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Saturday, 15 February 2020

14:40

जाने उलटे भजन का सीधा भाव के सी शर्मा



*जाने,"उलटे भजन का सीधा भाव"-के सी शर्मा*


         एक बार एक व्यक्ति श्री धाम वृंदावन में दर्शन करने गया। दर्शन करके लौट रहा था। तभी एक संत अपनी कुटिया के बाहर बैठे बड़ा अच्छापद गा रहे थे कि "हो नयन हमारे अटके श्री बिहारी जी के चरण कमल में" बार-बार यही गाये जा रहे थे तभी उस व्यक्ति ने जब इतना मीठा पद सुना तो वह आगे न बढ़ सका, और संत के पास बैठकर ही पद सुनने लगा और संत के साथ-साथ गाने लगा।
       कुछ देर बाद वह इस पद को गाता-गाता अपने घर गया, और सोचता जा रहा था कि वाह ! संत ने बड़ा प्यारा पद गाया। जब घर पहुँचा तो पद भूल गया अब याद करने लगा कि संत क्या गा रहे थे, बहुत देर याद करने पर भी उसे याद नहीं आ रहा था। फिर कुछ देर बाद उसने गाया "हो नयन बिहारी जी के अटके, हमारे चरण कमल में" उलटा गाने लगा। उसे गाना था नयन हमारे अटके बिहारी जी के चरण कमल में अर्थात बिहारी जी के चरण कमल इतने प्यारे हैं कि नजर उनके चरणों से हटती ही नहीं हैं। नयन मानो वही अटक के रह गए हैं। पर वो गा रहा था कि बिहारी जी के नयन हमारे चरणों में अटक गए, अब ये पंक्ति उसे इतनी अच्छी लगीं कि वह बार-बार बस यही गाये जाता, आँखे बंद है बिहारी के चरण हृदय में है और बड़े भाव से गाये जा रहा है। जब बहुत समय तक गाता रहा, तो अचानक क्या देखता है सामने साक्षात् बिहारी जी खड़े हैं। झट चरणों में गिर पड़ा। बिहारी जी बोले,"भईया ! एक से बढ़कर एक भक्त हुए। पर तुम जैसा भक्त मिलना बड़ा मुश्किल है लोगो के नयन तो हमारे चरणों के अटक जाते हैं पर तुमने तो हमारे ही नयन अपने चरणों में अटका दिए और जब नयन अटक गए तो फिर दर्शन देने कैसे नहीं आता" भगवान बड़े प्रसन्न हो गए। वास्तव में बिहारी जी ने उसके शब्दों की भाषा सुनी ही नहीं क्योकि बिहारी जी शब्दों की भाषा जानते ही नहीं है वे तो एक ही भाषा जानते है वह है भाव की भाषा,भले ही उस भक्त ने उलटा गाया पर बिहारी जी ने उसके भाव देखे कि वास्तव में ये गाना तो सही चाहता है शब्द उलटे हो गए तो क्या भाव तो कितना उच्च है। सही अर्थो में भगवान तो भक्त के हृदय का भाव ही देखते हैं।

Friday, 14 February 2020

08:55

जैसा संग वैसा रंग पढ़े के सी शर्मा के संग।



*पढ़े,जैसा संगत वैसा ही इंसान पर चढ़ता है रंग-के सी शर्मा*

हम जिनके पास बैठते हैं, वैसे ही हो जाते हैंजिनके साथ उठते बैठते हैं, उनका रंग चढ़ जाता है

सांप के ऊपर अगर स्वाति की बूंद भी गिरती है तो जहर हो जाती है लेकिन वही बूंद अगर सीपी में बंद हो जाती है
तो मोती बन जाती है बूंद वही है सांप के साथ जहर हो जाती है सीपी में बंद होकर मोती बन जाती है
कृष्णा नाम की सीपी में बंद हो जाओ तो मोती बन जाओगे।ये है संगति का महत्व

जिसके साथ जुड़ जाओगे वही हो जाओगे। सदगुरु के पास बैठते—बैठते तुम्हारे भीतर रोशनी हो जाएगी गुरु का अर्थ होता है.

अंधेरे को जो दूर कर दे ’ गु ‘ का अर्थ होता है : अंधेरा  रु’ का अर्थ होता है दूर करने वाला

गुरु का अर्थ हुआ दीया, रोशनी, क्योंकि रोशनी अंधेरे को दूर कर देती है
रोशनी से जुड़ जाओगे, रोशनी हो जाओगे।इसलिए रैदास कहते हैं हमने तो सब देख—समझ कर यही तय किया कि संगति करनी तो तुम्हारी

इस संसार में और कुछ संगति करने योग्य नहीं है प्रभुजी तुम संगति सरन तिहारी

एक तरफ हैं लोग जो पूछते हैं कि राम को कैसे जपें एक तरफ हैं लोग जो पूछते हैं  भजन कैसे हो?

 ध्यान कैसे हो?
 कीर्तन कैसे हो?
 पूजा कैसे?
अर्चना कैसे?
और रैदास कहते हैं हमारी मुसीबत दूसरी ही है हमारी मुसीबत यह है कि अब कैसे छूटै नामरट लागी!

 अब छुडाए नहीं छूटती ऐसा रंग चढ़ता है कि अब हम चाहें भी कि बंद हो जाए तो बंद नहीं होती

अब कैसे छूटै नामरट लागी
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी जाकी अंग—अंग बास समानी
प्रभुजी तुम घनबन हम मोरा जैसे चितवन चंद चकोरा
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती जाकी जोति बरै दिनराती
प्रभुजी तुम मोती हम धागा जैसे सोनपहिं मिलत सुहागा
प्रभुजी तुम स्‍वामी हम दासा ऐसी भक्‍ति करै रैदासा
रैदास कहते हैं ......

: अब समझ में आना शुरू हुआ कि तुम चंदन हो और हम पानी हैं

 जैसे पानी में चंदन डाल दो तो पानी के कण—कण में चंदन की बास समा जाती है
तुम मुझमें ऐसे समा गए हो जैसे चंदन की बास पानी में समा जाए अब अलग करने का कोई उपाय नहीं

 जब परमात्मा को अलग करने का कोई उपाय न रह जाए, तभी समझना कि उसे पाया
मंदिर गए, तिलक लगा लिया, चंदन घिस कर तीसरे नेत्र पर ऊपर से शीतलता पहुंचा दी और घर चले आए

तुम्हारे तीसरे नेत्र पर परमात्मा चंदन की बास जैसा हो जाना चाहिए

 और चंदन को क्यों चुना है?
 बहुत कारणों से चुना है चंदन अकेला वृक्ष है जिस पर विषैले सांप लिपटे रहते हैं,
मगर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। चंदन विषाक्त नहीं होता। सर्प भला सुगंधित हो जाएं, मगर चंदन विषाक्त नहीं होता

ऐसा ही यह संसार है  जहर से भरा हुआ इसमें तुम्हें चंदन जैसे होकर जीना होगा
 यह तुम्हें विषाक्त न कर पाए, ऐसा तुम्हारा साक्षीभाव होना चाहिए कि कीचड़ में से भी गुजरो तो भी कीचड़ तुम्हें छुए न

यह काजल की कोठरी है संसार इससे गुजरना तो है, परमात्मा चाहता है कि गुजरो। जरूर कोई शिक्षा है जो जरूरी है लेकिन ऐसे गुजरना जैसे कबीर गुजरे, रैदास गुजरे

और जैसे बादल घिर आते हैं आषाढ़ में घनघोर बादल और मोर नाचने लगते हैं ऐसे ही रैदास कहते हैं कि तुम घने बादलों की तरह छा गए हो और हम तो मोर हैं, हम नाच उठे

जिस व्यक्ति ने अपने भीतर अहर्निश प्रभु के नाद को सुना, उसे चारों तरफ परमात्मा दिखाई पड़ने लगता है वृक्षों में, पहाड़ी मेंचांद तारों में, लोगों में, पशुओं में, पक्षियों में

उसे सब तरफ परमात्मा दिखाई पड़ने लगता है और जो सब तरफ परमात्मा से घिर गया है वह मोर की तरह नहीं नाचेगा तो कौन नाचेगा?

प्रभुजी तुम घनबन हम मोरा जैसे चितवन चंद चकोरा
उसकी आंखें तो जैसे चकोर की आंखें चांद पर टिकी रह जाती हैं,

 बस ऐसे ही परमात्मा पर टिकी रह जाती हैं ही, एक फर्क है चकोर चांद से आंखें नहीं हटाता और ध्यानी हटाना भी चाहे तो नहीं हटा सकता,

क्योंकि जहां भी आंख ले जाए वहीं उसे परमात्मा दिखाई पड़ता है, वहीं चांद है उसका कंकड़ कंकड़ में उसकी ही ध्वनि है, पत्तेपत्ते पर उसी के हस्ताक्षर हैं

तो चकोर तो कभी थक भी जाए… थक भी जाता होगा कवियों की कविताओं में नहीं थकता, मगर असली चकोर तो थक भी जाता होगा।

असली चकोर तो कभी रूठ भी जाता होगा।असली चकोर तो कभी शिकायत से भी भर जाता होगा कि आखिर कब तक देखता रहूं?

लेकिन चकोर के प्रतीक को कवियों ने ही नहीं उपयोग किया, ऋषियों ने भी उपयोग किया है। प्रतीक प्यारा है चकोर एकटक चांद की तरफ देखता है

सारी दुनिया उसे भूल जाती है, सब भूल जाता है, बस चांद ही रह जाता है ठीक ऐसी ही घटना भक्त को भी घटती है
सब भूलता नहीं, सभी चांद हो जाता है। जहां भी देखता है, पाता है वही, वही परमात्मा है

प्रभुजी तुम दीपक हम बाती
तुम ज्योति हो, हम तुम्हारी बाती हैं इतना ही तुम्हारे काम आ जाएं तो बहुत तुम्हारी ज्योति के जलने में उपयोग आ जाएं तो बहुत

 तुम्हारे प्रकाश को फैलाने में उपयोग आ जाएं तो बहुत। यही हमारा धन्यभाग

 कि हम तुम्हारे दीये की बाती बन जाएं तुम्हारे लिए मिट जाने में सौभाग्य है

अपने लिए जीने में भी सौभाग्य नहीं है अपने लिए जीने में भी दुर्भाग्य है, नरक है, और तुम्हारे लिए मिट जाने में भी सौभाग्य है, स्वर्ग है

प्रभुजी तुम मोती हम धागा
कि तुम मोती हो, हमें धागा ही बना लो इतने ही तुम्हारे काम आ जाएं कि तुम्हारी माला बन जाए। तुम तो बहुमूल्य हो, हमारा क्या मूल्य है! धागे का क्या मूल्य है! मगर धागा भी मूल्यवान हो जाता है जब मोतियों में पिरोया जाता है

जैसे सोनपहिं मिलत सुहागा
सुहागे का क्या मूल्य है, मगर सोने से मिल जाए तो मूल्यवान हो जाता है
प्रभुजी तुम स्‍वामी हम दासा। ऐसी भक्‍ति करै रैदासा

तुम मालिक हो। सूफी फकीर परमात्मा को सौ नाम दिए हैं, उसमें एक नाम सबसे ज्यादा प्यारा है, वह है या मालिक! कि तुम मालिक हो, हम तो नाकुछ, तुम्हारे पैरों की धूल!

प्रभुजी तुम स्‍वामी हम दासा। ऐसी भक्‍ति करै रैदासा
यही हमारी भक्ति है कि हम तुम्हारे मोती में धागा बन जाएं, कि हम तुम्हारी ज्योति में बाती बन जाएं; कि तुम मालिक हो हम दास हो जाएं
बस इतनी हमारी भक्ति है। और हमें भक्ति का शास्त्र नहीं आता, कि कितने प्रकार की भक्ति होती है,

 नवधा भक्ति, कि कितने प्रकार की पूजाअर्चना होती है, कि कैसे व्यवस्था से यश करें, हवन करें हमें कुछ नहीं आता।

हम तो धागा बनने को राजी हैं, तुम मोती हो ही। तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, हमें धागा बन जाने दो। और तुम तो चंदन हो ही, और हम तो पानी हैं

 बस तुम्हारी बास समा जाए, बहुत और तुम तो ज्योति हो ही, तुम्हें बातियों की जरूरत तो पड़ती ही होगी न?
हम तुम्हारी बाती बनने को राजी हैं

Monday, 10 February 2020

06:39


जानिए, क्या है एक चुटकी सिंदूर-के सी शर्मा


आखिर तुम्हारा क्या है मेरे पास ???
जो मुझपर इतना हक जमाते हो...
न तुमने मुझे जन्म दिया ,
न तुमने मुझे बड़ा किया..
न पढ़ाया न ही लिखाया ,
डर पर कैसे पानी है विजय वो सिखाया ,
मैं खुद को पहचान और समझ सकूं इस काबिल ही बनाया !!

फिर क्यों मुझपर अपना अधिकार जताते हो ???

मुझे जन्म मेरी माँ ने दिया..
सुरक्षा पिता ने दिया ,
भाई बहनों ने लाड़ दिया !
मुझे इस काबिल बनाया कि मैं..
अपना घर छोड़ दूसरे घर को संभाल सकूं  !
पिता ने कभी भी उनके खिलाये निवाले का ,
एहसान नहीं जताया !!
जी करता था तो करती थी काम..
नहीं करता था तो भी किसी ने काम के लिए नहीं सुनाया !

फिर क्यों तुम मुझे ताने सुनाते हो ??

अरे हाँ याद आया..
है तुम्हारा दिया कुछ मेरे पास जिसे सदियों से ,
एक पुरुष देता आया है औरत को
वो है एक चुटकी सिंदूर ,
जिसे वो चाहे न चाहे लेना..
वो मांगे न मांगे किसी से ,
पर उसे दिया जाता है  !
"रिवाज जो है " !!
तुमने भी दी है मुझे भेंट स्वरूप एक चुटकी सिंदूर..
जिसे मैंने स्वेच्छा के स्वीकार किया ,
सिर्फ इस भरोसे पर कि तुम भी उतना ही दोगे...
मुझे मान जितना पिता ने दिया  !
उतना ही करोगे लाड़ जितना माँ ने किया !!
पर जाने क्यों तुम्हें मुझमें बस खोट ही नजर आती है..
दिनभर करूँ काम तो तुम्हें नहीं पड़ता फर्क ,
पर मेरे मोबाइल और आराम करने से
तुम्हारी त्योरियां चढ़ जाती है !
सबके सपनों के लिए लाख करू बलिदान ,
तो तुम्हें उसमें भी चाल नजर आती है !
किसी से कर लूं बात तो उंगली मेरे चरित्र पर उठ जाती है!

आखिर क्यों इतना मुझपर अपना रौब दिखाते हो ???
आखिर क्यों हरबार मेरी नजरों में तुम गिर जाते हो ???

मेरी मांग में भरे सिंदूर के अलावा ,
और क्या है तुम्हारा मेरे पास...
जो तुम हर बार मेरे स्त्रीत्व को कुचल जाते है !
बिन मुझे छुए अपने शब्दों से घाव गहरे दे जाते हो !!

आखिर क्यों हर बार मुझे , मैं पराये घर में हूँ
का एहसास कराते हो ,
आखिर क्यों नहीं तुम पुरुष बन जाते हो !
जानते हो तुम जब जब मेरे कोमल मन को ठेस पहुंचाते हो
तुम गिरते गिरते इतने गिर जाते हो
कि तुम मुझे 
06:32

मन चंगा तो कठौती में गंगा"-के सी शर्मा



*"मन चंगा तो कठौती में गंगा"-के सी शर्मा*


"शरीर को आत्मा से पवित्र होने की जरूरत है न कि किसी पवित्र नदी में नहाने से।
अगर हमारा हृदय और आत्मा शुध्द है तो हम पूरी तरह से पवित्र हैं चाहे हम घर में ही क्यों न नहायें..."

ऐसे थे संत शिरोमणि रविदास जी।
उन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों और ढोंग को हमेशा चुनौती दी।
           
बनारस में गंगा किनारे  जन्मे श्री रविदास की महानता का अंदाज़ा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा लिखित पद, भक्ति-गीत और दूसरे लेखन के 41 पद पाँचवे सिक्ख गुरु अर्जन देव जी ने गुरुग्रंथ साहिब में संकलित की है।

राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी मीरा ने तो संत रविदास के अध्यापन से बेहद  प्रभावित थीं। उन्होंने संत रविदास को अपना गुरु माना था। मीरा अपने गीतों में कहती हैं कि,

"गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी,
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।"

संत रविदास को पंडित शारदा नंद ने तमाम सामाजिक विरोधों के बाद भी अपना शिष्य बनाया था। पढ़ाई के दौरान संत रविदास गुरु शारदानंद के पुत्र के मित्र बन गये। बताया जाता है कि दोनों लुका-छिपी का खेल रहे थे। अपने मित्र को खोजने की बारी रविदास की थी कि अंधेरा हो गया। अगले दिन खेल पूरा करने का वचन देकर रविदास घर चले गये। जब वे अगले दिन पाठशाला लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके गुरु और गुरुमाता रो रहे हैं। जब उन्होंने गुरु शारदानंद से रोने की वजह पूछी तो पता चला कि बीती रात उनके मित्र की मृत्यु हो गयी है। रविदास अपने मित्र के शव पहुंचे और कहा-उठो ये सोने का समय नहीं है दोस्त। ये तो लुका-छिपी खेलने का समय है। रविदास जी के ये शब्द सुनते ही उनका मित्र फिरसे जी उठा। संत रविदास दैवीय शक्तियों से समृद्ध थे। वे कुष्ठ रोग का भी उपचार कर दिया करते थे।

संत रविदास कहते थे कि "ईश्वर ने इंसान को बनाया है न कि इंसान ने ईश्वर को।" उनका कहना था कि इस धरती पर सभी के अधिकार समान हैं। उस समय समाज में ऊंच-नीच और अस्पृश्यता का बोलबाला था। संत रविदास बहुत बहादुरी से सभी भेदभाव को स्वीकार करते और लोगों को वास्तविक मान्यताओं और जाति के बारे में बताते थे। संत शिरोमणि रविदास कहते थे कि कोई भी इंसान अपने जाति-धर्म के लिये नहीं जाना जाता। इंसान की पहचान उसके कर्मों से होती है।

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै ‘रैदासा’॥

अर्थात रविदास जी ईश्वर को अपना अभिन्न अंग मानते थे और ईश्वर के बिना जीवन की कल्पना भी नही करते थे।

Friday, 7 February 2020

08:05

जानिए,"सिन्दूर" का महत्व.-के सी शर्मा*



*जानिए,"सिन्दूर" का महत्व.-के सी शर्मा*

यदि पत्नी के मांग के बीच सिन्दूर लगा हुआ है तो उसके पति की अकाल मृत्यु नही हो सकती !
 जो स्त्री अपनी मांग के सिन्दूर को बालो से छिपा लेती है ,उसका पति समाज में छिप जाता है ।। जो स्त्री बीच मांग में सिन्दूर न लगा कर किनारे की तरफ सिन्दूर लगाती है ,उसका पति उससे किनारा कर लेता है। यदि स्त्री के बीच मांग में सिन्दूर भरा है ,तो उसके पति की आयु लम्बी होती है ।
रामायण में एक प्रसंग आता है ,जब बाली और सुग्रीव के बीच युद्ध हो रहा था तब श्रीराम ने बाली को नही मारा ।
जब बाली के हाथों मार खाकर सुग्रीव श्रीराम के पास पहुचा, तो श्रीराम ने कहा की तुम्हारी और बाली की शक्ल एक सी है, इस लिये मैं भ्रमित हो गया ।
अब आप ही बताइये श्रीराम की नजरो से भला कोई छुप सकता है क्या..?
 असली बात तो यह थी जब श्रीराम ने यह देख लिया की बाली की पत्नी तारा की मांग सिन्दूर से भरी हुई है।
तो उन्होने सिन्दूर का सम्मान करते हुऐ बाली को नही मारा।
 दूसरी बार जब सुग्रीव ने बाली को ललकारा तब तारा स्नान कर रही थी , उसी समय भगवान ने देखा की मौका हैं देखकर बाण छोड़ दिया ।
अब आप ही बताइये की जब मांग में सिन्दूर भरा हो तो परमात्मा भी उसको नही मारते,फिर उनके सिवाय कोई और क्यो मारेगा..?
यह पोस्ट मैं इसीलिये कर रहा हूं की आजकल फैशन चल रहा है ,सिन्दूर न लगाने का या हल्का सिन्दूर लगाने का या बीच मांग में न लगाकर किनारे लगाने का  आशा करता हूं की मेरे इस पोस्ट से आप लोग सिन्दूर का महत्व समझ गये होंगें।
 अपनी पत्नियों को जरूर इस हकीकत से रूबरू कराओ । और वो सब अपने पति की लम्बी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिये अपने पति के नाम का सिन्दूर अपने मांग में जरूर भरे,,,!
08:02

जानिए, भारतीय संस्कृति कितनी महान है-के सी शर्मा*



*जानिए, भारतीय संस्कृति कितनी महान है-के सी शर्मा*


भारतीय संस्कृति में :-
 शाकाहार ही अपनाया गया है।
मृत व्यक्ति को जला दिया जाता है।
 इसका कुछ लोग मजाक भी उड़ाने लग गए थे। लेकिन अब कोरोना वाइरस के डर ने दोनों बातों की मानने पर मजबूर कर दिया।
 मांसाहार केवल एक रोग ही नहीं बल्कि बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, निपाह, कोरोना वायरस लाते हैं, जिसकी कीमत सभी को भुगतनी पड़ती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति मांसाहार नहीं शाकाहार पर ही आधारित रहा है।
 जहां एक ओर फार्मा कंपनियों द्वारा वायरस का एक प्रोपेगेंडा फैलाया जाता है ताकि वो हजारों करोड़ों कमा लें, वहीं इसकी शुरुआत मांसाहार अर्थात जीवों में वायरस छोड़े जाते हैं, वैक्सीनेशन के द्वारा और फिर उस मांस का भक्षण जब लोग करते हैं तो वायरस तीव्र गति में फैलते हैं।
 वायरस से बचने के लिए चीन की सरकार ने मांसाहार पर रोक लगाया है और सब्जियां मंगवाई हैं। इस घटना से आपको यह समझने के लिये काफी है कि शाकाहार अपनाएंगे, भारतीय गौमाता के गोबर आधारित खेती से उत्पन्न अनाज खाएंगे तो कभी कोई वायरस आंख नहीं उठा सकेगा। गाय माता के गौझरण, गोबर, दूध आदि का उपयोग करेंगे तो वायरस आप पर हावी नहीं हो सकता।
ना डरें नए कोरोना वायरस से क्योंकि हमारी भारतीय नस्ल की कामधेनु गौमैया हमारे साथ है!
जी हां कोरोना वायरस जो कि चाइना और अन्य कुछ देशों में जल्दी से फैल रहा है, WHO के अनुसार इस नए घातक वायरस की कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, कुछ लोगों की मृत्यु भी हुई तो इसका डर लगभग सभी देशों में बढ़ रहा है।
 ये कोरोना वायरस हवा से रोगी के संसर्ग व स्पर्श से फैलने वाला वायरस है, ग्रसित व्यक्ति के संसर्ग से अथवा ग्रसित पशु के संसर्ग से फैलता है।
 अब ये वायरस दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है और भय का वातावरण बना रहा है।
तो ना डरें ये कोरोना वायरस से क्योंकि भारतीय वंश की देशी गौमैया के पास सब रोगों से लड़ने की क्षमता भरी पड़ी है।
देशी गाय के पंचगव्य से ये वायरस आपसे मीलों दूर रहेगा।

 *तो जानें आपको क्या करना है...*

शुद्ध भारतीय वंश की देसी गाय के पांचों गव्यों से सिद्ध पंचगव्य घृत को रोज रात्रि में सोते समय एवम सुबह उठकर कुनकुना करके 2-2 बून्द नाक में डालकर 15-20 मिनिट बिना तकिया सिर ऊंचा रखकर नाक में धीरे धीरे अंदर उतरने दो।
गिलोय, तुलसी, अड़ूसा, अदरक, जैसी औषधियों से निर्मित, गौमूत्र अर्क प्रातः खाली पेट 30 से 50 मिली सेवन करें।
 बस इतने सामान्य प्रयोग से आपसे कोरोना ही नहीं हवा से फैलने वाले सब वायरस से रक्षण मिलेगा वो भी गारंटी है भारतीय नस्ल की गौमैया की।
पंचगव्य घृत से हवा से फैलने वाले कोई भी वायरस आपके शरीर मे प्रवेश नहीं कर सकता और औषधि युक्त गौमूत्र अर्क आपकी रोग प्रतिकारक क्षमता बनाये रखेगा।
 गिलोय के 6-7 इंच लंबे तने को चबाते हुए रस निगल लें। तुलसी की पत्तियों को पीसकर शुद्ध शहद मिलाकर चाट लें। एक दो काली मिर्च मिला लें। इतने से ही इम्यून सिस्टम बे‍हतर होने लगेगा।
 यदि किसी को गिलोय को चबाना-चूसना/तुलसी की पत्तियों को पीसना सिरदर्दी का काम लगता है तो बाजार से नामी गिरामी फार्मेसी की तुलसी घनवटी और गिलोय सत्व ले आये। दो गोली तुलसी घनवटी की चबाकर ऊपर से एक ग्राम गिलोय सत्व मिला हुआ शहद चाट लें। बस हो गया काम। कोरोना ही नहीं किसी भी प्रकार के वायरस के प्रति अभेद्द्य सुरक्षा कवच इन दोनों के सेवन से मिल जाता है।
 आयुष मंत्रालय ने ट्वीट करके बताया कि कोरोना वायरस से बचने हेतु तुलसी, काली मिर्च, सोंठ और पिप्पली के मिश्रण का उपयोग करें।

 दूसरा कि कोरोना वायरस वाले मृतव्यक्ति को जलाया जाता है।

 भारतीय संस्कृति इतनी महान है कि उसमें शाकाहार पहले से ही अपनाया जाता है और मृत व्यक्ति को जलाया जाता है। अगर आप तुलसी आदि का उपयोग करते हैं तो अति उत्तम है!! अगर हम पहले से ही भारतीय संस्कृति अपनाएं तो बीमार ही नही होंगे।
 प्रकृति को बचाना है, स्वयं को बचाना है तो भारतीय संस्कृति के अनुसार शाकाहारी जीवन अपनायें। गौ-गीता और गंगा आदि का महत्व समझकर उसका जीवन में उपयोग करें तो जीवन धन्य-धन्य हो जाएगा।

Monday, 3 February 2020

09:32

जानिए,सनातन धर्म के वास्तविक योद्धा : दिगंबर (नागा) साधु-के सी शर्मा



जानिए,सनातन धर्म के वास्तविक योद्धा : दिगंबर (नागा) साधु-के सी शर्मा*
दिगंबर (अर्थात अंबर ही जिनका वस्त्र है) नागा साधु हिन्दू धर्मावलम्बी साधु हैं जो कि नग्न रहने तथा युद्ध कला में माहिर होने के लिये प्रसिद्ध हैं। ये विभिन्न अखाड़ों में रहते हैं जिनकी परम्परा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गयी थी

भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। भारत की धन संपदा से खिंचे तमाम आक्रमणकारी यहाँ आ रहे थे। कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी। ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की।

आदिगुरू शंकराचार्य को लगने लगा था सामाजिक उथल-पुथल के उस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहाँ इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा। आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं। कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए।
 शं
कराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह बाह्य आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया। कई बार स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें ४० हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की।

Sunday, 2 February 2020

09:13

आसान नहीं एक औरत होना"के सी शर्मा



*"आसान नहीं एक औरत होना"के सी शर्मा*


मैं जब पैदा हुई तो मुझसे बाप रूठ गया , ख़ानदान रूठ गया , जैसे तैसे चलना सीखा , फिर बोलना सीखा , फिर जैसे तैसे बड़ी हुई , स्कूल जाना शुरू किया , मेरी शिक्षा पर भी उंगलियां उठनी शुरू हुईं , स्कूल के लिए साइकिल से जब निकलती थी तो रास्ते में मनचले बाइक से पीछा करना शुरू कर देते थे , जो जी में आए कहते थे , बेहद गंदे और अश्लील शब्दों का प्रयोग कर मेरे ना चाहते हुए भी मुझे पुकारते थे , जैसे मैं उनकी जागीर हूँ । क्लास में जाती तो टीचर की गन्दी निगाह मेरे तन के अंगों पर पड़ती , उसकी भी अश्लील और ओछी हरकतें सहनी पड़ती । फिर कॉलेज का दौर शुरू हुआ , बस में सफ़र करती तो , मनचले किसी न किसी बहाने से मेरे जिस्म के अंगों पर स्पर्श करते , ब्रेक लगती तो मेरे ऊपर आ जाते , मैं अकेली , सहमी हुई सी बेबस लड़की , कुछ न कर पाती थी । कॉलेज के अंदर का माहौल स्कूल से भी ज़्यादा गंदा और अश्लील था , फिर शाम को जब कोचिंग से निकलती , तो मेरे बाप की उम्र के लोग मुझे खा जाने वाली नज़र से देखते , मुझे उस समाज में डर लगने लगा था , जहाँ पर स्त्री को देवी कहा जाता है । दिल में एक ख़ौफ़ होता था कि न जाने मेरे साथ कब और क्या हो जाए , मैं सहमी हुई सी घबराई हुई सी चुपचाप निकल जाती थी । जब शादी का वक़्त आया तो माँ बाप ने भी बोझ समझ कर विदा कर दिया , कुछ वक़्त ससुराल में बिताने के बाद पति का प्यार ख़त्म हो गया , मैं उनके लिए केवल उनकी हवस को शांत करने का सामान बन चुकी थी , सास-ससुर का दुर्व्यवहार , जहेज़ के ताने सहती रही । जब बच्चे हुए तो सारी जवानी अपने पति के लिए और बच्चों के पालन पोषण में कुर्बान कर दिया । और  ज़िन्दगी का आख़री पड़ाव आया , जब आँखों में रौशनी ना रही , तो सोचा की अपने बच्चों के साए में जीवन काट लूंगी , लेकिन ऐसा न हुआ , बच्चों ने भी वृद्धाश्रम ( Old Home ) छोड़ दिया , अब जब अपने बच्चों की याद आती है तो कंपते हुए हाँथ आसमान की तरफ उठा कर बच्चों की ख़ुशी और सलामती के लिए दुआ कर , बिलख कर रो के अपना मन हल्का कर लेती हूँ । मैं एक बेटी थी , पत्नी थी , बहू थी , माँ भी थी , परंतु मुझे जीवन के किसी भी पड़ाव पर सम्मान न मिल सका । इस जीवन और इस समाज से बस इतना ही सीखा मैंने , इतना आसान नहीं है एक औरत होना ।

Saturday, 1 February 2020

12:46

जानिए,नारियल का धार्मिक, वैज्ञानिक रहस्य और लाभ -के सी शर्मा



*जानिए,नारियल का धार्मिक, वैज्ञानिक रहस्य और लाभ -के सी शर्मा*


भारतीय धर्म और संस्कृति में नारियल का बहुत महत्व है। नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है। मंदिर में नारियल फोड़ना या चढ़ाने का रिवाज है। दक्षिण भारत में नारियल के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं।

हिन्दू धर्म में वृक्षों के गुणों और धर्म की अच्छे से पहचान करके ही उसके महत्व को समझते हुए उसे धर्म से जोड़ा गया है। उनमें ही नारियल का पेड़ भी शामिल है।
नारियल ऊर्जा का एक बहुत अच्छा स्रोत है इसलिए आप खाने की जगह चाहें तो नारियल का इस्तेमाल कर सकते हैं। नारियल में प्रोटीन और मिनरल्स के अलावा सभी पौष्टिक तत्व अच्छी मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

नारियल को 'श्रीफल' भी कहा जाता है। ऐसा इसकी धार्मिक महत्ता के साथ-साथ औषधीय गुणों के कारण कहा जाता है। नारियल में विटामिन, पोटेशियम, फाइबर, कैल्शियम, मैग्नीशियम और खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। नारियल में वसा और कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है इसलिए नारियल मोटापे से भी निजात दिलाने में मदद करता है।

नारियल ऊर्जा का एक बहुत अच्छा स्रोत है इसलिए आप खाने की जगह चाहें तो नारियल का इस्तेमाल कर सकते हैं। नारियल में प्रोटीन और मिनरल्स के अलावा सभी पौष्टिक तत्व अच्छी मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

  *नारियल के लाभ*

नारियल कई बीमारियों के इलाज में काम आता है, जैसे हाथ-पैर सुन्न होते हैं तो नारियल का पानी पीना चाहिए। नकसीर हो तो भी इसका पानी लाभदायक होता है। याददाश्त बढ़ाने में भी नारियल की भूमिका होती है। बच्चों को नारियल की गिरी खिलाने उनका दिमाग तेज होता है। नारियल के तेल में नींबू का रस अथवा ग्लिसरीन मिलाकर चेहरे पर लेप करने से भी मुहांसे, दाग-धब्बे समाप्त होते हैं।

मोटापा कम करने में नारियल बहुत फायदेमंद है। मोटे लोगों को नारियल का सेवन करना चाहिए। अनिद्रा रोग में भी यह लाभदायक है। नियमित रूप से रात के खाने के बाद आधा गिलास नारियल का पानी पीना चाहिए। इससे नींद न आने की समस्या खत्म होती है और नींद अच्छी आती है।

नारियल तेल में बादाम को मिलाकर तथा बारीक पीसकर सिर पर लेप लगाना चाहिए। इससे सिरदर्द में तुरंत आराम होता है। बालों में रूसी की समस्या के लिए नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर बालों में लगाने से रूसी एवं खुश्की से छुटकारा मिलता है। पेट में कीड़े होने पर सुबह नाश्ते के समय एक चम्मच पिसा हुआ नारियल का सेवन करने से पेट के कीड़े बहुत जल्दी मर जाते हैं। इस तरह नारियल के अनेक लाभ हैं।

 नारियल में फाइबर अधिक होता है इसलिए कब्ज के रोगियों के लिए यह लाभदायक है।
 नारियल मांसपेशियों को बढ़ाने में भी सहायक होता है।
 नारियल का दूध गले की खराश को ठीक कर देता है।
 नारियल का दूध पेट के अल्सर को ठीक करने में सहायक होता है। नारियल का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है।
 नारियल का पानी उन लोगों के लिए बहुत लाभकारी होता है जिन्हें किडनी की बीमारी होती है।
 नारियल का पानी हमारे शरीर की त्वचा को भी लाभ पहुंचाता है।
 नारियल का पानी मूत्राशय से संबंधित बीमारियों में काफी राहत देता है।
जिन लोगों को शुगर होती है उनको भी नारियल का पानी काफी लाभ पहुंचाता है।
 नारियल में पाया जाने वाला आयोडीन थॉयराइड को बढ़ने से रोकता है।

Tuesday, 28 January 2020

17:56

आदर्श कार्य संस्कृति के लिए कर्मियों का आध्यात्मिक विकास जरूरी’ : श्री गौर गोपाल दास*

 ‘संतुलित एवं सुखद जीवन के लिए गतिशील और सामंजस्यपूर्ण कार्य संस्कृति का होना जरूरी हैl कर्मचारियों के भौतिक विकास के साथ साथ आध्यात्मिक विकास द्वारा ही आदर्श कार्य संस्कृति, हासिल की जा सकती है l’

ये उद्गार है, अंतराष्ट्रीय स्तर के विख्यात जीवन मार्गदर्शक और मोटिवेशनल स्पीकर श्री गौर गोपाल दास की, जिन्होंने रविवार को एनसीएल की निगाही परियोजना स्थित अधिकारी क्लब में अपने व्याख्यान में ये बातें कहीं l
इस अवसर पर नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (सीएमडी) श्री प्रभात  कुमार सिन्हा, बतौर मुख्य अतिथि और  निदेशक (तकनीकी/संचालन) श्री गुणाधर पाण्डेय,  निदेशक (वित्त) श्री एन॰ एन॰ ठाकुर, कृति महिला मंडल, एनसीएल की अध्यक्षा श्रीमती संगीता सिन्हा एवं उपाध्यक्षा श्रीमती प्रतिमा पाण्डेय व श्रीमती नीलू ठाकुर बतौर विशिष्ट अतिथि  उपस्थित थे। साथ ही अलग-अलग  परियोजनाओं/इकाइयों  के महाप्रबन्धक और मुख्यालय के विभागाध्यक्ष भी मौजूद थे l

अपने व्याख्यान  के दौरान  श्री गौर गोपाल दास ने दूसरों से तुलना करने से बचते हुए आत्म-निरीक्षण और स्व-विवेचना पर बल दिया l उन्होने खुशहाल जीवन जीने के गुण को विस्तार से समझाते हुए , तनाव और तनाव के प्रभाव पर प्रकाश डाला व इसके दुष्परिणामों को रेखांकित करते हुए इससे बचने के उपाय बताए l 

गौरतलब है कि श्री गौर गोपाल दास ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पुणे से पूरी करने के कुछ ही समय बाद अपना जीवन एक प्रेरक वक्ता के रूप में समर्पित कर दिया l  वर्तमान में  एक अंतर्राष्ट्रीय  जीवन मार्गदर्शक और प्रेरक गुरू के रूप में श्री दास , भारत सहित  दुनिया भर के प्रतिष्ठित कंपनियों ,कॉलेजों और संस्थानों में आदर्श जीवन  के गुण सीखा रहे हैं l
12:23

जानिये काल सर्प दोष के बारे में पन्डित विष्णु जोशी के



*जानिये काल सर्प दोष के बारे में पन्डित विष्णु जोशी के साथ7905156547*


*कालसर्प दोष कितने प्रकार का होता है?*

*ज्योतिष ग्रंथों में 12 प्रकार के कालसर्प योगों का वर्णन किया गया है*

*1- अनंत कालसर्प योग।*
*2- कुलिक कालसर्प योग।*
*3- वासुकि कालसर्प योग।*
 *4- शंखपाल कालसर्प योग।*
*5- पद्म कालसर्प योग।*
*6- महापद्म कालसर्प योग।*
*7- तक्षक कालसर्प योग।*
*8- कर्कोटक कालसर्प योग।*
*9- शंखनाद कालसर्प योग।*
*10-पातक कालसर्प योग।*
*11- विषाक्त कालसर्प योग।*
*12- शेषनाग*

 *कालसर्प योग।*

*अनंत काल सर्प योग*
*यदि जातक के जन्‍मांग के प्रथम भाव में राहु और सप्‍तम भाव में केतु हो तो अनंत काल सर्प योग होता हे। इसकी वजह से जातक के घर में कलह होती रहती है। परिवार वालों या मित्रों से धोखा मिलने की आशंका हमेशा बनी रहती है। मानसिक रूप से व्‍यक्ति परेशान रहता है, हालांकि ऐसे लोग सिर्फ अपने मन की ही करते हैं।*

*कुलिक काल सर्प योग*
*यदि जातक के जन्‍मांग के द्वितीय भाव में राहु और अष्‍टम भाव में केतु हो तो यह कुलिक काल सर्प योग होता है। इस वजह से जातक गुप्‍त रोग से जूझता रहता है। इनके शत्रु भी अधिक होते हैं परिवार में परेशानी रहती है और वाणी में कटुता रहती है।*

*वासुकि काल सर्प योग*
*यदि जातक के जन्‍मांग में राहु तृतीय और केतु भाग्‍य भाव यानि 9वें भाव में हो तो वासुकि काल सर्प योग होता है। ऐसे लोगों को भाईयों से कभी सहयोग नहीं मिलता। ऐसे लोगों का स्‍वभाव चिड़चिड़ा होता है। ये लोग कितना भी कष्‍ट क्‍यों न आ जाये, किसी से कहते नहीं।*

*शंखपाल काल सर्प योग*
*यदि जातक के जन्‍मांग में मातृ यानि चतुर्थ स्‍थान पर राहु और पितृ यानि 9वें भाव में केतु दोनों हों तो शंखपाल काल सर्प योग माना जाता है। ऐसे लोगों का माता-पिता से हमेशा झगड़ा होता रहता है और परिवार में कलह बनी रहती है। ऐसे लोगों को दोस्‍तों से भी नहीं बनती है।*

*पद्म काल सर्प योग*
*जिन लोगों की कुंडली में पांचवें सथान पर राहु और ग्‍यारहवें भाव में केतु हो तो उस स्थिति में पद्म काल सर्प योग होता है। ऐसे लोग बुद्धिमान होते हैं, जमकर मेहनत करते हैं, लोगों से उनका व्‍यवहार काफी अच्‍दा होता है और प्रतिष्ठित पदों तक पहुंचते हैं। लेकिन अनावश्‍यक चीजों को लेकर उनके मान-सम्‍मान को हानि पहुंचना आम बात होती है। एक के बाद एक परेशानियां बनी रहती हैं। इनका पहला पुत्र कष्‍टकारी होता है।*

*शेषनाग काल सर्प योग*
*यदि किसी की कुंडली के बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु के अंतर्गत सभी ग्रह विद्यमान हों तो शेषनाग काल सर्प योग होता है। ऐसे लोगों के खिलाफ लोग तंत्र-मंत्र का इस्‍तेमाल ज्‍यादा करते हैं। इन्‍हें मानसिक रोग लगने की आशंका ज्‍यादा रहती है। यदि राहु के साथ मंगल है तो इनके सारे शत्रु परस्‍त हो जाते हैं। यानी इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता है। विदेश यात्रा से लाभ मिलते हैं, लेकिन साझेदारी के व्‍यापार में हानि उठानी पड़ती है।*

*विषाक्‍त काल सर्प योग*
*यदि व्‍यक्ति की कुंडली के ग्‍यारहवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु सभी ग्रहों को समेटे हुए हो तो विषाक्‍त काल सर्प योग होता है। ऐसे लोग अच्‍छी विद्या हासिल करते हैं। इन्‍हें पुत्र की प्राप्ति होती है। ये उदारवादी होते हैं, लेकिन कभी-कभी पारिवारिक कलह का सामना करना पड़ता है। ये कभी भी किसी पर मेहरबान हो सकते हैं।*

*पातक काल सर्प योग*
*पातक काल सर्प योग तब बनता है, जब कुंडली के 10वें भाव में राहु और चतुर्थ भाव में केतु हो। ऐसे लोगों के वैवाहिक जीवन में तनाव बना रहता है। पै‍तृक संपत्ति जल्‍दी नहीं मिल पाती है। ऐसे लोग नौकरी या व्‍यापार के लिये हमेशा परेशान रहते हैं। कर्ज भी बहुत जल्‍दी चढ़ जाता है। हृदय और सांस के रोग की परेशानी बनी रहती है।*

*शंखनाद काल सर्प योग*
*यदि कुंडली में सातों ग्रहों को लेकर राहु भाग्‍य यानि 4 स्‍थान पर हो और केतु 10 भाव में हो तो यह शंखनाद काल सर्प योग होता है। इसके अंतर्गत भाग्‍य अच्‍छा होते हुए और कड़ी मेहनत के बावजूद मनमाफिक फल नहीं मिलते। ऐसे लोगों के शत्रु गुप्‍त होते हैं। इनमें सहने की शक्ति बहुत होती है और लोग इनका नाजायज फायदा उठाने की कोशिश में रहते हैं।*

*कार्कोटक काल सर्प योग*
*कार्कोटक काल सर्प योग उस स्थिति में बनता है जब कुंडली में 8वें भाव में राहु और द्वितीय भाव में केतु हो। ये दोनों मिलकर सभी ग्रहों को निगलने के प्रयास करते रहते हैं। ऐसे व्‍यक्ति हर छोटी-छोटी चीज के लिये छटपटाते रहते हैं। इन्‍हें खाली बैठना पसंद नहीं होता। जीवन पर्यंत पैसे की चिंता बनी रहती है। ये अपनी इंद्रियों पर काबू नहीं रख पाते हैं और बहुत जल्‍दी शराब आदि का नशा लग जाता है।*

*महापद्म काल सर्प योग*
*महापद्म काल सर्प योग उ‍स स्थिति में बनता है* *जब कुंडली के रोग और शत्रु यानि छठे भाव में राहु और 12वें भाव में केतु सहित सातों ग्रह हों। ऐसे लोग जीवन भर परेशान रहते हैं। मानसिक तनाव बना रहता है। इनके हर काम में कोई न कोई अढ़चन जरूर आती है।*

*तक्षक काल सर्प योग*
*यदि जन्‍मांग के 7वें भाव में राहु और लग्‍नस्‍थ यानि* *प्रथम भाव में केतु* *विद्यमान तक्षक काल सर्प योग बनता है। ऐसे जातक जीवन भर घर परिवार, मान सम्‍मान, धन आदि के लिये जीवन भर संघर्ष करते रहते हैं। ऐसे लोग जिन पर विश्‍वास करते हैं, उनसे धोखा निश्चित तौर पर उठाना पड़ता है। लेकिन यह अपनी परेशानी किसी से कह नहीं पाते हैं।*
12:17

क्या आप जानते हैं की कथा 7 दिन ही क्यों होती है


के सी शर्मा की प्रस्तुति
.(महात्म्य​) 2
हम सात दिन की कथा सुनके अपने जीवन के सभी सातो दिनों को पवित्र कर लेते हैं! पाप रहित बनें!  राजा परीक्षित को सात दिन का शाप मिला तो तुरंत अपने पुत्र जनमेजय को  सौंपकर चलपड़े! पर मन में एक प्रश्न है? जीवन में प्रश्नो का होना बहुत महत्वपूर्ण है, अबोध बालक जो कुछ नहीं जनता वह भी एक दिन में न जाने कितने सारे प्रश्न करता है! फिर हम भी तो परमात्मा के विषय में अबोध हैं, कुछ जानते नहीं, हमारे पण्डित जी ने जो कहा उसी के आधार पर हमारी पूजा बढ़ जाती है!

तो हमें अपनी पूजा नहीं बढा़नी हमें तो श्रद्धा बढा़नी है, जब तक जानकारी नहीं  होगी, तब तक श्रद्धा भी नहीं बढे़गी! इसलिए परमात्मा की प्रीति के लिए प्रश्न जरूरी है, परन्तु प्रश्न करने से पहले ध्यान दें की हम प्रश्न किससे कर रहे है! और प्रश्न कहां कर रहे हैं! दूसरी बात हम जिनसे प्रश्न करते हैं! उनके प्रती आदर भाव आवश्यक है! महाभारत में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया, तो प्रश्न के पहले अर्जुन ने अपने आपको शिष्य माना! इसलिए आप जब शिष्य भाव से प्रश्न करेंगे, तो आपको प्रश्नों के उत्तर अवश्य मिलेंगे! राजा परीक्षित के जीवन में भी प्रश्न आया, और प्रश्न था की अब तक तो मैं जिया, खूब ऐश्वर्य भी पाया, पर अब मेरी जिन्दगी सिर्फ सात दिन की है, और मुझे मरना भी होगा? पर मैं मरूं कैसे? और मरने बाले को करना क्या चाहिए? अपनी मृत्यु को सुधारने के लिए राजा, राज्य को त्याग​कर गंगा नदी के तट पर अनसन में बैठगया! और शुक देव जी ने उसे मरने की विधी बताई!

पहले वर्तमान सुधारो, राजा परीक्षित अपना भूत भूलगया और वर्तमान को सुधारने का प्रयास किया!  भविष्य की चिन्ता मत करो यदी वर्तमान अच्छा है, तो भविष्य भी उज्वल होगा, वर्तमान की चिन्ता करते जो बैठा रहता है, वह मूर्ख है! दूसरी बात की ठाकुर जी की बड़ी कृपा है की हम अन्धे नहीं हैं! हमारे पास एक नहीं पूरी दो आंखें हैं हम बहुत भाग्यशाली हैं, परन्तु आंख है पर द्रष्टी नहीं है! आंख तो भगवान ने दी, पर द्रष्टी हमें सत्संग से मिलती है! हम इन सात दिन के सत्संग से दृष्टी प्राप्त करें,
अरे दृष्टी होगी तभी तो दर्शन प्राप्त होगा!

देखने में और दर्शन में अन्तर है! हम देखते हैं जगत को और दर्शन जगदीश का करें, देखने के लिए आंख की आवश्यकता है पर दर्शन के लिए दृष्टी जरूरी है! यदी दृष्टी नहीं तो दर्शन नहीं! तो हम दृष्टी श्रीमद्भागवत कथा से प्राप्त करें!

Friday, 24 January 2020

07:56

मृत्यु तो सबकी अटल है -वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा का लेख



*जाने कैसे करे, तैयारी मरने की- के सी शर्मा*


मृत्यु तो सबकी अटल है। आज या कल। लोग कहते है जन्म और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है।
आप जहाँ जन्म लेना चाहते है.... जैसा जन्म लेना चाहते है बिल्कुल ले सकते है...!
 आप कब, कहा, कैसे मरना चाहते है वैसे ही मर भी सकते है...!
ये कोई भी आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन यह हमारे ही अपने कर्मों का खेल है।
 अगर हम आत्मा को इतना शक्तिशाली और पवित्र बना सके तो इस संसार में कोई भी चीज हमारे लिए असंभव नहीं।
और आत्मा को इतना शक्तिशाली एवं पवित्र बनाने के लिए सर्वशक्तिमान परमात्मा से योगयुक्त होना ही पड़ेगा। क्योंकि दुःखदायी... पीड़ादायी और रोग से जर्जर हो कर मरना तो कोई भी पसंद नहीं करेगा।

*कम सोचो*

आज की उस तमोप्रधान विकारी दुनिया में चारों और नकारात्मक और विकारी वातावरण है। इसका असर शिशु से लेकर मरणासन्न व्यक्ति तक है।

चिंताओं से भरी दुनिया में चैन तभी मिल सकेगा जब हम अपनी मानसिक ऊर्जा को, अपने मनोबल को अर्थात शुभ सोचने की शक्ति को बढ़ायेंगे।

तो चलो सच्चे आनंद का अनुभव करने के लिए आज से आनेवाले 15 दिनों तक यह अभ्यास करें...
प्रतिज्ञा करें...

चाहे जो भी हो जैसी भी परिस्थिति हो... मैं कम सोचूँगा....
अच्छा सोचूँगा और अपने मन को शांत रखूँगा।

ना किसी के प्रभाव में रहो न अभाव में रहो, बल्कि अपने स्वभाव में रहो।
याद रहे नाव पानी में रहे, पर पानी नाव में ना आ पाए ।
अपने जीवन को Antivirus से सुरक्षित कर लीजिए।
Antivirus क्या है ?? "" ध्यान, प्राणायाम, योग, साधना, सेवा, सत्संग "" - हमेशा इन चीजों को अपनाकर अपना जीवन अच्छा बनाइए और साथ ही दूसरों का भी।

याद रहे हम यहाँ बस देने के लिए आये हैं ।
 जब ये भाव मन में आ जायेगा, समझ लो तुम्हें सबकुछ मिल गया।

Thursday, 23 January 2020

19:15

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस अपने छात्र जीवन से ही स्वामी विवेकानंद से प्रभावित रहे-के सी शर्मा*



 सुभाष चंद्र बोस ने समय-समय पर विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं पर चलने का आग्रह किया था और धर्म और स्वदेश रक्षा का स्वामी जी का सूत्र अपनाया था ।

मैं उनकी (विवेकानंद जी) पुस्तकों को दिन-पर-दिन, सप्ताह-पर-सप्ताह और महीने-पर-महीने पढ़ता चला गया।
आत्मनो मोक्षार्थ जगद्धिताय च यानी अपनी मुक्ति और मानवता की सेवा के लिए।

वे अक्सर कहा करते थे कि उपनिषदों का मूलमंत्र है शक्ति। नचिकेता के समान हमें अपने आप में श्रद्धा रखनी होगी।
मैं उस समय मुश्किल से पंद्रह वर्ष का था, जब स्वामी विवेकानंद ने मेरे जीवन में प्रवेश किया।
स्वामी विवेकानंद अपने चित्रों और अपने उपदेशों के जरिये मुझे एक पूर्ण विकसित व्यक्तित्व लगे।
स्वामी विवेकानंद के द्वारा मैं क्रमश: उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस की ओर झुका। विवेकानंद के भाषणों और पत्रों आदि के संग्रह छप चुके थे और सभी के लिए सामान्य रूप से उपलब्ध थे। परंतु स्वामी रामकृष्ण बहुत कम पढ़े-लिखे थे और उनके कथन उस प्रकार उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने जो भी जीवन जिया, उसके स्पष्टीकरण का भार औरों पर छोड़ दिया। फिर भी उनके शिष्यों ने कुछ पुस्तकें और डायरियां प्रकाशित कीं, जो उनसे हुई बातचीत पर आधारित थीं और जिनमें उनके उपदेशों का सार दिया गया था। इन पुस्तकों में चरित्र निर्माण के संबंध में सामान्यत: और आध्यात्मिक उत्थान के बारे में विशेषत: व्यावहारिक दिशा-निर्देश दिए गए हैं। रामकृष्ण परमहंस बार-बार इस बात को दोहराते थे कि आत्मानुभूति के लिए त्याग अनिवार्य है और संपूर्ण अहंकार-शून्यता के बिना आध्यात्मिक विकास असंभव है।
शीघ्र ही मैंने अपने मित्रों की एक मंडली बना ली, जिनकी रुचि रामकृष्ण और विवेकानंद में थी। स्कूल में और स्कूल के बाहर जब कभी हमें मौका मिलता, हम इसी विषय पर चर्चा करते। क्रमश: हमने दूर-दूर तक भ्रमण करना आरंभ किया, ताकि हमें मिल-बैठकर और अधिक बातचीत करने का अवसर मिले।
कटक से सुभाष बाबू ने अपनी पत्नी श्रीमती प्रभावती देवी को 8-9 पत्र लिखे थे। इन्हीं दिनों वे पत्र पढ़ने का अवसर मिला। एक पत्र में वे लिखते हैं- ‘संसार के तुच्छ पदार्थों के लिए हम कितना रोते हैं, किंतु ईश्वर के लिए हम अश्रुपात नहीं करते। हम तो पशुओं से भी अधिक कृतघ्न और पाषाण-हृदय हैं।’
8 जनवरी, 1913 को अपने मझले भाई के नाम पत्र में उन्होंने लिखा था-‘‘भारतवर्ष की कैसी दशा थी और अब कैसी हो गई है? कितना शोचनीय परिवर्तन है। कहां हैं वे परम ज्ञानी, महर्षि, दार्शनिक? कहां हैं हमारे वे पूर्वज, जिन्होंने ज्ञान की सीमा का स्पर्श कर लिया था? सब कुछ समाप्त हो गया। अब वेदमंत्रों का उच्चारण नहीं होता। पावन गंगातट पर अब मंत्र नहीं गूंजते, परंतु हमें अब भी आशा है कि हमारे हृदय से अंधकार को दूर करने और अनंत ज्योतिशिखा प्रज्जवलित करने के लिए आशादूत अवतरित हो गए हैं। वे हैं- विवेकानंद। वे दिव्य कांति और मर्मवेधी दृष्टि से युक्त हो संन्यासी के वेश में विश्व में हिन्दू धर्म का प्रचार करने के लिए ही आए हैं। अब भारत का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है।’
परंतु धर्म और सेवा में अपनी इस रुचि के बावजूद सुभाष बाबू ने अपने अध्ययन में उपेक्षा नहीं दिखाई थी। 1913 में  मैट्रिकुलेशन का परीक्षाफल निकलने पर पता चला कि कोलकाता विश्वविद्यालय के अंतर्गत बैठने वाले दस हजार विद्यार्थियों में कटक के सुभाषचंद्र बोस ने दूसरा स्थान प्राप्त किया था।
अब उच्चतर शिक्षा के लिए सुभाष को कटक से कोलकाता भेजा गया। साढ़े सोलह साल के इस तरुण ने वहां आते ही अपना भावी कार्यक्रम तय कर लिया- ‘‘मैं दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन करूंगा, जिससे मैं जीवन की मूलभूत समस्या का समाधान प्राप्त कर सकूं, व्यावहारिक जीवन में जहां तक संभव हो, रामकृष्ण और विवेकानंद के पदचिन्हों पर चलूंगा। और चाहे कुछ भी हो, मैं सांसारिकता की ओर नहीं जाऊंगा।’’ वे आगे लिखते हैं-‘‘यह दृष्टिकोण लेकर मैंने अपने जीवन के अध्याय का श्रीगणेश किया।’’
‘समाज-सेवा से उनका तात्पर्य अस्पताल या दातव्य चिकित्सालय स्थापित करना नहीं था, जैसा कि स्वामी विवेकानंद के शिष्य किया करते थे, बल्कि मुख्यत: शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय पुनर्निर्माण था। अत: हमें नव-विवेकानंद टोली कहा जा सकता था। और हमारा मुख्य उद्देश्य था धर्म और राष्ट्रीयता का न केवल सैद्धांतिक रूप में बल्कि वास्तविक जीवन में भी समन्वय।’
‘जिसे कृपा मिलती है, उसका जीवन ही बदल जाता है। मुझे भी कृपा का आभास मिला है, इसीलिए तो देश के कार्य हेतु जीवन देकर इसे सार्थक कर देना चाहता हूं। तुम्हें यह भी बता दूं कि इन्हीं राखाल महाराज (स्वामी ब्रह्मानंद) ने मुझे काशी में यह कहकर वापस लौटा दिया था कि तुझे देश का काम करना है।’
क्रांतिकारी नरेन्द्र नारायण चक्रवर्ती ने अपने जीवन का बारह वर्ष से अधिक का काल जेलों में बिताया था। स्वामी ब्रह्मानंद से उन्हें भावी जीवन के बारे में पथ प्रदर्शक मिला था। सुभाष जब सद्गुरु की तलाश में उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करते हुए काशीधाम आये थे तभी उनकी भेंट स्वामी विवेकानंद से हुई थी और उन्होंने कहा कि गुरु वह है जो तुम्हारे भूत और भविष्य को जान ले। 3 अक्तूबर, 1914 दक्षिणेश्वर के काली मंदिर का एक चित्र स्मरण हो आता है। कमलासन पर विराजने वाली मां काली खड्ग हाथ में लिए शिव के आसन पर खड़ी उनके आगे एक बालक है।
20 सितम्बर 1915 को वे लिखते हैं- ‘‘शारीरिक स्थिति को देखकर तो विश्वास नहीं होता कि जीवन में मैं कुछ भी कर सकूंगा। विवेकानंद की सभी बातें सत्य हैं। लोहे के समान सुदृढ़ नाड़ियां और श्रेष्ठ प्रतिभाशाली मस्तिष्क यदि तुम्हारे पास है तो संपूर्ण विश्व तुम्हारे कदमों में झुकेगा।’’
एक ओर ब्रह्मानंद की बात स्मरण हो जाती है तो दूसरी ओर है पाश्चात्य आदर्श, जो कर्मठता को ही जीवन मानता है। एक ओर मौन और शांतिपूर्ण जीवन जीने वाला एक आत्मदर्शी योगी है, जिसने जगत की साधारणता का अनुभव कर लिया और दूसरी ओर पश्चिम वालों की विशाल प्रयोगशालाएं, उनका विज्ञान दर्शन, उनके द्वारा आविष्कृत और प्रकट की गयी अद्भुत ज्ञान राशि।
18 जून 1928 को कोलकाता के अल्बर्ट हॉल में अखिल भारतीय बंग समिति द्वारा आयोजित सभा में सुभाष बाबू ने कहा-
‘‘एक के साथ बहुत्व का समन्वय यह बंगाल का वैशिष्ट्य है। वास्तविक सत्य को अस्वीकार करने से काम नहीं चलेगा। परमहंस रामकृष्ण व स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मनुष्य असत्य से सत्य की ओर अग्रसर नहीं होता, वह उच्च सत्य से उच्चतर सत्य की ओर पहुंचता है। सत्य के किसी भी अवसर को वह अस्वीकार नहीं करता। जैसे एक सत्य है वैसे बहुत्व भी सत्य है। एकत्व के साथ बहुत्व का मिलाप यही साधक की साधना है।’’
फरवरी 1929 में पावना युवा सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘बहुतों की धारणा है कि जन साधारण या तरुण समाज को जगाने के लिए राष्ट्र या समाज संबंधी मतवादों का प्रचार अनिवार्य है।’’
प्रत्येक मतवाद के कट्टर भक्तों का मत है कि उनके मतवाद की स्थापना हो जाने पर जगत के सारे दुख-दर्द दूर हो जाएंगे। पर मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी मतवाद हमारा तब तक उद्धार नहीं कर सकता जब तक कि हम स्वयं ही मनुष्योचित चरित्र बल प्राप्त न कर लें। इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा-मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। उन्होंने अपनी कविता की चार पंक्तियां उद्धृत की थीं, जिनका भावार्थ है-
‘अपार संग्राम ही मां काली की पूजा है। सदा पराजय मिले तो भी भयभीत न होना, भले हृदय श्मशान बन जाये और उस पर श्यामा नृत्य करती हो।’
21 जुलाई, 1929 को हुबली में छात्र सम्मेलन के भाषण के दौरान मानो संस्मरणात्मक मनोभाव से कहा-पंद्रह वर्ष पूर्व जो आदर्श बंगाल वस्तुत: पूरे देश छात्रों में अनुप्रमाणित किया करता था, वह विवेकानंद का आदर्श था। आध्यात्मिक शक्ति के बल पर शुद्ध-प्रबुद्ध जीवन के प्रति वे कटिबद्ध थे। इसलिए स्वामी विवेकानंद ने कहा-मनुष्य निर्माण करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। पर व्यक्तित्व विकास पर जोर देते हुए स्वामी जी राष्ट्र को बिल्कुल नहीं भूले थे। कार्य रहित संन्यास या पुरुषार्थहीन भाग्यवाद पर उनकी आस्था नहीं थी।
राजा राममोहन राय के युग में विभिन्न आंदोलनों के जरिए भारत की मुक्ति कामना धीरे-धीरे प्रकट हुई। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतर्गत स्वाधीनता के अखंड रूप का आभास रामकृष्ण-विवेकानंद के भीतर झलकता था-‘स्वतंत्रता मिट्टी का गीत है।’ यह संदेश जब स्वामी जी के हृदय से निकला तब उन्होंने समग्र देशवासियों को मुग्ध और उन्मत्त कर दिया।
10 जनवरी, 1931 को बेलूर मठ के प्रांगण में गंगा तट पर शाम को आम सभा में मठ से आमंत्रण पाकर कोलकता के महापौर के रूप में सुभाष बाबू ने कहा- विवेकानंद जी की बहुमुखी प्रतिभा की व्याख्या करना कठिन है। मेरे समय का छात्र समुदाय स्वामी जी की रचनाओं और व्याख्यानों से जैसा प्रभावित होता था वैसा किसी और से प्रभावित नहीं होता था। वे मानो उन छात्रों की आशाओं-आकांक्षाओं को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त करते थे। 13 जनवरी, 1933 को भारत से निर्वासन के बाद विश्व भ्रमण करते हुए उन्होंने अपना सुप्रसिद्ध ग्रंथ  ‘इंडिया स्ट्रगल’ लिखा, जिसमें वे लिखते हैं, ‘पिछली शताब्दी के आठवें दशक में दो धार्मिक महापुरुषों का उदय हुआ, जिनका देश के नवनिर्माण की धारा पर विशेष प्रभाव पड़ा।
वे थे स्वामी रामकृष्ण व उनके शिष्य विवेकानंद, जो एक सनातनी हिन्दू की तरह पले-बढ़े थे और अपने गुरु से मिलने से पहले नास्तिक थे। अपने स्वर्गवास से पहले गुरु ने अपने शिष्य को भारत और विश्व में हिन्दू धर्म का प्रचार करने का गुरुभार सौंप   दिया था।’
तद्नुसार स्वामी जी ने रामकृष्ण मठ की स्थापना की। इसके साथ ही हिन्दू जीवन दर्शन का देश और विदेश में, खासकर अमेरिका में विशुद्ध प्रचार करते रहे। उनके लिए धर्म राष्ट्रवाद का प्रेरक था।
विश्वयुद्ध के बाद जब सुभाष बाबू 26 फरवरी, 1941 की रात जेल से फरार हो गये तो गुप्त रूप से अफगानिस्तान, जर्मनी होते हुए अंत में जापान पहुंचे। 15 फरवरी, 1942 को उन्होंने सिंगापुर में विश्व सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
दिसंबर 1941 में रासबिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी। कैप्टन मोहन सिंह को उसका प्रधान बनाया था। 4 जुलाई 1942 को रासबिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की बागडोर नेता जी सुभाष बोस को सौंप दी थी।
नेता जी के सिंगापुर प्रवास के दौरान के कुछ संस्मरण सिंगापुर रामकृष्ण मठ के प्रमुख स्वामी भास्वरानंद जी ने लिपिबद्ध किये हैं। स्वामी जी ने लिखा है, उन्होंने समुद्र तट पर एक प्रसादनुमा भवन को अपना आवास बनाया। 1943 की विजयादशमी की रात उन्होंने सिंगापुर आश्रम की गतिविधियां जानने की कोशिश की। मां शारदा के जन्मदिवस पर मंदिर में आप ध्यानमग्न होकर बैठे रहे, दुर्गासप्तशती की एक प्रति की इच्छा व्यक्त की। मेरी अपनी चंडी पाठ की पुस्तक उन्हें उपहार में दिये जाने पर उन्होंने अतीव आनंद व्यक्त किया।
24 अप्रैल, 1945 को रंगून छोड़कर बैकाक के लिए रवाना होने की पूर्व संध्या पर अर्थात् 23 अप्रैल की रात को रामकृष्ण मठ में दर्शन के लिए गए थे। स्वामी जी ने उन्हें कहा था कि भारत की आजादी की लड़ाई जारी रखें। नेताजी ने स्वामी जी के आदेश को शिरोधार्य कर अन्य सभी देवी-देवताओं की अपेक्षा पूर्णयोग से भारत माता की ही उपासना की। बंगला के सुप्रसिद्ध लेखक श्री मोहित लाल मजूमदार ने उन्हें स्वामीजी का मानस पुत्र माना है।
13:43

जाने पूजा जप तप कितने प्रकार की होती है



*जप के प्रकार और कौन से जप से क्या होता है..???*
*-के सी शर्मा*



जप के अनेक प्रकार हैं।
उन सबको समझ लें तो एक जपयोग में ही सब साधन आ जाते हैं।
परमार्थ साधन के कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग ये चार बड़े विभाग हैं।
जपयोग में इन चारों का अंतर्भाव हो जाता है।

*जप के कुछ मुख्य प्रकार ये हैं:-*


1. नित्य जप,
2. नैमित्तिक जप,
3. काम्य जप,
4. निषिद्ध जप,
5. प्रायश्चित जप,
6. अचल जप,
7. चल जप,
8. वाचिक जप,
9. उपांशु जप,
10. भ्रमर जप,
11. मानस जप,
12. अखंड जप,
13. अजपा जप और
14. प्रदक्षिणा जप इत्यादि।

*1. नित्य जप*

प्रात:-सायं गुरु मंत्र का जो नित्य-नियमित जप किया जाता है, वह नित्य जप है। यह जप जपयोगी को नित्य ही करना चाहिए। आपातकाल में, यात्रा में अथवा बीमारी की अवस्‍था में, जब स्नान भी नहीं कर सकते, तब भी हाथ, पैर और मुंह धोकर कम से कम कुछ जप तो अवश्य कर ही लेना चाहिए, जैसे झाड़ना, बुहारना, बर्तन मलना और कपड़े धोना रोज का ही काम है, वैसे ही नित्य कर्म भी नित्य ही होना चाहिए। उससे नित्य दोष दूर होते हैं, जप का अभ्यास बढ़ता है, आनंद बढ़ता जाता है और चित्त शुद्ध होता जाता है और धर्म विचार स्फुरने लगते हैं। और जप संख्या ज्यों-ज्यों बढ़ती है, त्यों-त्यों ईश्वरी कृपा अनुभूत होने लगती और अपनी निष्ठा दृढ़ होती जाती है।

*2. नैमित्तिक जप*
किसी निमित्त से जो जप होता है, वह नैमित्तिक जप है। देव-पितरों के संबंध में कोई हो, तब यह जप किया जाता है। सप्ताह में अपने इष्ट का एक न एक बार होता ही है। उस दिन तथा एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि पर्व दिनों में और महाएकादशी, महाशिवरात्रि, श्री रामनवमी, श्री कृष्णाष्टमी, श्री दुर्गानवरात्र, श्री गणेश चतुर्थी, श्री रथ सप्तमी आदि शुभ दिनों में तथा ग्रहणादि पर्वों पर एकांत स्थान में बैठकर अधिक अतिरिक्त जप करना चाहिए। इससे पुण्य-संग्रह बढ़ता है और पाप का नाश होकर सत्यगुण की वृद्धि होती है और ज्ञान सुलभ होता है। यह जप रात में एकांत में करने से दृष्टांत भी होते हैं। 'न देवतोषणं व्यर्थम'- देव को प्रसन्न करना कभी व्यर्थ नहीं होता, यही मंत्रशास्त्र का कहना है।

इष्टकाल में इसकी सफलता आप ही होती है। पितरों के लिए किया हुआ जप उनके सुख और सद्गति का कारण होता है और उनसे आशीर्वाद मिलते हैं। हमारा उनकी कोख से जन्म लेना भी इस प्रकार चरितार्थ हो जाता है। जिसको उद्देश्य करके संकल्पपूर्वक जो जप किया जाता है, वह उसी को प्राप्त होता है, यह मंत्रशास्त्र का सिद्धांत है। इस प्रकार पुण्य जोड़कर वह पितरों को पहुंचाया जा सकता है। इससे उनके ऋण से मुक्ति मिल सकती है। इसलिए कव्य कर्म के प्रसंग में और पितृपक्ष में भी यह जप अवश्य करना चाहिए। गुरु मंत्र से हव्यकर्म भी होता है।

*3. काम्य जप*

किसी कामना की सिद्धि के लिए जो जप किया जाता है, उसे काम्य जप कहते हैं। यह काम्य कर्म जैसा है, मोक्ष चाहने वाले के काम का नहीं है। आर्त, अर्थार्थी, कामकामी लोगों के लिए उपयोगी है। इसके साधन में पवित्रता, नियमों का पूर्ण पालन, सावधानता, जागरूकता, धैर्य, निरलसता, मनोनिग्रह, इन्द्रिय निग्रह, वाक् संयम, मिताहार, मितशयन, ब्रह्मचर्य इन सबका होना अत्यंत ही आवश्यक है। योग्य गुरु से योग्य समय में लिया हुआ योग्य मंत्र हो, विधिपूर्वक जप हो, मन की एकाग्रता हो, दक्षिणा दे, भोजन कराएं, हवन करें, इस सांगता के साथ अनुष्ठान हो तो साधक की कामना अवश्य पूर्ण होती है।

इसमें कोई गड़बड़ हो तो मंत्र सिद्ध नहीं हो सकता। काम्य जप करने के अनेक मंत्र हैं। जप से पुण्य संग्रह तो होता है, पर भोग से उसका क्षय भी होता है। इसलिए प्राज्ञ पुरुष इसे अच्‍छा नहीं समझते। परंतु सभी साधक समान नहीं होते। कुछ ऐसे भी कनिष्ठ साधक होते ही हैं, जो शुद्ध मोक्ष के अतिरिक्त अन्य धर्माविरुद्ध कामनाएं भी पूरी करना चाहते हैं। क्षुद्र देवताओं और क्षुद्र साधनों के पीछे पड़कर अपनी भयंकर हानि कर लेने की अपेक्षा वे अपने इष्ट मंत्र का काम्य जप करके चित्त को शांत करें और परमार्थ प्रवण हों, यह अधिक अच्छा है।

*4. निषिद्ध जप*

मनमाने ढंग से अविधिपूर्वक अनियम जप जपने को निषिद्ध जप कहते हैं। निषिद्ध कर्म की तरह यह बहुत बुरा है। मंत्र का शुद्ध न होना, अपवित्र मनुष्य से मंत्र लेना, देवता कोई और मंत्र कोई और ही, अनेक मंत्रों को एकसाथ अविधिपूर्वक जपना, मंत्र का अर्थ और विधि न जानना, श्रद्धा का न होना, देवताराधन के बिना ही जप करना, किसी प्रकार का भी संयम न रखना- ये सब निषिद्ध जप के लक्षण हैं। ऐसा निषिद्ध जप कोई न करे, उससे लाभ होने के बदले प्राय: हानि ही हुआ करती है।

*5. प्रायश्चित जप*

अपने हाथ से अनजान से कोई दोष या प्रमाद हो जाए तो उस दुरित-नाश के लिए जो जप किया जाता है, वह प्रायश्चित जप है। प्रायश्चित कर्म के सदृश है और आवश्यक है। मनुष्य के मन की सहज गति अधोगति की ओर है और इससे उसके हाथों अनेक प्रमाद हो सकते हैं। यदि इन दोषों का परिमार्जन न हो तो अशुभ कर्मों का संचित निर्माण होकर मनुष्य को अनेक दु:ख भोगने पड़ते हैं और उर्वरित संचित प्रारब्ध बनकर भावी दु:खों की सृष्टि करता है। पापों के नाश के लिए शास्त्र में जो उपाय बताए गए हैं, उनको करना इस समय इतना कठिन हो गया है कि प्राय: असंभव ही कह सकते हैं। इसलिए ऐसे जो कोई हों, वे यदि संकल्पपूर्वक यह जप करें तो विमलात्मा बन सकते हैं।

मनुष्य से नित्य ही अनेक प्रकार के दोष हो जाते हैं। यह मानव स्वभाव है। इसलिए नित्य ही उन दोषों को नष्ट करना मनुष्य का कर्तव्य ही है। नित्य जप के साथ यह जप भी हुआ करे। अल्पदोष के लिए अल्प और अधिक दोष के लिए अधिक जप करना चाहिए। नित्य का नियम करके चलाना कठिन मालूम हो तो सप्ताह में एक ही दिन सही, यह काम करना चाहिए। प्रात:काल में पहले गो‍मूत्र प्राशन करें, तब गंगाजी में या जो तीर्थ प्राप्त हो उसमें स्नान करें। यह भी न हो तो 'गंगा गंगेति' मंत्र कहते हुए स्नान करें और भस्म-चंदनादि लगाकर देव, गुरु, द्विज आदि के दर्शन करें। अश्वत्थ, गौ आदि की परिक्रमा करें। केवल तुलसी दल-तीर्थ पान करके उपवास करें और मन को एकाग्र करके संकल्पपूर्वक अपने मंत्र का जप करें। इससे पवित्रता बढ़ेगी और मन आनंद से झूमने लगेगा। जब ऐसा हो, तब समझें कि अब सब पाप भस्म हो गए। दोष के हिसाब से जप संख्या निश्चित करें और वह संख्‍या पूरी करें।

*6. अचल जप*

यह जप करने के लिए आसन, गोमुखी आदि साहित्य और व्यावहारिक और मानसिक स्वास्थ्य होना चाहिए। इस जप से अपने अंदर जो गुप्त शक्तियां हैं, वे जागकर विकसित होती हैं और परोपकार में उनका उपयोग करते बनता है। इसमें इच्छाशक्ति के साथ-साथ पुण्य संग्रह बढ़ता जाता है। इस जप के लिए व्याघ्राम्बर अथवा मृगाजिन, माला और गोमुखी होनी चाहिए। स्नानादि करके आसन पर बैठे, देश-काल का स्मरण करके दिग्बंध करें और तब जप आरंभ करें।

अमुक मंत्र का अमुक संख्या जप होना चाहिए और नित्य इतना होना चाहिए, इस प्रकार का नियम इस विषय में रहता है, सो समझ लेना चाहिए और नित्य उतना जप एकाग्रतापूर्वक करना चाहिए। जप निश्चित संख्‍या से कभी कम न हो। जप करते हुए बीच में ही आसन पर से उठना या किसी से बात करना ठीक नहीं, उतने समय तक चित्त की और शरीर की स्थिरता और मौन साधे रहना चाहिए। इस प्रकार नित्य करके जप की पूर्ण संख्या पूरी करनी चाहिए। यह चर्या बीच में कहीं खंडित न हो इसके लिए स्वास्थ्य होना चाहिए इसलिए आहार-विहार संयमित हों। एक स्‍थान पर बैठ निश्चित समय में निश्चित जप संख्‍या एकाग्र होकर पूरी करके देवता को वश करना ही इस जप का मुख्य लक्षण है। इस काम में विघ्न तो होते ही हैं, पर धैर्य से उन्हें पार कर जाना चाहिए। इस जप से अपार आध्यात्मिक शक्ति संचित होती है। भस्म, जल अभिमंत्रित कर देने से वह उपकारी होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है।

*7. चल जप*

यह जप नाम स्मरण जैसा है। प्रसिद्ध वामन प‍ंडित के कथनानुसार 'आते-जाते, उठते-बैठते, करते-धरते, देते-लेते, मुख से अन्न खाते, सोते-जागते, रतिसुख भोगते, सदा सर्वदा लोकलाज छोड़कर भगच्चिंतन करने' की जो विधि है, वही इस जप की है। अंतर यही कि भगवन्नाम के स्थान में अपने मंत्र का जप करना है। यह जप कोई भी कर सकता है। इसमें कोई बंधन, नियम या प्रतिबंध नहीं है। अन्य जप करने वाले भी इसे कर सकते हैं। इससे वाचा शुद्ध होती है और वाक्-शक्ति प्राप्त होती है। पर इस जप को करने वाला कभी मिथ्या भाषण न करे; निंदा, कठोर भाषण, जली-कटी सुनाना, अधिक बोलना, इन दोषों से बराबर बचता रहे। इससे बड़ी शक्ति संचित होती है। इस जप से समय सार्थक होता है, मन प्रसन्न रहता है, संकट, कष्ट, दु:ख, आघात, उत्पात, अपघात आदि का मन पर कोई असर नहीं होता।

जप करने वाला सदा सुरक्षित रहता है। सुखपूर्वक संसार-यात्रा पूरी करके अनायास परमार्थ को प्राप्त होता है। उसकी उत्तम गति होती है, उसके सब कर्म यज्ञमय होते हैं और इस कारण वह कर्मबंध से छूट जाता है। मन निर्विषय हो जाता है। ईश-सान्निध्य बढ़ता है और साधक निर्भय होता है। उसका योग-क्षेम भगवान वहन करते हैं। वह मन से ईश्वर के समीप और तन से संसार में रहता है। इस जप के लिए यों तो माला की कोई आवश्यकता नहीं है, पर कुछ लोग छोटी-सी 'सुमरिनी' रखते हैं इसलिए कि कहीं विस्मरण होने का-सा मौका आ जाए तो वहां यह सु‍मरिनी विस्मरण न होने देगी। सुमरिनी छोटी होनी चाहिए, वस्त्र में छिपी रहनी चाहिए, किसी को दिखाई न दे। सुमिरन करते हुए होंठ भी न हिेलें। सब काम चुपचाप होना चाहिए, किसी को कुछ मालूम न हो।

*8. वा‍चिक जप*

जिस जप का इतने जोर से उच्चारण होता है कि दूसरे भी सुन सकें, उसे वाचिक जप कहते हैं। बहुतों के विचार में यह जप निम्न कोटि का है और इससे कुछ लाभ नहीं है। परंतु विचार और अनुभव से यह कहा जा सकता है कि यह जप भी अच्‍छा है। विधि यज्ञ की अपेक्षा वाचिक जप दस गुना श्रेष्ठ है, यह स्वयं मनु महाराज ने ही कहा है। जपयोगी के लिए पहले यह जप सुगम होता है। आगे के जप क्रमसाध्य और अभ्याससाध्य हैं। इस जप से कुछ यौगिक लाभ होते हैं।

सूक्ष्म शरीर में जो षट्चक्र हैं उनमें कुछ वर्णबीज होते हैं। महत्वपूर्ण मंत्रों में उनका विनियोग रहता है। इस विषय को विद्वान और अनुभवी जपयोगियों से जानकर भावनापूर्वक जप करने से वर्णबीज शक्तियां जाग उठती हैं। इस जप से वाक्-सिद्धि तो होती ही है, उसके शब्दों का बड़ा महत्व होता है। वे शब्द कभी व्यर्थ नहीं होते। अन्य लोग उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जितना जप हुआ रहता है, उसी हिसाब से यह अनुभव भी प्राप्त होता है। एक वाक्-शक्ति भी सिद्ध हो जाए तो उससे संसार के बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। कारण, संसार के बहुत से काम वाणी से ही होते हैं। वाक्-शक्ति संसार की समूची शक्ति का तीसरा हिस्सा है। यह जप प्रपंच और परमार्थ दोनों के लिए उपयोगी है।

*9. उपांशु जप*

वाचिक जप के बाद का यह जप है। इस जप में होंठ हिलते हैं और मुंह में ही उच्चारण होता है, स्वयं ही सुन सकते हैं, बाहर और किसी को सुनाई नहीं देता। विधियज्ञ की अपेक्षा मनु महाराज कहते हैं कि यह जप सौ गुना श्रेष्ठ है। इससे मन को मूर्च्छना होने लगती है, एकाग्रता आरंभ होती है, वृत्तियां अंतर्मुख होने लगती हैं और वाचिक जप के जो-जो लाभ होते हैं, वे सब इसमें होते हैं। इससे अपने अंग-प्रत्यंग में उष्णता बढ़ती हुई प्रतीत होती है। यही तप का तेज है। इस जप में दृष्टि अर्धोन्मीलित रहती है। एक नशा-सा आता है और मनोवृत्तियां कुंठित-सी होती हैं, यही मूर्च्छना है। इसके द्वारा साधक क्रमश: स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है। वाणी के सहज गुण प्रकट होते हैं। मंत्र का प्रत्येक उच्चार मस्तक पर कुछ असर करता-सा मालूम होता है- भालप्रदेश और ललाट में वेदनाएं अनुभूत होती हैं। अभ्यास से पीछे स्थिरता आ जाती है।

*10. भ्रमर जप*

भ्रमर के गुंजार की तरह गुनगुनाते हुए जो जप होता है, वह भ्रमर जप कहाता है। किसी को यह जप करते, देखते-सुनने से इसका अभ्यास जल्दी हो जाता है। इसमें होंठ नहीं हिलते, जीभ हिलाने का भी कोई विशेष कारण नहीं। आंखें झपी रखनी पड़ती हैं। भ्रूमध्य की ओर यह गुंजार होता हुआ अनुभूत होता है। यह जप बड़े ही महत्व का है। इसमें प्राण सूक्ष्म होता जाता है और स्वाभाविक कुम्भक होने लगता है। प्राणगति धीर-धीमी होती है, पूरक जल्दी होता है और रेचक धीरे-धीरे होने लगता है। पूरक करने पर गुंजार व आरंभ होता है और अभ्यास से एक ही पूरक में अनेक बार मंत्रावृत्ति हो जाती है।

इसमें मंत्रोच्चार नहीं करना पड़ता। वंशी के बजने के समान प्राणवायु की सहायता से ध्यानपूर्वक मंत्रावृत्ति करनी होती है। इस जप को करते हुए प्राणवायु से ह्रस्व-दीर्घ कंपन हुआ करते हैं और आधार चक्र से लेकर आज्ञा चक्र तक उनका कार्य अल्पाधिक रूप से क्रमश: होने लगता है। ये सब चक्र इससे जाग उठते हैं। शरीर पुलकित होता है। नाभि, हृदय, कंठ, तालु और भ्रूमध्य में उत्तरोत्तर अधिकाधिक कार्य होने लगता है। सबसे अधिक परिणाम भ्रूमध्यभाग में होता है। वहां के चक्र के भेदन में इससे बड़ी सहायता मिलती है। मस्तिष्क में भारीपन नहीं रहता। उसकी सब शक्तियां जाग उठती हैं। स्मरण शक्ति बढ़ती है। प्राक्तन स्मृति जागती है। मस्तक, भालप्रदेश और ललाट में उष्णता बहुत बढ़ती है। तेजस परमाणु अधिक तेजस्वी होते हैं और साधक को आंतरिक प्रकाश मिलता है। बुद्धि का बल बढ़ता है। मनोवृत्तियां मूर्च्छित हो जाती हैं। नागस्वर बजाने से सांप की जो हालत होती है, वही इस गुंजार से मनोवृत्तियों की होती है। उस नाद में मन स्वभाव से ही लीन हो जाता है और तब नादानुसंधान का जो बड़ा काम है, वह सुलभ हो जाता है।

'योगतारावली' में भगवान श्री शंकराचार्य कहते हैं कि भगवान श्री शंकर ने मनोलय के सवा लाख उपाय बताए। उनमें नादानुसंधान को सबसे श्रेष्ठ बताया। उस अनाहत संगीत को श्रवण करने का प्रयत्न करने से पूर्व भ्रमर-जप सध जाए तो आगे का मार्ग बहुत ही सुगम हो जाता है। चित्त को तुरंत एकाग्र करने का इससे श्रेष्ठ उपाय और कोई नहीं है। इस जप से साधक को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है और उसके द्वारा वह स्वप‍रहित साधन कर सकता है। यह जप प्रपंच और परमार्थ दोनों में काम देता है। शांत समय में यह जप करना चाहिए। इस जप से यौगिक तन्द्रा बढ़ती जाती है और फिर उससे योगनिद्रा आती है। इस जप के सिद्ध होने से आंतरिक तेज बहुत बढ़ जाता है और दिव्य दर्शन होने लगते हैं, दिव्य जगत प्रत्यक्ष होने लगता है, इष्टदर्शन होते हैं, दृष्टांत होते हैं और तप का तेज प्राप्त होता है। कवि कुलतिलक कालिदास ने जो कहा है-

शमप्रधानेषु तपोधनेषु
गूढं हि दहात्मकमस्ति तेज:।

बहुत ही ठीक है- 'शमप्रधान त‍पस्वियों में (शत्रुओं को) जलाने वाला तेज छिपा हुआ रहता है।'

*11. मानस जप*

यह तो जप का प्राण ही है। इससे साधक का मन आनंदमय हो जाता है। इसमें मंत्र का उच्चार नहीं करना होता है। मन से ही मंत्रावृत्ति करनी होती है। नेत्र बंद रहते हैं। मंत्रार्थ का चिंतन ही इसमें मुख्‍य है। श्री मनु महाराज ने कहा है कि विधियज्ञ की अपेक्षा यह जप हजार गुना श्रेष्ठ है। भिन्न मंत्रों के भिन्न-भिन्न अक्षरार्थ और कूटार्थ होते हैं। उन्हें जानने से इष्टदेव के स्वरूप का बोध होता है। पहले इष्टदेव का सगुण ध्यान करके यह जप किया जाता है, पीछे निर्गुण स्वरूप का ज्ञान होता है। और तब उसका ध्यान करके जप किया जाता है। नादानुसंधान के साथ-साथ यह जप करने से बहुत अधिक उपायकारी होता है। केवल नादानुसंधान या केवल जप की अपेक्षा दोनों का योग अधिक अच्‍छा है। श्रीमदाद्य शंकराचार्य नादानुसंधान की महिमा कथन करते हुए कहते हैं- 'एकाग्र मन से स्वरूप चिंतन करते हुए दाहिने कान से अनाहत ध्वनि सुनाई देती है। भेरी, मृदंग, शंख आदि आहत नाद में ही जब मन रमता है तब अनाहत मधुर नाद की महिमा क्या बखानी जाए? चित्त जैसे-जैसे विषयों से उपराम होगा, वैसे-वैसे यह अनाहत नाद अधिकाधिक सुनाई देगा। नादाभ्यंतर ज्योति में जहां मन लीन हुआ, तहां फिर इस संसार में नहीं आना होता है अर्थात मोक्ष होता है।'

(प्रबोधसुधाकर 144-148) 'योगतारावली' में श्रीमदाद्य शंकराचार्य ने इसका वर्णन किया है। श्री ज्ञानेश्वर महाराज ने 'ज्ञानेश्वरी' में इस साधन की बात कही है। अनेक संत-महात्मा इस साधन के द्वारा परम पद को प्राप्त हो गए। यह ऐसा साधन है कि अल्पायास से निजानंद प्राप्त होता है। नाद में बड़ी विचित्र शक्ति है। बाहर का सुमधुर संगीत सुनने से जो आनंद होता है, उसका अनुभव तो सभी को है, पर भीतर के इस संगीत का माधुर्य और आनंद ऐसा है कि तुरंत मनोलय होकर प्राणजय और वासनाक्षय होता है।

इन्द्रियाणां मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुत:।
मारुतस्य लयो नाथ: स लयो नादमाश्रित:।।

(ह.प्र.)

'श्रोत्रादि इन्द्रियों का स्वामी मन है, मन का स्वामी प्राणवायु है। प्राणवायु का स्वामी मनोलय है और मनोलय नाद के आसरे होता है।'

सतत नादानुसंधान करने से मनोलय बन पड़ता है। आसन पर बैठकर, श्वासोच्छवास की क्रिया सावकाश करते हुए, अपने कान बंद करके अंतरदृष्टि करने से नाद सुनाई देता है। अभ्यास से बड़े नाद सुनाई देते हैं और उनमें मन रमता है। मंत्रार्थ का चिंतन, नाद का श्रवण और प्रकाश का अनुसंधान- ये तीन बातें साधनी पड़ती हैं। इस साधन के सिद्ध होने पर मन स्वरूप में लीन होता है, तब प्राण, नाद और प्रकाश भी लीन हो जाते हैं और अपार आनंद प्राप्त होता है।

*12. अखंड जप*

यह जप खासकर त्यागी पुरुषों के लिए है। शरीर यात्रा के लिए आवश्यक आहारादि का समय छोड़कर बाकी समय जपमय करना पड़ता है। कितना भी हो तो क्या, सतत जप से मन उचट ही जाता है, इसलिए इसमें यह विधि है कि जप से जब चित्त उचटे, तब थोड़ा समय ध्यान में लगाएं, फिर तत्वचिंतन करें और फिर जप करें। कहा है-

जपाच्छ्रान्त: पुनर्ध्यायेद् ध्यानाच्छ्रान्त: पुनर्जपेत्।
जपध्यानपरिश्रान्त: आत्मानं च विचारयेत्।।

'जप करते-करते जब थक जाएं, तब ध्यान करें। ध्यान करते-करते थकें, तब फिर जप करें और जप तथा ध्यान से थकें, तब आत्मतत्व का विचार करें।'

'तज्जपस्तदर्थभावनम्' इस योगसूत्र के अनुसार मंत्रार्थ का विचार करके उस भावना के साथ मंत्रावृत्ति करें। तब जप बंद करके स्वरूपवाचक 'अजो नित्य:' इत्यादि शब्दों का विचार करते हुए स्वरूप ध्यान करें। तब ध्यान बंद करके तत्वचिंतन करें। आत्मविचार में ज्ञानविषयक ग्रंथावलोकन भी आ ही जाता है। उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता, शांकरभाष्य, श्रीमदाचार्य के स्वतंत्र ग्रंथ, अद्वैतसिद्धि, स्वाराज्यसिद्धि, नैष्कर्म्यसिद्धि, खंडन-खंडखाद्य, अष्टावक्र गीता, अवधूत गीता, योवासिष्ट आदि ग्रंथों का अवलोकन अवश्य करें। जो संस्कृत नहीं जानते, वे भाषा में ही इनके अनुवाद पढ़ें अथवा अपनी भाषा में संत-महात्माओं के जो तात्विक ग्रंथ हों, उन्हें देखें। आत्मानंद के साधनस्वरूप जो दो संपत्तियां हैं, उनके विषय में कहा गया है-

अत्यन्ताभावसम्पत्तौ ज्ञातुर्ज्ञेयस्य वस्तुन:।
युक्तया शास्त्रैर्यतन्ते ये ते तन्त्राभ्यासिन: स्थिता:।।

(यो.वा.)

'ज्ञाता और ज्ञेय दोनों मिथ्‍या हैं। ऐसी स्थिर बुद्धि का स्थिर होना अभाव संपत्ति कहाता है और ज्ञाता और ज्ञेय रूप से भी उनकी प्रतीति का न होना अत्यंत अभाव संपत्ति कहाता है। इस प्रकार की संपत्ति के लिए जो लोग युक्ति और शास्त्र के द्वारा यत्नवान होते हैं, वे ही मनोनाश आदि के सच्चे अभ्यासी होते हैं।'

ये अभ्यास तीन प्रकार के होते हैं- ब्रह्माभ्यास, बोधाभ्यास और ज्ञानाभ्यास।

दृश्यासम्भवबोधेन रागद्वेषादि तानवे।
रतिर्नवोदिता यासौ ब्रह्माभ्यास: स उच्यते।।

(यो.वा.)

दृश्य पदार्थों के असंभव होने के बोध से रागद्वेष क्षीण होते हैं, तब जो नवीन रति होती है, उसे ब्रह्माभ्यास कहते हैं।

सर्गादावेव नोत्पन्नं दृश्यं नास्त्येव तत्सदा।
इदं जगदहं चेति बोधाभ्यासं विदु: परम्।।

(यो.वा.)

सृष्टि के आदि में यह जगत उत्पन्न ही नहीं हुआ। इसलिए वह यह जगत और अहं (मैं) हैं ही नहीं, ऐसा जो बोध होता है, उसे ज्ञाता लोग बोधाभ्यास कहते हैं।

तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्वबोधनम्।
एतदेकपरत्वं च ज्ञानाभ्यासं विदुर्बुधा:।।

(यो.वा.)

उसी तत्व का चिंतन करना, उसी का कथन करना, परस्पर उसी का बोध करना और उसी के परायण होकर रहना, इसको बुधजन ज्ञानाभ्यास के नाम से जानते हैं।

अभ्यास अर्थात आत्मचिंतन का यह सामान्य स्वरूप है। ये तीनों उपाय अर्थात जप, ध्यान और तत्वचिंतन सतत करना ही अखंड जप है। सतत 12 वर्षपर्यंत ऐसा जप हो, तब उसे तप कहते हैं। इससे महासिद्धि प्राप्त होती है। गोस्वामी तुलसीदास, समर्थ गुरु रामदास आदि अनेक संतों ने ऐसा तप किया था।

*13. अजपा जप*

यह सहज जप है और सावधान रहने वाले से ही बनता है। किसी भी तरह से यह जप किया जा सकता है। अनुभवी महात्माओं में यह जप देखने में आता है। इसके लिए माला का कुछ काम नहीं। श्वाछोच्छवास की क्रिया बराबर हो ही रही है, उसी के साथ मंत्रावृत्ति की जा सकती है। अभ्यास से मंत्रार्थ भावना दृढ़ हुई रहती है, सो उसका स्मरण होता है। इसी रीति से सहस्रों संख्‍या में जप होता रहता है। इस विषय में एक महात्मा कहते हैं-

राम हमारा जप करे, हम बैठे आराम।

*14. प्रदक्षिणा जप*

इस जप में हाथ में रुद्राक्ष या तुलसी की माला लेकर वट, औदुम्बर या पीपल-वृक्ष की अथवा ज्योतिर्लिंगादि के मंदिर की या किसी सिद्धपुरुष की, मन में ब्रह्म भावना करके, मंत्र कहते हुए परिक्रमा करनी होती है। इससे भी सिद्धि प्राप्त होती है- मनोरथ पूर्ण होता है।

यहां तक मंत्र जप के कुछ प्रकार, विस्तार भय से संक्षेप में ही निवेदन किए। अब यह देखें कि जपयोग कैसा है- योग से इसका कैसा साम्य है।
योग के यम-नियमादि 8 अंग होते हैं। ये आठों अंग जप में आ जाते हैं।

(1) यम यह बाह्येन्द्रियों का निग्रह अर्थात 'दम' है। आसन पर बैठना, दृष्टि को स्थिर करना यह सब यम ही है।

(2) नियम यह अंतरिन्द्रियों का निग्रह अर्थात् 'शम्' है। मन को एकाग्र करना इत्यादि से इसका साधन इसमें होता है।

(3) स्थिरता से सुखपूर्वक विशिष्ट रीति से बैठने को आसन कहते हैं। जप में पद्मासन आदि लगाना ही पड़ता है।

(4) प्राणायाम विशिष्ट रीति से श्वासोच्छवास की क्रिया करना प्राणायाम है। जप में यह करना ही पड़ता है।

(5) प्रत्याहार शब्दादि विषयों की ओर मन जाता है, वहां से उसे लौटकर अंतरमुख करना प्रत्याहार है, सो इसमें करना पड़ता है।

(6) धारणा एक ही स्थान में दृष्टि को स्थिर करना जप में आवश्यक है।

(7) ध्यान ध्येय पर चित्त की एकाग्रता जप में होनी ही चाहिए।

(8) समाधि ध्येय के साथ तदाकारता जप में आवश्यक ही है। तात्पर्य, अष्टांग योग जप में आ जाता है, इसीलिए इसे जपयोग कहते हैं। कर्म, उपासना, ज्ञान और योग के मुख्य-मुख्य अंग जपयोग में हैं इसलिए यह मुख्य साधन है। यह योग सदा सर्वदा सर्वत्र सबके लिए है। इस समय तो इससे बढ़कर कोई साधन ही नहीं।

Wednesday, 22 January 2020

09:19

पहचानिये अपनी शक्ति को!*समझिये, हम कैसे कार्य करते हैं,*



*पहचानिये अपनी शक्ति को!*समझिये, हम कैसे कार्य करते हैं,*

हम एक आत्मा हैं,जिसके तीन प्रारूप मन, बुद्धि और संस्कार कार्य करते हैं,
तो ये कह सकते हैं कि आप ही मन ,बुद्धि और संस्कार का जोड़ हैं।
अब इस मन की शक्ति का कमाल देखिये कि ये कैसे जादू करती है।

मान लीजिए

आप अपनी खिड़की से दूर एक पेड़ को देखते हैं,आपने अगर उस पेड़ को कुछ देर देख लिया तो मन का जादू चुपचाप उसे आपके अंदर प्लांट कर देगा,फिर अगर बुद्धि के रूप में आपने उसको कुछ देर देख लिया तो उसकी जड़ें आपके अंदर ग़हरी उतर कर मज़बूत हो जाएंगी,और उसे automatically संस्कार खाद पानी देकर उस पर फूल,फल लगा देते हैं,अब आपकी memory पर इतना बड़ा पेड़ उग जायेगा तो आपके सिर को भारी करेगा ही,अब अगर इस पेड़ पर कांटे या ज़हरीले फूल फल लगेंगे तो आपके जीवन में तकलीफ़ लाएंगे ही।
हमारे अंदर कोई भी बात गहरे तभी उतरती है जब हम अपने चिंतन से उसे अपनी शक्तियां देते हैं,अगर हम उसे ख़ुराक़ ना दे तो कोई भी व्यर्थ या नकारात्मक बात एक पल भी मन में ठहर नहीं सकती।
तो कृपया ऐसे व्यर्थ की बातों के पेड़ को देखते ही मन की दृष्टि वहाँ से हटा लें तो फिर समस्या इतनी बढ़ेगी ही नहीं की उसकी जड़ काटने के लिए हमें बाद में परेशान होना पड़े।

बजाय इसके

मन की दृष्टि अगर सार्थक बातों,ज्ञान,सकारात्मकता,व् प्रभु की याद के बगीचे पर रखें तो यही बुद्धि व् संस्कार जब उसे खाद पानी देकर वटवृक्ष बनाएंगे तो हमें प्रभु शक्तियों की शीतल छाया भी मिलेगी,मन हल्का होकर उड़ता रहेगा और खुशियों की सुगंध से जीवन भी महकता रहेगा।
09:04

जाने कैसे एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं*?


          


*जाने कैसे एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं*?


एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा सभा बुलाकर प्रश्न किया कि
"मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर होगये ..क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं । सब सोच में पड़ गये कि अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में यदि जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है ।

राजा की जिज्ञासा बढ़ी और घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं , सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा "तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं वे दे सकते हैं ।"

राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया ,दृश्य ही कुछ ऐसा था, वे महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे । राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा " मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है "

सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ वहाँ भी जाकर देखता हूँ क्या होता है ।

राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया ।

राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुनो लो -

तुम, मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई व राजकुमार थे । एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे । अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा -

"बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो , मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी "

इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले "तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से ....। वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि "बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ? " भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझे भी बाटी मांगी... तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि " चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ ...?"।

बालक बोला "अंतिम आशा लिये वो महात्मा हे राजन !आपके पास आये , आपसे भी दया की याचना की, सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी ।

बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले "तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा "

बालक ने कहा "इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं " ..।

इतना कहकर वह बालक मर गया ।
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राजा अपने महल में पहुंचा और माना कि ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र है ।
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एक ही मुहूर्त में अनेकों जातक. जन्मते हैं किन्तु सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं ।
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जैसा भोग भोगना होगा वैसे ही योग बनेंगे । जैसा योग होगा वैसा ही भोग भोगना पड़ेगा यही जीवन चक्र ज्योतिष शास्त्र समझाता है !

Monday, 20 January 2020

09:05

वेदो के अनुसार मनुष्य को प्रतिदिन अपने जीवन में पाँच महायज्ञ जरूर करने चाहिए- के सी शर्मा*



*वेदो के अनुसार मनुष्य को प्रतिदिन अपने जीवन में पाँच महायज्ञ जरूर करने चाहिए- के सी शर्मा*

(1) *ब्रह्मयज्ञ* :- ब्रह्म यज्ञ संध्या ,उपासना को कहते है। प्रात: सूर्योदय से पूर्व तथा सायं सूर्यास्त के बाद जब आकाश में लालिमा होती है, तब एकांत स्थान में बैठ कर ओम् वा गायत्री आदि वेद मंत्रों से ईश्वर की महिमा का गुणगान करना ही ब्रह्मयज्ञ कहलाता है।

(2) *देवयज्ञ* :- अग्निहोत्र अर्थात हवन को देवयज्ञ कहते है। यह प्रतिदिन इसलिए करना चाहिए क्योंकि हम दिनभर अपने शरीर के द्वारा पृथ्वी ,जल ,वायु, आदि को प्रदूषित करते रहते है। इसके अतिरिक्त आजकल हमारे भौतिक साधनों से भी प्रदूषण फैल रहा है, जिसके कारण अनेक बीमारियाँ फैल रही है। उस प्रदूषण को रोकना तथा वायु, जल और पृथ्वी को पवित्र करना हमारा परम कर्तव्य है। सब प्रकार के प्रदूषण को रोकने का एक ही मुख्य साधन है और वो है हवन। अनुसंधानों के आधार पर एक बार हवन करने से 8 किलोमीटर तक की वायु शुद्ध होती है ।

(3) *पितृयज्ञ* :- जीवित माता- पिता तथा गुरुजनों और अन्य बड़ों की सेवा एवं आज्ञापालन करना ही पितृयज्ञ है।

(4) *अतिथियज्ञ* :- घर पर आए हुए विद्वान, धर्मात्मा, सन्यासी का भोजन आदि से सत्कार करके उनसे ज्ञानप्राप्ति करना ही अतिथियज्ञ कहलाता है।

(5) *बलिवैश्वदेवयज्ञ* :- पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए ही बनाए हैं। इन पर दया करना और इन्हें खाना खिलाना बलिवैश्वदेवयज्ञ कहलाता है। क्योकि ये हम पर आश्रित है। अब कोई चिङिया आदि कोई व्यापार, नौकरी आदि तो करेगी नहीं उनके लिए प्रतिदिन दाना आदि डालना बलिविश्वदेव यज्ञ कहलाता है।

मूर्तियों की पूजा में समय बर्बाद मत करो । इन पांच महायज्ञों को श्रद्धा पूर्वक नित करने से ही मनुष्य जीवन सफल हो सकता है ।

Sunday, 19 January 2020

08:27

जानिए क्या है, षटतिला एकादशी व्रत की कथा और शुभ मुहूर्त ?*




*पंडित विष्णु जोशी के साथ*
  *20 जनवरी  2020 , सोमवार को है*🙏

*जानिए क्या है, षटतिला एकादशी व्रत की कथा और शुभ मुहूर्त ?*
                                     
*हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार षटतिला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। कुछ लोग बैकुण्ठ रूप में भी भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। षटतिला एकादशी पर तिल का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन 6 प्रकार से तिलों का उपोयग किया जाता है। इनमें तिल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन, तिल से तर्पण, तिल का भोजन और तिलों का दान किया जाता है, इसलिए इसे षटतिला एकादशी व्रत कहा जाता है।*

*हिन्दू पंचांग के अनुसार यह एकादशी 20 जनवरी को पड़ेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार एक समय नारद मुनि भगवान विष्णु के धाम बैकुण्ठ पहुंचे। वहां उन्होंने भगवान विष्णु से षटतिला एकादशी व्रत के महत्व के बारे में पूछा। नारद जी के आग्रह पर भगवान विष्णु ने बताया कि, प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की पत्नी रहती थी। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। वह मेरी अन्नय भक्त थी और श्रद्धा भाव से मेरी पूजा करती थी। एक बार उसने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी उपासना की। व्रत के प्रभाव से उसका शरीर तो शुद्ध हो गया परंतु वह कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी, इसलिए मैंने सोचा कि यह स्त्री बैकुण्ठ में रहकर भी अतृप्त रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन उसके पास भिक्षा मांगने गया। जब मैंने उससे भिक्षा की याचना की तब उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरे हाथों पर रख दिया। मैं वह पिण्ड लेकर अपने धाम लौट आया। कुछ समय बाद वह देह त्याग कर मेरे लोक में आ गई। यहां उसे एक कुटिया और आम का पेड़ मिला। खाली कुटिया को देखकर वह घबराकर मेरे पास आई और बोली कि, मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली? तब मैंने उसे बताया कि यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है। मैंने फिर उसे बताया कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने आएं तो आप अपना द्वार तभी खोलना जब तक वे आपको षटतिला एकादशी के व्रत का विधान न बताएं। स्त्री ने ऐसा ही किया और जिन विधियों को देवकन्या ने कहा था उस विधि से षटतिला एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न धन से भर गई। इसलिए हे नारद इस बात को सत्य मानों कि, जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्नदान करता है उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है।*


*षटतिला एकादशी के व्रत पारण का शुभ मुहूर्त – एकादशी के अगले दिन यानी*

*21 जनवरी को  07:14:05  से 09:21:28 तक।*


*ओम नमो नारायणाय*

Wednesday, 15 January 2020

12:32

आत्मा अमर है मगर क्यों



प्रत्येक बार मृत्यु के समय आत्मा की अमरता का अनुभव किया जाता है।
*आत्मा अमर है--*
इस बात को हम जानते हैं,  हमने अनेक बार पढ़ा है । परंतु इस बात का अभी तक अनुभव नहीं किया गया है। अनेक शास्त्रों का अध्ययन किया , अनेक संतों के प्रवचन सुने, ( हमने स्वयं ने भी अनेक बार प्रवचनों  में गला फाड़-  फाड़ कर कहा है) कि " आत्मा अमर है और देह  क्षणभंगुर है। " फिर भी मरने तक इस बात का अनुभव नहीं हो पाता।  इसी से हम अपने देह को अपना स्वरूप मान बैठे हैं।
जिस प्रकार मेरी कमीज़ मेरे शरीर का आवरण है , उसी प्रकार मेरा देह  मेरी आत्मा का आवरण है।
उसी प्रकार मेरा शरीर भी मेरी आत्मा का मात्र आवरण है,  ऐसा मैं जानता हूं-- सुनता हूं-- पढ़ता हूं-- कहता हूं।  फिर भी अभी तक मुझे पक्का अनुभव नहीं हुआ कि यह " मैं"  हूं और यह मेरा देह है और " मैं " देह से बिल्कुल पृथक सत्ता हूं और " मैं " देह  से बिल्कुल विलक्षण हूं--- साथ ही देह के  गुण- धर्म और मेरे गुण- धर्म बिल्कुल पृथक है-- विरोधाभासी हैं। अतः यह मेरा देह है , परंतु मैं स्वयं देह नहीं हूं।
 परंतु ऐसा अनोखा और अद्भुत अनुभव व्यक्ति को मरते समय मृत्युदेव करवाते हैं। यह मृत्युदेव की एक अलौकिक महिमा है।  मरते समय जब जीवात्मा देह को त्याग कर देह से बाहर निकलता है, तब वह प्रत्यक्ष रूप से देख सकता है।
कि यह मैं अलग खड़ा हूं और सामने यह मेरा शरीर पड़ा हैं।
फिर तुरंत ही जीवात्मा को दूसरा देह पकड़ना होता है,  उस समय यदि हीन योनि  में देह पकड़ना पड़ता है, तो वह घबराता है , और इसीलिए वह छूटे हुए शरीर में पुनः प्रवेश करने का जोरदार प्रयास करता है । परंतु एक बार शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने के बाद उसके पुनः प्रवेश की कोई व्यवस्था नहीं है। अतः वह जीवात्मा उस छूटे हुए शरीर के आसपास भटकता रहता है। जीवात्मा पुराना शरीर छोड़ती है , उससे यदि नया शरीर उच्च कोटि का होता है तो वह जीवात्मा उस शरीर को धारण कर तुरंत ही अपना रास्ता नाप लेती है।
शरीर छूट जाने के बाद यदि उस शरीर में अत्यंत आसक्ति रह गई हो अथवा नया शरीर हीन योनि में प्राप्त होता है,  तो जीवात्मा उस छूटे हुए शरीर में पुनः प्रवेश करने के लिए प्रयास करती है ऐसी मान्यता है।
 परंतु पुनः उसी शरीर में प्रवेश करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए हमारे शास्त्रों ने आदेश दिया है कि शरीर के छूटते ही उसे तुरंत उठाकर श्मशान में ले जाकर जला देना चाहिए। जीवात्मा उस समय शरीर के पीछे - पीछे शमशान तक जाती है और जब देखता है कि शरीर को तो जला दिया गया है और अब पुनः प्रवेश का कोई प्रश्न ही नहीं रहता । तभी वह जीवात्मा अपने रास्ते पड़ती है और नया देह पकड़ लेती है ---ऐसी मान्यता है।
 फिर भी यदि स्त्री- पुत्रादि, संपत्ति , कोठी आदि में जीवात्मा की आसक्ति रह गई हो,  तो वह जीवात्मा उनके आसपास मंडराती रहती है। और इससे उसकी कोई गति न होने के कारण वह बीच में ही भूत योनि में लटक जाती है ऐसी मान्यता है।
यदि कोई जुबान स्त्री दो छोटे बच्चों को छोड़कर मर जाती है,  तो उसका जीव (आसक्ति)  उन छोटे बच्चों में रह जाती है,  और उसे यूं लगा रहता है कि मेरे बच्चों को उनकी नई मां आएगी तो दुखी करेगी।  इसी चिंता में उस जीवात्मा की गति नहीं होती और वह बीच में ही भूत योनि में लटक जाती है।
ऐसी परिस्थिति का निर्माण न हो,  और जीवात्मा शरीर छोड़कर भूत योनि में भटके बिना अपने कर्मानुसार , नया शरीर धारण कर चलती बने,  इस हेतु शास्त्रों ने अनेक प्रकार की विधियों का आयोजन किया है।
मान लीजिए कि किसी प्रकार की लालसा- वासना- कामना- आसक्ति के कारण जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर नहीं धारण करती,  और इसलिए वह भूत योनि में भटकती रह जाती है,  तो इसके लिए देह छुटने के बाद दसवे दिन--- दसवे के दिन उसके पिंड - दान की विधि की जाती है।  यह विधि प्रतीकात्मक है। यदि जीव आत्मा भटकती है,  तो उसे बताने के लिए कि देखो--- अब तुम्हारे पिंड (मृत देह का प्रतीक) का हम दान करते हैं---  विच्छेद करते हैं , क्योंकि अब हमारा और तुम्हारा कोई रिणानुबंध--- कोई लेन-देन रहा नहीं है ।  अतः अब तू कृपा करके अपना रास्ता ले -- और हमें परेशान मत करना । जीव आत्मा की सद्गति-- असद्गति  नहीं हुई और वह भूत योनि में भटकती होगी,   ऐसी मान्यता के आधार पर उपरोक्त दसवें  की विधि प्रतीकात्मक रूप में की जाती है।
क्रमश  अब इसी के आगे का भाग, शेष कल। मृत्यु के माहात्म्य पुस्तक से