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Friday, 3 July 2020

20:50

शनि की महिमा अपरंपार-के सी शर्मा


मान्यता है कि शनि देव किसी भी तरह के अन्याय या गलत बात को बर्दाश्त नहीं करते हैं और ऐसा करने वाले को उनके गुस्से का शिकार होना पड़ता है। उनके जन्म को लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं हैं। हालांकि अपने पिता सूर्य के साथ उनके संबंध कभी अच्छे नहीं रहे।

कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि उसे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। 

जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्य देव को देखा तो सूर्य देव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और भोलेनाथ ने उनको उनकी गलती का अहसास करवाया।

सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ, वह फिर नहीं सुधर पाया। आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है।

Thursday, 2 July 2020

23:39

डिप्रेशन का कारण बनता है केतु ग्रह -के सी शर्मा



राहु-केतु को ज्योतिष में छाया ग्रह की संज्ञा दी जाती है।
पौराणिक कथा के अनुसार राहु को असुर का ऊपरी धड़ और
केतु को पूँछ का हिस्सा माना जाता है।
इस तरह से विचार किया जाए तो केतु ग्रह के पास मस्तिष्क नहीं
है अर्थात यह जिस भाव में या जिस ग्रह के साथ रहता है, उसी के
अनुसार फल देने लगता है।
केतु का सीधा प्रभाव मन से है अर्थात केतु की निर्बल या अशुभ
स्थिति चंद्रमा अर्थात मन को प्रभावित करती है और आत्मबल
कम करती है। केतु से प्रभावित व्यक्ति अक्सर डिप्रेशन के शिकार
हो जाते हैं। भय लगना, बुरे सपने आना, शंकालु वृत्ति हो जाना
भी केतु के ही कारण होता है। केतु और चंद्रमा की युति-प्रतियुति
होने से व्यक्ति मानसिक रोगी हो जाता है। व्यसनाधीनता बढ़ती है
और मिर्गी, हिस्टीरिया जैसे रोग होने की आशंका बढ़ जाती है।
केतु प्राय: लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम, दशम व व्यय
में होने से अच्छा फल नहीं देता। तृतीय, पंचम, षष्ठ, नवम व
एकादश में केतु अच्छा फल देता है। साथ ही मेष, वृषभ, मिथुन,
कन्या, धनु व मीन राशि में केतु अच्छा फल देता है।

यदि किसी कुंडली में केतु अशुभ भाव में बैठा हो तो उसका उपाय
करना आवश्यक है अन्यथा व्यक्ति को ताउम्र परेशानियों का
सामना करना पड़ सकता है।
Remedies.. 

शांति के उपाय
1. केतु से बचने का सबसे अच्छा उपाय है हमेशा प्रसन्न रहना,
जोर से हँसना... इससे केतु आपके मन को वश में नहीं कर
पाएगा।
2. प्रतिदिन गणेशजी का पूजन-दर्शन करें।
3. मजदूर, अपाहिज व्यक्ति की यथासंभव मदद करें।
4. लहसुनिया पहनने से भी केतु के अशुभ प्रभाव में कमी आती
है।
5. काले, सलेटी रंगों का प्रयोग न करें।
6. लोगों में उठने-बैठने, सामाजिक होने की आदत डालें।

केतु ऊंचाई है,केतु सिखर है, केतु मंदिर के शीर्ष पर लगी पताका है, केतु जिस भी ग्रह के साथ युति बनाता है उस ग्रह के बल में वृद्धि  कर देता है, केतु आपको ऊंचाई तक पहुंचाने में पूर्ण सक्षम है, अगर केतु की महादशा या अंतर दशा चल रही है या सुरु होने वाली है,  तो गणेश सहस्त्र नाम का पाठ करें और मंदिर के सीखर पर अपने हाथ से एक पताका 
flag   जरूर स्थापित करे, फिर देखिए केतु का कमाल। 
अशुभ फल भी सुभता में तब्दील होजाएंगे।

Monday, 22 June 2020

21:35

जानिए आज भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के पावन अवसर पर विशेष-के सी शर्मा




   महाप्रभु  श्री जगन्नाथ धाम  के   मन्दिर  -- पुरी   के सम्बंध में कुछ आश्चर्य जनक तथ्य ---
भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा एक विस्तृत प्रस्तुति!

पुर्व भारतीय उड़ीसा राज्य का पुरी क्षेत्र जिसे पुरुषोत्तम पुरी, शंख क्षेत्र, श्रीक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री जगन्नाथ जी की मुख्य लीला-भूमि है। उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगन्नाथ जी ही माने जाते हैं। यहाँ के वैष्णव धर्म की मान्यता है कि राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगन्नाथ जी हैं। इसी प्रतीक के रूप श्री जगन्नाथ से सम्पूर्ण जगत का उद्भव हुआ है। श्री जगन्नाथ जी पूर्ण परात्पर भगवान है और श्रीकृष्ण उनकी कला का एक रूप है। ऐसी मान्यता श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य पंच सखाओं की है।

पूर्ण परात्पर भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरम्भ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं।

पर्यटन और धार्मिक महत्व,,,,,यहाँ की मूर्ति, स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। कोणार्क का अद्भुत सूर्य मन्दिर, भगवान बुद्ध की अनुपम मूर्तियों से सजा धौल-गिरि और उदय-गिरि की गुफ़ाएँ, जैन मुनियों की तपस्थली खंड-गिरि की गुफ़ाएँ, लिंग-राज, साक्षी गोपाल और भगवान जगन्नाथ के मन्दिर दर्शनीय है। पुरी और चन्द्रभागा का मनोरम समुद्री किनारा, चन्दन तालाब, जनकपुर और नन्दनकानन अभयारण्य बड़ा ही मनोरम और दर्शनीय है। 

शास्त्रों और पुराणों में भी रथ-यात्रा की महत्ता को स्वीकार किया गया है। स्कन्द पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि रथ-यात्रा में जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी का दर्शन करते हुए, प्रणाम करते हुए मार्ग के धूल-कीचड़ आदि में लोट-लोट कर जाते हैं वे सीधे भगवान श्री विष्णु के उत्तम धाम को जाते हैं।

 जो व्यक्ति गुंडिचा मंडप में रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा को आते हुए करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता 7 बीच आते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं। सब मनिसा मोर परजा (सब मनुष्य मेरी प्रजा है), ये उनके उद्गार है। भगवान जगन्नाथ तो पुरुषोत्तम हैं। उनमें श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महायान का शून्य और अद्वैत का ब्रह्म समाहित है। उनके अनेक नाम है, वे पतित पावन हैं।

महाप्रसाद का गौरव,,,,,रथयात्रा में सबसे आगे ताल ध्वज पर श्री बलराम, उसके पीछे पद्म ध्वज रथ पर माता सुभद्रा व सुदर्शन चक्र और अन्त में गरुण ध्वज पर या नन्दीघोष नाम के रथ पर श्री जगन्नाथ जी सबसे पीछे चलते हैं। तालध्वज रथ ६५ फीट लंबा, ६५ फीट चौड़ा और ४५ फीट ऊँचा है। 

इसमें ७ फीट व्यास के १७ पहिये लगे हैं। बलभद्र जी का रथ तालध्वज और सुभद्रा जी का रथ को देवलन जगन्नाथ जी के रथ से कुछ छोटे हैं। सन्ध्या तक ये तीनों ही रथ मन्दिर में जा पहुँचते हैं। अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मन्दिर में प्रवेश करते हैं और सात दिन वहीं रहते हैं। 

गुंडीचा मन्दिर में इन नौ दिनों में श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को आड़प-दर्शन कहा जाता है। श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतः प्रसाद ही कहा जाता है। श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला।

 कहते हैं कि महाप्रभु बल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुँचने पर मन्दिर में ही किसी ने प्रसाद दे दिया। महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया और उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव प्राप्त हुआ। नारियल, लाई, गजामूंग और मालपुआ का प्रसाद विशेष रूप से इस दिन मिलता है।

जनकपुर मौसी का घर,,,,,,,जनकपुर में भगवान जगन्नाथ दसों अवतार का रूप धारण करते हैं। विभिन्न धर्मो और मतों के भक्तों को समान रूप से दर्शन देकर तृप्त करते हैं। इस समय उनका व्यवहार सामान्य मनुष्यों जैसा होता है।

 यह स्थान जगन्नाथ जी की मौसी का है। मौसी के घर अच्छे-अच्छे पकवान खाकर भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं। तब यहाँ पथ्य का भोग लगाया जाता है जिससे भगवान शीघ्र ठीक हो जाते हैं। रथयात्रा के तीसरे दिन पंचमी को लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूँढ़ते यहाँ आती हैं। तब द्वैतापति दरवाज़ा बंद कर देते हैं जिससे लक्ष्मी जी नाराज़ होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और हेरा गोहिरी साही पुरी का एक मुहल्ला जहाँ लक्ष्मी जी का मन्दिर है, वहाँ लौट जाती हैं।

 बाद में भगवान जगन्नाथ लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं। उनसे क्षमा माँगकर और अनेक प्रकार के उपहार देकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। इस आयोजन में एक ओर द्वैतापति भगवान जगन्नाथ की भूमिका में संवाद बोलते हैं तो दूसरी ओर देवदासी लक्ष्मी जी की भूमिका में संवाद करती है।

 लोगों की अपार भीड़ इस मान-मनौव्वल के संवाद को सुनकर खुशी से झूम उठती हैं। सारा आकाश जै श्री जगन्नाथ के नारों से गूँज उठता है। लक्ष्मी जी को भगवान जगन्नाथ के द्वारा मना लिए जाने को विजय का प्रतीक मानकर इस दिन को विजयादशमी और वापसी को बोहतड़ी गोंचा कहा जाता है। रथयात्रा में पारम्परिक सद्भाव, सांस्कृतिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता का अद्भूत समन्वय देखने को मिलता है।

देवर्षि नारद को वरदान,,,,,,श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा में भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा या रुक्मिणी नहीं होतीं बल्कि बलराम और सुभद्रा होते हैं। उसकी कथा कुछ इस प्रकार प्रचलित है - द्वारिका में श्री कृष्ण रुक्मिणी आदि राज महिषियों के साथ शयन करते हुए एक रात निद्रा में अचानक राधे-राधे बोल पड़े। महारानियों को आश्चर्य हुआ। जागने पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं होने दिया, लेकिन रुक्मिणी ने अन्य रानियों से वार्ता की कि, सुनते हैं वृन्दावन में राधा नाम की गोपकुमारी है जिसको प्रभु ने हम सबकी इतनी सेवा निष्ठा भक्ति के बाद भी नहीं भुलाया है।

 राधा की श्रीकृष्ण के साथ रहस्यात्मक रास लीलाओं के बारे में माता रोहिणी भली प्रकार जानती थीं। उनसे जानकारी प्राप्त करने के लिए सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की। पहले तो माता रोहिणी ने टालना चाहा लेकिन महारानियों के हठ करने पर कहा, ठीक है। सुनो, सुभद्रा को पहले पहरे पर बिठा दो, कोई अंदर न आने पाए, भले ही बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों।

माता रोहिणी के कथा शुरू करते ही श्री कृष्ण और बलरम अचानक अन्त:पुर की ओर आते दिखाई दिए। सुभद्रा ने उचित कारण बता कर द्वार पर ही रोक लिया। अन्त:पुर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की वार्ता श्रीकृष्ण और बलराम दोनो को ही सुनाई दी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही सुभद्रा भी भाव विह्वल होने लगीं। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखते थे। सुदर्शन चक्र विगलित हो गया। उसने लंबा-सा आकार ग्रहण कर लिया। यह माता राधिका के महाभाव का गौरवपूर्ण दृश्य था।

अचानक नारद के आगमन से वे तीनों पूर्व वत हो गए। नारद ने ही श्री भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य जनों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर सदैव सुशोभित रहे। महाप्रभु ने तथास्तु कह दिया।

रथ यात्रा का प्रारंभ,,,,,,,कहते हैं कि राजा इन्द्रद्युम्न, जो सपरिवार नीलांचल सागर (उड़ीसा) के पास रहते थे, को समुद्र में एक विशालकाय काष्ठ दिखा। राजा के उससे विष्णु मूर्ति का निर्माण कराने का निश्चय करते ही वृद्ध बढ़ई के रूप में विश्वकर्मा जी स्वयं प्रस्तुत हो गए। उन्होंने मूर्ति बनाने के लिए एक शर्त रखी कि मैं जिस घर में मूर्ति बनाऊँगा उसमें मूर्ति के पूर्णरूपेण बन जाने तक कोई न आए। राजा ने इसे मान लिया। आज जिस जगह पर श्रीजगन्नाथ जी का मन्दिर है उसी के पास एक घर के अंदर वे मूर्ति निर्माण में लग गए।

 राजा के परिवारजनों को यह ज्ञात न था कि वह वृद्ध बढ़ई कौन है। कई दिन तक घर का द्वार बंद रहने पर महारानी ने सोचा कि बिना खाए-पिये वह बढ़ई कैसे काम कर सकेगा। अब तक वह जीवित भी होगा या मर गया होगा। महारानी ने महाराजा को अपनी सहज शंका से अवगत करवाया। महाराजा के द्वार खुलवाने पर वह वृद्ध बढ़ई कहीं नहीं मिला लेकिन उसके द्वारा अर्द्धनिर्मित श्री जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम की काष्ठ मूर्तियाँ वहाँ पर मिली।

महाराजा और महारानी दुखी हो उठे। लेकिन उसी क्षण दोनों ने आकाशवाणी सुनी, 'व्यर्थ दु:खी मत हो, हम इसी रूप में रहना चाहते हैं मूर्तियों को द्रव्य आदि से पवित्र कर स्थापित करवा दो।' आज भी वे अपूर्ण और अस्पष्ट मूर्तियाँ पुरुषोत्तम पुरी की रथयात्रा और मन्दिर में सुशोभित व प्रतिष्ठित हैं। रथयात्रा माता सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग रथों में बैठकर करवाई थी। माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष होती है।

 किंवदंतियों में जगन्नाथ पुरी का इतिहास अनूठा है। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन भी हैं और बुद्ध भी। अनेक कथाओं और विश्वासों और अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भूत समन्वय है। जगन्नाथ मन्दिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहाँ तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है।

 भुवनेश्वर के भास्करेश्वर मन्दिर में अशोक स्तम्भ को शिव लिंग का रूप देने की कोशिश की गई है। इसी प्रकार भुवनेश्वर के ही मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मन्दिर की दीवारों में शिव मूर्तियों के साथ राम, कृष्ण और अन्य देवताओं की मूर्तियाँ हैं। यहाँ जैन और बुद्ध की भी मूर्तियाँ हैं पुरी का जगन्नाथ मन्दिर तो धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण है। मन्दिर कि पीछे विमला देवी की मूर्ति है जहाँ पशुओं की बलि दी जाती है, वहीं मन्दिर की दीवारों में मिथुन मूर्तियों चौंकाने वाली है।

 यहाँ तांत्रिकों के प्रभाव के जीवंत साक्ष्य भी हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार शरीर के २४ तत्वों के ऊपर आत्मा होती है। ये तत्व हैं- पंच महातत्व, पाँच तंत्र माताएँ, दस इन्द्रियों और मन के प्रतीक हैं। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होती है। 

ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करती है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उस माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है।

सम्पूर्ण भारत में वर्षभर होने वाले प्रमुख पर्वों होली, दीपावली, दशहरा, रक्षा बंधन, ईद, क्रिसमस, वैशाखी की ही तरह पुरी का रथयात्रा का पर्व भी महत्त्वपूर्ण है। पुरी का प्रधान पर्व होते हुए भी यह रथयात्रा पर्व पूरे भारतवर्ष में लगभग सभी नगरों में श्रद्धा और प्रेम के साथ मनाया जाता है। जो लोग पुरी की रथयात्रा में नहीं सम्मिलित हो पाते वे अपने नगर की रथयात्रा में अवश्य शामिल होते हैं।

 रथयात्रा के इस महोत्सव में जो सांस्कृतिक और पौराणिक दृश्य उपस्थित होता है उसे प्राय: सभी देशवासी सौहार्द्र, भाई-चारे और एकता के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। जिस श्रद्धा और भक्ति से पुरी के मन्दिर में सभी लोग बैठकर एक साथ श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद प्राप्त करते हैं उससे वसुधैव कुटुंबकम का महत्व स्वत: परिलक्षित होता है। 

उत्साहपूर्वक श्री जगन्नाथ जी का रथ खींचकर लोग अपने आपको धन्य समझते हैं। श्री जगन्नाथपुरी की यह रथयात्रा सांस्कृतिक एकता तथा सहज सौहार्द्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जाती है।
18:03

जानिएमंगलवार के दिन सुनें हनुमान जी की सत्य कथा, जब बाली के साथ हुआ था भयंकर युद्ध - के सी शर्मा


हनुमान जी को लेकर पुराणों में कई कथाएं हैं जिनमें कहा जाता है कि, बजरंगबली भगवान राम के परम भक्त थे और आज इस वीडियो में एक ऐसी कथा के बारे में पता चलेगा जिसका विवरण आपको संसार की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। इस कथा का प्रारंभ वहां से होता है जब बाली को ब्रह्मा जी का वरदान मिला था। पर बाली ने अपनी ताकत का उपयोग गलत जगह किया और बजरंगबली को युद्ध के लिए ललकारा।

हिंदुओं में मंगलवार के दिन को बजरंगबली का दिन बताया गया है। हनुमान भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस दिन पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मुरादें पूरी करने की कामना करते हैं और बजरंगबली भी भक्तों की आस्था से खुश होकर उन्हें अपना आशीर्वाद देते हैं। हनुमान जी को लेकर पुराणों में कई कथाएं हैं जिनमें कहा जाता है कि, बजरंगबली भगवान राम के परम भक्त थे और आज इस वीडियो में एक ऐसी कथा के बारे में पता चलेगा जिसका विवरण आपको संसार की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। इस कथा का प्रारंभ वहां से होता है जब बाली को ब्रह्मा जी का वरदान मिला था। पर बाली ने अपनी ताकत का उपयोग गलत जगह किया और बजरंगबली को युद्ध के लिए ललकारा। पर जब बाली को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसकी भरपाई करने के लिए बाली ने भगवान राम का तप किया और मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया।

Friday, 19 June 2020

20:37

शनिवार के दिन सुनें हनुमान जी की सत्य कथा जब बाली के साथ हुआ था भयंकर युद्ध -के सी शर्मा



हनुमान जी को लेकर पुराणों में कई कथाएं हैं जिनमें कहा जाता है कि, बजरंगबली भगवान राम के परम भक्त थे और आज इस वीडियो में एक ऐसी कथा के बारे में पता चलेगा जिसका विवरण आपको संसार की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। इस कथा का प्रारंभ वहां से होता है जब बाली को ब्रह्मा जी का वरदान मिला था। पर बाली ने अपनी ताकत का उपयोग गलत जगह किया और बजरंगबली को युद्ध के लिए ललकारा।

हिंदुओं में मंगलवार के दिन को बजरंगबली का दिन बताया गया है। हनुमान भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस दिन पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मुरादें पूरी करने की कामना करते हैं और बजरंगबली भी भक्तों की आस्था से खुश होकर उन्हें अपना आशीर्वाद देते हैं। हनुमान जी को लेकर पुराणों में कई कथाएं हैं जिनमें कहा जाता है कि, बजरंगबली भगवान राम के परम भक्त थे और आज इस वीडियो में एक ऐसी कथा के बारे में पता चलेगा जिसका विवरण आपको संसार की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। इस कथा का प्रारंभ वहां से होता है जब बाली को ब्रह्मा जी का वरदान मिला था। पर बाली ने अपनी ताकत का उपयोग गलत जगह किया और बजरंगबली को युद्ध के लिए ललकारा। पर जब बाली को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उसकी भरपाई करने के लिए बाली ने भगवान राम का तप किया और मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया।

Thursday, 18 June 2020

18:29

जाने भगवान के अवतार का अत्यंत गोपनीय आध्यात्मिक रहस्य कथा-के सी शर्मा


बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। 
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥

भावार्थ:-ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे (अज्ञानमयी, मलिना) माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और (बाहरी तथा भीतरी) इन्द्रियों से परे हैं। उनका (दिव्य) शरीर अपनी इच्छा से ही बना है (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं)॥

 "वेदोक्त अभ्यास से विमुख (बिप्र), अनाचार से युक्त दैवीय गुण वाले (सुर), भेद बुद्धि उपासना में फंसे (संत) पुरुषों, और अत्याचार, पाप से दबी पृथ्वी (धेनु) के उत्थान के लिए निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा ने मानवी अवतार लिया है। 

अपनी ही इच्छा शक्ति से, विराट प्रकृति के समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर, अपना दिव्य सगुण साकार रूप बनाया है। माया के तीनों गुणों सत, रज, तम से निर्लेप रहते हुवे भी, उसके वशीभूत सा हुवा लीला करता दिखता है।"

विश्लेषण :-  "बिप्र" :- जो केवल वेदोक्त अचार का पालन करने वाला वेद का अभ्यासी है। उसे विप्र की संज्ञा दी गयी है। यही विप्र आगे सदाचार की सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण अर्थात जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता" भी होता है।

"धेनु" :- जिस प्रकार गौ अपने बछड़े का पालन करती है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी मनुष्यों सहित ८४ लाख योनियों के जरायुज, अण्डज, स्वदेज, उदि्भज जीवों को माता के समान पालन-पोषण करती है। रहने को स्थान और खाने को अन्न देती है। यहाँ पृथ्वी माता को धेनु शब्द से कहा गया है।

"सुर" :- तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता आदि दैविय गुणों से युक्त को सुर की संज्ञा दी गयी है।

"संत" :- ईश्वर के भक्त, साधु, संन्यासी, विरक्त, महात्मा को संत की संज्ञा दी गयी है। यही संत सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर आत्मज्ञानी / ब्रह्मज्ञानी कहलाते है।

"हित" :- बिप्र, धेनु, सुर, संत इन चारों शब्दो में पूरा चराचर जगत (समष्टि जगत) समा जाता है। हित अर्थात जब चराचर जगत का पतन होने लगता है। तब उनके उत्थान के लिए धर्म की स्थापना करना।

"लीन्ह मनुज अवतार" :- निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा या जीवनमुक्त सत्ता का अपनी उच्च स्थिति में स्थित रहते हुवे भी नीचे की सगुण साकार मानवी रूप में अभिव्यक्त होना।

"निज" :- प्रकृति के किसी भी बंधन में न होते हुवे भी अपनी स्वयं की मर्जी से।

"इच्छा" :- 'परब्रह्म की इच्छा शक्ति' या 'परमात्म ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) में स्थित पुरुष का दृढ़ निश्चय' सरल शब्दो में 'इच्छा शक्ति' दो शब्दों से मिल कर बनी है। दृढ़ निश्चय + ब्रह्मचर्य। "दृढ़ निश्चय" अर्थात ऐसा निश्चय जो किसी भी परिस्थिति में न बदले। और "ब्रह्मचर्य" अर्थात "ब्रह्म के समान आचरण" अर्थात निर्लेप / उदासीन / साक्षी / तटस्थ / निष्काम भाव से रहना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है।

(साधक, जिज्ञासु, भक्त इसी ब्रह्म आचरण की सिद्धि के लिए बाहर के ब्रह्मचर्य अर्थात विवाह न करना, त्याग, संयम, संतोष, तप आदि साधन करते है। और उनमें से कुछ तो अपने साधन को ही ब्रह्मचर्य समझ लेते है। जबकि शास्त्र, भीतर के ब्रह्म आचरण (ज्ञान में स्थिति) को ही ब्रह्मचर्य कहता है। फिर विवाह करे, चाहे शास्त्रोचित भोग भोगे, बाहर से सब कुछ करता हुआ भी भीतर से निर्लेप ही रहता है।)

"निर्मित तनु" :- प्रत्येक मनुष्य का अपना-अपना संस्कार (प्रकृति) और प्रारब्ध होता है। जिसको व्यष्टि कहते है। यही व्यष्टि सामूहिक रूप से समष्टि कहलाती है। परब्रह्म परमात्मा अवतार के समय, यही विराट समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर अपना सगुन साकार मानवी रूप बनाते है।

"माया गुन गो पार" :- माया के तीनों गुण सत, रज और तम से परे (निर्लेप / उदासीन / तटस्थ) होते हुवे भी माया के बीच रहना।

भूमिका :-  सृष्टि के आदि में केवल एक अद्वितीय सर्वशक्तिमान सचिदानंद परब्रह्म परमात्मा ही था। उसने इच्छा की "मैं एक से अनेक हो जाऊ" और वही ब्रह्मा बन के उत्पत्तिकर्ता, विष्णु बन के पालनकर्ता और महेश (शिव) बन के प्रलयकर्ता हुवा। 

उनकी ही इच्छा से क्रमिक विकास होते-होते, विविधता भरी जीव-ईश्वर, नाम-रूप सृष्टि प्रकाश में आयी। उसने ही जीवों के कल्याण के लिए वेदों को प्रगट किया। वेदों के ज्ञान के अनुसरण से जीव धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थ सिद्ध करता हुवा पुनः अपने आदि स्वरुप ब्रह्म को उपलब्ध हो जाता है।

व्याख्या :-  इस सृष्टि में ८४ लाख एक योनियाँ है। और उनमे से भी सर्वश्रेष्ट मनुष्य योनि है। और जब मनुष्यों में भी श्रेष्ट, धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले विप्र, सुर और संत अपने-अपने वार्णाश्रम के धर्म से कर्तव्य विमूढ़ होने लगते है।

 दंभ, दिखावा, शास्त्र विरुद्ध आचरण से धर्म का ह्रास होने लगता है। धर्म के मार्गदर्शक सदाचारी ब्राह्मणों, आत्मज्ञानियों का आभाव होने लगता है। संपूर्ण मानव जाति सहित विराट प्रकृति जब अंधकार रूपी तमोगुण की और अग्रसर होने लगती है। चराचर जगत को आश्रय देने वाली पृथ्वी जब चारो और फैलते अनाचार, अत्याचार, पापाचार के बोझ से त्राहि - त्राहि करने लगती है। 

तब पृथ्वी माता (प्रकृति माता) की करुण पुकार (प्रार्थना) पर, उनके उत्थान के लिये निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा / जीवनमुक्त सत्ता अपने सगुण साकार मानवी रूप को अभिव्यक्त करती है। और अपने मार्गदर्शन से वेदों के अंत, वेदान्त के द्वारा जानने मे आने वाले परम सत्य, अद्वैत रूप उस अभेद ब्रह्म (आत्मा / तत्व / जीवनमुक्त स्थिति) का रहस्य खोलती है। जिस ऊँचाई पर भक्त-भगवान, गुरु-शिष्य, मालिक-दास, प्रकृति-पुरुष, जीव-ईश्वर, आदि सारे भेद समाप्त हो जाते है। 

और केवल "एक अद्वितीय सर्वशक्तिमान सचिदानंद परब्रह्म परमात्मा" ही जानने में आता है। "ईश्वर अंश जीव अविनाशी" होने के कारण साधारण जीव भी धर्म का अनुसरण कर, प्रत्यक्ष ज्ञान की इस पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है। जिस प्रकार समुंद्र से अलग हुई पानी की बूंद पुनः समुंद्र में मिल कर समुंद्र रूप ही हो जाती है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्म को जानकर जीव भी ब्रह्म रूप (अपने आदि स्वरुप को प्राप्त) हों जाता है।

जब-जब पृथ्वी पर ऐसा समय आता है। जब पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य अपने संस्कारो से गिरते ही चले जाते है। संस्कारो के गिरने से धर्म की हानि होने लगती है। और अनिष्ट प्रारब्ध बलवान हो जाता है। और मनुष्य चाह (इच्छा) कर भी अपने पुरुषार्थ से ऊपर नहीं उठ पाता है।

 व्यष्टि जगत के पतन से सामूहिक विराट समष्टि संस्कार भी तेजी से तमोगुण के प्रभाव में आने लगता है। और सृष्टिकर्ता के निर्धारित समय के पूर्व ही प्रलय जैसी स्थिति बन जाती है। तब सर्वशक्तिमान जीवनमुक्त सत्ता अपना हस्तक्षेप कर अपनी उपस्थिति दर्शाती है। और अपनी ही इच्छा शक्ति से इस विराट समष्टि प्रारब्ध और संस्कार को स्वीकार कर अपना दिव्य सगुण साकार (पूर्ण ब्रह्म) मानवी रूप बनाती है। वेदों का अनुसरण करने वाली बुद्धि, सत्य, धर्म, मर्यादा, की साक्षात् मूर्ति ऐसी अवतारी सत्ताऐ, समष्टि के प्रचंड इष्ट-अनिष्ट प्रारब्ध को अपने ऊपर ले लेती है।

 "कभी कृष्ण बनके, छः - छः भाइयों की हत्या, माता-पिता को कारावास, आसुरी शक्तियों के षडयंत्र, महाभारत युद्ध और अपने ही वंश के नाश का साक्षी बनती है। और कभी राम बन के वनवास, पत्नी वियोग, रावण युद्ध भी देखती है। माया के तीनों गुणों सत, रज और तम से परे (निर्लेप) होते हुवे भी माया के वशीभूत से हुवे प्रवृत्ति करती दिखती है। और विपरीत परिस्थितियों के बीच, अपने पुरुषार्थ से समष्टि प्रारब्ध को काट कर, विराट प्रकृति के संस्कारो कोे सतोगुण तक उठा देतीे है।

 रस्सी के दो विपरीत सिरे की तरह समष्टि और व्यष्टि जगत एक दूसरे को प्रभावित करता है। इसलिए समष्टि के ऊपर उठने से व्यष्टि जगत भी पीछे-पीछे ऊपर उठ जाता है। और पृथ्वी पर फिर से वैदिक धर्म की स्थापना हो जाती है। लीला काल में भक्तों, ज्ञानियों की बात ही क्या, सब कुछ जानते हुवे ब्रह्मा जी जैसे भी भ्रम में पढ़ जाते है। कि सर्वशक्तिमान भगवान होते हुवे भी, कही चोरी कर रहे है। तो कही झूठा खा रहे है। कही रास कर रहे है। तो कही पत्नी वियोग में आंसू बहा रहे है। कही गुरु बन के ज्ञान सुनाते है। और कही स्वयं शिष्य बन के बैठ जाते है।

ऐसी जीवनमुक्त सत्ताएं जब पृथ्वी पर अवतार लेती है। तो भक्त इन्हें भगवान, शिष्य इन्हें जगतगुरु, प्रजाजन इन्हें संत और ज्ञानीयों को अपनी ही आत्मसत्ता के रूप में जानने में आते है। और बाद में विद्वानजन इनकी महिमा जान के 22, 23, 24.. करके अवतारों की संख्या बढ़ाते रहते है।

Wednesday, 10 June 2020

17:13

पवित्र और फलदायिनी है नरसिंह अवतार की यह पौराणिक गाथा -के सी शर्मा

पवित्र और फलदायिनी है नरसिंह अवतार की यह पौराणिक गाथा -के सी  शर्मा


कश्यप नामक ऋषि एवं उनकी पत्नी दिति को 2 पुत्र हुए जिनमें से एक का नाम 'हरिण्याक्ष' तथा दूसरे का 'हिरण्यकशिपु' था। हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा हेतु वराह रूप धरकर मार दिया था। अपने भाई की मृत्यु से दुखी और क्रोधित हिरण्यकशिपु ने भाई की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अजेय होने का संकल्प किया। 

 
सहस्रों वर्षों तक उसने कठोर तप किया। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे अजेय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त करके उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, लोकपालों को मारकर भगा दिया और स्वत: संपूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरुपाय हो गए थे। वे असुर हिरण्यकशिपु को किसी प्रकार से पराजित नहीं कर सकते थे।
 
ब्रह्माजी की हिरण्यकश्यप कठोर तपस्या करता है। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी वरदान देते हैं कि उसे न कोई घर में मार सके न बाहर, न अस्त्र से और न शस्त्र से, न दिन में मरे न रात में, न मनुष्य से मरे न पशु से, न आकाश में न पृथ्वी में।
 
 
इस वरदान के बाद हिरण्यकश्यप ने प्रभु भक्तों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया, लेकिन भक्त प्रहलाद के जन्म के बाद हिरण्यकश्यप उसकी भक्ति से भयभीत हो जाता है, उसे मृत्युलोक पहुंचाने के लिए प्रयास करता है। इसके बाद भगवान विष्णु भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लेते हैं और हिरण्यकश्यप का वध कर देते हैं।

 
 
भगवान नरसिंह में वे सभी लक्षण थे, जो हिरण्यकश्यप के मृत्यु के वरदान को संतुष्ट करते थे। भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप का नाश हुआ किंतु एक और समस्या खड़ी हो गई। भगवान नरसिंह इतने क्रोध में थे कि लगता था, जैसे वे प्रत्येक प्राणी का संहार कर देंगे। यहां तक कि स्वयं प्रह्लाद भी उनके क्रोध को शांत करने में विफल रहा।

 
सभी देवता भयभीत हो भगवान ब्रह्मा की शरण में गए। परमपिता ब्रह्मा उन्हें लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे अपने अवतार के क्रोध शांत कर लें किंतु भगवान विष्णु ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता जतलाई। भगवान विष्णु ने सबको भगवान शंकर के पास चलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि चूंकि भगवान शंकर उनके आराध्य हैं इसलिए केवल वही नरसिंह के क्रोध को शांत कर सकते हैं। और कोई उपाय न देखकर सभी भगवान शंकर के पास पहुंचे।
 
देवताओं के साथ स्वयं परमपिता ब्रह्मा और भगवान विष्णु के आग्रह पर भगवान शिव नरसिंह का क्रोध शांत करने उनके समक्ष पहुंचे किंतु उस समय तक भगवान नरसिंह का क्रोध सारी सीमाओं को पार कर गया था। साक्षात भगवान शंकर को सामने देखकर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ बल्कि वे स्वयं भगवान शंकर पर आक्रमण करने दौड़े।

 
उसी समय भगवान शंकर ने एक विकराल ऋषभ का रूप धारण किया और भगवान नरसिंह को अपनी पूंछ में लपेटकर खींचकर पाताल में ले गए। काफी देर तक भगवान शंकर ने भगवान नरसिंह को वैसे ही अपने पूंछ में जकड़कर रखा। अपनी सारी शक्तियों और प्रयासों के बाद भी भगवान नरसिंह उनकी पकड़ से छूटने में सफल नहीं हो पाए। अंत में शक्तिहीन होकर उन्होंने ऋषभ रूप में भगवान शंकर को पहचाना और तब उनका क्रोध शांत हुआ। 
 
इसे देखकर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के आग्रह पर ऋषभरूपी भगवान शंकर ने उन्हें मुक्त कर दिया। इस प्रकार देवताओं और प्रह्लाद के साथ-साथ सभी सत्पात्रों को 2 महान अवतारों के दर्शन हुए।
 
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
 
- हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्ष आत्मसमर्पण करता हूं।

Tuesday, 2 June 2020

12:00

सत्य क्या है - वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा का विशेष लेख

१-ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म को सत्य, ज्ञान, अनन्त और ब्रह्म कहा गया है।
२--सत्य की प्रत्यक्ष मूर्ति सूर्यदेव हैं।वे सत्य का विस्तार करते हैं - -- सत्यं ततान सूर्य:।
३-- यह पृथ्वी सत्य के आधार पर ठहरी हुई है--स्त्येनोत्तमिता भूमि:।
४-- धर्म के १०८ अवयवों में किसी एक के अनुकरण से सिद्धता आती है वह " सत्य " है।
५-- सत्य ज्ञानेन्द्रिय का प्रत्यक्ष विषय है।यह केवल वाणी (वाक् तत्त्व) का विषय मात्र नहीं है।
६-- सत्य भी कभी विकर्म होने से पाप का कारक होता है।जीवन रक्षक असत्य धर्म होता है तथा वह सत्य से गुरुतर होता है।
७--सत्य मौन से अधिक पुण्यकारी होता है।
८--सत्य जब व्यवहार का आधार बनता है तो मुकदमे नहीं होते हैं।इसे कहते हैं--सत्येकताना पुरुषा: ।
९--सत्य के अन्वेषण से ही न्याय  को आधार मिलता है।सत्याश्रित निर्णय ही न्याय होता है।
१०-- सत्य को स्थापित करने हेतु दण्ड धर्म का विधान अनिवार्य होता है।
११--जिस देश में जितना सत्य फैलेगा उतना ही FIR कम होगा। अतः कचहरी वाले उपभोक्ता के लिए सत्य कष्टकारी होता है।
यद्यपि सत्य की प्रतिष्ठा के लिए ही न्यायालय बने होते हैं।
यदि न्यायालयों से सत्य पराजित होकर निकलने लगे तो वे न्यायस्थल विश्रामशाला मात्र हो जायेंगे।
        सत्य को हम कहाँ तक उतारना चाहते हैं ?
 यह विषय सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उच्च पद पर बैठे व्यक्ति के लिये सत्य का अपलाप, गोपनीयता के लिए सत्य का पिधान( ढक्कन से बन्द करना)आदि विषय जटिल होते हैं। साथ ही अप्रिय सत्य के उद्गार को प्रिय सत्य में परोसने की शैली ( ट्रेनिंग) का प्रतिपादन अति अनिवार्य होता है।
 परुष सत्य को दबा कर मृदुल पर दृढ़ सत्य की स्थापना ध्येय होना चाहिए।हम सत्य को धरती के वातावरण में कैसे उतारें इस पर स्पष्ट रुचिकर प्रस्तुति होनी चाहिये।
11:57

जाने सुंदरकांड का धार्मिक महत्त्व के सी शर्मा

सुंदर कांड वास्तव में हनुमान जी का कांड है । हनुमान जी का एक नाम सुंदर भी है । सुंदर कांड के लिए कहा गया है -
सुंदरे सुंदरे राम: सुंदरे सुंदरीकथा ।
सुंदरे सुंदरे सीता सुंदरे किम् न सुंदरम् ।।

सुंदर कांड में मुख्य मूर्ति श्री हनुमान जी की ही रखी जानी चाहिए । इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि हनुमान जी सेवक रूप से भक्ति के प्रतीक हैं, अत: उनकी अर्चना करने से पहले भगवान राम का स्मरण और पूजन करने से शीघ्र फल मिलता है । कोई व्यक्ति खो गया हो अथवा पति - पत्नी, साझेदारों के संबंध बिगड़ गए हों और उनको सुधारने की आवश्यकता अनुभव हो रही हो तो सुंदर कांड शीघ्र में कहा गया है -

सकल सुमंगलदायक, रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं, भवसिंधु बिना जलजान ।।

अर्थात् श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का यानी सभी लौकिक एवं परलौकिक मंगलों को देने वाला है, जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर को तर जाएंगे ।

सुंदरकांड में तीन श्लोक, साठ दोहे तथा पांच सौ छब्बीस चौपाइयां हैं । साठ दोहों में से प्रथम तीस दोहों में विष्णुस्वरूप श्री राम के गुणों का वर्णन है । सुंदर शब्द इस कांड में चौबीस चौपाइयों में आया है । सुंदरकांड के नायक रूद्रावतार श्रीहनुमान हैं । अशांत मन वालों को शांति मिलने की अनेक कथाएं इसमें वर्णित हैं ।

इसमें रामदूत श्रीहनुमान के बल , बुद्धि और विवेक का बड़ा ही सुंदर वर्णन है । एक और श्रीराम की कृपा पाकर हनुमान जी अथाहसागर को एक ही छलांग में पार करके लंका में प्रवेश भी पा लेते हैं । बालब्रह्माचारी हनुमान ने विरह - विदग्ध मां सीता को श्रीराम के विरह का वर्णन इतने भावपूर्ण शब्दों में सुनाया है कि स्वयं सीता अपने विरह को भूलकर राम की विरह वेदना में डूब जाती है । 

इसी कांड में विभीषम को भेदनीति, रावण को भेद और दंडनीति तथा भगवत्कृपा प्राप्ति का मंत्र भी हनुमान जी ने दिया है । अंतत: पवनसुत ने सीता जी का आशिर्वाद तो प्राप्त किया ही है, राम काज को पूरा करके प्रभु श्रीराम को भी विरह से मुक्त किया है और उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित भी किया है । 

इस प्रकार सुंदरकांड नाम के साथ साथ इसकी कथा भी अति सुंदर है । अध्यात्मिक अर्थों में इस कांड की कथा के बड़े गंभीर और साधनामार्ग के उत्कृष्ट निर्देशन हैं । अत: सुंदरकांड आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक सभी दृष्टियों से बड़ा ही मनोहारी कांड है ।

सुंदरकांड के पाठ को अमोघ अनुष्ठान माना जाता है ऐसा विश्वास किया जाता है कि सुंदरकांड के पाठ करने से दरिद्रता एवं दुखों का दहन, अमंगलों संकटों का निवारण तथा गृहस्थ जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है । पूर्णलाभ प्राप्त करने के लिए भगवान में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना जरूरी है

Monday, 1 June 2020

19:19

जानिए संकट से बच सकते हैं, महादेव पूजन में पालन करें इन 10 नियमों का - के सी शर्मा



धार्मिक मान्यता है कि सोमवार का व्रत करने से हर व्रती को दु:ख, कष्ट और परेशानियों से छुटकारा मिलता है और वह सुखी, निरोगी और समृद्ध जीवन का आनन्द पाता है। सावन माह में सोमवार को जो भी पूरे विधि-विधान से शिव जी की पूजा करता है वो शिव जी का विशेष आशीर्वाद पा लेता है।

इस दिन व्रत करने से बच्चों की बीमारी दूर होती है, दुर्घटना और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है, मनचाहा जीवनसाथी मिलता है, वैवाहिक जीवन में आ रही परेशानियों का अंत होता है, सरकार से जुड़ी परेशानियों हल हो जाती हैं साथ ही भक्त का आध्यात्मिक उत्थान होता है।
 
सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न व अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए सावन सोमवार का विशेष महत्व है। शिव की उपासना व व्रत करने की अगर विधि सही हो तो शिव जी जल्दी प्रसन्न हो जाते है और अपने भक्त की मनचाही मनोकामना पूरी कर देते हैं। 

 
व्रत के नियम :-
 
1. व्रतधारी को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पानी में कुछ काले तिल डालकर नहाना चाहिए।

 
2. भगवान शिव का अभिषेक जल या गंगाजल से होता है परंतु विशेष अवसर व विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूध, दही, घी, शहद, चने की दाल, सरसों तेल, काले तिल, आदि कई सामग्रियों से अभिषेक की विधि प्रचिलत है।
 
3  तत्पश्चात ॐ नमः शिवाय मंत्र के द्वारा श्वेत फूल, सफेद चंदन, चावल, पंचामृत, सुपारी, फल और गंगाजल या साफ पानी से भगवान शिव और पार्वती का पूजन करना चाहिए।
 
4. मान्यता है कि अभिषेक के दौरान पूजन विधि के साथ-साथ मंत्रों का जाप भी बेहद आवश्यक माना गया है फिर महामृत्युंजय मंत्र का जाप हो, गायत्री मंत्र हो या फिर भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र।
 
5. शिव-पार्वती की पूजा के बाद सावन के सोमवार की व्रत कथा करें।
 
6. आरती करने के बाद भोग लगाएं और घर परिवार में बांटने के पश्चात स्वयं ग्रहण करें।
 
7. दिन में केवल एक समय नमक रहित भोजन ग्रहण करें। 
 
8. श्रद्धापूर्वक व्रत करें। अगर पूरे दिन व्रत रखना सम्भव न हो तो सूर्यास्त तक भी व्रत कर सकते हैं।
 
9. ज्योतिष शास्त्र में दूध को चंद्र ग्रह से संबंधित माना गया है क्योंकि दोनों की प्रकृति शीतलता प्रदान करने वाली होती है। चंद्र ग्रह से संबंधित समस्त दोषों का निवारण करने के लिए सोमवार को महादेव पर दूध अर्पित करें।
 
10. समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए शिवलिंग पर प्रतिदिन गाय का कच्चा दूध अर्पित करें। ताजा दूध ही प्रयोग में लाएं, डिब्बा बंद अथवा पैकेट का दूध अर्पित न करें।

Sunday, 31 May 2020

19:00

जानिए,भगवान शिव के चमत्कारों से भरे ये स्थान, जिन्हें देखकर आप भी रह जाएंगे हैरान - के सी शर्मा




भगवान भोलेनाथ के मंदिर..

भगवान शिव के मंदिरों में चमत्कार की घटनाओं के बारे में कई बार आपने भी सुना होगा। सनातन धर्म के प्रमुख देवों में से एक भगवान शंकर को संहार का देव माना जाता है। ऐसे में देश में कई जगह भगवान भोलेनाथ के मंदिर हैं। जिनमें होने वाली कुछ खास घटनाएं ( परिवर्तन ) हमेशा ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। ऐसे में आज हम आपको कुछ खास महादेव के मंदिरों के बारें में बता रहे हैं, जो आने वाले श्रद्धालुओं को भी आश्चर्य में डाल देते हैं।

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर :-

यह मंदिर अरब सागर के बीच कैम्बे तट पर स्थित है। 150 पहले खोजे गए इस मंदिर का उल्लेख महाशिवपुराण के रुद्रसंहिता में मिलता है। इस मंदिर के शिवलिंग का आकार चार फुट ऊंचा और दो फुट के व्यास वाला है।स्तंभेश्वर महादेव का यह मंदिर सुबह और शाम दिन में दो बार पलभर के लिए गायब हो जाता है। और कुछ देर बाद उसी जगह पर वापस भी आ जाता है। जिसका कारण अरब सागर में उठाने वाले ज्वार-और भांटा को बताया जाता है।

जिस कारण श्रद्धालु मंदिर के शिवलिंग का दर्शन तभी कर सकते हैं जब समुद्र की लहरें पूरी तरह शांत हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है। यह प्रक्रिया प्राचीन समय से ही चली आ रही है।

यहां आने वाले सभी श्रद्धालु को एक खास पर्चे बांटे जाते हैं। जिनमे ज्वार-भांटा आने का समय लिखा होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यहां आनेवाले श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना ना करना पड़े।

इसके अलावे इस मदिर से एक पौराणिक कथा भी जुडी हुई है। कथा केअनुसार राक्षस तारकासुर ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। एक दिन शिव जी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। उसके बाद वरदान के रूप में तारकासुर ने शिव से मांगा की उसे सिर्फ शिवजी का पुत्र ही मार सकेगा। और वह भी छह दिन की आयु का।शिव जी ने यह वरदान तारकासुर को दे दिया और अंतर्ध्यान हो गए।

इधर वरदान मिलते ही तारकासुर तीनो लोक में हाहाकार मचने लगा। जिससे डरकर सभी देवता गण शिव जी के पास गए। देवताओं की आग्रह पर शिव जी ने उसी समय अपनी शक्ति से श्वेत पर्वत कुंड से छह मस्तक,चार आंख और बारह हाथ वाले एक पुत्र को उत्पन्न किया।जिसका नाम कार्तिकेय रखा गया।

जिसके पश्चात् कार्तिकेय ने छह दिन की उम्र में तारकासुर का वध किया। लेकिन जब कार्तिकेय को पता चला की तारकासुर भगवान शंकर का भक्त था तो वो काफी व्यथित हो गए। फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा की उस स्थान पर एक शिवालय बनवा दें। इससे उनका मन शांत होगा। भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। फिर सभी देवताओं ने मिलकर वहीँ सागर संगम तीर्थ पर विश्वनंद स्तम्भ की स्थापना की जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

निष्कलंक महादेव :-

यह मंदिर गुजरात के भावनगर में कोल्याक तट से तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थिर है। रोज अरब सागर की लहरें यहाँ के शिवलिंगो का जलाभिषेक करती है। लोग पैदल चलकर ही इस मंदिर में दर्शन करने जाते हैं। इसके लिए उन्हें ज्वार उतरने का इंतजार करना पड़ता है।

ज्वार के समय सिर्फ मंदिर का खम्भा और पताका ही नजर आता है।जिसे देखकर ये अंदाजा भी नहीं लगा सकता की समुन्द्र में पानी के निचे भगवान महादेव का प्राचीन मंदिर भी है।यह मंदिर महाभारत कालीन बताई जाती है। ऐसा मान जाता है की महाभारत युद्ध में पांडवों ने कौरवों का वध कर युद्ध जीता। पर युद्ध समाप्ति के बाद पांडवों को ज्ञात हुआ की उसने अपने ही सगे सम्बन्धियों के हत्या कर महापाप किया है।

इस महापाप से छुटकारा पाने के लिए पांडव भगवान श्री कृष्ण के पास गए। जहां श्री कृष्ण ने पांडवों को पाप से मुक्ति के लिए एक काला ध्वजा और एक काली गाय सौंपी। और पांडवों को गाय का अनुसरण करने को कहा। और कहा की जब गाय और ध्वजे का रंग काले से सफ़ेद हो जाये तो समझ लेना की तुम सबको पाप से मुक्ति मिल गयी है।

साथ ही श्री कृष्ण ने पांडवों से यह भी कहा की जिस जगह ये चमत्कार होगा वहीं पर तुम भगवान शिव की तपस्या भी करना। पांचों भाई भगवान श्री कृष्ण के कहे अनुसार काली ध्वजा हाथ में लिए काली गाय पीछे-पीछे चलने लगे। इसी क्रम में वो सब कई दिनी तक अलग अलग जगह पर गए। लेकिन गाय और ध्वजा का रंग नहीं बदला।

पर जब वो वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे तो गाय और ध्वजा का रंग सफ़ेद हो गया। इससे पांचों पांडव भाई बड़े खुश हुए। और वहीं पर भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे। भगवान भोलेनाथ उनके तपस्या से खुश हुए और पांचों पांडव को लिंग-रूप में अलग -अलग दर्शन दिए।

वही पांचो शिवलिंग अभी भी वहीं स्थित है। पांचों शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा भी है। पांचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर बने हुए हैं। तथा ये कोलियाक समुद्र तट से पूर्व की ओर तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर में स्थित है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा पानी का तालाब भी है जिसे पांडव तालाब कहते हैं।

श्रद्धालु पहले उसमे अपने हाथ पांव धोते हैं और फिर शिवलिंगों की पूजा अर्चना करते हैं। चूंकि यहां पर आकर पांडवों को अपने भाइयों की हत्या की कलंक से मुक्ति मिली थी इसलिए इसे निष्कलंक महादेव कहते हैं। भादव के महीने में अमावश को यहाँ मेला लगता है जिसे भाद्रवी कहा जाता है।

प्रत्येक अमावस के दिन यहां भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। लोगों की ऐसी मान्यता है की यदि हम प्रियजनों की चिता की आग शिवलिंग पर लगाकर जल में प्रवाहित कर दें तो उनको मोक्ष मिल जाता है। मंदिर में भगवान शिव को राख,दूध-दही और नारियल चढ़ाये जाते हैं।सालाना प्रमुख मेला भाद्रवी भावनगर के महाराजा के वंशज के द्वारा मंदिर की पताका फहराने से शुरू होता है। और फिर यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती है।

अचलेश्वर महादेव मंदिर :-

अचलेश्वर नाम से भारत में महादेव के कई मंदिर हैं। लेकिन राजस्थान के धौलपुर में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर बांकी सभी मंदिरों से अलग है। यह मंदिर राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। जो चम्बल और बीहड़ों के लिए प्रसिद्ध है। भगवान अचलेश्वर महादेव का यह मंदिर इन्ही दुर्गम बीहड़ों के बिच स्थित है।

इस मंदिर का शिवलिंग जो दिन में तीन बार रंग बदलता है। सुबह में शिवलिंग का रंग लाल होता है,दोपहर में केसरिया और जैसे जैसे शाम होती है शिवलिंग का रंग सांवला हो जाता है।इन रंगों के बदलाव के रहस्य को कोई नहीं जनता। अचलेश्वर महादेव का यह मंदिर भी काफी प्राचीन है। चुकी मंदिर का यह इलाका डाकुओ के प्रसिद्ध था जिस वजह से यहां कम श्रद्धालु आते थे।

काम श्रद्धालु आते थे। साथ यहां तक पहुंचाने का रास्ता बहुत ही पथरीला और उबड़-खाबड़ था। पर जैसे जैसे भगवान के बारे में लोग जानने लगे यहां पर भक्तों की भीड़ जुटने लगी। इस शिवलिंग की एक और अनोखी बात यह है की इस शिवलिंग के छोर का आज तक पता नहीं चला है।

कहते हैं बहुत समय पहले एक बार भक्तों ने शिवलिंग की गहराई को जानने के लिए इसकी खुदाई की पर काफी गहराई तक खोदने के बाद भी इसके छोर का पता नहीं चला। अंत में भक्तों ने इसे भगवान का चमत्कार मानते हुए खुदाई बंद कर दी। भक्तों का मानना है की भगवान अचलेश्वर महादेव भक्तों की सभी मनोकामना पूरा करते हैं।

लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर :-

ऐसा माना जाता है की इस मंदिर की स्थापना भगवान राम ने खड़ और दूषण के वध के पश्चात् अपने भाई लक्ष्मण के कहने पर की थी। लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर के गर्भ गृह में एक शिवलिंग है जिसकी स्थापना स्वंय लक्ष्मण ने की थी। इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र हैं। इसलिए इसे लक्ष-लिंग भी कहा जाता है।

इस लाख छिद्रों में से एक छिद्र ऐसा है जो की पाताल गामी है। क्यूंकि उसमे जितना भी जल डालो वह सब उसमे समां जाता है। लेकिन एक छिद्र अक्षय कुंड है क्यूंकि उसमे जल हमेशा ही भरा रहता है। लक्ष-लिंग पर चढ़ाया गया जल मंदिर के पीछे कुंड में भी चले जाने की मान्यता है। क्यूंकि कुंड कभी सूखता नहीं। लक्ष-लिंग जमीन से करीब 30 फिट ऊपर है और इसे स्वयंभू-लिंग भी माना जाता है।

बिजली महादेव मंदिर :-

भगवान शिव के अनेकों अद्भुत मंदिरों में से एक है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित बजली महादेव मंदिर। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में व्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत पर बिजली महादेव का प्राचीन मंदिर है।

पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि ये घाटी ही एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह वर्ष बाद आकाश से भयानक बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहाँ के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े को एकत्रित कर मख्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ समय बाद ही शिवलिंग ठोस रूप में परवर्तित हो जाता है।

Friday, 22 May 2020

17:23

यहीं हनुमान जी को मिली थी तीव्र ताप से मुक्ति


सनातन धर्म में हनुमान को 11वां रुद्रावतार माना जाता है। कलयुग के देव रामभक्त हनुमान चिरंजीवियों में से एक हैं। वहीं ज्योतिष में मंगल के कारक देव होने के कारण सप्ताह में मंगलवार का दिन श्री हनुमान का माना जाता है।

माना जाता है कि चित्रकूट में आज भी हनुमान जी वास करते हैं जहां भक्तों को दैहिक और भौतिक ताप से मुक्ति मिलती है। वहीं चित्रकूट का अध्यात्मिक रुप से भी बड़ा महत्व है। कहते हैं चित्रकूट में ही भगवान श्रीराम ने तुलसीदास जी को दर्शन दिए थे, और यह संभव हुआ था हनुमान जी की कृपा से...

ये भी माना जाता है कि चित्रकूट में ही भगवान राम की कृपा से हनुमान जी को उस ताप से मुक्ति मिली थी जो लंका दहन के बाद हनुमान जी को कष्ट दे रहा था।

इस विषय में एक रोचक कथा भी है, जिसके अनुसार हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा, लंका जलाने के बाद शरीर में तीव्र अग्नि बहुत कष्ट दे रही है। तब श्रीराम ने मुस्कराते हुए कहा कि-चिंता मत करो। चित्रकूट पर्वत पर जाओ। वहां अमृत तुल्य शीतल जलधारा बहती है। उसी से कष्ट दूर होगा।

यहां सीता की रसोई से हनुमान मंदिर तक :-

चित्रकूट में हनुमान जी का एक मंदिर है जिसे हनुमान धारा मंदिर कहते हैं, मान्यता है कि यह लंका जलाने के बाद हनुमान जी के शरीर के तीव्र ताप से मुक्ति का साक्षी है। यहां भगवान श्रीराम का एक छोटा सा मंदिर भी है। हनुमान जी के दर्शन से पहले नीचे बने कुंड में भरे पानी से भक्त हाथ मुंह धोते हैं।

कुछ सालों पहले यहां पंचमुखी हनुमान जी भी प्रगट हुए हैं। यहां सीढ़ियां कहीं सीधी हैं तो कहीं घुमावदार। यहां से ही कुछ ऊपर सीता रसोई है।

जहां माता सीता ने भगवान श्रीराम और देवर लक्ष्मण के लिए कंदमूल से रसोई बनाई थी। माता सीता ने जिन चीजों से यहां रसोई बनाई थी उसके चिन्ह आज भी यहां देखे जा सकते हैं।

ऐसे पहुंचे यहां :-

यहां आने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन चित्रकूट घाम कर्वी है। यूपी संपर्क क्रांति और महाकौशल रोजाना तीर्थयात्रियों को यहां लेकर आती है। यहां मंगलवार, शनिवार के अलावा नवरात्रों और हनुमान जी के जन्मदिन पर श्रद्वालुओं की बड़ी भीड़ होती है।

Thursday, 21 May 2020

19:52

वट सावित्री व्रत आज,जानिए वट वृक्ष पूजा की मान्यताएं और महत्व - के सी शर्मा




वट सावित्री व्रत महिलाएं द्वारा अखण्ड सौभाग्य की कामना के साथ मनाती हैं। इस साल वट सवित्रि व्रत 22 मई, शुक्रवार के दिन है। भारतीय जनमानस में व्रत और त्योहार की विशेष महत्ता है। देशभर में धार्मिक और वैज्ञानिक कारणों से व्रत और त्योहार मनाए जाते है। प्राचीनकाल से भारत वर्ष में प्रत्येक माह कोई न कोई व्रत त्योहार मनाया जाता है। उसी में से एक वट सावित्री व्रत अखण्ड सौभाग्य तथा पयार्वरण संरक्षण और सुरक्षा के लिए मनाया जाता है। वट सावित्री व्रत धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस्या तक उत्तर भारत में और ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में इन्हीं तिथियों में वट सावित्री व्रत दक्षिण भारत में मनाया जाता है।

भारतीय समाज वट वृक्ष का आदर करता है। इसके पीछे भले ही धार्मिक मान्यताएं हों, लेकिन उद्देश्य पयार्वरण संरक्षण का ही जान पड़ता है। पयार्वरण संरक्षण के प्रति प्राचीन काल से ही पूर्वज जागरूक और सक्रिय रहे है यही कारण है कि वृक्षों को धार्मिक आस्था से जोड़ कर त्यौहार और व्रत रहने की परम्परा है। पूर्वजो द्वारा वृक्षों के पूजा के साथ ही साथ उनका संरक्षण प्राथमिकता से किया जाता था। 

 

वट सावित्री व्रत का महत्व :-

जेठ की अमावस्या पर बरगद की पूजा होती आ रही है। वट वृक्ष के नीचे ही सावित्री को अपना सुहाग वापस मिला था। इस पूजा का महत्व जीवन चक्र से जुड़ चुका है। यदि धरती को बचाना है तो बरगद व पीपल के अधिक से अधिक वृक्ष लगाने होंगे। कहावत है कि पीपल में ब्रह्म देव व बरगद में भगवान भैरों का निवास रहता है। इसलिए देवताओं का वास मानकर वृक्षों की पूजा की जाती है। धर्मग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि पीपल के पत्तों में देवी देवता वास करते हैं। इसे ऋषि, मुनियों की दूरदृष्टि ही कहेंगे कि उन्हें आने वाले समय की परेशानियां पता थीं। शायद इसी के चलते उन्होंने इन वृक्षों को धार्मिक महत्व से जोड़ दिया, ताकि ये संरक्षित रहें।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पीपल व बरगद के वृक्ष अन्य की अपेक्षा सर्वाधिक ऑक्सीजन देते हैं। बारिश में दोनों ही वृक्ष अपनी जड़ों से वर्षा का जल भी सर्वाधिक संरक्षित करते हैं। 

 

वट वृक्ष में होता है भगवान के कई रूपों का वास :-

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष जिसका अर्थ है बरगद का पेड़, का खास महत्व होता है। इस पेड़ में लटकी हुई शाखाओं को सावित्री देवी का रूप माना जाता है। वहीं पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास भी माना जाता है। इसलिए कहते हैं कि इस पेड़ की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी का, तने में भगवान विष्णु का तथा डालियों एवं पत्तियों में भगवान शिव का निवास कहा जाता है। इसके साथ ही अक्षय वट वृक्ष के पत्ते पर ही भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कंडेय ऋषि को दर्शन दिए थे यह अक्षय वट वृक्ष प्रयाग में गंगा तट पर वेणीमाधव के निकट स्थित है।

सौभाग्यवती महिलाएं अपने अखण्ड सौभाग्य के लिए आस्था और विश्वास के साथ व्रत रहकर पूजा अर्चना करती है। वट वृक्ष प्राणवायु आक्सीजन प्रदान करने के प्रमुख और महत्वपूर्ण स्रोत है। वट वृक्ष को पृथ्वी का संरक्षक भी कहा जाता है। वट वृक्ष की औसत उम्र 150 से भी अधिक होती है वट वृक्ष पंक्षियो और जन्तुओ को आश्रय प्रदान करता है धार्मिक आस्था के अनुसार वट वृक्ष के जड़ मे व्रहम्मा,तने मे विष्णु और पत्तो पर शिव का वास होता है।

पयार्वरण संरक्षण के वृक्ष सबसे उपयुक्त सहायक है वृक्ष :-

मृदा-निमार्ण,संरक्षण,जैविक उर्वरा-वृद्वि,जीवधारियो के लिए वायुमण्डल मे सही वायु मिश्रण वृद्वि के साथ ही उसे स्वच्छता प्रदान करते रहने एंव भूजल भण्डारण की वृद्व मे सहायक होने की भूमिका का निवार्ह करते है। वट वृक्ष की तो विशेष महत्ता है।

 

न चेते तो बन जाएगा रेगिस्तान :-

वट वृक्ष प्रकृति से ताल-मेल बिठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। मौजूदा समय में पयार्वरण को लेकर पूरा देश चिंतित है। वास्तव में देखा जाए तो पिछले 60 से भी ज्यादा सालों में देश की आजादी के बाद पेड़ तो लगे किन्तु वे पेड़ नहीं लगे जो वास्तव में पयार्वरण के लिए आवश्यक हैं। वनों के कटाव में बढ़ती जनसंख्या का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इससे पयार्वरण प्रदूषण, प्राकृतिक और जैविक असंतुलन बढ़ा है, जिससे पृथ्वी पर प्राणी-मात्र के अस्तित्व का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।  भारत में वृक्षो को धार्मिक आस्था से जोड़ कर त्यौहार और व्रत रहने की परम्परा है। यह व्रत भी इसी मान्यता के तहत मनाया जाता है।
19:39

शुक्रवार मां लक्ष्मी को अर्पित करें ये 5 प्रसाद मिलेगी सफलता धन बरसेगा अपार-के सी शर्मा

इन 5 चीजों के भोग के बिना अधूरी होती है मां लक्ष्मी की पूजा :-
 
धन की देवी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए हम कितने ही उपाय करते हैं। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार मां लक्ष्मी को प्रसाद चढ़ाता है।

यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं ऐसे 5 प्रसाद, जिनके बिना खास तौर पर शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानें कौन-कौन से ये वो खास प्रसाद :- 
 
1. माता लक्ष्मी का प्रिय फल होने के कारण ही नारियल को श्रीफल कहा गया है। अत: लक्ष्मी जी को नारियल का लड्डू, कच्चा नारियल और जल से भरा नारियल अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं।
 

 2. बताशे का संबंध चंद्रमा से भी होता है और चंद्रमा को देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है। यही वजह है कि बताशे मां लक्ष्मी को भी प्रिय हैं। अत: मां लक्ष्मी को बताशे का भोग लगाया जाता है।

 
3. सिंघाड़ा भी मां लक्ष्मी के पसंदीदा फलों में से एक है, पानी में पैदा होने वाला यह फल माता रानी को बहुत प्रिय है। यह एक मौसमी फल है।
 
4. धन की देवी कही जाने वाली माता लक्ष्मी को पान बहुत पसंद है। इसलिए पूजा के बाद देवी को पान का भोग जरूर लगाना चाहिए। 
 
5. मां लक्ष्मी को पानी में उगने वाला फल यानी कि मखाना बहुत प्रिय है, इसका कारण यह है कि यह पानी में एक कठोर आवरण में बढ़ता है और इसलिए यह हर तरह से शुद्ध और पवित्र होता है। अत: लक्ष्मी जी को मखाना चढ़ाने से वे अधिक प्रसन्न होती है तथा अपने भक्त की हर मनोकामना पूरी करती है।

 
इसके अलावा आप अपनी श्रद्धानुसार लक्ष्मी जी को फल, मिठाई, सूखे मेवे आदि का भी भोग लगा सकते हैं। यह प्रसाद आप माता को अर्पित करके जीवन में हर तरह की खुशियां पा सकते हैं।

Wednesday, 20 May 2020

21:11

वट सावित्री व्रत कथा -आचार्य प्राणनाथ मिश्रा की कलम से



🛕आचार्य प्राणनाथ मिश्रा 🛕
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पुरानी कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि एक बार अश्वपति नाम का एक राजा था जो मद्र साम्राज्य पर शासन करता था। वह और उनकी पत्नी निःसंतान थे और इस प्रकार एक ऋषि के कहने पर उन्होंने सूर्य के देवता सावित्र के सम्मान में अत्यंत समर्पण और आस्था के साथ पूजा की।
भगवान इस दंपत्ति की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें एक कन्या प्राप्ति का आर्शीवाद देने का वरदान दिया। उस बच्ची का नाम सावित्री रखा गया क्योंकि वह भगवान सावित्र का दिव्य वरदान था। जैसा कि उसका जन्म अपने पिता की कठोर तपस्या के कारण पड़ा था, लड़की तपस्वी जीवन जीती थी।
काफी लंबे समय से, राजा अपनी बेटी के लिए एक उपयुक्त मिलान खोजने में असमर्थ था, इस प्रकार उसने सावित्री को अपना जीवनसाथी स्वयं खोजने के लिए कहा। अपनी यात्रा के दौरान, उसने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पाया। राजा अंधा था और उसने अपना सारा धन और राज्य खो दिया था। सावित्री ने सत्यवान को अपने उपयुक्त साथी के रूप में पाया, और फिर अपने राज्य में लौट आई।
जब वह घर आईं, तो नारद मुनि भी वहां मौजूद थे, उन्होंने राजा को अपनी पसंद के बारे में बताया। उसकी बात सुनकर, नारद मुनि ने राजा अश्वपति से कहा कि इस संबंध को मना कर दें क्योंकि सत्यवान का जीवन बहुत कम बचा है और वह एक वर्ष में मर जाएगा।
राजा अश्वपति ने सावित्री को उसके लिए किसी और को खोजने के लिए कहा। लेकिन स्त्री गुणों के एक तपस्वी और आदर्श होने के नाते उसने इनकार कर दिया और कहा कि वह केवल सत्यवान से ही शादी करेगी, भले ही उसकी अल्पायु हो या दीर्घायु। इसके बाद सावित्री के पिता सहमत हो गए और सावित्री और सत्यवान विवाह बंधन में बंध गए।
एक साल बाद जब सत्यवान की मृत्यु का समय आने वाला था, सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया और सत्यवान की मृत्यु के निश्चित दिन पर, वह उसके साथ जंगल में चली गई। अचानक सत्यवान एक बरगद के पेड़ के पास गिर गया। जल्द ही, यम प्रकट हुए और सत्यवान की आत्मा को दूर करने ही वाले थे। सावित्री ने यम से कहा कि यदि आप उसे ले जाना चाहते हैं, तो आपको मुझे अपने साथ ले जाना होगा क्योंकि मैं एक पवित्र महिला हूं।
उसके संकल्प और तपस्या को देखकर, भगवान यम ने उसे तीन इच्छाएं मांगने का वरदान दिया। अपनी पहली इच्छा में, उसने राज्य की बहाली के साथ-साथ अपने ससुर की आंखों की रोशनी भी मांगी। दूसरे वरदान में, उसने अपने पिता के लिए 100 पुत्र मांगे, और अंतिम और तीसरे वरदान में उसने सत्यवान से एक पुत्र मांगा।
भगवान यम उसकी सभी इच्छाओं के लिए मान गए, पर सत्यवान को साथ ले जाने वाले थे। सावित्री ने उसे यह कहते हुए रोक दिया कि उसके पति सत्यवान के बिना बेटा पैदा करना कैसे संभव है। भगवान यम अपने शब्दों में फंस गए थे और इस तरह उन्हें सावित्री की भक्ति और पवित्रता देखकर सत्यवान के जीवन को वापस करना पड़ा।
उस दिन के बाद से, वट सावित्री व्रत सैकड़ों हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पतियों की दीर्घायु के लिए मनाया जाता है।
रिपोर्ट-रामजी पांडे
19:26

जानिए वह कौन शिव लिंग है जो दिन में तीन बार रंग बदलता है-के सी शर्मा




अचलेश्वर महादेव के नाम से भारत में कई मंदिर है जिसमे से एक धौलपुर के अचलेश्वर महादेव के बारे में हम आपको बता चुके है।
 जहाँ प्रति दिन में तीन बार रंग बदलने  वाला शिवलिंग है। 
आज हम आपको माउंट आबू के अचलेश्वर महादेव के बारे में बताएंगे जो की दुनिया का ऐसा इकलौत मंदिर है जहां पर शिवजी के पैर के अंगूठे की पूजा होती है।

राजस्थान के एक मात्र हिल स्टेशन माउंट आबू को अर्धकाशी के नाम से भी जाना जाता है क्योकि यहाँ पर भगवान शिव के कई प्राचीन मंदिर है। स्कंद पुराण के मुताबिक वाराणसी शिव की नगरी है तो माउंट आबू भगवान शंकर की उपनगरी ।अचलेश्वर माहदेव मंदिर माउंट आबू से लगभग 11 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलगढ़ के किले के पास स्तिथ है।

मंदिर में प्रवेश करते ही पंच धातु की बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, जिसका वजन चार टन हैं। मंदिर के अंदर गर्भगृह में शिवलिंग पाताल खंड के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जिसके ऊपर एक तरफ पैर के अंगूठे का निशान उभरा हुआ है, जिन्हें स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। यह देवाधिदेव शिव का दाहिना अंगूठा माना जाता है।  पारम्परिक मान्यता है की इसी अंगूठे ने पुरे माउंट आबू के पहाड़ को थाम रखा है जिस दिन अंगूठे का निशाँ गायब हो जाएगा, माउंट आबू का पहाड़ ख़त्म हो जाएगा।

 
मंदिर परिसर के विशाल चौक में चंपा का विशाल पेड़ अपनी प्राचीनता को दर्शाता है। मंदिर की बायीं बाजू की तरफ दो कलात्मक खंभों का धर्मकांटा बना हुआ है, जिसकी शिल्पकला अद्भुत है। कहते हैं कि इस क्षेत्र के शासक राजसिंहासन पर बैठने के समय अचलेश्वर महादेव से आशीर्वाद प्राप्त कर धर्मकांटे के नीचे प्रजा के साथ न्याय की शपथ लेते थे। मंदिर परिसर में द्वारिकाधीश मंदिर भी बना हुआ है। गर्भगृह के बाहर वाराह, नृसिंह, वामन, कच्छप, मत्स्य, कृष्ण, राम, परशुराम, बुद्ध व कलंगी अवतारों की काले पत्थर की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं।

मंदिर की पौराणिक कथा 
पौराणिक काल में जहां आज आबू पर्वत स्थित है, वहां नीचे विराट ब्रह्म खाई थी। इसके तट पर वशिष्ठ मुनि रहते थे। उनकी गाय कामधेनु एक बार हरी घास चरते हुए ब्रह्म खाई में गिर गई, तो उसे बचाने के लिए मुनि ने सरस्वती गंगा का आह्वान किया तो ब्रह्म खाई पानी से जमीन की सतह तक भर गई और कामधेनु गाय गोमुख पर बाहर जमीन पर आ गई। एक बार दोबारा ऐसा ही हुआ। इसे देखते हुए बार-बार के हादसे को टालने के लिए वशिष्ठ मुनि ने हिमालय जाकर उससे ब्रह्म खाई को पाटने का अनुरोध किया। हिमालय ने मुनि का अनुरोध स्वीकार कर अपने प्रिय पुत्र नंदी वद्र्धन को जाने का आदेश दिया। अर्बुद नाग नंदी वद्र्धन को उड़ाकर ब्रह्म खाई के पास वशिष्ठ आश्रम लाया।

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मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार

आश्रम में नंदी वद्र्धन ने वरदान मांगा कि उसके ऊपर सप्त ऋषियों का आश्रम होना चाहिए एवं पहाड़ सबसे सुंदर व विभिन्न वनस्पतियों वाला होना चाहिए। वशिष्ठ ने वांछित वरदान दिए। उसी प्रकार अर्बुद नाग ने वर मांगा कि इस पर्वत का नामकरण उसके नाम से हो। इसके बाद से नंदी वद्र्धन आबू पर्वत के नाम से विख्यात हुआ। वरदान प्राप्त कर नंदी वद्र्धन खाई में उतरा तो धंसता ही चला गया, केवल नंदी वद्र्धन का नाक एवं ऊपर का हिस्सा जमीन से ऊपर रहा, जो आज आबू पर्वत है।
 इसके बाद भी वह अचल नहीं रह पा रहा था, तब वशिष्ठ के विनम्र अनुरोध पर महादेव ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे पसार कर इसे स्थिर किया यानी अचल कर दिया तभी यह अचलगढ़ कहलाया। तभी से यहां अचलेश्वर महादेव के रूप में महादेव के अंगूठे की पूजा-अर्चना की जाती है। इस अंगूठे के नीचे बने प्राकृतिक पाताल खड्डे में कितना भी पानी डालने पर खाई पानी से नहीं भरती। इसमें चढ़ाया जानेवाला पानी कहा जाता है यह आज भी एक रहस्य है।

अचलगढ़ का किला 
अचलेश्वर महादेव मंदिर अचलगढ़ की पहाड़ियों पर अचलगढ़ के किले के पास स्तिथ है।  
अचलगढ़ का किला जो की अब खंडहर में तब्दील हो चूका है,का निर्माण परमार राजवंश द्वारा करवाया गया था।  बाद में 1452 में महाराणा कुम्भा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया तथा इसे अचलगढ़ नाम दिया। महाराणा कुम्भा ने अपने जीवन काल में अनेकों किलों का निर्माण करवाया जिसमे सबसे प्रमुख है कुम्भलगढ़ का दुर्ग, , जिसकी दीवार को विशव की दूसरी सबसे लम्बी दीवार होने का गौरव प्राप्त है।
19:24

क्या आप जानते है हनुमान जी को जब मिले इतने बरदान-के सी शर्मा



वाल्मीकि रामायण के अनुसार, बाल्यकाल में जब हनुमान सूर्यदेव को फल समझकर खाने को दौड़े तो घबराकर देवराज इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र का वार किया। 

वज्र के प्रहार से हनुमान निश्तेज हो गए। यह देखकर वायुदेव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने समस्त संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया।

 संसार में हाहाकार मच गया। तब परमपिता ब्रह्मा ने हनुमान को स्पर्श कर पुन: चैतन्य किया। उस समय सभी देवताओं ने हनुमानजी को वरदान दिए। 
इन वरदानों से ही हनुमानजी परम शक्तिशाली बन गए।

*हनुमानजी को मिले इतने वरदान*

1. भगवान सूर्य ने हनुमानजी को अपने तेज का सौवां भाग देते हुए कहा कि जब इसमें शास्त्र अध्ययन करने की शक्ति आ जाएगी, तब मैं ही इसे शास्त्रों का ज्ञान दूंगा, जिससे यह अच्छा वक्ता होगा और शास्त्रज्ञान में इसकी समानता करने वाला कोई नहीं होगा।

2. धर्मराज यम ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा।

3. यक्षराज कुबेर ने वरदान दिया कि इस बालक को युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा तथा मेरी गदा संग्राम में भी इसका वध न कर सकेगी।

 
4. भगवान शंकर ने यह वरदान दिया कि यह मेरे और मेरे शस्त्रों द्वारा भी अवध्य रहेगा।

5. देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे बनाए हुए जितने भी शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य रहेगा और चिंरजीवी होगा।

6. देवराज इंद्र ने हनुमानजी को यह वरदान दिया कि यह बालक आज से मेरे वज्र द्वारा भी अवध्य रहेगा।

7. जलदेवता वरुण ने यह वरदान दिया कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी।

8. परमपिता ब्रह्मा ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह बालक दीर्घायु, महात्मा और सभी प्रकार के ब्रह्दण्डों से अवध्य होगा। युद्ध में कोई भी इसे जीत नहीं पाएगा। यह इच्छा अनुसार रूप धारण कर सकेगा, जहां चाहेगा जा सकेगा। इसकी गति इसकी इच्छा के अनुसार तीव्र या मंद हो जाएगी।

9. इसके अलावा जब हनुमानजी माता सीता को खोजते हुए अशोक वाटिका पहुंचे थे तब माता सीता ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था।

Sunday, 17 May 2020

15:32

जानिए क्यों चढ़ाते हैं शिवलिंग पर भस्म - के सी शर्मा

शिवजी के पूजन में भस्म अर्पित करने का विशेष महत्व है। बारह ज्योर्तिलिंग में से एक उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन भस्म आरती विशेष रूप से की जाती है। यह प्राचीन परंपरा है। आइए जानते है शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर भस्म क्यों अर्पित की जाती है…

शिवजी का रूप है निराला :-

भगवान शिव अद्भुत व अविनाशी हैं। भगवान शिव जितने सरल हैं, उतने ही रहस्यमयी भी हैं। भोलेनाथ का रहन-सहन, आवास, गण आदि सभी देवताओं से एकदम अलग हैं। शास्त्रों में एक ओर जहां सभी देवी-देवताओं को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव का रूप निराला ही बताया गया है। शिवजी सदैव मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किए रहते हैं और शरीर पर भस्म (राख) लगाए रहते हैं।

भस्म का रहस्य :-

शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म यानी राख है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढंका रहता है। शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि का सार है, एक दिन संपूर्ण सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित हो जानी है। ऐसा माना जाता है कि चारों युग (त्रेता युग, सत युग, द्वापर युग और कलियुग) के बाद इस सृष्टि का विनाश हो जाता है और पुन: सृष्टि की रचना ब्रह्माजी द्वारा की जाती है। यह क्रिया अनवरत चलती रहती है। इस सृष्टि के सार भस्म यानी राख को शिवजी सदैव धारण किए रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जानी है।

ऐसे तैयार की जाती है भस्म :-

शिवपुराण के लिए अनुसार भस्म तैयार करने के लिए कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर के वृक्ष की लकडिय़ों को एक साथ जलाया जाता है। इस दौरान उचित मंत्रोच्चार किए जाते हैं। इन चीजों को जलाने पर जो भस्म प्राप्त होती है, उसे कपड़े से छान लिया जाता है। इस प्रकार तैयार की गई भस्म शिवजी को अर्पित की जाती है।
भस्म से बढ़ता है आकर्षण
ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार तैयार की गई भस्म को यदि कोई इंसान भी धारण करता है तो वह सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करता है। शिवपुराण के अनुसार ऐसी भस्म धारण करने से व्यक्ति का आकर्षण बढ़ता है, समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता है। अत: शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाना चाहिए।

भस्म से होती है शुद्धि :-

जिस प्रकार भस्म यानी राख से कई प्रकार की वस्तुएं शुद्ध और साफ की जाती है, ठीक उसी प्रकार यदि हम भी शिवजी को अर्पित की गई भस्म का तिलक लगाएंगे तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होगी और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

भस्म की विशेषता :-

भस्म की यह विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसे शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम भी करती है। शिवजी का निवास कैलाश पर्वत पर बताया गया है, जहां का वातावरण एकदम प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल वातावरण को अनुकूल बनाने में भस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भस्म धारण करने वाले शिव संदेश देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल लेना चाहिए। जहां जैसे हालात बनते हैं, हमें भी स्वयं
को उसी के अनुरूप बना लेना चाहिए।

भगवान शिव ने अपने तन पर जो भस्म रमाई है वह उनकी पत्नी सती की चिता की भस्म थी जो कि अपने पिता द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत हो वहां हो रहे यज्ञ के हवनकुंड में कूद गई थी। भगवान शिव को जब इसका पता चला तो वे बहुत बेचैन हो गये। जलते कुंड से सती के शरीर को निकालकर प्रलाप करते हुए ब्रह्माण्ड में घूमते रहे। उनके क्रोध व बेचैनी से सृष्टि खतरे में पड़ गई।

जहां जहां सती के अंग गिरे वहां शक्तिपीठ की स्थापना हो गई। पिर भी शिव का संताप जारी रहा। तब श्री हरि ने सती के शरीर को भस्म में परिवर्तित कर दिया। शिव विरह की अग्नि में भस्म को ही उनकी अंतिम निशानी के तौर पर तन पर लगा लिया।

पहले भगवान श्री हरि ने देवी सती के शरीर को छिन्न भिन्न कर दिया था। जहां जहां उनके अंग गिरे वहीं शक्तिपीठों की स्थापना हुई। लेकिन पुराणों में भस्म का विवरण भी मिलता है।

भगवान शिव के तन पर भस्म रमाने का एक रहस्य यह भी है कि राख विरक्ति का प्रतीक है। भगवान शिव चूंकि बहुत ही लौकिक देव लगते हैं। कथाओं के माध्यम से उनका रहन-सहन एक आम सन्यासी सा लगता है। एक ऐसे ऋषि सा जो गृहस्थी का पालन करते हुए मोह माया से विरक्त रहते हैं और संदेश देते हैं कि अंत काल सब कुछ राख हो जाना है।

एक रहस्य यह भी हो सकता है चूंकि भगवान शिव को विनाशक भी माना जाता है। ब्रह्मा जहां सृष्टि की निर्माण करते हैं तो विष्णु पालन-पोषण लेकिन जब सृष्टि में नकारात्मकता बढ़ जाती है तो भगवान शिव विध्वंस कर डालते हैं। विध्वंस यानि की समाप्ति और भस्म इसी अंत इसी विध्वंस की प्रतीक भी है। शिव हमेशा याद दिलाते रहते हैं कि पाप के रास्ते पर चलना छोड़ दें अन्यथा अंत में सब राख ही होगा। 

महाकाल की भस्मार्ती :-

उज्जैन स्थित महाकालेश्वर की भस्मार्ती विश्व भर में प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है क‌ि वर्षों पहले श्मशान भस्‍म से भूतभावन भगवान महाकाल की भस्‍म आरती होती थी लेक‌िन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है और अब कंडे की भस्‍म से आरती-श्रृंगार क‌िया जा रहा है। वर्तमान में महाकाल की भस्‍म आरती में कपिला गाय के गोबर से बने औषधियुक्त उपलों में शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर बनाई भस्‍म का प्रयोग क‌िया जाता है।

जलते कंडे में जड़ीबूटी और कपूर-गुगल की मात्रा इतनी डाली जाती है कि यह भस्म ना सिर्फ सेहत की दृष्टि से उपयुक्त होती है बल्कि स्वाद में भी लाजवाब हो जाती है। श्रौत, स्मार्त और लौकिक ऐसे तीन प्रकार की भस्म कही जाती है। श्रुति की विधि से यज्ञ किया हो वह भस्म श्रौत है, स्मृति की विधि से यज्ञ किया हो वह स्मार्त भस्म है तथा कण्डे को जलाकर भस्म तैयार की हो वह लौकिक भस्म है।

शिव का शरीर पर भस्म लपेटने का दार्शनिक अर्थ यही है कि यह शरीर जिस पर हम घमंड करते हैं, जिसकी सुविधा और रक्षा के लिए ना जाने क्या-क्या करते हैं एक दिन इसी इस भस्tम के समान हो जाएगा। शरीर क्षणभंगुर है और आत्मा अनंत।

कई सन्यासी तथा नागा साधु पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं। यह भस्म उनके शरीर की कीटाणुओं से तो रक्षा करता ही है तथा सब रोम कूपों को ढंककर ठंड और गर्मी से भी राहत दिलाती है।

रोम कूपों के ढंक जाने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती इससे शीत का अहसास नहीं होता और गर्मी में शरीर की नमी बाहर नहीं होती। इससे गर्मी से रक्षा होती है। मच्छर, खटमल आदि जीव भी भस्म रमे शरीर से दूर रहते हैं।
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धर्मशास्त्रों के अनुसार इस कुए के दर्शन मात्र से ही नागदंश के भय से मुक्ति मिल जाती है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार इस कुए के दर्शन मात्र से ही नागदंश के भय से मुक्ति मिल जाती है। के सी शर्मा



आज हम आपको एक अद्भुत कुए से अवगत करने जा रहें है। जिसके बारे में मान्यता है कि यह कुआ इतना गहरा है की इसकी अथाह गहराई नागलोक तक जाती है। जी हाँ यह सत्य है यह कुआ काशी के नवापुरा क्षेत्र में है। यह कुआ कारकोटक नाग तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। और इस कुएं की गहराई कितनी है इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं।

धर्मशास्त्रों के अनुसार इस कुए के दर्शन मात्र से ही नागदंश के भय से मुक्ति मिल जाती है।

बताया जाता है करकोटक नाग तीर्थ के नाम से विख्यात इसी पवित्र स्थान पर शेषावतार (नागवंश) के महर्षि पतंजलि ने व्याकरणाचार्य पाणिनी के महाभाष्य की रचना की थी।

मान्यता यह भी है की इस कुएं का रास्ता सीधे नाग लोक को जाता है।

इस कुए की सबसे बड़ी महत्ता ये हैं की इसमें स्नान व पूजा मात्र से ही सारे पापों का नाश हो जाता है।

कुए में स्नान मात्र से ही नाग दोष से मुक्ति मिल जाती है, ऐसी मान्यता है।

इस कुएं का रास्ता सीधे नाग लोक को जाता है। पूरे विश्व में काल सर्प दोष की सिर्फ तीन जगह ही पूजा होती हैं उसमे से ये कुंड प्रधान कुंड हैं।

चमत्कारिक मंदिर :-

यहाँ मंदिर में वैसे तो नागपंचमी के दिन छोटे गुरू और बड़े गुरू के लिए जो शब्द प्रयोग किया जाता है। उससे तात्पर्य यह है कि हम बड़े व छोटे दोनों ही नागों का सम्मान करते हैं । और दोनों की ही विधिविधानपूर्वक पूजन अर्चन करते हैं।

यहाँ पर हम आपको बता दें यह दोनों शब्द हमारी आस्था से गहरे जुड़े हुए हैं।

क्योंकि महादेव के श्रृंगार के रूप में उनके गले में जो सजे है वे है बड़े नागदेव हैं । तो वहीं उनके पैरों के समीप छोटे-छोटे नाग भी हैं वे छोटे नागदेव है।

व्याकरण की दृष्टि से अगर देखे तो पतंजलि ऋषि को बड़े गुरू और पाणिनी ऋषि को छोटे गुरू की संज्ञा दी जाती है। यह गुरू शब्द का प्रयोग एकमात्र काशी की ही परंपरा से जुड़ी हुई है। क्योकि इन दोनों ही ऋषियों ने व्याकरण को विस्तारित रूप देने का काम किया है।

॥ जय भोलेनाथ ॥

Saturday, 16 May 2020

18:50

क्या आप जानते हैं कि भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई थी के सी शर्मा

हम सभी को पता है कि कृष्ण का जन्म कैसे हुआ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई थी?
 
महाभारत का युद्ध हुआ था, तब वे लगभग 56 वर्ष के थे। उनका जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। इस मान से 3020 ईसा पूर्व उन्होंने 92 वर्ष की उम्र में देह त्याग दी थी। कैसे पढ़े पूरी स्टोरी –

भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगाव, बरसाना आदि जगहों पर बीता। अपने मामा कंस का वध करने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता को कंस के कारागार से मुक्त कराया और फिर जनता के अनुरोध पर मथुरा का राजभार संभाला। कंस के मारे जाने के बाद कंस का ससुर जरासंध कृष्ण का कट्टर शत्रु बन गया। जरासंध के कारण कालयवन मारा गया। उसके बाद कृष्ण ने द्वारिका में अपना निवास स्थान बनाया और वहीं रहकर उन्होंने महाभारत युद्ध में भाग लिया। महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण ने 36 वर्ष तक द्वारिका में राज्य किया।

‘ततस्ते यादवास्सर्वे रथानारुह्य शीघ्रगान, प्रभासं प्रययुस्सार्ध कृष्णरामादिमिर्द्विज। प्रभास समनुप्राप्ता कुकुरांधक वृष्णय: चक्रुस्तव महापानं वसुदेवेन नोदिता:, पिवतां तत्र चैतेषां संघर्षेण परस्परम्, अतिवादेन्धनोजज्ञे कलहाग्नि: क्षयावह:’। -विष्णु पुराण

धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अंत में दुर्योधन आदि मारे गए और कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत युद्ध के पश्चात सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गए। गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थीं। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे 100 पुत्रों का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस शाप को पूर्ण करने के लिए अपने कुल के यादवों की मति फेर दी। इसका यह मतलब नहीं कि उन्होंने यदुओं के वंश के नाश का शाप दिया था। सिर्फ कृष्ण वंश को शाप था। महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण द्वारिका में ही रहते थे। पांडव भी युधिष्ठिर को राज्य सौंपकर जंगल चले गए थे। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। गांधारी के बाद इस पर दुर्वासा ऋषि ने भी शाप दे दिया कि तुम्हारे वंश का नाश हो जाए। उनके शाप के प्रभाव से कृष्ण के सभी यदुवंशी भयभीत हो गए। इस भय के चलते ही एक दिन कृष्ण की आज्ञा से वे सभी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में आ गए। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले होकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ ही जीवित बचे रह गए।

एक कथा के अनुसार संयाग से साम्ब के पेट से निकले मूसल को जब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से रगड़ा गया था तो उसके चूर्ण को इसी तीर्थ के तट पर फेंका गया था जिससे उत्पन्न हुई झाड़ियों को यादवों ने एक-दूसरे को मारना शुरू किया था। ऋषियों के श्राप से उत्पन्न हुई इन्हीं झाड़ियों ने तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों का काम किया ओर सारे प्रमुख यदुवंशियों का यहां विनाश हुआ।

महाभारत के मौसल पर्व में इस युद्ध का रोमांचकारी विवरण है। सारे यादव प्रमुख इस गृहयुद्ध में मारे गए। बचे लोगों ने कृष्ण के कहने के अनुसार द्वारका छोड़ दी और हस्तिनापुर की शरण ली। यादवों और उनके भौज्य गणराज्यों का अंत होते ही कृष्ण की बसाई द्वारका सागर में डूब गई। भगवान कृष्ण इसी प्रभाव क्षेत्र में अपने कुल का नाश देखकर बहुत व्यथित हुए। वे वहीं रहने लगे। उनसे मिलने कभी-कभार युधिष्ठिर आते थे।

 

एक दिन वे इसी प्रभाव क्षेत्र के वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी ‘जरा’ नामक एक बहेलिए ने भूलवश उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी। महाभारत युद्ध के ठीक 36 वर्ष बाद उन्होंने अपनी देह इसी क्षेत्र में त्याग दी थी। अंत में कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।