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Thursday, 20 August 2020

07:54

इस दिन मनाई जाएगी हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त tap news india


धर्म/ हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. माता पार्वती ने शंकर भगवान को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. मान्यता है कि माता पार्वती के इस तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इस दिन पार्वती जी की अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया.

 
 हरतालिका तीज पर मिलता है अखंड सौभाग्य का वरदान

 हरतालिका तीज भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व है. हरतालिका तीज को कई जगहों पर तीजा के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं. ये व्रत निराहार और निर्जला किया जाता है. हरतालिका तीज हरियाली और कजरी तीज के बाद मनाई जाती है. इस बार हरतालिका तीज 21 अगस्त को मनाई जाएगी.
हरतालिका तीज शुभ मुहूर्त 
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प्रातःकाल मुहूर्त- सुबह 5 बजकर 53 मिनट से सुबह 8 बजकर 29 मिनट तक
अवधि: 2 घंटे 36 मिनट
हरतालिका तीज पूजा मुहूर्त- शाम 6 बजकर 54 मिनट से रात 9 बजकर 6 मिनट तक
हरतालिका तीज व्रत के नियम 
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- हरतालिका तीज व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है. अगले दिन सुबह पूजा के बाद जल पीकर व्रत खोलने का विधान है.
- हरतालिका तीज व्रत एक बार शुरू करने पर फिर इसे छोड़ा नहीं जाता है. हर साल इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करना चाहिए.
- हरतालिका तीज व्रत के दिन रात्रि जागरण किया जाता है. रात भर जागकर भजन-कीर्तन करना चाहिए.
हरतालिका तीज व्रत पूजा विधि 

- हरतालिका तीज की पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल में की जाती है.
- इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की बालू रेत और काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाई जाती है.

- पूजा स्थल को फूलों से सजाकर एक चौकी रखकर उस पर केले के पत्ते बिछाएं और भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें.
- इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें.
- इस व्रत की मुख्य परंपरा माता पार्वती को सुहाग की सारी वस्तुएं चढ़ाना है.
- हरतालिका तीज की पूजा में शिव जी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है. बाद में यह सामग्री किसी ब्राह्मण को दान देना चाहिए.
- तीज की कथा सुनें और रात्रि जागरण करें. आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं और हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें.
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वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने के लिए हरितालिका तीज पर कुछ खास उपाय किए जा सकते हैं. ज्योतिर्विद करिश्मा कौशिक से जानते हैं इसके बारे में:
हरतालिका तीज का महत्व
हरतालिका तीज पर माता पार्वती और भगवान शंकर की विधि-विधान से पूजा की जाती है. इस व्रत को रखने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना के लिए ये व्रत रखती हैं. हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. माता पार्वती ने शंकर भगवान को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. माता पार्वती के इस तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पार्वती जी की अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया. तभी से अच्छे पति की कामना और पति की लंबी आयु के लिए हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है.
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          कथा ब्यास 
  ज्योतिष कर्मकांड मर्मज्ञ 
    आचार्य प्राणनाथ मिश्रा 
📲8383985883
📲7835882780

Monday, 10 August 2020

17:28

जन्माष्टमी:बांके बिहारी और गोपाल मंदिर में कल उत्सव

इंदौर.श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मंगलवार और बुधवार को दो दिन धूमधाम से मनाएगा। मंगलवार को गोपाल मंदिर, बांके बिहारी और विद्याधाम मंदिर में रात 12 बजे भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाएगा, वहीं यशोदा माता मंदिर, इस्कॉन मंदिर, गोवर्धननाथ मंदिर, जानकीनाथ मंदिर, स्वामी नारायण मंदिर, गीता भवन मंदिर और मुरली मनोहर मंदिर में बुधवार को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। कोरोना को कारण इस बार किसी मंदिर में भक्तों को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इस बार यशोदा माता मंदिर में गोद भराई की रस्म भी नहीं निभाई जाएगी। इस्कॉन मंदिर सहित सभी मंदिरों में विद्युत सज्जा के साथ फूलों से सजावट होगी। विद्याधाम मंदिर और इस्कॉन मंदिर में भक्तों के लिए दर्शन की ऑनलाइन व्यवस्था रखी गई है।
ज्यादातर मंदिरों में 12 को मनेगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
श्री बांके बिहारी मंदिर में उत्सव 11 अगस्त को मनाया जाएगा। भगवान का फूलों से शृंगार, अभिषेक होगा। रात 12 बजे जन्मोत्सव मनेगा।
गोपाल मंदिर में भी जन्माष्टमी 11 को मनाई जाएगी। सुबह 7.30 बजे पंचामृत से स्नान के बाद 10 बजे शृंगार आरती होगी। रात को जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
यशोदा माता मंदिर में उत्सव 12 को मनाया जाएगा। मंदिर में विद्युत सज्जा के साथ सुबह 6 बजे अभिषेक होगा। नई पोषाक व शृंगार किया जाएगा। रात को जन्मोत्सव होगा।
श्री राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर में उत्सव 12 अगस्त को मनाया जाएगा। भगवान का विशेष शृंगार होगा। रात को जन्मोत्सव होगा।
श्री गोवर्धन नाथजी मंदिर में जन्माष्टमी बुधवार को मनाई जाएगी। विद्युत सज्जा की जाएगी। भगवान श्रीकृष्ण का विशेष शृंगार होगा। रात को उत्सव मनाया जाएगा।
इस्कॉन मंदिर में 12 को पूरे दिन सत्संग और अभिषेक के बाद रात 10 बजे से कृष्ण जन्मोत्सव शुरू होगा। रात 12 बजे जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
गीता भवन मंदिर में कृष्ण जन्मोत्सव 12 को मनाया जाएगा। शाम 7 से 11. 30 बजे तक ऑनलाइन भजन, सत्संग और रात 12 बजे जन्मोत्सव होगा।
17:11

जन्माष्टमी शुभ मुहूर्त:कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

 12 - 08 - 2020 :  भाद्रपद महीना लग गया है। भाद्रपद  कृष्ण पक्ष के षष्ठी को दाऊ बलराम जी और 
अष्टमी  रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण भगवान जी का जन्म हुआ था।
 इस दिन पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग है।  इस बार जन्माष्टमी पर कृतिका नक्षत्र रहेगा, उसके बाद रोहिणी नक्षत्र रहेगा, 12-08-2020 को रात्रि पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है।
12 अगस्त को जन्माष्टमी मानना श्रेष्ठ है। मथुरा और द्वारिका में 12 अगस्त को जन्मोत्सव मनाया जाएगा।

हर बार की तरह इस बार भी जन्माष्टमी दो दिन मनाई जा रही है। 

जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक कर पंचामृत अर्पित करना चाहिए। 
माखन मिश्री का भोग लगाएं।
कृष्ण जन्म उत्सव का आनंद लें और हर्ष  उल्लास के साथ भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मनाए उस परम परमात्मा की कृपा प्राप्त करें

सभी को कृष्ण जन्म उत्सव की बहुत सारी बधाइयां व बहुत सारी शुभकामनाएं
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            🌷कथा ब्यास 🌷
ज्योतिषवास्तु  एवं कर्मकांड मर्मज्ञ 
🌹आचार्य प्राणनाथ मिश्रा 🌹
 नोएडा

Thursday, 6 August 2020

21:48

संकष्टी चतुर्थी : सर्वार्थ सिद्धि योग में करें भगवान श्री गणेश की पूजा जाने कैसे -पंडित हेमराज शास्त्री

सवाई माधोपुर@ रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा।भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी  मनाई जाती है। भादो महीने में पूर्णिमा के बाद पड़ने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रीगणेश की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। संकष्टी चतुर्थी को कष्ट, रोग और दुख हरने वाली चतुर्थी माना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी के दिन बन रहा शुभ संयोग


संकष्टी चतुर्थी के दिन कई शुभ संयोग बन रहे हैं। शुक्रवार के दिन के साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का महत्व बढ़ जाता है। कहते हैं कि सर्वार्थ सिद्धि योग में श्रीगणेश की पूजा करने से सभी कष्टों से मुक्ति और मनचाहा वरदान भी प्राप्त होता है। 

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संकष्टी चतुर्थी का महत्व


मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रीगणेश की पूजा करने से विशेष वरदान प्राप्त होता है। जबकि व्रत रखने से परिवार के सदस्यों के बीच आपसी सौहार्द बढ़ता है। कहते हैं कि अगर किसी मनुष्य के जीवन में रुकावट या बाधाएं आ रही हैं तो संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को दही अर्पित करना चाहिए। जिससे बिगड़े हुए काम बनने लगते हैं।

Monday, 3 August 2020

04:31

शुभ और कल्याणकारी चिंतन है शिवत्व: संजीव


बदायंू: श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी होती है। शिव का अर्थ है शुभ और शंकर का अर्थ है कल्याण करने वाला। श्रावण मास में शुभ और कल्याणकारी चिंतन, चरित्र एवं आकांक्षाएँ बनाने से शिव आराधना, शिव सान्निध्य का लाभ प्राप्त होता है।
शिव को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप बनना पड़ता है। सूत्र है- ‘‘ शिवो भूत्वा शिवं यजेत् ‘‘ इसका तात्पर्य पर है कि शिव बनकर शिव की पूजा करें, तभी उनकी कृपा प्राप्त हो सकती है। श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना व्यक्तिगत पुण्य और लोककल्याण दोनों दृष्टियों से बहुत महत्त्वपूर्ण है।
साधक श्रावण मास में अपने संयमित जीवन, व्रत-उपवास करें। शिव अपने लिए कठोर दूसरों के लिए उदार हैं। यह आदर्श सूत्र अध्यात्म साधकों के जीवन को पवित्र बना देता है। स्वयं न्यूनतम साधनों से काम चलाते हुए मस्त रहना, दूसरों को बहुमूल्य उपहार देना ही शिवत्व है। आराधक को शिवजी के आदर्श परिवार के जैसे श्रेष्ठ संस्कार युक्त परिवार निर्माण का प्रवाह समाज के बीच प्रवाहित करना चाहिए।
शिव कल्याणकारी हैं। ‘‘ भवानी शंकरौ वंदे ‘‘ भवानी और शंकर की हम वंदना करते हैं। यह ‘‘ श्रद्धा विश्वास रूपिणौ ‘‘ श्रद्धा और विश्वास इन दोनों का नाम ही शंकर-पार्वती है। ‘‘ याभ्यां बिना न पश्यन्ति ‘‘ जिनकी पूजा किए बिना कोई सिद्धपुरुष भी भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर सकता। श्रद्धा और भक्ति से ही जीवन में आने वाले संकटों, प्राकृतिक आपदाओं और विनाशकारी लीलाओं से बचा जा सकता है। 
भगवान शिव के गण भूत-पिशाच और देव वर्ग हैं। वीरभद्र प्रधान गण हैं। वीरता अभद्र न हो, भद्रता डरपोक न हो। तभी शिवत्व की स्थापना होती है। भले काम के लिए देव-पिशाच सभी एक जुट हो जाएँ यही प्रेरणा शिवजी के गणों से प्राप्त होती है। शिव की भक्ति से साधकों को हृदय में सतप्रवृत्तियों का प्रवाह उमड़ता है। लोकमंगल के कार्य संभव होते चले जाते हैं।
शिव के मस्तक पर चन्द्रमा पूर्ण ज्ञान का प्रतीक है। जटाओं के बीच से निकली ज्ञानगंगा अज्ञानता को दूर कर लोक कल्याण करती है। तीसरा नेत्र दूरदर्शिता और विवेकशीलता का प्रतीक है। व्यक्ति उदास, निराश और खिन्न, विपन्न बैठकर अपनी शक्तियों को न खोए। शिव की आराधना कर पुलकित और प्रफुल्लित जीवन जिए। ज्ञान, भक्ति और कर्म ही त्र्यंबक है। भगवान शिव ने श्रावण मास की शिवरात्रि में समुद्रमंथन से निकले हलाहल का पान कर लोकोपकार किया। श्रावण मास में शिवलिंग पर वेल पत्र और जल चढ़ाने से भगवान शिव और पार्वती की कृपा सहजता से प्राप्त होती है।

Friday, 31 July 2020

22:44

जानिए बुधवार को किस मंत्र के साथ भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए-के सी शर्मा*


हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, प्रत्येक वार अलग अलग देवी देवताओं की समर्पित है. बुधवार गणेश भगवान को समर्पित माना जाता है. गणेश भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए बुधवार के दिन उनकी पूजा की जाती हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बुधवार को विधिवत गणेश जी की पूजा से जातक के जीवन में सुख, शांति और यश बरकरार रहता है. साथ ही उसके अन्न के भंडार और धन कभी खाली नहीं होते हैं. 

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि जब माता पार्वती के हाथों गणेश जी की उत्पत्ति हुई, तब कैलास में बुध देव भी मौजूद थे। इस वजह से श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना के लिए उनके प्रतिनिधि वार बुध हुए, इसलिए प्रत्येक बुधवार के दिन श्रीगणेश जी की आराधना होने लगी।

महत्व एवं लाभ
शास्त्रों में बुधवार को सौम्यवार भी कहा जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता की पूजा की जाती है, हर कार्य से पहले श्रीगणेश की पूजा करने का विधान है। ऐसे में बुधवार का दिन किसी भी कार्य को करने के लिए शुभ माना जाता है। इतना ही नहीं, जिन लोगों का बुध कमजोर हो, उन लोगों को बुधवार को विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की ​विधि विधान से पूजा करनी चाहिए।

बुधवार को क्या करें

1. गणेश जी की पूजा में दुर्वा की 21 गाठें चढ़ाएं।

2. बुधवार के दिन गणेश जी को गुड़ और गाय के घी का भोग लगाएं। बाद में उसे गाय को खिला दें। ऐसे करने से व्यक्ति को विशेष फल मिलेगा।

3. बुधवार को गणेश जी को शमी के पत्ते अर्पित करने से व्यक्ति का बुद्धि-विवेक बढ़ता है।

4. आज के दिन गणेश जी को बूंदी के लड्डू और लाल सिंदूर अर्पित करें।

5. बुधवार के दिन घर में गणेश जी की श्वेत मूर्ति स्थापित करने और उनको श्वेत मोदक अर्पित करने से घर के क्लेश दूर होते हैं। घर-परिवार में शांति होती है।

बुधवार को गणेश पूजा के मंत्र

1. गणेश जी को दीप अर्पित करते समय इस मंत्र का जाप करें।

साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया,

दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्,

2. गणेश जी को सिंदूर अर्पित करने का मंत्र

सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्,

शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्।

3. गणेश जी को प्रसाद अर्पित करने का मंत्र

नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरू,

ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गरतिम्,

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च,

आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद।

4. गणेश जी को पुष्प माला अर्पित करने का मंत्र

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो,

मयाहृतानि पुष्पाणि गृह्यन्तां पूजनाय भोः।

5. गणेश जी को यज्ञोपवीत पहनाने का मंत्र

नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्,

उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर।

Saturday, 25 July 2020

22:09

जानिए जानिए कैसे हुई नागों की उत्तपति के सी शर्मा*




कद्रू और विनता दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ थीं और दोनों कश्यप ऋषि को ब्याही थीं। एक बार कश्यप मुनि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों से वरदान मांगने को कहा। कद्रू ने एक सहस्र पराक्रमी सर्पों की मां बनने की प्रार्थना की और विनता ने केवल दो पुत्रों की किन्तु दोनों पुत्र कद्रू के पुत्रों से अधिक शक्तिशाली पराक्रमी और सुन्दर हों। कद्रू ने 1000 अंडे दिए और विनता ने दो। समय आने पर कद्रू के अंडों से 1000 सर्पों का जन्म हुआ। पुराणों में कई नागो खासकर वासुकी, शेष, पद्म, कंबल, कार कोटक, नागेश्वर, धृतराष्ट्र, शंख पाल, कालाख्य, तक्षक, पिंगल, महा नाग आदि का काफी वर्णन मिलता है।

शेषनाग - कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे। इनका एक नाम अनन्त भी है। शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी। ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए। 

इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया। क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेषनाग के आसन पर ही विराजित होते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण व श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम शेषनाग के ही अवतार थे।

वासुकि नाग - धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। ये भी महर्षि कश्यप व कद्रू की संतान थे। इनकी पत्नी का नाम शतशीर्षा है। इनकी बुद्धि भी भगवान भक्ति में लगी रहती है। जब माता कद्रू ने नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब नाग जाति को बचाने के लिए वासुकि बहुत चिंतित हुए। तब एलापत्र नामक नाग ने इन्हें बताया कि आपकी बहन जरत्कारु से उत्पन्न पुत्र ही सर्प यज्ञ रोक पाएगा। तब नागराज वासुकि ने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह ऋषि जरत्कारु से करवा दिया। समय आने पर जरत्कारु ने आस्तीक नामक विद्वान पुत्र को जन्म दिया। आस्तीक ने ही प्रिय वचन कह कर राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी। त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।

तक्षक नाग - धर्म ग्रंथों के अनुसार तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया। जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तीक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तीक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए। ग्रंथों के अनुसार तक्षक ही भगवान शिव के गले में लिपटा रहता है।

कर्कोटक नाग - कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए। ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके उपरांत कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रविष्ट हो गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

धृतराष्ट्र नाग - धर्म ग्रंथों के अनुसार धृतराष्ट्र नाग को वासुकि का पुत्र बताया गया है। महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया तब अर्जुन व उसके पुत्र ब्रभुवाहन (चित्रांगदा नामक पत्नी से उत्पन्न) के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रभुवाहन ने अर्जुन का वध कर दिया। ब्रभुवाहन को जब पता चला कि संजीवन मणि से उसके पिता पुन: जीवित हो जाएंगे तो वह उस मणि के खोज में निकला। वह मणि शेषनाग के पास थी। उसकी रक्षा का भार उन्होंने धृतराष्ट्र नाग को सौंप था। ब्रभुवाहन ने जब धृतराष्ट्र से वह मणि मागी तो उसने देने से इंकार कर दिया। तब धृतराष्ट्र एवं ब्रभुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ और ब्रभुवाहन ने धृतराष्ट्र से वह मणि छीन ली। इस मणि के उपयोग से अर्जुन पुनर्जीवित हो गए।

कालिया नाग - श्रीमद्भागवत के अनुसार कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं ओर निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं ओर चला गया।
22:07

जानिए ज्ञानेश्वर मंदिर उज्जैन का रोचक तथ्य क्या हैं के सी शर्मा*


नागचंद्रेश्वर मंदिर (उज्जैन) से जुड़े रोचक तथ्य अगर नहीं तो जानिए इस कहानी में हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परम्परा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है। नागचंद्रेश्वर मंदिर जो उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं इस मंदिर में रहते हैं।

भगवान शिव के इस रुप को नागचन्द्रेश्वर महादेव कहा जाता है. यहां की परंपरा के अनुसार आम दर्शनार्थी नागचन्द्रेश्वर महादेव का दिव्य दर्शन वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी पर्व के दिन ही कर पाते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। माना जाता है कि पूरी दुनिया में यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं।

मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया।

मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सान्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो 

अतः वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं।

कहते हैं इस मंदिर में दर्शन करने से मनुष्य के सभी प्रकार के सर्प दोष हट जाते हैं इसलिए नाग पंचमी के दिन यहां लाखों की संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए एक दिन पहले ही रात 12 बजे मंदिर के पट खोल दिए जाते हैं। दूसरे दिन नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होती है और मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां मंदिर में नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
22:05

जानिए शनिदेव के धाम शनि शिंगणापुर का रहस्य-के सी शर्मा

देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्व प्रसिद्ध इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ स्थित शनिदेव की पाषाण प्रतिमा बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है।

शिंगणापुर के इस चमत्कारी शनि मंदिर में स्थित शनिदेव की प्रतिमा लगभग पाँच फीट नौ इंच ऊँची व लगभग एक फीट छह इंच चौड़ी है। देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ आकर शनिदेव की इस दुर्लभ प्रतिमा का दर्शन लाभ लेते हैं। यहाँ के मंदिर में स्त्रियों का शनिदेव प्रतिमा के पास जाना वर्जित है। महिलाएँ दूर से ही शनिदेव के दर्शन करती हैं।

सुबह हो या शाम, सर्दी हो या गर्मी यहाँ स्थित शनि प्रतिमा के समीप जाने के लिए पुरुषों को स्नान कर पीताम्बर धोती धारण करना अत्यावश्यक है। ऐसा किए बगैर पुरुष शनिदेव की प्रतिमा का स्पर्श नहीं कर सकते हैं। इस हेतु यहाँ पर स्नान और वस्त्रादि की बेहतर व्यवस्थाएँ हैं।

यदि आप पहली बार शनि शिंगणापुर जा रहे हैं तो यहाँ भक्तों की श्रद्धा व विश्वास का नजारा देखकर आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे। केवल बड़े-बुजुर्ग ही नहीं अपितु तीन-चार वर्ष के बालक भी इस शीतल जल से स्नान कर शनिदेव के दर्शन के लिए अपने पिता के साथ चल पड़ते हैं। शनि मंदिर में दर्शन करने वाला हर पुरुष श्रद्धालु आपको यहाँ पीताम्बरधारी ही नजर आएगा।

शनि मंदिर का एक विशाल प्रांगण है जहाँ दर्शन के लिए भक्तों की कतारें लगती हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा ‍शनिदेव के दर्शनों की बेहतर व्यवस्थाएँ की गई हैं, जिससे भक्तों को यहाँ दर्शन के लिए धक्का-मुक्की जैसी किसी भी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है। जब आप यहाँ स्थित विशाल शनि प्रतिमा के दर्शन करेंगे तो आप स्वयं सूर्यपुत्र शनिदेव की भक्ति में रम जाएँगे। मान्यता है कि यहां प्रत्येक शनिवार, शनि जयंती व शनैश्चरी अमावस्या आदि अवसरों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

शनिदेव हैं मंगलकारी :

आमतौर पर शनिदेव को लेकर हमारे मन में कई भ्रामक धारणाएँ हैं। जैसे कि शनिदेव बहु‍त अधिक कष्ट देने वाले देवता हैं, लेकिन यदि सच कहें तो ऐसा नहीं है। यदि शनि की आराधना ध्यानपूर्वक की जाए तो शनिदेव से उत्तम कोई देवता ही नहीं है। शनि की जिस पर कृपा होती है उस व्यक्ति के लिए सफलता के सारे द्वार खुल जाते हैं।

शिंगणापुर की खासियत :

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शिंगणापुर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजौरी नहीं है। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज उसकी सजा स्वयं दे देते हैं। जब गाँव वालों पर शनिदेव की कृपा है व चोरी का भय ही नहीं है तो दरवाजे, खिड़की, अलमारी व तिजौरी का क्या काम है?
22:03

जाने नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना? जानिए इसके पीछे का रहस्य-के सी शर्मा


जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। आज हम आपको उसी के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार है..

इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना
मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं।

शिव के ही अवतार हैं नंदी
शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। भगवान शिव ने शिलाद मुनि को ये वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद मुनि भूमि जोत रहे थे, उन्हें एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। एक दिन मित्रा और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।
22:01

क्या आप जानते है कि कुरुक्षेत्र में ही क्यों हुआ महाभारत युद्ध के सी शर्मा*

जब महाभारत युद्ध होने का निश्चय हो गया तो उसके लिये जमीन तलाकिश की जाने लगी। श्रीकृष्ण जी बढ़ी हुई असुरता से ग्रसित व्यक्तियों को उस युद्ध के द्वारा नष्ट कराना चाहते थे। पर भय यह था कि यह भाई-भाइयों का, गुरु शिष्य का, सम्बन्धी कुटुम्बियों का युद्ध है। एक दूसरे को मरते देखकर कहीं सन्धि न कर बैठें इसलिए ऐसी भूमि युद्ध के लिए चुननी चाहिए जहाँ क्रोध और द्वेष के संस्कार पर्याप्त मात्रा में हों। 

उन्होंने अनेकों दूत अनेकों दिशाओं में भेजे कि वहाँ की घटनाओं का वर्णन आकर उन्हें सुनायें। एक दूत ने सुनाया कि अमुक जगह बड़े भाई ने छोटे भाई को खेत की मेंड़ से बहते हुए वर्षा के पानी को रोकने के लिए कहा। पर उसने स्पष्ट इनकार कर दिया और उलाहना देते हुए कहा-तू ही क्यों न बन्द कर आवे? मैं कोई तेरा गुलाम हूँ। इस पर बड़ा भाई आग बबूला हो गया। 

उसने छोटे भाई को छुरे से गोद डाला और उसकी लाश को पैर पकड़कर घसीटता हुआ उस मेंड़ के पास ले गया और जहाँ से पानी निकल रहा था वहाँ उस लाश को पैर से कुचल कर लगा दिया। इस नृशंसता को सुनकर श्रीकृष्ण ने निश्चय किया यह भूमि भाई-भाई के युद्ध के लिए उपयुक्त है। यहाँ पहुँचने पर उनके मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ेगा उससे परस्पर प्रेम उत्पन्न होने या सन्धि चर्चा चलने की सम्भावना न रहेगी। वह स्थान कुरुक्षेत्र था वहीं युद्ध रचा गया। 

महाभारत की यह कथा इंगित करती है की शुभ और अशुभ विचारों एवं कर्मों के संस्कार भूमि में देर तक समाये रहते हैं। इसीलिए ऐसी भूमि में ही निवास करना चाहिए जहाँ शुभ विचारों और शुभ कार्यों का समावेश रहा हो।
21:59

जानिए महाभारत : पाताल लोक में कैसे बचाई थी नागों ने भीभ की जान ऐसे बने थे महाबलशाली-के सी शर्मा

 

हस्तिनापुर की राजगद्दी को लेकर महाभारत युद्ध हुआ था. धर्म और अधर्म की इस लड़ाई में बहुत से अनुचित तरीकों का प्रयोग किया गया था. धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन जो कभी धर्म के रास्ते पर नहीं चला. उसने हमेशा राज्य पर राज करने के लिए गलत तरीका ही अपनाया. वो हमेशा से पांच पांडवों से से वह बेहद नफरता किया करता था और हर समय उन्हें मारने का षड्यंत्र रचा करता था. पांच पांडवों में से भीम को वह अपना परम शत्रु मानता था.

दुर्योधन ने भीम को मारने के लिए रचा षड्यंत्र
दुर्योधन मलयुद्ध में माहिर थे. भीम भी इस खेल में परांगत थे. बचपन से ही भीम दुर्योधन को इस खेल में चुनौती देते आए थे. इस कारण भी दुर्योधन बचपन से ही भीम से अधिक शत्रुता रखता था. दुर्योधन का ऐसा मानना था कि यदि किसी तरह से वह भीम को खत्म कर दे तो इसके बाद युधिष्ठिर, अर्जुन और सभी भाइयों को बंदी बनाकर संपूर्ण राज्य पर राज करेगा. मामा शकुनि दुर्योधन को इसके लिए लगातार प्रेरित करता रहता था. इसके ही चलते दुर्योधन ने भीम को कालकूट विष देने की योजना बनाई.

भीम को मारने के लिए दुर्योधन ने दिया विष
शकुनि के प्रोत्साहित करने के बाद दुर्योधन ने एक बार भीम को जहर देकर मारने की योजना बनाई. इसके लिए दुर्योधन ने पूरा एक षड्यंत्र रचा. दुर्योधन सभी पांडवों को जल विहार में आनंद करने के लिए बुलाया इसके लिए दुर्याेधन ने गंगा नदी के किनारे सभी लोगों के रहने रूकने और खाने पीने के लिए विशेष इंतजाम कराए. भीम को मारने के लिए दुर्याेधन ने उदयनक्रीडन नाम का स्थल विशेष तौर पर विकसित कराया. जिसमें पांडवों के लिए हर सुविधा की व्यवस्था की गई. दुर्योधन के आग्रह करने पर सभी पांडव यहां पर पहुंचे. भीम के लिए दुर्योधन ने विशेष पकवान बनवाए लेकिन इसमें उसने कालकूट नाम का खतरनाक विष मिला दिया. इस विष के सेवन से भीम बेहोश हो गए. दुर्योधन ने भीम को रस्सियों से बांधकर गंगा नदी में धकेल देता है.

भीम पर सांपों ने बोला हमला
भीम बेहोशी की हालत में पाताल लोक जिसे नागलोक भी कहा जाता है वहां पर पहुंच गए. बेहोशी के हालत में भीम पर नागों ने हमला बोल दिया. सांपों के डसने के कारण भीम का जहर कम होने लगा. सांपों के डसने के कारण भीम का पूरा जहर उतर गया और वे होश में आ गए. होश में आते ही भीम को नागलोक के राजा वासुकी के सामने पेश किया गया. जहां पर वासुकी के साथी सर्प आर्यक ने भीम को पहचान लिया. आर्यक भीम के नाना के नाना थे. नाग राजा वासुकी को जब यह बात पता चलती है तो वो बहुत प्रसन्न होते हैं और भीम को उपहार देने का आदेश देते हैं.

इस तरह से भीम को प्राप्त हुई हजारों हाथियों की शक्ति
वासुकी के उपहार देने के आदेश पर आर्यक कहते हैं कि महाराज ये धन और रत्न लेकर क्या करेंगे आपका आदेश हो तो जो विष भीम के शरीर में शेष रह गया उसे पीनें की आज्ञा दें ऐसा करने से भीम के भीतर हजारों हाथियों का बल आ जाएगा. वासुकी आर्यक को जहर पीने की आज्ञा देते हैं. इसके बाद भीम शक्तिशाली बन जाते हैं.
21:57

जानिए मां वैभव लक्ष्मी कैसे अपने भक्तों की करती हैं सहायता पढ़िए ये व्रत कथा-के सी शर्मा


किसी शहर में अनेक लोग रहते थे. सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे. किसी को किसी की परवाह नहीं थी. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए. शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं. शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे. इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे.

ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी. शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी. उनका पति भी विवेकी और सुशील था. शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे. शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे.

देखते ही देखते समय बदल गया. शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा. अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा. इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया. यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी. शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया. दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया.

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी. वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी. उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था. उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था. उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था. उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया. शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था. अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया.

मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं.' इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी. फिर मांजी बोलीं- 'तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई.'

मांजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया. उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी. मांजी ने कहा- 'बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं. धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता.'

मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई.

कहानी सुनकर माँजी ने कहा- 'कर्म की गति न्यारी होती है. हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं. इसलिए तू चिंता मत कर. अब तू कर्म भुगत चुकी है. अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे. तू तो माँ लक्ष्मीजी की भक्त है. माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं. वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं. इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर. इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.'

शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई. मांजी ने कहा- 'बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है. उसे 'वरदलक्ष्मी व्रत' या 'वैभव लक्ष्मी व्रत' कहा जाता है. यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है. वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है.'

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं.

दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ. यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ. उनके मन में 'वैभवलक्ष्मी व्रत' के लिए श्रद्धा बढ़ गई.
21:55

जाने कैसे उत्पन्न हुआ है भगवान शिव से वास्तु पुरुष के सी शर्मा

भगवान शिव के पसीने से वास्तु पुरुष की उत्पत्ति हुई है। भगवान शिव का पसीना धरती पर गिरा तो उससे ही वास्तु पुरुष उत्पन्न होकर जमीन पर गिरा। वास्तु पुरुष को प्रसन्न करने के लिए वास्तु शास्त्र की रचना की गई। वास्तु पुरुष का असर सभी दिशाओं में रहता है। इसके बाद वास्तु पुरुष के कहने पर ब्रह्मा जी ने वास्तु शास्त्र के नियम बनाए। जिनके अनुसार कोई भी मकान या इमारत बनाई जाती है। इसके बाद भूमि पूजन से गृह प्रवेश तक हर मौके पर वास्तु पुरुष की पूजा का महत्व है। जिसके साथ ही भगवान शिव, गणेश और ब्रह्मा जी की पूजा जरूर करनी चाहिए। इससे भूमि शुद्ध हो जाती है और वहां जगह पर रहने वाले लोग किसी भी तरह परेशान नहीं होते।

भूमि पूजन से गृह प्रवेश तक, वास्तु पूजा जरूरी
पुराणों के अनुसार किसी भी तरह के निर्माण कार्य के मौके पर वास्तु पुरुष की पूजा की जाती है। ऐसा करने से शुभ फल मिलता है। इसलिए सबसे पहले भूमि पूजन के समय वास्तु देवता की पूजा की जाती है। इसके बाद नींव खोदते समय, मुख्य द्वार लगाते समय और गृह प्रवेश के दौरान भी वास्तु पुरुष की पूजा करने का विधान बताया गया है। इससे उस घर में रहने वाले लोग हर तरह की परेशानियों से दूर रहते हैं। उनको हर तरह का सुख और समृद्धि भी मिलती है।

वास्तु पुरुष हैं भवन के मुख्य देवता
वास्तु पुरुष को भवन का प्रमुख देवता माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार वास्तु पुरुष भूमि पर अधोमुख स्थित है। अधोमुख यानी उनका मुंह जमीन की तरफ और पीठ उपर की ओर हैं। सिर ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में, पैर नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम दिशा में है। इस तरह उनकी भुजाएं पूर्व और उत्तर में हैं।

ब्रह्माजी ने बनाए वास्तु शास्त्र के नियम
कई पुराणों में वास्तु शास्त्र के नियम बताए गए हैं लेकिन इनके बारे में खासतौर से मत्स्य पुराण में बताया गया है। इसके अनुसार वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ही ब्रह्माजी ने वास्तु शास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी जानकारी पुराणों के जरिये अन्य ग्रंथों से होते हुए आम लोगों तक पहुंची।
21:52

जाने आखिर क्यों प्रिय है भगवान शिव को काशी नगरी-के सी शर्मा


देवों के देव महादेव का संसार के कण-कण में विराजमान हैं. लेकिन कहा जाता है कि भगवान शिव को काशी नगरी बहुत प्रिय है। लोग तो वाराणसी को भगवान शिव की ही नगरी कहते हैं। क्योंकि समूची काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजमान है। भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में गंगा नदी के तट पर विद्यमान है।

काशी में जो भी आ गया वो भोलेनाथ के रंग में रंग जाता है। हर दिन भगवान शिव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी लाइन लगी रहती है। लेकिन सावन आते ही भगवान शिव के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इस मंदिर के दर्शन को मोक्ष प्रदायी माना जाता है। इस मंदिर का दर्शन करने वालों में आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वांमी विवेकानंद, स्वाआमी दयानंद, गोस्वारमी तुलसीदास जैसे बड़े महापुरुष रहे।

क्या है मान्यता-
हिंदू धर्म में काशी विश्वनाथ का अत्यधिक महत्व है। कहते हैं काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। मान्यता है कि जिस जगह ज्योतिर्लिग स्थापित है वह जगह लोप नहीं होती और जस का तस बना रहती है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु इस नगरी में आकर भगवान शिव का पूजन और दर्शन करता है उसको समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

इतिहास-
इस मंदिर का 3,500 वर्षो का लिखित इतिहास है। इस मंदिर का निर्माण कब किया गया था इसकी जानकारी तो नहीं है लेकिन इसके इतिहास से पता चलता है कि इस पर कई बार हमले किए गए लेकिन उतनी ही बार इसका निर्माण भी किया गया। बार-बार के हमलों और पुन: निर्मित किये जाने के बाद मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था।

पौराणिक कथा-
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग के संबंध में भी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत रहने लगे तब पार्वती जी इस बात से नाराज रहने लगीं। उन्होंने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। अपनी प्रिया की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़ कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे। इस तरह से काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ ज्योतिर्लिग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया।

माना यह भी जाता है कि काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए।

हिंदुओं का सबसे पूज्य मंदिर-
काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदू मंदिरों में अत्यंत प्राचीन है। मंदिर के शिखर पर स्वर्ण लेपन होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। इस पर महाराजा रणजीत सिंह ने अपने शासन काल के दौरान स्वर्ण लेपन करवाया था। मंदिर के अंदर चिकने काले पत्थर से बना हुआ शिवलिंग है। मंदिर के ठीक बगल में ज्ञानवापी मस्जिद है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी (23 मार्च) को यहां श्रृंगारोत्सव का आयोजन होता है।

काशी विश्वनाथ की भव्य आरती-

काशी विश्वनाथ में की जाने वाली आरती विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां दिन में पांच बार आरती आयोजित की जाती है। मंदिर रोजाना 2.30 बजे खुल जाता है। बाबा विश्वनाथ के मंदिर में तड़के सुबह की मंगला आरती के साथ पूरे दिन में चार बार आरती होती है। भक्तों के लिए मंदिर को सुबह 4 से 11 बजे तक के लिए खोल दिया जाता है फिर आरती होने के पश्चात दोपहर 12 से सायं 7 बजे तक दोबारा भक्तजन मंदिर में पूजा कर सकते हैं। सायं सात बजे सप्त ऋषि आरती का वक्त होता है। उसके बाद 9 बजे तक श्रद्धालु मंदिर में आ जा सकते हैं। 9 बजे भोग आरती शुरू की जाती है इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में प्रवेश वर्जित है। रात 10.30 बजे शयन आरती का आयोजन किया जाता है। मंदिर रात 11 बजे बंद कर दिया जाता है।
21:50

क्या आप जानते है भगवान श्री कृष्ण सांवरे होने का राज-के सी शर्मा

भगवान श्री कृष्ण का एक नाम सांवरा है। इस नाम का मतलब है सांवले रंग का, जबकि भगवान श्री कृष्ण जन्म से सांवरा यानी सांवले नहीं थे। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार गोपाल बचपन में गोरे रंग के थे। लेकिन इनके जीवन में एक ऐसी घटना हुई जिससे इनका 
वर्ण नीला हो गया। 

पुराणों की कथा के अनुसार एक बार कालिया नामक नाग अपने परिवार के साथ यमुना में आकर रहने लगा। इससे गोकुलवासियों के प्राण संकट में पड़ गए। गोकुलवासी गांव छोड़कर कहीं और जाने की योजना तक बनाने लगे। ऐसे में गोकुल वासियों की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने अपने प्राण संकट में डालकर कालिया दह में प्रवेश किया। कालिया नाग को भगवान ने युद्घ में परास्त कर दिया लेकिन इसके मुख से निकलने वाले विष के प्रभाव से श्रीकृष्ण का शरीर नीलवर्ण का हो गया। इसके बाद से भगवान श्री कृष्ण सांवारा कहलाने लगे।

दर्शन और तर्क कहता है कि भगवान का नीला रंग उनके व्यापकता और विशालता को दर्शाने के लिए है। जैसे विशाल समुद्र और अनंत गगन नीला दिखता है उसी प्रकार आदि अनंत भगवान भी नील वर्ण के दिखाई देते हैं।

Wednesday, 22 July 2020

23:58

जानिए हरियाली तीज, शुभ मुहूर्त और पूजा की विधि-के सी शर्मा


हरियाली तीज का व्रत इस साल 23 जुलाई को रखा जाएगा. सुहागिन महिलाओं और मनचाहे वर की इच्छा रखने वाली कन्याओं के लिए यह व्रत बहुत फलदायी होता है. इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा से भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं. हरियाली तीज भगवान शिव और मां पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है.

हरियाली तीज का शुभ मुहूर्त

श्रावण तृतीया आरम्भ: 22 जुलाई शाम 7 बजकर 23 मिनट

श्रावण तृतीया समाप्त: 23 जुलाई शाम 5 बजकर 4 मिनट तक.

हरियाली तीज पूजा विधि
- इस दिन साफ-सफाई कर घर को तोरण-मंडप से सजायें. मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, भगवान गणेश और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं और इसे चौकी पर स्थापित करें.

- मिट्टी की प्रतिमा बनाने के बाद देवताओं का आह्वान करते हुए षोडशोपचार पूजन करें.

- हरियाली तीज व्रत का पूजन रातभर चलता है. इस दौरान महिलाएं जागरण और कीर्तन भी करती हैं.

- इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं और पूरी विधि-विधान से मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं.

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हरियाली तीज का पौराणिक महत्व
हरियाली तीज पर शिव-पार्वती जी की पूजा और व्रत किया जाता है. शिव पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था. उत्तर भारतीय राज्यों में तीज का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.

मान्यता है कि इस दिन विवाहित महिलाओं को अपने मायके से आए कपड़े पहनने चाहिए और साथ ही श्रृंगार में भी वहीं से आई वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए. अच्छे वर की मनोकामना के लिए इस दिन कुंवारी कन्याएं भी व्रत रखती हैं.
23:55

शंख का शास्त्र धर्म और ज्योतिष में उपयोग-के सी शर्मा



स्वास्थ्य में महत्व 

१-शंख की आकृति और पृथ्वी की संरचना समान है नासा के अनुसार - शंख बजाने से खगोलीय ऊर्जा का उत्सर्जन होता है जो जीवाणु का नाश कर लोगो को ऊर्जा व् शक्ति का संचार करता है 

२-शंख में १००% कैल्शियम है इसमें रात को पानी भर के पीने से कैल्शियम की पूर्ति होती है 

३-शंख बजाने से योग की तीन क्रियाए एक साथ होती है - कुम्भक, रेचक, प्राणायाम 

४-शंख बजाने से हृदयाघात, रक्तचाप की अनियमितता, दमा, मंदाग्नि में लाभ होता है 

५-शंख बजाने से फेफड़े पुष्ट होते है 

६-शंख में पानी रख कर पीने से मनोरोगी को लाभ होता है उत्तेजना कम होती है 

७-शंख की ध्वनि से दिमाग व् स्नायु तंत्र सक्रिय रहता है 

*धार्मिक महत्व :-*

८ दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी स्वरुप कहा जाता है इसके बिना लक्ष्मी जी की आराधना पूरी नहीं मानी जाती 

९ समुन्द्र मंथन के दौरान १४ रत्नो में से ये एक रत्न है सुख- सौभाग्य की वृद्धि के लिए इसे अपने घर में स्थापित करे 

१०  शंख में दूध भर कर रुद्राभिषेक करने से समस्त पापों का नाश होता है 

११ घर में शंख बजाने से नकारात्मक ऊर्जा का व् अतृप्त आत्माओ का वास नहीं होता 

१२ दक्षिणावर्ती शंख से पितरो का तर्पण करने से पितरो की शांति होती है 

१३ शंख से स्फटिक के श्री यन्त्र अभिषेक करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है 

*ज्योतिषीय महत्व :-*

१४ सोमवार को शंख में दूध भर कर शिव जी को चढाने से चन्द्रमा ठीक होता है 

१५ मंगलवार को शंख बजा कर सुन्दर काण्ड पढ़ने से मंगल का कुप्रभाव काम होता है 

१६ शंख में चावल भर के रखे और लाल कपडे में लपेट कर तिजोरी में रखये माँ अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है 

१७ बुधवार को शालिग्राम जी का शंख में जल व तुलसी जी डाल कर अभिषेक करने से बुध ग्रह ठीक होता है 

१८शंख को केसर से तिलक कर पूजा करने से भगवन विष्णु व् गुरु की प्रसन्ता मिलती है 

१९ शंख सफ़ेद कपड़े में रखने से शुक्र ग्रह बलवान होता है 

२० शंख में जलभर कर सूर्ये देव को अर्घ्य देने से सूर्य देव प्रस्सन होते है।
साभार
23:52

सावन : महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है घृष्णेश्वर मंदिर, यहां दर्शन करने से दूर होते हैं हर कष्ट-के सी शर्मा

घृष्णेश्वर या घुष्मेश्वर मंदिर भगवान शिन के 12 ज्योतिर्लिंगों मे से एक है. महादेव का ये मंदिर महाराष्ट्र में औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस मंदिर का अंतिम जीर्णोद्धार 18 वीं शताब्दी में इंदौर की महारानी पुण्यश्लोका देवी अहिल्याबाई होलकर के द्वारा करवाया गया था. शहर के शोर-शराबे से दूर स्थित यह मंदिर शांति एवं सादगी से परिपूर्ण माना जाता है. हर साल देश-विदेशों से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं तथा आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं. वहीं में सावन के महीने में यहा पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है. शिव भक्तों की इस ज्योतिर्लिंग को लेकर अट्टू आस्था है. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवमहापुराण में भी आता है. ऐसा माना जाता है कि मंदिर के दर्शन करने से सब प्रकार के अभीष्ट प्राप्त होते हैं, नि:संतानों को संतान की प्राप्ति होती है. 

पौराणिक कथा
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि यहां आने वाले की हर व्यक्ति की भगवान शिव मनोकामना पूर्ण करते हैं. एक कथा के अनुसार देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा अपनी पत्नी सुदेहा के साथ निवास करते थे. ये दोनों दंपति एक दूसरों को बहुत प्रेम करते थे. सुधर्मा एक तेजस्वी ब्राह्मण थे. इन दोनों का जीवन आराम से गुजर रहा था. लेकिन इन लोगों को एक कष्ट था कि इनकी कोई संतान नहीं थी. सुधर्मा ज्योतिष शास्त्र के भी विद्वान थे. उन्होंने पत्नी की जन्म कुंडली में बैठे ग्रहों का जब अध्ययन किया तो पाया कि सुदेहा संतानोत्पत्ति नहीं कर सकती है. जबकि सुदेहा की संतान की प्रबल इच्छा थी. लेकिन इस बात को जानकर उसे बहुत दुख हुआ. एक दिन सुदेहा ने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन घुष्मा से दूसरा विवाह करने की बात कही. पहले तो इस सुधर्मा ने सुझाव को नकार दिया लेकिन जब पत्नी ने दवाब बनाया तो झुकना पड़ा. कुछ दिन बाद सुधर्मा पत्नी की छोटी बहन से विवाह कर घर ले आए.

घुष्मा शिव की परम भक्त थी. कुछ दिनों बाद उसने सुंदर बालक को जन्म दिया. पुत्र होने पर दोनों प्रसन्न रहने लगे. लेकिन सुदेहा के मन में नकारात्मक विचार पनपने लगे. इसी के चलते उसने एक दिन घुष्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला और शव को तालाब में फेंक दिया. इसी तलाव में घुष्मा भगवान शिव के पार्थिव शिवलिंगों को बहाती थी.

पुत्र की मौत पर परिवार में शोक की लहर छा गयी. घुष्मा को भगवान शिव पर पूरा विश्वास था. रोज की भांति घुष्मा ने उसी तलाव के किनारे 100 शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की पूजा प्रारंभ की, थोड़ी देर बाद ही तालाब से उसका पुत्र आता दिखाई दिया. घुष्मा ने जैसे ही पूजा समाप्त की भगवान शिव प्रकट हुए और बहन को दंड देने की बात कही. लेकिन घुष्मा ने ऐसा करने की भगवान से प्रार्थना की. इस बात से शिवजी अत्यंत प्रसन्न हुए और वरदान मांगने का कहा. तब घुष्मा ने भगवान शिव से इसी स्थान पर निवास करने के लिए कहा. भगवान ने कहा ऐसा ही होगा. तब से यह स्थान घुष्मेश्वर के नाम से जाना जा रहा है.
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इस मंत्र से करें भगवान गणेश की पूजा, हर दुख होगा दूर-के सी शर्मा



हिंदू धर्म में कोई भी पूजा पाठ या शुभ काम बिना गणेश भगवान  की पूजा कर या आरती उतारे शुरू नहीं की जाती. गणपति जी को प्रथम पूज्य देवता की उपाधि प्राप्त है. इसलिए हर शुभ कार्य में सबसे पहले उन्हें याद किया जाता है. हिन्दू धर्म में सप्ताह का हर दिन खास है और उसका अलग महत्व है. बुधवार का जहां बुध ग्रह से संबंध माना जाता है. वहीं शास्त्रों में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है. माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा कर उनकी कृपा पाई जा सकती है. मान्यता के अनुसार, बुधवार के दिन विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा करने से विशेष लाभ होता है.

इस दिन 'गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्टगणेशाय महायक्षायायं बलिः' मंत्र के जप करने से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी हो जाती है. गणेश जी का श्रृंगार सिंदूर से ही किया जाता है, इससे लोगों की समस्त परेशानियां दूर होती हैं. आइए आपको कुछ उपायों के बारे में बताते हैं जिन्हें अपनाने से सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं और धन की प्राप्ति होती है, यदि इन उपायों को बुधवार के दिन किया जाए तो अच्छे फल की प्राप्ति होती है. साथ ही बुधवार को गणेश चालीसा का पाठ भी जरूर करें.

बुधवार को क्या करें
बुधवार के दिन एक अमरूद का पौधा लेकर भगवान गणेश के सामने रखें. श्रीगणेश के चरणों में देसी घी का दीपक जलाएं. इसके बाद उस अमरूद के पौधे को किसी मिट्टी के गमले में लगा दें और उसकी देखभाल करें. जब इस पौधे पर पहला फल आए तो उस फल को भगवान गणेश को अर्पित कर दें. माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश सभी दुख दूर करते हैं. इसके अलावा समय के साथ साथ सभी कष्ट धीरे-धीरे खत्म होने लगते हैं. इस अमरूद के पौधे को भगवान गणेश के सामने रखकर 'गं हं क्लौं ग्लौं उच्छिष्टगणेशाय महायक्षायायं बलिः' मंत्र का जाप भी करें.

जरूर करें ये उपाय
भगवान गणेश को घी और गुड़ का भोग लगाना चाहिए. भोग लगाने के बाद घी-गुड़ गाय को खिला देनी चीहिए. ऐसा करने से घर में धन व खुशहाली आती है. अगर घर में नकारात्मक शक्तियों का वास है, तो घर के मंदिर में सफेद रंग के गणपति की स्थापना जरूर करनी चाहिए. मान्यता है कि इससे सभी प्रकार की बुरी शक्तियों का नाश होता है. बुध ग्रह खराब चल रहा तो किसी मंदिर में जाकर हरा मूंग दान करें. इससे बुध ग्रह का दोष शांत होता है. बुधवार के दिन सुबह स्नान कर गणेश जी को दूर्वा की 11 या 21 गांठ अर्पित करें. ऐसा करने से कार्यों के जल्द ही शुभ फल मिलने लगेंगे.