शरीर को सर्दी ऋतु से गर्मी ऋतु में प्रवेश करना आसान हो जाता है

हमारे त्योहार में छुपा है.....
तंदुरस्त स्वास्थ्य का वैज्ञानिक रहस्य
06:41

जाने होलिका दहन का सुभ मुहूर्त



*होली - 2020:*


होलाष्टक:- होलाष्टक 3  मार्च से 9  मार्च, 2020 तक जिसमे सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए है।

फाल्गुन माह की पूर्णिमा (9  मार्च) को होलिका दहन किया जाएगा और इसके अगले दिन 10  मार्च को धुलेण्डी (होली) का पर्व मनाया जाता है . 
शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के आठ दिन पूर्व होलाष्टक लग जाता है.
इसके अनुसार होलाष्टक लगने से होली तक कोई भी शुभ संस्कार संपन्न नहीं किए जाते.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है

*होलिका दहन*

होली से एक दिन पहले फाल्गुन पूर्णिमा 9  मार्च को होलिका दहन किया जाएगा. 

होलिका दहन भद्रा रहित काल में किया जाता है. 
सायं काल में होलिका दहन किया जायेगा
इस वर्ष भद्रा रहित होलिका दहन होगा। 

*होलिका दहन मुहूर्त*

18:26:20 से 20:52:17 तकअवधि :2 घंटे 25 मिनट

होलिका दहन का मुहूर्त किसी त्यौहार के मुहूर्त से ज्यादा महवपूर्ण और आवश्यक है। 
यदि किसी अन्य त्यौहार की पूजा उपयुक्त समय पर न की जाये तो मात्र पूजा के लाभ से वञ्चित होना पड़ेगा परन्तु होलिका दहन की पूजा अगर अनुपयुक्त समय पर हो जाये तो यह दुर्भाग्य और पीड़ा देती है।

होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं)
के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है 
और...
अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।