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Tuesday, 7 April 2020

08:20

7 अप्रैल 1857 की अप्रतिम योद्धा बेगम हजरत महल जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा




1857 के स्वाधीनता संग्राम में जो महिलाएं पुरुषों से भी अधिक सक्रिय रहीं, उनमें बेगम हजरत महल का नाम उल्लेखनीय है। मुगलों के कमजोर होने पर कई छोटी रियासतें स्वतन्त्र हो गयीं। अवध भी उनमें से एक थी। श्रीराम के भाई लक्ष्मण के नाम पर बसा लखनऊ नगर अवध की राजधानी था।

हजरत महल वस्तुतः फैजाबाद की एक नर्तकी थी, जिसे विलासी नवाब अपनी बेगमों की सेवा के लिए लाया था; पर फिर वह उसके प्रति भी अनुरक्त हो गया। हजरत महल ने अपनी योग्यता से धीरे-धीरे सब बेगमों में अग्रणी स्थान प्राप्त कर लिया। वह राजकाज के बारे में नवाब को सदा ठीक सलाह देती थी। पुत्रजन्म के बाद नवाब ने उसे ‘महल’ का सम्मान दिया।

वाजिदअली शाह संगीत, काव्य, नृत्य और शतरंज का प्रेमी था। 1847 में गद्दी पाकर उसने अपने पूर्वजों द्वारा की गयी सन्धि के अनुसार रियासत का कामकाज अंग्रेजों को दे दिया। अंग्रेजों ने रियासत को पूरी तरह हड़पने के लिए कायर और विलासी नवाब से 1854 में एक नयी सन्धि करनी चाही। हजरत महल के सुझाव पर नवाब ने इसे अस्वीकार कर दिया।

इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने नवाब को बन्दी बनाकर कोलकाता भेज दिया। इससे क्रुद्ध होकर हजरत महल ने अपने 12 वर्षीय पुत्र बिरजिस कद्र को नवाब घोषित कर दिया तथा रियासत के सभी नागरिकों को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ दिया।

अंग्रेजों ने नवाब की सेना को भंग कर दिया था। वे सब सैनिक भी बेगम से आ मिले। बेगम स्वयं हाथी पर बैठकर युद्धक्षेत्र में जाती थी। अंततः पांच जुलाई, 1857 को अंग्रेजों के चंगुल से लखनऊ को मुक्त करा लिया गया। अब वाजिद अली शाह भी लखनऊ आ गये।

इसके बाद बेगम ने राजा बालकृष्ण राव को अपना महामंत्री घोषित कर शासन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिये। उन्होंने दिल्ली में बहादुरशाह जफर को यह सब सूचना देते हुए स्वाधीनता संग्राम में पूर्ण सहयोग का वचन दिया। उन्होंने खजाने का मुंह खोलकर सैनिकों को वेतन दिया तथा महिलाओं की ‘मुक्ति सेना’ का गठन कर उसके नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था की।

एक कुशल प्रशासक होने के नाते उनकी ख्याति सब ओर फैल गयी। अवध के आसपास के हिन्दू राजा और मुसलमान नवाब उनके साथ संगठित होने लगे। वे सब मिलकर पूरे क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के लिए प्रयास करने लगेे; पर दूसरी ओर नवाब की अन्य बेगमें तथा अंग्रेजों के पिट्ठू कर्मचारी मन ही मन जल रहे थे। वे भारतीय पक्ष की योजनाएं अंग्रेजों तक पहुंचाने लगे।

इससे बेगम तथा उसकी सेनाएं पराजित होने लगीं। प्रधानमंत्री बालकृष्ण राव मारे गये तथा सेनापति अहमदशाह बुरी तरह घायल हो गये। इधर दिल्ली और कानपुर के मोर्चे पर भी अंग्रेजों को सफलता मिली। इससे सैनिक हताश हो गये और अंततः बेगम को लखनऊ छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद कई राजाओं तथा नवाबों ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। वे उनसे निश्चित भत्ते पाकर सुख-सुविधा का जीवन जीने लगे; पर बेगम को यह स्वीकार नहीं था। वे अपने पुत्र के साथ नेपाल चली गयीं। वहां पर ही अनाम जीवन जीते हुए सात अप्रैल, 1879 को उनका देहांत हुआ। लखनऊ का मुख्य बाजार हजरत गंज तथा हजरत महल पार्क उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाये है।

Saturday, 4 April 2020

05:00

4 अप्रैल एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी जी के जन्मदिन पर विशेष-के सी शर्मा



श्री माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अपै्रल, 1889 को ग्राम बाबई, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में श्री नन्दलाल एवं श्रीमती सुन्दराबाई के घर में हुआ था। उन पर अपनी माँ और घर के वैष्णव वातावरण का बहुत असर था। वे बहुत बुद्धिमान भी थे। एक बार सुनने पर ही कोई पाठ उन्हें याद हो जाता था। चैदह वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। इस समय तक वे ‘एक भारतीय आत्मा’ के नाम से कविताएँ व नाटक लिखने लगे थे।

1906 में कांग्रेस के कोलकाता में सम्पन्न हुए अधिवेशन में माखनलाल जी ने पहली बार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के दर्शन किये। अपने तरुण साथियों के साथ उनकी सुरक्षा करते हुए वे प्रयाग तक गये। तिलक जी के माध्यम से वे क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आये। महाराष्ट्र के क्रान्तिवीर सखाराम गणेश देउस्कर से दीक्षा लेकर उन्होंने अपने रक्त से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किये। फिर उन्होंने पिस्तौल चलाना भी सीखा।

इसके बाद उनका रुझान पत्रकारिता की ओर हो गया। उन्होंने अनेक हिन्दी और मराठी के पत्रों में सम्पादन एवं लेखन का कार्य किया। इनमें कर्मवीर, प्रभा और गणेशशंकर विद्यार्थी द्वारा कानपुर से प्रकाशित समाचार पत्र प्रताप प्रमुख हैं। वे श्रीगोपाल, भारत सन्तान, भारतीय, पशुपति, एक विद्यार्थी, एक भारतीय आत्मा आदि अनेक नामों से लिखते थे। खंडवा से उन्होंने ‘कर्मवीर’ साप्ताहिक निकाला, जिसकी अपनी धाक थी।

1915 में उनकी पत्नी का देहान्त हो गया। मित्रों एवं रिश्तेदारों के आग्रह पर भी उन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया। अब वे सक्रिय रूप से राजनीति में कूद पड़े और गान्धी जी के भक्त बन गये। गांधी जी द्वारा 1920, 1930 और 1940 में किये गये तीन बड़े आन्दोलनों में माखनलाल जी पूरी तरह उनके साथ रहे।

गांधी जी के अतिरिक्त उन पर स्वामी रामतीर्थ, विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस आदि सामाजिक व आध्यात्मिक महापुरुषों का बहुत प्रभाव था। उनके ग्रन्थालय में अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान आदि अनेक विषयों की पुस्तकों की भरमार थी। खंडवा (मध्य प्रदेश) में रहकर उन्होंने अपनी पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाजसेवा का आलोक चहुँदिश फैलाया।

माखनलाल जी को सन्तों की कविताएँ बहुत पसन्द थीं। निमाड़ के सन्त सिंगाजी से लेकर निर्गुण और सगुण सभी तरह के भक्त कवियों और सूफियों की रचनाएँ उन्हें प्रिय थीं। वे पृथ्वी को अपनी माता और आकाश को अपने घर की छत मानते थे। विन्ध्याचल की पर्वतशृंखलाएँ एवं नर्मदा का प्रवाह उनके मन में काव्य की उमंग जगा देता था। इसलिए उनके साहित्य में बार-बार पर्वत, जंगल, नदी, वर्षा जैसे प्राकृतिक दृश्य दिखायी देते हैं।

माखनलाल जी के साहित्य में देशप्रेम की भावना की सुगन्ध भी भरपूर मात्रा में दिखायी देती है। ‘एक फूल की चाह’ उनकी प्रसिद्ध कविता है -

मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फंेक।
मातृभूमि हित शीश चढ़ाने, जिस पथ जायें वीर अनेेक।।

गांधी जी के अनन्य भक्त होने के कारण उन पर माखनलाल जी ने बहुत सी कविताएँ एवं निबन्ध लिखे हैं। लोकमान्य तिलक एवं जवाहरलाल नेहरु पर भी उन्होंने प्रचुर साहित्य की रचना की है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत में उन्हें राष्ट्रकवि एवं पद्मभूषण के सम्मान से विभूषित किया गया।

माखनलाल चतुर्वेदी ने हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में नये प्रतिमान स्थापित किये। 30 जनवरी, 1968 को उनका देहान्त हुआ।

Friday, 27 March 2020

08:34

27 मार्च सिन्ध में संघ कार्य के प्रणेता राजपाल पुरी जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



27 मार्च
सिन्ध में संघ कार्य के प्रणेता राजपाल पुरी जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

श्री राजपाल पुरी का जन्म 18 अगस्त, 1919 को स्यालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में एक वकील श्री बिशम्भर नाथ एवं श्रीमती बिन्द्रा देवी के घर में हुआ था। उनका घर हकीकत राय की समाधि के सामने था। पढ़ाई में वे सदा प्रथम श्रेणी तथा छात्रवृत्ति पाते रहे। 1929 में उनके पिताजी का निधन हो गया।

1937 में उत्तर पंजाब के प्रांत प्रचारक श्री के.डी.जोशी के सम्पर्क में आकर वे स्वयंसेवक बने। 1938 तथा 39 में उन्होंने नागपुर से प्रथम व द्वितीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। 1939 में पंजाब वि.वि. से बी.ए. करते ही उन्हें दिल्ली में रक्षा विभाग में नौकरी मिल गयी; पर एक महीने बाद त्यागपत्र देकर वे संघ कार्य के लिए हैदराबाद पहुंच गये। वहां हिन्दू महासभा के नेता श्री धर्मदास बेलाराम ने उनके रहने का प्रबंध किया। घर की जिम्मेदारी होने से वे वहां एक विद्यालय में पढ़ाने लगे; पर छोटे भाई संतोष की नौकरी लगते ही पढ़ाना छोड़कर वे पूरी तरह संघ के काम में लग गये।

नागपुर में हुए 1940 के संघ शिक्षा वर्ग में सिन्ध से छह स्वयंसेवक गये। राजपाल जी ने भी तभी अपना तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण पूरा किया। 1945 में वे सिन्ध के प्रांत प्रचारक बने। उन्हें सब ‘श्रीजी’ कहकर बुलाते थे। सिन्ध में हिन्दू केवल 13 लाख थे। विभाजन की तलवार सिर पर लटकी थी। मुसलमानों के अत्याचार बढ़ रहे थे। कई गांव और कस्बों में हिन्दू केवल दो-तीन प्रतिशत ही थे; पर शाखाओं के कारण हिन्दुओं में भारी जागृति आयी।

राजपाल जी के प्रयास से बैरिस्टर खानचंद गोपालदास कराची के तथा बैरिस्टर होतचंद गोपालदास अडवानी हैदराबाद के संघचालक बने। एक बार श्री अडवानी एक बम कांड में पकड़े गये। सरसंघचालक श्री गुरुजी तथा राजपाल जी के प्रयास से वे रिहा हुए। 1942 में संघ कार्यालय, हैदराबाद पर छापा मारकर पुलिस ने राजपाल जी तथा दो अन्य को पकड़ लिया। ऐसे में बैरिस्टर अडवानी ने मार्शल लॉ प्रशासक से मिलकर उन्हें रिहा कराया।

मार्च 1947 में राजपाल जी ने पूरे प्रान्त में हिन्दू जनगणना की। इससे 1947 में हिन्दुओं की रक्षा में बड़ा लाभ हुआ। उन्होंने ‘पंजाब सहायता समिति’ बनाकर पांच लाख रु. एकत्र किये तथा शस्त्रों के संग्रह, निर्माण व प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया। विभाजन के बाद जोधपुर को केन्द्र बनाकर उन्होंने सिन्ध से आये हिन्दुओं के पुनर्वास का काम किया। 1948 के प्रतिबंध काल में संघ का संविधान बनाने में उन्होंने दीनदयाल जी तथा एकनाथ जी का साथ दिया। प्रतिबंध समाप्ति के बाद वे गुजरात और फिर महाराष्ट्र के प्रांत प्रचारक बनाये गये।

1952 में छोटे भाई की असामयिक मृत्यु से वृद्ध मां की जिम्मेदारी फिर उन पर आ गयी। अतः 1954 में उन्होंने विवाह कर लिया। इससे पूर्व 1953 में उन्होंने ‘मुंबई हाइकोर्ट बार काउंसिल’ की परीक्षा दी। वहां भी प्रथम श्रेणी तथा प्रथम स्थान पाने पर उन्हें ‘सर चिमनलाल सीतलवाड़ पदक’ मिला। वकालत के साथ वे विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, विवेकानंद शिला स्मारक, फ्रेंडस ऑफ इंडिया सोसायटी आदि में सक्रिय रहे।

वे उद्योग कानूनों के विशेषज्ञ थे। उन्होंने विश्व मजदूर संघ (आई.एल.ओ) के जेनेवा अधिवेशन में भी भाग लिया था।आपातकाल में उनके वारंट थे; पर वे विदेश चले गये और वहीं जनजागरण करते रहे। मार्च 1977 में वे लौटे; पर कुछ ही दिन बाद 27 मार्च, 1977 को हुए भीषण हृदयाघात से उनका निधन हो गया।

राजपाल जी हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, सिन्धी, मराठी, गुजराती आदि कई भाषाएं जानते थे। सिन्ध में उनके आठ वर्ष के कार्यकाल में बलूचिस्थान तक शाखाओं का विस्तार हुआ। लगभग 75 युवक प्रचारक भी बने। पांच अगस्त, 1947 को कराची में सरसंघचालक श्री गुरुजी की सभा में दस हजार गणवेशधारी स्वयंसेवक तथा एक लाख हिन्दू आये। सिन्ध आज भारत में नहीं है; पर वहां से सुरक्षित भारत आये सभी हिन्दू राजपाल जी को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।

Wednesday, 25 March 2020

07:40

विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन RSS राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ केशब वलीरामहेडगेवार के जन्म दिवस पर विशेष- के सी शर्मा



विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। आज उनके बताए मार्ग पर करोड़ों स्वयंसेवक चल रहे हैं और समाज-जीवन के प्राय: हर क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं

गहराई से विचार करने पर ऐसा लगता है मानो भगवान ने हमारे देश और हमारे हिन्दू समाज पर विशेष उपकार करते हुए केशव को भेजा था। यह भी मानना पड़ेगा कि कालान्तर में पूरे अस्तित्व का ही पोषण हो, ऐसी व्यवस्था बन रही है। ऐसा कोई कारण नहीं दिखाई देता कि बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि या परिस्थिति-जन्य प्रतिक्रिया के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाला एक छोटा बालक एक विशेष तर्क से मिठाई-मुफ्त में प्राप्त मिठाई- को फेंक दे या तमाशा देखने की आयु में उसी तर्क से आतिशबाजी देखने से मना कर दे, साथियों या बड़े भाई के कहने पर भी। अभी किशोरावस्था में ही थे। रिश्तेदारी में यवतमाल गए। हमउम्र साथियों को लेकर मालरोड पर गिल्ली डंडा खेलने चले गए। मालरोड पर इसलिए कि वह सड़क अंग्रेजों ने अपने लिए आरक्षित कर रखी थी। किशोर केशव का कहना था कि हमारे देश की सड़क अंग्रेजों की कैसे हो गई। अभी खेल प्रारम्भ ही हुआ था कि अंग्रेज साहब बहादुर की सवारी आ गई तो पहले अहलकार ने गिल्ली डंडा खेलने वालों को वहां से हटाने की कोशिश की। अभी कुछ तर्क-वितर्क चल ही रहा था कि सवारी निकट आने पर इन बालकों को साहब बहादुर से सलाम करने को कहा गया तो केशव बोल पड़े, ‘‘मैं तो राजधानी नागपुर से आया हूं। वहां बिना जान-पहचान के नमस्ते करने का रिवाज नहीं है, यदि यहां का रिवाज ऐसा हो तो ये साहब बहादुर ही हम लोगों को सलाम करें।’’

हाईस्कूल में पढ़ते हुए ही अपने विद्यालय में वन्दे भारत आन्दोलन का आयोजन करना, स्कूल से निकाला जाना, अन्यत्र जाकर नए स्कूल में दाखिला, पर वहां भी स्कूल बंदी। जैसे-तैसे हाईस्कूल पास करना, कलकत्ता जाकर मेडिकल की पढ़ाई, क्रांतिकारी गतिविधि- ये सभी कोई मामूली घटनाएं नहीं हैं। हाईस्कूल के होते हुए ही विजयादशमी पर उग्र भाषण में अंग्रेजों को रावण का राक्षस कुल का बताना, इतनी कम उम्र में भी गुप्तचर विभाग की निगाह में आना, सभी बातें मानो ईश्वर द्वारा प्रायोजित थीं।
डॉ. हेडगेवार देखने में अति सामान्य, अन्य साधारण लोगों के समान ही लगते थे। बाबा साहेब आप्टे ने बताया कि उन्होंने भी अपने बड़प्पन या महानता को हमारे ऊपर प्रगट नहीं होने दिया, बल्कि वे हमेशा हमें हमारे बीच के ही लगते थे। न कभी पद या प्रतिष्ठा की चाह, न कभी पैसे के प्रति कोई आकर्षण, स्वयं स्वीकृत दरिद्रता का जीवन, पर शत शत नमन!

कल्पना करें 30-31 वर्ष का युवक नागपुर के कांग्रेस महाधिवेशन के स्वयंसेवक दल का प्रमुख, तिलक जी की असामयिक मृत्यु के कारण अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए महर्षि अरविंद घोष को मनाने के लिए गए डॉ. मुंजे के साथी, अधिवेशन की विषय समिति के सामने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखने का उपक्रम, यह थी डॉ. हेडगेवार।की कांग्रेस, जो आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभा रही थी, 9 वर्ष बाद ही पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित कर सकी।
स्वतंत्रता आन्दोलन के हर प्रयास में वे पूरी तरह से सम्मिलित थे। कई बार सभी बातों से सहमत नहीं भी होते थे। उन्हें सबसे पहले एक वर्ष का सश्रम कारावास मिला था। उनके किसी भाषण को देशद्र्रोहपूर्ण ठहराकर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। कांग्रेस की नीति थी कि मुकदमे की पैरवी न की जाए, पर डॉ. केशव ने न्यायालय में अपना बयान देने का निश्चय किया। न्यायधीश का कहना था कि न्यायालय में दिया गया इनका बयान मूल भाषण से कई गुना उग्र और देशद्र्रोहितापूर्ण है। एक वर्ष बाद जेल से छूटकर आए तो उनके स्वागत में नागपुर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कांग्रेस के शीर्ष नेता उपस्थित होकर डॉक्टर जी की महिमा का गुणगान कर रहे थे। नाम ही बताना हो तो हकीम अजमल खां, जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरु, सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल, डॉ. अंसारी और राजगोपालाचारी आदि। दूसरी बार भी वे कांग्रेस के ही आन्दोलन में 1931 में जेल गए। यह आन्दोलन था सविनय अवज्ञा आन्दोलन।

यद्यपि 1925 में संघ की स्थापना हो चुकी थी, ताकि देश के लिए आवश्यक एवं शक्तिशाली समाज की स्थाई व्यवस्था बन सके, तो भी डॉक्टर जी ने संघ के अपने दायित्व को किसी दूसरे कार्यकर्ता को सौंपकर सत्याग्रह कर जेल जाने का निश्चय किया। इस बार की जेल यात्रा का लाभ संघ के विस्तार को भी मिला, क्योंकि जेल में अनेक सक्रिय भावनाशील देशभक्तों से डॉक्टर जी की मित्रता बन गई। डॉक्टर जी की क्रान्तिकारी गतिविधियों की जानकारी मिलना तो अब लगभग असंभव है-क्योंकि वे इतने कुशल थे कि उनकी हर गतिविधि गोपनीय ही रही। पर क्रान्तिकारी, कांग्रेस या फिर संघ की गतिविधियों से उनकी महत्ता को सहज ही समझा जा सकता है। संघ यानी एक विचार ही नहीं, बल्कि एक अत्यन्त सफल कार्य पद्धति देकर डॉक्टर जी ने भगवान के धर्म स्थापना के कार्य की स्थाई व्यवस्था ही की है। बड़ी संख्या में उनकी तरह सोचने वाले लोगों का संच लगातार खड़ा होता रहे-ऐसी अद्भुत व्यवस्था। इतना ही नहीं इस विश्व कल्याण के विचार के लिए, धर्म की स्थापना के लिए संकल्प को लेकर अपने जीवन को होम करने वाले, उनके पद्चिन्हों पर लगातार चलने वाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की स्थाई व्यवस्था उनके द्वारा हुई।
हिन्दू जीवन मूल्य विश्व के कल्याण की गारंटी है-यह तो स्वयं प्रमाणित है-बस इनकी स्थापना के लिए देव दुर्लभ कार्यकर्ताओं की एक टोली चाहिए थी-जिसकी व्यवस्था डॉक्टर जी द्वारा स्थापित पद्धति के द्वारा हो रही है। हिन्दू के जागरण से ही विश्व का जागरण संभव है और उसी से विश्व का, मानवता का, संपूर्ण अस्तित्व का कल्याण होगा। हिन्दू जगेगा, विश्व जगेगा।
07:29

25 मार्च क्रान्ति और सद्भाव के समर्थक गणेशशंकर विद्यार्थी जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा




श्री गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्म प्रयाग के अतरसुइया मौहल्ले में अपने नाना श्री सूरजप्रसाद के घर में 25 अक्तूबर, 1890 को हुआ था। इनके नाना सहायक जेलर थे। इनके पुरखे जिला फतेहपुर (उ.प्र.) के हथगाँव के मूल निवासी थे; पर जीवनयापन के लिए इनके पिता श्री जयनारायण अध्यापन एवं ज्योतिष को अपनाकर जिला गुना, मध्य प्रदेश के गंगवली कस्बे में बस गये। वहीं गणेश को स्थानीय एंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल में भर्ती करा दिया गया।

प्रारम्भिक शिक्षा वहाँ से लेने के बाद गणेश ने अपने बड़े भाई के पास कानपुर आकर हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने प्रयाग में इण्टर में प्रवेश लिया। उसी दौरान उनका विवाह हो गया, जिससे पढ़ाई खण्डित हो गयी; लेकिन तब तक उन्हें लेखन एवं पत्रकारिता का शौक लग गया था, जो अन्त तक जारी रहा। विवाह के बाद घर चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी, अतः वे फिर कानपुर भाईसाहब के पास आ गये।

1908 यहाँ उन्हें कानपुर में एक बैंक में 30 रु. महीने की नौकरी मिल गयी। एक साल बाद उसे छोड़कर विद्यार्थी जी पी.पी.एन.हाईस्कूल में अध्यापन कार्य करने लगे। यहाँ भी अधिक समय तक उनका मन नहीं लगा। वे इसे छोड़कर प्रयाग आ गये और वहाँ ‘सरस्वती’ एवं ‘अभ्युदय’ नामक पत्रों के सम्पादकीय विभाग में कार्य किया; पर यहाँ उनके स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया। अतः वे फिर कानपुर लौट गये और 19 नवम्बर, 1918 से कानपुर से साप्ताहिक पत्र ‘प्रताप’ का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया।

अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सामग्री से भरपूर प्रताप समाचार पत्र के कार्य में विद्यार्थी जी ने स्वयं को खपा दिया। वे उसके संयोजन, छपाई से लेकर वितरण तक के कार्य में स्वयं लगे रहते थे। अतः प्रताप की लोकप्रियता बढ़ने लगी। दूसरी ओर वह अंग्रेज शासकों की निगाह में भी खटकने लगा। 1920 में विद्यार्थी जी ने प्रताप को साप्ताहिक के बदले दैनिक कर दिया। इससे प्रशासन बौखला गया। उसने विद्यार्थी जी को झूठे मुकदमों में फँसाकर जेल भेज दिया और भारी जुर्माना लगाकर उसका भुगतान करने को विवश किया।

इतनी बाधाओं के बावजूद भी विद्यार्थी जी का साहस कम नहीं हुआ। उनका स्वर प्रखर से प्रखरतम होता चला गया। कांग्रेस की ओर से स्वाधीनता के लिए जो भी कार्यक्रम दिये जाते थे, विद्यार्थी जी उसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। इतना ही नहीं, वे क्रान्तिकारियों की भी हर प्रकार से सहायता करते थे। उनके लिए रोटी और गोली से लेकर उनके परिवारों के भरणपोषण की भी चिन्ता वे करते थे। क्रान्तिवीर भगतसिंह ने भी कुछ समय तक विद्यार्थी जी के समाचार पत्र ‘प्रताप’ में काम किया था।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में पहले तो मुसलमानों ने अच्छा सहयोग दिया; पर फिर वे पाकिस्तान की माँग करने लगे। भगतसिंह आदि की फांसी का समाचार अगले दिन 24 मार्च, 1931 को देश भर में फैल गया। लोगों ने जुलूस निकालकर शासन के विरुद्ध नारे लगाये। इससे कानपुर में मुसलमान भड़क गये और उन्होंने भयानक दंगा किया। विद्यार्थी जी अपने जीवन भर की तपस्या को भंग होते देख बौखला गये। वे सीना खोलकर दंगाइयों के आगे कूद पड़े।

दंगाई तो मरने-मारने पर उतारू ही थे। उन्होंने विद्यार्थी जी के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। उनकी लाश के बदले केवल एक बाँह मिली, जिस पर लिखे नाम से वे पहचाने गये। वह 25 मार्च, 1931 का दिन था, जब धर्मान्धता की बलिवेदी पर भारत माँ के सपूत गणेशशंकर विद्यार्थी का बलिदान हुआ।
07:23

25 मार्च भूमिगत रेडियो की संचालक उषा मेहता जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



आजकल मोबाइल और अंतरजाल जैसे संचार के तीव्र साधनों के बल पर संपर्क और संबंध ही नहीं, तो विश्व स्तर पर व्यापार और आंदोलन भी हो रहे हैं; पर भारतीय स्वाधीनता के आंदोलन के समय यह सुविधा नहीं थी। तब टेलिफोन, रेडियो और बेतार आदि शासन के पास ही होते थे। ऐसे में आंदोलन के समाचार तथा नेताओं के संदेशों को भूमिगत रेडियो द्वारा जनता तक पहुंचाने में जिस महिला ने बड़े साहस का परिचय दिया, वे थीं उषा मेहता।

उषा मेहता का जन्म 25 मार्च, 1920 को सूरत (गुजरात) के पास एक गांव में हुआ था। गांधी जी को उन्होंने पांच वर्ष की अवस्था में कर्णावती में देखा था। कुछ समय बाद उनके गांव के पास लगे एक शिविर में उन्होंने गांधी जी के विचारों को सुना और उनके कार्यों के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। वहां पर ही उन्होंने खादी पहनने का व्रत लिया और इसे जीवन भर निभाया।

आठ वर्ष की अवस्था में वे स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत ‘मांजर सेना’ में शामिल होकर अपने बाल मित्रों के साथ भरूच की गलियों में तिरंगा झंडा लेकर प्रभातफेरी निकालने लगीं। उन्होंने साइमन कमीशन के विरुद्ध जुलूस निकाला तथा विदेशी कपड़ों एवं शराब की दुकानों के आगे विरोध प्रदर्शन भी किये।

उनके पिता एक जज थे। 1930 में अवकाश पाकर वे मुंबई आ गये। यहां उषा मेहता की सक्रियता और बढ़ गयी। वे जेल में बंदियों से मिलकर उनके संदेश बाहर लाती थीं तथा अपने साथियों के साथ गुप्त पर्चे भी बांटती थीं।

उषा मेहता ने 1939 में दर्शन शास्त्र की स्नातक उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। इसके बाद वे कानून की पढ़ाई करने लगीं; पर तभी भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ गया। ऐसे में वे पढ़ाई अधूरी छोड़कर आंदोलन में कूद गयीं। आंदोलन के समाचार तथा नेताओं के संदेश रेडियो द्वारा जनता तक पहुंचाने के लिए कुछ लोगों ने गुप्त रेडियो प्रणाली की व्यवस्था भी कर ली।

उषा जी ने यह कठिन काम अपने कंधे पर लिया। 14 अगस्त, 1942 को इसका पहला प्रसारण उनकी आवाज में ही हुआ। इस पर नेताओं के पहले से रिकार्ड किये हुए संदेश भी सुनाये जाते थे। इससे सरकार के कान खड़े हो गये। वे इस रेडियो स्टेशन की तलाश करने लगे; पर ‘तुम डाल-डाल, हम पात-पात’ की तरह ये लोग हर दिन इसका स्थान बदल देते थे। श्री राममनोहर लोहिया तथा अच्युत पटवर्धन का भी इस काम में बड़ा सहयोग था; पर तीन माह बाद उषा जी और उनके साथी पुलिस के हत्थे चढ़ ही गये।

उषा मेहता को चार साल की सजा दी गयी। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया; पर वे झुकी नहीं। 1946 में वहां से आकर उन्होंने फिर पढ़ाई प्रारम्भ कर दी। स्वाधीनता के बाद उन्होंने गांधी जी के सामाजिक तथा राजनीतिक विचारों पर शोध कर पी.एच-डी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद मुंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य को उन्होंने अपनी आजीविका बनाया।

अंतिम गांधीवादी के रूप में विख्यात उषा जी आजीवन गांधी संग्रहालय, गांधी शांति प्रतिष्ठान, गांधी स्मारक निधि, मणि भवन आदि से जुड़ी रहीं। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन पर कई पुस्तकें लिखीं। वे सामाजिक कार्यों में महिलाओं की सक्रियता की पक्षधर थीं। 11 अगस्त, 2000 को पद्मश्री तथा कई अन्य पुरस्कारों से अलंकृत उषा जी का निधन हुआ।

Tuesday, 24 March 2020

02:17

24 मार्च नींव और आधार स्तम्भ दयाचंद जैन जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



24 मार्च
नींव और आधार स्तम्भ  दयाचंद जैन जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

देहरादून उत्तराखंड राज्य की राजधानी है। यहां संघ के काम में नींव और फिर आधार स्तम्भ के रूप में प्रमुख भूमिका निभाने वाले श्री दयाचंद जी का जन्म 12 जुलाई, 1928 को ग्राम तेमला गढ़ी (जिला बागपत, उ.प्र.) में श्रीमती अशर्फी देवी तथा श्री धर्मदास जैन के घर में हुआ था। निकटवर्ती कस्बे दाहा से मिडिल तक की शिक्षा पाकर वे आगे पढ़ाई और कारोबार के लिए देहरादून आ गये। 1942 में यहां पर ही वे स्वयंसेवक बने।

1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय सत्याग्रह कर वे तीन माह आगरा जेल में रहे। प्रतिबंध के बाद देहरादून में संघ के प्रायः सभी बड़े कार्यकर्ता काम से पीछे हट गये। ऐसे में दयाचंद जी ने नये सिरे से काम प्रारम्भ किया। 1960 में वे संघ के तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण के लिए नागपुर गये। विद्यालयी शिक्षा कम होते हुए भी उन्होंने वहां बौद्धिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

देश, धर्म और समाज पर आने वाले हर चुनौती में वे अग्रणी भूमिका में रहते थे। 1967 में गोरक्षा आंदोलन में वे दिल्ली की तिहाड़ जेल में रहे। 1975 में संघ पर प्रतिबंध लगने पर वे प्रारम्भ में भूमिगत हो गये और फिर 15 अगस्त को सत्याग्रह कर छह माह के लिए जेल में रहे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय भी वे हर आंदोलन में वे सदा आगे रहे।

दयाचंद जी बहुत दिलेर प्रकृति के व्यक्ति थे। इंदिरा गांधी की हत्या होने पर जब कांग्रेस वाले बाजार बंद कराने निकले, तो दयाचंद जी ने दुकान बंद नहीं की। उन्होंने कहा कि जिसने आपातकाल में पूरे देश को जेल बना दिया था,  जिसके कारण मेरी दुकान साल भर बंद रही, उसकी मृत्यु पर मैं दुकान बंद नहीं करूंगा। कांग्रेसी लोग अपना सा मुंह लेकर चुपचाप आगे चले गये।

दयाचंद जी ने मुख्यशिक्षक से लेकर जिला कार्यवाह, जिला संघचालक और प्रान्त व्यवस्था प्रमुख जैसी जिम्मेदारियां निभाईं। वे किसी सूचना की प्रतीक्षा किये बिना स्वयं योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करते थे। निर्धन कार्यकर्ताओं की बेटियों के सम्मानपूर्वक विवाह की वे विशेष चिन्ता करते थे।

सामाजिक जीवन में उनका स्थान इतना महत्वपूर्ण था कि झंडा बाजार में उनकी कपड़े की दुकान पर समाज के सब तरह के लोग उनसे परामर्श करने आते थे। कई लोग तो हंसी में कहते थे कि ‘झंडे वाले बाबा’ के पास हर समस्या का समाधान है।

देहराूदन में जब सरस्वती शिशु मंदिर खुला, तो मोती बाजार स्थित संघ कार्यालय में ही उसकी कक्षाएं प्रारम्भ कर दी गयीं। कुछ समय बाद जब तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्री भाऊराव देवरस वहां आये, तो उन्होंने शिशु मंदिर को वहां से स्थानांतरित करने को कहा। दयाचंद जी ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और एक स्थान खोजकर नये सत्र में विद्यालय वहां पहुंचा दिया।

शिक्षा के महत्व को समझते हुए सरस्वती शिशु मंदिरों के प्रसार का उन्होंने विशेष प्रयास किया। देहरादून में संघ परिवार की हर संस्था से वे किसी न किसी रूप से जुड़े थे। उनकी सोच सदा सार्थक दिशा में रहती थी। अंतिम दिनों में वे जब चिकित्सालय में भर्ती थे, तो उनसे मिलने आये कुछ कार्यकर्ता किसी की आलोचना कर रहे थे। दयाचंद जी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अच्छा सोचो और अच्छा बोलो, तो परिणाम भी अच्छा ही निकलेगा।
70 वर्ष तक सक्रिय रहे ऐसे श्रेष्ठ कार्यकर्ता का देहांत 24 मार्च, 2012 को हुआ।

Monday, 23 March 2020

11:00

23 मार्च राजगुरु जी का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



सामान्यतः लोग धन, पद या प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं; पर क्रांतिवीर राजगुरु सदा इस होड़ में रहते थे कि किसी भी खतरनाक काम का मौका भगतसिंह से पहले उन्हें मिलना चाहिए।

श्री हरि नारायण और श्रीमती पार्वतीबाई के पुत्र शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे के पास खेड़ा (वर्तमान राजगुरु नगर) में हुआ था। उनके एक पूर्वज पंडित कचेश्वर को छत्रपति शिवाजी के प्रपौत्र साहू जी ने राजगुरु का पद दिया था। तब से इस परिवार में यह नाम लगने लगा।

छह वर्ष की अवस्था में राजगुरु के पिताजी का देहांत हो गया। पढ़ाई की बजाय खेलकूद में अधिक रुचि लेने से उनके भाई नाराज हो गये। इस पर राजगुरु ने घर छोड़ दिया और कई दिन इधर-उधर घूमते हुए काशी आकर संस्कृत पढ़ने लगे। भोजन और आवास के बदले उन्हें अपने अध्यापक के घरेलू काम करने पड़ते थे। एक दिन उस अध्यापक से भी झगड़ा हो गया और पढ़ाई छोड़कर वे एक प्राथमिक शाला में व्यायाम सिखाने लगे।

यहां उनका परिचय स्वदेश साप्ताहिक, गोरखपुर के सह सम्पादक मुनीश अवस्थी से हुआ। कुछ ही समय में वे क्रांतिकारी दल के विश्वस्त सदस्य बन गये। जब दल की ओर से दिल्ली में एक व्यक्ति को मारने का निश्चय हुआ, तो इस काम में राजगुरु को भी लगाया गया। राजगुरु इसके लिए इतने उतावले थे कि उन्होंने रात के अंधेरे में किसी और व्यक्ति को ही मार दिया।

राजगुरु मस्त स्वभाव के युवक थे। उन्हें सोने का बहुत शौक था। एक बार उन्हें एक अभियान के लिए कानपुर के छात्रावास में 15 दिन रुकना पड़ा। वे 15 दिन उन्होंने रजाई में सोकर ही गुजारे। राजगुरु को यह मलाल था कि भगतसिंह बहुत सुंदर है, जबकि उनका अपना रंग सांवला है। इसलिए वह हर सुंदर वस्तु से प्यार करते थे। यहां तक कि सांडर्स को मारने के बाद जब सब कमरे पर आये, तो राजगुरु ने सांडर्स की सुंदरता की प्रशंसा की।

भगतसिंह से आगे निकलने की होड़ में राजगुरु ने सबसे पहले सांडर्स पर गोली चलाई थी। लाहौर से निकलतेे समय सूटधारी अफसर बने भगतसिंह  के साथ हाथ में बक्सा और सिर पर होलडाल लेकर नौकर के वेष में राजगुरु ही चले थे। इसके बाद वे महाराष्ट्र आ गये। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने अपने एक कार्यकर्ता के फार्म हाउस पर उनके रहने की व्यवस्था की। जब दिल्ली की असेम्बली में बम फंेकने का निश्चय हुआ, तो राजगुरु ने चंद्रशेखर आजाद से आग्रह किया कि भगतसिंह के साथ उसे भेजा जाए; पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। इससे वे वापस पुणे आ गये।

राजगुरु स्वभाव से कुछ वाचाल थे। पुणे में उन्होंने कई लोगों से सांडर्स वध की चर्चा कर दी। उनके पास कुछ शस्त्र भी थे। क्रांति समर्थक एक सम्पादक की शवयात्रा में उन्होंने उत्साह में आकर कुछ नारे भी लगा दिये। इससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गये। पुणे में उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी को मारने का प्रयास किया; पर दूरी के कारण सफलता नहीं मिली।

इसके अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा सांडर्स वध का मुकदमा चलाकर मृत्यु दंड घोषित किया गया। 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह और सुखदेव के साथ वे भी फांसी पर चढ़ गये। मरते हुए उन्हें यह संतोष रहा कि बलिदान प्रतिस्पर्धा में वे भगतसिंह से पीछे नहीं रहे।
10:56

23 मार्च अमर शहीद क्रांतिवीर सुखदेव जी का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा




स्वतन्त्रता संग्राम के समय उत्तर भारत में क्रान्तिकारियों की दो त्रिमूर्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुईं। पहली चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खाँ की थी, जबकि दूसरी भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की थी। इनमें से सुखदेव का जन्म ग्राम नौघरा (जिला लायलपुर, पंजाब, वर्तमान पाकिस्तान) में 15 मई, 1907 को हुआ था। इनके पिता प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता श्री रामलाल थापर तथा माता श्रीमती रल्ली देई थीं।

सुखदेव के जन्म के दो साल बाद ही पिता का देहान्त हो गया। अतः इनका लालन-पालन चाचा श्री अचिन्तराम थापर ने किया। सुखदेव के जन्म के समय वे जेल में मार्शल लाॅ की सजा भुगत रहे थे। ऐसे क्रान्तिकारी वातावरण में सुखदेव बड़ा हुए।

जब वह तीसरी कक्षा में थे, तो गवर्नर उनके विद्यालय में आये। प्रधानाचार्य के आदेश पर सब छात्रों ने गवर्नर को सैल्यूट दिया; पर सुखदेव ने ऐसा नहीं किया। जब उनसे पूछताछ हुई, तो उन्होंने साफ कह दिया कि मैं किसी अंग्रेज को प्रणाम नहीं करूँगा।

आगे चलकर सुखदेव और भगतसिंह मिलकर लाहौर में क्रान्ति का तानाबाना बुनने लगे। उन्होंने एक कमरा किराये पर ले लिया। वे प्रायः रात में बाहर रहते थे या देर से आते थे। इससे मकान मालिक और पड़ोसियों को सन्देह होता था। इस समस्या के समाधान के लिए सुखदेव अपनी माता जी को वहाँ ले आये। अब यदि कोई पूछता, तो वे कहतीं कि दोनों पी.डब्ल्यू.डी. में काम करते हैं। नगर से बहुत दूर एक सड़क बन रही है। वहाँ दिन-रात काम चल रहा है, इसलिए इन्हें आने में प्रायः देर हो जाती है।

सुखदेव बहुत साहसी थे। लाहौर में जब बम बनाने का काम प्रारम्भ हुआ, तो उसके लिए कच्चा माल फिरोजपुर से वही लाते थे। एक बार माल लाते समय वे सिपाहियों के डिब्बे में चढ़ गये। उन्होंने सुखदेव को बहुत मारा। सुखदेव चुपचाप पिटते रहे; पर कुछ बोले नहीं; क्योंकि उनके थैले में पिस्तौल, कारतूस तथा बम बनाने का सामान था। एक सिपाही ने पूछा कि इस थैले में क्या है ? सुखदेव ने त्वरित बुद्धि का प्रयोग करते हुए हँसकर कहा - दीवान जी, पिस्तौल और कारतूस हैं। सिपाही भी हँस पड़े और बात टल गयी।

जब साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन के समय लाठी प्रहार से घायल होकर लाला लाजपतराय की मृत्यु हुई, तो सांडर्स को मारने वालों में सुखदेव भी थे। उनके हाथ पर ॐ गुदा हुआ था। फरारी के दिनों में एक दिन उन्होंने वहाँ खूब सारा तेजाब लगा लिया। इससे वहाँ गहरे जख्म हो गये; पर फिर भी ॐ पूरी तरह साफ नहीं हुआ। इस पर उन्होंने मोमबत्ती से उस भाग को जला दिया।

पूछने पर उन्होंने मस्ती से कहा कि इससे मेरी पहचान मिट गयी और पकड़े जाने पर यातनाओं से मैं डर तो नहीं जाऊँगा, इसकी परीक्षा भी हो गयी। उन्हें पता लगा कि भेद उगलवाने के लिए पुलिस वाले कई दिन तक खड़ा रखते हैं। अतः उन्होंने खड़े-खड़े सोने का अभ्यास भी कर लिया।

जब भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी घोषित हो गयी, तो जनता ने इसके विरोध में आन्दोलन किया। लोगों की इच्छा थी कि इन्हें फाँसी के बदले कुछ कम सजा दी जाये। जब सुखदेव को यह पता लगा, तो उन्होंने लिखा, ‘‘हमारी सजा को बदल देने से देश का उतना कल्याण नहीं होगा, जितना फाँसी पर चढ़ने से।’’ स्पष्ट है कि उन्होंने बलिदानी बाना पहन लिया था।

23 मार्च, 1931 को भगतसिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव भी हँसते हुए फाँसी के फन्दे पर झूल गये।
10:50

23 मार्च शहीदी दिवस पर खास रिपोर्ट देश के नाम सरदार भगत सिंह का आखिरी खत-के सी शर्मा



28 सितंबर सरदार भगत सिंह का जन्मदिन है।
23 मार्च 1931 वो दिन जब भारत माता का लाल आजादी के लिए खुद को कुर्बान करने की तैयारी कर चुका था।
एक दिन पहले यानी 22 मार्च 1931 को अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने इस बात का जिक्र भी किया था।
भगत सिंह ने खत में लिखा।

 ‘साथियों स्वाभाविक है जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता हूं लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि कैद होकर या पाबंद होकर न रहूं। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। क्रांतिकारी दलों के आदर्शों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है। इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा नहीं हो सकता था। मेरे हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ने की सूरत में देश की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह की उम्मीद करेंगी। इससे आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना नामुमकिन हो जाएगा। आजकल मुझे खुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।'

Thursday, 19 March 2020

04:27

19 मार्च विकलांग क्रांतिवीर चारुचंद्र बोस जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा




19 मार्च
विकलांग क्रांतिवीर चारुचंद्र बोस जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा
बंगाल के क्रांतिकारियों की निगाह में अलीपुर का सरकारी वकील आशुतोष विश्वास बहुत समय से खटक रहा था। देशभक्तों को पकड़वाने, उन पर झूठे मुकदमे लादने तथा फिर उन्हें कड़ी सजा दिलवाने में वह अपनी कानूनी बुद्धि का पूरा उपयोग कर रहा था। ब्रिटिश शासन के लिए वह एक पुष्प था, जबकि क्रांतिकारी उस कांटे को शीघ्र ही अपने मार्ग से हटाना चाहते थेे।

आशुतोष विश्वास यह जानता था कि क्रांतिकारी उसके पीछे पड़े हैं, अतः वह हर समय बहुत सावधान रहता था। वह प्रायः भीड़ से दूर ही रहकर चलता था। उसे उठाकर पटकने में सक्षम कोई हृष्ट-पुष्ट युवक यदि उसके पास से निकलता, तो वह दूर हट जाता था। वह रात में कभी अपने घर से नहीं निकलता था और अपरिचित लोगों से बिल्कुल नहीं मिलता था।

दूसरी ओर चारुचंद्र बोस नामक एक युवक था, जो आशुतोष को मजा चखाना चाहता था। ईश्वर ने चारुचंद्र के साथ बहुत अन्याय किया था। वह जन्म से ही अपंग था। उसके दाहिने हाथ में कलाई से आगे हथेली और उंगलियां नहीं थीं। दुबला-पतला होने के कारण चलते समय लगता था मानो वह अभी गिर पड़ेगा। उसके माता-पिता का भी देहांत हो चुका था।

इस पर भी चारुचंद्र साहसपूर्वक छापेखानों में काम कर पेट भर रहा था। उसने एक ही हाथ से काम करने की कला विकसित कर ली थी। इसके साथ ही उसके मन में देश के लिए कुछ करने की तड़प भी विद्यमान थी। उसे लगा कि आशुतोष विश्वास को यमलोक पहुंचाकर वह देश की सेवा कर सकता है। उसने कहीं से एक पिस्तौल का प्रबंध किया और जंगल में जाकर निशाना लगाने का अभ्यास करने लगा। धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया और अंततः उसने अपने संकल्प की पूर्ति का निश्चय कर लिया।

10 फरवरी, 1909 को चारुचंद्र अलीपुर के न्यायालय में जा पहुंचा। आशुतोष विश्वास हर दिन की तरह आज भी जैसे ही न्यायालय से बाहर निकला, चारुचंद्र की पिस्तौल से निकली गोली उसके शरीर में घुस गयी। उसने मुड़कर देखा, तो पतला-दुबला चारुचंद्र उसके सामने था।

आशुतोष ‘‘अरे बाप रे’’ कहकर घायल अवस्था में वहां से भागा; पर चारुचंद्र को तो अपना काम पूरा करना था। उसने एक ही छलांग में अपने शिकार को दबोचकर बिल्कुल पास से एक गोली और दाग दी। आशुतोष विश्वास वहीं ढेर हो गया।

चारुचंद्र ने इसके लिए बड़ी बुद्धिमत्ता से काम लिया था। अपने विकलांग हाथ पर रस्सी से पिस्तौल को अच्छी तरह बांधकर वह बायें हाथ से उसका घोड़ा दबा रहा था। जब पुलिस वालों ने उसे पकड़ा, तो उसने झटके से स्वयं को छुड़ाकर उन पर भी गोली चला दी; पर इस बार उसका निशाना चूक गया और कई पुलिसकर्मियों ने मिलकर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिसकर्मियों ने लातों, मुक्कों और डंडों से वहीं उसे बहुत मारा-पीटा; पर उसके चेहरे पर लक्ष्यपूर्ति की मुस्कान विद्यमान थी। न्यायालय में उस पर हत्या का मुकदमा चलाया गया। उसने बचने का कोई प्रयास नहीं किया। एक स्थितप्रज्ञ की तरह वह सारी कार्यवाही को देखता था, मानो वह अभियुक्त न होकर कोई दर्शक मात्र था। न्यायालय ने उसे मृत्यु दंड सुना दिया।

19 मार्च, 1909 को अलीपुर केन्द्रीय कारागार में उसने विजयी भाव से फंदा स्वयं गले में डाल लिया। उसके चेहरे पर आज भी वैसी ही मुस्कान तैर रही थी, जैसी देशद्रोही को मृत्युदंड देते समय थी। उसने सिद्ध कर दिया कि विकलांगता शुभ संकल्पों को पूरा करने में कभी बाधक नहीं होती।

(संदर्भ : क्रांतिकोश)

Saturday, 14 March 2020

08:47

14 मार्च गोबर्धन पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य पूज्य श्री भारती कृष्णतीर्थ जी के जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



14 मार्च
गोबर्धन पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य पूज्य श्री भारती कृष्णतीर्थ जी के जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


वैदिक गणित के संन्यासी प्रवक्ता
संन्यासी को देखकर लोगों के मन में उनके त्याग तथा अध्यात्म के प्रति श्रद्धा जाग्रत होती है। कई बार लोग इन्हें कम पढ़ा-लिखा समझते हैं; पर इनमें से अनेक उच्च शिक्षा विभूषित होते हैं।
आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से एक श्री गोवर्धन पीठ (जगन्नाथ पुरी) के जगद्गुरु  शंकराचार्य पूज्य श्री भारती कृष्णतीर्थ जी का जन्मदिन पर शत शत  नमन

ऐसी ही विभूति थे।

14 मार्च, 1884 को तिन्निवेलि, मद्रास (तमिलनाडु) में तहसीलदार श्री पी. नृसिंह शास्त्री के घर जन्मे इस बालक का नाम वेंकटरमन रखा गया। यह पूरा परिवार बहुत शिक्षित और प्रतिष्ठित था। वेंकटरमन के चाचा श्री चंद्रशेखर शास्त्री महाराजा कालिज, विजय नगर में प्राचार्य थे। इनके परदादा श्री रंगनाथ शास्त्री मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुके थे।

कुशाग्र बुद्धि के स्वामी वेंकटरमन सदा कक्षा में प्रथम आते थे। गणित, विज्ञान, समाजशास्त्र तथा भाषा शास्त्र में उनकी विशेष रुचि थी। धाराप्रवाह संस्कृत बोलने के कारण 15 वर्ष की किशोरावस्था में उन्हें मद्रास संस्कृत संस्थान ने ‘सरस्वती’ जैसी उच्च उपाधि से विभूषित किया। 1903 में उन्होंने अमरीकन कालिज ऑफ़ साइन्स, रोचेस्टर के मुम्बई केन्द्र से एम.ए. किया।

1904 में केवल 20 वर्ष की अवस्था में उन्होंने एक साथ सात विषयों (संस्कृत, दर्शन, अंग्रेजी, गणित, इतिहास, भौतिकी एवं खगोल) में एम.ए की परीक्षा उच्चतम सम्मान के साथ उत्तीर्ण कीं। यह कीर्तिमान सम्भवतः आज तक अखंडित है।

समाज सेवा की ओर रुचि होने के कारण उन्होंने गोपालकृष्ण गोखले के साथ राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन तथा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की समस्याओं के लिए काम किया। 1908 में वे राजमहेन्द्रि में नवीन कालिज के प्राचार्य बने; पर उनका अधिक रुझान अध्यात्म की ओर था। अतः 1911 में वे शृंगेरी पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री नृसिंह भारती के पास मैसूर पहुँच गये और आठ साल तक वेदान्त दर्शन का गहन अध्ययन किया।

इसके साथ उन्होंने ध्यान, योग एवं ब्रह्म साधना का भी भरपूर अभ्यास किया। इस दौरान वे स्थानीय विद्यालयों और आश्रमों में संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र भी पढ़ाते रहेे। अमलनेर के शंकर दर्शन संस्थान में आद्य शंकराचार्य के दर्शन पर दिये गये उनके 16 भाषण बहुत प्रसिद्ध हैं। मुंबई, पुणे और खानदेश के कई महाविद्यालयों में उन्होंने अतिथि प्राध्यापक के नाते भी व्याख्यान दिये।

4 जुलाई, 1919 को शारदा पीठ के शंकराचार्य त्रिविक्रम तीर्थ जी ने उन्हें काशी में संन्यास की दीक्षा देकर उनका नाम भारती कृष्ण तीर्थ रखा। 1921 में उन्हें शारदापीठ के शंकराचार्य पद पर विभूषित किया गया। 1925 में जब गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य श्री मधुसूदन तीर्थ का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया, तो उन्होंने इस पीठ का कार्यभार भी श्री भारती को ही सौंप दिया।

1953 में उन्होंने नागपुर में ‘विश्व पुनर्निमाण संघ’ की स्थापना की। वे भारत से बाहर जाने वाले पहले शंकराचार्य थे। 1958 में अमरीका, ब्रिटेन कैलिफोर्निया आदि देशों के रेडियो, दूरदर्शन, चर्च एवं महाविद्यालयों में उनके भाषण हुए।

स्वामी जी ने अथर्ववेद में छिपे गणित के 16 सूत्र खोज निकाले, जिनसे विशाल गणनाएँ संगणक से भी जल्दी हो जाती हैं। उन्होंने इन पर 16 ग्रन्थ लिखे, जो 1956 में हुई एक अग्नि दुर्घटना में जल गये। तब तक उनकी आंखें पूरी तरह खराब हो चुकी थीं; लेकिन उन्होंने स्मृति के आधार पर केवल डेढ़ माह में उन सूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या कर नई पुस्तक ‘वैदिक गणित’ लिखी, जो अब उपलब्ध है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्म, विज्ञान, विश्व शांति आदि विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। 1959 में उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और 2 फरवरी, 1960 को मुंबई में उन्होंने शरीर छोड़ दिया।

(संदर्भ : पांचजन्य 1.12.2002 एवं विकीपीडिया)

Wednesday, 11 March 2020

08:19

11 मार्च हमारे रियल हीरो अमर बलिदानी छत्रपति सम्भाजी का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



11 मार्च हमारे रियल हीरो
अमर बलिदानी छत्रपति सम्भाजी का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा

भारत में हिन्दू धर्म की रक्षार्थ अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। छत्रपति शिवाजी के बड़े पुत्र सम्भाजी भी इस मणिमाला के एक गौरवपूर्ण मोती हैं। उनका जन्म 14 मई, 1657 को मां सोयराबाई की कोख से  हुआ था। तीन अप्रैल, 1680 को शिवाजी के देहान्त के बाद सम्भाजी ने हिन्दवी साम्राज्य का भार सँभाला; पर दुर्भाग्य से वे अपने पिता की तरह दूरदर्शी नहीं थे। इस कारण उन्हें शिवाजी जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई। दूसरी ओर औरंगजेब सिर कुचले हुए नाग की भाँति अवसर की तलाश में रहता ही था।

संभाजी अपने वीर सैनिकों के बलपर औरंगजेब को सदा छकाते रहे। कभी उनका पलड़ा भारी रहता, तो कभी औरंगजेब का। घर के अंदर चलने वाली राजनीतिक उठापटक से भी संभाजी दुखी रहते थे। जिन दिनों वे अपने 500 सैनिकों के साथ संगमेश्वर में ठहरे थे, तब किसी मुखबिर की सूचना पर मुकर्रबखान ने 3,000 मुगल सेना के साथ उन्हें घेर लिया। संभाजी ने युद्ध करते हुए रायगढ़ की ओर जाने का निश्चय किया।

इस प्रयास में दोनों ओर के सैकड़ों सैनिक मारे गये। सम्भाजी के कुछ साथी तो निकल गये; पर संभाजी और उनके मित्र कवि कलश मुगलों के हत्थे चढ़ गये। औरंगजेब यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने संभाजी को अपमानित करते हुए अपने सामने लाने को कहा।

15 फरवरी, 1689 को दोनों को चीथड़े पहनाकर, ऊंट पर उल्टा बैठाकर औरंगजेब के सामने लाया गया। औरंगजेब उनका मनोबल तोड़कर हिन्दू शक्ति को सदा के लिए कुचलना चाहता था। अतः उसने सम्भाजी को कहा कि यदि तुम मुसलमान बन जाओ, तो तुम्हारा राज्य वापस कर दिया जाएगा और वहाँ से कोई कर नहीं लिया जाएगा।

पर सम्भाजी ने उसका प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि सिंह कभी सियारों की जूठन नहीं खाते। मैं हिन्दू हूँ और हिन्दू ही मरूँगा। औरंगजेब ने तिलमिला कर उन्हें यातनाएँ देना प्रारम्भ किया। उनके शरीर पर 200 किलो भार की जंजीरे बँधी थीं, फिर भी उन्हें पैदल चलाया गया। सम्भाजी कुछ कदम चलकर ही गिर जाते।

उन्हें कई दिन तक भूखा और प्यासा रखा गया। जंजीरों की रगड़ से सम्भाजी के शरीर पर हुए घावों पर नमक-मिर्च डाला गया। उनके शरीर को गर्म चिमटों से दागा गया। आँखों में गर्म कीलें डालकर उन्हें फोड़ दिया गया; पर उस सिंह पुरुष के मुँह से आह तक न निकली।

इससे चिढ़कर औरंगजेब ने 11 मार्च, 1686 (फागुन कृष्ण अमावस्या) का दिन उनकी हत्या के लिए निर्धारित किया। अगले दिन वर्ष प्रतिपदा (गुडी पाड़वा) का पर्व था। औरंगजेब इस दिन पूरे महाराष्ट्र को शोक में डुबो देना चाहता था।

11 मार्च की प्रातः दोनों को बहूकोरेगांव के बाजार में लाया गया। संभाजी से पूर्व उनके एक साथी कविकलश की जीभ और फिर सिर काटा गया। इसके बाद सम्भाजी के हाथ-पैर तोड़े गये और फिर उनका भी सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

मुसलमान सैनिक सिर को भाले की नोक पर लेकर नाचने लगे। उन्होंने उस सिर का भी भरपूर अपमान कर उसे कूड़े में फंेक दिया। अगले दिन खंडोबल्लाल तथा कुछ अन्य वीर वेश बदलकर संभाजी के मस्तक को उठा लाये और उसका यथोचित क्रियाकर्म किया।

शिवाजी ने अपने जीवन कार्य से हिन्दुओं में जिस जागृति का संचार किया, संभाजी ने अपने बलिदान से उसे आगे बढ़ाया। अतः उनके छोटे भाई छत्रपति राजाराम के नेतृत्व में यह संघर्ष और तीव्र होता गया।

Saturday, 7 March 2020

07:17

7 फरवरी ऐतिहासिक उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



7 फरवरी
ऐतिहासिक उपन्यासकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा


30 दिसम्बर, 1887 को भरूच (गुजरात) के डिप्टी कलेक्टर श्री माणिक लाल मुंशी के घर में जन्मे श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी कुशलता राजनीति, साहित्य, शिक्षा व धर्मप्रेम के साथ ही प्रकृति संरक्षण के लिए किये गये उनके प्रयासों से भी प्रकट हुई। मुंशी जी बड़ौदा से स्नातक एवं मुंबई से कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1913 में मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। बड़ौदा विश्वविद्यालय में पढ़ते समय उनकी भेंट ऋषि अरविंद से हुई। आगे चलकर अरविंद, सरदार पटेल व गांधी जी से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

1927 में सरदार पटेल के साथ उन्होंने बारदोली सत्याग्रह में भाग लिया। 1930 और 1932 में वे फिर जेल गये। 1940 में उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लिया। स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल के साथ शासन के प्रतिनिधि के रूप में हैदराबाद रियासत को मुक्त कराने में उन्होंने भरपूर सहयोग दिया। महमूद गजनवी द्वारा तोड़े गये सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। जब सरदार पटेल ने हाथ में समुद्र का जल लेकर मंदिर निर्माण का संकल्प लिया, तो कन्हैयालाल जी भी उनके साथ थे।

स्वतंत्र भारत में उन्हें कृषि एवं खाद्य मंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने जुलाई के प्रथम सप्ताह में ‘वन महोत्सव’ मनाने की कल्पना सबके सामने रखी। इस समय वर्षाकाल होने के कारण धरती खूब उर्वरा रहती है। जब तक वे कृषि मंत्री रहे, तब तक यह योजना कुछ चली; पर सरदार पटेल के दिवंगत होते ही नेहरू जी ने उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल से हटाकर उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाकर लखनऊ भेज दिया। इस प्रकार वन महोत्सव की योजना असमय मार दी गयी। यदि आज भी इस योजना पर ठीक से काम हो, तो न केवल भारत अपितु विश्व पर्यावरण प्रदूषण के अभिशाप से मुक्त हो सकता है।

मुंशी जी गुजराती भाषा के श्रेष्ठ साहित्यकार थे। ऐतिहासिक उपन्यासकार के नाते उनकी बड़ी ख्याति है। लोपामुद्रा, लोमहर्षिणी, पाटन का प्रभुत्व, गुजरात के नाथ, जय सोमनाथ, पृथ्वीवल्लभ, भगवान परशुराम, भग्न पादुका, कृष्णावतार (सात खंड) आदि इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। उन्होंने सैकड़ों लेख, निबंध, नाटक और कहानियां लिखीं, जिनमें भारत और भारतीयता की सुगंध सर्वत्र व्याप्त है।

गांधी जी द्वारा सम्पादित ‘यंग इंडिया’ के वे सह सम्पादक थे। इसके साथ ही गुजराती, आर्यप्रकाश, नवजीवन, सत्य आदि पत्रों के वे सम्पादक रहे। गुजराती के अतिरिक्त हिन्दी, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मराठी तथा अंग्रेजी पर भी इनका अधिकार था। इनकी पुस्तकों के अनेक भाषाओं में अनुवाद हुए हैं।

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारत की स्वतंत्रता के साथ ही उसके पुनर्निर्माण के बारे में भी विचार किया। हिन्दू धर्म एवं संस्कृति उनके मन, वचन और कर्म में बसी थी। कालान्तर में इसी चिंतन से 1932 में ‘साहित्य संसद’ तथा 1938 में ‘भारतीय विद्या भवन’ जैसी श्रेष्ठ संस्था का जन्म हुआ। भारतीय विद्या भवन की देश भर में 22 शाखाएं हैं। इस संस्था ने देश-विदेश में वेद, उपनिषद, गीता, रामायण जैसे हिन्दू धर्मग्रंथों तथा भारतीय भाषा व संस्कृति के विकास में अप्रतिम योगदान दिया।

मुंशी जी अपने जीवन के अंतिम समय तक देश, धर्म, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान एवं कला की सेवा करते रहे। हिन्दू हितैषी होने के कारण वे विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना में भी सहयोगी बने। सात फरवरी, 1971 को उनकी श्वास भगवान सोमनाथ के श्रीचरणों में सदा के लिए विसर्जित हो गयी।

Wednesday, 4 March 2020

07:04

4 फरवरी हमारे रियल हीरो गढ़ आया, पर सिंह गया' तानाजी मालसुरे पर विशेष-के सी शर्मा



सिंहगढ़ का नाम आते ही छत्रपति शिवाजी के वीर सेनानी तानाजी मालसुरे की याद आती है। तानाजी ने उस दुर्गम कोण्डाणा दुर्ग को जीता, जो ‘वसंत पंचमी’ पर उनके बलिदान का अर्घ्य पाकर ‘सिंहगढ़’ कहलाया।
शिवाजी को एक बार सन्धिस्वरूप 23 किले मुगलों को देने पड़े थे। इनमें से कोण्डाणा सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण था। एक बार माँ जीजाबाई ने शिवाजी को कहा कि प्रातःकाल सूर्य भगवान को अर्घ्य देते समय कोण्डाणा पर फहराता हरा झण्डा आँखों को बहुत चुभता है। शिवाजी ने सिर झुकाकर कहा - मां, आपकी इच्छा मैं समझ गया। शीघ्र ही आपका आदेश पूरा होगा।
कोण्डाणा को जीतना आसान न था; पर शिवाजी के शब्दकोष में असम्भव शब्द नहीं था। उनके पास एक से एक साहसी योद्धाओं की भरमार थी। वे इस बारे में सोच ही रहे थे कि उनमें से सिरमौर तानाजी मालसुरे दरबार में आये। शिवाजी ने उन्हें देखते ही कहा -तानाजी, आज सुबह ही मैं आपको याद कर रहा था। माता की इच्छा कोण्डाणा को फिर से अपने अधीन करने की है।
तानाजी ने ‘जो आज्ञा’ कहकर सिर झुका लिया। यद्यपि तानाजी उस समय अपने पुत्र रायबा के विवाह का निमन्त्रण महाराज को देने के लिए आये थे; पर उन्होंने मन में कहा -पहले कोण्डाणा विजय, फिर रायबा का विवाह; पहले देश, फिर घर। वे योजना बनाने में जुट गये। 4 फरवरी, 1670 की रात्रि इसके लिए निश्चित की गयी।

कोण्डाणा पर मुगलों की ओर से राजपूत सेनानी उदयभानु 1,500 सैनिकों के साथ तैनात था। तानाजी ने अपने भाई सूर्याजी और 500 वीर सैनिकों को साथ लिया। दुर्ग के मुख्य द्वार पर कड़ा पहरा रहता था। पीछे बहुत घना जंगल और ऊँची पहाड़ी थी। पहाड़ी से गिरने का अर्थ था निश्चित मृत्यु। अतः इस ओर सुरक्षा बहुत कम रहती थी। तानाजी ने इसी मार्ग को चुना।

रात में वे सैनिकों के साथ पहाड़ी के नीचे पहुँच गये। उन्होंने ‘यशवन्त’ नामक गोह को ऊपर फेंका। उसकी सहायता से कुछ सैनिक बुर्ज पर चढ़ गये। उन्होंने अपनी कमर में बँधे रस्से नीचे लटका दिये। इस प्रकार 300 सैनिक ऊपर आ गये। शेष 200 ने मुख्य द्वार पर मोर्चा लगा लिया।

ऊपर पहुँचते ही असावधान अवस्था में खड़े सुरक्षा सैनिकों को यमलोक पहुँचा दिया गया। इस पर शोर मच गया। उदयभानु और उसके साथी भी तलवारें लेकर भिड़ गये। इसी बीच सूर्याजी ने मुख्य द्वार को अन्दर से खोल दिया। इससे शेष सैनिक भी अन्दर आ गये और पूरी ताकत से युद्ध होने लगा।

यद्यपि तानाजी लड़ते-लड़ते बहुत घायल हो गये थे; पर उनकी इच्छा मुगलों के चाकर उदयभानु को अपने हाथों से दण्ड देने की थी। जैसे ही वह दिखायी दिया, तानाजी उस पर कूद पड़े। दोनों में भयानक संग्राम होने लगा। उदयभानु भी कम वीर नहीं था। उसकी तलवार के वार से तानाजी की ढाल कट गयी। इस पर तानाजी हाथ पर कपड़ा लपेट कर लड़ने लगे; पर अन्ततः तानाजी वीरगति को प्राप्त हुए। यह देख मामा शेलार ने अपनी तलवार के भीषण वार से उदयभानु को यमलोक पहुँचा दिया। ताना जी और उदयभानु, दोनों एक साथ धरती माता की गोद में सो गये।

जब शिवाजी को यह समाचार मिला, तो उन्होंने भरे गले से कहा - गढ़ तो आया; पर मेरा सिंह चला गया। तब से इस किले का नाम ‘सिंहगढ़’ हो गया। किले के द्वार पर तानाजी की भव्य मूर्ति तथा समाधि निजी कार्य से देशकार्य को अधिक महत्त्व देने वाले उस वीर की सदा याद दिलाती है।

Tuesday, 3 March 2020

08:38

3 मार्च करगिल युद्ध का सूरमा संजय कुमार जी के जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



3 मार्च
करगिल युद्ध का सूरमा संजय कुमार जी के जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


भारत माता वीरों की जननी है। इसकी कोख में एक से बढ़कर एक वीर पले हैं। ऐसा ही एक वीर है संजय कुमार, जिसने करगिल के युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया। इसके लिए भारत के राष्ट्रपति महोदय ने उसे युद्धकाल में अनुपम शौर्य के प्रदर्शन पर दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ देकर सम्मानित किया।

संजय का जन्म ग्राम बकैण (बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश) में श्री दुर्गाराम व श्रीमती भागदेई के घर में 3 मार्च, 1976 को हुआ था। संजय ने 1998 में 13 जैक रायफल्स में लान्सनायक के रूप में सैनिक जीवन प्रारम्भ किया। कुछ समय बाद जकातखाना ग्राम की प्रमिला से उसकी मँगनी हो गयी।

इधर संजय और प्रमिला विवाह के मधुर सपने सँजो रहे थे, उधर भारत की सीमा पर रणभेरी बजने लगी। धूर्त पाकिस्तान सदा से ही भारत को आँखें दिखाता आया है। उसने अपने जन्म के तुरन्त बाद कश्मीर पर हमला किया और उसके एक बड़े भाग पर कब्जा कर लिया।

प्रधानमन्त्री नेहरू जी की भूल के कारण आज भी वह क्षेत्र उसके कब्जे में ही है। 1965 और 1971 में उसने फिर प्रयास किया; पर भारतीय वीरों ने हर बार उसे धूल चटायी। इससे वह जलभुन उठा और हर समय भारत को नीचा दिखाने का प्रयास करने लगा। ऐसा ही एक प्रयास उसने 1999 में किया।

देश की ऊँची पहाड़ी सीमाओं से भारत और पाकिस्तान के सैनिक भीषण सर्दी के दिनों में पीछे लौट जाते थे। यह प्रथा वर्षों पूर्व हुए एक समझौते के अन्तर्गत चल रही थी; पर 1999 की सर्दी कम होने पर जब भारतीय सैनिक वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि पाकिस्तानियों ने भारतीय क्षेत्र में बंकर बना लिये हैं।

कुछ समय तक तो उन्हें और लाहौर में बैठे उनके आकाओं को शान्ति से समझाने का प्रयास किया गया; पर जब बात नहीं बनी, तो भारत की ओर से भी युद्ध घोषित कर दिया गया।

संजय कुमार के दल को इस युद्ध में मश्कोह घाटी के सबसे कठिन मोर्चे पर तैनात किया गया था। भर्ती होने के एक वर्ष के भीतर ही देश के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी मिलने से वह अत्यधिक उत्साहित थे। पाकिस्तानी सैनिक वहाँ भारी गोलाबारी कर रहे थे।

इस पर भी संजय ने हिम्मत नहीं हारी और आमने-सामने के युद्ध में उन्होंने तीन शत्रु सैनिकों को ढेर कर दिया। यद्यपि इसमें संजय स्वयं भी बुरी तरह घायल हो गये; पर घावों से बहते रक्त की चिन्ता किये बिना वह दूसरे मोर्चे पर पहुुँच गये।

दूसरा मोर्चा भी आसान नहीं था; पर संजय कुमार ने वहाँ भी अपनी राइफल से गोली बरसाते हुए सभी पाकिस्तानी सैनिकों को जहन्नुम पहुँचा दिया। जब उनके साथियों ने उस दुर्गम पहाड़ी पर तिरंगा फहराया, तो संजय का मन प्रसन्नता से नाच उठा; पर तब तक बहुत अधिक खून निकलने के कारण उनकी स्थिति खराब हो गयी थी। साथियों ने उन्हें शीघ्रता से आधार शिविर और फिर अस्पताल पहुँचाया, जहाँ वह शीघ्र ही स्वस्थ हो गये।

सामरिक दृष्टि से मश्कोह घाटी का मोर्चा अत्यन्त कठिन एवं महत्त्वपूर्ण था। इस जीत में संजय कुमार की विशिष्ट भूमिका को देखकर सैनिक अधिकारियों की संस्तुति पर राष्ट्रपति श्री के.आर.नारायणन ने 26 जनवरी, 2000 को उन्हें ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया। संजय कुमार आज भी सेना में तैनात हैं। उनकी इच्छा है कि उनका बेटा भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करे।

Wednesday, 26 February 2020

08:12

रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर विशेष-के सी शर्मा*




रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर विशेष-के सी शर्मा*

वे स्वामी विवेकानंद के गुरु थे। हिन्दी पंचांग के अनुसार रामकृष्ण परमहंस का जन्म फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर हुआ था। इस साल ये तिथि 25 फरवरी को है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से परमहंसजी का जन्म 18 फरवरी 1836 को बंगाल के कामारपुर में हुआ था। उनकी मृत्यु 16 अगस्त 1886 को कोलकाता में हुई थी। उनकी जयंती के अवसर पर जानिए 3 ऐसे प्रेरक प्रसंग, जो सुखी और सफल जीवन के सूत्र बताते हैं...
पहला प्रसंग - सभी लोग भक्ति क्यों नहीं कर पाते हैं?
एक दिन रामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य ने पूछा कि इंसान के मन में सांसारिक चीजों को पाने की और इच्छाओं को लेकर व्याकुलता रहती है। व्यक्ति इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए लगातार कोशिश करता है। ऐसी व्याकुलता भगवान को पाने की, भक्ति करने की क्यों नहीं होती है?
परमहंसजी ने जवाब दिया कि व्यक्ति अज्ञानता की वजह से भक्ति नहीं कर पाता है। अधिकतर लोग सांसारिक वस्तुओं को पाने के भ्रम में उलझे रहते हैं, मोह-माया में फंसे होने की वजह से व्यक्ति भगवान की ओर ध्यान नहीं दे पाता है। इसके बाद शिष्य ने फिर पूछा कि ये भ्रम और काम वासनाओं को कैसे दूर किया जा सकता है?
परमहंसजी ने जवाब दिया कि सांसारिक वस्तुएं भोग हैं और जब तक भोग का अंत नहीं होगा, तब तक व्यक्ति भगवान की ओर मन नहीं लगा पाएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि कोई बच्चा खिलौने से खेलने में व्यस्त रहता है और अपनी मां को याद नहीं करता है। जब उसका मन खिलौने से भर जाता है या उसका खेल खत्म हो जाता है, तब उसे मां की याद आती है। यही स्थिति हमारे साथ भी है।
जब तक हमारा मन सांसारिक वस्तुओं और कामनाओं के खिलौनों में उलझा रहेगा, तब तक हमें भी अपनी मां यानी परमात्मा का ध्यान नहीं आएगा। भगवान को पाने के लिए, भक्ति के लिए हमें भोग-विलास से दूरी बनानी पड़ेगी, तभी हम भगवान की ओर ध्यान दे पाएंगे।
दूसरा प्रसंग - जो लोग नियमों को तोड़ते हैं, उन्हें दंड जरूर मिलता है
एक दिन रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। वे धर्म और अध्यात्म से जुड़ी बातें कर रहे थे। तभी एक शिष्य ने कहा कि ये सृष्टि इतनी बड़ी है। यहां इतनी विविधता है, फिर भी संपूर्ण सृष्टि पूरे नियंत्रण के साथ चल रही है, ऐसा कैसे हो रहा है?
परमहंसजी ने जवाब दिया कि इस सृष्टि की रचना परमात्मा ने की है और उनका पूरा नियंत्रण है इस पर। ईश्वर के नियमों में जरा भी ढील नहीं है, उनका कानून बहुत सख्त है। जो जैसा करेगा, उसे वैसा ही फल मिलेगा।
जंगल में अंसख्य जानवर हैं, सभी को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और सभी अच्छी तरह करते भी हैं। ये शक्ति भगवान ने ही दी है। आकाश में असंख्य ग्रह-नक्षत्र हैं, सभी अपनी धूरी पर अपने नियमों के साथ टिके हुए हैं। एक भी ग्रह सृष्टि के नियमों से अलग नहीं जाता है। हमारे में समाज में असंख्य लोग हैं, सभी की सोच अलग है, लेकिन एक-दूसरे से प्रेम और मैत्री भाव के साथ रहते हैं। जो लोग सृष्टि के नियमों को तोड़ता है, प्रकृति उन्हें दंड जरूर देती है।
ये पूरी सृष्टि परम पिता परमेश्वर का परिवार है, सभी पर भगवान का नियंत्रण है। यहां सभी को अपने नियमों का पालन सख्ती से करना ही पड़ता है। इसीलिए हमें गलत कामों से बचना चाहिए, वरना प्रकृति के नियम बहुत कठोर हैं।
तीसरा प्रसंग - भक्ति में किसी एक रास्ते पर आगे बढ़ते रहना चाहिए
एक चर्चित प्रसंग के अनुसार एक बार रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्य से बात कर रहे थे। तब उन्होंने कहा कि ईश्वर एक ही है, उस तक पहुंचने के मार्ग अलग-अलग हैं। इसीलिए हमें सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है ईश्वर तक पहुंचना। भक्ति के तरीके-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।
ये बात सुनकर शिष्य ने कहा कि हम ये कैसे मान सकते हैं कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य तक पहुंच रहे हैं? परमहंसजी ने कहा कि सभी रास्ते सत्य हैं। किसी भी एक रास्ते पर दृढ़ता से आगे बढ़ते रहने से एक दिन हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने शिष्य को समझाते हुए कहा कि किसी अनजाने घर की छत पर पहुंचना कठिन है। छत पर पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं, जैसे सीढ़ियों से, रस्सी से या किसी बांस के सहारे हम ऊपर पहुंच सकते हैं। हमें इनमें से किसी एक रास्ते को चुनना होगा। जब एक बार किसी तरह छत पर पहुंच जाते हैं तो सारी स्थितियां स्पष्ट नजर आती हैं। नीचे से ऊपर देखने पर जो रास्ते भ्रमित कर रहे थे, वे ऊपर से नीचे देखने पर एकदम साफ-साफ दिखाई देते हैं।
हमें भक्ति करते समय किसी एक रास्ते पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते रहना चाहिए। अलग-अलग रास्तों को देखकर भटकना नहीं चाहिए। तभी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है।

Sunday, 23 February 2020

09:48

राष्ट्रसन्त गाडगे बाबा जी के जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा*



गाडगे बाबा का जन्म एक अत्यन्त निर्धन परिवार में 23 फरवरी, 1876 को ग्राम कोतेगाँव (अमरावती, महाराष्ट्र) में हुआ था। उनका बचपन का नाम डेबूजी था। निर्धनता के कारण उन्हें किसी प्रकार की विद्यालयी शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी। कुछ बड़े होने पर उनके मामा चन्द्रभान जी उन्हें अपने साथ ले गये। वहाँ वे उनकी गाय चराने लगे। इस प्रकार उनका समय व्यतीत होने लगा।

प्रभुभक्त होने के कारण डेबूजी ने बहुत पिछड़ी मानी जाने वाली गोवारी जाति के लोगों की एक भजनमंडली बनायी, जो रात में पास के गाँवों में जाकर भजन गाती थी। वे विकलांगों, भिखारियों आदि को नदी किनारे एकत्र कर खाना खिलाते थे। इन सामाजिक कार्यों से उनके मामा बहुत नाराज होते थे।

जब वे 15 साल के हुए, तो मामा उन्हें खेतों में काम के लिए भेजने लगे। वहाँ भी वे अन्य मजदूरों के साथ भजन गाते रहते थे। इससे खेत का काम किसी को बोझ नहीं लगता था। 1892 में कुन्ताबाई से उनका विवाह हो गया; पर उनका मन खेती की बजाय समाजसेवा में ही लगता था।

उन्हें बार-बार लगता था कि उनका जन्म केवल घर-गृहस्थी की चक्की में पिसने के लिए ही नहीं हुआ है। 1 फरवरी, 1905 को उन्होंने अपनी माँ सखूबाई के चरण छूकर घर छोड़ दिया। घर छोड़ने के कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम गोविन्दा रखा गया।

घर छोड़ते समय उनके शरीर पर फटी धोती, हाथ में फूटा मटका एवं एक लकड़ी थी। अगले 12 साल उन्होंने भ्रमण में बिताये। इस दौरान उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर रूपी षडरिपुओं को जीतने का अभ्यास भी किया। उनके बाल और दाढ़ी बढ़ गयी। कपड़े भी फट गये; पर उनका ध्यान इस ओर नहीं था। अब लोग उन्हें ‘गाडगे बाबा’ कहने लगे।

समाज सेवा के लिए समर्पित गाडगे बाबा ने 1908 से 1910 के बीच ऋणमोचन नामक तीर्थ में दो बाँध बनवाये। इससे ग्रामीणों को हर साल आने वाली बाढ़ के कष्टों से राहत मिली। 1908 में ही उन्होंने एक लाख रु0 एकत्रकर मुर्तिजापुर में एक विद्यालय तथा धर्मशाला बनवायी।

1920 से 1925 के दौरान बाबा ने पंढरपुर तीर्थ में चोखामेला धर्मशाला, मराठा धर्मशाला और धोबी धर्मशाला बनवायी। फिर एक छात्रावास भी बनवाया। इन सबके लिए वे जनता से ही धन एकत्र करते थे। 1930-32 में नासिक जाकर बाबा ने एक धर्मशाला बनवायी। इसमें तीन लाख रुपये व्यय हुआ।

बाबा जहाँ भी जाते, वहाँ पर ही कोई सामाजिक कार्य अवश्य प्रारम्भ करते थे। इसके बाद वे कोई संस्था या न्यास बनाकर उन्हें स्थानीय लोगों को सौंपकर आगे चल देते थे। वे स्वयं किसी स्थान से नहीं बँधे। अपने जीवनकाल में विद्यालय, धर्मशाला, चिकित्सालय जैसे लगभग 50 प्रकल्प उन्होंने प्रारम्भ कराये। इनसे सभी जाति और वर्गों के लोग लाभ उठाते थे। पंढरपुर की हरिजन धर्मशाला बनवाकर उन्होंने उसे डा. अम्बेडकर को सौंप दिया।

अपने प्रवास के दौरान बाबा गाडगे अन्धश्रद्धा, पाखंड, जातिभेद, अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों तथा गरीबी उन्मूलन के प्रयास भी करते थे। चूँकि वे अपने मन, वचन और कर्म से इसी काम में लगे थे, इसलिए लोगों पर उनकी बातों का असर होता था। अपने सक्रिय सामाजिक जीवन के 80 वर्ष पूर्णकर 20 दिसम्बर, 1956 को बाबा ने देहत्याग दी। महाराष्ट्र के विभिन्न तीर्थस्थानों पर उनके द्वारा स्थापित सेवा प्रकल्प आज भी बाबा की याद दिलाते हैं।

Wednesday, 19 February 2020

08:08

अग्निधर्मी पत्रकार रामदहिन ओझा जी के बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा





अग्निधर्मी पत्रकार रामदहिन ओझा जी के बलिदान दिवस पर  विशेष-के सी शर्मा*

रामदहिन ओझा का जन्म श्री सूचित ओझा के घर 1901 की महाशिवरात्रि को ग्राम बाँसडीह (जिला बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं हुई। इसके बाद इनके पिता ने इन्हें उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता भेज दिया। वहाँ इनका सम्पर्क क्रान्तिकारियों से हुआ। इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कूदना शिक्षा से अधिक जरूरी समझा।

1921 में जब गांधी जी ने सत्याग्रह का आह्नान किया, तो जो सात सत्याग्रही सर्वप्रथम जेल गये, उनमें ये भी थे। गांधी जी ने अपने पत्र ‘हरिजन’ में इनके साहस की प्रशंसा करते हुए इन्हें ‘सप्तर्षिमंडल’ की संज्ञा दी थी। इनकी गतिविधियों से चिंतित होकर 11 मार्च 1921 को बलिया के जिलाधीश ने इन्हें तुरन्त जिला छोड़ने का आदेश दिया। अतः ये गाजीपुर आकर स्वतन्त्रता के लिए अलख जगाने लगे। इस पर 15 अप्रैल को गाजीपुर के जिलाधीश ने भी इन्हें जिला छोड़ने को कह दिया। 16 मई, 1921 को इन्हें गिरफ्तार कर छह महीने का कठोर कारावास दिया गया। 30 जनवरी, 1922 को फिर इन्हें पकड़कर एक साल के लिए जेल में डाल दिया।

सजा पूरी कर वे कोलकाता चले गये और वहाँ ‘विश्वमित्र’ नामक दैनिक समाचार पत्र से जुड़ गये। कुछ समय बाद वे ‘युगान्तर’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र के सम्पादक बने। इसके मुखपृष्ठ पर यह पंक्ति छपती थी - मुक्त हों हाथ, हथकड़ी टूटे, राष्ट्र का सिंहनाद घर-घर हो। इसी से पता लगता है कि समाचार पत्र में क्या होता होगा। इसके बाद वे ‘शेखावाटी’ समाचार पत्र के सम्पादक भी बने। वे जिस पत्र में भी रहे, उनकी कलम सदा अंग्रेजों के विरुद्ध आग ही उगलती रही।

युगान्तर में 4 अगस्त, 1924 को उन्होंने लिखा, ‘‘मालूम पड़ता है भारतीय सदा गुलाम ही रहना चाहते हैं। वह भी मामूली गुलाम नहीं। संसार के इतिहास में ऐसी गुलामी खोजे नहीं मिलेगी। पशु भी पिंजरे में बन्द रहने पर दो बूँद आँसू बहा सकते हैं; पर गुलाम भारतीय दिल खोलकर रो भी नहीं सकते।’’

इस पर शासन ने उन्हें कोलकाता छोड़ने का भी आदेश दे दिया। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 1930 के नमक आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया। शासन ने उन्हें बलिया से 27 अक्तूबर को गिरफ्तार कर छह माह के कठोर कारावास का दण्ड दिया। यह स्वाधीनता संग्राम में इनकी चौथी गिरफ्तारी थी; पर इससे भी झुकने या टूटने की बजाय इनका उत्साह और बढ़ गया।

शासन ने इन्हें रास्ते से हटाने का एक सरल मार्ग ढूँढा। इन्हें खाने में हल्का जहर दिया जाने लगा। इसके कारण 17 फरवरी, 1931 को इनकी तबियत बहुत खराब हो गयी। बलिया जेल के अधिकारियों ने बिना किसी पूर्व सूचना के उन्हें स्थानीय जमींदार महावीर प्रसाद के निवास पर पहुँचा दिया।

महादेव प्रसाद अपनी गाड़ी से उन्हें बलिया चिकित्सालय ले गये। वहाँ पर भी उन्हें उचित चिकित्सा नहीं मिली। इस पर उन्हें जानकी प्रसाद जी के आवास पर लाया गया। वहाँ रात भर तड़पने के बाद 18 फरवरी, 1931 की प्रातः उनका निधन हो गया। इस प्रकार उन्होंने केवल 30 साल की अल्पायु में ही बलिदानी चोला पहन लिया।

रामदहिन जी जैसे पत्रकारों के बारे में ही प्रख्यात पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लिखा है, ‘‘वे ही सम्पादक थे, जिनसे धनी घृणा करते थे। शासक क्रुद्ध रहा करते थे। जो हमारे ही जैसा एक पैर जेल में रखकर धर्मबुद्धि से पत्र का सम्पादन किया करते थे।’’

Saturday, 15 February 2020

15:14

15 फरवरी कूर्मांचल केसरी बद्रीदत्त पाण्डेय जी के जन्म दिवस पर-के सी शर्मा



उत्तरांचल राज्य मुख्यतः दो पर्वतीय क्षेत्रों, गढ़वाल और कुमाऊं से मिल कर बना है। कुमाऊं को प्राचीन समय से कूर्मांचल कहा जाता है। यहां के प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी श्री बद्रीदत्त पांडेय का जन्म 15 फरवरी, 1882 को हरिद्वार के प्रसिद्ध वैद्य श्री विनायक दत्त पांडेय के घर में हुआ था। अल्पावस्था में माता और पिता के देहांत के बाद इनका लालन-पालन बड़े भाई ने किया।

अल्मोड़ा में पढ़ते समय इन्होंने स्वामी विवेकानंद, महामना मदनमोहन मालवीय तथा ऐनी बेसेंट जैसे महान लोगों के भाषण सुने। बड़े भाई की मृत्यु हो जाने से इन्हें शिक्षा अधूरी छोड़कर 1902 में सरगुजा राज्य में नौकरी करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने नैनीताल में अध्यापन तथा चकराता (देहरादून) की सैनिक कार्यशाला में भी काम किया। 1908 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

पत्रकारिता में रुचि होने से प्रयाग के ‘लीडर’ तथा देहरादून के ‘कॉस्मोपोलिटिन’ पत्रों में काम करने के बाद 1913 में उन्होंने ‘अल्मोड़ा अखबार’ निकाला। जनता की कठिनाई तथा शासन के अत्याचारों के बारे में विस्तार से छापने के कारण कुछ ही दिन में यह पत्र लोकप्रिय हो गया। इससे सरकारी अधिकारी बौखला उठे। उन्होंने इनसे जमानत के नाम पर एक बड़ी राशि जमा करने को कहा। बद्रीदत्त जी ने वह राशि नहीं दी और समाचार पत्र बन्द हो गया।

1918 की विजयादशमी से बद्रीदत्त जी ने ‘शक्ति’ नामक एक नया पत्र प्रारम्भ कर दिया। कुमाऊं के स्वाधीनता तथा समाज सुधार आंदोलनों में इस पत्र तथा बद्रीदत्त जी का बहुत बड़ा योगदान है। 1916 में उन्होंने ‘कुमाऊं परिषद’ नामक संस्था बनाई, जिसे गांधी जी का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। 1920 में इसके काशीपुर अधिवेशन में पहाड़ में प्रचलित कुली और बेगार जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के प्रस्ताव पारित किये गये।

‘कुली बेगार प्रथा’ के विरोध में 1921 की मकर संक्रांति पर 40,000 लोग बागेश्वर में एकत्र हुए। बद्रीदत्त जी, हरगोविन्द पंत, मोहन जोशी आदि नेता काफी दिनों से प्रवास कर इसकी तैयारी कर रहे थे। सभा के बीच अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर डाइविल ने सैकड़ों सिपाहियों के साथ वहां आकर सबको तुरन्त चले जाने को कहा; पर बद्रीदत्त जी ने यह आदेश ठुकरा दिया। उनकी प्रेरणा से सब लोगों ने सरयू का जल हाथ में लेकर बाघनाथ भगवान के सम्मुख इस कुप्रथा को न मानने की शपथ ली और इसकी बहियां फाड़कर नदी में फेंक दीं।

इस अहिंसक क्रांति ने बद्रीदत्त जी को जनता की आंखों का तारा बना दिया। लोगों ने उन्हें ‘कूर्मांचल केसरी’ की उपाधि तथा दो स्वर्ण पदक प्रदान किये। 1962 में चीन से युद्ध के समय उन्होंने वे पदक राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दे दिये। स्वाधीनता आंदोलन में वे पांच बार जेल गये। स्वाधीनता से पूर्व तथा बाद में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा तथा 1955 में संसद के सदस्य बने।

बद्रीदत्त जी के जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आये। बरेली कारावास के समय इनका पुत्र तारकनाथ जन्माष्टमी के दिन वाराणसी में नहाते समय नदी में डूब गया। वह प्रयाग से से बी.एस-सी कर रहा था। यह सुनकर मुंबई में रह रही इनकी पुत्री जयन्ती ने आत्मदाह कर लिया। इनकी धर्मपत्नी भी बेहोश हो गयीं; पर बद्रीदत्त जी ने संयम नहीं खोया। उन दिनों वे ‘कुमाऊं का इतिहास’ लिख रहे थे। उन्होंने अपने दुख को इस पुस्तक के लेखन में विसर्जित कर दिया। यह शोधार्थियों के लिए आज भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रन्थ है।

13 जनवरी, 1965 को बद्रीदत्त जी का देहांत हुआ। उनका दाह संस्कार बागेश्वर में सरयू के तट पर किया गया, जहां से उन्होंने देश की स्वाधीनता और कुली बेगार प्रथा के विरोध में अहिंसक क्रांति का शंखनाद किया था।