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Sunday, 31 May 2020

19:04

अमेरिकी सांसद बोले- संपन्न, ताकतवर और लोकतांत्रिक भारत ही चीन के गलत मंसूबों को नाकाम करेगा-के सी शर्मा

हकीकत का आईंना


विशेषज्ञों ने कहा कि अमेरिका को भारत की विकास दर को बढ़ाने में मदद करनी चाहिए।
 चीन के साथ शुरू हो रहे नए शीत युद्ध में भारत, अमेरिका का नेचुरल सहयोगी है। 
 "संपन्न, ताकतवर और लोकतांत्रिक भारत ही चीन के गलत मंसूबों को नाकाम करेगा।" चीन और अमेरिका में मौजूदा दौर में तनाव बहुत बढ़ा हुआ है।
 दोनों देशों में कोरोनावायरस, हॉन्गकॉन्ग में नया सुरक्षा कानून और दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों को लेकर टकराव बढ़ गया है।

 टेक्सास से रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन ने गुरुवार को ट्वीट किया।
 इसके साथ ही उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल में विदेश मामलों के जानकार वॉल्टर रसेल मीड के एक लेख को शेयर किया, इसमें कहा गया है कि अमेरिका को भारत की विकास दर को उठाने में मदद करनी चाहिए। यह अमेरिका की विदेश नीति का पहला लक्ष्य होना चाहिए।

 भारत हमारा नेचुरल सहयोगी :-

रसेल मीड लिखा, ‘‘अमेरिका ने लोकतांत्रिक देशों को अमीर बनाने में मदद करके शीत युद्ध में जीत हासिल की थी। अब उसी रणनीति को दोबारा से शुरू करने का समय है और भारत वह जगह है, जहां से इसकी शुरुआत होनी चाहिए।’’ मीड ने कहा कि चीन के साथ नए शीत युद्ध में भारत, अमेरिका का नेचुरल सहयोगी है।

 भारतीय इकोनॉमी को तेज धक्के की जरूरत :-

मीड ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी जब तक भारत की इकोनॉमी को तेज धक्का नहीं लगातीं, तब तक विकास दर स्थिर रहेगी। ऐसे में यह हर साल एक नियत दर से बढ़ेगी, जिससे भारत चीन से बहुत पीछे हो जाएगा। यह भारत और एशिया दोनों के लिए अच्छा नहीं होगा। भारत में अगर विकास दर तेजी से बढ़ेगी तो कई लोग गरीबी से बाहर निकलेंगे, लेकिन भारतीय समाज शासन के लिहाज से बहुत कठिन है। वहां सुधारों को लागू करने में बहुत कठिनाई होती है।

 कोरोना की आड़ में चीन अपना एजेंडा बढ़ा रहा :-

चीन कोरोना महामारी की आड़ में भारत, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग और साउथ
 चाइना सी (दक्षिण चीन सागर) पर अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। इन जगहों से चीन का लंबे समय से विवाद है। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस पर विश्लेषण किया है। 
इसमें विशेषज्ञों ने कहा है कि कोरोना के इस दौर में जहां अमेरिका, लैटिन अमेरिका और यूरोप संक्रमण से जूझ रहे हैं, वहीं, चीन अपने एजेंडे में आगे बढ़ रहा है। जिन मुद्दों पर चीन को तमाम देशों से विरोध का सामना करना पड़ता है, उन्हें वह कोरोना की आड़ में हल करना चाहता है।
18:57

1 जून भगतसिंह की वीर माता विद्यावती कौर जी की पुण्यतिथि पर विशेष- सम्पादक के सी शर्मा

इतिहास इस बात का साक्षी है कि देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना जीवन अर्पण करने वालों के मन पर ऐसे संस्कार उनकी माताओं ने ही डाले हैं। भारत के स्वाधीनता संग्राम में हंसते हुए फांसी चढ़ने वाले वीरों में भगतसिंह का नाम प्रमुख है। उस वीर की माता थीं श्रीमती विद्यावती कौर।

विद्यावती जी का पूरा जीवन अनेक विडम्बनाओं और झंझावातों के बीच बीता। सरदार किशनसिंह से विवाह के बाद जब वे ससुराल आयीं, तो यहां का वातावरण देशभक्ति से परिपूर्ण था। उनके देवर सरदार अजीतसिंह देश से बाहर रहकर स्वाधीनता की अलख जगा रहे थे। स्वाधीनता प्राप्ति से कुछ समय पूर्व ही वे भारत लौटे; पर देश को विभाजित होते देख उनके मन को इतनी चोट लगी कि उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को सांस ऊपर खींचकर देह त्याग दी।

उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्णसिंह भी जेल की यातनाएं सहते हुए बलिदान हुए। उनके पति किशनसिंह का भी एक पैर घर में, तो दूसरा जेल और कचहरी में रहता था। विद्यावती जी के बड़े पुत्र जगतसिंह की 11 वर्ष की आयु में सन्निपात से मृत्यु हुई। भगतसिंह 23 वर्ष की आयु में फांसी चढ़ गये, तो उससे छोटे कुलतार सिंह और कुलवीर सिंह भी कई वर्ष जेल में रहे।

इन जेलयात्राओं और मुकदमेबाजी से खेती चौपट हो गयी तथा घर की चौखटें तक बिक गयीं। इसी बीच घर में डाका भी पड़ गया। एक बार चोर उनके बैलों की जोड़ी ही चुरा ले गये, तो बाढ़ के पानी से गांव का जर्जर मकान भी बह गया। ईर्ष्यालु पड़ोसियों ने उनकी पकी फसल जला दी। 1939-40 में सरदार किशनसिंह जी को लकवा मार गया। उन्हें खुद चार बार सांप ने काटा; पर  उच्च मनोबल की धनी माताजी हर बार घरेलू उपचार और झाड़फूंक से ठीक हो गयीं। भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का समाचार सुनकर उन्होंने दिल पर पत्थर रख लिया क्योंकि भगतसिंह ने उनसे एक बार कहा था कि तुम रोना नहीं, वरना लोग क्या कहेंगे कि भगतसिंह की मां रो रही है।

भगतसिंह पर उज्जैन के विख्यात लेखक श्री श्रीकृष्ण ‘सरल’ ने एक महाकाव्य लिखा। नौ मार्च, 1965 को इसके विमोचन के लिए माताजी जब उज्जैन आयीं, तो उनके स्वागत को सारा नगर उमड़ पड़ा। उन्हें खुले रथ में कार्यक्रम स्थल तक ले जाया गया। सड़क पर लोगों ने फूल बिछा दिये। इतना ही नहीं, तो छज्जों पर खड़े लोग भी उन पर पुष्पवर्षा करते रहे। 

पुस्तक के विमोचन के बाद सरल जी ने अपने अंगूठे से माताजी के भाल पर रक्त तिलक किया। माताजी ने वही अंगूठा एक पुस्तक पर लगाकर उसे नीलाम कर दिया। उससे 3,331 रु. प्राप्त हुए। माताजी को सैकड़ों लोगों ने मालाएं और राशि भेंट की। इस प्रकार प्राप्त 11,000 रु. माताजी ने दिल्ली में इलाज करा रहे भगतसिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त को भिजवा दिये। समारोह के बाद लोग उन मालाओं के फूल चुनकर अपने घर ले गये। जहां माताजी बैठी थीं, वहां की धूल लोगों ने सिर पर लगाई। सैकड़ों माताओं ने अपने बच्चों को माताजी के पैरों पर रखा, जिससे वे भी भगतसिंह जैसे वीर बन सकें।

1947 के बाद गांधीवादी सत्याग्रहियों को अनेक शासकीय सुविधाएं मिलीं; पर क्रांतिकारी प्रायः उपेक्षित ही रह गये। उनमें से कई गुमनामी में बहुत कष्ट का जीवन बिता रहे थे। माताजी उन सबको अपना पुत्र ही मानती थीं। वे उनकी खोज खबर लेकर उनसे मिलने जाती थीं तथा सरकार की ओर से उन्हें मिलने वाली पेंशन की राशि चुपचाप वहां तकिये के नीचे रख देती थीं। 

इस प्रकार एक सार्थक और सुदीर्घ जीवन जीकर माताजी ने दिल्ली के एक अस्पताल में एक जून, 1975 को अंतिम सांस ली। उस समय उनके मन में यह सुखद अनुभूति थी कि अब भगतसिंह से उनके बिछोह की अवधि सदा के लिए समाप्त हो रही है।

Saturday, 30 May 2020

19:57

देश में होगा अनलॉक 8 जून से खुलेंगे मंदिर, रेस्टोरेंट, मॉल

देश में होगा अनलॉक  8 जून से खुलेंगे मंदिर, रेस्टोरेंट, मॉल
जयपुर/ सवाई माधोपुर@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। देश में चर्चा लॉकडाउन-5 की थी, लेकिन सामने आ गया अनलॉक-1 का फॉर्मूला।
64 दिनों के लॉकडाउन के बाद अब देश चरणबद्ध तरीके से अनलॉक होने जा रहा है। लॉकडाउन आगे बढ़ चुका है, जिसे 1 से 30 जून 2020 तक लागू किया गया है। इस दौरान कंटेनमेंट क्षेत्रों के बाहर कई सुविधाओं को चरणबद्ध तरीके से खोला जाएगा।
केंद्र सरकार ने अनलॉक के लिए तीन चरणों की योजना बनाई है। पहला चरण 8 जून से लागू होगा। इसके तहत 8 जून के बाद होटल, रेस्टोरेंट, शॉपिंग मॉल और धार्मिक स्थल शर्तों के साथ खुलेंगे। स्कूल-कॉलेज खोलने पर फैसला जुलाई में राज्य सरकारों द्वारा किया जाएगा। वहीं अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू करने और सिनेमा हॉल जैसे स्थान आम लोगों के लिए खोलने पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है।
तीन चरणों में लॉकडाउन में मिलेगी कई छूट, देश में एक जून से 30 जून तक नई रियायतों के साथ बढ़ा लॉकडाउन।
चरण-1. सार्वजनिक स्थानों और पूजा के सार्वजनिक स्थान, होटल, रेस्तरां और अन्य आतिथ्य सेवाएं और शॉपिंग मॉल को 8 जून, 2020 से खोलने की अनुमति दी जाएगी। सरकार इस संबंध में दिशानिर्देश जारी करेगी। 
चरण-2. स्कूल, कॉलेज, शैक्षिक (प्रशिक्षण) कोचिंग संस्थान आदि, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ विचार-विमर्श के बाद खोले जाएंगे।
चरण-3. अंतर्राष्ट्रीय हवाई यात्रा, मेट्रो रेल का संचालन, सिनेमा हॉल, व्यायामशाला, स्विमिंग पूल, मनोरंजन पार्क आदि के लिए तिथियों का निर्धारण स्थिति के आकलन के आधार पर किया जाएगा।
अगले एक महीने के लिए कंटेनमेंट जोन के बाहर की सभी गतिविधियों को फिर से चरणों में खोलने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 
कंटेनमेंट जोन के बाहर आर्थिक गतिविधियों को मिलेगी छूट।
एक से दूसरे राज्य में जाने के लिए पास की जरुरत नहीं होगी।
– आवश्यक गतिविधियों को छोड़कर, पूरे देश में रात 9 बजे से सुबह 5 बजे के बीच व्यक्तियों का आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित रहेगी- गृह मंत्रालय।
– सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए मेट्रो सेवाओं को अगले नोटिस तक बंद रखा जाएगा- दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन
सख्त नियमों का करना होगा पालन
सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और दफ्तरों में मास्क पहनना होगा अनिवार्य।
हर व्यक्ति को सार्वजिक स्थानों पर छह फीट (दो गज) की दूरी बनानी होगी।
बड़ी संख्या में भीड़ पर प्रतिबंध जारी रहेगा। लेकिन शादी समारोह में 50 से अधिक लोग शामिल नहीं होने चाहिए।
दुकानों में सामाजिक दूरी का पालन करना होगा, एक बार में पांच से अधिक लोग खड़े नहीं रह पाएंगे।
सार्वजनिक स्थान पर थूकना जुर्माने के साथ दंडनीय अपराध होगा।
सार्वजनिक स्थानों पर शराब, पान, गुटखा तंबाकू का सेवन प्रतिबंधित रहेगा।
गर्भवती महिलाएं, 10 साल से कम उम्र के बच्चों और बुजुर्गों को घरों में रहने के निर्देश।
कंटेनमेंट जोन में नहीं मिलेगी अधिक छूट, जारी रहेगा लॉकडाउन 
लॉकडाउन के पांचवे चरण में कंटेनमेंट जोन में 30 जून तक जारी रहेगी सख्ती।
कंटेनमेंट जोन में सिर्फ जरूरी सेवाओं की ही इजाजत होगी।
यहां लोगों की आवाजाही पर जारी रहेगा पहले की तरह प्रतिबंध।
इस जोन में कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और घर-घर की जांच होगी।
राज्यों की तरफ से कंटेनमेंट जोन के बाहर बफर जोन बनाए जा सकते हैं जहां जिला प्रशासन अपने अनुसार पाबंदियां लगा सकता है।
देशभर में अब तक लगे चार लॉकडाउन
कोरोना से रोकथाम के लिए 25 मार्च से देशभर में चरणबद्ध तरीके से लॉकडाउन लगाया गया, 68 दिन तक चले लॉकडाउन में बढ़ते वक्त के साथ दिशा-निर्देशों में ढील मिलती गई।
कैसे रहे लॉकडाउन के चार फेज-
पहला फेज- 25 मार्च से 14 अप्रैल तक। यह 21 दिन का रहा। इस दौरान सिर्फ जरूरी सामान की दुकानें खोलने की इजाजत दी गई।
दूसरा फेज- 15 अप्रैल से 3 मई। यह 19 दिन का रहा। हॉटस्पॉट (रेड जोन) को छोड़कर ऑरेंज और ग्रीन जोन में दुकानें खोलने की परमिशन दी गई।
तीसरा फेज- 4 मई से 17 मई। यह 12 दिन का था। हॉटस्पॉट (रेड जोन) को छोड़कर ऑरेंज और ग्रीन जोन में दुकानें खोलने की परमिशन दी गई। प्रवासी मजदूरों के लिए ट्रेनें और बस चलाई गईं। नई दिल्ली से स्पेशल ट्रेनों की भी शुरुआत हुई। वंदे भारत और समुद्र सेतु मिशन के जरिए दूसरे देशों में फंसे भारतीयों की वापसी हुई।
चौथा फेज- 18 मई से 31 मई तक के इस फेज में सरकार ने राज्यों को कोरोना संक्रमण के हिसाब से रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन तय करने की छूट दी। बसें चलाने की इजाजत दी गई। शॉपिंग मॉल्स के अलावा सभी दुकानें खोलने की परमिशन दी गई। बाद में अलग से घोषणा कर 25 मई से घरेलू उड़ानें भी शुरू कर दी गईं।

Tuesday, 19 May 2020

19:43

जाने कैलाश की अनसुलझी पहेली-के सी शर्मा


नेशनल /कैलाश पर्वत देखने में जितना सुंदर है उतना ही ज्यादा यह रहस्यमयी भी है। 
कैलाश पर्वत के साथ ना जाने कितने रहस्य जुड़े हुए हैं – एक रहस्य यह है कि आखिर क्यों कोई इस पर्वत पर आज तक नहीं चढ़ पाया। 
कैलाश पर्वत के सारे रहस्य एक पोस्ट में बता पाना संभव नहीं है। फिर भी मैं कैलाश पर्वत के कुछ रहस्य  प्रस्तुत कर रही हूँ –

कैलाश पर्वत की ऊंचाई 6638 मीटर है। 
और इस पर एक सीमा के बाद ऊपर  चढ़ना असंभव माना जाता है। 
अब एक थ्योरी सामने आ रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि हो सकता है कि कैलाश पर्वत अंदर से खोखला हो। 
पहले भी कई वैज्ञानिकों ने अपनी- अपनी रिसर्च में पाया कि कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोऐक्टिव है। 
और यह रेडियो एक्टिविटी पर्वत के चारों तरफ एक समान ही है। और ऐसा तभी संभव हो सकता है जब इसका स्रोत इस पर्वत का केंद्र हो।

वैसे तो कैलाश पर्वत को हमारे धर्म में सबसे पवित्र पर्वत माना जाता है। 
और वेदों में भी कैलाश पर्वत की व्याख्या की गई है कि कैलाश पर्वत पर कोई भी अपवित्र आत्मा नहीं जा सकती। 
क्योंकि इस पर भगवान शिव का निवास है। 
कई वैज्ञानिक यह तक दावा करते हैं कि कैलाश पर्वत प्राकृतिक नहीं है, बल्कि इसे बनाया गया है। 
बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह से इजिप्ट में “पिरामिड” बनाए गए हैं। 
पिरामिड भी अंदर से खोखले हैं। और उसके अंदर भी देवताओं की कई मूर्तियाँ रखी गई हैं। कैलाश पर्वत इससे भी लाखों साल पुराना है। 
और समय के साथ यह और भी ज्यादा सख्त और रहस्यमय हो गया है।

अगर हम बात करें कैलाश पर्वत की स्थिति की तो यह नॉर्थ पोल से 6666 किलोमीटर दूर है। 
और साउथ पोल से 13332 किलोमीटर, बिल्कुल दुगना नॉर्थ पोल से।  
हमारे वेदों में भी कैलाश पर्वत को धरती का केंद्र माना गया है। और अब वैज्ञानिक भी इसकी पुष्टि कर रहे हैं। 
एक रशियन प्रोफेसर “इंस्ट मँदोसय” ने अपने एक गहन रिसर्च में पाया कि हो सकता है कि कैलाश पर्वत के अंदर एक पूरा का पूरा शहर बसा हो।

इस पर्वत को इतिहास में बनाया ही इसलिए गया हो, ताकि भविष्य में भी इस सभ्यता को बाकी दुनिया से अलग रखा जा सके। 
उस प्रोफेसर का यह भी दावा था कि इसके अंदर जाने का रास्ता इस पर्वत की चोटी पर हो सकता है। 
क्योंकि एक वही ऐसी जगह है जहाँ पर जाना सबसे ज्यादा मुश्किल है। 
हमारे वेदों में भी कहा गया है कि सिर्फ शुद्ध आत्मा ही कैलाश पर्वत पर पहुँच सकती है। 
और कैलाश पर्वत पर पहुँचने के बाद स्वर्ग का रास्ता खुल जाता है।

तो अंत में हमारे मन में ही सवाल उठता है कि, क्या सच में कैलाश पर्वत के अंदर एक अलग ही सभ्यता निवास करती है? 
और क्या सच में यह एक कुदरती पर्वत नहीं बल्कि अति विकसित विज्ञान की एक संरचना है?
 इसका जवाब तो हमें इस पर्वत से ही मिल सकता है।

Sunday, 17 May 2020

20:40

भारत को जुलाई में मिल जाएंगे पहले 4 राफेल लड़ाकू विमान



विमानों को फ्रांस से मई में ही आना था, कोरोनावायरस संकट के चलते फ्रांस और भारत ने इसे दो महीने के लिए टाल दिया था
2022 तक सभी 36 राफेल विमान भारत को मिल जाएंगे, पहले 18 राफेल जेट अंबाला एयरबेस में रखे जाएंगे !

इस साल जुलाई के अंत तक भारत को पहले चार राफेल फाइटर प्लेन मिल जाएंगे। फ्रांस से सीधा ये हरियाणा के अंबाला स्थित एयरबेस में उतारे जाएंगे। पहले ये प्लेन मई में ही आने वाले थे लेकिन कोरोना संकट के चलते इसे दो माह के लिए टाल दिया गया था।  

राफेल मिलने से भारतीय वायुसेना की ताकत में जबरदस्त इजाफा होगा। हवा से हवा में और हवा से जमीन पर वार करने की क्षमता पाकिस्तान और चीन के मुकाबले भारत की काफी बढ़ जाएगी। मतलब यह जेट एकसाथ जमीन से आसमान तक दुश्मनों को पस्त कर सकता है। इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक राफेल को रोकने के लिए पाकिस्तान को दो F-16 विमानों की जरूरत पड़ेगी।

एडवांस तकनीक से लैस है राफेल
भारत के लिए राफेल काफी जरूरी है। अभी तक मिस्र और फ्रांस में राफेल जेट का प्रयोग होता रहा है। हालांकि, भारत को मिलने वाला राफेल ज्यादा एडवांस   है। भारत की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसमें कुछ अतिरिक्त फीचर्स भी जोड़े गए हैं। पहला राफेल भारत की तरफ से 17 गोल्डन एरो के स्क्वॉड्रन कमांडिंग ऑफिसर उड़ाएंगे। उनके साथ एक फ्रेंच पायलट भी रहेगा। 2022 तक सभी 36 राफेल विमान भारत को मिल जाएंगे। पहले 18 राफेल जेट अंबाला एयरबेस में रखे जाएंगे, जबकि बाकी के 18 विमान पूर्वोत्तर के हाशीमारा में तैनात किए जाएंगे।
20:38

18 मई परिवार के मुखिया बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में संघचालक की भूमिका परिवार के मुखिया की होती है। बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह ने उत्तर प्रदेश में इस भूमिका को जीवन भर निभाया। उनका जन्म 18 मई, 1911 को कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर श्री विक्रमाजीत सिंह के घर में हुआ था। शिक्षाप्रेमी होने के कारण इस परिवार की ओर से कानुपर में कई शिक्षा संस्थाएं स्थापित की गयीं।

नरेन्द्र जी की शिक्षा स्वदेश व विदेश में भी हुई। लंदन से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे बैरिस्टर बने। वे न्यायालय में हिन्दी में बहस करते थे। उन्होंने प्रसिद्ध लेखकों के उपन्यास पढ़कर अपनी हिन्दी को सुधारा। कम्पनी लाॅ के वे विशेषज्ञ थे, उनकी बहस सुनने दूर-दूर से वकील आते थे। 

1935 में उनका विवाह जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ जी की पुत्री सुशीला जी से हुआ। 1944 में वे पहली बार एक सायं शाखा के मकर संक्रांति उत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आये। 1945 में वे विभाग संघचालक बनाये गये। 1947 में श्री गुरुजी ने उन्हें प्रांत संघचालक घोषित किया।  

नरेन्द्र जी का परिवार अत्यधिक सम्पन्न था; पर शिविर आदि में वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह सब काम स्वयं करते थे। उन्होंने अपने बच्चों को संघ से जोड़ा और एक पुत्र को तीन वर्ष के लिए प्रचारक भी बनाया। 1948 ई0 के प्रतिबंध के समय उन्हें कानपुर जेल में बंद कर दिया गया। कांग्रेसी गुंडों ने उनके घर पर हमला किया। शासन चाहता था कि वे झुक जाएं; पर उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि संघ का काम राष्ट्रीय कार्य है और वह इसे नहीं छोड़ेंगे। 

उनके बड़े भाई ने संदेश भेजा कि अब पिताजी नहीं है। अतः परिवार का प्रमुख होने के नाते मैं आदेश देता हूं कि तुम जेल मत जाओ; पर बैरिस्टर साहब ने कहा कि इस अन्याय के विरोध में परिवार को भी समर्पित करना पड़े, तो वह कम है। वे जेल में सबके साथ सामान्य भोजन करते और भूमि पर ही सोते थे। 1975 में आपातकाल में भी वे जेल में रहे। जेल में मिलने आते समय उनके परिजन फल व मिष्ठान आदि लाते थे। वे उसे सबके साथ बांटकर ही खाते थे।

बैरिस्टर साहब के पूर्वज पंजाब के मूल निवासी थे। वे वहां से ही सनातन धर्म सभा से जुड़े थे। 1921 में उनके पिता श्री विक्रमाजीत सिंह ने कानपुर में ‘सनातन धर्म वाणिज्य महाविद्यालय’ की स्थापना की। इसके बाद तो इस परिवार ने सनातन धर्म विद्यालयों की शृंखला ही खड़ी कर दी। 

बैरिस्टर साहब एवं उनकी पत्नी (बूजी) का दीनदयाल जी से बहुत प्रेम था। उनकी हत्या के बाद कानपुर में हुई श्रद्धांजलि सभा में बूजी ने उनकी स्मृति में एक विद्यालय खोलने की घोषणा की। उनके परिवार द्वारा चलाये जा रहे सभी विद्यालयों की पूरे प्रदेश में धाक है। विद्यालयों से उन्हें इतना प्रेम था कि उनके निर्माण में धन कम पड़ने पर वे अपने पुश्तैनी गहने तक बेच देते थे। मेधावी छात्रों से वे बहुत प्रेम करते थे। जब भी कोई निर्धन छात्र अपनी समस्या लेकर उनके पास आता था, तो वे उसका निदान अवश्य करते थे। 

वे बहुत सिद्धांतप्रिय थे। एक बार उनके घर पर चीनी समाप्त हो गयी। बाजार में भी चीनी उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने अपने विद्यालय के छात्रावास से कुछ चीनी मंगायी; पर साथ ही उसका मूल्य भी भेज दिया। उनका मत था कि राजनीति में चमक-दमक तो बहुत है; पर उसके माध्यम से जितनी समाज सेवा हो सकती है, उससे अधिक बाहर रहकर की जा सकती है। 

बैरिस्टर साहब देश तथा प्रदेश की अनेक धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी थे। जब तक स्वस्थ रहे, तब तक प्रत्येक काम में वे सहयोग देते रहे।  31 अक्तूबर, 1993 को उनका शरीरांत हुआ। उन्होंने अपने व्यवहार से प्रमाणित कर दिखाया कि परिवार के मुखिया को कैसा होना चाहिए।

Monday, 11 May 2020

02:01

उद्योगपतियों की खातिर मजदूरों को बंधुआ मजदूर बनाना चाहती है योगी सरकार -अनिल पांडेय

आम आदमी पार्टी हरियाणा के नेता अनिल पाण्डेय ने उत्तर प्रदेश में मजदूरों पर हो रहे भीषण अत्याचार पर BJP की योगी सरकार पर निशाना साधते हुये कहा कि उ०प्र० की सरकार उद्योगपतियों के हित में श्रम कानून 3 साल के लिए स्थगित कर मजदूरों को बंधुआ मजदूर बनाना चाहती है, सरकार का यह फैसला मजदूर और गरीब विरोधी है, उत्तर प्रदेश सरकार को इस आदेश को वापस लेना चाहिए। उत्तर प्रदेश की जनता अधिकतम मजदूरी करती है और आज इस वैश्विक महामारी में जहाँ लाखों मजदूर विभिन्न प्रदेशों से उत्तर प्रदेश में अपने घर वापस जा रहे हैं सरकार सिम्पैथी दिखाने के बजाय मजदूरों को बँधुआ मजदूर बनाना चाहती है।
 इस तुगलकी फरमान के खिलाफ आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता आज अपने अपने घरों पर एक दिन का उपवास रख कर श्रम क़ानून में हुए संशोधन का विरोध कर रहे हैं। अतः योगी सरकार को मजदूरों को बँधुआ बनाने वाले इस कानून को वापस लेना चाहिये।
 इसी मांग को लेकर उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के आह्वान पर उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक दिवसीय उपवास कर काले कानून का विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है बताते चले कि लाकडाउन को देखते हुए यह प्रदर्शन लॉक डाउन व शोशल डिस्टेंसिंग को मेंटेन रख किया जा रहा है क्योंकि इसमें पार्टी के कार्यकर्ता इसका  पालन करते हुए अपने अपने घरों से अलग अलग जारी रक्खे हुए है 
   साथ ही AAP की प्रदेश सरकार से मांग है कि लॉकडाउन में घर वापसी के दौरान जिन मजदूरों की मौत हो गयी है, उनके परिवार को 50 लाख रुपये और एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाए।

Tuesday, 5 May 2020

18:11

जानिए,भारतवर्ष के सबसे प्राचीन सिक्के- आहत सिक्के-के सी शर्मा

हक़ीकत का आईंना

जानिए,भारतवर्ष के सबसे प्राचीन सिक्के- आहत सिक्के-के सी शर्मा
   

        मुद्रा के रूप में भारत मे सिक्कों का चलन लगभग ढाई हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। 
शुरुआत में सिक्कों को आज के सिक्कों की भांति सांचों में ढाला नही जाता था बल्कि धातु के टुकड़ों पर औजारों से प्रहार कर आकृतियां बनाई जाती थीं। इस तरह के सिक्के आहत सिक्के (पंचमार्क कॉइन) कहलाए। 500 ई.पू से 200 ई.पू में आहत सिक्के तत्कालीन जनजीवन में विनिमय के मुख्य स्रोत थे।

 प्रारंभ में चांदी के आहत सिक्के सर्वाधिक प्राप्त हुए हैं, बाद में तांबे और कांसे के आहत सिक्के भी मिलते हैं। इन सिक्कों का कोई नियमित आकार नहीं होता था, ये राजाओं द्वारा जारी किए जाते थे। 

*आहत सिक्कों का शिल्प: -*
  
          आहत सिक्के धातु के टुकड़ों पर चिन्ह विशेष या ठप्पा मारकर या पीटकर बनाए जाते थे। आहत सिक्कों को धातु की अधिकर्णी पर हथौड़े से पीटा जाता था। बाद में कतरनी से उसके टुकड़े बनाए जाते थे और अंत में इन टुकड़ों पर बिंब टांक लगाई जाती थी। निर्माण की इस आहत (चोट) करने की पद्धति के आधार पर मुद्राविदों ने इन सिक्कों को आहत सिक्के नाम दिया। आहत सिक्कों पर प्राप्त आकृतियों में मछली, पेड़, मोर, यज्ञ वेदी, हाथी ,शंख, बैल, ज्यामितीय चित्र जैसे- वृत्त, चतुर्भुज, त्रिकोण तथा खरगोश आदि जंतु मिलते हैं। आहत सिक्कों की विशेषता यह थी कि इन पर लेख न होकर मात्र प्रतीक टंके होते थे। प्रारंभ में सिक्के केवल एक ओर ही टंके होते थे, बाद में सिक्कों पर दोनों ओर चिन्हों को अंकित किया जाने लगा था। ये प्राचीन कालीन आहत सिक्के बड़ी संख्या में देश के सभी भागों से मिलते हैं। अधिकांश आहत सिक्के उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तथा बिहार के मगध से मिले हैं। आहत सिक्कों से ही व्यापार में सुदृढ और नवीन संवर्गो के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ था।
  
 *महाजनपदों में प्रचलित आहत सिक्के: -*

         यह आहत सिक्के चांदी और तांबे की परतों पर अंकित होते थे। यह कह पाना अभी संभव नहीं है कि इन जनपदों में से किसने सबसे पहले यह सिक्के प्रारंभ किए। प्रत्येक जनपद के सिक्कों की बनावट, आकृति, वजन, धातु और स्वरूप एक दूसरे से पर्याप्त भिन्नता पाई गई है।

अश्मक महाजनपद के सिक्के मोटे तथा गोल आकृति के होते थे।
पांचाल सिक्कों में प्रमुख चिन्ह- मत्स्य, वृष, हाथी सवार, प्रमुख थे।
शूरसेन के सिक्कों पर बिल्ली या सिंह की आकृति मिलती है।
गांधार के आहत सिक्के पूर्णता अलग पाए गए हैं, यह एक से पौने दो इंच लंबे वर्तुलाकार शलाका सरीखे हैं।
वत्स, काशी, कौशल, मगध, कलिंग और आंध्र के सिक्कों पर चार-चार चिन्ह अंकित मिलते
 हैं ।

    चांदी के सिक्के का निर्माण ईसा से पूर्व ही बंद कर दिया गया था परंतु इनका चलन अगले 500 वर्षों तक बना रहा। गुप्तों के उदय तक चांदी के सिक्के नहीं मिलते। आहत मुद्रा की छांप से युक्त एक सांचा एरण (सागर, मध्यप्रदेश) से मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उल्लेख से पता चलता है कि उसके समय में तांबे के सिक्के भी प्रचलित थे। अधिकारियों को पण (जो कि चांदी की मुद्रा होती थी) द्वारा वेतन दिया जाता था।

       धातु बदलती रही परंतु जिन सिक्कों पर चिन्हों का टंकण किया जाता था वे ही पंचमार्क या आहत सिक्के कहलाए।

इति।



 संदर्भ :
1. भारतीय मुद्राएं , पी एल गुप्ता ,पृष्ठ क्र. 3 
2. प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास, डॉ.ओमप्रकाश, पृष्ठ क्र. 148
3. प्राचीन भारतीय मुद्राएं परमेश्वरी लाल, पृष्ठ क्र. 7 व 25

 चित्र- इंटरनेट से साभार
01:27

जमकर पड़े ओले तूफानी बवंडर ने मचाई तबाही, तीन की मौत,4 दर्जन से अधिक घायल, लाखों का नुकसान

जिले में तूफानी बवंडर ने मचाई तबाही, तीन की मौत,4 दर्जन से अधिक घायल, लाखों का नुकसान                       सवाई माधोपुर@ रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। सवाई माधोपुर जिले में तेज बारिश व
अंधड़ के रूप में आए भीषण तूफान ने तीन जनों की जिंदगी लील ली और तकरीबन 4 दर्जन से अधिक लोगों को घायल अवस्था में पहुंचा दिया । बरसाती तूफान ने सबसे अधिक कहर खंडार व चौथ का बरवाड़ा क्षेत्र में बरपाया। खंडार थाना क्षेत्र के 17 मिल गांव में सोमवार शाम आयी तेज आंधी के कारण एक पक्का मकान धराशाई हो गया, मकान की पट्टीयां गिरने से एक ही परिवार के 6 सदस्य मलबे के नीचे दब गए। वहीं दूसरी ओर चौथ का बरवाड़ा में तेज आंधी की वजह से दीवार गिरने से दो लोगों की मौत हो गई और 5 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। सवाई माधोपुर जिला कलेक्टर और एसपी द्वारा मौके पर पहुंचकर सही स्थिति  का जायजा लिया गया।सूचना मिलने के साथ ही खंडार थाना पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। ग्रामीणों की सहायता से मलबे में दबे परिवार के सभी सदस्यों को बाहर निकाला गया और घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। उपचार के दौरान 14 वर्षीय बच्ची आंसी की मौत की खबर है। इस प्रकार कुल 3 जनों की मौत हो गई,और कई दर्जन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।                      *तूफान ने मचाई भारी तबाही, सैकड़ों पेड़ व बिजली के पोल कोई धराशाई* : डॉक्टरों के प्राथमिक उपचार के बाद परिवार के अन्य सदस्यों को सवाई माधोपुर रेफर कर दिया सोमवार शाम आए तेज आंधी के कारण जिले के कई इलाकों में भी भारी नुकसान की खबर है सैकड़ों पेड़ पौधे और बिजली के पोल गिर गए जिसके चलते बिजली के ट्रांसफार्मर  खेतों में पड़े मिले। दर्जनों कच्चे मकान से लेकर टीन शेड छप्पर पोश घरों का तो मूल अस्तित्व ही समाप्त हो गया। कच्चे घरों के छप्पर वह टीन शेड दूर कहीं खेतों में जाकर पड़े मिले। विद्युत के तारों के टूटने व विद्युत पोल उखड़ने से ट्रांसफार्मर भी जमीन पर आ गिरे। भारी बरसात व ओले गिरने से जायद की फसल को भारी मात्रा में नुकसान पहुंचा। तूफान के चलते जहां पालतू जानवरों के भी चोट आई, वहीं ट्रैक्टर, मोटरसाइकिलें आदि पेड़ों वह मकान की दीवारों के चपेट में आने से क्षतिग्रस्त हो गए।

Monday, 4 May 2020

15:16

लाक डाउन में शहर छोड़कर गांव तो जाओगे मगर वहां आओगे क्या

हक़ीकत का आईंना
 वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा की कलम से
दिहाड़ी,मजबूर,मजदूर के मुम्बई पलायन और डर के मारे भाग रहे सक्षम अंतरराज्यीय लोगो के पलायन में अन्तर है?अवसरवादी,मजबूर लोगो का विश्लेषण लोग तो गाँव जाने के लिये ऐसे उत्पात मचा रहे हैं कि जैसे गांव पहुंचते ही सभी प्रकार की आर्थिक, शारीरिक एवं मानसिक समस्यायें समाप्त हो जायेंगी।

कई राज्यो से आरही जानकारी के उपराँत वहाँ के लोगो की आर्थिक,सामाजिक,व्यवसायिक की वास्तविक स्थिति के अनुभव के आधार पर ही यह लिख रहा हूँ और अच्छे से जानता हूँ कि वहां पर कितने,गरीब,मध्यम वर्ग,और कितने गिनेचुने लोग बडे जमींदार परिवार से संबंध रखते है!
बस ज़्यादातर मध्यमवर्गीय ही दिखे है!बेरोजगारी की तो हद दर्जे की है!
जबकि मुंबई में कोई भूखा नहीं सोता,यह कोई फिल्मी डायलॉग नहीं है, यह यहाँ का यथार्थ है!कोरोना महामारी के समय जिस प्रकार से तमाम व्यक्तिगत,राजनीतिक,सामाजिक, धार्मिक संगठन, दिन रात, पिछले दो महीनों से सबको भोजन, पानी दे रहे हैं, वह केवल और केवल मुंबई में ही संभव है!                                                                                          आप अन्य राज्य के सक्षम लोग (मजबूर मजदूर को छोड़कर)उसी मुंबई को ठुकरा कर गांव जाने के लिए नंगई पर उतारू हो!
थोडी सी कभी प्राकृतिक संकट/जेहादीधार्मिक तनाव/आतँकवादी घटना हुवी नही कि सबसे पहले आप मुंबई छोड़ कर भागने पर आमादा हो जाते हो?शर्म नहीं आती आपको (मजबूर मजदूर को छोड़कर)?                              
अरे भाई कौन सी जमींदारी छोड़ कर आये हो अपने गावँ में?
 संयुक्त परिवार होगा तो दो चार बिस्वा ज़मीन भी तो नहीं होगी शायद एक आदमी के हिस्से में?वहां कौन खिलायेगा?और कितने दिन खिलायेगा?
वहां मुफ्त में चार दिन भी नहीं खा पाओगे?पैसे खत्म हो जाएंगे तो यहाँ की ही याद आएगी?                                     झारखण्ड,विहार हो या यूपी हो कितने बडे बडे कारखाने, मिल, कंपनियां, फैक्टरियां हैं वहां, वो सबको पता है?
नब्बे प्रतिशत घरों की तो यह हालत है कि अगर पूरा परिवार जो शहरों में वसे है?
सब एक साथ आ जाये?
या जब पूरा परिवार इकट्ठा हो जाता है तो सोने के लिये खटिया विस्तर भी कम पड जाती है?
टेंट वाले के भरोसे इज्जत बचती है?और सब पलायनवादी (मजबूर मजदूर को छोड़कर)उसी जगह जाकर झंडा गाडने का सपना देख रहे 
हो?
चार दिन से ज्यादा बिना पैसे के,वहां जी नहीं पाओगे?
कायदे से, नियंत्रित ढंग से रहे होते तो,यह बीमारी अब तक समाप्त हो चुकी होती?
लेकिन हाय रे तब्लीगी जमात और तुम सब अवसरवादी पलायनवादी (मजबूर मजदूर को छोड़कर) यहां भी संक्रमण फैला रहे हो?और अब झारखण्ड,बिहार,उत्तर प्रदेश जाकर वहां भी फैलाओगे?

एक बात आज मुझे  सच लगी कि राज ठाकरे सच कहते थे कि तुम परप्रांतीय हो? आज अवसरवादी,पलायनवादी
(मजबूर मजदूर को छोड़कर) ने सच में सिद्ध कर दिया कि आप केवल पैसा कमाने की लालच में मुंबई आये थे?
 आपको मुंबई की मिट्टी से,मुंबई से कोई लगाव नही?
आपको जरा सा भी अपनापन नहीं मुंबई की धरती से?
वह धरती जिसने आप जैसे मौकापरस्त लोगों को अब  तक  पाला पोसा?
 लेकिन आपने अंत में वेवफाई कर ही दी मुंबई के साथ?
और अब रो भी रहे हो कि सरकार गांव जाने के लिए रेल टिकट का पैसा ले रही है,तो इतने वर्ष मुंबई में रहकर क्या पराक्रम किया तुमने कि रेल टिकट भी नहीं खरीद पा रहे हो?
जाओ भाई, मित्र,गाँववाले लेकिन याद रखना कि जरा सा भी स्वाभिमान, गैरत और आत्मसम्मान हो तो वापस मुम्बई मत आना क्योंकि मुंबई जिंदादिल लोगों का शहर है,  मुर्दों के लिए(मजबूर मजदूर को छोड़कर) यहां कोई जगह नहीं है?
15:02

शराब की कमाई ज़रूरी या,कोरोना से लड़ाई -के सी शर्मा

हकीकत का आईंना
कल पूरे शराब की दुकानों पर जो अफरा-तफरी का माहौल देखा उससे यह साबित हो गया कि 40 दिनों के लॉक डाउन का पानी फिर जाएगा।

ना जाने शराब और पान-गुटखा कब से Eseential Goods में आ गए ?
जिस विशेषज्ञों की सलाह मानकर लॉक डाउन के समय मे शराब की दुकानें खोलने का आदेश सरकार देती हैं आज उसका परिणाम पूरे देश ने देखा।

शराब की दुकानें Unlock (अनलॉक) होने के बाद.... शराब की दुकानों के बाहर उमड़ी भीड़ के कारण सोशल डिस्टन्सिंग की धज्जियाँ उड़ रही हैं,

पूरे देश ने "लॉक डाउन" के सवा महीने में जो कमाया है, वो शराब की दुकानों के चक्कर में गँवा ना बैठें!

यह समझने वाली बात है कि शराब की दुकानें खुलवाने की इतनी क्यों जल्दबाजी थी?

लॉक डाउन समय मे जब सभी धर्मों के धर्मस्थान नही खुल सकते तो शराब की दुकाने खुलवाने के आदेश क्यो?
क्या शराब के बिना व्यक्ति जिंदा नही रह सकता?
ना जाने शराब और पान-गुटखा कब से Eseential Goods में आ गए ?
लॉक डाउन के चलते शराब की दुकानें खुलवाने के पीछे  जिस जिस विशेषज्ञों का दिमाग काम कर गया, क्या उसके पीछे भी बहुत कुछ दिमाग और दबाव तो नही था?
क्योंकि भारत मे 60% से ज्यादा कथित राजनेता प्रत्यक्ष या परोक्ष शराब माफिया ओ के माध्यम से ही राजनीति में आते है...
इन सब ने शराब की दुकाने खुलवाने के लिए अपने तंत्र को काम पर लगाया और  दबाब बनाने में सफल रहे...
राजस्व नुकसान का हवाला देकर... बहुत से तर्क दिए होंगे इन लोगो ने....

ये शराब माफिया बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली है..., ये सरकारे बना भी सकते है गिरा भी सकते है...
सवाल उठता  है कि...
शराब के ठेके खोलकर इटली वाली गलती को तो हम नही दोहरा रहे है?