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Thursday, 27 August 2020

06:44

उज्जैन:सप्त सागरों में एक रुद्रसागर’ 5 माह में होगा पुनर्जीवित वैज्ञानिक परीक्षण शुरू

 AUG 27, 2020
deepak tiwari 
जांच करने मुंबई, भोपाल से उज्जैन पहुंची वैज्ञानिकों की टीम….

उज्जैन। 100 वर्ष पहले शिप्रा नदी 12 महीने प्रवाहमान रहती थी। इसमें शुद्ध पानी कल-कल बहता था। महाकालेश्वर मंदिर के पीछे स्थित रुद्रसागर में भी साफ पानी शिप्रा नदी से ही रिचार्ज होता था, लेकिन समय के साथ शहर के फैलाव व अतिक्रमण के कारण शिप्रा नदी के तट छोटे होते गये और अब रूद्रसागर में बारिश व नालों का पानी स्टोर होता है। इसे पुन: शुद्ध जल से भरने के लिये भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की कंपनी वाप्कोस लि. के वैज्ञानिक व इंजीनियरों की टीम ने काम शुरू किया है जो करीब 5 माह में पूरा होगा।

वैज्ञानिक डॉ. रोमन का कहना है कि प्रारंभिक स्टडी में पता चला है कि महाकालेश्वर मंदिर के पीछे स्थित रुद्रसागर करीब 100 वर्षों पूर्व शिप्रा नदी के पानी से ही रिचार्ज होता था और शिप्रा नदी 12 महीने प्रवाहमान रहती थी….

वाप्कोस लि. के डायरेक्टर डॉ. उदय रोमन ने बताया कि हाईड्रोलिक प्रोजेक्ट स्टडी के तहत स्मार्ट सिटी योजना अंतर्गत रुद्रसागर को पुनर्जीवित करने के लिये सर्वे का काम शुरू किया गया है। डॉ. रोमन की टीम में वैज्ञानिक देवेन्द्र जोशी मुंबई, डॉ. विश्वकर्मा भोपाल, इंजीनियर आदित्य पाटीदार और महेश शर्मा शामिल हैं। यह लोग सुबह शिप्रा नदी के छोटे पुल पर पहुंचे और नाव में बैठकर नदी के तल से 100 फीट नीचे मौजूद पत्थर, मिट्टी, रेती आदि की जानकारी जुटाई। यहां से गऊघाट तक शिप्रा नदी की वर्तमान और पूर्व स्थिति का आंकलन शुरू किया गया है। डॉ. रोमन का कहना है कि प्रारंभिक स्टडी में पता चला है कि महाकालेश्वर मंदिर के पीछे स्थित रुद्रसागर करीब 100 वर्षों पूर्व शिप्रा नदी के पानी से ही रिचार्ज होता था और शिप्रा नदी 12 महीने प्रवाहमान रहती थी।

रुद्रसागर का फैलाव नदी तक था : वैज्ञानिकों की टीम को इस बात के भी पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि रुद्रसागर का फैलाव नृसिंहघाट की ओर शिप्रा नदी तक था जो अतिक्रमण और अन्य निर्माण के कारण सीमित क्षेत्र में बदल गया है।

सप्त सागर भी एक दूसरे से जुड़े थे

वाप्कोस की टीम के सदस्यों ने बताया कि पौराणिक महत्व के सप्त सागर जिनमें रूद्र सागर के अलावा गोवर्धन सागर, पुरुषोत्तम सागर, विष्णु सागर, क्षीरसागर, पुष्कर सागर, रत्नाकर सागर एक दूसरे से जुड़े थे। शिप्रा नदी का पानी रुद्रसागर में एकत्रित होता और लेवल बढऩे के बाद यही पानी दूसरे सागरों में पहुंच जाता था।

कोटितीर्थ कुंड की आवक भी रुद्रसागर से

वाप्कोस की टीम शिप्रा नदी पर सर्वे कर रही थी उसी दौरान वैज्ञानिकों को यह भी पता चला कि नदी के किनारे लगे बोरिंग से पानी ओवरफ्लो होकर बहता है। शिप्रा आरती द्वार और मौलाना मौज के नीचे स्थित बोरिंग ओवरफ्लो होते हैं जो इस बात का प्रमाण है कि यह बोरिंग रुद्रसागर की ओर से आने वाले पानी से ही ओवरफ्लो होते हैं, साथ ही महाकालेश्वर मंदिर स्थित कोटितीर्थ में भी रुद्रसागर के पानी की ही आवक होती होगी

Monday, 10 August 2020

23:54

महाकाल की सवारी:deepak tiwari

उज्जैन.भादौ मास में सोमवार को उज्जैन स्थित भगवान महाकाल की पहली सवारी निकली। श्रावण-भादौ मास के क्रम में यह भगवान महाकाल की छठी सवारी है। इसके बाद 17 अगस्त को शाही सवारी निकाली जाएगी। ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर के सभा मंडप में परंपरा अनुसार कलेक्टर आशीष सिंह ने भगवान महाकाल के मनमहेश और चंदमौलेश्वर रूप का पूजन कर पालकी को नगर भ्रमण के लिए रवाना किया। इस दौरान बाबा के स्वागत में एक भव्य रंगोली बनाई गई थी।
बाबा के स्वागत में एक भव्य रंगोली बनाई गई।
हाथी पर सवार होकर चंद्रमौलेश्वर स्वरूप में बाबा ने भक्तों को दर्शन दिए।
महाकालेश्वर मंदिर से प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी सावन महीने के सभी सोमवार और भादौ महीने के दो सोमवार को बाबा महाकाल की सवारी निकाली जा रही है। ऐसी मान्यता है कि भगवान खुद पालकी में सवार होकर भक्तों का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इसी कड़ी में सोमवार शाम 4 बजे लाव लश्कर के साथ बाबा महाकाल नगर भ्रमण निकले। भगवान महाकाल ने चांदी की पालकी में मनमहेश व हाथी पर चंद्रमौलेश्वर रूप में सवार होकर भक्तों को दर्शन दिए।
सवारी बड़ा गणेश, हरसिद्धि चौराहा, सिद्ध आश्रम के सामने से होते हुए सवारी मोक्षदायिनी शिप्रा के रामघाट पहुंची। यहां महाकाल पेढ़ी पर पुजारी भगवान महाकाल का शिप्रा जल से अभिषेक कर पूजा-अर्चना की। पूजन पश्चात सवारी हरसिद्धि की पाल होते हुए शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर के सामने से पुनः महाकाल मंदिर पहुंचेगी। हालांकि इस बार भी सवारी में श्रद्धालुओं को प्रवेश नहीं मिल पाया। महाकाल मंदिर समिति ने भक्तों के लिए लाइव दर्शन की व्यवस्था की थी। अब अगले सोमवार 17 अगस्त को भगवान महाकाल की शाही और अंतिम सवारी परंपरागत मार्ग से निकाली जाएगी।

Wednesday, 6 November 2019

12:22

उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में लागू होगी नई व्यवस्था




उज्जैन. महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालु गर्भगृह में प्रवेश बंद होने की स्थिति में 1500 रुपए शुल्क देकर गर्भगृह में जाकर बगैर पुजारी के जलाभिषेक कर सकेंगे। यह सुविधा बुधवार से शुरू होगी।
अभी गर्भगृह में प्रवेश बंद होने की स्थिति में श्रद्धालुओं को केवल दूर लगे पात्र में ही जल अर्पित करना होता है। अभी गर्भगृह में प्रवेश के लिए उन्हें 1700 रुपए की अभिषेक सुविधा लेना होती है। इसमें वे पुजारी के साथ जाकर गर्भगृह में पूजन कर पाते हैं। श्रद्धालुओं को सीधे जलाभिषेक की सशुल्क सुविधा की योजना मंदिर समिति ने बनाई है।
प्रशासक एसएस रावत के अनुसार प्रतिदिन सुबह 8 से 10 और दोपहर 2 से शाम 4 बजे के बीच 1500 रुपए शुल्क चुकाने पर गर्भगृह में जाकर जलाभिषेक कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें पंडे-पुजारियों के साथ जाने की जरूरत नहीं रहेगी।
शीघ्र दर्शन के लिए 250 रुपए
मंदिर में सशुल्क दर्शन की सुविधा भी है। सामान्य की बजाए वीआईपी कतार से दर्शन के लिए मंदिर समिति के काउंटर पर 250 रुपए शुल्क देकर सशुल्क शीघ्र दर्शन की रसीद लेकर भी दर्शन किए जा सकते हैं