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Monday, 7 October 2019

06:58

महाभारत का यह सार्थक प्रसंग अंतर्मन को लगा छूने - के सी शर्मा






एडिटर-के सी शर्मा
का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है
महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी .... !
गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा
"देवव्रत" (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला .... !
तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" .... !!
भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी ,  बोले , " आओ देवकीनंदन .... !  स्वागत है तुम्हारा .... !!
मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" .... !!
कृष्ण बोले ,  "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" .... !
भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ... ?
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" .... !
कृष्ण चुप रहे .... !
भीष्म ने पुनः कहा ,  "कुछ पूछूँ केशव .... ?
बड़े अच्छे समय से आये हो .... !
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " .... !!
कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ....!
एक बात बताओ प्रभु !  तुम तो ईश्वर हो न .... ?
कृष्ण ने बीच में ही टोका ,  "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं ...  मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह ... ईश्वर नहीं ...."
भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े .... !  बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे .... !! "
कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले ....  " कहिये पितामह .... !"
भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया !  इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या .... ?"
  "किसकी ओर से पितामह .... ?  पांडवों की ओर से .... ?"
" कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया !  पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था .... ?  आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या .... ?  यह सब उचित था क्या .... ?"
इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह .... !
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ..... !!
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन .... !!
मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह .... !!
"अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण .... ?
 अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है .... !
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण .... !"
"तो सुनिए पितामह .... !
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ .... !
 वही हुआ जो हो होना चाहिए .... !"
"यह तुम कह रहे हो केशव .... ?
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ....?  यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ..... ? "
 "इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है .... !
 हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है .... !!
 राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था .... !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह .... !!"
" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो .... !"
" राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह .... !
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था .... !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ..... !  तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे .... !  उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
 इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया .... ! किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं .... !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"

 "तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव .... ?
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा .... ?
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ..... ??"
" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !
कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा .... !
  वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा ....  नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !
जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ  सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों,  तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह.... !
तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय .... !
भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह..... !!"
"क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव .... ?
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ..... ?"
 "सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !
ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !*केवल मार्ग दर्शन करता है
  सब मनुष्य को ही स्वयं  करना पड़ता है .... !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न .... !
तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ..... ?
सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
यही प्रकृति का संविधान है .... !
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से .... ! यही परम सत्य है ..... !!"
भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे .... !
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी .... !
 उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण .... !"
कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था.... !
जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ  सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ....।।

*धर्मों रक्षति रक्षितः*
06:51

कन्या पूजन से होता हैं वास्तुदोष विध्न और शत्रुओं का नाश जाने की सही विधि







एडिटर- के सी शर्मा की रिपोर्ट
 शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या kanya को कुमारी कहा गया है । कुमारी के पूजन से सभी तरह के दुखों और दरिद्रता का नाश होता है ।तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति माना गया है । त्रिमूर्ति के पूजन poojan से धन लाभ होता है ।
चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते है । कल्याणी के पूजन poojan से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है । पांच वर्ष की कन्या kanya को रोहिणी कहा गया है । माँ के रोहणी स्वरूप की पूजा करने से जातक के घर परिवार से सभी रोग दूर होते है।
छः वर्ष की कन्या kanya को काली कहते है । माँ के इस स्वरूप की पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि, यश और सभी क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है ।सात वर्ष की कन्या को चंडिका कहते है । माँ चण्डिका के इस स्वरूप की पूजा करने से धन, सुख और सभी तरह की ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है ।
आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कहते है । शाम्भवी की पूजा करने से युद्ध, न्यायलय में विजय और यश की प्राप्ति होती है नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा का स्वरूप मानते है । माँ के इस स्वरूप की अर्चना करने से समस्त विघ्न बाधाएं दूर होती है, शत्रुओं का नाश होता है और कठिन से कठिन कार्यों में भी सफलता प्राप्त होती है ।दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा स्वरूपा माना गया हैं। माँ के इस स्वरूप की आराधना करने से सभी मनवाँछित फलों की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार के सुख प्राप्त होते है ।इसीलिए नवरात्र के इन नौ दिनों तक प्रतिदिन इन देवी स्वरुप कन्याओं को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य से भेंट देना अति शुभ माना जाता है। इन दिनों इन नन्ही देवियों को फूल, श्रंगार सामग्री, मीठे फल (जैसे केले, सेब,नारियल आदि), मिठाई, खीर , हलवा, कपड़े, रुमाल,रिबन, खिलौने, मेहंदी आदि उपहार में देकर मां दुर्गा की अवश्य ही कृपा प्राप्त की जा सकती है ।
इन उपरोक्त रीतियों के अनुसार माता की पूजा अर्चना करने से देवी मां प्रसन्न होकर हमें सुख, सौभाग्य,यश, कीर्ति, धन और अतुल वैभव का वरदान देती है।
06:19

नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व और सही विधि







के सी शर्मा
नवरात्र की पूजा में कुमारी कन्या के पूजन का विधान शास्त्रों में बताया गया है।श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार इस अवधि में कुमारी कन्या के पूजन से मातारानी प्रसन्न होती है ।कुमारी कन्या के पूजन में 2 वर्ष से लेकर 9 वर्ष तक की कन्या के पूजन का विधान है ।प्रतिदिन एक ही कन्या की पूजा की जा सकती है या सामर्थ्य के अनुसार तिथिवार संख्या के अनुसार कन्या की पूजा भी की जा सकती है ।

 यदि ऐसा संभव न हो तो अंतिम दिन नवमी तिथि के जब तक दो चरण समाप्त होजाए तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुमारी कन्या का पूजन करना चाहिए ।

 इस बार 7 अक्टूबर की सुबह 3 बजे से 9 बजे तक तीसरा चरण रहेगा ।
यानि इस अवधि में हवन-पूजन शुरू कर दे, भले वह आगे तक क्यों न चलता रहे । शास्त्रों में कहा गया है कि जितने अधिक लोगों के हितार्थ पूजा की जाती है, उसी के अनुसार दैवी कृपा भी मिलती है । पूजा में संकुचित दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए कुमारी पूजा के क्रम में श्रीमद्देवीभागवत के प्रथम खण्ड के तृतीय स्कंध में उल्लिखित है 2 वर्ष की कन्या 'कुमारी' कही गयी है जिसके पूजन से दुःख-दरिद्रता का नाश, शत्रुओं का क्षय और धन, आयु, एवं बल की वृद्धि होती है ।
इसी प्रकार 3 वर्ष की कन्या 'त्रिमूर्ति' कही गयी है जिसकी पूजा से धर्म,अर्थ, काम की पूर्ति, धन-धान्य का आगमन और पुत्र-पौत्र की वृद्धि होती है । जबकि 4 वर्ष की कन्या 'कल्याणी' होती है जिसकी पूजा से विद्या, विजय, राज्य तथा सुख की प्राप्ति होती है। राज्य पद पर आसीन उपासक 'कल्याणी' की पूजा करे । इसी तरह 5 वर्ष की कन्या 'कालिका' होती है ।
 जिसकी पूजा से शत्रुओं का नाश तथा 6 वर्ष की कन्या 'चंडिका' होती है जिसकी पूजा से धन तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
 7 वर्ष की कन्या 'शाम्भवी' है जिसकी पूजा से दुःख-दारिद्र्य का नाश, संग्राम एवं विविध विवादों में विजय मिलता है जबकि 8 वर्ष की कन्या 'दुर्गा' के पूजन से इहलोक के ऐश्वर्य के  साथ परलोक में उत्तम गति मिलती है और कठोर साधना करने में सफलता मिलती है । इसी क्रम में सभी मनोरथों के लिए 9 वर्ष की कन्या को 'सुभद्रा' और जटिल रोग के नाश के लिए 10 वर्ष की कन्या को 'रोहिणी' स्वरुप मानकर पूजा करनी चाहिए धर्मग्रन्थों में देवी को अलग अलग तिथियों में अलग अलग भोज्य पदार्थ का भोग लगाना चाहिए ।
नवमी को धान का लावा चढ़ाने से लोक-परलोक सुखकर होता है ।
कुमारी कन्या का पूजन षोडशोपचार हो तो अच्छा है वरना मन में शुभ संकल्प लेकर कन्या का चरण धोए, माथे पर बिंदी लगाएं, श्रृंगार सामाग्री दें, माला फूल पहनाने के बाद भोग लगाए जिसमें घर की रसोई में बनी पूड़ी, हलवा, मिष्ठान्न जरूर रहे । आरती कर लें ।
 फल, उपहार एवं दक्षिणा देकर कन्या का चरण स्पर्श पूरा परिवार करें ।

 कन्या की प्रदक्षिणा भी एक बार कर लें ।
यह संक्षिप्त विधि आवश्यक है ।

Sunday, 6 October 2019

09:38

विधि विधान से शारदीय नवरात्रि का विसर्जन करके करें मां को प्रसन्न





शारदीय नवरात्र के शुभ-अनुष्ठान के उद्यापन-विसर्जन तथा पारण भी यथासंभव उचित तरीके से हो तो बेहतर है । इसलिए इन तीनों शब्दों की महत्ता भी समझने की जरूरत है  इस संबन्ध में नवरात्र अवधि में कलश स्थापना करने तथा पूरे नवरात्र अवधि तक व्रत रहने वाले नवमी में उद्यापन करते हैं ।  'उद्यापन' का अर्थ ही है कि कोई कार्य यदि शुरू किया गया तो उसका समापन भी बड़े विधि विधान से हो ।
चूँकि नवरात्र व्रत माता दुर्गा का आशीष पाने के लिए किया  जाता है । दुर्गा का आशय ही असुरों से देवताओं की रक्षा का रहा है, इसलिए आसुरी शक्तियों यथा नकारात्मक शक्तियों से खुद को विरत कर लोकहित में कार्य करने से है ।
इसलिए उद्यापन के वक्त पूरे परिवार एवं शुभचिंतकों के साथ बैठकर दुर्गा की आराधना की जानी चाहिए तथा इसके साथ नवरात्र-अनुष्ठान का समापन किया जाना चाहिए ।

लोक कल्याण के लिए की गई पूजा-प्रार्थना से देवी प्रसन्न जल्दी होती हैं । इसी के साथ विसर्जन के भी विशेष अर्थ होते हैं ।
 विसर्जन का आशय अनुष्ठान की समाप्ति तथा मन में आने वाले कुविचारों से विरत रहने का संकल्प क्योंकि माता की पूजा का उद्देश्य भी यही है ।

    विसर्जन के बारे में विचार कहा गया है कि घर में तथा प्राण-प्रतिष्ठित मन्दिरों एवं शक्तिपीठों में विसर्जन नहीं किया जाता । बल्कि पूजा समाप्ति का संकल्प होता है । देवी-देवताओं से पुनः आगमन की प्रार्थना के साथ स्व-स्थान जाने की प्रार्थना करना चाहिए । विसर्जन तो पूजा-पंडालों में अस्थायी रूप से स्थापित मूर्तियों का होता है ।

    इसके अतिरिक्त पारण का भी आशय व्रत के बाद अन्न ग्रहण करना है । शारदीय नवरात्र में व्रत के पारण के लिए नवमी तिथि के अंतिम चरण का विधान निर्णय सिंधु में दिया गया है और उल्लिखित है नवमी तिथि में पारण करने से कुल की वृद्धि होती है ।
जहां तक दशमी तिथि में व्रत के पारण की बात है वह जो त्रिरात्र व्रत करते हैं यानि नवरात्र के अंतिम तीन दिनों सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी को व्रत रखते हैं, उन्हें नवमी उपरांत दशमी में व्रत का पारण करना चाहिए ।

 पारण में कांसे के बर्तन का निषेध बताया गया है । पारण के दिन मदिरा, मांस, कामोत्तेजक कार्य, झूठ फरेब से व्रत निष्फल होना कहा गया है ।

    इस दृष्टि से शारदीय नवरात्र की नवमी तिथि 7 अक्टूबर को अपराह्न 3.04बजे तक है । इसलिए 7 अक्टूबर को प्रातः काल से लेकर हवन तथा कन्या पूजन कर लेना चाहिए ।
इसके बाद नवमी के अंतिम चरण अपराह्न 3.04बजे तक पारण कर लेना चाहिए ।
जो त्रिरात्रि व्रत यानि सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी व्रत हों, वे 8 अक्टूबर को पारण करें जबकि सिर्फ पहले और अष्टमी को व्रत रखने वाले 7 अक्टूबर को प्रातः अन्न ग्रहण कर सकते हैं ।

 शारदीय नवरात्र में नवमी तिथि के भीतर तथा चैत्र नवरात्र में रामनवमी पड़ने के कारण दशमी में पारण होता है ।
09:04

माता दुर्गा का अष्टम स्वरूप है महागौरी जाने इनको प्रसन्न करने की सही पूजन विधि



माँ महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:
 ध्यान मंत्र
श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥

अर्थात्: मां दुर्गा का आठवां स्वरूप है महागौरी का। देवी महागौरी का अत्यंत गौर वर्ण हैं। इनके वस्त्र और आभूषण आदि भी सफेद ही हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। महागौरी का वाहन बैल है। देवी के दाहिने ओर के ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाएं ओर के ऊपर वाले हाथ में डमरू और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनका स्वभाव अति शांत है।

महागौरी स्वरूप-
महागौरी की चार भुजाएं हैं उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता है। बायीं भुजा में डमरू डम डम बज रही है और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान देती हैं। जो स्त्री इस देवी की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वयं करती हैं। मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं। : माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।
महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से आर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए।

यह है आपके लिए शुभ रंग
महागौरी की पूजा करते समय जहां तक हो सके गुलाबी रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। महागौरी गृहस्थ आश्रम की देवी हैं और गुलाबी रंग प्रेम का प्रतीक है। एक परिवार को प्रेम के धागों से ही गूथकर रखा जा सकते हैं, इसलिए आज के दिन गुलाबी रंग पहनना शुभ रहता है।

आरती
जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥
हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥
चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥
भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥
हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥
सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥
बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥
तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥
शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

🙏माँ महागौरी की कृपा सभी पर सदा बरसती रहे 🙏

Friday, 4 October 2019

07:41

नवरात्रि साधना विधि पंडित विष्णु जोशी के साथ





आज का हिन्दू पंचांग
पं. विष्णु जोशी का राम राम जी
दिनांक 04 अक्टूबर 2019
दिन - शुक्रवार
विक्रम संवत - 2076 (गुजरात. 2075)
शक संवत -1941
अयन - दक्षिणायन
ऋतु - शरद
मास - अश्विन
पक्ष - शुक्ल
तिथि - षष्ठी सुबह 09:35 तक तत्पश्चात सप्तमी
नक्षत्र - ज्येष्ठा दोपहर 12:29 तक तत्पश्चात मूल
योग - सौभाग्य रात्रि 11:46 तक तत्पश्चात शोभन
राहुकाल - सुबह 10:47 से दोपहर 12:16 तक
सूर्योदय - 06:31
सूर्यास्त - 18:23
दिशाशूल - पश्चिम दिशा में
व्रत पर्व विवरण - तप षष्ठी  (ओड़िशा), सरस्वती आवाहन - स्थापन
विशेष - षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
               🌞  हिन्दू पंचांग  🌞

काम धंधे में सफलता एवं राज योग के लिए
🙏🏻 अगर काम धंधा करते समय  सफलता नहीं मिलती हो या विघ्न आते हों तो शुक्ल  पक्ष की अष्टमी हो.. बेल के कोमल कोमल पत्तों पर लाल चन्दन लगा कर माँ जगदम्बा को अर्पण करने से .... मंत्र बोले " ॐ ह्रीं नमः । ॐ श्रीं नमः । " और थोड़ी देर बैठ कर प्रार्थना और जप करने से राज योग बनता है गुरु मंत्र का जप और कभी कभी ये प्रयोग करें नवरात्रियों में तो खास करें | देवी भागवत में वेद व्यास जी ने बताया है।*
           🌞  हिन्दू पंचांग  🌞

नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकते हो तो
🙏🏻 *यदि कोई पूरे नवरात्रि के उपवास-व्रत न कर सकता हो तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तीन दिन उपवास करके देवी की पूजा करने से वह सम्पूर्ण नवरात्रि के उपवास के फल को प्राप्त करता है।
             🌞 हिन्दू पंचांग 🌞

सातवे दिन करें मां कालरात्रि की पूजा
महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप है कालरात्रि। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्रि के सातवे दिन  मां कालरात्रि की पूजा की जाती है।
मां कालरात्रि की आराधना के समय भक्त को अपने मन को भानु चक्र जो ललाट अर्थात सिर के मध्य स्थित करना चाहिए। इस आराधना के फलस्वरूप भानु चक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती है।
➡ उपाय- सप्तमी तिथि को माता को गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाएं तथा दान भी करें। इससे दरिद्रता का नाश होता है।
              हिन्दू पंचांग 

Sunday, 29 September 2019

22:58

आज नवरात्रि के प्रथम दिन होगी मां शैलपुत्री की पूजा






आज से नवरात्रि शुरू हो रहे हैं इसे लेकर देशभर के विभिन्न मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं इसके अलावा घरों में भी कलश स्थापना कर नवरात्रि की तैयारियां जोर शोर से की जा रही हैं मंदिरों के कपाट फूलों की लड़ियों और रंग-बिरंगी झालरों से सुशोभित है इसके अलावा बाजारों में भी पूजा अर्चना की सामग्रियों को खरीदने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है दुकानों पर खड़े होने तक की जगह नहीं है इसके चलते कल शाम तक काफी भीड़भाड़ रही वहीं इसके अलावा सुबह भी लोग दुकानों पर पूजा का सामान खरीदने के लिए पहुंचने लगे साथ ही मंदिरों में साफ सफाई और नवरात्रि की तैयारियां जोर शोर से होती रही है नवरात्रि के पहले दिन रविवार को मां शैलपुत्री का पूजन होगा।


 जिसके तहत मंदिरों में प्रसाद वितरण कीर्तन और 9 दिनों के लिए विशेष कार्यक्रमों का आयोजन सूचीबद्ध किया गया है आपको बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित संकट देवी मंदिर में नवरात्रि की तैयारियां देखने को मिली वहीं नोएडा के सेक्टर 66 ममुरा स्थित हांथी मन्दिर,19 स्थित सनातन धर्म मंदिर ,सेक्टर 20 स्थित हनुमान मंदिर और सेक्टर दो स्थित श्री लाल मंदिर सेक्टर 31 प्राचीन शिव मंदिर सी ब्लॉक मंदिर सेक्टर 40 के मंदिर सेक्टर 48 स्थित शिव मंदिर सेक्टर महादेव मंदिर इसके साथ-साथ शहर के सभी छोटे-बड़े मंदिरों में रविवार तड़के से ही पूजा-अर्चना शुरू हो गई है मान्यता है कि नवरात्रि के पूजन से आत्म शुद्धि होती है इसके साथ-साथ घर से सभी नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती है ।

Saturday, 28 September 2019

09:18

शारदीय नवरात्रि मे इस सुभ मुहूर्त में ही करें कलश स्थापना और पाएं माँ का आशीष



नवरात्रि का पहला दिन  और इस दिन मां की आराधना करने से पहले कलश स्थापना करने का नियम बनाया गया है क्योंकि कलश को गणेश भगवान का स्वरूप माना जाता है इसीलिए किसी भी पूजा से पहले इसकी स्थापना करना बेहद जरूरी है कलश स्थापना करने के बाद सर्वप्रथम भगवान गणेश की वंदना की जाती है इसके विषय में पुराणों में कहा गया है कि जिस स्थान पर कलश की स्थापना करनी हो सबसे पहले उस जगह को गंगाजल से पवित्र कर लेना चाहिए और उस स्थान पर एक लकड़ी का पटरा रखकर और उस पर कुछ बूंद गंगाजल का छिड़काव कर लाल कपड़ा बिछा देना चाहिए इसके बाद भगवान गणेश को याद कर छोटे मिट्टी के पात्र अथवा गमले में जौ बो कर के ऊपर उसके बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए कलश के ऊपर रोली से स्वास्तिक या ओम का चिन्ह बनाने के बाद अंदर आम के पत्ते या अशोक पत्ते उसके मुख पर रखकर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए इसके बाद चुनरी में लपेटकर नारियल को कलश पर रखकर  और दीप प्रज्वलित कर विधि विधान से मां दुर्गा सहित सभी देवताओं का आवाहन करना चाहिए तत्पश्चात कलश स्थापना की जा सकती है।
कलश स्थापना का शुभ समय
मंदिरों और शक्तिपीठों में प्रातः 4:09 से लेकर 5:23 तक है इसके अलावा देवी के मंडे को और घरों में प्रातः 9:59 से लेकर 11:17 तक माना गया है इसलिए इस समय पर ही कोशिश करके मां के लिए कलश स्थापना करनी चाहिए।
05:22

जननी माँ की सेवा के बिना आदि शक्ति दुर्गा की पूजा रहेगी अधूरी




उज्जैन / कोलकाता : कल से आदि शक्ति माँ नव दुर्गा सर्वशक्तिशाली दयालु एवं दैत्यों का संघार करने वाली माँ दुर्गा की उपासना का शुभारम्भ हो रहा है और इन नौ दिनों में हर कोई बढ़ - चढ़ कर माँ दुर्गा की सेवा भाव से भक्ति पूजन करेगा. किन्तु हमारे संस्कृति में हमें जन्म देने वाली माँ को भी पूजनीय स्थान प्रदान किया गया है क्योकि उन्होंने हमें जन्म दिया. और जन्म के बाद हमें संस्कार दिए हमें जीवन जीने की सीख दी. पर हम समझदार और युवा अवस्था में प्रवेश करते ही उस जननी माँ को तो उनके हाल पर छोड़ देते है (कोई वृद्ध आश्रम भेज देता है तो कोई घर में ही नौकरों की तरह बर्ताव करता है तो किसी के पास दो घडी का समय नहीं होता की वो अपने माँ से प्यार से बैठ बात करे उनके सुख और दुःख बाटें.) ये बात हर इंसान जब अपने दिल पर हाथ रख कर पूछेगा की मेने अपने माँ के साथ कैसा व्यवहार किया है तो वह इसमें से कुछ बात तो अपने अस्तित्व में भी पायेगा.
यह बात अखिल भारतीय हिन्दू सेवा दल के राष्ट्रीय सचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार विनायक अशोक लुनिया ने मीडिया के माध्यम से देश वासियों को नवरात्र की शुभकामनाये प्रेषित करते हुए कहा की श्री लुनिया ने आगे कहा की मुझे सोशल मीडिया पर बहुत से लोग बढ़-चढ़ कर माँ बाप पर हो रहे अत्याचार पर बने विडिओ शेयर करते मिल जाते है जिसमे माँ बाप को वृद्ध आश्रम में भेज दिया तो कही उनको घर में ही प्रताड़ित किया जा रहा है, छोटी छोटी सी चीज़ों के लिए तरसाया जा रहा है. मै मानता हूँ की आज महंगाई की मार इस कदर हमारी कमर तोड़ रखी है की आज खर्च बहुत सोच समझ के किया जाता है पर एक तरफ माँ बाप के जरुरी चींजों के लिए पैसे ना होने वाले बच्चों के पास उसी समय पत्नी के लिए या मित्रों के साथ बाहर पार्टी करने के लिए फिजूल पैसे आ जाते है. यहाँ बेहद दुःख लगता है. आज यह बात इसलिए लिख रहा हूँ क्योकि कल से नव दुर्गा की स्थापना हो रही है और वो माँ का स्वरुप है वो माँ हर हर में नहीं आ सकती हमारे हर इंसान को अपना प्यार अपना दुलार नहीं दे सकती इसलिए माँ दुर्गा ने धरती पर अपना प्रतिबिम्ब हमारे बिच हर घर में माँ के रूप में बनाया और हमें माँ के द्वारा हमारे हक़ का प्यार दुलार देने के लिए माँ को धरती पर भेजा. तो क्या हमें उस नवदुर्गा की पूजा करना चाहिए और उनके प्रतिबिम्ब का तिरस्कार करना चाहिए? उनको तरसना चाहिए? क्या उनके बुढ़ापे में हमें उनको प्यार नहीं करना चाहिए? क्या उनके बुढ़ापे में उनको ठोकर मार देना चाहिए? क्या ऐसा करने के बाद आप जब माँ दुर्गा की पूजा करेंगे तब वो आपकी भक्ति से खुश होगी ? नहीं माँ दुर्गा के धरती पर माँ जननी के अवतार को ठुकराने वाले को माँ दुर्गा कभी नहीं बख्शती, माँ तत्काल रूप में आपको सजा ना दे पर आपके किये की सजा आपको निश्चित ही मिलता है तो क्यों न हम माँ दुर्गा की पूजा के पहले माँ जननी की पूजा करें उनके चरणों को छूकर उनसे आशीर्वाद ले, वहीँ साथ ही साथ हम माँ जननी की पूजा कर हम माँ के बाद अपने दूध पर हमें जीवन दान देने वाली 36 कोटि देवी देवताओं के वास् करने वाले महान गौ माता की पूजा कर उनको छारा खिला कर हम माँ दुर्गा की आराधना करें तो माँ दुर्गा भी प्रसन्न होगी क्यों की माँ जननी माँ दुर्गा के प्रतिबिम्ब के रूप में हम सभी के समक्ष मौजूद है तो वहीँ 36 कोटि देवी देवताओं के वास् वाली गौ माता की जब हम सेवा करेंगे तो उनके दिल से निकलने वाला आशीर्वाद स्वयं माँ दुर्गा के आशीर्वाद सामान होगा. इसलिए माँ जननी और गौ माता की पूजा के बाद करें आदि शक्ति की आराधना. श्री लुनिया ने अंत में अपने विचार से किसी को ठेस पहुंचा हो तो क्षमा मांगते हुए कहा की हम सभी एक बार अपने अस्तित्व में झाँक कर अवश्य देखे...

Wednesday, 25 September 2019

18:14

इस बार की नवरात्रि करेगी आपके मन को निर्भय



नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों के पूजा की बड़ी है महत्ता है माना जाता है कि जब हम अपने जीवन में समस्याओं व गतिरोध ओं का सामना करते हैं तो देवी के नौ रूपों की विशेषताएं हमें सही रास्ता दिखाने में मददगार साबित होती हैं जिस कारण से अपनी क्षमताओं पर संदेश करने वाले ईशा और देश रखने वाले तथा चिंतित रहने वाले लोगों को नवदुर्गा आत्मबल देती हैं देवी दुर्गा शक्ति का प्रतीक है जो सभी प्रकार की बुराई और बुरी शक्तियों और बुरे विचारों से हमारी रक्षा करती हैं आमतौर पर देवी को शेर पर सवार दिखाया जाता है या संकेत है साहस और वीरता का जो दुर्गा शक्ति का मूल तत्व है नवदुर्गा यानी दुर्गा शक्ति के नव रूप में बाधाओं या बौद्धिक अवरोधों का सामना करने पर देवी के नौ रूपों की विशेषताओं को याद करने मात्र से आमजन को मदद मिलती है यह विशेष रूप से उन लोगों के लिए अधिक फायदेमंद साबित होता है जो अपनी क्षमताओं पर संदेह करते हैं या नकारात्मक भाव से भरे रहते हैं देवी के नामों के उच्चारण से हमारी चेतना जागृत होती है और मन केंद्रित होता है जिससे हम अपने जीवन में चारों ओर कामयाब होने लगते हैं इसीलिए इस बार की नवदुर्गा का आगमन हमारे जीवन में कई बदलाव लेकर आ रहा है जो हमारे मन को निर्भय बनाएगा और जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और भक्ति से मां की आराधना और पूजा करेगा उसे कामयाब होने से दुनिया की कोई शक्ति रोक नहीं पाएगी इसलिए इस बार के नव दुर्गा पूजा और भक्ति बेहद आवश्यक है।

Monday, 23 September 2019

23:18

मोक्ष दायक होता है पित्र पक्ष में गया तीर्थ जाकर अपने पितरों का पिंडदान करना






शास्त्रों में पित्र पक्ष को गया तीर्थ में जाकर अपने पितरों को पिंडदान करना बेहद शुभ कहा गया है अपने पूर्वजों को नमन करने का यह बेहद शुभ समय होता है क्योंकि अगर हम अपने पितरों को याद करेंगे तो वह हमें हमारे जीवन में एक अदृश्य शक्ति देंगे ऐसी मान्यता है की पितृपक्ष में  अपने परिजनों के लिए मोक्ष प्राप्ति की दुआओं के साथ पिंडदान करने से मनुष्य को पुण्य फल प्राप्त होता है इसके अलावा गरुड़ पुराण आदि ग्रंथों में भी कहा गया है कि अपने पितरों को पिंडदान करने से कुल की सात पीढ़ी तक का उद्धार हो जाता है वहीं दूसरी तरफ जो व्यक्ति श्राद्ध पक्ष में अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं और उन्हें याद नहीं करते हैं उनका जीवन व्यर्थ चला जाता है इसलिए हमें अपनी श्रद्धा के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध और नमन अवश्य करना चाहिए कथा पुराणों के अनुसार अगर गया में अपने पूर्वजों को कुछ भी दान किया जाता है तो वह उन्हें स्वर्ग में जाकर मिलता है पदम पुराण के एक प्रसंग में आता है कि श्रद्धा पूर्वक गया में  किए जाने वाले पिंडदान से मनुष्य को अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है वहां  की फल्गु नदी में स्नान करने के बाद देवताओं तथा पितरों का जो भी व्यक्ति तर्पण करता है वह अपने कुल का उद्धार अपने आप ही कर देता है

Sunday, 22 September 2019

06:39

हल्दी की माला धारण करने से कट जाता है बुरे से बुरा समय के फंदे


 जीवन और समय का पहिया सदा घूमता ही रहता है इसलिए एक समय पर ही किसी का समय अच्छा चलता है तो उसी वक्त किसी का समय बुरा इंसान अपने भाग्य के लेख को तो नहीं बदल सकता है लेकिन थोड़ी सी सतर्कता और समझदारी से इसके नकारात्मक प्रभाव को कम जरूर कर सकता है इसलिए अपने जीवन में आने वाले नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए आप नियमित हल्दी की माला का प्रयोग कर सकते हैं जो आपके लिए काफी लाभकारी सिद्ध होगा हल्दी का उपाय ना केवल आपको परेशानियों से बचाता है बल्कि हल्दी की माला पहनने से आपको समाज में मान सम्मान भी मिलता है इसीलिए कहते हैं कि हल्दी की माला को गुरुवार के दिन पहना सबसे ज्यादा शुभ माना जाता है हिंदू शास्त्रों के अनुसार हल्दी की माला का काफी ज्यादा महत्व है हमारे शरीर में उत्पन्न होने वाले कई रोगों में भी फायदा करती है और मानसिक परेशानियों से भी छुटकारा दिलाने में कारगर है शास्त्रों के अनुसार इसका उपयोग कई सारे देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है भगवान विष्णु को हल्दी सबसे ज्यादा प्रिय है इसी वजह से उन्हें साबुत हल्दी की गांठ  की माला चढ़ाई जाती है इससे धन संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है जिस किसी को भी मानसिक परेशानी रहती है या उसका स्वभाव ठीक नहीं रहता है ऐसे लोगों को गुरुवार के दिन हल्दी की गांठ की माला पहननी चाहिए लेकिन ध्यान रहे यह माला पहनने से पहले विष्णु जी के किसी भी मंत्र से माला को सिद्ध जरूर कर ले यदि आप मेहनत करने के बावजूद भी अपने काम में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो गुरुवार के दिन गले या हाथ में हल्दी की गांठ की माला पहने इसको पहनने से पहले  इस पर थोड़ा सा गंगाजल  जरूर डाल लेना चाहिए इसके बाद इसको भगवान विष्णु के चरणों में रख दें ऐसा करने से माला शुद्ध हो जाएगी साथ ही इससे काम में आ रही सभी बाधाएं भी दूर होने लगेगी जिन लोगों की कुंडली में गुरु नीचे स्थान पर  विराजमान है उन लोगों को भी हल्दी की माला का उपयोग करना चाहिए लेकिन ध्यान रहे इसे हमेशा शुद्ध कर कर ही पहने इससे आपका गुरु मजबूत होगा साथ ही आपको भाग्य का साथ भी मिलने लगेगा जिन लोगों को शादी में होने वाली बाधाएं परेशान करती हैं ऐसे लोगों को भी गुरुवार के दिन हल्दी की गांठ की माला धारण करनी चाहिए लेकिन याद रहे इसे पहनने के बाद रोजाना माला को धूप दीप जरूर दिखाएं इसके साथ ही आप विश्णु जी का कोई सिद्ध मंत्र पढ़ते हैं तो आपको इसका दोगुना फायदा मिल जाएगा ऐसे बहुत सारे लोग होते हैं जिन्हें रात के समय बुरे बुरे सपने आते हैं ऐसे लोगों को भी अपने तकिए के नीचे रात को सोते वक्त हल्दी की गांठ की माला रख लेनी चाहिए और इसे सुबह गंगाजल से शुद्ध करके रख देना चाहिए जिससे नकारात्मकता दूर होती है और बुरे सपनों से छुटकारा मिलता है साथ ही बुद्धि का विकास होता है

Wednesday, 18 September 2019

07:34

धर्म का मर्म समझने से बदलते हैं जीवन के हालात




असीम उर्जा के केंद्र पूजा या प्रार्थना स्थल व्यक्ति को न सिर्फ ईश्वर से जोड़ते हैं बल्कि भेदभाव से रहित सामाजिक एकता के सूत्र में विरुद्ध भी हैं धर्म का असली मर्द यह बात समझने में है कि हम अपने उपासना स्थलों में आस्था रखने के साथ-साथ दूसरों के प्रार्थना स्थलों का भी पूरा सम्मान करें मशहूर शायर व दार्शनिक अल्लामा इकबाल का एक प्रसिद्ध है शेर है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हम सभी के लिए यह बात कहता है कि कोई भी धर्म हमें कभी भी दूसरे धर्म के लोगों को नफरत की निगाह से देखने को नहीं सिखाता है धर्म का अर्थ है प्रेम और सौहार्द की बात करना क्योंकि मन ही मंदिर है मन ही मस्जिद और गिरजाघर फिर भी पूजा और उपासना स्थल के लिए यह लड़ाइयां और धर्म युद्ध होते हैं 1947 में भारत पाकिस्तान के बीच बंटवारे को लेकर जब संपूर्ण देश जल रहा था तब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने संपूर्ण देशवासियों से यही बात पूछी थी उनका या प्रश्न था जब हम देश-दुनिया की खबरों में या पढ़ते हैं और देखते हैं कि किसी एक धर्म के अनुयाई दूसरे धर्म की पूजा स्थल को देते हैं जो सरासर गलत है महात्मा गांधी ने कहा था कि पूजा और उपासना स्थल का महत्व और बढ़ जाता है जब वहां सामूहिक प्रार्थना और साधना की जाती है मेरा राम पुस्तक में महात्मा गांधी ने लिखा है कि प्रार्थना लोगों को एक साथ रखने वाली सबसे बड़ी ताकत है जो आदमी प्रार्थना के जरिए  सब के साथ अपनी एकता को पहचान लेता है वह सबको अपने जैसा ही मानने लगता है ऐसी हालात में उसके मन में ना तो ऊंच-नीच की दुर्भावना होगी और ना ही राज्य या देश का भेदभाव और वह सभी व्यक्तियों को ईश्वर का ही रूप मानकर देखेगा ओशो ने भी पूजा स्थल के बारे में कहा है कि यदि आप ईश्वर की उपासना करना चाहते हैं तो उसका सर्वोच्च तरीका ध्यान है लेकिन पूजा स्थल पर भी आप स्वयं को ईश्वर से जोड़ने की ही कोशिश करते हैं यह आप पर ही निर्भर करता है कि इस कोशिश में आप कितने कामयाब होते हैं ।





पिछले कुछ सालों से तकनीक और खास प्रकार के विचारों में संपूर्ण मानव जाति की जीवन शैली में परिवर्तन कर दिया है अब उसके हर कार्य यहां तक कि चलने फिरने की गति और सीमा को भी तकनीक देने लगी है ऐसी स्थिति में पूजा स्थलों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है पूजा स्थल पर सिर्फ स्वयं को ईश्वर से जोड़ने का ही नहीं बल्कि देश और समाज के लिए एक होने का माध्यम भी बन जाता है प्रार्थना स्थल के महत्व को रेखांकित करने के लिए हाल ही में बढ़ाई आफ इंडिया संस्था द्वारा अलग-अलग धर्मों के आध्यात्मिक गुरुओं और विद्वानों की एक सभा आयोजित की गई इस समारोह में बढ़ाई धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाने वाली कार में पार्टी ने कहा भले ही ध्यान लगाने के लिए पूजा स्थल की जरूरत पड़े लेकिन लोगों में एकता की प्रेरणा देने के लिए एक शक्तिशाली आवश्यक है।

Thursday, 12 September 2019

21:00

14 सितंबर से पित्र पक्ष सुरु जाने कब करें अपने पितरो को नमन और उनका श्राद्ध


 13 सितम्बर 2019भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा की तिथि है इस दिन ऋषि मुनियों का तर्पण किया जाता है इस दिन पर लोग  परलोक में रहने वाली पितरों की आत्मा परिवार के सदस्यों से मिलने के लिए विदा होती है और आज ही के दिन परिवार के बीच पहुंच जाती हैं प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक पितरों की आत्मा धरती पर ही निवास करती है यही वजह है कि इन 15 दिनों में मनुष्य को संयम पूर्वक रहना चाहिए इन दिनों काम भाव को त्याग कर सदाचार का जीवन व्यतीत करना चाहिए इससे पितरों को प्रसन्नता होती है गरुड़ पुराण में कहा गया है कि पितर लोग को गई आत्मा पित्र पक्ष में जब लौटकर आती है तो वह अपने परिवार द्वारा किए गए और जल को ग्रहण कर होती है इसी से पितरों की आत्मा को बल मिलता है और वह अपने परिवार के लोगों का कल्याण कर पाते हैं जिन्हें पितृपक्ष में अन्य जल प्राप्त नहीं होता वह भूख प्यास से व्याकुल होकर अमावस्या के दिन लौट जाते हैं पितरों का निराश होकर लौटना परिवार में निराशा और कष्ट को बढ़ाता है शास्त्रों के नियम के अनुसार जिस दिन दोपहर के समय अधिक समय तक जो तिथि व्याप्त हो उस दिन ही उसी तिथि का श्राद्ध किया जाना चाहिए इस नियम के अनुसार 15 तारीख को तृतीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा इस बार श्राद्ध पक्ष में एकादशी और द्वादशी का श्राद्ध एक ही दिन होगा द्वादशी तिथि का क्षय है।

13 सितम्बर-पूर्णिमा श्राद्ध
14सितम्बर,प्रतिपदा तिथि का श्राद्घ
15 सितम्बर,रविवार द्धितीय तिथि का श्राद्ध
आदि।
पण्डित रामजी पांडेय

Saturday, 31 August 2019

00:00

इस गणेश चतुर्थी पर जानिए कहां कहां विराजमान होंगे गणपति बप्पा

गणेश चतुर्थी को लेकर देशभर में तैयारियां जोरों पर है गली मोहल्ले घर सभी जगह तैयारियां की जा रही हैं अलग-अलग स्थानों पर विशेष पंडाल लगाए जा रहे हैं और इस बार विनायक चतुर्थी पर गणपति बप्पा को विशेष मोदक का भोग लगाया जाएगा छात्रों के अनुसार गजानन को मोदक बहुत पसंद है इसलिए इस बार महिलाएं उनके लिए विशेष प्रकार की मोदक तैयार कर रही है ताकि सिद्धि सिद्धि के दाता प्रसन्न होकर सुख समृद्धि का वरदान दे बताते चलें कि 2 सितंबर से गणेश उत्सव का आरंभ हो रहा है अतः शहरों में कई जगह पर कार्यक्रम का आयोजन होगा आइए हम आपको बताते हैं नोएडा में कहां-कहां पर गणपति बप्पा विराजमान होंगे सेक्टर 78 अंतरिक्ष गोल्फ व्यू अपार्टमेंट सेक्टर 22 गणेश मंदिर सेक्टर 62 श्री विनायक मंदिर और श्री कार्तिकेय मंदिर सेक्टर 34 कम्युनिटी सेंटर सेक्टर 22 और सेक्टर 11 सेक्टर 78 की सोसाइटी समय सेक्टर 31 के पार्क में भी गणपति बप्पा विराजमान होंगे गणेश उत्सव उत्साह से भरे हुए युवा अपना हुनर दिखाने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं सिटी पार्क में गणेश चतुर्थी को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं मजबूत और अन्य साज-सज्जा में लगे हुए हैं सचिन ने बताया कि 1 सितंबर तक में तैयारियों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा

Tuesday, 27 August 2019

01:04

जाने आखिर क्या होता है ईश्वर और जीव का संबंध

यह एक सत्य है कि इस पृथ्वी पर जिसने भी जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है जो चीज बनी है उसे 1 दिन बिगड़ना है जो बिगड़ी है उसे 1 दिन बनना है इसी प्रकार से जब तक हम ईश्वर पर पूरा यकीन नहीं करते हैं तब तक हमें मुक्ति का मार्ग नहीं मिलता है अगर हमें मुक्ति का मार्ग चाहिए तो ईश्वर पर आस्था करनी ही पड़ेगी क्योंकि जब तक इंसान रोटी जीव उस एक स्वरूप ईश्वर के साथ मिलता नहीं है तब तक उसकी कोई कीमत नहीं होती इसका कारण यह है की सभी वस्तुओं को ईश्वर के साथ जुड़ने के बाद ही उसका मूल्य होता है जब तक जीवन रूपी इंसान पैसे मोह माया हानि लाभ जीवन मरण के आगे पीछे भागता है तब तक उसको मुक्ति का कोई मार्ग नजर नहीं आता लेकिन जिस वक्त से जीव ईश्वर की आराधना करने लगता है उस समय से ही उसके जीवन का उद्धार शुरू हो जाता है जिस तरीके से बिना तेल के कोई भी दीपक नहीं जलाया जा सकता उसी प्रकार से ईश्वर अगर नहीं होगा तो मनुष्य समेत कोई भी जीव जंतु पृथ्वी पर जीवित नहीं रह सकता इसलिए ईश्वर और जीव का बहुत ही निकट संबंध है जिस तरीके से लोहा और चुंबक जिस प्रकार चुंबक कितना भी कीचड़ में लिपटा हो लेकिन लोहे के नजदीक आते ही लोहे को अपनी ओर खींच ही लेता है इसी प्रकार से इंसान किसी भी तरीके के मेल से गंदा हो उसके बावजूद भी ईश्वर उसको कठिन परीक्षा के दौर से गुजर जाने के बाद और जिओ के पश्चाताप के बाद ईश्वर उसे अपनी शरण में बुला लेता है और जो जीव एक बार ईश्वर की शरण में चला जाता है वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है क्योंकि बगैर ईश्वर के जीव का कोई भी अस्तित्व नहीं है अगर ऐसा नहीं होता तो इस पृथ्वी पर लाखों करोड़ों के स्वामी कभी भी मौत को प्राप्त नहीं होते और वह हमेशा जीवित रहते लेकिन यह सत्य है कि जब मौत की आहट होती है तो सारी धन-दौलत सारी संपदा सारे डॉक्टर सारा ज्ञान यहीं पर धरा का धरा रह जाता है और जीव रूपी मानव ईश्वर की तरफ खिंचा चला जाता है

00:48

जाने कब होती है हरतालिका तीज की पूजा और व्रत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरतालिका तीज भाद्र पद के शुक्ल पक्ष में  मनाई जाती है जिसमें महिलाएं निर्जला व्रत कर कर अपने परिवार के लंबी उम्र की दुआ करती है और इस हरतालिका तीज के दिन सभी विवाहित महिलाएं शंकर पार्वती की पूजा और अर्चना करती हैं इससे उन्हें सौभाग्य और वैवाहिक जीवन में खुशहाली कावड़ मिलता है इसके अलावा अविवाहित कन्याएं मनपसंद जीवनसाथी को पाने के लिए भी यह व्रत करती हैं बिहार उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तीज का यह त्यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है इस दिन पूजन के साथ सभी महिलाएं पूरे दिन व्रत का पालन करती है और नए परिधानों से सुसज्जित होकर सुहागिन जोड़ा पहनकर पूजा करती है यह पूजा महिलाओं को समूह में करनी होती है इस पूजा का मतलब यह है कि समूह में पूजा करने से  मनुष्यों में एक दूसरे से निकटता होती है और घनिष्ठता बढ़ती है जिससे इंसानियत भी बढ़ती है हरतालिका तीज भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में तृतीया तिथि को मनाई जाती है 2019 में इस वर्ष हरतालिका तीज 1 सितंबर को है जिसमें सभी महिलाएं पूजा अर्चना कर अपने जीवन को खुशहाल होने की दुआ मांगती है मान्यता है कि इस दिन पूजा-पाठ और व्रत करने से मनुष्य के जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों से छुटकारा मिलता है

Saturday, 24 August 2019

00:00

जब जब जिस युग में धर्म घटा तब तब प्रभु ने अवतार लिया

नोएडा  हर वर्ष की भाती इस वर्ष भी हर्षोल्लास के साथ भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाए जाने की तैयारियां जोरों पर हैं  कहीं  कल ही जन्माष्टमी मना ली गई तो कहीं आज उसकी तैयारियां जोर शोर से हो रही हैं चारों ओर  भगवान श्री कृष्ण की झांकी बनाई जा रही है देवकी की आठवीं संतान  देवकीनंदन  माखनचोर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव  आज देशभर में एक अलग ही रंग में नजर आने वाला है  मिली जानकारी के अनुसार नोएडा के सेक्टर 66 ममुरा के हाथी मंदिर और उसके आसपास लगभग सभी मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियां  हो रही है  कहते हैं जब जब  धर्म घटता है  और पाप अनाचार दुराचार बढ़ने लगता है तब तब प्रभु किसी ना किसी रूप में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और पापियों का नाश करके अपने भक्तों का उद्धार करते हैं देवकी  की आठवी संतान माखन चोर  भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव मे एक अलग ही क्रान्ति झलक रही है जरा सोचिए अगर भगवान ने कलयुग में जन्म ले लिया तो दुष्टो,पापी वा आतताईयो का क्या हाल होगा। उनको अपनी जान बचानी भारी पड़ जाएगी होना भी यही चाहिये।  क्यो कि भगवानको जन्म तो लेना  ही हैं। आज नहीं तो कल  क्योंकि  जिस तरीके से पृथ्वी पर पाप बढ़ता जा रहा है इंसान इंसान का दुश्मन बनता जा रहा है लोग अपने स्वार्थ के कारण किसी को भी नीचा दिखाने और नुकसान करने से बाज नहीं आ रहे हैं इसका सीधा सा अर्थ यह है कि एक न एक दिन प्रभु को जन्म लेना ही पड़ेगा   जब जब होई  धर्म की हानि बाड़े अधर्म असुर अभिमान  तब तब धारी प्रभु  मनुजा शरीरा हर्रई सदा सज्जन की पीड़ा बताते चलें कि नोएडा के सेक्टर 50 स्थिति एक प्ले स्कूल डे केयर के बच्चों ने शुक्रवार को ही जन्माष्टमी का प्रोग्राम कर लिया है बच्चों ने भगवान श्री कृष्ण की झांकी के साथ साथ अन्य कार्यक्रमों में भी हिस्सा लिया बच्चों ने भगवान कृष्ण के जीवन पर आधारित लघु फिल्म देखी और कहानियां भी सुनी जिसके बाद हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की का उद्घोष किया गया इसके अलावा भी नोएडा में जगह-जगह मंदिरों में और घरों में जन्माष्टमी की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है।

Tuesday, 20 August 2019

11:21

23 अगस्त 2019 को होगी जन्माष्टमी शुक्रवार को रहे व्रत

यह व्रत शास्त्रोक्त मतानुसार जिस रात्रि में चन्द्रोदय के समय भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि हो उस दिन मनाया जाता है। माताएं मां देवकी के समान पूरे दिन निराहार  रहकर व्रत रखती हैं तथा रात्रि में भगवान् के प्राकट्य पर चन्द्रोदय के समय भगवान् चन्द्रदेव को अर्घ्य देकर अपने व्रत की पारणा करती हैं।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि में उदय होने वाले चन्द्रमा के दर्शन सर्वाधिक शुभ माने गए हैं। क्योंकि चन्द्रवंश में इसी चन्द्रोदय के समय भगवान् प्रकट हुए थे।

यह चन्द्र उदय दर्शन का संयोग वर्ष में केवल एक ही बार होता है। इस बार यह संयोग 23 अगस्त शुक्रवार की रात्रि को है।

अतः इसी दिन व्रत करें ।

 इससे अगले कई दिनों तक गोकुल में तथा अनेक स्थानों पर भगवान् का जन्मोत्सव मनाया जाता है। क्योंकि गोकुलवासियों को अगले दिन सुबह ही पता चला कि नंद घर आनंद भयो है।और जन्मोत्सव शुरू हो गया।
अत: व्रत 23/8/19 को ही रखें। इसमें कोई विवाद नहीं है।

अतः समस्त पुजारीजनों से भी अनुरोध है कि 23/8/19 को ही अर्द्धरात्रि तक कीर्तन प्रसाद चरणामृत की  व्यवस्था करें।

 जो व्रत 24 अगस्त को कहता है ।वह शायद यह नहीं जानता कि 24 को अष्टमी प्रातः 8:32 तक ही है। फिर नवमी लग जाएगी और नवमी का चन्द्रोदय मान्य नहीं है