Tap news india

Hindi news ,today news,local news in india

Breaking news

गूगल सर्च इंजन

Showing posts with label जानकारियां. Show all posts
Showing posts with label जानकारियां. Show all posts

Thursday, 22 October 2020

17:57

जाने नवरात्रि में व्रत आहार का महत्व :deepak tiwari

नवरात्रि के दौरान नौ दिन तक दूध या दही ज़रूर लें, वजन अधिक हो तो पूरी के बजाय रोटी ही खाएं ताकि वेट न बढ़े
नवरात्र के व्रत में आपकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत रहे, इसके लिए फलाहार में पोषण जोड़ सकते हैं। कैसे, आइए जानते हैं।
व्रत में पोषण करें पूरा
कोरोना के इस दौर में लोग नवरात्र का व्रत भी रखेंगे, परंतु अभी एक चिंता का विषय है- रोग-प्रतिरोधक क्षमता। भूखे रहने पर यह क्षमता प्रभावित होती है। दरअसल, जब भोजन नहीं करते या ज़रूरत से कम करते हैं, तो शरीर पर अधिक भार पड़ता है। शरीर को काम तो सभी करने होते हैं, किंतु भोजन और पोषक तत्व सीमित मिलते हैं और उन्हीं में उसे सारा काम चलाना पड़ता है। ऐसे में व्रत कैसे रखना है, ताकि रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी मज़बूत बनी रहे, आइए, इसके बारे में जानते हैं।
दूध से मिलेगा पोषण
व्रत में दूध और दही का उपयोग बहुत आसानी से किया जा सकता है। फलों का उपयोग भी किया जाता है। आलू, साबूदाना और सिंघाड़े के आटे का उपयोग किया जाता है। इसमें दूध का सेवन बहुत ज़रूरी है। दूध या दही का सेवन दिन में 3 छोटे कप या 2 गिलास ज़रूर करें। इस दूध या दही को केले के साथ ले सकते हैं, आलू की टिक्की के साथ ले सकते हैं या फिर साबूदाने की खीर बनाकर ले सकते हैं, ये पसंद पर निर्भर करता है। दूध पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन बी 12 देगा। वहीं दही इनके साथ-साथ पाचन क्रिया को दुरुस्त रखेगा।
रात का भोजन ऐसा हो
यह भी ध्यान दें कि दोपहर और रात के खाने में किसी भी प्रकार की रोटी को शामिल करना ज़रूरी है। ऐसे में साबूदाना या सिंघाड़े के आटे की रोटी का उपोग करें। अगर वज़न नियंत्रण में है, तो रोटी की जगह सिंघाड़े की पूड़ी या पराठा भी खा सकते हैं। कुछ लोग उबले आलू को सिंघाड़े के आटे के साथ मिलाकर पूड़ी आदि व्यंजन बनाते हैं। अगर वज़न अधिक है तो ऐसे में रोटी का ही उपयोग करें।
ज़रूरी विटामिन मिलेंगे
सिंघाड़े का आटा रेशे से भरपूर होता है जो बहुत सारे खनिज देगा, इसलिए दिन में कम से कम एक समय के खाने में साबूदाने की जगह पर सिंघाड़े का आटा उपयोग करें। ये भी ध्यान रखें कि केला, पपीता आदि ऊर्जा देते हैं, इसलिए व्रत के तीनों समय के आहार यानी कि सुबह के नाश्ते और दोपहर व रात के भोजन में फलों का उपयोग भी अवश्य करिए। इस समय मौसंबी, पपीता, केला ले सकते हैं। इनसे विटामिन सी, फाइबर, विटामिन ए और अन्य विटामिनों की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
दालों की दूर होगी कमी
व्रत में दालों का उपयोग नहीं किया जाता, ऐसे में कम से कम एक मुट्ठी मूंगफली, बादाम और काजू का मिश्रण ज़रूर लें। पूरे दिन में अपने खाने में एक चम्मच तिल का उपयोग ज़रूर करें। चाहें तो तिल को आटे में गूंध सकते हैं, साबूदाने की खिचड़ी या आलू की टिक्की में मिलाकर भी ले सकते हैं। पर ध्यान रहे कि तिल को चबाकर ज़रूर खाएं ताकि इसका पूरा फ़ायदा मिले।
रात के समय का पोषण
रात में सोने से पहले एक कप दूध में आधा चम्मच हल्दी डालकर अवश्य लीजिए। पर्याप्त पानी पीना आवश्यक होगा। साथ ही शुद्ध और साफ़ हवा में सैर करें या छत पर ज़रूर टहलें।

Friday, 16 October 2020

17:21

58 वर्षों बाद इस नवरात्रि बन रहा है यह दुर्लभ योग -आचार्य प्राण गुरू जी

नई दिल्ली :देवी भगवती की व‍िशेष पूजा और अर्चना का पर्व शारदीय नवरात्रि 17 अक्‍टूबर दिन शनिवार यानी क‍ि कल से शुरू हो रहा है। यह पर्व 25 अक्टूबर तक चलेगा। 9 दिन मां भगवती की भक्ति से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा। बता दें क‍ि इस बार की शारदीय नवरात्रि अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंक‍ि इस बार पूरे 58 वर्षों के बाद शनि, मकर में और गुरु, धनु राशि में रहेंगे। इससे पहले यह योग वर्ष 1962 में बना था। तो आइए जानते हैं कलश स्‍थापना का शुभ मुहूर्त, नवरात्र के नौ द‍िन होने वाले मां के अलग-अलग स्‍वरूप, नौ द‍िनों के नौ रंग खास और नौ द‍िनों के भोग व‍िशेष क्‍या हैं?

2/5शारदीय नवरात्रि का शुभ मुहूर्त

इस बार का शारदीय नवरात्रि आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी क‍ि 17 अक्टूबर को पड़ रही है। इसी द‍िन कलश स्‍थापना होगी। कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 06 बजकर 27 मिनट से शुरू होकर 10 बजकर 13 मिनट तक है। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 29 मिनट तक है।
ऐसे हुई थी शारदीय नवरात्रि की शुरुआत जानिए पौराणिक कथा

3/5जानें कौन से द‍िन होगी देवी के क‍िस रूप की पूजा



मां शैलपुत्री पूजा घटस्थापना : 17 अक्टूबर

मां ब्रह्मचारिणी पूजा : 18 अक्टूबर

मां चंद्रघंटा पूजा : 19 अक्टूबर

मां कुष्मांडा पूजा : 20 अक्टूबर

मां स्कंदमाता पूजा : 21 अक्टूबर

षष्ठी मां कात्यायनी पूजा : 22 अक्टूबर

मां कालरात्रि पूजा : 23 अक्टूबर

मां महागौरी दुर्गा पूजा : 24 अक्टूबर

मां सिद्धिदात्री पूजा : 25 अक्टूबर

4/5नवरात्रि के ये 9 रंग हैं खास, इन्‍हें धारण करके करें पूजा



देवी शैलपुत्री: देवी मां के इस स्‍वरूप को पीला रंग अत्‍यंत प्र‍िय है। इसल‍िए इस द‍िन पीला रंग पहनना शुभ माना जाता है।

देवी ब्रह्मचारिणी: देवी ब्रह्मचारिणी को हरा रंग अत्‍यंत प्र‍िय है। इसल‍िए नवरात्रि के दूसरे दिन हरे रंग का वस्‍त्र धारण करें।

देवी चंद्रघंटा: देवी चंद्रघंटा को प्रसन्‍न करने के ल‍िए नवरात्रि के तीसरे दिन हल्का भूरा रंग पहनें।

देवी कूष्माण्डा: देवी कूष्‍मांडा को संतरी रंग प्र‍िय है। इसल‍िए नवरात्रि के चौथे दिन संतरी रंग के कपड़े पहनें।

देवी स्कंदमाता: देवी स्‍कंदमाता को सफेद रंग अत्‍यंत प्र‍िय है। इसल‍िए नवरात्रि के पांचवे द‍िन सफेद रंग के वस्‍त्र पहनें।

देवी कात्यायनी: देवी मां के इस स्‍वरूप को लाल रंग अत्‍यंत प्रिय है। इसल‍िए इस द‍िन मां की पूजा करते समय लाल रंग का वस्‍त्र पहनें।

देवी कालरात्रि: भगवती मां के इस स्‍वरूप को नीला रंग अत्‍यंत प्र‍िय है। इसल‍िए नवरात्रि के सातवें द‍िन नीले रंग के वस्‍त्र पहनकर मां की पूजा-अर्चना की जानी चाह‍िए।

देवी महागौरी: देवी महागौरी की पूजा करते समय गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। अष्टमी की पूजा और कन्या भोज करवाते इसी रंग को पहनें।

देवी सिद्धिदात्री: देवी मां के इस स्‍वरूप को बैंगनी रंग अत्‍यंत प्रिय है। इसल‍िए नवमी त‍िथ‍ि के द‍िन भगवती की पूजा करते समय बैंगनी रंग के वस्‍त्र पहनने चाह‍िए।

शारदीय नवरात्र 17 से, इस बार घोड़े पर सवार होकर आएंगी देवी भगवती, जान‍िए क्‍या है मतलब

5/5देवी मइया को लगाएं ये भोग, होंगी पूरी मुरादें



नवरात्रि के पहले दिन मां के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करें। ऐसा करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है।

नवरात्रि के दूसरे दिन मां को शक्‍कर का भोग लगाकर घर के सभी सदस्यों में बांटें। इससे आयु वृद्धि होती है।

नवरात्रि के तीसरे दिन देवी भगवती को दूध या खीर का भोग लगाएं। इसके बाद इसे ब्राह्मणों को दान कर दें। ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

नवरात्रि के चौथे दिन देवी मां को मालपुए का भोग लगाएं। इसके बाद इसे जरूरतमंदों को दान कर दें। ऐसा करने से व्‍यक्ति की बौद्धिक क्षमता का व‍िकास होता है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां को केले का भोग अर्पित करें। ऐसा करने से जातक न‍िरोगी रहता है।

नवरात्रि के छठवें द‍िन मां भगवती को शहद का भोग लगाएं। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से आकर्षण भाव में वृद्धि होती है।

नवरात्रि के सातवें द‍िन देवी मां गुड़ का भोग लगाएं। इसके बाद यह भोग न‍िराश्रितजनों और दिव्‍यांगों को बांट दें। ऐसा करने से देवी मां प्रसन्‍न होती हैं और ऐश्‍वर्य-वैभव की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि के आठवें दिन माता भगवती को नारियल का भोग लगाकर वह नारियल दान कर दें। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से संतान संबंधी सभी परेशानियों से राहत म‍िलती है

नवरात्रि के नवें द‍िन देवी भगवती को त‍िल का भोग लगाएं। इसके बाद यह भोग क‍िसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान कर दें। इससे अकाल मृत्‍यु से राहत म‍िलती है।

Thursday, 8 October 2020

20:48

जानिए किसकी पूजा से होता है जीवन मे बदलाव आचार्य पंडित हेमराज शास्त्री की कलम से TAP NEWS

सवाई माधोपुर@ रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। सवाई माधोपुर निवासी आचार्य पंडित हेमराज शास्त्री (लाखनपुर वाले) बताते हैं कि हमारे हिंदू धर्म में कुछ लोग शिव को ईश्वर मानते हैं,तो कुछ नारायण को और श्रीराम व श्रीकृष्ण आदि अनेकों नामों से लोग ईश्वर को पूजते हैं। कुछ लोग कहते हैं ईश्वर एक है और स्पष्ट भी है कि ईश्वर के कई नाम है परंतु जो भी हो एकेश्वरवाद में एक संदेश छुपा है वह है इष्ट देव का हिंदू धर्म में देवी-देवताओं के अलग-अलग नाम और उनके स्वरूप का वर्णन मिलता है।
शास्त्री जी का कहना है, कि जो लोग आस्थावान हैं उनके लिए यह प्रश्न काफी महत्वपूर्ण है कि मुझे किसकी पूजा करनी चाहिए।
कहते हैं कि मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है यदि पूजा भी करेगा तो उसके पीछे भी उसका स्वार्थ होगा चाहे वह मोक्ष प्राप्ति ही क्यों ना हो अब यदि मनुष्य स्वार्थी है तो उसे अपने हितसाधन के अनुरूप ही अपना एक चुनना चाहिए।
ख्वाहिश एक और मन्नतें कई
जीवन की किसी विशेष इच्छा की पूर्ति के लिए कई बार हम मन्नत मांगते हैं मंदिर गए तो वहां मन्नत मांग ली गुरुद्वारा गए तो वहां भी मन्नत मांग ली और अधिकतर लोग यह भूल जाएंगे की मन्नत कहां कहां मांगी है क्या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हमें ईश्वर के किसी भी रूप पर पूर्ण विश्वास नहीं है और यदि विश्वास है तो डगमगाता क्यों है।
कर्ज खत्म करने के लिए क्या करें
मूर्ती कौन सी चुने
अब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सवाल उठाते हैं पूजा में मूर्ती का क्या महत्व है क्या आवश्यकता है और पत्थर की पूजा क्यों करें। मूर्ती का एक ख़ास महत्व है। मूर्ती एक प्रतीक है। यह याद रखने के लिए कि हम अमुक देवी देवता के लिए कर्म कर रहे हैं फिर चाहे पत्थर हो या किसी प्रकार की धातु। मन तब तक एकाग्र नहीं होगा जब तक अंतर्मन में ईश्वर के प्रति एक छवि नहीं बनेगी। किसी भी मूर्ती का अखंडित होना सुन्दर होना मन में एक उमंग पैदा करता है एक पवित्रता का संचार होता है।
मूर्ती में प्राण प्रतिष्ठा का विधान है जो शुद्धिकरण का एक चरण है। हम किसी पत्थर की पूजा नहीं कर रहे हैं हम अपने मन को एकाग्र करके शुद्ध कर रहे हैं जो शुद्धता लम्बे समय तक बनी रहती है उसमे सकारात्मक परिवर्तन होता है। कहते हैं न की मन चंगा तो कटौती में गंगा। मन साथ नहीं है तो पूजा करने से पहले मन को शांत करने का उपाय करना होगा। हमारे मन की ताकत असीम है और इस ताकत में वृद्धि होती है जब ईश्वर का प्रतीक सामने होता है।
ऐसे होती है पूजा निष्फल
एक इष्ट चुनें
सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपके जीवन का लक्ष्य क्या है।
धन और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए कुबेर गणेश और महालक्ष्मी, शत्रुओं के नाश के लिए प्रतिस्पर्धा में विजय प्राप्ति के लिए तथा सर्वत्र सफलता प्राप्ति के लिए बगलामुखी, महाकाली तथा छिन्नमस्ता, रोग नाश तथा स्वास्थ्य लाभ के लिए श्री राम रक्षा स्त्रोत, मोक्ष प्राप्ति के लिए शिव, पितरों की संतुष्टि के लिए ब्रह्मा, संतान और संपूर्ण परिवार के लिए विष्णु को इष्ट देव मानकर पूजा प्रारंभ करें।
एक ही मंत्र का चुनाव करें तथा अभीष्ट सिद्धि होने तक किसी अन्य मंत्र का जाप ना करें अपना लक्ष्य सीमित रखें पूजा स्थान बार-बार ना बदले पूजा का समय एक सा रखें मंत्र पढ़ने का तरीका एक रखे यानी मानसिक जप कर रहे हैं तो केवल मानसिक जप करें उपांशु कर रहे हैं तो केवल उपांशु करें जो भी करें उसमें कंसिस्टेंसी रखें माला आसन आदि सब कुछ एक जैसा ही रहे।
स्थिरता जरूरी है
कैसा भी कार्य हो स्थिरता (Consistency) का अपना महत्व होता है कंसंट्रेशन और कंसिस्टेंसी का सही तालमेल और आपकी भावना को मिलाकर जो पूजा की जाती है वह जल्दी सिद्ध होती है।
निष्कर्ष यही है कि पूजा हो प्रार्थना हो या फिर देव दर्शन की इच्छा हो मन का एकाग्र रहना अति आवश्यक है यदि आपका मन आपके साथ हैं है तो किसी भी तरह से अच्छे की उम्मीद करना व्यर्थ है

Sunday, 4 October 2020

18:38

जाने रोज सुबह आंवला खाने के फायदे:deepak tiwari

आंवला खाने के फायदे:deepak tiwari रोज कच्चा आंवला खाने से कम होगा वजन, इसमें मौजूद विटामिन सी की अधिक मात्रा आपकी इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करेगी आमतौर पर आंवले का सेवन बालों को काला, घना बनाने के लिए किया जाता है। लेकिन ये सिर्फ़ बालों की ही नहीं बल्कि शरीर की कई अन्य दिक़्क़तों को भी दूर भगाने में मददगार है। आंवला बहुत ही पौष्टिक होता है। यह अपने एंटीऑक्सीडेंट्स के कारण सौंदर्य प्रसाधनों में अधिक उपयोग में लाया जाता है। इसे आयुर्वेदिक दवा के रूप में त्वचा और बालों के स्वास्थ्य में सुधार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आइए जानते हैं कि आंवला और किस प्रकार से हमारे लिए फ़ायदेमंद है।
पाचन क्रिया में लाभ
कई फलों की तरह आंवले में भी फाइबर भरपूर मात्रा में होता है जो पाचन क्रिया सुचारु रखने में मददगार है। इसलिए आंवले का सेवन पेट संबंधी विकारों को दूर करता है।
मधुमेह पर नियंत्रण
आंवले में क्रोमियम होता है, जो डायबिटीज़ के इलाज में महती भूमिका निभाता है।
वज़न घटाने में मददगार
वज़न कम करने के लिए कच्चा आंवला खाएं। इसके अलावा आंवले के पाउडर को शहद और गुनगुने पानी के साथ पिएं। कुछ ही दिनों में अंतर दिखने लगेगा।
माहवारी नियमित रखे
माना जाता है कि आंवले में पाए जाने वाले मिनरल्स और विटामिन मासिक धर्म में ऐंठन की समस्या से राहत दिलाने में और माहवारी को नियमित करने में भी मददगार हैं।
इम्यूनिटी बढ़ाता है
चूंकि आंवले में विटामिन-सी की भरपूर मात्रा पाई जाती है, इसलिए यह प्राकृतिक प्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूत बनाने वाला माना जाता है।
हृदय संबंधी समस्याओं से राहत
आंवले का पाउडर हृदय की मांसपेशियों को मज़बूत करता है। इससे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन अच्छी तरह से होता है।
यूरिन इंफेक्शन से बचाव
आंवला यूरिन की मात्रा को नियंत्रित करता है और यूरिन इंफेक्शन से भी बचाव करता है।
भूख बढ़ाता है
भोजन से पहले मक्खन, शहद के साथ आंवले के पाउडर का सेवन करने से भूख बढ़ती है। आंवला बुख़ार, अपच की समस्या, एनीमिया में भी फ़ायदेमंद साबित होता है।
ख़ून साफ़ करे
आंवला प्राकृतिक रूप से ख़ून को साफ़ करता है। अगर आपको मुंहासे होते हैं तो आंवला आधारित फेस पैक लगाएं। आंवला कोलेजन को बढ़ाने में भी मदद करता है, जो त्वचा को जवां बनाए रखता है।

Tuesday, 29 September 2020

08:44

कोरोनाकाल में संजीवनी बनी प्रोज पोजिशन जाने कैसे:deepak tiwari

कोरोनाकाल में 'संजीवनी' बनी प्रोज पोजिशन:deepak tiwari सांस लेने में दिक्कत है तो 40 मिनट पेट के बल लेट जाएं, यह पोजिशन नेचुरल वेंटिलेटर का काम करती है; 80 % तक इसके नतीजे असरदार
कोरोना संक्रमण के कारण ज्यादातर मरीजों को सांस लेने में दिक्कत है। आक्सीजन का लेवल गिरने पर अस्पतालों में वेंटिलेटर नहीं मिल पा रहा है। ऐसे मरीजों के लिए प्रोन पोजिशन आक्सीजनेशन तकनीक 80 प्रतिशत तक कारगर है। हर चिकित्सा प्रणाली के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने प्रोन पोजिशन को अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीजों के लिए 'संजीवनी' बताया है।
सांस लेने में तकलीफ होने पर इस अवस्था में 40 मिनट लेटते हैं तो आक्सीजन का लेवल सुधरता है। पेट के बल लेटने से वेंटिलेशन परफ्यूजन इंडेक्स में सुधार आता है। डॉक्टरों ने कोविड के मरीजों को सलाह दी है कि सांस लेने में दिक्कत होने पर इस तकनीक को आजमा सकते हैं।
इस पोजीशन का इस्तेमाल एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस की हालत में किया जाता है, ताकि ऑक्सीजन सर्कुलेट की जा सके। ऐसी स्थिति में फेफड़ों के निचले हिस्से में पानी आ जाता है।
प्रोन पोजिशन बनाते हुए ये ध्यान रखें
गर्दन के नीचे एक तकिया, पेट-घुटनों के नीचे दो तकिए लगाते हैं और पंजों के नीचे एक। हर 6 से 8 घंटे में 40-45 मिनट ऐसा करने के लिए कहते हैं।
पेट के बल लिटाकर हाथों को कमर के पास पैरलल भी रख सकते हैं। इस अवस्था में फेफड़ों में खून का संचार अच्छा होने लगता है। फेफड़ों में मौजूद फ्लुइड इधर-उधर हो जाता है और यहां तक ऑक्सीजन पहुंचने लगती है।
प्रोन पोजिशन सुरक्षित है और खून में ऑक्सीजन का लेवल बिगड़ने पर कंट्रोल करने का काम करती है। यह डेथ रेट को भी घटाती है।
एक्सपर्ट के मुताबिक, आईसीयू में भर्ती मरीजों को प्रोन पोजिशन से बेहतर रिजल्ट मिलते हैं। वेंटिलेटर न मिलने पर यह सबसे अधिक कारगर तकनीक है। इससे 80 फीसदी तक नतीजे वेंटिलेटर जैसे ही मिलते हैं।
एक्सपर्ट पैनल : एसएमएस अस्पताल, जयपुर के अधीक्षक डॉ. राजेश शर्मा, मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. रमन शर्मा, पल्मोनरी मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. नरेंद्र खिप्पल, अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरेन्द्र सिंह, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक डॉ. संजीव शर्मा और आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. राकेश पांडे।

Thursday, 17 September 2020

03:01

अपनी कला से बांट रहीं खुशियां जाने कैसे:deepak tiwari

अपनी कला से बांट रहीं खुशियां:deepak tiwari भव्या दोषी कोरोना के बीच अपने वेंचर 'द डूडल डेस्क' से लोगों को दे रहीं पॉजिटिव थिंकिंग का संदेश, इनके 2 लाख फॉलोअर्स में से 81% महिलाएं हैं
पूरी दुनिया में फैली महामारी की वजह से लोगों का एक दूसरे से मिलना कम हुआ है। कोरोना के चलते हर उम्र के लोगों के बीच डिप्रेशन तेजी से बढ़ा है। ऐसे में भव्या दोषी अपने वेंचर 'द डूडल डेस्क' के माध्यम से लॉकडाउन के दौरान लोगों के अहसास बयां कर रही हैं।
भावना कहती हैं ''ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अपने मैसेज के जरिये ये बताया कि वे अपनी फीलिंग किस तरह से शेयर कर रहे हैं। मेरे पॉजिटिव डूडल्स और मैसेज लोगों को कोरोना काल में सकारात्मक रहने का संदेश देते हैं''।
उनके इंस्टाग्राम पेज पर दो लाख फॉलोअर्स हैं। इनमें से 81% महिलाएं हैं। उनके पेज पर कलरफुल डूडल्स और स्ट्रॉन्ग मैसेज देखते ही बनते हैं। एमबीए पासआउट भव्या दोषी अपनी इस कला को खुशी जाहिर करने का जरिया मानती हैं।
भव्या के अनुसार, ''मैंने इस पेज की शुरुआत उस वक्त की जब 2015 में मेरे पैरेंट्स इस दुनिया में नहीं रहे। ये मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था। उस वक्त मैंने अपनी जॉब छोड़ दी और ऐसी कई किताबें पढ़ी जिससे मोटिवेशन मिल सके''।
भव्या के पापा डॉक्टर थे जो लोगों की हर तरह से मदद करते थे। वे कहती हैं ''मैंने अपने प्रयासों से मैंने एक बार फिर लोगों की मदद करने की कोशिश की है। मैंने लोगों की सोच को सही दिशा देने के लिए ही अपने डूडल के साथ मैसेज लिखना शुरू किया है''।
पिछले कुछ सालों से भव्या पेपर पर डूडल बना रहीं थीं। फिर उसका फोटो लेकर ऑनलाइन पोस्ट करती थीं। लेकिन अब वे लैपटॉप पर डूडल बनाने में एक्सपर्ट हो गईं हैं।
गुरूग्राम की रहने वाली भव्या का यह आर्ट जापानी और कोरियन आर्टिस्ट के 'कवाई डूडल्स' से प्रेरित है। भव्या अपने काम के जरिये मुश्किल वक्त में लोगों का साथ देना चाहती हैं। भव्या कहती हैं ''जब आप लोगों को प्यार और सम्मान देते हैं तो बदले में आपको भी प्यार और आदर ही मिलता है''।
इस वक्त वे टी शर्ट्स, पोस्टर्स, कॉफी मग्स, सिपर्स और उन सभी चीजों पर डूडलिंग कर रही हैं जो सुबह से शाम तक हमारे काम आती हैं। इन छोटी-छोटी चीजों के माध्यम से वे लोगों को खुश करना चाहती हैं।
लोगों को डूडलिंग सीखाने के लिए उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पेज पर कुछ वीडियोज अपलोड किए हैं। भव्या ने अपनी वेबसाइट पर एक 'हैप्पी क्लब' बनाया है जिसके 3000 सदस्य हैं।
02:57

फरहान ने लॉकडाउन में कम किया 15 किलो वजन जाने कैसे

एक मेडिकल स्टूडेंट होने के नाते लाइब्रेरी में घंटों बैठना शामिल होता है। ऐसे में अगर आप हॉस्टल में रह रहे हैं तो सादा खाना कम और जंक फूड ज्यादा खाने लगते हैं। अहमदनगर, महाराष्ट्र में एमबीबीएस के थर्ड ईयर स्टूडेंट फरहान के साथ भी यही हुआ।
सैयद मोहम्मद फरहान इरफान डॉ. विट्‌ठल राव विखे पाटिल फाउंडेशंस मेडिकल कॉलेज एंड मेमोरियल हॉस्पिटल, अहमदनगर से एमबीबीएस कर रहे हैं। वे कहते हैं अगर आपके दोस्त भी खाने के शौकीन हो तो मेस के खराब खाने से बचने के लिए रोज ही बाहर का खाना खाने में आता है।
कभी-कभार बाहर का खाना तो अच्छा लगता है लेकिन अगर रोज ऐसा ही खाना आपकी आदत बन जाए तो आप खुद को थका हुआ और सुस्त महसूस करने लगते हैं। ऐसे में आपका वजन भी तेजी से बढ़ने लगता है।
ऐसा ही कुछ फरहान के साथ भी हुआ और उनका वजन 85 से 90 किलो हो गया। लॉकडाउन के दौरान 15 किलो वजन कम करने वाले फरहान ने अपनी वेट लॉस जर्नी खुद अपने शब्दों में कुछ इस तरह से बयां की। वे चाहते हैं उनके बारे में जानकर दूसरे लोग भी अपने वजन को कंट्रोल करना सीखें और सेहतमंद रहें:
एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान दिन-रात बस बैठे-बैठे पढ़ना और जब पढ़ाई से उठो तो खाना खाना। अब से कुछ महीनों पहले तक यही मेरा डेली रुटीन हुआ करता था। उन दिनों मेरा वजन लगभग 90 किलो हो गया था।
मेरे दोस्तों ने मुझे जिम जॉइन करने की सलाह दी। मैं जिम जाने लगा लेकिन वजन कम नहीं हुआ। तब मैंने नानावटी हॉस्पिटल, मुंबई की चीफ डाइटीशियन डॉ. उषा किरण सिसोदिया से कंसल्ट किया।
मैं ये भी जानता था कि उनके बताए डाइट चार्ट को मैं ज्यादा दिनों तक फॉलो नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मैं खुद भी खाने का बहुत शौकीन हूं। मैं नॉनवेज खाए बिना नहीं रह सकता। ऐसे में डाइट प्लान फॉलो करना मेरे लिए मुश्किल था,लेकिन डॉ. उषा किरण द्वारा बताया गया मेरा डाइट प्लान खाने में टेस्टी और हेल्दी था। जिस वजह से इसे फॉलो करना मेरे लिए आसान रहा। साथ ही मैंने साइकिलिंग और वॉकिंग की शुरुआत की।
वजन बढ़ने के दौरान मैंने ये महसूस किया कि जब आप मोटे होने लगते हैं तो आपका शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगता है। चाहे वजन कम करने और परफेक्ट शेप के लिए डाइटिंग और वर्कआउट जरूरी है लेकिन इससे भी जरूरी है आपका विल पावर मजबूत होना। एक बार में ज्यादा खाने के बजाय थोड़ी-थोड़ी देर में पौष्टिक भोजन जैसे सलाद या फल खाना जरूरी है।
अपना वजन कम करने का ख्याल मुझे तब आने लगा जब लोग मेरे वजन का मजाक उड़ाने लगे और मुझे वेट लॉस के लिए तरह-तरह की सलाह देने लगे। ऐसे में मैं अपने लिए जब भी नए कपड़े लेकर आता तो वे कपड़े हर बार मुझे टाइट लगते। धीरे-धीरे अपने वजन की वजह से मुझे फोटो खिंचवाने में भी शर्मिंदगी महसूस होने लगी।
उन्हीं दिनों मैने एमबीबीएस की पढ़ाई करते हुए ये जाना कि वजन बढ़ने के सेहत को क्या नुकसान हो सकते हैं। ऐसी कई बीमारियां हैं जो ज्यादा वजन की वजह से कम उम्र में ही घेरने लगती हैं। इन सब बातों को जानकर मैंने ये फैसला किया कि कुछ भी हो जाए मुझे अपना वजन कम करना ही है।
वजन कम करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी आपका समय और ऊर्जा दोनों देने की है। इसके अलावा सारी कोशिशों के साथ ही सब्र से काम लेना भी जरूरी है। जिन लोगों को लगता है कि वजन कम करने के लिए सर्जरी या जिम सप्लीमेंट जरूरी होते हैं, वे भी गलत हैं। इन दोनों चीजों के बिना भी आसानी से वेट लॉस किया जा सकता है।
मैंने फरवरी और मार्च में पूरे अनुशासन के साथ वजन कम करने की कवायद जारी रखी। उसके बाद रमजान के एक महीने इसे फॉलो नहीं कर पाया। लेकिन ईद के बाद मैंने फिर एक बार अपनी कोशिश की। इस तरह जुलाई तक मैंने 15 किलो वजन कम किया। मेरी वेट लॉस जर्नी अभी भी जारी है।
मुझे अपना वजन 68 किलो करना है। हालांकि वजन कम करने के लिए मैंने अपने खाने पर कंट्रोल किया लेकिन सीमित मात्रा में हर चीज खाई जैसे खाने में दो चपाती के साथ सब्जी। इसके अलावा बीच में भूख लगने पर सलाद, फल या चने में टमाटर और खीरा मिलाकर खाया। अगर सुबह नॉनवेज खा लिया है तो शाम को नहीं खाया। वजन कम करने के लिए रोज क्या खाना है, इससे ज्यादा जरूरी है कितना खाना है। मैंने इस बात का हमेशा ध्यान रखा।
इस समय जो लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं, उनका वजन बढ़ने के अधिक चांस हैं क्योंकि दिन भर बैठकर कंप्यूटर या लैपटॉप के सामने काम करना और घर में रहते हुए ऑफिस के बजाय अधिक खाना। लेकिन यही वो वक्त है जब आप अपना वेट आसानी से कम कर सकते हैं। घर में रहते हुए भी एक साथ ज्यादा खाने के बजाय थोड़े-थोड़े अंतराल में कम खाना शुरू करें। साथ ही तली-भुनी चीजों से बचें।
इसके बजाय सलाद, फल या चने खाएं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो यह समझते हैं कि एक बार वजन बढ़ गया तो इसे कम करना बहुत मुश्किल है। जबकि ऐसा नहीं है। वजन कम करने के लिए आपको एक अच्छे डाइटीशियन की जरूरत है। साथ ही एक्सरसाइज की भी। इस दौरान आप अपने लक्ष्य की ओर धीरे-धीरे बढ़ेंगे लेकिन कोशिश करते रहेंगे तो कामयाबी जरूर हासिल होगी।
डाइटिंग करना उस वक्त मेरे लिए मुश्किल हुआ जब मैं होस्टल से घर जाता था। इतने कम समय के लिए घर जाने पर घर में रोज ही खाने में कुछ खास बनता है। ऐसे में खुद को कंट्रोल करना कठिन था। लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मुझे अपने डाइट चार्ट को हर हाल में फॉलो करना ही है।
जब मैंने अपने घर वालों को मेरे वेट लॉस प्लान के बारे में बताया तो उन्होंने मेरा साथ दिया और इस तरह मेरे मम्मी-पापा भी मेरे साथ डाइटिंग करने लगे। इसके अलावा मेरे दोस्तों ने जब वेट लॉस को लेकर मेरा जज्बा देखा तो उन्होंने भी मेरा साथ दिया।
वजन कम करने के बाद फरहान का फोटो-4।
अगर आप वेट लॉस करना चाहते हैं तो यह जान लें कि वजन कम करना एक बार का लक्ष्य नहीं है बल्कि लगातार की जाने वाली कोशिश है। ये तब सरल हो सकता है जब आप फ्राइड चीजों से दूर रहें। मीठा कम खाएं और कोल्ड ड्रिंक आदि पीने से परहेज करें। इसके साथ ही अपने वजन की नियमित रूप से जांच करते रहें ताकि आप वजन बढ़ते ही अपनी डाइट में बदलाव कर सकें और वजन नियंत्रित रहे।
02:55

आप की कॉफी का स्वाद बढ़ाएंगी ये 5 चीज़ें:deepak tiwari

कॉफी का स्वाद बढ़ाएंगी ये 5 चीज़ें:deepak tiwari कॉफी में पीनट बटर मिलाकर पाएं डिफरेंट टेस्ट, इसमें चुटकी भर दालचीनी पाउडर डालने से मिलेगा मनचाहा फ्लेवर
कॉफी लवर्स रोज एक ही तरह की कॉफी पीकर बोर हो गए हैं, तो यह छोटे-छोटे ट्विस्ट अपनाकर अपनी मॉर्निंग या ईवनिंग कप ऑफ कॉफी को घर पर ही अपग्रेड कर सकते हैं। आप चाहें तो अपनी कॉफी को फ्रीज़र में फ्रीज़ किया जा सकता है और इससे भविष्य में आइस्ड बेवरेज बनाए जा सकते हैं। नो-शुगर फ्लेवर्ड कॉफी भी ट्राय कर सकते हैं। हेज़लनट फ्लेवर इन दिनों सबसे ज्यादा मशहूर है। इसके बाद वनिला और मोका भी विकल्प हैं। आजकल बहुत से ब्रांड्स फ्लेवर्ड कॉफी ऑफर कर रहे हैं।
1. होम मेड वैनिला क्रीमर
इसमें केवल दो इंग्रीडिएंट्स के साथ एक कप कॉफी तैयार की जा सकती है। नेचुरली स्वीट वनिला क्रीमर इस्तेमाल करने के लिए एक चौथाई कप दूध (ओट, आमंड, सॉय) को वनिला एक्सट्रैक्ट की 4-5 बूंदों के साथ मिक्स कर 20 सेकंड के लिए माइक्रोवेव में रख दें।
2. कोको :
कॉफी कप में थोड़ा-सा कोको पाउडर मिला लेंगे तो बेहद स्वादिष्ट चॉकलेट फ्लेवर कॉफी आपको मिलेगी। इसमें मौजूद कोको फ्लेवेनॉल्स आपका ब्लड फ्लो सुधार कर हार्ट हेल्थ बेहतर करते हैं।
3. थोड़ा फिज़ :
कॉफी बोरिंग और फ्लैट लग रही है तो उसे फिज़ी स्पिन भी दिया जा सकता है। आइस्ड कॉफी में थोड़ा स्पार्कलिंग वॉटर मिला सकते हैं। इससे कॉफी में न तो शुगर की मात्रा बढ़ती है, न ही कैलोरीज़ बढ़ती हैं। ये कैफीन फ्री भी होता है। इसका स्वाद भी बढ़िया रहेगा।
4. स्पाइसेस :
एक चुटकी सिनेमन पाउडर मिला सकते हैं। इससे कॉफी को फ्लेवर मिलता है। इससे शुगर भी नहीं बढ़ती। मोका ब्लेंड चाहिए तो सिनेमन के साथ थोड़ा कोको पाउडर मिलाएं।
5. पीनट बटर :
पीनट प्रोटीन से कॉफी को पावर करना चाहते हैं, तो इसमें थोड़ा-सा पाउडर्ड पीनट बटर मिला सकते हैं। ये डीहाइड्रेटेड ग्राउंड पीनट्स ही होती हैं।
केवल एक चम्मच पाउडर अपनी गर्म कॉफी में मिला सकते हैं। यह शुगर फ्री होता है और पोषण की बात करें, तो इसे लेने से फाइबर के साथ प्रोटीन भी मिलता है।
02:46

नींद लेने का तरीका बदलें बदल जाएगी जिंदगी :deepak tiwari

नींद लेने का तरीका बदलें:deepak tiwari झुर्रियां रोकना है तो पीठ के बल लेटिए और खर्राटों से बचना है तो करवट लेते रहें, अमेरिकी शोधकर्ताओं का दावा
चेहरे की खूबसूरती, खर्राटे और सीने में जलन का कनेक्शन आपके सोने के तरीके से भी है। यह दावा जॉन हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है। यूनिवर्सिटी में न्यूरोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. राचेल सालास कहते हैं, जैसे-जैसे आप बुढ़ापे की ओर बढ़ते हैं सोने के तरीके और नींद लेने पर असर पड़ता है। अगर झुर्रियां रोकना चाहते हैं तो पीठ के बल लेटना चाहिए और खर्राटों से बचना है तो करवट लें।सीने में जलन है तो बाईं करवट लेकर सोएं।
जोर-जोर से खर्राटे आते हैं तो बदलें सोने का तरीका
स्लीप एप्निया के कारण ढंग से सांस लेने में दिक्कत होती है। हवा का फ्लो रुकता है। इसके चलते लोग जोर-जोर से खर्राटे लेते हैं। ऐसे में करवट लेकर या फिर पेट के बल लेटना फायदेमंद हो सकता है।
सीने में जलन है तो बाईं करवट लेकर सोएं
दाईं करवट लेकर लेटने पर समस्या बढ़ सकती है। ऐसे व्यक्ति जिन्हें गैट्रोसोफेगल रिफलक्स डिसीज (जीईआरडी) यानी खाना भोजन नली में ऊपर चढ़ने की समस्या है, जैसे गर्भवती महिलाएं उनमें यह दिक्कत जरूर बढ़ती है। ऐसे में बाईं करवट सोएं। इससे जलन कम होगी।
चेहरे की खूबसूरती के लिए 6 से 8 घंटे की नींद जरूरी
जब आप करवट लेकर या पेट के बल सोते हैं, तब उठने के बाद चेहरे पर सिकुड़न महसूस की होगी। ऐसे में पीठ के बल सोएं। चेहरे पर झुर्रियां धीमे आएंगी। एक्सपर्ट के मुताबिक, रोजाना 6 से 8 घंटे की नींद जरूर लें। यह फिजिकल और मेंटली आपको रिलैक्स रखती है। ​​इसके अलावा रात में देर तक जागने की आदत को बदलें। इसका असर भी चेहर पर पड़ता है।
पीठ या गर्दन में दर्द हो तो ये ध्यान रखें
प्रो. राचेल कहते हैं, पीठ या गर्दन दर्द के मामले में स्थिति थोड़ी अलग है। कुछ लोगों का मानना है कि पीठ के बल सोने से दर्द कम होता है तो कुछ का कहना है कि ऐसा करने पर दर्द और बढ़ सकता है। प्रो. राचेल के मुताबिक, ऐसी स्थिति में सोने की पोजिशन के साथ एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं और देख सकते हैं कि कौन सी स्थिति में आपका दर्द कम हो रहा है।

Saturday, 12 September 2020

05:33

पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध पक्ष में लगाने चाहिए पीपल का पेंड

पितृपक्ष:deepak tiwari पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध पक्ष में लगाने चाहिए पीपल, अशोक और तुलसी जैसे पेड़-पौधे, इनसे खुश होते हैं पितृ
श्राद्ध पक्ष में पितरों की संतुष्टि के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन के साथ ही पौधे लगाकर भी संतुष्ट करना चाहिए। कुछ पेड़-पौधे सकारात्मक उर्जा देते हैं। इसलिए ग्रंथों में बताए गए शुभ पेड़-पौधे पितृपक्ष में लगाए जाए तो पितरों का आशीर्वाद मिलता है। काशी के ज्योतिषाचार्य और धर्म शास्त्रों के जानकार पं. गणेश मिश्र मुताबिक पीपल में देवताओं के साथ ही पितरों का भी वास होता है। इसलिए श्राद्ध पक्ष में पीपल का पेड़ खासतौर से लगाना चाहिए। इसके साथ बरगद, नीम, अशोक, बिल्वपत्र, तुलसी, आंवला और शमी का पेड़ लगाने से पर्यावरण को साफ रखने में तो मदद होगी ही। पितरों के साथ देवता भी प्रसन्न होंगे।
पीपल: पीपल को पवित्र माना गया है। पुराणों के अनुसार इसमें पितरों का वास होता है। इसलिए पीपल के पेड़ पर दूध में पानी और तिल मिलाकर चढ़ाना चाहिए। इससे पितर संतुष्ट होते हैं।
बरगद: शास्त्रों में बरगद को आयु देने वाला तथा मोक्ष देने वाला पेड़ माना गया है। बरगद के पेड़ को ही साक्षी मानकर माता सीता ने राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। बरगद पर जल चढ़ाकर इसकी परिक्रमा करने से पितर प्रसन्न होते हैं।
बिल्वपत्र: इस पेड़ में देवी लक्ष्मी और पत्तों में भगवान विष्णु का वास होता है। भगवान विष्णु की पूजा से पितृ प्रसन्न होते हैं। इसलिए इस पेड़ पर भी दूध में गंगाजल मिलाकर चढ़ाना चाहिए।
अशोक: अशोक के पेड़ को शुभ माना गया है। इसमें भी भगवान विष्णु का वास होता है। इसलिए इस पेड़ को लगाने और इसकी पूजा करने से पितृ देवता संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं।
तुलसी: तुलसी का पौधा लगाने और उसकी पूजा से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। भगवान विष्णु के प्रसन्न होने से पितर भी संतुष्ट हो जाते हैं। इसलिए तुलसी का पौधा पितृपक्ष में लगाना चाहिए। तुलसी के पौधें में रोज जल डालने से भी पितृ प्रसन्न होते हैं।
पं. मिश्रा का कहना है कि परिवार के मृत सदस्यों के मुताबिक भी अलग-अलग पेड़-पौधे लगाए जा सकते हैं।
बच्चे के लिए अमरूद, आम या इमली का पेड़ लगाएं।
कुंवारी लड़की के लिए आंवला, अनार या अंजीर का पेड़ लगाया जा सकता है।
सौभाग्यवती स्त्री यानी शादीशुदा महिला के लिए अशोक, तुलसी या सीताफल का पेड़ लगाना चाहिए।
दुर्घटना में मृत लोगों के लिए पीपल, बरगद, नीम या शमी का पेड़ लगाएं।
माता, दादी और परदादी के लिए पलाश, पारस पीपल या चन्दन का पेड़ लगाया जा सकता है।
पिता, दादा और परदादा के लिए बिल्वपत्र, पीपल, बरगद या आंवले का पेड़ लगाना चाहिए।

Friday, 11 September 2020

15:36

इस साल पितृ पक्ष की अमावस्या के बाद शुरू नहीं होगी नवरात्रि जाने क्यों

17 अक्टूबर को घट स्थापना:deepak tiwari इस साल पितृ पक्ष की अमावस्या के बाद शुरू नहीं होगी नवरात्रि, 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक नहीं आएगा कोई बड़ा त्योहार
हर साल पितृ पक्ष की अमावस्या के बाद से ही आश्विन मास की नवरात्रि शुरू हो जाती है। लेकिन, इस साल ऐसा नहीं होगा। 17 सितंबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या है। इसके बाद 18 तारीख से अधिकमास शुरू हो जाएगा। ये माह 16 अक्टूबर तक रहेगा। इस माह में कोई बड़ा त्योहार नहीं रहेगा। 17 अक्टूबर को घट स्थापना के साथ नवरात्रि शुरू होगी।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार 19 साल बाद आश्विन माह का अधिकमास रहेगा। इससे पहले 2001 में ये माह आया था। 17 से 25 अक्टूबर तक नवरात्रि, 26 अक्टूबर को दशहरा और 14 नवंबर को दीपावली मनाई जाएगी। श्राद्ध पक्ष के बाद अधिकमास में कोई भी बड़ा त्योहार नहीं रहेगा। इस माह में चतुर्थी (20 सितंबर और 5 अक्टूबर), एकादशी (27 सितंबर और 13 अक्टूबर), पूर्णिमा (1 अक्टूबर) और अमावस्या (16 अक्टूबर) विशेष तिथियां रहेंगी।
कब और क्यों आता है अधिकमास
पं. शर्मा के मुताबिक एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का रहता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर है। ये अंतर हर तीन साल में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
अधिकमास से बनी रहती है त्योहारों की व्यवस्था
हिन्दी पंचांग में अधिकमास का महत्व काफी अधिक है। इस माह के पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। अगर अधिकमास नहीं होता तो हमारे त्योहारों की व्यवस्था बिगड़ जाती है। अधिकमास की वजह से ही सभी त्योहारों अपने सही समय पर मनाए जाते हैं।
अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है
अधिकमास को मलमास यानी मलिन मास माना गया है, इस वजह से कोई भी देवता इस मास का स्वामी बनना नहीं चाहता था। तब मलमास ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। मलमास की प्रार्थना सुनकर विष्णुजी ने इसे अपना श्रेष्ठ नाम पुरुषोत्तम प्रदान किया। इसी वजह से इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस माह में भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने की परंपरा है।

Sunday, 6 September 2020

17:28

जान लें नाक छिदवाने के फायदे और नुकसान ऐसे करें देखभाल deepak tiwari

  नाक छिदवाना यूं तो भारत में परंपरा है, लेकिन इन दिनों फैशन और स्टाइल के लिए भी लड़कियां नाक में तरह-तरह की बाली, नथ पहनना पसंद करती हैं. ...

   नाक छिदवाना यूं तो भारत में परंपरा है, लेकिन इन दिनों फैशन और स्टाइल के लिए भी लड़कियां नाक में तरह-तरह की बाली, नथ पहनना पसंद करती हैं. भले ही यह परंपरा हो, लेकिन नाक छिदवाने के कुछ फायदे और नुकसान भी हैं. नाक छिदवाने से सेहत को कई फायदे होते हैं. कई वैज्ञानिकों ने इसे बीमारियों को ठीक करने की वैकल्पिक प्रक्रिया माना है. इसे एक्युपंक्चर पद्धति में शामिल किया जाता है जो कि शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से जुड़ी बीमारियों को ठीक करता है.
   इतना ही नहीं नाक पर विशेष जगह छेद करने से महिलाओं को पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द में राहत मिलती है. बाएं नथुने पर सही जगह छेद करने और बाली पहनने से एक खास फायदा होता है. इससे महिला को बच्चे के जन्म के वक्त आसानी होती है. कारण यह है कि महिला के बाएं नथुने की कई नसें महिलाओं के प्रजनन अंगों से जुड़ी होती हैं. यही नहीं महिलाएं सोने या चांदी से बनी नथ पहनती हैं, जिससे ये धातुएं लगातार शरीर के संपर्क में रहती हैं. इन धातुओं के गुण मिलते रहते हैं और इस वजह से नाक छिदवाने से फायदा होता है. नाक छिदवाने से माइग्रेन में राहत मिलती है.
    नाक छिदवाने के बाद कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए. कई बार नाक छिदवाने के बाद छेद की जगह उभार हो जाता है. इससे नाक में सूजन, खून निकलना और लालिमा कुछ हफ्ते तक रह सकती है. यह उभार कुछ वजहों से हो सकता है, जिसमें नाक छेदने में गलत तकनीक का इस्तेमाल, गंदे हाथों से नाक को छूना, बाली या अन्य आभूषणों से होने वाली एलर्जी आदि शामिल हैं. छिदवाने के बाद दिन में दो से तीन बार छेद के आसपास की जगह को साफ करना चाहिए. छेद वाले स्थान को छूने से पहले हाथ साबुन से धुले होने चाहिए. नाक के छेद पर टी ट्री ऑयल लगाना लाभकारी होता है.
   इसमें प्राकृतिक रूप से एंटी फंगल, एंटी सेप्टिक और एंटी माइक्रोबियम गुण होते हैं. इससे घाव जल्दी भरता है और संक्रमण व सूजन कम होती है. लड़कियों की एक और आदत होती है कि जब नया-नया नाक छिदवाती हैं तो नाक की बाली से खेलने लगती हैं, उसे बैठे-बैठे घुमाने लगती हैं, ऐसा बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे जख्म गहरा हो सकता है. नाक के छेद के आसपास की पपड़ी को रगड़कर कभी न निकालें. अगर बाली नहीं पहननी है तो भी मेकअप से छेद छुपाने की कोशिश न करें. सूजन होने पर गर्म सेंक लगा सकते हैं. एक साफ कपड़े को पानी में भिगोकर उसक जगह पर सेंक सकते हैं.
   अगर लगता है कि नाक छिदवाने के बाद संक्रमण हुआ है तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि यह गंभीर हो जाए. संक्रमण के लक्षणों में बुखार, लालिमा, छिदवाई जगह पर सूजन, दर्द या उस जगह से पीला या हरा डिस्चार्ज शामिल है. यह परेशानी दो सप्ताह तक बनी रहे तो जरूर डॉक्टर से मिलें.

Thursday, 20 August 2020

18:18

कार सर्विस कराने जा रहें हैं तो पहले यह पढ़िए:किस तरह सर्विसिंग के दौरान आपका बिल बढ़ाया जाता है, आप कैसे बच सकते हैं deepak tiwari

कार सर्विस को लेकर हमेशा लोगों में मन में संशय रहता है कि सर्विस सेंटर पर कराई जाए या लोकल मैकेनिक से कराई जाए। फ्री सर्विस खत्म होने के बाद कुछ लोग लोकल मैकेनिक के पास पहुंच जाते हैं तो कुछ सर्विस सेंटर को ही प्राथमिकता देते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सर्विसिंग के नाम पर किस तरह से आपकी जेब खाली की जाती है। नाम ना छापने की शर्त पर एक्सपर्ट ने कुछ अहम बातें बताईं...
पहला: ऑयल काला हो गया है चेंज करना पड़ेगा
आमतौर पर यह कहकर ऑयल चेंज करवा लिया जाता है कि ऑयल काला हो गया है लेकिन यह बिल्कुल गलत है। एक्सपर्ट ने बताया कि कितना भी अच्छा ऑयल हो इंजन में जाने के बाद काला हो ही जाता है। खासतौर से डीजल गाड़ियों की बात करें तो नया ऑयल भी जल्दी काला हो जाता है। ऐसे में आपको अनुभव है तो घर पर ही आप ऑयल डिप से ऑयल कि विस्कॉसिटी, क्वालिटी, टैक्सचर देख कर उसकी क्वालिटी का अंदाजा लगा सकते हैं।
अगर अनुभव नहीं हो तो सबसे सरल तरीका यह है कि सर्विस रिकॉर्ड के हिसाब से ऑयल चेंज करवाएं। एक साल कम्पलीट होने पर या 10 हजार किमी. या उससे ज्यादा चला लेने पर सर्विस जरूर कराएं, जिसमें ऑयल चेंज हो। क्योंकि सेमी सिंथेटिक ऑयल की नॉर्मल लाइफ 10 हजार किमी. होती है, मिनरल ऑयल की लाइफ इससे भी कम होती है। फुल सिंथेटिक ऑयल की लाइफ 15 हजार किमी. तक होती है लेकिन उसमें भी यह सलाह दी जाती है कि 10 हजार किमी. तक एक बार टॉप-अप के लिए चेक करा लें क्योंकि हीट होने पर ऑयल थोड़ा वाष्प बनकर उड़ जाता है। लोकल मैकेनिक हो या अथॉराइज्ड सर्विस सेंटर ऑयल सामने चेंज करवाएं तो बेहतर होगा।
दूसरा: फुल सिंथेटिक ऑयल डलवा लो, गाड़ी की लाइफ बढ़ जाएगी
यह सही है कि फुल सिंथेटिक ऑयल से इंजन की लाइफ बढ़ती है लेकिन इसे डलवाना चाहिए या नहीं ये गाड़ी की रनिंग पर निर्भर करता है। लेकिन मैकेनिक पैसे कमाने के चक्कर में महंगा ऑयल डलवाने के लिए कह देते हैं। सिंथेटिक ऑयल की कीमत नॉर्मल ऑयल से तीन गुना अधिक तक होती है। सबको यह ऑयल डलवाने की जरूरत नहीं है। हां, अगर आपकी रनिंग ज्यादा है या आपकी गाड़ी ट्रैवल्स में लगी है तो आपको फुल सिंथेटिक ऑयल डलवा सकते हैं।
एक्सपर्ट ने बताया कि सेमी सिंथेटिक और फुल सिंथेटिक ऑयल का सीधा असर गाड़ी के इंजन स्मूदनेस, रनिंग और वियर-एंड-टियर पर पड़ता है। जिनकी हाई रनिंग होती है उन लोगों को अपनी गाड़ी में फुल सिंथेटिक ऑयल ही डलवाना चाहिए खासतौर से डीजल इंजन में, इससे वियर-एंड-टियर कम होता है।
फुल सिंथेटिक में इंजन का परफॉर्मेंस अच्छा मिलेगा। ठंड के मौसम में भी सिंथेटिक ऑयल इंजन में जल्दी फैल जाता है, जमता नहीं है, तो अगर आप किसी बर्फीले इलाके में या ऐसी जगह रह रहे हैं जहां तापमान बेहद काम या माइनस में चला जाता है तो आप सिंथेटिक ऑयल ही यूज करें। नॉर्मल रनिंग है तो कम से कम सेमी सिंथेटिक ऑयल डलवाएं।
तीसरा: व्हील अलाइनमेंट-बैलेंसिंग करना पड़ेगा
बिल बढ़ाने के लिए आपसे फिजूल में व्हील बैलेंसिंग और अलाइनमेंट कराने के लिए कहा जा सकता है। लेकिन आप टायरों की कंडीशन से इसका पता लगा सकते हैं कि क्या वाकई में इसकी जरूरत है। अगर आगे के टायर अनियमित तरह से घिस रहे हैं, जैसे की अंदर की तरफ ग्रिप है लेकिन बाहर से घिस रहे हों या बाहर ग्रिप अच्छी है लेकिन अंदर की तरफ से घिस रहे हों तो व्हील अलाइनमेंट की बिल्कुल जरूरत है।
यदि हाई स्पीड (लगभग 80 किमी. प्रतिघंटा) पर यदि स्टीयरिंग व्हील में जर्क आ रहा है या वाइब्रेशन आ रहा है, तो बैलेंसिंग की जरूरत है। अगर इनमें से कोई परेशानी नहीं दिख रही है, तो बेवजह पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं है। बाकी प्रॉपर शेड्यूलिंग की बात करें तो हर 5 हजार किमी. पर बैलेंसिंग और अलाइनमेंट कर लेना चाहिए और 10 हजार किमी.पर व्हील रोटेशन करना चाहिए।
चौथा: कूलिंग नहीं हो रही, एसी फिल्टर चेंज होगा
ज्यादातर लोगों को पता नहीं होता कि एसी फिल्टर कब चेंज कराना चाहिए और इसी बात का फायदा मैकेनिक उठाते हैं और फिजूल में एसी फिल्टर चेंज करवा लेते हैं। एक्सपर्ट ने बताया कि एसी फिल्टर हर 20 हजार किमी. पर बदला जाता है।
बेहतर होगा कि गर्मी का मौसम शुरू होने से पहले एक बार एसी चेक करा लें क्योंकि गर्मियों में ज्यादातर लोगों को शिकायत रहती है कि एसी कूलिंग नहीं कर रहा लेकिन होता यह है कि फ्रेश एयर एसी फिल्टर में जाम होने की वजह से अच्छी तरह से फ्लो नहीं होती। इसलिए गर्मी आने से पहले एक बार फिल्टर जरूर चेक करा लें।
पांचवां: बैटरी चेंज करनी पड़ेगी, खराब हो गई है
बैटरी खराब हो रही है, ज्यादा दिन नहीं चलेगी, नई लगवा लो। यह कहकर भी कई मैकेनिक जबरन का बिल बढ़ा देते हैं। एक्सपर्ट ने बताया कि अगर बैटरी लेवल मेनटेन रहेगा और गाड़ी प्रोपर चलती रहेगी तो बैटरी में कोई समस्या नहीं आएगी और लंबे समय तक सर्विस दे जाएगी। इसलिए साल में दो बार बैटरी वॉटर टॉप-अप करा लें।
अगर बैटरी डिसचार्ज भी हो रही है तो एक-दो बार चार्ज करवा लें, जिसका खर्च बहुत मामूली होता है, अल्टीनेटर चेक करा लें, क्योंकि हो सकता है कि अल्टीनेटर खराब होने की वजह से भी बैटरी ड्रेन हो रही हो। अगर इन सब के बाद भी समस्या बनी हुई है, तो नई बैटरी लगवाने का डिसीजन लिया जा सकता है।
छठवां: एयर-ऑयल फिल्टर खराब हो गए हैं, नया लगाना पड़ेगा
फिल्टर खराब हो गए हैं, चेंज करना पड़ेगा और उस समय ग्राहक के पास हां कहने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं होता। लोकल मैकेनिक फिल्टर में काफी बड़ी धांधली करते हैं, लोकल फिल्टर को ओरिजनल बता कर लगा देते हैं और अनुभव न होने के कारण हम उसकी पहचान भी नहीं कर पाते। इसलिए अगर फिल्टर्स चेंज भी करवाना पड़े तो अथॉराइज्ड सेंटर पर भरोसा किया जा सकता है।
सातवां: एसी गैस लीक हो गई है, दोबारा फिल करना पड़ेगी
यह कारण बता कर भी अच्छे खासे पैसे वसूले जा सकते हैं। कई बार एसी कूलिंग कम करता है और मैकेनिक हमें कारण बताता है कि एसी गैस खत्म हो गई है। आम आदमी को इसकी ज्यादा नॉलेज नहीं होती और यह मैकेनिक को अच्छी तरह पता होता है। एक्सपर्ट ने बताया कि अक्सर यह कारण बता कर लंबा बिल थमा दिया जाते है। हर कंपनी अलग अलग तरह की एसी गैस यूज करती है, इसी के जरिए एसी कूलिंग करता है। यह लाइफ टाइम के लिए होती है। बिना लीकेज गैस खत्म नहीं हो सकती है।
हालांकि आम आदमी के पास एसी गैस खत्म हुई है या नहीं इसे चेक करने का कोई तरीका नहीं होता। गाड़ी के साइज के अनुसार 250 ग्राम से 600 ग्राम तक एसी गैस डलती है, अगर वो कम होगी तो एसी अंदर परफॉर्म करेगा। अगर मैकेनिक मशीन से गैस निकाल कर बताएं कि इतनी गैस निकली है तब तो ठीक है वरना इसमें भी घपला किया जा सकता है।
18:04

deepak tiwari मच्छर के काटने पर होने वाली बीमारी और कोरोना संक्रमण के लक्षण एक जैसे, मानसून में खतरा सबसे ज्यादा जाने कैसे

कोरोनाकाल में विश्व मच्छर दिवस:deepak tiwari मच्छर के काटने पर होने वाली बीमारी और कोरोना संक्रमण के लक्षण एक जैसे, मानसून में खतरा सबसे ज्यादा, एक्सपर्ट से समझें कैसे अलर्ट रहे
विश्व स्वास्थ्य संगठन की मलेरिया रिपोर्ट-2017 कहती है, दक्षिण पूर्व एशिया में मलेरिया के सबसे ज्यादा 87 फीसदी मामले भारत में है। अधिक मामलों की वजह जनसंख्या का ज्यादा होना है। देश में उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में मलेरिया के मामले सबसे ज्यादा हैं। राज्यों में मानसून के बाद जलभराव, वेक्टर की मौजूदगी के कारण मच्छर पनपते हैं, जो मलेरिया के मामलों को बढ़ाते हैं।
2017 के मुकाबले 2016 में मलेरिया के मामलों 23 फीसदी घटे हैं। भारत में मलेरिया के मामले प्रति एक हजार जनसंख्या (2017) पर 0.66 मामले रहे। वहीं, 2019 में डेंगू से करीब 1.35 लाख केस आए थे, जिसमें 132 लोगों को जान गंवानी पड़ी।
आज विश्व मच्छर दिवस है, यह खास दिन ब्रिटिश चिकित्सक, सर रोनाल्ड रॉस की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने 1897 में साबित किया था कि इंसानों में मलेरिया के लिए मच्छर ही जिम्मेदार है। इसके बाद दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने इस पर काम करना शुरू किया और कई नई बातें सामने आईं। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन और ट्रॉपिकल मेडिसिन ने विश्व मच्छर दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1930 में की थी। जानिए मच्छरों से इंसानों की सेहत पर कितना असर हुआ।
मलेरिया की खोज करने वाले सर रोनाल्ड रॉस के बारे में 6 बड़ी बातें
ब्रिटिश डॉक्टर सर रोनाल्ड रॉस ने 20 अगस्त 1897 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रेसिडेंसी जनरल हॉस्पिटल में इंसानों में मलेरिया की खोज की।
डॉ. रोनाल्ड रॉस ने मच्छर की आंत में मलेरिया के रोगाणु का पता लगाकर यह तथ्य स्थापित किया था कि मच्छर मलेरिया का वाहक है
रोनाल्ड रॉस का जन्म 13 मई 1857 को अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में हुआ था, यानी देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने के सिर्फ तीन दिन बाद।
आईएमएस में दाखिले के बाद इनको कलकत्ता या बॉम्बे के बजाय सबसे कम प्रतिष्ठित मद्रास प्रेसीडेंसी में काम करने का मौका मिला। वहां, उनका ज्यादातर काम मलेरिया पीड़ित सैनिकों का इलाज करना था।
सिकंदराबाद की भीषण गर्मी, अत्यधिक उमस और खुद मलेरिया के शिकार होते हुए भी उन्होंने एक हजार मच्छरों का डिसेक्शन किया।
रॉस 1888 में इंग्लैंड लौट गए, मलेरिया की खोज के लिए उन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया।
कोरोनाकाल में मच्छरओं के कारण चुनौतियां कितनी बढ़ीं
विशेषज्ञों के मुताबिक, मच्छर से जुड़े रोग इसी बारिश के मौसम में फैलते हैं। मच्छरों से एक नहीं, कई संक्रामक बीमारियों का खतरा है। कोविड के दौर में सबसे बड़ी चुनौती है कि मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी के लक्षण भी कोरोना संक्रमण से मिलते-जुलते हैं। कोरोना व डेंगू, मलेरिया के अधिकतर लक्षण एक जैसे हैं, जिसमें मुख्य है कि तीनों से संक्रमित होने पर सिर व शरीर में दर्द होता है और तेज बुखार आता है।
मादा एनोफ़िलीज़ कूलिसिफासीस से मलेरिया फैलता है, जो कि आमतौर पर मनुष्यों के साथ-साथ मवेशियों को भी काटता है। एनोफिलीज़ मच्छर सबसे ज़्यादा शाम और सुबह के बीच काटता है।
मादा एनोफ़िलीज़ कूलिसिफासीस से मलेरिया फैलता है, जो कि आमतौर पर मनुष्यों के साथ-साथ मवेशियों को भी काटता है। एनोफिलीज़ मच्छर सबसे ज़्यादा शाम और सुबह के बीच काटता है।
डेंगू से ग्रस्त होने वाले मरीजों को कोरोना अपनी चपेट में आसानी से ले सकता है। यदि दोनों बीमारी से ग्रसित होने वाली मरीजों की संख्या बढ़ी तो मौत के आंकड़ों में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी होगी और स्थिति भयावह हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि खुद को कोरोना के साथ ही डेंगू जैसी बीमारी से भी सुरक्षित रखें।
एक्सपर्ट की सलाह : हमेशा दो मास्क साथ रखें, घर का बना खाना ही खाएं, ठंडी चीजों से दूर रहें
आईएमए के पूर्व सचिव डॉ. नरेंद्र सैनी का कहना है कि चाहे बारिश हो या गर्मी या फिर सर्दी का मौसम, वायरस कभी भी फैल सकता है। इसलिये इससे बचने का अभी भी वही नियम है, जो दूसरे मौसम में था। जहां बारिश हो रही है वहां लोगों को ध्यान रखना है कि उनका मास्क गीला न हो और लोगों से उचित दूरी बनी रहे। अगर भीग गये हैं तो मास्क तुरंत उतार दें।
इस वक्त एक मास्क लगायें तो एक मास्क साथ में रखें। एक गीला हो जाये तो उसे उतार कर रख लें और दूसरा लगा लें। अब जो मास्क रखा है, उसे दोबारा इस्तेमाल करने से पहले साबुन पानी से जरूर धोयें।
एनोफिलीज मच्छर (मलेरिया की रोगवाहक) बारिश का पानी और इकट्ठा हुए जल (तालाब), गड्ढे, कम पानी वाली नदी, सिंचाई माध्यम (चैनल), रिसाव, धान के खेत, कुएं, तालाब के किनारे, रेतीले किनारे के साथ धीमी धाराओं में प्रजनन करते हैं।
एनोफिलीज मच्छर (मलेरिया की रोगवाहक) बारिश का पानी और इकट्ठा हुए जल (तालाब), गड्ढे, कम पानी वाली नदी, सिंचाई माध्यम (चैनल), रिसाव, धान के खेत, कुएं, तालाब के किनारे, रेतीले किनारे के साथ धीमी धाराओं में प्रजनन करते हैं।
एम्स दिल्ली के चिकित्सक डॉ. नंद कुमार के मुताबिक, बारिश में खाने पीने का खास ध्‍यान रखें। उन्होंने कहा कि जो पहले से सामान्य खाना खाते हैं, रोटी, चावल, दाल, सब्जी, फल, आदि ही सबसे अच्छा है। इसके अलावा इस मौसम में साफ-सफाई का ध्यान रखें और बाहर से सब्जी लाने के बाद उसे पानी से धो लें। जितना हो ठंडे पदार्थ से दूर रहें। गरम पानी पीने से मेटाबोलिक रेट बढ़ता है। जब यह बढ़ता है तो कोई भी बाहरी बैक्टीरिया आता है, तो उसे मार देता है। इसके अलावा बाहर जाएं तो सावधानी के साथ जाएं, सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क और हैंड सैनिटाइज करते रहें।
मच्छर भी वायरस और बैक्टीरिया से कम नहीं
कोई भी बीमारी फैलने के कई कारण होते हैं, अलग-अलग रोग अलग-अलग वजह से होते हैं, इनमें वायरस, बैक्टीरिया, गंदगी आदि शामिल हैं। मच्छर भी इनमें से एक है जो एक नहीं बल्कि कई बीमारियां फैला सकता है। ऐसी ही बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये हर साल 20 अगस्त को विश्व मच्छर दिवस मनाया जाता है।
मच्छर विश्व के सबसे घातक कीटों में से एक हैं। जिसके कारण विश्व में हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। मच्छर कई प्रकार के होते हैं, जो अलग-अलग रोगों की वजह बनते हैं, जैसे एडीज, एनोफ़िलीज़,, क्यूलेक्स।
मादा एडीज एजिप्ट मच्छर मनुष्य में डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका और पीला बुखार आदि को दूसरे मनुष्यों तक पहुंचाती हैं। यह दिन में अधिक काटती है। मादा एडीज एजिप्ट आमतौर पर 400 मीटर की औसत पर उड़ती है।
मादा एडीज एजिप्ट मच्छर मनुष्य में डेंगू, चिकनगुनिया, ज़ीका और पीला बुखार आदि को दूसरे मनुष्यों तक पहुंचाती हैं। यह दिन में अधिक काटती है। मादा एडीज एजिप्ट आमतौर पर 400 मीटर की औसत पर उड़ती है।
किस मच्छर से कौन सी बीमारी
एडीज: चिकनगुनिया, डेंगू बुख़ार, लिम्फेटिक फाइलेरिया, रिफ्ट वैली बुखार, पीला बुखार (पीत ज्वर), ज़ीका।
एनोफ़िलीज़: मलेरिया, लिम्फेटिक फाइलेरिया (अफ्रीका में)
क्यूलेक्स: जापानी इन्सेफेलाइटिस, लिम्फेटिक फाइलेरिया, वेस्ट नाइल फ़ीवर
2030 तक मलेरिया को खत्म करने का लक्ष्य
भारत सरकार ने 2030 तक मलेरिया को खत्म करने के लिए लक्ष्य तय किया था। इसके लिए 11 फरवरी, 2016 को नेशनल फ्रेमवर्क फॉर मलेरिया एलिमिनेशन (NFME) प्रोग्राम 2016-20 लॉन्च हुआ।
सरकार ने मलेरिया उन्मूलन (2017-2020) के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना का मसौदा तैयार किया, जिसमें देश को मलेरिया के केस के आधार पर चार श्रेणियों - श्रेणी 0 से श्रेणी 3 में बांटा और इसके आधार पर मलेरिया नियंत्रण और रोकथाम को मजबूत किया जा रहा है।
मादा मच्छरों के लिए केवल रक्त भोजन की जरूरत होती है, इसलिये मनुष्यों और जानवरों को काटते हैं, जबकि पुरुष मच्छर काटते नहीं है, लेकिन वे फूलों के मकरंद या अन्य स्रोतों से आहार लेते हैं।
मादा मच्छरों के लिए केवल रक्त भोजन की जरूरत होती है, इसलिये मनुष्यों और जानवरों को काटते हैं, जबकि पुरुष मच्छर काटते नहीं है, लेकिन वे फूलों के मकरंद या अन्य स्रोतों से आहार लेते हैं।
सामुदायिक स्तर पर शीघ्र निदान और शीघ्र उपचार के लिए ASHAs के साथ रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) और एंटीमलेरियल दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
इसके अलावा राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीबीडीसीपी) भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के तकनीकी विभागों में से एक है और भारत में सभी वेक्टर-जनित रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी नोडल एजेंसी है।

Wednesday, 22 July 2020

00:59

सच्चे सुख का मिलन-के सी शर्मा की कलम से


किसी गांव में एक महिला बहुत धार्मिक स्वभाव वाली थी। वह साधु-संन्यासियों का सम्मान करती थी। हमेशा पूजा-पाठ करने के बाद भी उसका मन अशांत ही रहता था। एक दिन उसके गांव में प्रसिद्ध संन्यासी आए। संत घर-घर जाकर भिक्षा मांगते थे।

गांव में भ्रमण करते हुए संत उस महिला के घर भिक्षा मांगने पहुंचे। महिला ने संत को खाना देते हुए कहा कि महाराज जीवन में शांति कैसे मिल सकती है, सच्चा सुख कैसे मिल सकता है? कृपया मेरे प्रश्न का उत्तर दें। संत ने कहा कि इसका जवाब मैं कल दूंगा।

अगले दिन संत महिला के घर फिर आने वाले थे। इस वजह से महिला ने संत के लिए खीर बनाई। संत महिला के घर पहुंचे। उन्होंने भिक्षा के लिए महिला को आवाज लगाई। महिला खीर लेकर बाहर आई। संत ने खीर लेने के लिए अपना कमंडल आगे बढ़ा दिया। महिला ने देखा कि कमंडल के अंदर गंदगी है। वह बोली महाराज आपका कमंडल तो गंदा है।

संत बोले कि कोई बात नहीं, आप इसी में खीर डाल दो। महिला ने कहा कि नहीं महाराज, ऐसे तो खीर खराब हो जाएगी। आप कमंडल दें, मैं इसे धोकर साफ कर देती हूं। संत ने पूछा कि मतलब जब कमंडल साफ होगा, तभी आप इसमें खीर देंगी? महिला ने कहा कि जी महाराज इसे साफ करने के बाद ही मैं इसमें खीर दूंगी।

संत ने कहा कि ठीक इसी तरह जब तक हमारे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, बुरे विचारों की गंदगी है, तब तक उसमें ज्ञान कैसे डाल सकते हैं? अगर ऐसे मन में ऐसी गंदगी पड़ी रहेगी तो उसमें उपदेश अपना असर नहीं दिखा पाएंगे। इसीलिए उपदेश सुनने से पहले हमें हमारे मन की इन बुराइयों को दूर करना होगा। इन बुरी बातों की वजह से ही मन शांत नहीं होता है।

जब ये बुराइयां दूर होंगी तो उपदेश का असर जल्दी होगा। इन बुराइयों को छोड़ने के बाद ही शांति मिल सकती है। तभी हम ज्ञान की बातें ग्रहण कर सकते हैं। पवित्र मन वाले ही सच्चा सुख और आनंद प्राप्त कर सकते हैं।

Wednesday, 8 July 2020

07:43

जानिए अग्निदेव की महिमा


 के सी शर्मा-अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं।

वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है।

आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था।

पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं।

 इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। उन जिह्वाओं के नाम : - काली,कराली, मनोजवा,
सुलोहिता,धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं।

पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं।

अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। 

रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। 

अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था।

अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है।

 अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है।

ऋग्वेद के अनुसार,अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए। अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए। अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। 

वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया।

 तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की।[3] अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं।[4] अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।[5]

महाभारत के अनुसार : - देवताओं को जब पार्वती से शाप मिला था कि वे सब सन्तानहीन रहेंगे, तब अग्निदेव वहाँ पर नहीं थे। कालान्तर में विद्रोहियों को मारने के लिए किसी देवपुत्र की आवश्यकता हुई। अत: देवताओं ने अग्नि की खोज आरम्भ की। अग्निदेव जल में छिपे हुए थे। मेढ़क ने उनका निवास स्थान देवताओं को बताया। अत: अग्निदेव ने रुष्ट होकर उसे जिह्वा न होने का शाप दिया। देवताओं ने कहा कि वह फिर भी बोल पायेगा। अग्निदेव किसी दूसरी जगह पर जाकर छिप गए। 

हाथी ने देवताओं से कहा-अश्वत्थ (सूर्य का एक नाम) अग्नि रूप है। अग्नि ने उसे भी उल्टी जिह्वा वाला कर दिया। इसी प्रकार तोते ने शमी में छिपे अग्नि का पता बताया तो वह भी शापवश उल्टी जिह्वा वाला हो गया। शमी में देवताओं ने अग्नि के दर्शन करके तारक के वध के निमित्त पुत्र उत्पन्न करने को कहा। अग्नि देव शिव के वीर्य का गंगा में आधान करके कार्तिकेय के जन्म के निमित्त बने।

भृगु पत्नी पुलोमा का पहले राक्षस पुलोमन से विवाह हुआ था। जब भृगु अनुपस्थित थे, वह पुलोमा को लेने आया तो उसने यज्ञाग्नि से कहा कि वह उसकी है या भृगु की भार्या। उसने उत्तर दिया कि यह सत्य है कि उसका प्रथम वरण उसने (राक्षस) ही किया था, लेकिन अब वह भृगु की पत्नी है। 

जब पुलोमन उसे बलपूर्वक ले जा रहा था, उसके गर्भ से 'च्यवन' गिर गए और पुलोमन भस्म हो गया। उसके अश्रुओं से ब्रह्मा ने 'वसुधारा नदी' का निर्माण किया। भृगु ने अग्नि को शाप दिया कि तू हर पदार्थ का भक्षण करेगी। शाप से पीड़ित अग्नि ने यज्ञ आहुतियों से अपने को विलग कर लिया, जिससे प्राणियों में हताशा व्याप्त हो गई। 

ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि वह पूर्ववत् पवित्र मानी जाएगी। सिर्फ़ मांसाहारी जीवों की उदरस्थ पाचक अग्नि को छोड़कर उसकी लपटें सर्व भक्षण में समर्थ होंगी। अंगिरस ने अग्नि से अनुनय किया था कि वह उसे अपना प्रथम पुत्र घोषित करें, क्योंकि ब्रह्मा द्वारा नई अग्नि स्रजित करने का भ्रम फैल गया था। अंगिरस से लेकर बृहस्पति के माध्यम से अन्य ऋषिगण अग्नि से संबद्ध रहे हैं।

हरिवंश पुराण के अनुसार ,असुरों के द्वारा देवताओं की पराजय को देखकर अग्नि ने असुरों को मार डालने का निश्चय किया। वे स्वर्गलोक तक फैली हुई ज्वाला से दानवों की दग्ध करने लगे। मय तथा शंबरासुर ने माया द्वारा वर्षा करके अग्नि को मंद करने का प्रयास किया, किन्तु बृहस्पति ने उनकी आराधना करके उन्हें तेजस्वी रहने की प्रेरणा दी। फलत: असुरों की माया नष्ट हो गई।

जातवेदस् नामक अग्नि का एक भाई था। वह हव्यवाहक (यज्ञ-सामग्री लाने वाला) था। दिति-पुत्र (मधु) ने देवताओं के देखते-देखते ही उसे मार डाला। अग्नि गंगाजल में आ छिपा। देवता जड़वत् हो गए। अग्नि के बिना जीना कठिन लगा तो वे सब उसे खोजते हुए गंगाजल में पहुँचे। अग्नि ने कहा, भाई की रक्षा नहीं हुई, मेरी होगी, यह कैसे सम्भव है? देवताओं ने उसे यज्ञ में भाग देना आरम्भ किया। अग्नि ने पूर्ववत् स्वर्गलोक तथा भूलोक में निवास आरम्भ कर दिया। देवताओं ने जहाँ अग्नि प्रतिष्ठा की, वह स्थान अग्नितीर्थ कहलाया।

दक्ष की कन्या (स्वाहा) का विवाह अग्नि (हव्यवाहक) से हुआ। बहुत समय तक वह नि:सन्तान रही। उन्हीं दिनों तारक से त्रस्त देवताओं ने अग्नि को सन्देशवाहक बनाकर शिव के पास भेजा। शिव से देवता ऐसा वीर पुत्र चाहते थे, जो कि तारक का वध कर सके। 

पत्नी के पास जाने में संकोच करने वाले अग्नि ने तोते का रूप धारण किया और एकान्तविलासी शिव-पार्वती की खिड़की पर जा बैठा। शिव ने उसे देखते ही पहचान लिया तथा उसके बिना बताये ही देवताओं की इच्छा जानकर शिव ने उसके मुँह में सारा वीर्य उड़ेल दिया। शुक (अग्नि) इतने वीर्य को नहीं सम्भाल पाए। 

उसने वह गंगा के किनारे कृत्तिकाओं में डाल दिया, जिनसे कार्तिकेय का जन्म हुआ। थोड़ा-सा बचा हुआ वीर्य वह पत्नी के पास ले गया। उसे दो भागों में बाँटकर स्वाहा को प्रदान किया, अत: उसने (स्वाहा ने) दो शिशुओं को जन्म दिया। पुत्र का नाम सुवर्ण तथा कन्या का नाम सुवर्णा रखा गया। मिश्र वीर्य सन्तान होने के कारण वे दोनों व्यभिचार दोष से दूषित हो गए।

 सुवर्णा असुरों की प्रियाओं का रूप बनाकर असुरों के साथ घूमती थी तथा सुवर्ण देवताओं का रूप धारण करके उनकी पत्नियों को ठगता था। सुर तथा असुरों को ज्ञात हुआ तो उन्होंने दोनों को सर्वगामी होने का शाप दिया। ब्रह्मा के आदेश पर अग्नि ने गोमती नदी के तट पर, शिवाराधना से शिव को प्रसन्न कर दोनों को शापमुक्त करवाया। वह स्थान तपोवन कहलाया।

Monday, 6 July 2020

10:22

सावन के पहले सोमवार के दिन हर-हर महादेव के नारे के साथ श्रद्धालु पहुंचे शिवालय-के सी शर्मा*

 सावन का पहला दिन और पहला सोमवार है. इस पूरे माह भक्त भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं. लेकिन इस साल कोरोना संक्रमण के कारण महौल वैसा नहीं है, जैसा आज के दिन मंदिरों के बाहर दिखने को मिलता था. हालांकि, नियमों का पालन करते हुए शिवालायों के बाहर भगवान शिव के भक्तों की भीड़ उमड़ रही है.  

कई मंदिरों के बाहर सोशल डिस्टेंसिंग के साथ लाइन लगी हैं. भगवान शिव का जलाभिषेक किया जा रहा है. भगवान भोले की नगरी वाराणसी से लेकर उज्जैन में महाकाल और दिल्ली के मंदिरों में भी भक्त सुबह-सुबह भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे हैं.

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में सावन के पहले दिन विधिवत पूजा-अर्चना की गई. सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ इकट्ठा हो गई थी. भगवान शिव का श्रृंगार किया गया. सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखते हुए श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक कर रहे हैं.

वहीं, भगवान भोले की नगर वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई. सुबह से ही श्रद्धालु भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए लाइन में लगे रहे. मंदिर प्रबंधन की ओर से खास इंतजाम भी किए गए हैं. स्थानीय प्रशासन ने बैरिकेडिंग लगाई है, ताकि कोरोना गाइडलाइन का उल्लंघन न हो.

दिल्ली के सभी शिवालयों में भी सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी थी. चांदनी चौक स्थित गौरी शंकर मंदिर में सावन के पहले सोमवार को श्रद्धालु भगवान शिव की उपासना के लिए इकट्ठा हुए. मंदिर में प्रवेश से पहले श्रद्धालुओं का टेम्प्रेचर चेक किया गया. इसके साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग को बनाए रखा गया.
09:03

क्या आप जानते है कि कितने प्रकार की होती है आरती-के सी शर्मा

आरती का अर्थ है पूरी श्रद्धा के साथ परमात्मा की भक्ति में डूब जाना। आरती को नीराजन भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है, विशेष रूप से प्रकाशित करना। यानी कि देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दें। व्यक्तित्व को उज्जवल कर दें। बिना मंत्र के किए गए पूजन में भी आरती कर लेने से पूर्णता आ जाती है। 
 
स्कंद पुराण में भगवान की आरती के संबंध में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता हो पूजा की विधि भी नहीं जानता हो। लेकिन भगवान की आरती की जा रही हो और उस पूूजन कार्य में श्रद्धा के साथ शामिल होकर आरती करें, तो भगवान उसकी पूजा को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं।
 
1 - आरती दीपक से क्यों :   रुई के साथ घी की बाती जलाई जाती है। घी समृद्धि प्रदाता है। घी रुखापन दूर कर स्निग्धता प्रदान करता है। भगवान को अर्पित किए गए घी के दीपक का मतलब है कि जितनी स्निग्धता इस घी में है। उतनी ही स्निग्धता से हमारे जीवन के सभी अच्छे कार्य बनते चले जाएं। कभी किसी प्रकार की रुकावटों का सामना न करना पड़े।
 
2 - आरती में शंख ध्वनि और घंटा ध्वनि क्यों : आरती में बजने वाले शंख और घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है। उससे मन एक जगह केन्द्रित होता है, जिससे मन में चल रहे विचारों की उथल-पुथल कम होती जाती है। शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठता है, जिससे शरीर और ऊर्जावान बनता है। 
 
3 - आरती कर्पूर से क्यों :   कर्पूर की महक तेजी से वायुमंडल में फैलती है। ब्रह्मांड में मौजूद सकारात्मक शक्तियों ( दैवीय शक्तियां ) को यह आकर्षित करती है। आरती वह माध्यम है जिसके द्वारा देवीय शक्ति को पूजन स्थल तक पहुंचने का मार्ग मिल जाता है।
 
4 :  आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए कि मानो वह पंच-प्राणों ( पूरे मन के साथ ) की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानना चाहिए। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं तो यह पंचारती कहलाती है। 
 
5 :   आरती दिन में एक से पांच बार की जा सकती है। घरों में आरती दो बार की जाती है। प्रातःकालीन आरती और संध्याकालीन आरती। 
 
6 :  दीपभक्ति विज्ञान के अनुसार आरती से पहले भगवान को नमस्कार करते हुए तीन बार फूल अर्पित करना चाहिए।
 
7 :   उसके बाद एक दीपक में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या में यानी कि 1, 3, 5 या 7 बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है,जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। इसके बाद कर्पूर से आरती की जाती है। कर्पूर का धुंआ वायुमंडल में जाकर मिलता है। यहां धुआं हमारे पूजन कार्य को ब्रंह्माडकीय शक्ति तक पहुंचाने  का कार्य करता है।
 
8 :  किसी विशेष पूजन में आरती पांच चीजों से की जा सकती है। पहली धूप से, दूसरी दीप से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, कर्पूर से ,पांचवी जल से।
 
कैसे सजाना चाहिए आरती का थाल आरती करने की पूरी विधि के बारे में...

आरती के थाल में एक जल से भरा लोटा, अर्पित किए जाने वाले फूल, कुमकुम, चावल, दीपक, धूप, कर्पूर, धुला हुआ वस्त्र, घंटी, आरती संग्रह की किताब रखी जाना चाहिए। थाल में कुमकुम से स्वस्तिक की आकृति बना लें। थाल पीतल या तांबे का लिया जाना चाहिए।
 
*आरती करने की विधि*

1 :   भगवान के सामने आरती इस प्रकार से घुमाते हुए करना चाहिए कि ऊँ जैसी आकृति बने। 

2 : अलग-अलग देवी - देवताओं के सामने दीपक को घुमाने की संख्या भी अलग है, जो इस प्रकार है।

भगवान शिव के सामने तीन या पांच बार घुमाएं।

भगवान गणेश के सामने चार बार घुमाएं। 

भगवान विष्णु के सामने बारह बार घुमाएं। 

भगवान रूद्र के सामने चौदह बार घुमाएं।

भगवान सूर्य के सामने सात बार घुमाएं।

भगवती दुर्गा जी के सामने नौ बार घुमाएं। 

अन्य देवताओं के सामने सात बार घुमाएं। 

यदि दीपक को घुमाने की विधि को लेकर कोई उलझन हो रही हो तो आगे दी गई विधि से किसी भी देवी या देवता की आरती की जा सकती है।
 
3 :  आरती अपनी बांई ओर से शुरू करके दाईं ओर ले जाना चाहिए। इस क्रम को सात बार किया जाना चाहिए। सबसे पहले भगवान की मूर्ति के चरणों में चार बार, नाभि देश में दो बार और मुखमंडल में एक बार घुमाना चाहिए। इसके बाद देवमूर्ति के सामने आरती को गोलाकार सात बार घुमाना चाहिए।
 
4 :  पद्म पुराण में आरती के लिए कहा गया है कि कुंकुम, अगर, कपूर, घी और चन्दन की सात या पांच बत्तियां बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियां बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुए आरती करनी चाहिए।
 
5 :  भगवान की आरती हो जाने के बाद थाल के चारों ओर जल घुमाया जाना चाहिए, जिससे आरती शांत की जाती है।
 
6 :   भगवान की आरती सम्पन्न हो जाने के बाद भक्तों को आरती दी जाती है। आरती अपने दाईं  ओर से दी जानी चाहिए।
 
7 :   सभी भक्त आरती लेते हैं। आरती लेते समय भक्त अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ते हैं। आरती पर से घुमा कर अपने माथे पर लगाते हैं। जिसके पीछे मान्यता है कि ईश्वरीय शक्ति उस ज्योत में समाई रहती हैं। जिस शक्ति का भाग भक्त माथे पर लेते हैं। एक और मान्यता के अनुसार इससे ईश्वर की नजर उतारी जाती है। जिसका असली कारण भगवान के प्रति अपने प्रेम व भक्ति को जताना होता है।

पूजा के बाद क्यों जरूरी है आरती ?

घर हो या मंदिर भगवान की पूजा के बाद घड़ी, घंटा और शंख ध्वनि के साथ आरती की जाती है। बिना आरती के कोई भी पूजा अपूर्ण मानी जाती है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले लोग आरती की थाल सजाकर बैठते हैं। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका उत्तर स्कंद पुराण में मिलता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।

आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। याद कीजिए आरती की थाल में कौन कौन सी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। आपके जेहन में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन जरूर आ गया होगा। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है।

जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।

आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है।

Saturday, 4 July 2020

19:25

गुरुपूर्णिमा पर विशेष रिपोर्ट - वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा की कलम से


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

 पूर्णिमा पर श्रमिक नेता रामजी पांडे का अपने गुरु
के चरणों मे प्रणाम

आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
इस वर्ष गुरू पूर्णिमा आज 5 जुलाई 2020 को मनाई जारही है। 
गुरू पूर्णिमा अर्थात गुरू के ज्ञान एवं उनके स्नेह का स्वरुप है। हिंदु परंपरा में गुरू को ईश्वर से भी आगे का स्थान प्राप्त है तभी तो कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर. इस दिन के शुभ अवसर पर गुरु पूजा का विधान है. गुरु के सानिध्य में पहुंचकर साधक को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त होती है।
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी होता है. 
वेद व्यास जी प्रकांड विद्वान थे उन्होंने वेदों को लिपिबद्ध संपादित किया था और पुराणों की रचना की थी इस कारण उन्हें वेद व्यास के नाम से पुकारा जाने लगा।

ज्ञान का मार्ग गुरू पूर्णिमा -!


शास्त्रों में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. गुरु हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता।

भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की।
गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है।
गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताय।

गुरु पूर्णिमा पौराणिक महत्व -!


गुरु को ब्रह्मा कहा गया है. गुरु अपने शिष्य को नया जन्म देता है. गुरु ही साक्षात महादेव है, क्योकि वह अपने शिष्यों के सभी दोषों को माफ करता है. गुरु का महत्व सभी दृष्टि से सार्थक है. आध्यात्मिक शांति, धार्मिक ज्ञान और सांसारिक निर्वाह सभी के लिए गुरू का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है. गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं है, अपितु वह व्यक्ति को जीवन के हर संकट से बाहर निकलने का मार्ग बताने वाला मार्गदर्शक भी है।
गुरु व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश में ले जाने का कार्य करता है, सरल शब्दों में गुरु को ज्ञान का पुंज कहा जा सकता है. आज भी इस तथ्य का महत्व कम नहीं है. विद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा आज भी इस दिन गुरू को सम्मानित किया जाता है. मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है।
वास्तव में हम जिस भी व्यक्ति से कुछ भी सीखते हैं , वह हमारा गुरु हो जाता है और हमें उसका सम्मान अवश्य करना चाहिए. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 'गुरु पूर्णिमा' अथवा 'व्यास पूर्णिमा' है. लोग अपने गुरु का सम्मान करते हैं उन्हें माल्यापर्ण करते हैं तथा फल, वस्त्र  इत्यादि वस्तुएं गुरु को अर्पित करते हैं. यह गुरु पूजन का दिन होता है जो पौराणिक काल से चला आ रहा है।

शास्त्रोक्त श्री गुरु पूजन विधि-!


ध्यान दें...... इस वर्ष गुरुपूर्णिमा के ही दिन मान्ध चंद्रग्रहण पड़ रहा है। 
परन्तु मान्ध होने के कारण इसका आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कोई महत्त्व नही इसका यम नियमादि मान्य नही होने के कारण सूतक आदि नही लगेगा।

इस साधना के लिए प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर, स्नानादि करके, पीले या सफ़ेद आसन पर पूर्वाभिमुखी होकर बैठें बाजोट पर पीला कपड़ा बिछा कर उस पर केसर से “ॐ” लिखी ताम्बे या जर्मन सिल्वर की प्लेट रखें। उस पर पंचामृत से स्नान कराके “गुरु यन्त्र” व “कुण्डलिनी जागरण यन्त्र” रखें। सामने गुरु चित्र भी रख लें। अब पूजन प्रारंभ करें।

पवित्रीकरण-!

बायें हाथ में जल लेकर दायें हाथ की उंगलियों से स्वतः पर छिड़कें।

ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।

आचमन-! 

निम्न मंत्रों को पढ़ आचमनी से तीन बार जल पियें।

ॐ आत्म तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ ज्ञान तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।
ॐ विद्या तत्त्वं शोधयामि स्वाहा।

१ माला जाप करे अनुभव करे हमरे पाप दोस समाप्त हो रहे है। .

ॐ ह्रौं मम समस्त दोषान निवारय ह्रौं फट
संकल्प ले फिर पूजन आरम्भ करे ।

सूर्य पूजन-! 

कुंकुम और पुष्प से सूर्य पूजन करें।

ॐ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्येन सविता रथेन याति भुनानि पश्यन ।।

ॐ पश्येन शरदः शतं श्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं। जीवेम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात।।

ध्यान -!

अचिन्त्य नादा मम देह दासं, मम पूर्ण आशं देहस्वरूपं।न जानामि पूजां न जानामि ध्यानं, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

ममोत्थवातं तव वत्सरूपं, आवाहयामि गुरुरूप नित्यं। स्थायेद सदा पूर्ण जीवं सदैव, गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं ।।

आवाहन-! 

ॐ स्वरुप निरूपण हेतवे श्री निखिलेश्वरानन्दाय गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वच्छ प्रकाश विमर्श हेतवे श्री सच्चिदानंद परम गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

ॐ स्वात्माराम पिंजर विलीन तेजसे श्री ब्रह्मणे पारमेष्ठि गुरुवे नमः आवाहयामि स्थापयामि।

स्थापन-! 

गुरुदेव को अपने षट्चक्रों में स्थापित करें।

श्री शिवानन्दनाथ पराशक्त्यम्बा मूलाधार चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री सदाशिवानन्दनाथ चिच्छक्त्यम्बा स्वाधिष्ठान चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री ईश्वरानन्दनाथ आनंद शक्त्यम्बा मणिपुर चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री रुद्रदेवानन्दनाथ इच्छा शक्त्यम्बा अनाहत चक्रे स्थापयामि नमः।

श्री विष्णुदेवानन्दनाथ क्रिया शक्त्यम्बा सहस्त्रार चक्रे स्थापयामि नमः।

पाद्य-! 

मम प्राण स्वरूपं, देह स्वरूपं समस्त रूप रूपं गुरुम् आवाहयामि पाद्यं समर्पयामि नमः।

अर्घ्य-!

ॐ देवो तवा वई सर्वां प्रणतवं परी संयुक्त्वाः सकृत्वं सहेवाः। अर्घ्यं समर्पयामि नमः।

गन्ध-! 

ॐ श्री उन्मनाकाशानन्दनाथ – जलं समर्पयामि।

ॐ श्री समनाकाशानन्दनाथ – स्नानं समर्पयामि।

ॐ श्री व्यापकानन्दनाथ – सिद्धयोगा जलं समर्पयामि।

ॐ श्री शक्त्याकाशानन्दनाथ – चन्दनं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वन्याकाशानन्दनाथ – कुंकुमं समर्पयामि।

ॐ श्री ध्वनिमात्रकाशानन्दनाथ – केशरं समर्पयामि।

ॐ श्री अनाहताकाशानन्दनाथ – अष्टगंधं समर्पयामि।

ॐ श्री विन्द्वाकाशानन्दनाथ – अक्षतां समर्पयामि।

ॐ श्री द्वन्द्वाकाशानन्दनाथ – सर्वोपचारां समर्पयामि।

पुष्प, बिल्व पत्र-! 

तमो स पूर्वां एतोस्मानं सकृते कल्याण त्वां कमलया सशुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध स चिन्त्य अचिन्त्य वैराग्यं नमितांपूर्ण त्वां गुरुपाद पूजनार्थंबिल्व पत्रं पुष्पहारं च समर्पयामि नमः।

दीप-! 

श्री महादर्पनाम्बा सिद्ध ज्योतिं समर्पयामि।

श्री सुन्दर्यम्बा सिद्ध प्रकाशम् समर्पयामि।

श्री करालाम्बिका सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री त्रिबाणाम्बा सिद्ध ज्ञान दीपं समर्पयामि।

श्री भीमाम्बा सिद्ध ह्रदय दीपं समर्पयामि।

श्री कराल्याम्बा सिद्ध सिद्ध दीपं समर्पयामि।

श्री खराननाम्बा सिद्ध तिमिरनाश दीपं समर्पयामि।

श्री विधीशालीनाम्बा पूर्ण दीपं समर्पयामि।

नीराजन-! 

ताम्रपात्र में जल, कुंकुम, अक्षत अवं पुष्प लेकर यंत्रों पर समर्पित करें।

श्री सोममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री सूर्यमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री अग्निमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ज्ञानमण्डल नीराजनं समर्पयामि।

श्री ब्रह्ममण्डल नीराजनं समर्पयामि।

पञ्च पंचिका-!

अपने दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न पञ्च पंचिकाओं का उच्चारण करते हुए इन दिव्य महाविद्याओं की प्राप्ति हेतु गुरुदेव से निवेदन करें।

पञ्चलक्ष्मी-! 

श्री विद्या लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री एकाकार लक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री महालक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिशक्तिलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री सर्वसाम्राज्यलक्ष्मी लक्ष्म्यम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकोश-! 

श्री विद्या कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परज्योति कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री परिनिष्कल शाम्भवी कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अजपा कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री मातृका कोशाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकल्पलता-!

श्री विद्या कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्वरिता कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पारिजातेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री त्रिपुटा कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री पञ्च बाणेश्वरी कल्पलताम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

पञ्चकामदुघा-! 

श्री विद्या कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।

श्री अमृत पीठेश्वरी कामदुघाम्बा प्राप्तिम् प्रार्थयामि।
 
तदोपरांत गुरुदेव की आरती करें

आरती-!

आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।  

जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञानरूप अन्तर के वासी,
पग पग पर देते प्रकाश, जैसे किरणें दिनकर कीं।
आरती करूँ गुरुवर की॥

जब से शरण तुम्हारी आए, अमृत से मीठे फल पाए,
शरण तुम्हारी क्या है छाया,
कल्पवृक्ष तरुवर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

ब्रह्मज्ञान के पूर्ण प्रकाशक, योगज्ञान के अटल प्रवर्तक।
जय गुरु चरण-सरोज मिटा दी, व्यथा हमारे उर की। आरती करूँ गुरुवर की।  

अंधकार से हमें निकाला, दिखलाया है अमर उजाला,  
कब से जाने छान रहे थे, खाक सुनो दर-दर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

संशय मिटा विवेक कराया, भवसागर से पार लंघाया,
अमर प्रदीप जलाकर कर दी, निशा दूर इस तन की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

भेदों बीच अभेद बताया,... आवागमन विमुक्त कराया,
धन्य हुए हम पाकर धारा, ब्रह्मज्ञान निर्झर की।
आरती करूँ गुरुवर की॥

करो कृपा सद्गुरु जग-तारन,
सत्पथ-दर्शक भ्रान्ति-निवारन,
जय हो नित्य ज्योति दिखलाने वाले लीलाधर की।
आरती करूँ आरती सद्गुरु की
प्यारे गुरुवर की आरती, आरती करूँ गुरुवर की।  

गुरु हैं सब कुछ जगत में गुरु से सब कुछ होय ।
  गुरु बिन और जो जानहीं भक्ति न पावै सोय ॥

जय गुरुदेव-!

Thursday, 2 July 2020

23:34

शिव पुराण के अनुसार जब न दिखाई दे अपनी परछाईं तो ये है मृत्यु का संकेत


सनातन धर्म में कई पुराण हैं जिनमें से शिव पुराण में भगवान शंकर सकी महिमा के बारे में विस्तार से बताया गया है. भगवान शिव  हिंदुओं के देवता हैं. उन्हें ब्रह्मांड में जीवन का आधार माना गया है. जीवन के अस्तित्व से लेकर अंत तक सबमें शिव की अवधारणा समाई है. जीवन की सबसे बड़ी उर्जा हैं शिव. शिव पुराण में बताया गया है कि भगवान शिव देवता, मनुष्यों, राक्षण और हर जीव पर समान रूप से कृपा करते हैं तथा जल्दी ही प्रसन्न होने वाले देवता हैं. आइए जानते हैं शिवपुराण के बारे में ख़ास बातें...

शिव पुराण में मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेतों के बारे में बताया गया है. यदि किसी का शरीर एकदम पीला या सफ़ेद पड़ जाए और शरीर पर लाल चकते उभरने लगें तो यह पास आती मृत्यु का एक संकेत है.

शिव पुराण के अनुसार, यदि किसी को आग की रोशनी ठीक से न दिखाई दे और हर तरफ अन्धकार प्रतीत हो. तो यह भी मृत्यु का एक संकेत है. ऐसे समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए.

शिव पुराण में यह भी बताया गया है कि यदि जातक को तेल, शीशे और पानी में अपनी परछाईं दिखाई देनी बंद हो जाए या फिर लगे कि नजरें एकदम कमजोर हो गई हैं या दिखाई देना बंद हो गया है, तो भी यह मृत्यु का एक संकेत है.