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Thursday, 31 October 2019

17:39

आस्था का महापर्व छठ पूजा आज से शुरू



सूर्य की उपासना का महापर्व छठ आज गुरुवार को नहाय-खाए से शुरू होकर अगले चार दिनों तक चलेगा। शुक्रवार 1 नवंबर को खरना और शनिवार 2 नवंबर की शाम सूर्य भगवान को पहला सायंकालीन अर्घ्य और रविवार 3 नवंबर की सुबह सूर्य देवता को प्रात:कालीन अर्घ्य देकर  इस पर्व का समापन किया जाएगा।
छट पूजा के मद्देनजर मोरवा छठ घाटों की सफाई का कार्य अभी भी जारी है। आस्था का महापर्व छठ को लेकर प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क दिखाई दे रहा है। गुरुवार सुबह *रेलवे स्टेशन समीप* बने घाट, *मोरवा छठ घाट व झिंगुरदाह* में बने घाटों का *निरीक्षण एसडीओपी मोरवा डॉ कृपा शंकर द्विवेदी व नगर निरीक्षक नागेंद्र प्रताप सिंह* द्वारा किया गया। निरीक्षण करने पहुंचे पुलिस अधिकारियों द्वारा मोरवा छठ घाट पर *क्षतिग्रस्त पुलिया पर रोष जताते हुए पूजा के समय पुल के दोनों तरफ पुलिस बल नियुक्त* करने का निर्देश दिया गया। वही छठ पूजा के दौरान *यातायात व्यवस्था* बनाए रखने व गहरे पानी में डूबने से बचाने के लिए *गोताखोर नियुक्त* करने के बाद भी पुलिस अधिकारियों द्वारा कही गई। इस दौरान वहां कांग्रेस जिला महासचिव *शेखर सिंह व व्यवसाई विनोद सिंह* भी मौजूद रहे। उनके द्वारा उम्मीद जताई गई की नगर निगम द्वारा कल तक सफाई व सुचारु रुप से बिजली व्यवस्था कर ली जाएगी। गौरतलब है कि मोरवा छठ घाट पर अन्य घाटों की अपेक्षा ज्यादा संख्या में लोग पूजा करने आते हैं। वहीं सकरा मार्ग होने की वजह से यहां जाम की स्थिति निर्मित हो जाती है।

Monday, 21 October 2019

06:02

दिल्ली समाचार उम्र कैद की सजा पाने के बाद फरार हुआ कैदी गिरफ्तार




दिल्ली समाचार

दिल्ली के राजौरी गार्डन इलाके में 1997 के एक हत्या के केस में निचली अदालत से उम्रकैद की सजा पाने के बाद सजा को माफ कराने के लिए आरोपी ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपील की लेकिन जब उसे राहत नहीं मिली और उसकी सजा कोर्ट ने बरकरार रखी इसके बाद वह फरार हो गया कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया लेकिन इतने सालों के बाद आखिर कार वह पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया पुलिस ने उस पर ₹20000 का इनाम भी घोषित कर रखा था उसे दिल्ली के पालम इलाके से गिरफ्तार किया गया है मिली जानकारी के अनुसार दिल्ली की स्पेशल सेल की टीम ने आरोपी जोगिंदर कुमार उम्र 40 को कई सालों के बाद धर दबोचा है उसे पालम इलाके से गिरफ्तार किया गया पुलिस के अनुसार 7 नवंबर 1997 को चार लोगों ने रघुवीर नगर में रहने वाले देवेंद्र और उसके पिता को घर के बाहर ही चाकुओं से गोद दिया था जिनमें इलाज के दौरान देवेंद्र की मौत हो गई थी जिस पर राजौरी गार्डन पुलिस ने हत्या का केस दर्ज कर जोगिंदर कुमार विजय कुमार सूरज इंदौर समीर को गिरफ्तार कर लिया था 22 जनवरी 2001 को तीसहजारी कोर्ट में चारों आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई थी इसके बाद आरोपी पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया था।

Sunday, 20 October 2019

08:33

जानिए कैसे रची गई कमलेश तिवारी की मौत की साजिश और कैसे दिया गया घटना को अंजाम





यूपी के लखनऊ में गत दिवस गला रेत कर मौत की नींद सुला दिए गए प्रखर हिंदुत्ववादी और हिन्दू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी हत्याकांड का खुलासा करने का दावा यूपी के डीजीपी ने किया है।

सूरत में रची गई थी हत्या की साजिश-!*


हिन्दू समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या की साजिश सूरत में ही रची गई थी। लखनऊ के खुर्शेदबाग में इस साजिश में छह लोगों ने अंजाम दिया। इनमें मौलाना मोहसिन शेख, फैजान और रशीद अहमद पठान को गिरफ्तार कर लिया गया है। दो शूटरों की पहचान नहीं हो सकी है। उनके संबंध में पुलिस को कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं।


भड़काऊ बयान बने हत्या का कारण:डीजीपी-!*


पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने शनिवार सुबह हत्याकांड का खुलासा करते हुए दावा किया कि यह हत्या कमलेश के वर्ष 2015 में दिए गए भड़काऊ बयान और प्रखर हिन्दूवादी सोच की वजह से की गई है। कई अन्य बिन्दुओं पर अभी पड़ताल की जा रही है। डीजीपी ने बताया कि घटनास्थल पर बरामद मिठाई के डिब्बे से अहम सुराग मिले। गिरफ्तार तीनों आरोपी सूरत के रहने वाले हैं। इनकी उम्र 21 से 25 वर्ष के बीच है। इनमें मोहसिन शेख साड़ी की दुकान पर और फैजान  जूते की दुकान पर काम करता है। रशीद  दर्जी का काम करता है और कंप्यूटर का अच्छा जानकार है। डीजीपी ने बताया कि इन तीनों ने हत्या की साजिश रची थी।


आतंकी संगठन की साजिश के सबूत नही-!*


डीजीपी ने दावा किया कि इन आरोपियों का अभी तक किसी आतंकी संगठन से संपर्क नहीं मिला है। ये लोग भड़काऊ बयान से ही नाराज थे। मुख्य रूप से राशिद ने ही साजिश रची थी। मौलाना मोहसिन शेख ने राशिद को कमलेश तिवारी का भड़काऊ बयान वाला वीडियो दिखाया था। इसके बाद ही मौलाना ने कहा था कि इसकी हत्या करनी है।


सीसीटीवी फुटेज से मिले हत्याकांड के कई सुराग-!*


लखनऊ पुलिस को सीसीटीवी फुटेज से कई सुराग मिल गए थे। इसमें ही हत्यारों का चेहरा साफ दिख रहा था। वे भगवा वेश में आए थे। उन लोगों के साथ एक फुटेज में महिला भी दिखी थी। महिला का  पता चल गया है। उसका नाम शहनाज बानो है। वह मड़ियांव की रहने वाली है। उसका कहना है कि दोनों ने उससे कालोनी का रास्ता पूछा था। घटनास्थल पर मिले मिठाई के डिब्बे से ही लखनऊ पुलिस को महत्वपूर्ण सुराग मिले। जांच में पता चला कि आरोपी फैजान ने सूरत में मिठाई खरीदी थी।


सूरत के एक युवक पर पुलिस की कड़ी नजर-!*


डीजीपी के मुताबिक जिन दो लोगों को हिरासत में लेकर छोड़ा गया है, उनमें एक आरोपी का भाई गौरव तिवारी है। वह सूरत में ही रहता है। वह पिछले कुछ समय से कमलेश तिवारी के संपर्क में था। उसने ही हिन्दू समाज के लिए सूरत में काम करने को लेकर फोन किया था। उसने कहा था कि वह उसे अपनी पार्टी में शामिल कर ले और सूरत में उसे कोई पद दे दे।


बिजनौर में पुलिस ने मौलाना समेत दो हिरासत में लिया-!*


डीजीपी ने इस बात की पुष्टि की कि कमलेश की पत्नी किरन ने बिजनौर के जिन दो लोगों मौलाना अनवारुल हक और मो. मुफ्ती नईम काजमी पर आरोप लगाया गया था, उन्हें भी हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। इन आरोपियों ने कमलेश की हत्या करने वालों को डेढ़ करोड़ रुपये इनाम देने की बात कही थी।


सीतापुर में किया गया दिवंगत कमलेश तिवारी के शव का अंतिम संस्कार-!*


 सीतापुर के महमूदाबाद में कमलेश तिवारी का शव शनिवार तड़के साढ़े तीन बजे पहुंचा। शव पहुंचने से पहले ही इलाके में भारी फोर्स तैनात कर दी गई। परिवारीजनों ने प्रशासन को यह कहकर हैरत में डाल दिया कि मुख्यमंत्री के आने के बाद ही अंतिम संस्कार किया जाएगा। परिवारीजनों की जिद को देखते हुए कमिश्नर मुकेश मेश्राम और आईजी एसके भगत महमूदाबाद के कोठावां गांव पहुंचे। कमिश्नर ने उचित मुआवजा, एक परिवारीजन को नौकरी देने और रविवार को मुख्यमंत्री से मिलवाने का आश्वासन दिया। तब जाकर परिवारीजन अंतिम संस्कार के लिए राजी हुए। 12 घंटे से अधिक समय तक मान-मनौवल के बाद पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में कमलेश तिवारी का अंतिम संस्कार किया गया।


कमलेश तिवारी की हत्या ने पैदा किये कई सवाल-!*


भले ही कमलेश तिवारी की हत्या का खुलासा पुलिस ने कर दिया हो किन्तु इस हत्याकांड ने कई बडे सवाल पैदा कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि अल्लाह को आधार बनाकर एक समुदाय के नाम पर भले ही अंर्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंसानियत की हत्या कर रहा है? किन्तु कोई अन्य अगर इसका विरिध करेगा तो उसे मौत का सामना करना पड़ेगा?
इसके अलावा एक सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि संविधान और समाज व भाईचारे की घुट्टी पिलाकर आप समुदाय विशेष सम्बन्ध रखने वाले इन आतंकियों के आतंक का विरोध भी नही करेंगे?

आज मिलेंगे परिवार से योगी-!*

आज सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ कमलेश तिवारी के परिवार से मिलेंगे ,जिस पर सब की नजरें टिकी हुई हैं।
08:25

जानिए कितनी है हमारी पृथ्वी की आयु -tap news india

जानिए कितनी है पृथ्वी की आयु 

हाल ही में एक समाचार पत्र में यह समाचार प्रकाशित हुआ था कि विभिन्न प्रकार की खोज और शोध के अनुसार हमारे पृथ्वी की आयु लगभग ४.५ बिलियन वर्ष आँकी गई है... अर्थात ४५४ करोड़ वर्ष.

मजे की बात यह है कि हमारे पुराणों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है. अंग्रेजों ने हमारे पुराणों को Mythology नाम दिया है, जो कि Myth शब्द से तैयार किया गया है. Myth का अर्थ है ‘सत्य प्रतीत होने वाला झूठ’, अर्थात Mythology का अर्थ अंग्रेजों ने निकाला, ‘जो सच नहीं है, वह...’ इसका दूसरा अर्थ यह है कि जो भी पुराणों में लिखा है उसे सच नहीं माना जा सकता. पुराण केवल दादा-दादी की, नाना-नानी की भगवान भक्ति के लिए, भजन-कीर्तन के लिए ठीक हो सकता है. परन्तु वास्तव में उसकी कोई कीमत नहीं है. अंग्रेजों के अनुसार पुराणों में वर्णित बातों को प्रमाण नहीं माना जा सकता. उनका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है.

अब विष्णुपुराण के तीसरे अध्याय में स्थित इस श्लोक को देखिये –

‘काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम ।
काष्ठात्रिंशत्कला त्रिंशत्कला मौहूर्तिको विधिः ॥ १,३.८ ॥
तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम् ।
अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ १,३.९ ॥
तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे ।
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम् ॥ १,३.१० ॥
दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् ।
चतुर्युगं द्वादशभिस्तद्विभागं निबोद मे ॥ १,३.११ ॥
चत्वारित्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ।
द्विव्याब्दानां सहस्राणि युगोष्वाहुः पुराविदः ॥ १,३.१२ ॥
तत्प्रमाणैः शतैः संध्या पूर्वा तत्राभिधीयते ।
सन्ध्यांशश्चैव तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि सः ॥ १,३.१३ ॥
सन्ध्यासंध्यांशयोरन्तर्यः कालो मुनिसत्तम ।
युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतत्रेतादिसंज्ञितः ॥ १,३.१४ ॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ।
प्रोच्यते तत्सहस्रं व ब्रह्मणां दिवसं मुने ॥ १,३.१५ ॥

महाभारत में भी इस कालगणना का वर्णन किया गया है –

जानिए कितनी है पृथ्वी की आयु 

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव
त्रिंशत्तु काष्ठा गणयेत्कलां ताम्।
त्रिंशत्कलश्चापि भवेन्मुहूर्तो
भागः कलाया दशमश्च यः स्यात्।।
त्रिंशन्मुहूर्तं तु भवेदहश्च
रात्रिश्च सङ्ख्या मुनिभिः प्रणीता।
मासः स्मृतो रात्र्यहनी च त्रिंशु
त्संवत्सरो द्वादशमास उक्तः।।
- महाभारत, वां अध्याय (शांतिपर्व), २३८ वां सर्ग

इसके अनुसार –
१५ निमिष (पलक खुलने-झपकने का समय)  १ कष्ट
३० कष्ट  १ कला
३० कला  १ मुहूर्त
३० मुहूर्त  १ दिन / रात्रि
३० दिवस/रात्रि  १ महीना (मास)
६ महीने  १ अयन
२ अयन  १ मानवी वर्ष
३६० मानवी वर्ष  १ देवी वर्ष
१२,००० दैवी वर्ष  ४ युग
 ४३,२०,००० मानवी वर्ष
 १ चौकड़ी
७२ चौकडियाँ (चतुर्युग)  ३१ कोटि १० लाख ४० हजार वर्ष
 १ मन्वंतर
इस प्रकार जब १४ मन्वंतर हो जाते हैं तब वह ब्रह्मदेव का एक दिवस होता है.
१४ मन्वंतर  ४३५.४५ करोड़ मानवी वर्ष
 ब्रह्मदेव का १ दिवस
ब्रम्हदेव का दिवस/रात्रि  ८७०.९१ कोटि मानवी वर्ष
(सृष्टि का आरम्भ / अंत)

अभी चौदह में से सातवाँ वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है. इसका अट्ठाईसवाँ युग ही कलियुग है. अर्थात – ४३५.४५ करोड़ + २८ युग (३ करोड़ २ लाख वर्ष) = ४३८.६५ करोड़ वर्ष.

दूसरी मजे की बात यह है कि अथर्ववेद में भी सृष्टि की आयु के बारे में एक श्लोक है –
शतं ते युतंहायानान्द्वे युगे त्रीणी चत्वारि || अथर्ववेद ८.२.२१||

जानिए कितनी है पृथ्वी की आयु 

इस श्लोक की गणना के अनुसार सृष्टि की आयु है – ४३२ करोड़ वर्ष

कहने का अर्थ ये है कि *अंग्रेजों द्वारा हमारे जिन पुराणों को ‘सत्य लगने वाला झूठ’ कहकर प्रचारित किया गया है, उन पुराणों के अनुसार सृष्टि का निर्माण काल ४३८.६५ करोड़ वर्ष है. और कथित आधुनिकतम विज्ञान द्वारा एकदम सटीक और तमाम प्रयोगों के बाद सृष्टि का उदगम ४५४ करोड़ वर्ष पहले हुआ है. इसका अर्थ साफ़ है कि हमारे पुराण भी आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रयोगों के बाद घोषित किए गए निरीक्षणों के एकदम पास हैं.* कुछ हजार वर्ष पूर्व, जब आज की तरह आधुनिक वैज्ञानिक साधन नहीं थे, तब हमारे पूर्वजों ने पृथ्वी के उद्गम संबंधी यह सटीक गणना एवं आँकड़े कैसे प्राप्त किए होंगे...?

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हमारे स्कूलों में आज भी बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि ‘निकोलस कोपर्निकस’ (१४७३-१५४३) नामक पोलैंड के एक खगोलशास्त्री ने सर्वप्रथम दुनिया को यह बताया कि ‘सूर्य हमारे अंतरिक्ष एवं ग्रह परिवार का केंद्रबिंदु है तथा पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है..’. हम इतने निकम्मे निकले कि यही जानकारी वर्षों से बच्चों को आगे पढ़ाए जा रहे हैं. *इस कोपर्निकस नामक वैज्ञानिक से लगभग ढाई-तीन हजार वर्ष पहले पाराशर ऋषि ने विष्णुपुराण की रचना की हुई है.* इस विष्णुपुराण के आठवें अध्याय का पन्द्रहवां श्लोक है –

नैवास्तमनमर्कस्यनोदमः सर्वतासतः |
उदयास्तमनाख्यन्ही दर्शनादर्शन रवे II

अर्थात, ‘यदि वास्तविकता से कहा जाए तो सूर्य का उदय एवं अस्त होने का अर्थ सूर्य का अस्तित्त्व होना या समाप्त होना नहीं है, क्योंकि सूर्य तो सदैव वहीं पर स्थित है’.*

इसी प्रकार एकदम स्पष्टता के साथ सूर्य, पृथ्वी, चन्द्र, ग्रह-गोल-तारे इन सभी के बारे में हमारे पूर्वजों को जानकारी थी. और यह जानकारी सभी को थी. फिर भी किसी के मन में यह भावना नहीं थी कि उसे कोई बहुत ही विशिष्ट जानकारी है.

अर्थात जिस समय प्रसिद्ध पश्चिमी वैज्ञानिक टोलेमी (Ptolemy AD100 to AD 170) यह सिद्धांत प्रतिपादित कर रहा था कि, ‘पृथ्वी स्थिर होती है और सूर्य उसके चारों तरफ चक्कर लगाता है’, और पश्चिमी जगत इस वैज्ञानिक का समर्थन भी कर रहा था, उस कालखंड में आर्यभट्ट अत्यंत आत्मविश्वास के साथ अपना प्राचीन ज्ञान प्रतिपादित कर रहे थे, जिसके अनुसार –

अनुलोमगतिनरस्थ: पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।
अचलानि भानि तदवत्समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥
उदयास्तमयनिमित्तं नित्यं प्रवहेण वायुना क्षिप्त:।
लङ्कासमपश्चिमगो भपञ्जर: सग्रहो भ्रमति॥
- (आर्यभटीय ४.९ से ४.१० श्लोक)

इस श्लोक का अर्थ है कि, ‘जिस प्रकार अनुलोम (गति से आगे जाने वाला) एवं नाव में बैठा हुआ मनुष्य, अचल किनारे को विलोम (पीछे जाते हुए) देखता है, उसी प्रकार लंका में अचल यानी स्थिर तारे हमें पश्चिम दिशा में जाते हुए दिखाई देते हैं..’

कितने स्पष्ट शब्दों में समझाया गया है... लंका का सन्दर्भ यह है कि ग्रीनविच रेखा के निर्धारण से पहले भारतीयों के अक्षांश-रेखांश तय किए हुए थे एवं उसमें विषुवत रेखा लंका से होकर गुजरती थी.

आगे चलकर तेरहवीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर (१२७५-१२९६) ने एकदम सहज स्वरूप में यह लिखा, कि –

 अथवा नावे हन जो रिगे | तो थडियेचे रुख जातां देखे वेंगे |
 तेची साचोकारें जों पाहों लागे |
तंव रुख म्हणे अचल||
-  श्री ज्ञानेश्वरी ४-९७
तथा...
उदो अस्ताचेनी प्रमाणे, जैसे न चलता सूर्याचे चालण|
तैसे नैष्कर्म्यत्व जाणे, कर्मीचिअसतां||
_-  श्री ज्ञानेश्वरी ४-९९_

यह पंक्तियाँ आर्यभट्ट द्वारा दिए गए उदाहरणों का सरल-सरल प्राकृत भाषा में किया गया अर्थ है. इसी का दूसरा अर्थ यह है कि, *मुस्लिम आक्रांताओं के भारत में आने से पहले जो शिक्षा पद्धति हमारे देश में चल रही थी, उस शिक्षा प्रणाली में यह जानकारी अंतर्भूत होती थी. उस कालखंड में खगोलशास्त्र के ‘बेसिक सिद्धांत’ विद्यार्थियों को निश्चित ही पता थे. इसीलिए संत ज्ञानेश्वर भी एकदम सहज भाषा में यह सिद्धांत लिख जाते हैं.*

इसका एक और अर्थ यह भी है कि *जो ज्ञान हम भारतीयों को इतनी सरलता से, और हजारों वर्षों पहले से था, वही ज्ञान पंद्रहवीं शताब्दी में कोपर्निकस ने दुनिया के सामने रखा. दुनिया ने भी इस कथित शोध को ऐसे स्वीकार कर लिया, मानो ‘कोपर्निकस ने बहुत महत्त्वपूर्ण शोध किया हो’.* इसी के साथ भारत में भी कई पीढ़ियों तक, सूर्य-पृथ्वी के सम्बन्ध में यह खोज कोपर्निकस ने ही की, ऐसा पढ़ने लगे, पढ़ाने लगे...!

कितना बड़ा दुर्भाग्य है हमारा..!

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जैसे यह बात सूर्य के स्थिर केन्द्रीय स्थान के बारे में है वैसे ही सूर्य प्रकाश की गति के बारे में भी मौजूद है.

आज हम तीसरी-चौथी के बच्चों को पढ़ाते हैं कि, प्रकाश की गति की खोज, डेनमार्क के खगोलशास्त्री ओले रोमर (Olaus Roemer) ने सन १६७६ में, अर्थात महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के राज्यारोहण के दो वर्ष बाद, की... कहा जाए तो एकदम हाल ही में. परन्तु वास्तविक स्थिति क्या है…?

यूनेस्को की अधिकृत रिपोर्ट में कहा गया है कि इस संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है, जो कि ईसा से लगभग पाँच-छः हजार वर्ष पूर्व लिखा गया था. इस ऋग्वेद के पहले मंडल में, पचासवें सूक्त की चौथे श्लोक में क्या कहा गया है –

 तरणीर्विश्वदर्शतो तरणीर्विश्वदर्शतो ज्योतिषकृदसी सूर्य |
 विश्वमा भासि रोचनम || ऋग्वेद १.५०.४

अर्थात, हे सूर्य प्रकाश, तुम गति से भरे हो (तीव्रगामी), तुम सभी को दिखाई देते हो, तुम प्रकाश का स्रोत हो.. तुम सारे संसार को प्रकाशमान करते हो.

आगे चलकर चौदहवीं शताब्दी में, विजयनगर साम्राज्य के सायणाचार्य (१३३५-१३८७) नामक ऋषि ने ऋग्वेद के इस श्लोक की मीमांसा करते हुए लिखा है कि –

 तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च
 योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममान नमोस्तुऽते || (सायण ऋग्वेद भाष्य १.५०.४)

अर्थात-

प्रकाश द्वारा तय की गई दूरी  २२०२ योजन (द्वे द्वे शते द्वे)
१ योजन  ९ मील ११० यार्ड्स
 ९.०६२५ मील
अर्थात प्रकाश की दूरी  ९.०६२५ X २२०२
 =  २१,१४४.७०५ मील
पृथ्वी तक पहुँचने के लिए लिया गया समय  आधा निमिष = १/८.७५
 = ०.११४२८ सेकण्ड
अर्थात प्रकाश का वेग  १८५,०२५.८१३ मील/सेकण्ड
आधुनिक विज्ञान द्वारा तय किया गया प्रकाश वेग - 
१८६,२८२.३९७ मील / सेकण्ड

*ध्यान देने योग्य बात यह है कि डेनिश वैज्ञानिक ओले रोमर से पाँच हजार वर्ष पहले हमारे ऋग्वेद में सूर्य प्रकाश की गति के बारे में स्पष्ट उल्लेख है.* इस सन्दर्भ में कुछ और सूत्र भी होंगे, परन्तु आज वे उपलब्ध नहीं हैं. *आज हमारे पास सायणाचार्य द्वारा ऋग्वेद मीमांसा के रूप में लिखित शक्तिशाली सबूत है. यह भी ओले रोमर से तीन सौ वर्ष पहले लिखा गया है.* परन्तु फिर भी हम पीढ़ी दर पीढ़ी बच्चों को पढ़ाते आ रहे हैं कि प्रकाश की गति की खोज यूरोपियन वैज्ञानिक ओले रोमर ने की.

ऐसा हम और भी न जाने कितने तथ्यों के बारे में कहते रहेंगे..

जानिए कितनी है पृथ्वी की आयु 


ग्रहण की संकल्पना बेहद प्राचीन है. चीनी वैज्ञानिकों ने २६०० वर्षों में कुल ९०० सूर्यग्रहण और ६०० चंद्रगहण होने का दावा किया. परन्तु यह ग्रहण क्यों हुए, इस बारे में कोई नहीं बता पाया. जबकि पाँचवीं शताब्दी में आर्यभट्ट ने एकदम स्पष्ट शब्दों में बताया हुआ है कि –

 छादयती शशी सूर्य शशिनं महती च भूच्छाया ||३७||
-  (गोलपाद, आर्यभटीय)

अर्थात, ‘पृथ्वी की छाया जब चंद्रमा को ढंकती है तब चंद्रगहण होता है.’ आठ हजार वर्षों पूर्व ऋग्वेद में चन्द्र को इंगित करके लिखा जा चुका है कि –

ॐ आयं गौ : पृश्निरक्रमीद सदन्नमातरं पुर : पितरञ्च प्रयन्त्स्व :
ॐ भू : गौतमाय नम : । गौतमायावाहयामि स्थापयामि । ४३

अर्थात चन्द्र, जो कि पृथ्वी का उपग्रह है, यह अपने मातृग्रह (अर्थात पृथ्वी) के चारों ओर घूमता है, और यह मातृग्रह, उसके (यानी पृथ्वी के) प्रकाशमान पितृ ग्रह के चारों तरफ घूमता है.

इससे अधिक स्पष्ट और क्या चाहिए? ध्यान दें कि *आज से लगभग आठ हजार वर्ष पहले हमारे पूर्वजों को यह मालूम था कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ, तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है. इसके हजारों वर्षों के बाद ही, बाकी संसार को, विशेषकर पश्चिमी सभ्यता को यह ज्ञान प्राप्त हुआ.*

इसमें महत्त्वपूर्ण बात ये है कि हमारे देश में यह ज्ञान हजारों वर्षों से उपलब्ध था, इसलिए यह बातें हमें पता हैं, फिर भी हमारे ऋषियों / विद्वानों में ऐसा भाव कभी नहीं था कि उनके पास बहुत बड़ा ज्ञान का भण्डार है. इसी कारण संत ज्ञानेश्वर महाराज अथवा गोस्वामी तुलसीदास जैसे विद्वान ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारी बेहद सरल शब्दों में लिख जाते हैं...!

के सी शर्मा 

Saturday, 19 October 2019

03:05

दुबई से जुड़े हैं कमलेश तिवारी हत्याकांड के तार

कमलेश तिवारी की हत्या भले ही लखनऊ में हुई हो लेकिन इसकी साजिश दुबई में रची गई थी। गुजरात एटीएस ने दावा किया है कि कमलेश तिवारी की हत्या के लिए सूरत से पिस्टल खरीदी गई थी।

वहीं साजिश रचने के बाद एक शख्स दो महीने पहले ही दुबई से भारत कमलेश तिवारी की हत्या के लिए आया। गुजरात एटीएस ने बताया कि कमलेश तिवारी की हत्या के लिए दुबई से आए शख्स ने दो लोगों को तैयार किया। सूरत से मिठाई खरीदने वाले दोनों ही शूटर थे। शुक्रवार को कमलेश तिवारी की लखनऊ में गला रेतकर हत्या कर दी गई थी।

इससे पहले शनिवार सुबह इस मामले में गुजरात के सूरत में पुलिस ने छह लोगों को हिरासत में लिया। हिरासत में लिए गए लोगों में इस हत्याकांड में एक की भूमिका संदिग्ध होने की बात कही जा रही है। इन सभी को गुजरात एटीएस ने हिरासत में लिया और वो यूपी पुलिस और एसआईटी से लगातार संपर्क में है।

वहीं शुक्रवार को हुई कमलेश तिवारी की हत्या मामले की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एसआईटी गठित की है। इस टीम में लखनऊ के आईजी एस के भगत, एसपी क्राइम लखनऊ दिनेश पुरी और स्पेशल टास्क फोर्स के डिप्टी एसपी पीके मिश्रा होंगे।