Tap news india

Hindi news ,today news,local news in india

Breaking news

गूगल सर्च इंजन

Showing posts with label हमारे रियल हीरो. Show all posts
Showing posts with label हमारे रियल हीरो. Show all posts

Thursday, 10 September 2020

18:03

मां तो आखिर मां होती है:deepak tiwari

मां तो आखिर मां होती है:deepak tiwari बेटा कट्टा लेकर मां को मारने के लिए खोज रहा है, और मां ने उसी बेटे की लंबी उम्र के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा है
भागलपुर.लबों पर उसके बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जग में जो खफा नहीं होती। जी हां, दरभंगा से अपने बेटे के खौफ से भागकर भागलपुर आई एक मां ने उसी की लंबी उम्र के लिए जिउतिया का व्रत रखा है। यहीं से वह अपने बेटे की सलामती की दुआ मांग रही है। उसने लगातार 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखा है... उसी बेटे के लिए जो कट्‌टा लेकर उनके खून का प्यासा बना हुआ है। उसी बेटे से जान बचाकर महिला को अपना घर छोड़ना पड़ा। इस दुनिया में इस महिला का और कोई नहीं है सो उसने वृंदावन के वृद्धाश्रम जाना तय किया है।
ये महिला दरभंगा जिले के लादौर की रहने वाली हैं। लाॅकडाउन में जब बेटे ने राेज प्रताड़ित किया ताे घर छाेड़ कर वृद्धाश्रम जाने के लिए वहां से भाग आईं। बेटे की ज्यादतियाें के निशान उनके शरीर पर जगह-जगह नीला दाग माैजूद है। किस्मत ऐसी कि इनकी एक बेटी बचपन में ही सांप काटने की वजह से मर गई। एक बेटा भी कम उम्र में बीमार हाेकर मर गया। पति लुधियाना में एक फैक्ट्री में मजदूरी करते थे। सात साल पहले ईश्वर ने वह सहारा भी छीन लिया। बेटा पहले लुधियाना और दिल्ली में काम करता था। महिला पिछले चार महीने से समाजसेवी सुजाता चाैधरी के घर में शरण लिए हुए है।
मां का खाैफ : मैं कहां हूं, उसे पता चल जाए ताे मेरी जान ले लेगा
बेटे के खाैफ के साये में वह मां जी रही हैं। इस मां ने कई बार अपने बेटे काे समझाने की काेशिश की। लेकिन बेटा बीते सात साल से कभी पैसा मांगता ताे कभी अपना तनाव इन्हें पीटकर खत्म करता। बैंक खाते में जाे भी पैसा था वह भी निकाल चुका। वह कहती हैं मेरा बेटा मुझे कमजाेर समझकर मुझ पर जुल्म करता है। मैं भाग आई हूं। एक साल पहले भी मैं उसकी मार से तंग आकर भाग गई थी। फिर मुझे लगा उसे मेरी याद आती हाेगी। वह सुधर गया हाेगा। मैं वापस उसके पास गई। लेकिन अब ताे वह और उग्र हाे गया। मेरी जान के पीछे पड़ गया है। अगर उसे पता चल जाए मैं कहां हूं, ताे मेरी जान ले लेगा।
मां की ममता : बेटा बुरा है मगर मैं मां हूं, उसका बुरा नहीं चाह सकती
महिला बताती है कि पहले ऐसा नहीं था। पति का जबसे देहांत हुआ तब से ये मुझपर हाथ उठाने लगा। मैं व्रत कर रही हूं क्याेंकि नाै महीने उसे अपनी खून से सींचा है, तीन साल तक उसे अपना दूध पिलाकर बड़ा किया है। वह मेरा अंश है। मैं उसका बुरा नहीं चाह सकती। मैं ताे अब भी उसके साथ रहना चाहती हूं, अफसाेस कि ये संभव नहीं है। मैंने पुलिस में शिकायत नहीं की क्याेंकि वह उसे मारेंगे। मेरे पास घर छाेड़ के भागने के अलावा काेई रास्ता नहीं था। आश्रम में मैं अपनी बची हुई जिंदगी काट लूंगी।

Tuesday, 25 August 2020

08:04

डॉ. अदिति मित्तल ने ड्राय फ्रूट्स से बनाए श्री गणेश, deepak tiwari

डॉ. अदिति मित्तल ने ड्राय फ्रूट्स से बनाए श्री गणेश,   deepak tiwari वे इसे कोविड-19 अस्पतालों में भर्ती मरीजों की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए बांटेंगी
हर साल की तरह इस साल भी गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्तियों को ईको फ्रेंडली बनाने के नए-नए रास्ते खोजे जा रहे हैं। इसी कड़ी में गुजरात के सूरत की डॉ. अदिति मित्तल सूखे मेवों से गणेश प्रतिमा बनाने के लिए चर्चा में हैं।
उन्होंने श्री गणेश की मूर्तियों को सिर्फ सूखे मेवों से बनाया है। गणेश समारोह के बाद वे इस मूर्ति को बनाने में उपयोग किए जाने वाले ड्राई फ्रूट्स को COVID-19 पेशेंट्स में बांटेंगी।
अदिति ने इन मूर्तियों को अखरोट, काजू, बादाम जैसे सूखे मेवों से बनाया है। इन मूर्तियों की ऊंचाई 20 इंच है। उन्होंने भगवान गणेश का पेट अखरोट से तो आंखों को काजू से बनाया है। इसी तरह उनके कान मूंगफली से बने हैं।
अदिति ने अपने ट्विटर पर गणेश जी की मूर्तियों को शेयर किया है। उन्होंने साथ में ये भी लिखा कि इन मूर्तियों को गणेश चतुर्थी के दौरान सूरत के कोविड अस्पताल 'अटल संवेदना' में रखा गया है। इन्हें 511 ड्राई फ्रूट्स का इस्तेमाल करके बनाया गया है।
गणेश चतुर्थी के बाद विध्नहर्ता के खुशहाल और सेहतमंद जिंदगी के आशीर्वाद के रूप में इसे वितरित कर दिया जाएगा। ये सूखे मेवे मरीजों की इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करेंगे।
सोशल मीडिया पर अदिति के काम की तारीफ हो रही है। लोग ये देखकर भी हैरान हैं कि अदिति ने इन ड्राई फ्रूट्स को आपस में चिपकाया किस तरह होगा। उन्होंने इस काम को पूरा करने में बहुत मेहनत की है।

Wednesday, 19 August 2020

05:37

नाटक लिखा तो जेल हो गई, लेकिन फिर सरकार ही बदल गई

  deepak tiwari 
 August 19, 2020

आज है ख्यात अभिनेता उत्पल दत्त की पुण्यतिथि
अभिनेता उत्पल दत्त फिल्मों के साथ थिएटर से भी जुड़े हुए थे, वे बंगाली राजनीति पर नाटक लिखते थे। सन् 1963 में उनके लिखे कल्लोल नाटक पर खूब हंगामा हुआ, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया और जनता चुनाव में सरकार के कदम का विरोध करते हुए सरकार ही बदल
डाली थी।
एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुत अच्छे बने उत्पल दा को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त की आज पुण्यतिथि है आज के दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। कॉमेडी फिल्मों के किंग कहे जाने वाले उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 में पूर्वी बंगाल के बारीसाल में हुआ था। उन्होंने अपने करियर में कई हिट और मजेदार फिल्में दीं। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने, उत्पल दा को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है।
यह थी दत्त के हास्य से भरपूर हिट फिल्में
गोलमाल, शौकिन, रंग‑बिरंगी, नरक, किसी से न कहना, पसंद अपनी अपनी, अमानुष, किराएदार, अपने पराएं, मेरा दामाद, बात बन जाए, अंगूर, साहेब, आनंद, गुड्डी, इन्कलाब, दो अनजाने, द ग्रेट गैंबलर, प्रेम विवाह, कत्र्तव्य, सदा सुहागन, उल्टा-सीधा आदि ।

Saturday, 15 August 2020

04:58

चन्द्रशेखर आजाद के विचारों की गौरव गाथा



आभार: चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) बैसवारा से थे। आजाद के पितापण्डित सीताराम तिवारी संवत् १८५६ में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों [मध्य प्रदेश] अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा [गाँव] में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ" के नाम से जाना जाता था।

*पहली घटना*
१९१९ में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। जब गांधीजी ने सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलनका फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है-

ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'भारत माता की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना
*झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां*
चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।

*क्रान्तिकारी संगठन*
असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में (चौरी चौरा) की घटना के पश्चात् बिना किसी से पूछे (गाँधीजी) ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। "एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था।

इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ - पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।

४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

*लाला लाजपतराय का बदला*
17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।

केन्द्रीय असेंबली में बम संपादित करें
चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था। इस काण्ड के फलस्वरूप भी क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए। केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगति सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया। वे न्यायालय को अपना प्रचार–मंच बनाना चाहते थे।

*चरम सक्रियता*
आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।

*बलिदान*
एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फ़रवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और २० फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें! अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद ने अंतिम गोली खुद को मार कर वीरगति प्राप्त की। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद के बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी।। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फ़रवरी १९३१ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेस बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे

Thursday, 23 July 2020

07:53

SVS नेता रामजी पांडे ने किया स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद को कोटि कोटि नमन


नोयडा श्रमिक  विकास संगठन SVS के गौतमबुद्ध नगर के जिला अध्यक्ष रामजी पांडे ने स्वतंत्रता आंदोलन के अमर शहीद  चंद्रशेखर आजाद की जन्म जयंती परआज उस पुण्य आत्मा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि  आज देश को फिर से चन्द्रशेखर आजाद जैसे देशभक्त की जरूरत आन पड़ी है।रामजी पांडे ने कहा कि आज ही के दिन 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा में चन्द्र शेखर आजाद का जन्म हुआ था. 1920 में 14 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और तब जज ने आजाद जी के कांतिकारी तेवर देखकर उन्हें कड़ी सजा सुनाई  मौजूदा इतिहास के अनुसार चंद्रशेखर आजाद की निशानेबाजी बचपन से बहुत अच्छी थी. सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया. जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आजाद भी इस दल में शामिल हो गए। इसके बाद

आजाद ने सशस्त्र क्रान्ति के माध्यम से देश को आजाद कराने वाले युवकों का एक दल बना लिया, जिसमें शचीन्द्रनाथ सान्याल, बटुकेश्वर दत्त, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल, अशफाक, जयदेव, शिव प्रसाद गुप्त, दामोदर स्वरूप, आचार्य धरमवीर आदि उनके सहयोगी थे. बाद में काकोरी कांड, अंग्रेज अफसर जेपी सांडर्स की हत्या और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले आजाद प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। रामजी पांडे ने कहा कि चंदशेखर आजाद का सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित रहा।जिसने आजाद भारत को  देश भक्ति का सही मतलब समझाया ऐसी पुण्य आत्मा के श्री चरणों मे मेरा कोटि कोटि नमन।

Tuesday, 14 July 2020

23:53

शिक्षाप्रेमी सन्त स्वामी कल्याणदेव जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



स्वामी कल्याणदेव जी महाराज सच्चे अर्थों में सन्त थे। उनकी जन्मतिथि एवं शिक्षा-दीक्षा के बारे में निश्चित जानकारी किसी को नहीं है। एक मत के अनुसार जून 1876 में उनका जन्म ग्राम कोताना (जिला बागपत, उ.प्र.) के एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री फेरूदत्त जाँगिड़ तथा माता श्रीमती भोईदेवी थीं। कुछ लोग जिला मुजफ्फरनगर के मुण्डभर गाँव को उनकी जन्मस्थली मानते हैं। उनके बचपन का नाम कालूराम था।

धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण दस साल की अवस्था में उन्होंने घर छोड़ दिया था। 1900 ई0 में ऋषिकेश में स्वामी पूर्णदेव जी से दीक्षा लेकर वे हिमालय में तप एवं अध्ययन करने चले गये। 1902 में राजस्थान में खेतड़ी नरेश के बगीचे में स्वामी विवेकानन्द से उनकी भेंट हुई। विवेकानन्द ने उन्हें पूजा-पाठ के बदले निर्धनों की सेवा हेतु प्रेरित किया। इससे कल्याणदेव जी के जीवन की दिशा बदल गयी।

1915 में गान्धी जी से भेंट के बाद स्वामी जी स्वाधीनता संग्राम के साथ ही हिन्दी और खादी के प्रचार तथा अछूतोद्धार में जुट गये। इस दौरान उन्हें अनुभव आया कि निर्धनों के उद्धार का मार्ग उन्हें भिक्षा या अल्पकालीन सहायता देना नहीं, अपितु शिक्षा की व्यवस्था करना है। बस, तब से उन्होंने शिक्षा के विस्तार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

स्वामी जी ने मुजफ्फरनगर जिले में गंगा के तट पर बसे तीर्थस्थान शुकताल को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया। यह वही स्थान है, जहाँ मुनि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को वटवृक्ष के नीचे पहली बार भागवत की कथा सुनायी थी। वह वटवृक्ष आज भी जीवित है। स्वामी जी ने इस स्थान का जीर्णाेद्धार कर उसे सुन्दर तीर्थ का रूप दिया। इसके बाद तो भक्तजन स्वामी जी को मुनि शुकदेव का अंशावतार मानने लगे। स्वामी जी ने गंगा तट पर बसे महाभारतकालीन हस्तिनापुर के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

सरलता और सादगी की प्रतिमूर्ति स्वामी जी का प्रेम एवं आशीर्वाद जिसे भी मिला, वही धन्य हो गया। इनमें भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर पण्डित नेहरू, नीलम संजीव रेड्डी, इन्दिरा गान्धी, डा. शंकरदयाल शर्मा, गुलजारीलाल नन्दा, के.आर. नारायणन, अटल बिहारी वाजपेयी आदि बड़े राजनेताओं से लेकर सामान्य ग्राम प्रधान तक शामिल हैं। स्वामी कल्याणदेव जी सबसे समान भाव से मिलते थे।

स्वामी जी ने अपने जीवनकाल में 300 से भी अधिक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की। वे सदा खादी के मोटे भगवा वस्त्र ही पहनते थे। प्रायः उनके वस्त्रों पर थेगली लगी रहती थी। प्रारम्भ में कुछ लोगों ने इसे उनका पाखण्ड बताया; पर वे निर्विकार भाव से अपने कार्य में लगे रहे। वे सेठों से भी शिक्षा के लिए पैसा लेते थे; पर भोजन तथा आवास सदा निर्धन की कुटिया में ही करते थे। शाकाहार के प्रचारक इस सन्त को 1992 में पद्मश्री तथा 2000 ई. में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

13 जुलाई की अतिरात्रि में उन्होंने अपने शिष्यों से उन्हें प्राचीन वटवृक्ष एवं शुकदेव मन्दिर की परिक्रमा कराने को कहा। परिक्रमा पूर्ण होते ही 12.20 पर उन्होंने देहत्याग दी। तीन सदियों के द्रष्टा 129 वर्षीय इस वीतराग सन्त को संन्यासी परम्परा के अनुसार अगले दिन शुकताल में भूसमाधि दी गयी।
23:52

15 जुलाईहिंदी पत्रकारिता के पुरोधा प्रभाष जोशी जी का जन्मदिन पर विशेष-के सी शर्मा

स्वाधीन भारत में जिन पत्रकारों ने विशिष्ट पहचान बनाई, उनमें प्रभाष जोशी भी एक हैं। उनका जन्म 15 जुलाई 1937 को म.प्र. के मालवा क्षेत्र में हुआ था। छात्र जीवन से ही वे गांधी, सर्वोदय और विनोबा से जुड़ गये। उन्होंने विनोबा के साथ रहकर भूदान आंदोलन के समाचार जुटाये। फिर उन्होंने इंदौर से प्रकाशित ‘नई दुनिया’ में बाबा राहुल बारपुते की देखरेख में पत्रकारिता के गुर सीखे और भोपाल के ‘मध्य देश’ से जुड़े। 

जयप्रकाश नारायण ने जब 1972 में दस्यु माधोसिंह का आत्मसमर्पण कराया, तो प्रभाष जी भी साथ थे। सर्वोदय जगत, प्रजानीति, आसपास, इंडियन एक्सप्रेस आदि में वे अनेक दायित्वों पर रहे। हिन्दी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। लेखन में वे स्थानीय लोकभाषा के शब्दों का खूब प्रयोग करते थे।

1983 में एक्सप्रेस समूह ने प्रभाष जोशी के संपादकत्व में दिल्ली से ‘जनसत्ता’ प्रकाशित किया। प्रभाष जी ने युवा पत्रकारों की टोली बनाकर उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम करने दिया। शुद्ध और साहित्यिक, पर सरल हिन्दी जनसत्ता की विशेषता थी। उसमें साहित्य, कला व संस्कृति के साथ ही सामयिक विषयों पर मौलिक हिन्दी लेख छपते थे, अंग्रेजी लेखकों की जूठन नहीं। 

उन्होेंने हिन्दी अखबारों की भेड़चाल से अलग रहकर नागरी अंकावली का ही प्रयोग किया। सम्पादकीय विचार अलग होने पर भी समाचार वे निष्पक्ष रूप से देते थे। इससे शीघ्र ही जनसत्ता लोकप्रिय हो गया। धीरे-धीरे प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक-दूसरे के पर्याय बन गये।

कबीर, क्रिकेट और कुमार गंधर्व के शास्त्रीय गायन के प्रेमी होने के कारण वे इन पर खूब लिखते थे। एक दिवसीय कोे 'फटाफट क्रिकेट' और 20 ओवर वाले मैच को उन्होंने 'बीसम बीस' की उपमा दी। जन समस्याओं को वे गोष्ठियों से लेकर सड़क तक उठाते थे। उनका प्रायः सभी बड़े राजनेताओें से संबंध थे। वे प्रशंसा के साथ ही उनकी खुली आलोचना भी करते थे। 

उन्होंने आपातकाल का तीव्र विरोध किया। राजीव गांधी के भ्रष्टाचार के विरोध में वी.पी. सिंह के बोफोर्स आंदोलन तथा फिर राममंदिर आंदोलन का उन्होंने साथ दिया। चुटीले एवं मार्मिक शीर्षक के कारण उनके लेख सदा पठनीय होते थे। जनसत्ता में हर रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ उनका लोकप्रिय स्तम्भ था। वे हंसी में स्वयं को ‘ढिंढोरची’ कहते थे, जो सब तक खबर पहुंचाता है।

राममंदिर आंदोलन में एक समय वे वि.हि.प. और सरकार के बीच कड़ी बन गये थे; पर 6 दिसम्बर, 1992 को अचानक हिन्दू युवाओं के आक्रोश से बाबरी ढांचा ध्वस्त हो गया। उन्हें लगा कि यह सब योजनाबद्ध था। इससे उन्होंने स्वयं को अपमानित अनुभव किया और फिर उनकी कलम और वाणी सदा संघ विचार के विरोध में ही चलती रही। धीरे-धीरे जनसत्ता वामपंथी स्वभाव का पत्र बन गया और उसकी लोकप्रियता घटती गयी। कुछ के मतानुसार भा.ज.पा. ने उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा, इससे वे नाराज थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में कई अखबारों ने प्रत्याशियों सेे पैसे लेकर विज्ञापन के रूप में समाचार छापे, इसके विरुद्ध उग्र लेख लिखकर उन्होंने पत्रकारों और जनता को जाग्रत किया।

प्रभाष जी का शरीर अनेक रोगों का घर था। उनकी बाइपास सर्जरी हो चुकी थी। 5 नवम्बर, 2009 को हैदराबाद में भारत और ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हुआ। प्रभाष जी उसे दूरदर्शन पर देख रहे थे। सचिन तेंदुलकर ने 175 रन बनाये, इससे वे बहुत प्रफुल्लित हुए; पर अचानक उसके आउट होने और तीन रन से भारत की हार का झटका उनका दिल नहीं सह सका और अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही उनका प्राणांत हो गया। इस प्रकार एक प्रखर पत्रकार की वाणी और लेखनी सदा के लिए शांत हो गयी।।
23:50

15 जुलाईउत्कट स्वाभिमानी जयदेव पाठक जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



संघ के वरिष्ठ जीवनव्रती प्रचारक श्री जयदेव पाठक का जन्म 1924 ई. की जन्माष्टमी वाले दिन हिण्डौन (राजस्थान) के ग्राम फाजिलाबाद में श्रीमती गुलाबोदेवी की गोद में हुआ था। उनके पिता का श्री जगनलाल शर्मा अध्यापक थे। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तो उनकी माताजी का देहांत हो गया। 
हिण्डौन से कक्षा सात उत्तीर्ण कर वे जयपुर आ गये और 1942 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक किया। उन दिनों भारत छोड़ो आंदोलन का जोर था। अतः वे उसमें शामिल हो गये। इससे घर वाले बहुत नाराज हुए। इस पर जयदेव जी ने घर ही छोड़ दिया। वे इतने उत्कट स्वाभिमानी थे कि उसके बाद फिर घर गये ही नहीं।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे निकटवर्ती गांव और नगरों में प्रचार के लिए जाते थे। उस समय उन्हें न भोजन की चिन्ता रहती थी, न विश्राम की। कई बार तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही सोकर वे रात बिता देते थे। जब वह आंदोलन समाप्त हुआ, तो देशभक्ति की वह आग उन्हें संघ की ओर खींच लाई और फिर वे तन-मन से संघ के लिए समर्पित हो गये।
1942 में जयपुर में संघ का काम ‘सत्संग’ के नाम से चलता था। चार अपै्रल, 1944 को जयदेव जी ने पहली बार इसमें भाग लिया। उन दिनों श्री बच्छराज व्यास नागपुर से प्रान्त प्रचारक होकर राजस्थान आये थे। जयदेव जी उनसे बहुत प्रभावित हुए और अति उत्साह के साथ संघ शाखाओं के विस्तार में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल दिये। उनके अत्यधिक उत्साह से कई लोगों को शक हुआ कि वे खुफिया विभाग के व्यक्ति हैं; पर क्रमशः शंका के बादल छंट गये और 1946 में वे प्रचारक बन कर कार्यक्षेत्र में कूद गये।
प्रथम प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद संघ भीषण आर्थिक संकट में आ गया। ऐसे में प्रचारकों को यह कहा गया कि यदि वे चाहें, तो वापस लौटकर कोई नौकरी या काम धंधा कर सकते हैं। अतः जयदेव जी भी 1950 में अध्यापक बन गये; पर उनके मन में तो संघ बसा था। अतः सरकारी नौकरी के अतिरिक्त शेष सारा समय वे शाखा विस्तार में ही लगाते थे। बारह वर्ष तक अध्यापन करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और फिर से प्रचारक बन गये।
प्रचारक जीवन में वे उदयपुर व डूंगरपुर में जिला प्रचारक तथा उदयपुर, जयपुर, सीकर व भरतपुर में विभाग प्रचारक रहे। इस बीच दो वर्ष उन पर राजस्थान प्रान्त के बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी भी रही। खूब प्रवास करने के बावजूद वे स्वभाव से बहुत मितव्ययी थे। अपने ऊपर संगठन का एक पैसा भी अधिक खर्च न हो, इसकी ओर उनका बहुत आग्रह एवं ध्यान रहता था।
1974 से 2002 तक उन पर राजस्थान में विद्या भारती और शिक्षक संघ के संगठन मंत्री का काम रहा। 28 वर्ष के इस कालखंड में उन्होंने राजस्थान शिक्षक संघ को राज्य का सबसे बड़ा और प्रभावी संगठन बना दिया। आदर्श विद्या मंदिरों की एक बड़ी श्रृंखला के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही है। जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण प्रवास में कठिनाई होने लगी, तब भी वे राजस्थान में विद्या भारती के मार्गदर्शक के नाते संस्था की देखभाल करते रहे।
जयदेव जी के मन में एक घंटे की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी। प्रतिदिन शाखा जाने का जो व्रत उन्होंने 1944 में लिया था, उसे आजीवन निभाया। परम पवित्र भगवा ध्वज को वे ईश्वर का साकार रूप मानते थे। अतः शाखा से लौटकर ही वे अन्न-जल ग्रहण करते थे। ऐसे कर्मठ एवं स्वाभिमानी प्रचारक का15 जुलाई, 2006 को निधन हुआ।

Monday, 13 July 2020

19:25

14 जुलाईसबके रज्जू भैया जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालकद प्रो0 राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी, 1922 को ग्राम बनैल (जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश) के एक सम्पन्न एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता कुँवर बलबीर सिंह  अंग्रेज शासन में पहली बार बने भारतीय मुख्य अभियन्ता थे। इससे पूर्व इस पद पर सदा अंग्रेज ही नियुक्त होते थे। राजेन्द्र सिंह को घर में सब प्यार से रज्जू कहते थे। आगे चलकर उनका यही नाम सर्वत्र लोकप्रिय हुआ।

रज्जू भैया बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उनके पिता की इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जायें। इसीलिए उन्हें पढ़ने के लिए प्रयाग भेजा गया; पर रज्जू भैया को अंग्रेजों की गुलामी पसन्द नहीं थी। उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम-एस.सी. उत्तीर्ण की और फिर वहीं भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गये। 

उनकी एम-एस.सी. की प्रयोगात्मक परीक्षा लेने नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 सी.वी.रमन आये थे। वे उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने साथ बंगलौर चलकर शोध करने का आग्रह किया; पर रज्जू भैया के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही था।

प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र, जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ, उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे। 

प्राध्यापक रहते हुए रज्जू भैया अब संघ कार्य के लिए अब पूरे उ.प्र.में प्रवास करने लगे। वे अपनी कक्षाओं का तालमेल ऐसे करते थे, जिससे छात्रों का अहित न हो तथा उन्हें सप्ताह में दो-तीन दिन प्रवास के लिए मिल जायें। पढ़ाने की रोचक शैली के कारण छात्र उनकी कक्षा के लिए उत्सुक रहते थे।

रज्जू भैया सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे। वे सदा तृतीय श्रेणी में ही प्रवास करते थे तथा प्रवास का सारा व्यय अपनी जेब से करते थे। इसके बावजूद जो पैसा बचता था, उसे वे चुपचाप निर्धन छात्रों की फीस तथा पुस्तकों पर व्यय कर देते थे। 1966 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय संघ को ही देने लगे। 

अब उन पर उत्तर प्रदेश के साथ बिहार का काम भी आ गया। वे एक अच्छे गायक भी थे। संघ शिक्षा वर्ग की गीत कक्षाओं में आकर गीत सीखने और सिखाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। सरल उदाहरणों से परिपूर्ण उनके बौद्धिक ऐसे होते थे, मानो कोई अध्यापक कक्षा ले रहा हो।

उनकी योग्यता के कारण उनका कार्यक्षेत्र क्रमशः बढ़ता गया। आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ। 

1977 में रज्जू भैया सह सरकार्यवाह, 1978 में सरकार्यवाह और 1994 में सरसंघचालक बने। उन्होंने देश भर में प्रवास कर स्वयंसेवकों को कार्य विस्तार की प्रेरणा दी। बीमारी के कारण उन्होंने 2000 ई0 में श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दे दिया। इसके बाद भी वे सभी कार्यक्रमों में जाते रहे।

अन्तिम समय तक सक्रिय रहते हुए 14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में रज्जू भैया का देहान्त हो गया।
19:24

बाजी प्रभु देशपाण्डे का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिन्दू पद-पादशाही की स्थापना में जिन वीरों ने नींव के पत्थर की भांति स्वयं को विसर्जित किया, उनमें बाजीप्रभु देशपाण्डे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

एक बार शिवाजी 6,000 सैनिकों के साथ पन्हालगढ़ में घिर गये। किले के बाहर सिद्दी जौहर के साथ एक लाख सेना डटी थी। बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने अफजलखाँ के पुत्र फाजल खाँ के शिवाजी को पराजित करने में विफल होने पर उसे भेजा था। चार महीने बीत गये। एक दिन तेज आवाज के साथ किले का एक बुर्ज टूट गया। शिवाजी ने देखा कि अंग्रेजों की एक टुकड़ी भी तोप लेकर वहाँ आ गयी है। किले में रसद भी समाप्ति पर थी।

साथियों से परामर्श में यह निश्चय हुआ कि जैसे भी हो, शिवाजी 40 मील दूर स्थित विशालगढ़ पहुँचे। 12 जुलाई, 1660 की बरसाती रात में एक गुप्त द्वार से शिवाजी अपने विश्वस्त 600 सैनिकों के साथ निकल पड़े। भ्रम बनाये रखने के लिए अगले दिन एक दूत यह सन्धिपत्र लेकर सिद्दी जौहर के पास गया कि शिवाजी बहुत परेशान हैं, अतः वे समर्पण करना चाहते हैं।

यह समाचार पाकर मुगल सैनिक उत्सव मनाने लगे। यद्यपि एक बार उनके मन में शंका तो हुई; पर फिर सब शराब और शबाब में डूब गये। समर्पण कार्यक्रम की तैयारी होने लगी। उधर शिवाजी का दल तेजी से आगे बढ़ रहा था। अचानक गश्त पर निकले कुछ शत्रुओं की निगाह में वे आ गये। तुरन्त छावनी में सन्देश भेजकर घुड़सवारों की एक टोली उनके पीछे लगा दी गयी।

पर इधर भी योजना तैयार थी। एक अन्य पालकी लेकर कुछ सैनिक दूसरी ओर दौड़ने लगे। घुड़सवार उन्हें पकड़कर छावनी ले आये; पर वहाँ आकर उन्होंने माथा पीट लिया। उसमें से निकला नकली शिवाजी। नये सिरे से फिर पीछा शुरू हुआ। तब तक महाराज तीस मील पारकर चुके थे; पर विशालगढ़ अभी दूर था। इधर शत्रुओं के घोड़ों की पदचाप सुनायी देने लगी थी।

इस समय शिवाजी एक संकरी घाटी से गुजर रहे थे। अचानक बाजीप्रभु ने उनसे निवेदन किया कि मैं यहीं रुकता हूँ। आप तेजी से विशालगढ़ की ओर बढ़ें। जब तक आप वहाँ नहीं पहुँचेंगे, तब तक मैं शत्रु को पार नहीं होने दूँगा। शिवाजी के सामने असम॰जस की स्थिति थी; पर सोच-विचार का समय नहीं था। आधे सैनिक बाजीप्रभु के साथ रह गये और आधे शिवाजी के साथ चले। निश्चय हुआ कि पहुँच की सूचना तोप दागकर दी जाएगी।

घाटी के मुख पर बाजीप्रभु डट गये। कुछ ही देर में सिद्दी जौहर के दामाद सिद्दी मसूद के नेतृत्व में घुड़सवार वहाँ आ पहंँचे। उन्होंने दर्रे में घुसना चाहा; पर सिर पर कफन बाँधे हिन्दू सैनिक उनके सिर काटने लगे। भयानक संग्राम छिड़ गया। सूरज चढ़ आया; पर बाजीप्रभु ने उन्हें घाटी में घुसने नहीं दिया। 

एक-एक कर हिन्दू सैनिक धराशायी हो रहे थे। बाजीप्रभु भी सैकड़ों घाव खा चुके थे; पर उन्हें मरने का अवकाश नहीं था। उनके कान तोप की आवाज सुनने को आतुर थे। विशालगढ़ के द्वार पर भी शत्रु सेना का घेरा था। उन्हें काटते मारते शिवाजी किले में पहुँचे और तोप दागने का आदेश दिया।

इधर तोप की आवाज बाजीप्रभु के कानों ने सुनी, उधर उनकी घायल देह धरती पर गिरी। शिवाजी विशालगढ़ पहुँचकर अपने उस प्रिय मित्र की प्रतीक्षा ही करते रह गये; पर उसके प्राण तो लक्ष्य पूरा करते-करते अनन्त में विलीन हो चुके थे। बाजीप्रभु देशपाण्डे की साधना सफल हुई। तब से वह बलिदानी घाटी (खिण्ड) पावन खिण्ड कहलाती है।

Saturday, 11 July 2020

23:25

12 जुलाईकर्मठ कार्यकर्ता सदानंद काकड़े जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

संगठन द्वारा निर्धारित कार्य में पूरी शक्ति झांेक देने वाले श्री सदाशिव नीलकंठ (सदानंद) काकड़े का जन्म 14 जून, 1921 को बेलगांव (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता वहीं साहूकारी करते थे। बलिष्ठ शरीर वाले पांच भाई और नौ बहनों के इस परिवार की नगर में धाक थी। बालपन में उन्होंने रंगोली, प्रकृति चित्रण, तैल चित्र आदि में कई पारितोषिक लिये। वे नाखून से चित्र बनाने में भी निपुण थे। मेधावी छात्र होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती रही। उन्हें तेज साइकिल चलाने में मजा आता था। वास्तु शास्त्र, हस्तरेखा विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, अंक ज्ञान आदि भी उनकी रुचि के विषय थे।

रसायन शास्त्र में स्नातक सदानंद जी 1938 में स्वयंसेवक और 1942 में प्रचारक बने। नागपुर में श्री यादवराव जोशी से हुई भेंट ने उनके जीवन में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रारम्भ में वे बेलगांव नगर और तहसील कार्यवाह रहे। प्रचारक बनने पर वे बेलगांव नगर, जिला और फिर गुलबर्गा विभाग प्रचारक रहे। 1969 में उन्हें 'विश्व हिन्दू परिषद' में भेजा गया।

उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद का काम प्रारम्भिक अवस्था में था। सदानंद जी को कर्नाटक प्रान्त के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। 1979 में प्रयाग में हुए द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन में वे 700 कार्यकर्ताओं को एक विशेष रेल से लेकर आये। 1983 तक वे प्रांत और 1993 तक दक्षिण भारत के क्षेत्रीय संगठन मंत्री रहे। 1993 में उनका केन्द्र दिल्ली हो गया और वे केन्द्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री, उपाध्यक्ष और फिर परामर्शदाता मंडल के सदस्य रहे। 1983 में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की शताब्दी मनाने के लिए उन्होंने श्रीलंका, इंग्लैंड और अमरीका की यात्रा भी की।

बेलगांव में सदानंद जी का सम्पर्क श्री जगन्नाथ राव जोशी से हुआ, जो आगे चलकर प्रचारक और फिर दक्षिण में जनसंघ और भाजपा के आधार स्तम्भ बने। 'इतिहास संकलन समिति' के श्री हरिभाऊ वझे और वि.हि.प. के श्री बाबूराव देसाई भी अपने प्रचारक जीवन का श्रेय उन्हें ही देते हैं। गांधी हत्या के बाद एक क्रुद्ध भीड़ ने बेलगांव जिला संघचालक अप्पा साहब जिगजिन्नी पर प्राणघातक हमला कर दिया। इस पर सदानंद जी भीड़ में कूद गये और अप्पा साहब के ऊपर लेटकर सारे प्रहार झेलते रहे। इससे वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।

प्रारम्भ में संघ की सब गतिविधियों का केन्द्र बेलगांव ही था। कई वर्ष तक उनकी देखरेख में संघ शिक्षा वर्ग लगातार वहीं लगा; पर उसमें कभी घाटा नहीं हुआ। गोवा मुक्ति आंदोलन के समय देश भर से लोग बेलगांव होकर ही गोवा जाते थे। वर्ष 1995 में हुई द्वितीय एकात्मता यात्रा के वे संयोजक थे। इसमें सात बड़े और 700 छोटे रथ थे, जिन पर भारत माता,गंगा माता और गोमाता की मूर्तियां लगी थीं। सभी बड़े रथों के रेशीम बाग, नागपुर में मिलन के समय निवर्तमान सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस, सरसंघचालक श्री रज्जू भैया और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे भी उपस्थित हुए।

बहुभाषी सदानंद जी ने हिन्दी और मराठी में कई पुस्तकें लिखीं। ‘हिन्दू, हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र’ नामक पुस्तक का देश की नौ भाषाओं में अनुवाद हुआ। जगन्नाथ राव जोशी से उनके संबंध बहुत मित्रतापूर्ण थे। जोशी जी के देहांत के बाद उन्होंने आग्रहपूर्वक पुणे के श्री अरविन्द लेले से उनका जीवन परिचय लिखवाया और श्री ओंकार भावे से उसका हिन्दी अनुवाद कराया।

वर्ष 2005 से वे अनेक रोगों से पीड़ित हो गये। कई तरह के उपचार के बावजूद प्रवास असंभव होने पर वे आग्रहपूर्वक अपनी जन्मभूमि बेलगांव ही चले गये। वहां एक अनाथालय का निर्माण उन्होंने किसी समय कराया था। उसमें रहते हुए 12 जुलाई, 2010 को उनका शरीरांत हुआ।
23:23

11 जुलाईपहाड़ी गांधी बाबा काशीराम जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा

बाबा काशीराम का नाम हिमाचल प्रदेश के स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची में शीर्ष पर लिया जाता है। उनका जन्म ग्राम पद्धयाली गुर्नाड़ (जिला कांगड़ा) में 11 जुलाई, 1888 को हुआ था। इनके पिता श्री लखनु शाह तथा माता श्रीमती रेवती थीं। श्री लखनु शाह और उनके परिवार की सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत प्रतिष्ठा थी।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में अनेक लोकगीतों और कविताओं ने राष्ट्रभक्ति की ज्वाला को प्रज्वलित करने में घी का काम किया। इन्हें गाकर लोग सत्याग्रह करते थे और प्रभातफेरी निकालते थे। अनेक क्रान्तिकारी ‘वन्दे मातरम्’ और ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’ जैसे गीत गाते हुए फाँसी पर झूल गये। उन क्रान्तिवीरों के साथ वे गीत और उनके रचनाकार भी अमर हो गये।

इसी प्रकार बाबा काशीराम ने अपने गीत और कविताओं द्वारा हिमाचल प्रदेश की बीहड़ पहाड़ियों में पैदल घूम-घूम कर स्वतन्त्रता की अलख जगायी। उनके गीत हिमाचल प्रदेश की स्थानीय लोकभाषा और बोली में होते थे। पर्वतीय क्षेत्र में ग्राम देवताओं की बहुत प्रतिष्ठा है। बाबा काशीराम ने अपने काव्य में इन देवी-देवताओं और परम्पराओं की भरपूर चर्चा की। इसलिए वे बहुत शीघ्र ही आम जनता की जिह्ना पर चढ़ गये।

1937 में गद्दीवाला (होशियारपुर) में सम्पन्न हुए सम्मेलन में नेहरू जी ने इनकी रचनाएँ सुनकर और स्वतन्त्रता के प्रति इनका समर्पण देखकर इन्हें ‘पहाड़ी गान्धी’ कहकर सम्बोधित किया। तब ये इसी नाम से प्रसिद्ध हो गये। जीवन में अनेक विषमताओं से जूझते हुए बाबा काशीराम ने अपने देश, धर्म और समाज पर अपनी चुटीली रचनाओं द्वारा गहन टिप्पणियाँ कीं। इनमें कुणाले री कहाणी, बाबा बालकनाथ कनै फरियाद, पहाड़ेया कन्नै चुगहालियाँ आदि प्रमुख हैं। 

उन दिनों अंग्रेजों के अत्याचार चरम पर थे। वे चाहे जिस गाँव में आकर जिसे चाहे जेल में बन्द कर देते थे। दूसरी ओर स्वतन्त्रता के दीवाने भी हँस-हँसकर जेल और फाँसी स्वीकार कर रहे थे। ऐसे में बाबा ने लिखा -

भारत माँ जो आजाद कराणे तायीं
मावाँ दे पुत्र चढ़े फाँसियाँ
हँसदे-हँसदे आजादी ने नारे लाई।।

बाबा स्वयं को राष्ट्रीय पुरुष मानते थे। यद्यपि पर्वतीय क्षेत्र में जाति-बिरादरी को बहुत महत्त्व दिया जाता है; पर जब कोई बाबा से यह पूछता था, तो वे गर्व से कहते थे -

मैं कुण, कुण घराना मेरा, सारा हिन्दुस्तान ए मेरा
भारत माँ है मेरी माता, ओ जंजीराँ जकड़ी ए।
ओ अंग्रेजाँ पकड़ी ए, उस नू आजाद कराणा ए।।

उनकी सभी कविताओं में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना के स्वर सुनाई देते हैं

काशीराम जिन्द जवाणी, जिन्दबाज नी लाणी
इक्को बार जमणा, देश बड़ा है कौम बड़ी है।
जिन्द अमानत उस देस दी
कुलजा मत्था टेकी कने, इंकलाब बुलाणा।।

इसी प्रकार देश, धर्म और राष्ट्रीयता के स्वर बुलन्द करते हुए बाबा काशीराम 15 अक्तूबर, 1943 को इन दुनिया से विदा हो गये। हिमाचल प्रदेश में आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उनके गीत गाकर उन्हें याद किया जाता है।

Thursday, 9 July 2020

21:35

10 जुलाईसंकल्प के धनी जयगोपाल जी का जन्म.दिवस पर विशेष-के सी शर्मा


राष्ट्रीय स्वयंगसेवक संघ की परम्परा में अनेक कार्यकर्ता प्रचारक जीवन स्वीकार करते हैं; पर ऐसे लोग कम ही होते हैं, जो बड़ी से बड़ी व्यक्तिगत या पारिवारिक बाधा आने पर भी अपने संकल्प पर दृढ़ रहते हैं। श्री जयगोपाल जी ऐसे ही संकल्प के व्रती थे। 

उनका जन्म अविभाजित भारत के पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त स्थित डेरा इस्माइल खाँ नगर के एक प्रतिष्ठित एवं सम्पन्न परिवार में 10 जुलाई, 1923 को हुआ था। अब यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। वे चार भाइयों तथा तीन बहनों में सबसे बड़े थे। विभाजन से पूर्व छात्र जीवन में ही वे संघ के सम्पर्क में आ गये थे।

जयगोपाल जी ने लाहौर से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने हीवेट पॉलीटेक्निक कॉलिज, लखनऊ से प्रथम श्रेणी में स्वर्ण पदक के साथ अभियन्ता की परीक्षा उत्तीर्ण की। यहीं उनकी मित्रता भाऊराव देवरस से हुई। उसके बाद तो दोनों 'दो देह एक प्राण' हो गये।

घर में सबसे बड़े होने के नाते माता-पिता को आशा थी कि अब वे नौकरी करेंगे; पर जयगोपाल जी तो संघ के माध्यम से समाज सेवा का व्रत ले चुके थे। अतः शिक्षा पूर्ण कर 1942 में वे संघ के प्रचारक बन गये। भारत विभाजन के समय उस ओर के हिन्दुओं ने बहुत शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संकट झेले। जयगोपाल जी के परिवारजन भी खाली हाथ बरेली आ गये। ऐसे में एक बार फिर उन पर घर लौटकर कुछ काम करने का दबाव पड़ा; पर उन्होंने अपने संकल्प को लेशमात्र भी हल्का नहीं होने दिया और पूर्ववत संघ के प्रचारक के रूप में काम में लगे रहे।

संघ कार्य में नगर, जिला, विभाग प्रचारक के नाते उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई स्थानों विशेषकर शाहजहाँपुर, बरेली, लखनऊ तथा प्रयाग आदि में संघ कार्य को प्रभावी बनाया। उन्होंने तीन वर्ष तक काठमाण्डू में भी संघ-कार्य किया और नेपाल विश्वविद्यालय से उपाधि भी प्राप्त की। 

वे 1973 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक बने। 1975 में देश में आपातकाल लागू होने पर उन्होंनेे भूमिगत रहकर अत्यन्त सक्रिय भूमिका निभाई और अन्त तक पकड़े नहीं गये। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक श्री माधवराव देवड़े की गिरफ्तारी के बाद वे पूरे उत्तर प्रदेश में भ्रमण कर स्वयंसेवकों का उत्साहवर्धन करते रहे।

जयगोपाल जी ने 1989 में क्षेत्र प्रचारक के नाते जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा तथा दिल्ली का कार्य सँभाला। उनका केन्द्र चण्डीगढ़ बनाया गया। उस समय पंजाब में आतंकवाद चरम पर था और संघ की कई शाखाओं पर आतंकवादी हमले भी हुए थे। इन कठिन परिस्थितियों में भी वे अडिग रहकर कार्य करते रहे। स्वास्थ्य खराबी के बाद भी वे लेह-लद्दाख जैसे क्षेत्रों में गये और वहाँ संघ कार्य का बीजारोपण किया।

1994 में उन्हें विद्या भारती (उ.प्र.) का संरक्षक बनाकर फिर लखनऊ भेजा गया। यहाँ रह कर भी वे यथासम्भव प्रवास कर विद्या भारती के काम को गति देते रहे। वृद्धावस्था तथा अन्य अनेक रोगों से ग्रस्त होने के कारण दो अगस्त, 2005 को दिल्ली में अपने भाई के घर पर उनका देहान्त हुआ।

जयगोपाल जी ने जो तकनीकी शिक्षा और डिग्री पाई थी, उसका उन्होंने पैसा कमाने में तो कोई उपयोग नहीं किया; पर लखनऊ में संघ परिवार की अनेक संस्थाओं के भवनों के नक्शे उन्होंने ही बनाये। इनमें विद्या भारती का मुख्यालय निराला नगर तथा संघ कार्यालय केशव भवन प्रमुख हैं।

Saturday, 4 July 2020

02:34

4 जुलाईस्वामी विवेकानंद जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



लक्ष्य की सही पहचान करे ! —
एक बार स्वामी विवेकानन्द के आश्रम में एक व्यक्ति आया जो देखने में बहुत दुखी लग रहा था. वह व्यक्ति आते ही स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ मैं अपने दैनिक जीवन में बहुत मेहनत करता हूँ, काफी लगन से भी काम करता हूँ लेकिन कभी भी सफल नहीं हो पाया. भगवान ने मुझे ऐसा नसीब क्यों दिया है कि मैं पढ़ा लिखा और मेहनती होते हुए भी कभी कामयाब नहीं हो पाया हूँ, धनवान नहीं हो पाया हूँ.

स्वामी जी उस व्यक्ति की परेशानी को पल भर में ही समझ गए. उन दिनों स्वामी जी के पास एक छोटा सा पालतू कुत्ता था, उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, “तुम कुछ दूर जरा मेरे कुत्ते को सैर करा लाओ फिर मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा.”

आदमी ने बड़े आश्चर्य से स्वामी जी की ओर देखा और फिर कुत्ते को लेकर कुछ दूर निकल पड़ा. काफी देर तक अच्छी खासी सैर करा कर जब वो व्यक्ति वापस स्वामी जी के पास पहुँचा तो स्वामी जी ने देखा कि उस व्यक्ति का चेहरा अभी भी चमक रहा था जबकि कुत्ता हाँफ रहा था और बहुत थका हुआ लग रहा था. स्वामी जी ने व्यक्ति से कहा, “कि ये कुत्ता इतना ज्यादा कैसे थक गया जबकि तुम तो अभी भी साफ सुथरे और बिना थके दिख रहे हो.” तो व्यक्ति ने कहा, “मैं तो सीधा साधा अपने रास्ते पे चल रहा था लेकिन ये कुत्ता गली के सारे कुत्तों के पीछे भाग रहा था और लड़कर फिर वापस मेरे पास आ जाता था. हम दोनों ने एक समान रास्ता तय किया है लेकिन फिर भी इस कुत्ते ने मेरे से कहीं ज्यादा दौड़ लगाई है इसीलिए ये थक गया है.”

स्वामी जी ने मुस्कुरा कर कहा, “यही तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब है, तुम्हारी मंजिल तुम्हारे आस पास ही है वो ज्यादा दूर नहीं है लेकिन तुम मंजिल पे जाने की बजाय दूसरे लोगों के पीछे भागते रहते हो और अपनी मंजिल से दूर होते चले जाते हो.”

Thursday, 2 July 2020

00:46

2 जुलाईकन्नड़ साहित्य के उन्नायक डा. फकीरप्पा हलकट्टी जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा

कन्नड़ साहित्य एवं संस्कृति से अत्यधिक प्रेम करने वाले डा. फकीरप्पा हलकट्टी का जन्म2 जुलाई, 1880 को कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी धारवाड़ के एक निर्धन बुनकर परिवार में हुआ। इनके पिता गुरुबसप्पा अध्यापक एवं साहित्यकार थे। तीन साल में माँ दानम्मा का निधन होने के कारण उनका पालन दादी ने किया। दादी ने कर्नाटक के वीरों, धर्मात्माओं तथा साहित्यकारों की कथाएँ सुनाकर फकीरप्पा के मन में कर्नाटक के गौरवशाली इतिहास व कन्नड़ साहित्य के प्रति उत्सुकता जगा दी।
शिक्षा के प्रति रुचि के कारण उन्होंने सभी परीक्षाएँ अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कीं। 1896 में मैट्रिक पास कर वे मुम्बई आ गये। वहाँ उन्होंने अनेक भाषाओं का अध्ययन किया। मुम्बई में मराठी और गुजराती भाषी लोग बहुसंख्यक हैं। फकीरप्पा उनके साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाने लगे। उनके मन में यह भाव जाग्रत हुआ कि कन्नड़ भाषा में भी ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए। उन्होंने इसके लिए स्वयं ही प्रयास करने का निश्चय किया।
यों तो मुम्बई में फकीरप्पा विज्ञान पढ़ रहे थे;पर अधिकांश समय वे कन्नड़ साहित्य की चर्चा में ही लगाते थे। छुट्टियों में घर आकर वे पिताजी से इस विषय में खूब बात करते थे।1901-02 में उन्होंने बी.एस-सी. की डिग्री ली। इसी समय उनका विवाह भागीरथीबाई से हुआ। 1904 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। अब उनके लिए धन और प्रतिष्ठा से परिपूर्ण सरकारी नौकरी के द्वार खुले थे; पर उनके मन में तो कन्नड़ साहित्य बसा था। अतः वे बेलगाँव आकर वहाँ के प्रसिद्ध वकील श्री चौगुले के साथ काम करने लगे। कुछ समय बाद वे बीजापुर आ गये।
डा. हलकट्टी वकालत को जनसेवा का माध्यम मानते थे, इसलिए मुकदमे की फीस के रूप में ग्राहक ने जो दे दिया, उसी में सन्तोष मानते थे। वह सब भी वे पत्नी के हाथ में रख देते थे। पत्नी ने बिना शिकायत किये उससे ही परिवार चलाया। यदि कोई निर्धन उनके पास मुकदमा लेकर आता, तो वे उससे पैसे ही नहीं लेते थे। इस कारण वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।
कन्नड़ साहित्य के उत्थान में रुचि होने के कारण वकालत के बाद का समय वे इसी में लगाते थे। 1901 से 1920 तक अनेक नगरों तथा ग्रामों में भ्रमण कर उन्होंने ताड़पत्रों पर हाथ से लिखी एक हजार से भी अधिक प्राचीन पाण्डुलिपियाँ एकत्र कीं। न्यायालय से आते ही वे उनके अध्ययन, सम्पादन और वर्गीकरण में जुट जाते थे। 1921 में वे बीजापुर से बेलगाँव चले गये। वहाँ उनकी वकालत तो खूब बढ़ी; पर साहित्य साधना में व्यवधान आ गया। अतः दो साल बाद वे फिर बीजापुर लौट आये। डा. हलकट्टी के ज्ञान,अनुभव व प्रामाणिकता को देखकर शासन ने उन्हें सरकारी वकील बना दिया।
उन्होंने अनेक दुर्लभ गद्य व पद्य कृतियों का सम्पादन किया। इनमें पंचशतक, रक्षाशतक,गिरिजा कल्याण महाप्रबन्ध, बसवराज देवर रगले, नम्बियण्णन रगले आदि प्रमुख हैं। उन्होंने भक्त कवि हरिहर का काव्य तथा12वीं शती की सामाजिक विभूतियों के जीवन चरित् सरल भाषा में लिखकर प्रकाशित किये। साहित्यिक तथा धार्मिक विषयों पर उनके हजारों शोधपूर्ण लेख छपे हैं। उन्होंने अनेक शैक्षिक, सहकारी तथा ग्राम विकास संस्थाएँ भी प्रारम्भ कीं। कन्नड़ साहित्य के इस उन्नायक का 26 जून, 1964को देहान्त हुआ।

Tuesday, 23 June 2020

20:30

24 जून का इतिहास महारानी दुर्गावती का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा




महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई. की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस और शौर्य के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

उनका विवाह गढ़ मंडला के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपतशाह से हुआ। 52 गढ़ तथा 35,000 गांवों वाले गोंड साम्राज्य का क्षेत्रफल 67,500 वर्गमील था। यद्यपि दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया।

पर दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मंदिर, मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य उनके देवर सहित कई लोगों की आंखों में चुभ रहा था। मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया; पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में सेनाएं भेज दीं। आसफ खां गोंडवाना के उत्तर में कड़ा मानकपुर का सूबेदार था।

एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ; पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये। रानी की भी अपार क्षति हुई। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। तब तक रात घिर आयी। वर्षा होने से नाले में पानी भी भर गया।

अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था। अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा। रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया। रानी ने इसे भी निकाला; पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।

रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे; पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को प्रचुर धन की प्राप्ति हुई। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, वहां रानी की समाधि बनी है। देशप्रेमी वहां जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

Sunday, 21 June 2020

13:10

22 जुन स्वाभिमान के सूर्य पंडित सूर्यनारायण व्यास जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



उज्जैन महाकाल की नगरी है। अंग्रेजी साम्राज्य का डंका जब पूरी दुनिया में बजा, तो जी.एम.टी (ग्रीनविच मीन टाइम) को मानक मान लिया गया; पर इससे पूर्व उज्जैन से ही विश्व भर में समय निर्धारित किया जाता था। इसी उज्जैन के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित नारायण व्यास और श्रीमती रेणुदेवी के घर में दो मार्च, 1902 को सूर्यनारायण व्यास का जन्म हुआ। वे ज्योतिष और खगोलशास्त्री के साथ ही लेखक, पत्रकार, स्वाधीनता सेनानी, इतिहासकार, पुरात्ववेत्ता आदि के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। जिन महर्षि सांदीपनी के आश्रम में श्रीकृष्ण और बलराम पढ़े थे, यह परिवार उन्हीं का वंशज है। 

श्री व्यास ने अपने पिताजी के आश्रम तथा फिर वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। आठ वर्ष की अवस्था से ही उन्होंने लेखन प्रारम्भ कर दिया था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान 1934 में उन्होंने उज्जैन के जत्थे का नेतृत्व कर अजमेर में गिरफ्तारी दी और 16 मास जेल में रहे। 

जेल से आकर जहां एक ओर वे अपने लेखन से जनता को जगाते रहे, तो दूसरी ओर सशस्त्र क्रांति में भी सहयोगी बने। क्रांतिकारियों को उनसे आर्थिक सहायता तथा उनके घर में शरण भी मिलती थी। सुभाष चंद्र बोस के आह्नान पर उन्होंने अजमेर स्थित लार्ड मेयो की मूर्ति तोड़ी और उसका एक हाथ अपने घर ले आये। 1942 में उन्होंने एक गुप्त रेडियो स्टेशन भी चलाया। 

प्रख्यात ज्योतिषी होने के कारण देश-विदेश के अधिकांश बड़े नेता तथा धनपति उनसे परामर्श करते रहते थे। स्वाधीनता से पूर्व वे 144 राजघरानों के राज ज्योतिषी थे। चीन से हुए युद्ध के बारे में उनकी बात ठीक निकली। उन्होंने लालबहादुर शास्त्री को भी ताशकंद न जाने को कहा था। 

व्यास जी ने फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रिया, इंग्लैंड, रोम आदि की यात्रा की। हिटलर ने भी उनसे अपने भविष्य के बारे में परामर्श किया था। उन्होंने 1930 में ‘आज’ में प्रकाशित एक लेख में कहा था कि भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र होगा। उन्होंने विवाह भी स्वाधीन होने के बाद 1948 में ही किया। 

उज्जैन महाकवि कालिदास की नगरी है; पर वहां उनकी स्मृति में कोई स्मारक या संस्था नहीं थी। अतः उन्होंने ‘अखिल भारतीय कालिदास परिषद’ तथा ‘कालिदास अकादमी’ जैसी संस्थाएं गठित कीं। इनके माध्यम से प्रतिवर्ष ‘अखिल भारतीय कालिदास महोत्सव’ का आयोजन होता है। उनके प्रयास से सोवियत रूस में और फिर 1958 में भारत में कालिदास पर डाक टिकट जारी हुआ। 1956 में कालिदास पर फीचर फिल्म भी उनके प्रयास से ही बनी। 

उज्जैन भारत के पराक्रमी सम्राट विक्रमादित्य की भी राजधानी थी। व्यास जी ने 1942 में ‘विक्रम द्विसहस्राब्दी महोत्सव अभियान’ के अन्तर्गत ‘विक्रम’ नामक पत्र निकाला तथा विक्रम विश्वविद्यालय, विक्रम कीर्ति मंदिर आदि कई संस्थाओं की स्थापना की। इस अवसर पर हिन्दी, मराठी तथा अंग्रेजी में ‘विक्रम स्मृति ग्रंथ’ प्रकाशित हुआ। ‘प्रकाश पिक्चर्स’ ने पृथ्वीराज कपूर तथा रत्नमाला को लेकर विक्रमादित्य पर एक फीचर फिल्म भी बनाई। 

व्यास जी हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने हजारों लेख, निबन्ध, व्यंग्य, अनुवाद, यात्रा वृतांत आदि लिखे। 1958 में उन्हें राष्ट्रपति की ओर से ‘पद्मभूषण’ अलंकरण प्रदान किया गया; पर अंग्रेजी को लगातार जारी रखने वाले विधेयक के विरोध में उन्होंने 1967 में इसे लौटा दिया। 

सैकड़ों संस्थाओं द्वारा सम्मानित श्री व्यास देश के गौरव थे। उज्जैन की हर गतिविधि में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी। कालिदास तथा विक्रमादित्य के नाम पर बनी संस्थाओं के संचालन के लिए उन्होंने पूर्वजों द्वारा संचित निधि भी खुले हाथ से खर्च की। 22 जून, 1976 को ऐसे विद्वान मनीषी का देहांत हुआ।
13:06

22 जूननगर सेठ अमरचन्द बांठिया का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



स्वाधीनता समर के अमर सेनानी सेठ अमरचन्द मूलतः बीकानेर (राजस्थान) के निवासी थे। वे अपने पिता श्री अबीर चन्द बाँठिया के साथ व्यापार के लिए ग्वालियर आकर बस गये थे। जैन मत के अनुयायी अमरचन्द जी ने अपने व्यापार में परिश्रम, ईमानदारी एवं सज्जनता के कारण इतनी प्रतिष्ठा पायी कि ग्वालियर राजघराने ने उन्हें नगर सेठ की उपाधि देकर राजघराने के सदस्यों की भाँति पैर में सोने के कड़े पहनने का अधिकार दिया। आगे चलकर उन्हें ग्वालियर के राजकोष का प्रभारी नियुक्त किया।

अमरचन्द जी बड़े धर्मप्रेमी व्यक्ति थे। 1855 में उन्होंने चातुर्मास के दौरान ग्वालियर पधारे सन्त बुद्धि विजय जी के प्रवचन सुने। इससे पूर्व वे 1854 में अजमेर में भी उनके प्रवचन सुन चुके थे। उनसे प्रभावित होकर वे विदेशी और विधर्मी राज्य के विरुद्ध हो गये। 1857 में जब अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय सेना और क्रान्तिकारी ग्वालियर में सक्रिय हुए, तो सेठ जी ने राजकोष के समस्त धन के साथ अपनी पैतृक सम्पत्ति भी उन्हें सौंप दी।

उनका मत था कि राजकोष जनता से ही एकत्र किया गया है। इसे जनहित में स्वाधीनता सेनानियों को देना अपराध नहीं है और निजी सम्पत्ति वे चाहे जिसे दें; पर अंग्रेजों ने राजद्रोही घोषित कर उनके विरुद्ध वारण्ट जारी कर दिया। ग्वालियर राजघराना भी उस समय अंग्रेजों के साथ था।

अमरचन्द जी भूमिगत होकर क्रान्तिकारियों का सहयोग करते रहे; पर एक दिन वे शासन के हत्थे चढ़ गये और मुकदमा चलाकर उन्हें जेल में ठूँस दिया गया। सुख-सुविधाओं में पले सेठ जी को वहाँ भीषण यातनाएँ दी गयीं। मुर्गा बनाना, पेड़ से उल्टा लटका कर चाबुकों से मारना, हाथ पैर बाँधकर चारों ओर से खींचना, लोहे के जूतों से मारना, अण्डकोषों पर वजन बाँधकर दौड़ाना, मूत्र पिलाना आदि अमानवीय अत्याचार उन पर किये गये। अंग्रेज चाहते थे कि वे क्षमा माँग लें; पर सेठ जी तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेजों ने उनके आठ वर्षीय निरपराध पुत्र को भी पकड़ लिया।

अब अंग्रेजों ने धमकी दी कि यदि तुमने क्षमा नहीं माँगी, तो तुम्हारे पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। यह बहुत कठिन घड़ी थी; पर सेठ जी विचलित नहीं हुए। इस पर उनके पुत्र को तोप के मुँह पर बाँधकर गोला दाग दिया गया। बच्चे का शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया। इसके बाद सेठ जी के लिए 22 जून, 1858 को फाँसी की तिथि निश्चित कर दी गयी। इतना ही नहीं, नगर और ग्रामीण क्षेत्र की जनता में आतंक फैलाने के लिए अंग्रेजों ने यह भी तय किया गया कि सेठ जी को 'सर्राफा बाजार' में ही फाँसी दी जाएगी।

अन्ततः 22 जून भी आ गया। सेठ जी तो अपने शरीर का मोह छोड़ चुके थे। अन्तिम इच्छा पूछने पर उन्होंने नवकार मन्त्र जपने की इच्छा व्यक्त की। उन्हें इसकी अनुमति दी गयी; पर धर्मप्रेमी सेठ जी को फाँसी देते समय दो बार ईश्वरीय व्यवधान आ गया। एक बार तो रस्सी और दूसरी बार पेड़ की वह डाल ही टूट गयी, जिस पर उन्हें फाँसी दी जा रही थी। तीसरी बार उन्हें एक मजबूत नीम के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दी गयी और शव को तीन दिन वहीं लटके रहने दिया गया। 
सर्राफा बाजार स्थित जिस नीम के पेड़ पर सेठ अमरचन्द बाँठिया को फाँसी दी गयी थी, उसके निकट ही सेठ जी की प्रतिमा स्थापित है। हर साल 22 जून को वहाँ बड़ी संख्या में लोग आकर देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले उस अमर हुतात्मा को श्रद्धा॰जलि अर्पित करते हैं।

Saturday, 20 June 2020

20:08

21 जूनआवारा मसीहा विष्णु प्रभाकर जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



बंगला उपन्यासकार शरद चंद्र के जीवन पर ‘आवारा मसीहा’ जैसी कालजयी रचना लिखने वाले हिन्दी कथाकार श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को मीरापुर (मुजफ्फरनगर, उ.प्र.) में हुआ था। 

उनका प्रारम्भिक जीवन हरियाणा के हिसार नगर में व्यतीत हुआ। वहां से ही उन्होंने 1929 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वे नौकरी करने लगे। साथ-साथ ही उन्होंने हिन्दीभूषण,  प्राज्ञ, हिन्दी प्रभाकर तथा बी.ए. भी किया। 1944 में वे दिल्ली आ गये। कुछ समय अखिल भारतीय आयुर्वेद महामंडल तथा आकाशवाणी में काम करने के बाद वे पूरी तरह मसिजीवी हो गये।

विष्णु जी स्वतंत्रता आंदोलन में 1940 और 42 में गिरफ्तार हुए और शासनादेश के कारण उन्हें पंजाब छोड़ना पड़ा। उन्हीं दिनों उन्होंने खादी पहनने का संकल्प लिया और उसे जीवन भर निभाया। उन्होंने हिन्दी की प्रायः सभी विधाओं कहानी,  नाटक,  उपन्यास, यात्रावृत, रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध, अनुवाद, बाल साहित्य आदि में उन्होंने प्रचुर लेखन किया। फिर भी वे स्वयं को मुख्यतः कहानीकार ही मानते थे। 

अपने प्रारम्भिक जीवन में वे रंगमंच से भी सम्बद्ध रहे। उन्होंने अनेक पुस्तकों का सम्पादन किया। हिन्दी की इस सेवा के लिए उन्हंे देश-विदेश की हजारों संस्थाओं ने सम्मानित किया। राष्ट्रपति डा. कलाम ने भी उन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया था।

विष्णु जी ने अपना जीवन अपने ढंग से जिया, इसके लिए उन्होंने किसी से समझौता नहीं किया। भारत देश और हिन्दी भाषा के प्रति उनके मन में बहुत प्रेम था। अंत्यन्त स्वाभिमानी विष्णु जी ने कभी सत्ता के सम्मुख घुटने नहीं टेके। स्वामी दयानंद और गांधी जी के विचारों की छाप उनके मन, वचन और कर्म से सर्वत्र दिखाई देती थी। वे स्वतंत्र चिंतन के पक्षधर थे, अतः विरोधी विचारों का भी खुलकर स्वागत करते थे।

उन्होंने देश के हर भाग की यात्रा कर समाज जीवन का व्यापक अनुभव बटोरा था। इसीलिए उनका लेखन रोचक और जीवंत होता था। जब वे दिल्ली में होते थे, तो सुबह गांधी समाधि पर टहलने अवश्य जाते थे। इसी प्रकार वे शाम को मोहन सिंह प्लेस स्थित  काफी हाउस पहुंचते थे, जहां कई पीढ़ी के लेखकों से उनकी भेंट हो जाती थी। वहां साहित्य पर गहरा विमर्श तो होता ही था, हंसी-मजाक भी भरपूर होती थी। देश भर के हजारों लेखकों व पाठकों से वे पत्र-व्यवहार द्वारा सम्पर्क बनाकर रखते थे।

अपनी रचनाओं में वे जाति, भाषा, धर्म के आधार होने वाले भेद तथा नारी समस्याओं को प्रखरता से उठाते थे। समय, समाज व संस्कृति पर की गयी उनकी टिप्पणियां शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। आकाशवाणी के लिए लिखे गये रूपक व नाटकों में उन्होंने कई नये प्रयोग किये, जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा। 

'आवारा मसीहा' उनकी सर्वाधिक चर्चित रचना है। इसके लिए उन्होंने जीवन के 14 वर्ष लगाये। उन्होंने बंगला भाषा सीखकर शरदचंद्र के सैकड़ों समकालीन लोगों से बात की और बिहार, बंगाल तथा बर्मा का व्यापक भ्रमण किया। इससे पूर्व शरदचंद्र की कोई प्रामाणिक जीवनी नहीं थी। अतः हिन्दी के साथ ही बंगलाभाषियों ने भी इसका भरपूर स्वागत किया।

भारतीय साहित्य के इस भीष्म पितामह का 11 अपै्रल, 2009 को 97वर्ष की सुदीर्घ आयु में देहांत हुआ। वे जीवन भर अतिवाद, रूढ़िवाद और कर्मकांडों से मुक्त रहे। उनकी इच्छानुसार मृत्यु के बाद उनका शरीर छात्रों के उपयोग के लिए अ.भा.आयुर्विज्ञान संस्थान को दान कर दिया गया।
20:06

21 जुन संघ संस्थापक डा. हेडगेवार जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा


विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नतहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता डा. केशवराव हेडगेवार का जन्म एक अपै्रल, 1889 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वि. सम्वत् 1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं।

केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते  हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई। 

वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया।

उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। 

सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे।

उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है।

प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे।

डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।