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Saturday, 4 July 2020

02:34

4 जुलाईस्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



लक्ष्य की सही पहचान करे ! —
एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था. वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया. भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ, धनवान नहीं हो पाया हूँ.

स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए. उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, “तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा.”

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा. काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था. स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा, “कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो.” तो व्यक्ति ने कहा, “मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पे चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था. हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है.”

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा, “यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पे जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो.”

Thursday, 2 July 2020

00:46

2 जुलाईकन्नड़ साहित्य के उन्नायक डा. फकीरप्पा हलकट्टी जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा

कन्नड़ साहित्य एवं संस्कृति से अत्यधिक प्रेम करने वाले डा. फकीरप्पा हलकट्टी का जन्म2 जुलाई, 1880 को कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी धारवाड़ के एक निर्धन बुनकर परिवार में हुआ। इनके पिता गुरुबसप्पा अध्यापक एवं साहित्यकार थे। तीन साल में माँ दानम्मा का निधन होने के कारण उनका पालन दादी ने किया। दादी ने कर्नाटक के वीरों, धर्मात्माओं तथा साहित्यकारों की कथाएँ सुनाकर फकीरप्पा के मन में कर्नाटक के गौरवशाली इतिहास व कन्नड़ साहित्य के प्रति उत्सुकता जगा दी।
शिक्षा के प्रति रुचि के कारण उन्होंने सभी परीक्षाएँ अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कीं। 1896 में मैट्रिक पास कर वे मुम्बई आ गये। वहाँ उन्होंने अनेक भाषाओं का अध्ययन किया। मुम्बई में मराठी और गुजराती भाषी लोग बहुसंख्यक हैं। फकीरप्पा उनके साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाने लगे। उनके मन में यह भाव जाग्रत हुआ कि कन्नड़ भाषा में भी ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए। उन्होंने इसके लिए स्वयं ही प्रयास करने का निश्चय किया।
यों तो मुम्बई में फकीरप्पा विज्ञान पढ़ रहे थे;पर अधिकांश समय वे कन्नड़ साहित्य की चर्चा में ही लगाते थे। छुट्टियों में घर आकर वे पिताजी से इस विषय में खूब बात करते थे।1901-02 में उन्होंने बी.एस-सी. की डिग्री ली। इसी समय उनका विवाह भागीरथीबाई से हुआ। 1904 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। अब उनके लिए धन और प्रतिष्ठा से परिपूर्ण सरकारी नौकरी के द्वार खुले थे; पर उनके मन में तो कन्नड़ साहित्य बसा था। अतः वे बेलगाँव आकर वहाँ के प्रसिद्ध वकील श्री चौगुले के साथ काम करने लगे। कुछ समय बाद वे बीजापुर आ गये।
डा. हलकट्टी वकालत को जनसेवा का माध्यम मानते थे, इसलिए मुकदमे की फीस के रूप में ग्राहक ने जो दे दिया, उसी में सन्तोष मानते थे। वह सब भी वे पत्नी के हाथ में रख देते थे। पत्नी ने बिना शिकायत किये उससे ही परिवार चलाया। यदि कोई निर्धन उनके पास मुकदमा लेकर आता, तो वे उससे पैसे ही नहीं लेते थे। इस कारण वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।
कन्नड़ साहित्य के उत्थान में रुचि होने के कारण वकालत के बाद का समय वे इसी में लगाते थे। 1901 से 1920 तक अनेक नगरों तथा ग्रामों में भ्रमण कर उन्होंने ताड़पत्रों पर हाथ से लिखी एक हजार से भी अधिक प्राचीन पाण्डुलिपियाँ एकत्र कीं। न्यायालय से आते ही वे उनके अध्ययन, सम्पादन और वर्गीकरण में जुट जाते थे। 1921 में वे बीजापुर से बेलगाँव चले गये। वहाँ उनकी वकालत तो खूब बढ़ी; पर साहित्य साधना में व्यवधान आ गया। अतः दो साल बाद वे फिर बीजापुर लौट आये। डा. हलकट्टी के ज्ञान,अनुभव व प्रामाणिकता को देखकर शासन ने उन्हें सरकारी वकील बना दिया।
उन्होंने अनेक दुर्लभ गद्य व पद्य कृतियों का सम्पादन किया। इनमें पंचशतक, रक्षाशतक,गिरिजा कल्याण महाप्रबन्ध, बसवराज देवर रगले, नम्बियण्णन रगले आदि प्रमुख हैं। उन्होंने भक्त कवि हरिहर का काव्य तथा12वीं शती की सामाजिक विभूतियों के जीवन चरित् सरल भाषा में लिखकर प्रकाशित किये। साहित्यिक तथा धार्मिक विषयों पर उनके हजारों शोधपूर्ण लेख छपे हैं। उन्होंने अनेक शैक्षिक, सहकारी तथा ग्राम विकास संस्थाएँ भी प्रारम्भ कीं। कन्नड़ साहित्य के इस उन्नायक का 26 जून, 1964को देहान्त हुआ।

Tuesday, 23 June 2020

20:30

24 जून का इतिहास महारानी दुर्गावती का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा




महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई. की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस और शौर्य के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

उनका विवाह गढ़ मंडला के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपतशाह से हुआ। 52 गढ़ तथा 35,000 गांवों वाले गोंड साम्राज्य का क्षेत्रफल 67,500 वर्गमील था। यद्यपि दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया।

पर दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मंदिर, मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य उनके देवर सहित कई लोगों की आंखों में चुभ रहा था। मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया; पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में सेनाएं भेज दीं। आसफ खां गोंडवाना के उत्तर में कड़ा मानकपुर का सूबेदार था।

एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ; पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये। रानी की भी अपार क्षति हुई। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। तब तक रात घिर आयी। वर्षा होने से नाले में पानी भी भर गया।

अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था। अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा। रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया। रानी ने इसे भी निकाला; पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।

रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे; पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को प्रचुर धन की प्राप्ति हुई। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, वहां रानी की समाधि बनी है। देशप्रेमी वहां जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

Sunday, 21 June 2020

13:10

22 जुन स्वाभिमान के सूर्य पंडित सूर्यनारायण व्यास जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



उज्जैन महाकाल की नगरी है। अंग्रेजी साम्राज्य का डंका जब पूरी दुनिया में बजा, तो जी.एम.टी (ग्रीनविच मीन टाइम) को मानक मान लिया गया; पर इससे पूर्व उज्जैन से ही विश्व भर में समय निर्धारित किया जाता था। इसी उज्जैन के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित नारायण व्यास और श्रीमती रेणुदेवी के घर में दो मार्च, 1902 को सूर्यनारायण व्यास का जन्म हुआ। वे ज्योतिष और खगोलशास्त्री के साथ ही लेखक, पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी, इतिहासकार, पुरात्ववेत्ता आदि के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। जिन महर्षि सांदीपनी के आश्रम में श्रीकृष्ण और बलराम पढ़े थे, यह परिवार उन्हीं का वंशज है। 

श्री व्यास ने अपने पिताजी के आश्रम तथा फिर वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। आठ वर्ष की अवस्था से ही उन्होंने लेखन प्रारम्भ कर दिया था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान 1934 में उन्होंने उज्जैन के जत्थे का नेतृत्व कर अजमेर में गिरफ्तारी दी और 16 मास जेल में रहे। 

जेल से आकर जहां एक ओर वे अपने लेखन से जनता को जगाते रहे, तो दूसरी ओर सशस्त्र क्रांति में भी सहयोगी बने। क्रांतिकारियों को उनसे आर्थिक सहायता तथा उनके घर में शरण भी मिलती थी। सुभाष चंद्र बोस के आह्नान पर उन्होंने अजमेर स्थित लार्ड मेयो की मूर्ति तोड़ी और उसका एक हाथ अपने घर ले आये। 1942 में उन्होंने एक गुप्त रेडियो स्टेशन भी चलाया। 

प्रख्यात ज्योतिषी होने के कारण देश-विदेश के अधिकांश बड़े नेता तथा धनपति उनसे परामर्श करते रहते थे। स्वाधीनता से पूर्व वे 144 राजघरानों के राज ज्योतिषी थे। चीन से हुए युद्ध के बारे में उनकी बात ठीक निकली। उन्होंने लालबहादुर शास्त्री को भी ताशकंद न जाने को कहा था। 

व्यास जी ने फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रिया, इंग्लैंड, रोम आदि की यात्रा की। हिटलर ने भी उनसे अपने भविष्य के बारे में परामर्श किया था। उन्होंने 1930 में ‘आज’ में प्रकाशित एक लेख में कहा था कि भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र होगा। उन्होंने विवाह भी स्वाधीन होने के बाद 1948 में ही किया। 

उज्जैन महाकवि कालिदास की नगरी है; पर वहां उनकी स्मृति में कोई स्मारक या संस्था नहीं थी। अतः उन्होंने ‘अखिल भारतीय कालिदास परिषद’ तथा ‘कालिदास अकादमी’ जैसी संस्थाएं गठित कीं। इनके माध्यम से प्रतिवर्ष ‘अखिल भारतीय कालिदास महोत्सव’ का आयोजन होता है। उनके प्रयास से सोवियत रूस में और फिर 1958 में भारत में कालिदास पर डाक टिकट जारी हुआ। 1956 में कालिदास पर फीचर फिल्म भी उनके प्रयास से ही बनी। 

उज्जैन भारत के पराक्रमी सम्राट विक्रमादित्य की भी राजधानी थी। व्यास जी ने 1942 में ‘विक्रम द्विसहस्राब्दी महोत्सव अभियान’ के अन्तर्गत ‘विक्रम’ नामक पत्र निकाला तथा विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर आदि कई संस्थाओं की स्थापना की। इस अवसर पर हिन्दी, मराठी तथा अंग्रेजी में ‘विक्रम स्मृति ग्रंथ’ प्रकाशित हुआ। ‘प्रकाश पिक्चर्स’ ने पृथ्वीराज कपूर तथा रत्नमाला को लेकर विक्रमादित्य पर एक फीचर फिल्म भी बनाई। 

व्यास जी हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने हजारों लेख, निबन्ध, व्यंग्य, अनुवाद, यात्रा वृतांत आदि लिखे। 1958 में उन्हें राष्ट्रपति की ओर से ‘पद्मभूषण’ अलंकरण प्रदान किया गया; पर अंग्रेजी को लगातार जारी रखने वाले विधेयक के विरोध में उन्होंने 1967 में इसे लौटा दिया। 

सैकड़ों संस्थाओं द्वारा सम्मानित श्री व्यास देश के गौरव थे। उज्जैन की हर गतिविधि में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी। कालिदास तथा विक्रमादित्य के नाम पर बनी संस्थाओं के संचालन के लिए उन्होंने पूर्वजों द्वारा संचित निधि भी खुले हाथ से खर्च की। 22 जून, 1976 को ऐसे विद्वान मनीषी का देहांत हुआ।
13:06

22 जूननगर सेठ अमरचन्द बांठिया का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।

अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।

उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें; पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।

अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे; पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।

अब अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। यह बहुत कठिन घड़ी थी; पर सेठ जी विचलित नहीं हुए। इस पर उनके पुत्र को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया गया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया। इसके बाद सेठ जी के लिए 22 जून, 1858 को फाँसी की तिथि निश्चित कर दी गयी। इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया गया कि सेठ जी को 'सर्राफा बाजार' में ही फाँसी दी जाएगी।

अन्ततः 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे। अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दी गयी; पर धर्मप्रेमी सेठ जी को फाँसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया। एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फाँसी दी जा रही थी। तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया। 
सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धा॰जलि अर्पित करते हैं।

Saturday, 20 June 2020

20:08

21 जूनआवारा मसीहा विष्णु प्रभाकर जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



बंगला उपन्यासकार शरद चंद्र के जीवन पर ‘आवारा मसीहा’ जैसी कालजयी रचना लिखने वाले हिन्दी कथाकार श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को मीरापुर (मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) में हुआ था। 

उनका प्रारम्भिक जीवन हरियाणा के हिसार नगर में व्यतीत हुआ। वहां से ही उन्होंने 1929 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे नौकरी करने लगे। साथ-साथ ही उन्होंने हिन्दीभूषण,  प्राज्ञ, हिन्दी प्रभाकर तथा बी.ए. भी किया। 1944 में वे दिल्ली आ गये। कुछ समय अखिल भारतीय आयुर्वेद महामंडल तथा आकाशवाणी में काम करने के बाद वे पूरी तरह मसिजीवी हो गये।

विष्णु जी स्वतंत्रता आंदोलन में 1940 और 42 में गिरफ्तार हुए और शासनादेश के कारण उन्हें पंजाब छोड़ना पड़ा। उन्हीं दिनों उन्होंने खादी पहनने का संकल्प लिया और उसे जीवन भर निभाया। उन्होंने हिन्दी की प्रायः सभी विधाओं कहानी,  नाटक,  उपन्यास, यात्रावृत, रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, बाल साहित्य आदि में उन्होंने प्रचुर लेखन किया। फिर भी वे स्वयं को मुख्यतः कहानीकार ही मानते थे। 

अपने प्रारम्भिक जीवन में वे रंगमंच से भी सम्बद्ध रहे। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन किया। हिन्दी की इस सेवा के लिए उन्हंे देश-विदेश की हजारों संस्थाओं ने सम्मानित किया। राष्ट्रपति डा. कलाम ने भी उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया था।

विष्णु जी ने अपना जीवन अपने ढंग से जिया, इसके लिए उन्होंने किसी से समझौता नहीं किया। भारत देश और हिन्दी भाषा के प्रति उनके मन में बहुत प्रेम था। अंत्यन्त स्वाभिमानी विष्णु जी ने कभी सत्ता के सम्मुख घुटने नहीं टेके। स्वामी दयानंद और गांधी जी के विचारों की छाप उनके मन, वचन और कर्म से सर्वत्र दिखाई देती थी। वे स्वतंत्र चिंतन के पक्षधर थे, अतः विरोधी विचारों का भी खुलकर स्वागत करते थे।

उन्होंने देश के हर भाग की यात्रा कर समाज जीवन का व्यापक अनुभव बटोरा था। इसीलिए उनका लेखन रोचक और जीवंत होता था। जब वे दिल्ली में होते थे, तो सुबह गांधी समाधि पर टहलने अवश्य जाते थे। इसी प्रकार वे शाम को मोहन सिंह प्लेस स्थित  काफी हाउस पहुंचते थे, जहां कई पीढ़ी के लेखकों से उनकी भेंट हो जाती थी। वहां साहित्य पर गहरा विमर्श तो होता ही था, हंसी-मजाक भी भरपूर होती थी। देश भर के हजारों लेखकों व पाठकों से वे पत्र-व्यवहार द्वारा सम्पर्क बनाकर रखते थे।

अपनी रचनाओं में वे जाति, भाषा, धर्म के आधार होने वाले भेद तथा नारी समस्याओं को प्रखरता से उठाते थे। समय, समाज व संस्कृति पर की गयी उनकी टिप्पणियां शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। आकाशवाणी के लिए लिखे गये रूपक व नाटकों में उन्होंने कई नये प्रयोग किये, जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा। 

'आवारा मसीहा' उनकी सर्वाधिक चर्चित रचना है। इसके लिए उन्होंने जीवन के 14 वर्ष लगाये। उन्होंने बंगला भाषा सीखकर शरदचंद्र के सैकड़ों समकालीन लोगों से बात की और बिहार, बंगाल तथा बर्मा का व्यापक भ्रमण किया। इससे पूर्व शरदचंद्र की कोई प्रामाणिक जीवनी नहीं थी। अतः हिन्दी के साथ ही बंगलाभाषियों ने भी इसका भरपूर स्वागत किया।

भारतीय साहित्य के इस भीष्म पितामह का 11 अपै्रल, 2009 को 97वर्ष की सुदीर्घ आयु में देहांत हुआ। वे जीवन भर अतिवाद, रूढ़िवाद और कर्मकांडों से मुक्त रहे। उनकी इच्छानुसार मृत्यु के बाद उनका शरीर छात्रों के उपयोग के लिए अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान को दान कर दिया गया।
20:06

21 जुन संघ संस्थापक डा. हेडगेवार जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा


विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नतहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता डा. केशवराव हेडगेवार का जन्म एक अपै्रल, 1889 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वि. सम्वत् 1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं।

केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते  हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई। 

वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया।

उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। 

सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे।

उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है।

प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे।

डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।

Wednesday, 17 June 2020

17:38

18 जून इतिहास-स्मृति हल्दीघाटी का महासमर पर विशेष-के सी शर्मा

18 जून, 1576 को सूर्य प्रतिदिन की भाँति उदित हुआ; पर वह उस दिन कुछ अधिक लाल दिखायी दे रहा था। चूँकि उस दिन हल्दीघाटी में खून की होली खेली जाने वाली थी। एक ओर लोसिंग में अपने प्रिय चेतक पर सवार हिन्दुआ सूर्य महाराणा प्रताप देश की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए डटे थे, तो दूसरी ओर मोलेला गाँव में मुगलों का पिट्ठू मानसिंह पड़ाव डाले था।

सूर्योदय के तीन घण्टे बाद मानसिंह ने राणा प्रताप की सेना की थाह लेने के लिए अपनी एक टुकड़ी घाटी के मुहाने पर भेजी। यह देखकर राणा प्रताप ने युद्ध प्रारम्भ कर दिया। फिर क्या था; मानसिंह तथा राणा की सेनाएँ परस्पर भिड़ गयीं। लोहे से लोहा बज उठा। खून के फव्वारे छूटने लगे। चारों ओर लाशों के ढेर लग गये। भारतीय वीरों ने हमलावरों के छक्के छुड़ा दिये।

यह देखकर मुगल सेना ने तोपों के मुँह खोल दिये। ऊपर सूरज तप रहा था, तो नीचे तोपें आग उगल रही थीं। प्रताप ने अपने साथियों को ललकारा - साथियो, छीन लो इनकी तोपें। आज विधर्मियों की पूर्ण पराजय तक युद्ध चलेगा। धर्म व मातृभूमि के लिए मरने का अवसर बार-बार नहीं आता। स्वातन्त्र्य योद्धा यह सुनकर पूरी ताकत से शत्रुओं पर पिल पड़े।

राणा की आँखें युद्धभूमि में देश और धर्म के द्रोही मानसिंह को ढूँढ रही थीं। वे उससे दो-दो हाथकर धरती को उसके भार से मुक्त करना चाहते थे। चेतक भी यह समझ रहा था। उसने मानसिंह को एक हाथी पर बैठे देखा, तो वह उधर ही बढ़ गया। पलक झपकते ही उसने हाथी के मस्तक पर अपने दोनों अगले पाँव रख दिये।

राणा प्रताप ने पूरी ताकत से निशाना साधकर अपना भाला फेंका; पर अचानक महावत सामने आ गया। भाले ने उसकी ही बलि ले ली। उधर मानसिंह हौदे में छिप गया। हाथी बिना महावत के ही मैदान छोड़कर भाग गया। भागते हुए उसने अनेक मुगल सैनिकों को जहन्नुम भेज दिया।

मुगल सेना में इससे निराशा फैल गयी। तभी रणभूमि से भागे मानसिंह ने एक चालाकी की। उसकी सेना के सुरक्षित दस्ते ने ढोल नगाड़ों के साथ युद्धभूमि में प्रवेश किया और यह झूठा शोर मचा दिया कि बादशाह अकबर खुद लड़ने आ गये हैं। इससे मुगल सेना के पाँव थम गये। वे दुगने जोश से युद्ध करने लगे। 

इधर राणा प्रताप घावों से निढाल हो चुके थे। मानसिंह के बच निकलने का उन्हें बहुत खेद था। उनकी सेना सब ओर से घिर चुकी थी। मुगल सेना संख्याबल में भी तीन गुनी थी। फिर भी वे पूरे दम से लड़ रहे थे।

ऐसे में यह रणनीति बनायी गयी कि पीछे हटते हुए मुगल सेना को पहाड़ियों की ओर खींच लिया जाये। इस पर कार्यवाही प्रारम्भ हो गयी। ऐसे समय में झाला मानसिंह ने आग्रहपूर्वक उनका छत्र और मुकुट स्वयं धारण कर लिया। उन्होंने कहा - महाराज, एक झाला के मरने से कोई अन्तर नहीं आयेगा। यदि आप बच गये, तो कई झाला तैयार हो जायेंगे;पर यदि आप नहीं बचे, तो देश किसके भरोसे विदेशी हमलावरों से युद्ध करेगा ?

छत्र और मुकुट के धोखे में मुगल सेना झाला से ही युद्ध में उलझी रही और राणा प्रताप सुरक्षित निकल गये। मुगलों के हाथ कुछ नहीं आया। इस युद्ध में राणा प्रताप और चेतक के कौशल का जीवन्त वर्णन पण्डित श्यामनारायण पाण्डेय ने अपने काव्य ‘हल्दीघाटी’ में किया है।
17:35

18 जुन उपन्यासकार बाबू देवकीनन्दन खत्री जी का जन्मदिन.(जिनके उपन्यासों को पढ़ने के लिए ही लाखों लोगों ने हिन्दी सीखी )पर विशेष-के सी शर्मा




हिन्दी में ग्रामीण पृष्ठभूमि पर सामाजिक समस्याओं को जाग्रत करने वाले उपन्यास लिखने के लिए जहाँ प्रेमचन्द को याद किया जाता है; वहाँ जासूसी उपन्यास विधा को लोकप्रिय करने का श्रेय बाबू देवकीनन्दन खत्री को है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में एक समय ऐसा भी आया था, जब खत्री जी के उपन्यासों को पढ़ने के लिए ही लाखों लोगों ने हिन्दी सीखी थी।

बाबू देवकीनन्दन खत्री का जन्म अपने ननिहाल पूसा (मुजफ्फरपुर, बिहार) में 18 जून, 1861 को हुआ था। इनके पिता श्री ईश्वरदास तथा माता श्रीमती गोविन्दी थीं। इनके पूर्वज मूलतः लाहौर निवासी थे। महाराजा रणजीत सिंह के देहान्त के बाद उनके पुत्र शेरसिंह के राज्य में वहाँ अराजकता फैल गयी। अतः ये लोग काशी में बस गये। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ननिहाल में उर्दू-फारसी में ही हुई। काशी आकर इन्होंने हिन्दी, संस्कृत व अंग्रेजी सीखी।

गया के टिकारी राज्य में इनकी पैतृक व्यापारिक कोठी थी। वहाँ रहकर इन्होंने अच्छा कारोबार किया। टिकारी का प्रबन्ध अंग्रेजों के हाथ में जाने के बाद ये स्थायी रूप से काशी आ गये। काशी नरेश श्री ईश्वरी नारायण सिंह जी से इनके बहुत निकट सम्बन्ध थे। चकिया तथा नौगढ़ के जंगलों के ठेके मिलने पर इन्होंने वहाँ प्राचीन किले, गुफाओं, झाड़ियों आदि का भ्रमण किया। भावुक प्रवृति के खत्री जी को इन निर्जन और बीहड़ जंगलों में व्याप्त रहस्यों ने ऐसी प्रेरणा दी कि वे ठेकेदारी छोड़कर साहित्य की साधना में लग गये।

उन दिनों सामान्य शिक्षित वर्ग उर्दू तथा फारसी की शिक्षा को ही महत्व देता था। चारों ओर उर्दू शायरी, कहानी, उपन्यास आदि का प्रचलन था; पर इसमें शराब तथा शबाब का प्रचुर वर्णन होता था। इसका नयी पीढ़ी पर बहुत खराब असर पड़ रहा था। ऐसे में 1888 में प्रकाशित श्री देवकीनन्दन खत्री के उपन्यासों ने साहित्य की दुनिया में प्रवेशकर धूम मचा दी। उन दिनों बंगला उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद भी बहुत लोकप्रिय थे; पर हिन्दी में उपन्यास विधा का पहला मौलिक लेखक इन्हें ही माना जाता है।

इनके उपन्यासों के ‘गूढ़ पुरुष’ सदा अपने राजा के पक्ष की रक्षा तथा शत्रु-पक्ष को नष्ट करने की चालें चलते रहते हैं। इसकी प्रेरणा उन्हें संस्कृत के नीति साहित्य से मिली। उन्होंने चन्द्रकान्ता और चन्द्रकान्ता सन्तति के अतिरिक्त नरेन्द्र मोहिनी, वीरेन्द्र वीर, कुसुम कुमारी, कटोरा भर खून, लैला-मजनू, अनूठी बेगम, काजर की कोठरी, नौलखा हार, भूतनाथ, गुप्त गोदना नामक उपन्यास भी लिखे। 

चन्द्रकान्ता सन्तति के 24 खण्ड प्रकाशित हुए। भूतनाथ के छह खण्ड इनके सामने तथा 15 इनके बाद प्रकाशित हुए। इनमें रहस्य, जासूसी और कूटनीति के साथ तत्कालीन राजपूती आदर्श और फिर पतनशील राजपूती जीवन का जीवन्त वर्णन है। आगे चलकर इन्होंने सुदर्शन, साहित्य सुधा तथा उपन्यास लहरी नामक साहित्यिक पत्र भी निकाले थे।

गत वर्षों में दूरदर्शन ने अनेक साहित्यिक कृतियों को प्रसारित किया। इनमें चन्द्रकान्ता पर बना धारावाहिक बहुत लोकप्रिय हुआ। रामायण और महाभारत के बाद लोकप्रियता के क्रम में चन्द्रकान्ता का ही नाम लिया जाता है। अपनी यशस्वी लेखनी से हिन्दी में रहस्य को जीवित-जाग्रत कर हिन्दी को लोकप्रिय करने वाले अमर उपन्यासकार श्री देवकीनन्दन खत्री का एक अगस्त, 1913 को देहावसान हो गया।

Tuesday, 16 June 2020

20:26

पढ़ेआयुर्वेद विशारद महर्षि चरक पर विशेष-के सी शर्मा




महर्षि चरक एक महर्षि एवं आयुर्वेद विशारद के रूप में विख्यात हैं। वे कुषाण राज्य के राजवैद्य थे। इनके द्वारा रचित चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रन्थ है। इसमें रोगनाशक एवं रोगनिरोधक दवाओं का उल्लेख है तथा सोना, चाँदी, लोहा, पारा आदि धातुओं के भस्म एवं उनके उपयोग का वर्णन मिलता है। आचार्य चरक ने आचार्य अग्निवेश के अग्निवेशतन्त्र में कुछ स्थान तथा अध्याय जोड्कर उसे नया रूप दिया जिसे आज हम चरक संहिता के नाम से जानते है।

*परिचय:-*

चरकसंहिता आयुर्वेद में प्रसिद्ध है। इसके उपदेशक अत्रिपुत्र पुनर्वसु, ग्रंथकर्ता अग्निवेश और प्रतिसंस्कारक चरक हैं।

प्राचीन वां‌मय के परिशीलन से ज्ञात होता है कि उन दिनों ग्रंथ या तंत्र की रचना शाखा के नाम से होती थी। जैसे कठ शाखा में कठोपनिषद् बनी। शाखाएँ या चरण उन दिनों के विद्यापीठ थे, जहाँ अनेक विषयों का अध्ययन होता था। अत: संभव है, चरकसंहिता का प्रतिसंस्कार चरक शाखा में हुआ हो।

चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं, जैसे अवक्रांति, जेंताक (जंताक – विनयपिटक), भंगोदन, खुड्डाक, भूतधात्री (निद्रा के लिये)। इससे चरकसंहिता का उपदेशकाल उपनिषदों के बाद और बुद्ध के पूर्व निश्चित होता है। इसका प्रतिसंस्कार कनिष्क के समय 78 ई. के लगभग हुआ।

त्रिपिटक के चीनी अनुवाद में कनिष्क के राजवैद्य के रूप में चरक का उल्लेख है। किंतु कनिष्क बौद्ध था और उसका कवि अश्वघोष भी बौद्ध था, पर चरक संहिता में बुद्धमत का जोरदार खंडन मिलता है। अत: चरक और कनिष्क का संबंध संदिग्ध ही नहीं असंभव जान पड़ता है। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में मत स्थिर करना कठिन है।

साभार: सर्वमयं संस्कृतं
20:24

17 जून खूब लड़ी मरदानी वह तो, झाँसी वाली रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस पर विशेष- के सी शर्मा




भारत में अंग्रेजी सत्ता के आने के साथ ही गाँव-गाँव में उनके विरुद्ध विद्रोह होने लगा; पर व्यक्तिगत या बहुत छोटे स्तर पर होने के कारण इन संघर्षों को सफलता नहीं मिली। अंग्रेजों के विरुद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 में हुआ। इसमें जिन वीरों ने अपने साहस से अंग्रेजी सेनानायकों के दाँत खट्टे किये, उनमें झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम प्रमुख है।

19 नवम्बर, 1835 को वाराणसी में जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु था। प्यार से लोग उसे मणिकर्णिका तथा छबीली भी कहते थे। इनके पिता श्री मोरोपन्त ताँबे तथा माँ श्रीमती भागीरथी बाई थीं। गुड़ियों से खेलने की अवस्था से ही उसे घुड़सवारी,  तीरन्दाजी, तलवार चलाना, युद्ध करना जैसे पुरुषोचित कामों में बहुत आनन्द आता था। नाना साहब पेशवा उसके बचपन के साथियों में थे।

उन दिनों बाल विवाह का प्रचलन था। अतः सात वर्ष की अवस्था में ही मनु का विवाह झाँसी के महाराजा गंगाधरराव से हो गया। विवाह के बाद वह लक्ष्मीबाई कहलायीं। उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। जब वह 18 वर्ष की ही थीं, तब राजा का देहान्त हो गया। दुःख की बात यह भी थी कि वे तब तक निःसन्तान थे। युवावस्था के सुख देखने से पूर्व ही रानी विधवा हो गयीं।

उन दिनों अंग्रेज शासक ऐसी बिना वारिस की जागीरों तथा राज्यों को अपने कब्जे में कर लेते थे। इसी भय से राजा ने मृत्यु से पूर्व ब्रिटिश शासन तथा अपने राज्य के प्रमुख लोगों के सम्मुख दामोदर राव को दत्तक पुत्र स्वीकार कर लिया था; पर उनके परलोक सिधारते ही अंग्रेजों की लार टपकने लगी। उन्होंने दामोदर राव को मान्यता देने से मनाकर झाँसी राज्य को ब्रिटिश शासन में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सुनते ही लक्ष्मीबाई सिंहनी के समान गरज उठी - मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।

अंग्रेजों ने रानी के ही एक सरदार सदाशिव को आगे कर विद्रोह करा दिया। उसने झाँसी से 50 कि.मी दूर स्थित करोरा किले पर अधिकार कर लिया; पर रानी ने उसे परास्त कर दिया। इसी बीच ओरछा का दीवान नत्थे खाँ झाँसी पर चढ़ आया। उसके पास साठ हजार सेना थी; पर रानी ने अपने शौर्य व पराक्रम से उसे भी दिन में तारे दिखा दिये।

इधर देश में जगह-जगह सेना में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गये। झाँसी में स्थित सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों ने भी चुन-चुनकर अंग्रेज अधिकारियों को मारना शुरू कर दिया। रानी ने अब राज्य की बागडोर पूरी तरह अपने हाथ में ले ली; पर अंग्रेज उधर नयी गोटियाँ बैठा रहे थे।

जनरल ह्यू रोज ने एक बड़ी सेना लेकर झाँसी पर हमला कर दिया। रानी दामोदर राव को पीठ पर बाँधकर 22 मार्च, 1858 को युद्धक्षेत्र में उतर गयी। आठ दिन तक युद्ध चलता रहा; पर अंग्रेज आगे नहीं बढ़ सके। नौवें दिन अपने बीस हजार सैनिकों के साथ तात्या टोपे रानी की सहायता को आ गये; पर अंग्रेजों ने भी नयी कुमुक मँगा ली। रानी पीछे हटकर कालपी जा पहुँची।

कालपी से वह ग्वालियर आयीं। वहाँ 17 जून, 1858 को ब्रिगेडियर स्मिथ के साथ हुए युद्ध में उन्होंने वीरगति पायी। रानी के विश्वासपात्र बाबा गंगादास ने उनका शव अपनी झोंपड़ी में रखकर आग लगा दी। रानी केवल 22 वर्ष और सात महीने ही जीवित रहीं। पर ‘‘खूब लड़ी मरदानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी.....’’ गाकर उन्हें सदा याद किया जाता है।
20:23

17 जुन तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी की पुण्यतिथि पर विशेष- के सी शर्मा




राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति के निर्माण एवं विकास में जिनकी प्रमुख भूमिका रही है, उन श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस का जन्म 11 दिसम्बर, 1915 को नागपुर में हुआ था। वे बालासाहब के नाम से अधिक परिचित हैं। वे ही आगे चलकर संघ के तृतीय सरसंघचालक बने। 

बालासाहब ने 1927 में शाखा जाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका सम्पर्क डा0 हेडगेवार से बढ़ता गया। उन्हें मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया। इसमें विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। बालासाहब खेल में बहुत निपुण थे। कबड्डी में उन्हें विशेष मजा आता था; पर वे सदा प्रथम श्रेणी पाकर उत्तीर्ण भी होते थे। 

बालासाहब देवरस बचपन से ही खुले विचारों के थे। वे कुरीतियों तथा कालबाह्य हो चुकी परम्पराओं के घोर विरोधी थे। उनके घर पर उनके सभी जातियों के मित्र आते थे। वे सब एक साथ खाते-पीते थे। प्रारम्भ में उनकी माताजी ने इस पर आपत्ति की; पर बालासाहब के आग्रह पर वे मान गयीं। 

कानून की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने नागपुर के ‘अनाथ विद्यार्थी वसतिगृह’ में दो वर्ष अध्यापन किया। इन दिनों वे नागपुर के नगर कार्यवाह रहे। 1939 में वे प्रचारक बने, तो उन्हें कोलकाता भेजा गया; पर 1940 में डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया। 1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह के संचालन तथा फिर समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क कर उनके माध्यम से प्रतिबन्ध निरस्त कराने में बालासाहब की प्रमुख भूमिका रही।

1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया। देश भर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे। नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया। 

1965 में वे सरकार्यवाह बने। शाखा पर होने वाले गणगीत, प्रश्नोत्तर आदि उन्होंने ही शुरू कराये। संघ के कार्यक्रमों में डा0 हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के चित्र लगते हैं। बालासाहब के सरसंघचालक बनने पर कुछ लोग उनका चित्र भी लगाने लगे; पर उन्होंने इसे रोक दिया। यह उनकी प्रसिद्धि से दूर रहने की वृत्ति का ज्वलन्त उदाहरण है।

1973 में श्री गुरुजी के देहान्त के बाद वे सरसंघचालक बने। 1975 में संघ पर लगे प्रतिबन्ध का सामना उन्होंने धैर्य से किया। वे आपातकाल के पूरे समय पुणे की जेल में रहे; पर सत्याग्रह और फिर चुनाव के माध्यम से देश को इन्दिरा गांधी की तानाशाही से मुक्त कराने की इस चुनौती में संघ सफल हुआ। मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक उन्होंने यह दायित्व निभाया। 

इस दौरान उन्होंने संघ कार्य में अनेक नये आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्धन बस्तियों में चलने वाले सेवा के कार्य हैं। इससे वहाँ चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गयी थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। मीनाक्षीपुरम् कांड के बाद एकात्मता यात्रा तथा फिर श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान हिन्दू शक्ति का जो भव्य रूप प्रकट हुआ, उसमें इन सब संगठनों के काम और प्रभाव की व्यापक भूमिका है।

जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तो उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व मा0 रज्जू भैया को सौंप दिया। 17 जून, 1996 को उन्होंने अन्तिम श्वास ली। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार रेशीमबाग की बजाय नागपुर में सामान्य नागरिकों के शमशान घाट में किया गया।
20:20

नलिनीकान्त बागची का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में यद्यपि क्रान्तिकारियों की चर्चा कम ही हुई है; पर सच यह है कि उनका योगदान अहिंसक आन्दोलन से बहुत अधिक था। बंगाल क्रान्तिकारियों का गढ़ था। इसी से घबराकर अंग्रेजों ने राजधानी कोलकाता से हटाकर दिल्ली में स्थापित की थी। इन्हीं क्रान्तिकारियों में एक थे नलिनीकान्त बागची, जो सदा अपनी जान हथेली पर लिये रहते थे।

एक बार बागची अपने साथियों के साथ गुवाहाटी के एक मकान में रह रहे थे। सब लोग सारी रात बारी-बारी जागते थे; क्योंकि पुलिस उनके पीछे पड़ी थी। एक बार रात में पुलिस ने मकान को घेर लिया। जो क्रान्तिकारी जाग रहा था, उसने सबको जगाकर सावधान कर दिया। सबने निश्चय किया कि पुलिस के मोर्चा सँभालने से पहले ही उन पर हमला कर दिया जाये।

निश्चय करते ही सब गोलीवर्षा करते हुए पुलिस पर टूट पड़े। इससे पुलिस वाले हक्के बक्के रह गये। वे अपनी जान बचाने के लिए छिपने लगे। इसका लाभ उठाकर क्रान्तिकारी वहाँ से भाग गये और जंगल में जा पहुँचे। वहाँ भूखे प्यासे कई दिन तक वे छिपे रहे; पर पुलिस उनके पीछा करती रही। जैसे तैसे तीन दिन बाद उन्होंने भोजन का प्रबन्ध किया। वे भोजन करने बैठे ही थे कि पहले से बहुत अधिक संख्या में पुलिस बल ने उन्हें घेर लिया।

वे समझ गये कि भोजन आज भी उनके भाग्य में नहीं है। अतः सब भोजन को छोड़कर फिर भागे; पर पुलिस इस बार अधिक तैयारी से थी। अतः मुठभेड़ चालू हो गयी। तीन क्रान्तिकारी वहीं मारे गये। तीन बच कर भाग निकले। उनमें नलिनीकान्त बागची भी थे। भूख के मारे उनकी हालत खराब थी। फिर भी वे तीन दिन तक जंगल में ही भागते रहे। इस दौरान एक जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया। उसका जहर भी उनके शरीर में फैलने लगा। फिर भी वे किसी तरह हावड़ा पहुँच गये।

हावड़ा स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े। सौभाग्यवश नलिनीकान्त का एक पुराना मित्र उधर से निकल रहा था। वह उन्हें उठाकर अपने घर ले गया। उसने मट्ठे में हल्दी मिलाकर पूरे शरीर पर लेप किया और कई दिन तक भरपूर मात्रा में मट्ठा उसे पिलाया। इससे कुछ दिन में नलिनी ठीक हो गये। ठीक होने पर नलिनी मित्र से विदा लेकर कुछ समय अपना हुलिया बदलकर बिहार में छिपे रहे; पर चुप बैठना उनके स्वभाव में नहीं थी। अतः वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के पास ढाका आ गये।

लेकिन पुलिस तो उनके पीछे पड़ी ही थी। 15 जून को पुलिस ने उस मकान को भी घेर लिया, जहाँ से वे अपनी गतिविधियाँ चला रहे थे। उस समय तीन क्रान्तिकारी वहाँ थे। दोनों ओर से गोलीबारी शुरू हो गयी। पास के मकान से दो पुलिस वालों ने इधर घुसने का प्रयास किया; पर क्रान्तिवीरों की गोली से दोनों घायल हो गये। क्रान्तिकारियों के पास सामग्री बहुत कम थी, अतः तीनों दरवाजा खोलकर गोली चलाते हुए बाहर भागे। नलिनी की गोली से पुलिस अधिकारी का टोप उड़ गया; पर उनकी संख्या बहुत अधिक थी। अन्ततः नलिनी गोली से घायल होकर गिर पड़े।

पुलिस वाले उन्हें बग्घी में डालकर अस्पताल ले गये, जहाँ अगले दिन 16 जून, 1918 को नलिनीकान्त बागची ने भारत माँ को स्वतन्त्र कराने की अधूरी कामना मन में लिये ही शरीर त्याग दिया।
20:18

17 जुनउत्कलमणि गोपबन्धु दास जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा





उत्कलमणि गोपबन्धु दास का जन्म ग्राम सुवान्दो (जिला पुरी) में नौ अक्तूबर, 1877 को हुआ था। इनके परदादा को उत्कल के गंग शासकों ने जयपुर से बुलाकर अपने यहाँ बसाया था। इनके पिता श्री दैत्यारि तथा माता श्रीमती स्वर्णमयी देवी थीं। जन्म के कुछ दिन बाद ही इनकी माता का देहान्त हो गया। अतः इनका पालन ताई जी ने किया। इनके परिवार में परम्परा से पुरोहिताई होती थी। अतः बचपन से ही इन्हें पूजा-पाठ के संस्कार मिले।

इनके पिताजी यों तो एक कर्मकांडी ब्राह्मण थे; पर उनकी इच्छा थी कि गोपबन्धु अंग्रेजी पढ़ें। अतः उन्होंने अपने गाँव में ही अंग्रेजी पढ़ाने वाले एक विद्यालय की स्थापना कराई। 12 वर्ष की अवस्था में गोपबन्धु का विवाह हो गया। पढ़ाई में उनकी रुचि थी ही, अतः उन्होंने कटक से बी.ए और फिर कोलकाता से एम.ए तथा काूनन की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। 

कोलकाता में रहते हुए भी उनका मन अपने प्रदेश की सेवा के लिए छटपटाता रहता था। उन दिनों बंगाल में उड़ीसा के लोग रसोइये और कुली का काम करते थे, अतः उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता था। यह देखकर गोपबन्धु दास रात्रिकालीन कक्षाएँ लगाकर उन्हें पढ़ाने लगे। एक बार जब उड़ीसा में बाढ़ आयी, तो उन्होंने कोलकाता से धन संग्रह कर वहाँ भेजा। 

उनके तीन पुत्र थे; पर तीनों छोटी आयु में ही चल बसे। जब उनका तीसरा पुत्र मृत्युशय्या पर था, तो वे उसे छोड़कर बाढ़-पीड़ितों की सेवा करने चले गये। पत्नी ने जब रोका, तो वे बोले - जो प्रभु की इच्छा है, वही होगा। यहाँ तो एक पुत्र है, मैं तो हजारों पुत्रों की रक्षा के लिए जा रहा हूँ। कुछ समय बाद उनकी पत्नी का भी देहान्त हो गया। उस समय गोपबन्धु की अवस्था केवल 28 वर्ष की थी। लोगों ने उनसे दूसरा विवाह करने का बहुत आग्रह किया; पर उन्होंने स्वयं को समाज-सेवा में झोंक दिया।

गोपबन्धु दास कटक में वकालत करते थे; पर उनका मन समाज सेवा में ही लगा रहता था। उड़ीसा में प्रायः हर साल बाढ़ आती थी। ऐसे में सेवा कार्य करने वाली हर संस्था तथा व्यक्ति के लिए उनके द्वार खुले रहते थे। उन्हें कई बार अपनी जाति के कट्टर लोगों का विरोध सहना पड़ता था; पर उन्होंने इसकी चिन्ता नहीं की। वे राजनीतिक रूप से भी बहुत जागरूक थे। देश को गुलाम देखकर उनका मन पीड़ा से भर उठता था। अतः वे कांग्रेस में शामिल होकर आजादी के लिए भी प्रयत्न करने लगे।

गोपबन्धु दास ने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए ‘सत्यवादी विद्यालय’ की स्थापना की। इसके बाद वे पत्रकारिता में भी सक्रिय हुए। उन्होंने ‘उत्कल दीपिका’ ‘समाज’ तथा ‘आशा’ नामक समाचार पत्र प्रकाशित किये। इनके सुचारु संचालन के लिए लिए उन्होंने मदनमोहन प्रेस खरीदा। 

एक बार ग्रामीणों पर पुलिस अत्याचार का समाचार छापने पर इन्हें जेल भेज दिया गया। मुकदमे की सुनवाई के समय न्यायालय में हजारों लोग आते थे। अतः न्यायाधीश को खुले में सुनवाई करनी पड़ी। अन्ततः गोपबन्धु दास निर्दोष सिद्ध हुए। इसके बाद भी कई बार प्रकाशित समाचारों को लेकर उनका शासन से टकराव हुआ; पर उन्होंने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया।

17 जून, 1928 को प्रख्यात समाजसेवी, पत्रकार, अधिवक्ता, शिक्षाविद उत्कलमणि श्री गोपबन्धुदास का निधन हो गया।

Sunday, 14 June 2020

21:16

15जून1857 स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान आर्य राजा देवीसिंह गोदर(गोदारा) के बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा




राजा देवी सिंह का जन्म मथुरा के राया तहसील के गांव अचरु में गोदर(गोदारा) गौत्र के हिंदू जाट परिवार में हुआ था। 
राजा देवीसिंह एक धार्मिक स्वभाव के थे और एक अच्छे पहलवान भी थे।राज को त्याग करके साधु बन गए थे। 

क्रांति में कूदने के लिए प्रेरणा

जब इस देश पर अंग्रेज़ी संकट आया तब एक बार वे गांव में पहलवानी कर रहे थे तो उनके सामने कोई नहीं टिक पाया।फिर जीत के बाद वे अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे।तो एक युवक ने उन पर ताना कसते हुए कहा के यहां ताकत दिखाने का क्या फायदा है दम है तो अंग्रेजो के खिलाफ लड़ो और देश सेवा करो। यही क्षत्रियो का धर्म है आपके पूर्वजो ने सदा से इस क्षेत्र की रक्षा अपने प्राणों की आहुति देकर की है ।

चूंकि राजा साहब बचपन से ही देशभक्त और धर्म भक्त थे इसलिए यह बात उनके दिल पर लगी।उन्होंएँ कहा के बात तो तुम्हारी सही है यहां ताकत दिखाने का क्या फायदा।लेकिन अंग्रेजो से लड़ने के लिए एक फौज की जरूरत पड़ेगी मैं वह कहां से लाऊं।तभी उनके एक साथी ने कहा के आप अपनी फौज बनाइये।इस पर राजा साहब सहमत हो गए।पूरे क्षेत्र में देवी सिंह का नाम था लोगो ऊनका बहुत आदर करते थे।

क्रांति

इसके बाद देवी सिंह ने गांव गांव घूमना शुरू कर दिया व स्वराज का बिगुल बजा दिया।उन्होंने राया,हाथरस,मुरसान,सादाबाद आदि समेत सम्पूर्ण कान्हा की नगरी मथुरा बृज क्षेत्र में क्रांति की अलख जगा दी। उनके तेजस्वी व देशभक्त भाषणों से युवा उनसे जुड़ने लगे। जिस कारण उन्हें सेना बनाने में ज्यादा परेशानी नहीं आई। उन्होंने किसान की आजादी,अपना राज,भारत को आजाद कराने का बीड़ा उठा लिया।
उन्होंने चन्दा इकट्ठा करके व कुछ अंग्रेजो को लूटकर तलवार और बंदूकों का प्रबंध कर लिया।एक रिटायर्ड आर्मी अफसर के माध्यम से उन्होंने अपने सैनिकों को हथियार चलाने में निपुण किया और 1857 की क्रांति में कूद पड़े । जब यह बात अंग्रेजों को पता चली तो वे बौखला गए।उन्होंने राजा साहब को ब्रिटिश आर्मी जॉइन करने का ऑफर दिया।लेकिन देवी सिंह ने कहा कि वे अपने देश के दुश्मनों के साथ बिल्कुल भी नहीं जाएंगे।

राजतिलक

इसके बाद बल्लभगढ हरियाणा के राजा नाहर सिंह ने भी उनकी मदद की और दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर से कहकर उनके राज को मान्यता देने के लिए कहा।जफर को उस समय क्रान्तिकारियो की भी जरूरत थी और दूसरा एक नाहर सिंह ही थे जो उसे व दिल्ली को अंग्रेजो से अब तक बचाये हुए थे।इसलिए उन्होंने राजा देवी सिंह के राज को अपनी तरफ से मान्यता दे दी।

मार्च 1857 में फिर राजा देवी सिंह ने राया थाने पर आक्रमण कर दिया व सब कुछ तहस नहस कर दिया।सात दिन तक थाने को घेरे रखा।जेल पर आक्रमण करके सभी सरकारी दफ्तरों, बिल्डिंगों,पुलिस चौकियों आदि को जलाकर तहस नहस कर दिया गया। नतीजा यह हुआ के अंग्रेज कलेक्टर थोर्नबिल वहां से भेष बदलकर भाग खड़ा हुआ।इसमें उसके वफादार दिलावर ख़ान और सेठ जमनाप्रसाद ने मदद की।दोनों को ही बाद में अंग्रेजी सरकार से काफी जमीन व इनाम मिला।

अब राया को राजा साहब ने अंग्रेज़ो से स्वतंत्र करवा दिया।उन्होंने अंग्रेजों के बही खाते व रिकॉर्ड्स जला दिए जिसके माध्यम से वे भारतीयों को लूटते थे। फिर अंग्रेज समर्थित व्यापारियों को धमकी भेजी गई के या तो देश सेवा में ऊनका साथ दें वरना सजा के लिए तैयार रहें।जो व्यापारी नहीं माने उनकी दुकान से सामान लुटा गया व उनके बही खाते जला दिए गए क्योंकि वे अंग्रेजों के साथ रहकर गरीबो से हद से ज्यादा सूदखोरी करते थे।राजा साहब के समर्थन में पूरे मथुरा के जय हो के नारे लगने लगे,उन्हें गरीबो का राजा,हमेशा अजेय राजा जैसे शब्दों से जनता द्वारा सुशोभित किया जाने लगा।
राजा देवी सिंह ने एक सरकारी स्कूल को अपना थाना बनाया।उन्होंन अपनी सरकार पूर्णतः आधुनिक पद्धति से बनाई। उन्होंने कमिशनर, अदालत, पुलिस सुप्रिडेण्टेन्ट आदि पद नियुक्त किये।वे रोज यहां जनता की समस्या सुलझाने आते थे। उन्होंने राया के किले पर भी कब्जा कर लिया। वे रोज जनता के बीच रहते थे और उनकी समस्या का समाधान करते थे।

वे हमेशा देशभक्ति के जज्बे को जगाते हुए पूरे क्षेत्र में घूमते थे।अंग्रेजों के यहां घुसनी पर पाबंदी थी।उन्होंएँ क्रान्तिकारियो संग कई बार अंग्रेजों को लूटा व आम लोगो की मदद की।

फांसी

उन्होंने 1 साल तक अंग्रेजों के नाक में दम रखा।अंग्रेजी सल्तनत की चूल तक हिल गयी थी अंग्रेज अधिकारी तक उनसे कांपते थे।अंत मे अंग्रेजों ने कोटा से आर्मी बुलाई और बिल ने अंग्रेज अधिकारी डेनिश के नित्रत्व में एक बड़ी आर्मी के साथ हमला किया और धोखे से उन्हें कैद कर लिया।फिर 15 जून 1858 को उन्हे राया में फांसी दी गयी।उनके साथी श्री राम गोदारा व कई अन्य क्रांतिकारियों को भी उनके साथ ही फांसी दी गयी।अंग्रेजों ने फांसी से पहले उन्हें झुकने के लिए बोला था लेकिन राजा साहब ने कहा के मैं मृत्यु के डर से अपने देश के दुश्मनों के आगे कतई नहीं झुकूंगा।

इस तरह एक देशभक्त साधु ने देश पर संकट आने पर अपनी तलवार पुनः उठा कर क्षत्रिय धर्म का पालन किया व देश सेवा करते हुए हंसते हंसते फांसी पर झूल देश के लिए बलिदान हो गया ।
आओ हम सभी उनके बलिदान को नमन करे ।

Saturday, 13 June 2020

20:53

14 जूनकर्मठ कार्यकर्ता सदानंद काकड़े जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


संगठन द्वारा निर्धारित कार्य में पूरी शक्ति झांेक देने वाले श्री सदाशिव नीलकंठ (सदानंद) काकड़े का जन्म 14 जून, 1921 को बेलगांव (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता वहीं साहूकारी करते थे। बलिष्ठ शरीर वाले पांच भाई और नौ बहनों के इस परिवार की नगर में धाक थी। बालपन में उन्होंने रंगोली, प्रकृति चित्रण, तैल चित्र आदि में कई पारितोषिक लिये। वे नाखून से चित्र बनाने में भी निपुण थे। मेधावी छात्र होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती रही। उन्हें तेज साइकिल चलाने में मजा आता था। वास्तु शास्त्र, हस्तरेखा विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, अंक ज्ञान आदि भी उनकी रुचि के विषय थे।

रसायन शास्त्र में स्नातक सदानंद जी 1938 में स्वयंसेवक और 1942 में प्रचारक बने। नागपुर में श्री यादवराव जोशी से हुई भेंट ने उनके जीवन में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रारम्भ में वे बेलगांव नगर और तहसील कार्यवाह रहे। प्रचारक बनने पर वे बेलगांव नगर, जिला और फिर गुलबर्गा विभाग प्रचारक रहे। 1969 में उन्हें 'विश्व हिन्दू परिषद' में भेजा गया।

उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद का काम प्रारम्भिक अवस्था में था। सदानंद जी को कर्नाटक प्रान्त के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। 1979 में प्रयाग में हुए द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन में वे 700 कार्यकर्ताओं को एक विशेष रेल से लेकर आये। 1983 तक वे प्रांत और 1993 तक दक्षिण भारत के क्षेत्रीय संगठन मंत्री रहे। 1993 में उनका केन्द्र दिल्ली हो गया और वे केन्द्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री, उपाध्यक्ष और फिर परामर्शदाता मंडल के सदस्य रहे। 1983 में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की शताब्दी मनाने के लिए उन्होंने श्रीलंका, इंग्लैंड और अमरीका की यात्रा भी की।

बेलगांव में सदानंद जी का सम्पर्क श्री जगन्नाथ राव जोशी से हुआ, जो आगे चलकर प्रचारक और फिर दक्षिण में जनसंघ और भाजपा के आधार स्तम्भ बने। 'इतिहास संकलन समिति' के श्री हरिभाऊ वझे और वि.हि.प. के श्री बाबूराव देसाई भी अपने प्रचारक जीवन का श्रेय उन्हें ही देते हैं। गांधी हत्या के बाद एक क्रुद्ध भीड़ ने बेलगांव जिला संघचालक अप्पा साहब जिगजिन्नी पर प्राणघातक हमला कर दिया। इस पर सदानंद जी भीड़ में कूद गये और अप्पा साहब के ऊपर लेटकर सारे प्रहार झेलते रहे। इससे वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।

प्रारम्भ में संघ की सब गतिविधियों का केन्द्र बेलगांव ही था। कई वर्ष तक उनकी देखरेख में संघ शिक्षा वर्ग लगातार वहीं लगा; पर उसमें कभी घाटा नहीं हुआ। गोवा मुक्ति आंदोलन के समय देश भर से लोग बेलगांव होकर ही गोवा जाते थे। वर्ष 1995 में हुई द्वितीय एकात्मता यात्रा के वे संयोजक थे। इसमें सात बड़े और 700 छोटे रथ थे, जिन पर भारत माता,गंगा माता और गोमाता की मूर्तियां लगी थीं। सभी बड़े रथों के रेशीम बाग, नागपुर में मिलन के समय निवर्तमान सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस, सरसंघचालक श्री रज्जू भैया और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे भी उपस्थित हुए।

बहुभाषी सदानंद जी ने हिन्दी और मराठी में कई पुस्तकें लिखीं। ‘हिन्दू, हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र’ नामक पुस्तक का देश की नौ भाषाओं में अनुवाद हुआ। जगन्नाथ राव जोशी से उनके संबंध बहुत मित्रतापूर्ण थे। जोशी जी के देहांत के बाद उन्होंने आग्रहपूर्वक पुणे के श्री अरविन्द लेले से उनका जीवन परिचय लिखवाया और श्री ओंकार भावे से उसका हिन्दी अनुवाद कराया।

वर्ष 2005 से वे अनेक रोगों से पीड़ित हो गये। कई तरह के उपचार के बावजूद प्रवास असंभव होने पर वे आग्रहपूर्वक अपनी जन्मभूमि बेलगांव ही चले गये। वहां एक अनाथालय का निर्माण उन्होंने किसी समय कराया था। उसमें रहते हुए 12 जुलाई, 2010 को उनका शरीरांत हुआ।
20:52

14 जूनअहिंसा यात्रा के पथिक आचार्य महाप्रज्ञ जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



आतंकवाद, अशांति, अनुशासनहीनता और अव्यवस्था से विश्व को बचाने का एकमात्र उपाय अंिहंसा ही है। देश के दूरस्थ गांवों में लाखों कि.मी पदयात्रा कर यह संदेश फैलाने वाले जैन सन्त आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म14 जून, 1920 (आषाढ़ कृष्ण 13) को राजस्थान के झुंझनू जिले के ग्राम टमकोर में हुआ था।
बचपन में इनका नाम नथमल था। पिता श्री तोलाराम चोरड़िया का देहांत जल्दी हो जाने से इनका पालन माता श्रीमती बालू ने किया। धार्मिक स्वभाव की माताजी का नथमल पर बहुत प्रभाव पड़ा। अतः माता और पुत्र दोनों ने एक साथ 1929 में संत श्रीमद् कालूगणी से दीक्षा ले ली।
श्रीमद् कालूगणी की आज्ञा से इन्होंने आचार्य तुलसी को गुरु बनाकर उनके सान्निध्य में दर्शन, व्याकरण,ज्योतिष, आयुर्वेद,  मनोविज्ञान, न्याय शास्त्र, जैन, बौद्ध और वैदिक साहित्य का अध्ययन किया। संस्कृत, प्राकृत तथा हिन्दी पर उनका अच्छा अधिकार था। वे संस्कृत में आशु कविता भी करते थे। जैन मत के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ‘आचरांग सूत्र’ पर उन्होंने संस्कृत में भाष्य लिखा। उनकी प्रवचन शैली भी रोचक थी। इससे उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी।
उनके विचार और व्यवहार को देखकर आचार्य तुलसी ने 1965 में उन्हें अपने धर्मसंघ का निकाय सचिव बनाया। इस प्रशासनिक दायित्व का समुचित निर्वाह करने पर उन्हें 1969 में युवाचार्य एवं 1978 में महाप्रज्ञ घोषित किया गया। 1998 में आचार्य तुलसी ने अपना पद विसर्जित कर इन्हें जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया।
आचार्य महाप्रज्ञ ने अपने गुरु आचार्य तुलसी द्वारा 1949 में प्रारम्भ किये गये ‘अणुव्रत आंदोलन’ के विकास में भरपूर योगदान दिया। 1947के बाद जहां एक ओर भारत में भौतिक समृद्धि बढ़ी, वहीं अशांति, हिंसा,दंगे आदि भी बढ़ने लगे। वैश्वीकरण भी अनेक नई समस्याएं लेकर आया। आचार्य जी ने अनुभव किया कि इन समस्याओं का समाधान अहिंसा ही है। अतः उन्होंने 2001 से 2009 तक ‘अहिंसा यात्रा’ का आयोजन किया। इस दौरान लगभग एक लाख कि.मी की पदयात्रा कर वे दस हजार ग्रामों में गये। लाखों लोगों ने उनसे प्रभावित होकर मांस, मदिरा आदि को सदा के लिए त्याग दिया।
भौतिकवादी युग में मानसिक तनाव, व्यस्तता व अवसाद आदि के कारण लोगों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन को चौपट होते देख आचार्य जी ने साधना की सरल पद्धति ‘प्रेक्षाध्यान’ को प्रचलित किया। इसमें कठोर कर्मकांड, उपवास या शरीर को अत्यधिक कष्ट देने की आवश्यकता नहीं होती। किसी भी अवस्था तथा मत, पंथ या सम्प्रदाय को मानने वाला इसे कर सकता है। अतः लाखों लोगों ने इस विधि से लाभ उठाया।
आचार्य जी प्राचीन और आधुनिक विचारों के समन्वय के पक्षधर थे। वे कहते थे कि जो धर्म सुख और शांति न दे सके, जिससे जीवन में परिवर्तन न हो, उसे ढोने की बजाय गंगा में फेंक देना चाहिए। जहां समाज होगा, वहां समस्या भी होगी; और जहां समस्या होगी, वहां समाधान भी होगा। यदि समस्या को अपने साथ ही दूसरे पक्ष की दृष्टि से भी समझने का प्रयास करें, तो समाधान शीघ्र निकलेगा। इसे वे ‘अनेकांत दृष्टि’ का सूत्र कहते थे।
आचार्य जी ने प्रवचन के साथ ही प्रचुर साहित्य का भी निर्माण किया। विभिन्न विषयों पर उनके लगभग 150 ग्रन्थ उपलब्ध हैं। उन्होंने विश्व के अनेक देशों में यात्रा कर अहिंसा, प्रेक्षाध्यान और अनेकांत दृष्टि के सूत्रों का प्रचार किया। उन्हें अनेक उपाधियों से भी विभूषित किया गया। नौ मई, 2010 को जिला चुरू (राजस्थान) के सरदारशहर में हृदयाघात से उनका निधन हुआ।

Friday, 12 June 2020

18:10

13 जूनमाँ गंगा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले पुत्र स्वामी निगमानंद का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



मां गंगा भारत की प्राण रेखा है। भारत की एक तिहाई जनसंख्या गंगा पर ही आश्रित है; पर उसका अस्तित्व आज संकट में है। उसे बड़े-बड़े बांध बनाकर बन्दी बनाया जा रहा है। उसके किनारे बसे नगरों की संपूर्ण गंदगी उसी में बहा दी जाती है। वहां के उद्योगों के अपशिष्ट पदार्थ उसी में डाल दिये जाते हैं। इस प्रकार गंगा को मृत्यु की ओर धकेला जा रहा है।

गंगा एवं हरिद्वार के सम्पूर्ण कुंभ क्षेत्र की इस दुर्दशा की ओर जनता तथा शासन का ध्यान दिलाने के लिए अनेक साधु-सन्तों और मनीषियों ने कई बार धरने, प्रदर्शन और अनशन किये; पर पुलिस, प्रशासन और माफिया गिरोहों की मिलीभगत से हर बार आश्वासन के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला।

गंगा में बहकर आने वाले पत्थरों को छोटे-बड़े टुकड़ों में तोड़कर उसका उपयोग निर्माण कार्य में होता है। इसके लिए शासन ठेके देता है; पर ठेकेदार निर्धारित मात्रा से अधिक पत्थर निकाल लेते हैं। वे गंगा के तट पर ही पत्थर तोड़ने वाले स्टोन क्रेशर लगा देते हैं। इसके शोर तथा धूल से आसपास रहने वाले लोगों का जीना कठिन हो जाता है।

हरिद्वार एक तीर्थ है। वहां स्थित हजारों आश्रमों में रहकर सन्त लोग साधना एवं स्वाध्याय करते हैं। ऐसे ही एक आश्रम ‘मातृसदन’ के संत निगमानंद ने गंगा के साथ हो रहे इस अत्याचार के विरुद्ध अनशन करते हुए 13 जून, 2011 को अपने प्राणों की आहुति दे दी।

स्वामी निगमानंद का जन्म ग्राम लदारी, जिला दरभंगा (बिहार) में 1977में हुआ था। श्री प्रकाशचंद्र झा के विज्ञान, पर्यावरण एवं अध्यात्मप्रेमी इस तेजस्वी पुत्र का नाम स्वरूपम् कुमार था। दरभंगा के सर्वोदय इंटर क१लिज से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे हरिद्वार आ गये तथा मातृसदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद से दीक्षा लेकर स्वामी निगमानंद हो गये। घर छोड़ते समय उन्होंने अपने पिताजी को पत्र में लिखा कि मां जानकी की धरती पर जन्म लेने के कारण सत्य की खोज करना उनकी प्राथमिकता है।

मातृसदन के संन्यासियों ने गंगा की रक्षा के लिए कई बार आंदोलन किये हैं। न्यायालय ने इन अवैध क्रेशरों पर रोक भी लगाई; पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। स्वामी निगमानंद ने इसके लिए 2008में भी 73 दिन का अनशन किया था। इससे उनके शरीर के कई अंग स्थायी रूप से कमजोर हो गये। इस बार 19 फरवरी, 2011 से उन्होंने फिर अनशन प्रारम्भ किया था।

पर इस बार का अनशन प्राणघातक सिद्ध हुआ। उनकी हालत बिगड़ती देख 27 अपै्रल, 2011 को शासन ने उन्हें हरिद्वार के जिला चिकित्सालय में भर्ती करा दिया। तब तक उनकी बोलने, देखने और सुनने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। इलाज से उनकी स्थिति कुछ सुधरी;पर दो जून को वे अचानक कोमा में चले गये। इस पर शासन उन्हें जौलीग्रांट स्थित हिमालयन मैडिकल क१लिज में ले गया, जहां 13 जून, 2011 को उनका शरीरांत हो गया।

स्वामी निगमानंद के गुरु स्वामी शिवानंद जी का आरोप है कि हरिद्वार के चिकित्सालय में उन्हें जहर दिया गया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच इतना तो सत्य ही है कि गंगा में हो रहे अवैध खनन के विरुद्ध अनशन कर एक 34 वर्षीय युवा संत ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। 16 जून को उन्हें विधि-विधान सहित मातृसदन में ही समाधि दे दी गयी।

स्वामी निगमानंद ने यह सिद्ध कर दिया कि भजन और पूजा करने वाले संत समय पड़ने पर सामाजिक व धार्मिक विषयों पर अहिंसक मार्ग से आंदोलन करते हुए अपने प्राण भी दे सकते हैं। उनकी समाधि हरिद्वार में गंगाप्रेमियों का एक नया तीर्थ बन गयी है।
18:07

13 जूनओबरी युद्ध के नायक राजा बलभद्र सिंह चहलारी बलिदान दिवस पर विशेष- के सी शर्मा


भारत माँ को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए देश का कोई कोना ऐसा नहीं था, जहाँ छोटे से लेकर बड़े तक, निर्धन से लेकर धनवान तक, व्यापारी से लेकर कर्मचारी और कवि, कलाकार,  साहित्यकार तक सक्रिय न हुए हों। यह बात और है किसी को इस संग्राम में सफलता मिली, तो किसी को निर्वासन और वीरगति।

चहलारी, बहराइच (उत्तर प्रदेश) के 18 वर्षीय जमींदार बलभद्र सिंह ऐसे ही वीर थे। उनके पास 33 गाँवों की जमींदारी थी। उनकी गाथाएँ आज भी लोकगीतों में जीवित हैं। 1857 में जब भारतीय वीरों ने मेरठ में युद्ध प्रारम्भ किया, तो अंग्रेजों ने सब ओर भारी दमन किया। अवध के नवाब वाजिद अली शाह की गिरफ्तारी के बाद उनकी बेगम हजरत महल ने लखनऊ छोड़कर राजा हरदत्त सिंह (बौड़ी) के गढ़ को केन्द्र बनाया। उन्होंने वहाँ अपने विश्वासपात्र राजाओं, जमींदारों तथा स्वाधीनता सेनानियांे की बैठक बुलाकर सबको इस महासंग्राम में कूदने का आह्नान किया।

अपने छोटे भाई छत्रपाल सिंह के विवाह के कारण बलभद्र सिंह इस बैठक में आ नहीं पाये। बेगम ने उन्हें बुलाने के लिए एक विशेष सन्देशवाहक भेजा। इस पर बलभद्र सिंह  बारात को बीच में ही छोड़कर बौड़ी आ गये। बेगम ने उन्हें सारी योजना बतायी, जिसके अनुसार सब राजा अपनी सेना लेकर महादेवा (बाराबंकी) में एकत्र होने थे। बलभद्र सिंह ने इससे पूरी सहमति व्यक्त की और अपने गाँव लौटकर सेनाओं को एकत्र कर लिया।

जब बलभद्र सिंह सेना के साथ प्रस्थान करने लगे, तो वे अपनी गर्भवती पत्नी के पास गये। वीर पत्नी ने उनके माथे पर रोली-अक्षत का टीका लगाया और अपने हाथ से कमर में तलवार बाँधी। इसी प्रकार राजमाता ने भी बेटे को आशीर्वाद देकर अन्तिम साँस तक अपने वंश और देश की मर्यादा की रक्षा करने को कहा। बलभद्र सिंह पूरे उत्साह से महादेवा जा पहुँचे।

महादेवा में बलभद्र सिंह के साथ ही अवध क्षेत्र के सभी देशभक्त राजा एवं जमींदार अपनी सेना के साथ आ चुके थे। वहाँ राम चबूतरे पर एक सम्मेलन हुआ, जिसमें सबको अलग-अलग मोर्चे सौंपे गये। बलभद्र सिंह को नवाबगंज के मोर्चे का नायक बनाकर बेगम ने शाही चिन्हों के साथ ‘राजा’ की उपाधि और 100 गाँवों की जागीर प्रदान की।

बलभद्र सिंह ने 16,000 सैनिकों के साथ मई 1958 के अन्त में ओबरी (नवाबगंज) में मोर्चा लगाया। वे यहाँ से आगे बढ़ते हुए लखनऊ को अंग्रेजों से मुक्त कराना चाहते थे। उधर अंग्रेजों को भी सब समाचार मिल रहे थे। अतः ब्रिगेडियर होप ग्राण्ट के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी गयी, जिसके पास तोपखाने से लेकर अन्य सभी आधुनिक शस्त्र थे।

13 जून को दोनों सेनाओं में भयानक युद्ध हुआ। बलभद्र सिंह ने अपनी सेना को चार भागों में बाँट कर युद्ध किया। एक बार तो अंग्रेजों के पाँव उखड़ गये; पर तभी दो नयी अंग्रेज टुकड़ियाँ आ गयीं, जिससे पासा पलट गया। कई जमींदार और राजा डर कर भाग खड़े हुए; पर बलभद्र सिंह चहलारी वहीं डटे रहे। अंग्रेजों ने तोपों से गोलों की झड़ी लगा दी, जिससे अपने हजारों साथियों के साथ राजा बलभद्र सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए।

इस युद्ध में राजा बलभद्र सिंह चहलारी के साहस की अंग्रेज सेनानायकों ने भी बहुत प्रशंसा की है; पर इसमें पराजय से भारत की स्वतन्त्रता का स्वप्न अधूरा रह गया।

Thursday, 11 June 2020

15:43

12 जुनमहायोगी गोपीनाथ कविराज की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

12 जुन
महायोगी गोपीनाथ कविराज की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

भारत योगियों की भूमि है। यहाँ अनेक योगी ऐसे हैं, जो हजारों सालों से हिमालय की कन्दराओं में तपस्यारत हैं । ऐसे योगियों की साधना एवं चमत्कार देख सुन कर आश्चर्य होता है। ऐसे योगियों से मिलकर उनकी साधना की जानकारी लेखन द्वारा जनसामान्य तक पहुँचाने का काम जिन महान आत्मा ने किया, वे थे महामहोपाध्याय डा. गोपीनाथ कविराज।

श्री गोपीनाथ कविराज का जन्म 7 सितम्बर, 1887 को अपने ननिहाल धामराई (अब बांग्लादेश) में हुआ था। दुर्भाग्यवश इनके जन्म से पाँच महीने पूर्व ही इनके पिता का देहान्त हो गया। अतः इनका पालन माता सुखदा सुन्दरी ने अपने मायके और ससुराल काँठालिया में रहते हुए किया। गोपीनाथ जी बचपन से ही मेधावी छात्र थे। शिक्षा की लगन के कारण ये ढाका, जयपुर और काशी आदि अनेक स्थानों पर भटकते रहे।

छात्र जीवन में इन्होंने अपने पाठ्यक्रम के अतिरिक्त विश्व के अनेक देशों के इतिहास तथा भाषाओं का अध्ययन किया। 13 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह भी हो गया। इनके एक पुत्र एवं एक पुत्री थी। जयपुर से बी.ए. करने के बाद बनारस संस्कृत कालेज के प्राचार्य डा. वेनिस के सुझाव पर इन्होंने एम.ए. में न्यायशास्त्र, पुरालेखशास्त्र, मुद्राविज्ञान तथा पुरालिपि का गहन अध्ययन किया। प्रख्यात राजनेता आचार्य नरेन्द्र देव इनके सहपाठी थे।

गोपीनाथ जी ने एम.ए. प्रथम श्रेणी और पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम रहकर उत्तीर्ण किया। उन्हें लाहौर और राजस्थान विश्वविद्यालय से अध्यापन के प्रस्ताव मिले; पर डा. वेनिस के परामर्श पर उन्होंने तीन वर्ष तक और अध्ययन किया। अब उनकी नियुक्ति इसी विद्यालय में संस्कृत विभाग में हो गयी। यहाँ रहकर उन्होंने अनेक प्राचीन हस्तलिखित संस्कृत ग्रन्थों को प्रकाशित कर अमूल्य ज्ञाननिधि से जन सामान्य का परिचय कराया।

1924 में गोपीनाथ जी प्राचार्य बने। बचपन से ही उनका मन योग साधना में बहुत लगता था। अतः 1937 में उन्होंने समय से पूर्व अवकाश ले लिया। अब उनके पास पूरा समय स्वाध्याय एवं साधना के लिए था। काशी में ही रहने का निश्चय कर उन्होंने वहीं एक मकान भी बनवा लिया। काशी में उनका सम्पर्क अनेक सिद्ध योगियों तथा संन्यासियों से हुआ। इनमें से अनेक देहधारी थे, तो अनेक विदेह रूप में विचरण करने वाले भी थे। इनसे जो वार्तालाप होता था, उसे वे लिखते रहते थे। इस प्रकार इनके पास अध्यात्म सम्बन्धी अनुभवों का विशाल भण्डार हो गया।

अध्यात्म क्षेत्र में परमहंस विशुद्धानन्द जी इनके गुरु थे; पर स्वामी शिवराम किंकर योगत्रयानन्द, माँ आनन्दमयी आदि विद्वानों से इनका निरन्तर सम्पर्क रहता था। 1961 में ये कैन्सर से पीड़ित हुए, तो माँ आनन्दमयी ने मुम्बई ले जाकर इनका समुचित इलाज कराया। स्वस्थ होकर वे फिर काशी चले आये और पूर्ववतः स्वाध्याय एवं साधना में लग गये। इसी प्रकार जनसेवा करते हुए 12 जून, 1976 को उन्होंने अपनी देह लीला का विसर्जन किया।

पं. गोपीनाथ कविराज के अध्यात्म, योग एवं साधना सम्बन्धी हजारों लेख विभिन्न पत्रों में प्रकाशित हुए हैं। पत्र द्वारा भी हजारों लोग उनसे इस सम्बन्ध में समाधान प्राप्त करते थे। उन्होंने अनेक ग्रन्थ तथा सैकड़ों ग्रन्थों की भूमिका लिखी। आज भी उनके हजारों लेख हस्तलिखित रूप में अप्रकाशित हैं।