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Wednesday, 11 December 2019

10:38

11 दिसंबर तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवसर जी के जन्म दिवस पर विशेष



के सी शर्मा*
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति के निर्माण एवं विकास में जिनकी प्रमुख भूमिका रही है, उन श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस का जन्म 11 दिसम्बर, 1915 को नागपुर में हुआ था। वे बालासाहब के नाम से अधिक परिचित हैं। वे ही आगे चलकर संघ के तृतीय सरसंघचालक बने।

बालासाहब ने 1927 में शाखा जाना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका सम्पर्क डा0 हेडगेवार से बढ़ता गया। उन्हें मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया। इसमें विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। बालासाहब खेल में बहुत निपुण थे। कबड्डी में उन्हें विशेष मजा आता था; पर वे सदा प्रथम श्रेणी पाकर उत्तीर्ण भी होते थे।

बालासाहब देवरस बचपन से ही खुले विचारों के थे। वे कुरीतियों तथा कालबाह्य हो चुकी परम्पराओं के घोर विरोधी थे। उनके घर पर उनके सभी जातियों के मित्र आते थे। वे सब एक साथ खाते-पीते थे। प्रारम्भ में उनकी माताजी ने इस पर आपत्ति की; पर बालासाहब के आग्रह पर वे मान गयीं।

कानून की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने नागपुर के ‘अनाथ विद्यार्थी वसतिगृह’ में दो वर्ष अध्यापन किया। इन दिनों वे नागपुर के नगर कार्यवाह रहे। 1939 में वे प्रचारक बने, तो उन्हें कोलकाता भेजा गया; पर 1940 में डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया। 1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह के संचालन तथा फिर समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क कर उनके माध्यम से प्रतिबन्ध निरस्त कराने में बालासाहब की प्रमुख भूमिका रही।

1940 के बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। इस दौरान उन्होंने नागपुर के काम को आदर्श रूप में खड़ा किया। देश भर के संघ शिक्षा वर्गों में नागपुर से शिक्षक जाते थे। नागपुर से निकले प्रचारकों ने देश के हर प्रान्त में जाकर संघ कार्य खड़ा किया।

1965 में वे सरकार्यवाह बने। शाखा पर होने वाले गणगीत, प्रश्नोत्तर आदि उन्होंने ही शुरू कराये। संघ के कार्यक्रमों में डा0 हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के चित्र लगते हैं। बालासाहब के सरसंघचालक बनने पर कुछ लोग उनका चित्र भी लगाने लगे; पर उन्होंने इसे रोक दिया। यह उनकी प्रसिद्धि से दूर रहने की वृत्ति का ज्वलन्त उदाहरण है।

1973 में श्री गुरुजी के देहान्त के बाद वे सरसंघचालक बने। 1975 में संघ पर लगे प्रतिबन्ध का सामना उन्होंने धैर्य से किया। वे आपातकाल के पूरे समय पुणे की जेल में रहे; पर सत्याग्रह और फिर चुनाव के माध्यम से देश को इन्दिरा गांधी की तानाशाही से मुक्त कराने की इस चुनौती में संघ सफल हुआ। मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक उन्होंने यह दायित्व निभाया।

इस दौरान उन्होंने संघ कार्य में अनेक नये आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्धन बस्तियों में चलने वाले सेवा के कार्य हैं। इससे वहाँ चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गयी थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। मीनाक्षीपुरम् कांड के बाद एकात्मता यात्रा तथा फिर श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान हिन्दू शक्ति का जो भव्य रूप प्रकट हुआ, उसमें इन सब संगठनों के काम और प्रभाव की व्यापक भूमिका है।

जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तो उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व मा0 रज्जू भैया को सौंप दिया। 17 जून, 1996 को उन्होंने अन्तिम श्वास ली। उनकी इच्छानुसार उनका दाहसंस्कार रेशीमबाग की बजाय नागपुर में सामान्य नागरिकों के शमशान घाट में किया गया।
10:33

11 दिसंबर हमारे रियल हीरो राष्ट्रवादी स्वर के धनी सुब्रह्मण्य भारती जी के जन्म दिवस पर विशेष



के सी शर्मा*
भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम से देश का हर क्षेत्र और हर वर्ग अनुप्राणित था। ऐसे में कवि भला कैसे पीछे रह सकते थे। तमिलनाडु में इसका नेतृत्व कर रहे थे सुब्रह्मण्य भारती। यद्यपि उन्हें अनेक संकटों का सामना करना पड़ा; पर उनका स्वर मन्द नहीं हुआ।

सुब्रह्मण्य भारती का जन्म एट्टयपुरम् (तमिलनाडु) में 11 दिसम्बर, 1882 को हुआ था। पाँच वर्ष की अवस्था में ही वे मातृविहीन हो गये। इस दुख को भारती ने अपने काव्य में ढाल लिया। इससे उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। स्थानीय सामन्त के दरबार में उनका सम्मान हुआ और उन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी गयी। 11 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह कर दिया गया। अगले साल पिताजी भी चल बसे। अब भारती पढ़ने के उद्देश्य से अपनी बुआ के पास काशी आ गये।

चार साल के काशीवास में भारती ने संस्कृत,हिन्दी और अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया। अंग्रेजी कवि शेली से वे विषेष प्रभावित थे। उन्होेंने एट्टयपुरम् में ‘शेलियन गिल्ड’ नामक संस्था भी बनाई। तथा ‘शेलीदासन्’ उपनाम से अनेक रचनाएँ लिखीं। काशी में ही उन्हें राष्ट्रीय चेतना की शिक्षा मिली, जो आगे चलकर उनके काव्य का मुख्य स्वर बन गयी। काशी में उनका सम्पर्क भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित‘हरिश्चन्द्र मण्डल’ से रहा।

काशी में उन्होंने कुछ समय एक विद्यालय में अध्यापन किया। वहाँ उनका सम्पर्क श्रीमती डा. एनी बेसेण्ट से हुआ; पर वे उनके विचारों से पूर्णतः सहमत नहीं थे। एक बार उन्होेंने अपने आवास शैव मठ में महापण्डित सीताराम शास्त्री की अध्यक्षता में सरस्वती पूजा का आयोजन किया। भारती ने अपने भाषण में नारी शिक्षा, समाज सुधार,विदेशी का बहिष्कार और स्वभाषा की उन्नति पर जोर दिया। अध्यक्ष महोदय ने इसका प्रतिवाद किया। फलतः बहस होने लगी और अन्ततः सभा विसर्जित करनी पड़ी।

भारती का प्रिय गान बंकिम चन्द्र का वन्दे मातरम् था। 1905 में काशी में हुए कांग्रेस अधिवेशन में सुप्रसिद्ध गायिका सरला देवी ने यह गीत गाया। भारती भी उस अधिवेशन में थे। बस तभी से यह गान उनका जीवन प्राण बन गया। मद्रास लौटकर भारती ने उस गीत का उसी लय में तमिल में पद्यानुवाद किया, जो आगे चलकर तमिलनाडु के घर-घर में गूँज उठा।

सुब्रह्मण्य भारती ने जहाँ गद्य और पद्य की लगभग 400 रचनाओं का सृजन किया, वहाँ उन्होंने स्वदेश मित्रम, चक्रवर्तिनी, इण्डिया,सूर्योदयम, कर्मयोगी आदि तमिल पत्रों तथा बाल भारत नामक अंग्रेजी साप्ताहिक के सम्पादन में भी सहयोग किया। अंग्रेज शासन के विरुद्ध स्वराज्य सभा के आयोजन के लिए भारती को जेल जाना पड़ा। कोलकाता जाकर उन्होंने बम बनाना, पिस्तौल चलाना और गुरिल्ला युद्ध का भी प्रशिक्षण लिया। वे गरम दल के नेता लोकमान्य तिलक के सम्पर्क में भी रहे।

भारती ने नानासाहब पेशवा को मद्रास में छिपाकर रखा। शासन की नजर से बचने के लिए वे पाण्डिचेरी आ गये और वहाँ से स्वराज्य साधना करते रहे। निर्धन छात्रों को वे अपनी आय से सहयोग करते थे। 1917 में वे गान्धी जी के सम्पर्क में आये और 1920 के असहयोग आन्दोलन में भी सहभागी हुए। स्वराज्य, स्वभाषा तथा स्वदेशी के प्रबल समर्थक इस राष्ट्रप्रेमी कवि का 12 सितम्बर, 1921 को मद्रास में देहान्त हुआ।
10:27

11 दिसंबर हमारे रियल हीरो धर्म और देशभक्ति के गायक कवि प्रदीप जी की पुण्यतिथि पर विशेष



के सी शर्मा*
फिल्म जगत में अनेक गीतकार हुए हैं। कुछ ने दुःख और दर्द को अपने गीतों में उतारा, तो कुछ ने मस्ती और शृंगार को। कुछ ने बच्चों के लिए गीत लिखे, तो कुछ ने बड़ों के लिए; पर कवि प्रदीप के लिखे और गाये अधिकांश गीत देश, धर्म और ईश्वर के प्रति भक्ति की भावना जगाने वाले थे।

प्रदीप के गीत आज भी जब रेडियो या दूरदर्शन पर बजते हैं, तो बच्चे से लेकर बूढ़े तक सब भाव विभोर हो जाते हैं। कवि प्रदीप का असली नाम रामचन्द्र द्विवेदी था। उनका जन्म छह फरवरी, 1915 को बड़नगर (उज्जैन, मध्य प्रदेश) में हुआ था। उनकी रुचि बचपन से ही गीत लेखन और गायन की ओर थी। वे ‘प्रदीप’ उपनाम से कविता लिखते थे।

बड़नगर, रतलाम, इन्दौर, प्रयाग, लखनऊ आदि स्थानों पर उन्होंने शिक्षा पायी। इसके बाद घर वालों की इच्छानुसार वे कहीं अध्यापक बनना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए प्रयास भी किया; पर इसी बीच 1939 में वे एक कवि सम्मेलन में भाग लेने मुम्बई गये। इससे उनका जीवन बदल गया।

उस कवि सम्मेलन में ‘बाम्बे टाकीज स्टूडियो’ के मालिक हिमांशु राय भी आये थे। प्रदीप के गीतों से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे अपनी आगामी फिल्म ‘कंगन’ के गीत लिखने को कहा। प्रदीप ने उनकी बात मान ली। उन गीतों की लोकप्रियता से प्रदीप की ख्याति सब ओर फैल गयी। इस फिल्म के चार गीतों में से तीन गीत प्रदीप ने स्वयं गाये थे। इससे वे फिल्म जगत के एक स्थापित गीतकार और गायक हो गये।

उन दिनों भारत में स्वतन्त्रता का आन्दोलन तेजी पर था। कवि प्रदीप ने भी अपने गीतों से उसमें आहुति डाली। सरल एवं लयबद्ध होने के कारण उनके गीत बहुत शीघ्र ही आन्दोलनकारियों के मुँह पर चढ़ गये। ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है’ तथा ‘चल-चल रे नौजवान’ ने अपार लोकप्रियता प्राप्त की। इन गीतों के कारण पुलिस ने उनका गिरफ्तारी का वारंट निकाल दिया। अतः उन्हें कुछ समय के लिए भूमिगत होकर रहना पड़ा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी उनके गीतों में देशप्रेम की आग कम नहीं हुई। फिल्म जागृति का गीत ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की; वन्दे मातरम्, वन्दे मातरम्’ हर बच्चे को याद हो गया था। ‘जय सन्तोषी माँ’ के गीत भी प्रदीप ने ही लिखे, जो आज भी श्रद्धा से गाये जाते हैं। कुल मिलाकर उन्होंने सौ से भी अधिक फिल्मों में 1,700 से भी अधिक गीत लिखे।

उन्हें सर्वाधिक प्रसिद्धि ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, जरा आँख में भर लो पानी; जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी’ से मिली। 1962 में चीन से मिली पराजय से पूरा देश दुखी था। ऐसे में प्रदीप ने सीमाओं की रक्षा के लिए अपना लहू बहाने वाले सैनिकों की याद में यह गीत लिखा। इसे दिल्ली में लालकिले पर प्रधानमन्त्री नेहरु जी की उपस्थिति में लता मंगेशकर ने गाया। गीत सुनकर नेहरु जी की आँखें भर आयीं। तब से यह गीत स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर बजाया ही जाता है।

अपने गीतों के लिए उन्हें अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले। इनमें फिल्म जगत का सर्वोच्च ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ भी है। अपनी कलम और स्वर से सम्पूर्ण देश में एकता एवं अखंडता की भावनाओं का संचार करने वाले शब्दों के इस चितेरे का 11 दिसम्बर, 1998 को देहान्त हो गया।

Tuesday, 10 December 2019

15:57

10 दिसंबर हमारे रियल हीरो प्रफुल्ल चाकी के जन्म दिवस पर विशेष



के सी शर्मा*

10 दिसम्बर 1888 को उत्तरी बंगाल के एक गाँव में हुआ था | जब प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) मात्र दो वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया | माँ ने बड़ी कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन पोषण किया | विधार्थी जीवन में प्रफुल्ल का स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संघठन से परिचय हुआ | उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साहित्य का और क्रान्तिकारियो के विचारों का अध्ययन किया | इससे उनके अंदर देश को स्वतंत्र करने की भावना पुष्ट हो गयी |

इसी बीच बंगाल का विभाजन हुआ जिसके विरोध में लोग उठ खड़े हुए | विद्यार्थियों ने भी इस आन्दोलन में आगे बढकर भाग लिया | कक्षा 9 के छात्र प्रफुल्ल आन्दोलन में भाग लेने के कारण स्कूल से निकाल दिए गये | इसके बाद ही ऊनका सम्पर्क क्रान्तिकारियो की युगांतर पार्टी से हो गया | उन दिनों कोलकाता का चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्स्फोर्ड राजनितिक कार्यकर्ताओ को अपमानित और दंडित करने के लिए बहुत बदनाम था |

क्रांतिकारियों ने उसे समाप्त करने का काम प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) और खुदीराम बोस को सौंपा | सरकार ने किंग्स्फोर्ड के प्रति लोगो के आक्रोश को भांपकर उसकी सुरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया पर दोनों क्रांतिकारी भी उसके पीछे पीछे यही पहुच गये | किंग्स्फोर्ड की गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने 30 अप्रैल 1908 को यूरोपियन क्लब से बाहर निकलते ही किंग्स्फोर्ड की बग्घी पर बम फेंक दिया किन्तु दुर्भाग्य से उस समान आकार-प्रकार की बग्घी में दो युरोपियीन महिलाये बैठी थी और वे मारी गयी |

क्रांतिकारी किंग्स्फोर्ड को मारने में सफलता समझकर वे घटना स्थल से भाग निकले | प्रफुल्ल ने समस्तीपुर पहुचकर कपड़े बदले और टिकिट खरीदकर ट्रेन में बैठ गये | दुर्भाग्यवश उसी डिब्बे में पुलिस सब इंस्पेक्टर नन्दलाल बेनर्जी बैठा था | बम काण्ड की सुचना चारो ओर फ़ैल चुकी थी | इंस्पेक्टर को प्रफूल्ल पर कुछ संदेह हुआ | उसने चुपचाप अगले स्टेशन पर सुचना भेजकर चाकी को गिरफ्तार करने का प्रबंध कर लिया पर स्टेशन आते ही ज्यो ही प्रफूल्ल (Prafulla Chaki) को गिरफ्तार करना चाहा वे बच निकलने के लिए दौड़ पड़े |

पर जब देखा कि वे चारो ओर से घिर गये है तो उन्होंने अपनी रिवाल्वर से अपने उपर स्वयं को फायर करके प्राणाहुति दे दी | यह 1 मई 1908 की घटना है | कालीचरण घोष ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “रोल ऑफ़ ऑनर” में प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) का विचरण अन्य प्रकार से दिया है | उनके अनुसार प्रफुल्ल ने खुदीराम बोस के साथ किंग्स्फोर्ड से बदला लेते समय अपना दिनेश चन्द्र राय रखा था | घटना के बाद जब उन्होंने अपने हाथो से प्राण लिए तो उनकी पहचान न हो सकी इसलिए अधिकारियों ने उनका सर धड़ से काटकर स्पिरिट में रखा और उसे लेकर पहचान के लिए कोलकाता ले गये | वहा पता चला कि यह दिनेश चन्द्र रॉय और कोई नही , रंगपुर का प्रसिद्ध क्रांतिकारी प्रफुल्ल कुमार चाकी था |

Monday, 9 December 2019

11:03

9 दिसंबर विजई विश्व तिरंगा प्यारा झंडा गीत के लेखक श्याम लाल गुप्ता जी के जन्म दिवस पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
भारत की स्वाधीनता के युद्ध में ‘झण्डा गीत’ का बड़ा महत्व है। यह वह गीत है, जिसे गाते हुए लाखों लोगों ने ब्रिटिश शासन की लाठी गोली खाई; पर तिरंगे झण्डे को नहीं झुकने दिया। आज भी यह गीत सुनने वालों को प्रेरणा देता है। इस गीत की रचना का बड़ा रोचक इतिहास है।

इसके लेखक श्री श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जन्म कानपुर (उ.प्र.) के पास नरवल गाँव में नौ दिसम्बर, 1893 को हुआ था। मिडिल पास करने के बाद उनके पिताजी ने उन्हें घरेलू कारोबार में लगाना चाहा; पर पार्षद जी की रुचि अध्ययन और अध्यापन में थी। अतः वे जिला परिषद के विद्यालय में अध्यापक हो गये। वहाँ उनसे यह शपथपत्र भरने को कहा गया कि वे दो साल तक यह नौकरी नहीं छोड़ेंगे। पार्षद जी ने इसे अपनी स्वाधीनता पर कुठाराघात समझा और नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

इसके बाद वे मासिक पत्र ‘सचिव’ का प्रकाशन करने लगे। इसके मुखपृष्ठ पर लिखा होता था -

रामराज्य की शक्ति शान्ति, सुखमय स्वतन्त्रता लाने को
लिया सचिव ने जन्म, देश की परतन्त्रता मिटाने को।।

पार्षद जी की रुचि कविता में भी थी। एक समारोह में पार्षद जी ने अध्यक्ष महावीर प्रसाद द्विवेदी के स्वागत में एक कविता पढ़ी। इससे गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ बहुत प्रभावित हुए। 1923 में फतेहपुर (उ.प्र.) में जिला कांग्रेस अधिवेशन में विद्यार्थी जी का बड़ा ओजस्वी भाषण हुआ। सरकार ने इस पर उन्हें जेल में ठूँस दिया। जेल से आने पर उनके स्वागत में पार्षद जी ने एक कविता पढ़ी। इस प्रकार दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गयी।

उन दिनों कांग्रेस ने अपना झण्डा तो तय कर लिया था; पर उसके लिए कोई गीत नहीं था। विद्यार्थी जी पार्षद जी से आग्रह किया कि वे कोई झण्डा गीत लिख दें। पार्षद जी ने स्वीकृति दे दी; पर काफी समय तक लिख नहीं पाये। एक बार विद्यार्थी जी ने कहा कि लगता है तुम्हें बहुत घमंड हो गया है। चाहे जैसे हो, पर मुझे हर हाल में कल सुबह तक झण्डा गीत चाहिए। इस पर पार्षद जी ने रात में यह गीत लिखा।

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसाने वाला, वीरों को हर्षाने वाला
शान्ति सुधा बरसाने वाला, मातृभूमि का तन मन सारा।
झण्डा ऊँचा रहे हमारा।।

इस गीत में विजयी विश्व पर कुछ लोगों को आपत्ति थी; पर पार्षद जी ने कहा कि इसका अर्थ विश्व को जीतना नहीं, अपितु विश्व में विजय प्राप्त करना है। धीरे-धीरे यह गीत लोकप्रिय होता गया। 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब गांधी जी और नेहरु जैसे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने इसे गाया, तो अपनी कलम को सार्थक होते देख पार्षद जी भाव विभोर हो उठे।

पर आजादी के बाद कांग्रेस का जो हाल हुआ, उससे पार्षद जी का मन खिन्न हो गया। एक बार उनसे एक मित्र ने पूछा कि आजकल क्या नया लिख रहे हो ? अपने मन की पीड़ा को दबा कर वे बोले - नया तो नहीं लिखा; पर पुराने झण्डा गीत में यह संशोधन कर दिया है।

इसकी शान भले ही जाए; पर कुर्सी न जाने पाये।।

आगे चलकर उन्होंने ग्राम नरवल में गणेश सेवा आश्रम खोला। वहाँ प्रतिदिन वे पैदल जाते थे। एक बार उनके पाँव में काँच चुभ गया। पैसे के अभाव में इलाज ठीक से नहीं हो पाया और गैंगरीन हो जाने से 10 अगस्त, 1977 को उनका देहान्त हो गया।
07:41

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास के लेखक चंद्रशेखर परमानंद जी पर विशेष


-के सी शर्मा*

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।  प्रायः हर राज्य में अपनी-अपनी भाषाओं में संघ के प्रकाशन संस्थान भी हैं, जहां न केवल संघ अपितु हिन्दू विचार को बढ़ाने वाला साहित्य प्रकाशित होता है। प्रायः सभी बड़े कार्यालयों पर संघ वस्तु भंडार भी हैं, जहां ऐसा साहित्य बिक्री हेतु उपलब्ध हो जाता है। प्रकाशन एवं विक्रय की समुचित व्यवस्था के कारण देश भर में कहीं न कहीं, किसी न किसी भाषा में प्रायः हर दिन संघ की कोई न कोई पुस्तक प्रकाशित हो रही है। प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं में बड़े या छोटे समाचार पत्र और जागरण पत्रक भी प्रकाशित हो रहे हैं।

पर जब संघ का काम प्रारम्भ हुआ, तब ऐसा कुछ नहीं था। प्रसिद्धि से दूर रहने की नीति के कारण इस ओर किसी का ध्यान भी नहीं था; पर क्रमशः लेखन और सम्पादन में रुचि रखने वाले कुछ लोगों ने यह काम प्रारम्भ किया। श्री चंद्रशेखर परमानंद (बापूराव) भिषीकर ऐसे लोगों की मालिका के एक सुवर्ण मोती थे।

संघ के संस्थापक पूज्य डा. केशव बलीराम हेडगेवार की पहली जीवनी उन्होंने ही लिखी। इसमें उनकी जीवन-यात्रा के साथ ही संघ स्थापना की पृष्ठभूमि तथा उनके सामने हुआ संघ का क्रमिक विकास बहुत सुंदर ढंग से लिखा गया है। लम्बे समय तक इसे ही संघ की एकमात्र अधिकृत पुस्तक माना जाता था। आगे चलकर उन्होंने श्री गुरुजी, भैया जी दाणी, दादाराव परमार्थ, बाबासाहब आप्टे आदि संघ के अनेक पुरोधाओं के जीवन चरित्र लिखे। इस कारण बापूराव को संघ इतिहास का व्यास कहना नितांत उचित ही है।

बापूराव का जन्म नौ अगस्त, 1914 को हुआ था। वे संघ के प्रारम्भिक स्वयंसेवकों में से एक थे। अतः उन्हें डा. हेडगेवार, श्री गुरुजी तथा उनके साथियों को निकट से देखने एवं उनके अन्तर्मन को समझने का भरपूर अवसर मिला था। संघ की कार्यपद्धति का विकास तथा शाखाओं का नागपुर से महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में कैसे और कब विस्तार हुआ, इसके भी वे अधिकृत जानकार थे।

छात्र जीवन से ही उनकी रुचि पढ़ने और लिखने में थी। इसलिए आगे चलकर जब उन्होंने पत्रकारिता और लेखन को अपनी आजीविका बनाया, तो जीवनियों के माध्यम से संघ इतिहास के अनेक पहलू स्वयंसेवकों और संघ के बारे में जानने के इच्छुक शोधार्थियों को उपलब्ध कराये। कुल मिलाकर उन्होंने संघ के दस वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के जीवन चरित्र लिखे।

एक निष्ठावान स्वयंसेवक होने के साथ ही वे मौलिक चिंतक भी थे। संघ के संस्कार उनके जीवन में हर कदम पर दिखाई देते थे। पुणे के ‘तरुण भारत’ में सम्पादक रहते हुए वे ‘अखिल भारतीय समाचार पत्र सम्पादक सम्मेलन’ (ए.आई.एन.ई.सी.) के सदस्य बने। सामान्यतः पत्रकारों और सम्पादकों के कार्यक्रमों में खाने और पीने की अच्छी व्यवस्था रहती है। आजकल तो इसमें नकद भेंट से लेकर कई अन्य तरह के भ्रष्ट आचार-व्यवहार भी जुड़ गये हैं; पर बापूराव ऐसे कार्यक्रमों में जाने के बाद भी पीने-पिलाने से सदा दूर ही रहे।

सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश लेने के बाद भी बापूराव ने सक्रिय लेखन से अवकाश नहीं लिया। उनकी जानकारी, अनुभव तथा स्पष्ट विचारों के कारण विभिन्न पत्र-पत्रिकाएं उनसे लेख मांगकर प्रकाशित करती रहती थीं। वृद्धावस्था संबंधी अनेक कष्टों के बावजूद पुणे में अपने पुत्र के पास रहते हुए उन्होंने अपने मन को सदा सकारात्मक विचारों से ऊर्जस्वित रखा। बापूराव के बड़े भाई नाना भिषीकर बाबासाहब आप्टे के घनिष्ठ सहयोगी थे। डा. हेडगेवार की योजनानुसार 1931 में वे संघ कार्य के लिए सिन्ध प्रान्त के कराची नगर में गये थे।

संघ इतिहास के ऐसे शीर्षस्थ अध्येता का आठ दिसम्बर, 2008 को महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के हराली कस्बे में निधन हुआ।

Thursday, 5 December 2019

14:17

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी खुदीराम बोस के जन्मदिवस पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
युवा क्रान्तिकारी खुदीराम बोस (१९०५ में)
खुदीराम बोस (बांग्ला: ক্ষুদিরাম বসু ; जन्म: ३-१२-१८८९ - मृत्यु : ११ अगस्त १९०८) भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र १९ साल की उम्र में भारतवर्ष की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये, कुछ इतिहासकारों की यह धारणा है कि वे अपने देश के लिये फाँसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के ज्वलन्त तथा युवा क्रान्तिकारी देशभक्त थे, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि खुदीराम से पूर्व १७ जनवरी १८७२ को ६८ कूकाओं के सार्वजनिक नरसंहार के समय १३ वर्ष का एक बालक भी शहीद हुआ था; उपलब्ध तथ्यानुसार उस बालक को, जिसका नम्बर ५०वाँ था, जैसे ही तोप के सामने लाया गया, उसने लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी कसकर पकड़ ली और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ तलवार से काट नहीं दिये गये बाद में उसे उसी तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया था।
(देखें सरफरोशी की तमन्ना भाग ४ पृष्ठ १३)

*फाँसी का आलिंगन*

दूसरे दिन सन्देह होने पर प्रफुल्लकुमार चाकी को पुलिस पकड़ने गयी, तब उन्होंने स्वयं पर गोली चलाकर अपने प्राणार्पण कर दिये; खुदीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, इस गिरफ्तारी का अन्त निश्चित ही था; ११ अगस्त १९०८ को भगवद्गीता हाथ में लेकर खुदीराम धैर्य के साथ खुशी - खुशी फाँसी चढ गये, किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड़ दी और जिन क्रांतिकारियों को उसने कष्ट दिया था उनके भय से उसकी शीघ्र ही मौत भी हो गयी।

फाँसी के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गये कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे, इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिये वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया, विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया; कई दिन तक स्कूल कालेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।
13:48

5 दिसंबर संत ज्ञानेश्वर महाराज की पुण्यतिथि पर विशेष रिपोर्ट के सी शर्मा की कलम से



के सी शर्मा*
इस पंडित की आज्ञा का पालन करो। ज्यों ही उन्होंने ऐसा कहा, भैंसे ने गम्भीर मानवी वाणी में कहना शुरु किया......
संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन निवृत्ति, सोपान एवं मुक्ताबाई को पैठण के ब्राह्मणों ने जाति से बहिष्कृत कर दिया । यह देख एक सज्जन को दया आयी और वह उन्हें अपने साथ पैठण ले गया । उन्हें गाँव में आया देख,लोग रुष्ट हो गये ।

एक पंडित ने ज्ञानेश्वरजी की हँसी उड़ाते हुए कहा :‘‘इसका नाम तो ज्ञानेश्वर है, मगर ज्ञान दो कौड़ी का भी नहीं है। इससे ज्ञानेश्वरजी के स्वाभिमान को ठेस पहुँची ।

उन्होंने कहा : ‘‘मेरा ज्ञान क्या पूछते हो ? मुझे सारे विश्व का ज्ञान है, विश्व के समस्त रूपों में मैं ही समाया हुआ हूँ ।

‘‘बस ! बस !! बस !!! पंडित ने कहा: ‘‘बड़ा आया है शेखी बघारनेवाला । देखता हूँ, किन-किन रूपों में तू समाया है। वह सामने जो भैंसा दिखायी दे रहा है, शायद वह भी तेरा ही रूप है।
ज्ञानेश्वरजी ने उत्तर दिया : ‘‘हाँ, हाँ ! मेरा ही रूप है । वह पंडित उस भैंसे के पास गया और उसने उसकी पीठ पर सटाक्-से तीन चाबुक लगाये और ज्ञानेश्वरजी की ओर व्यंग्य से देखा । ज्ञानेश्वरजी ने तुरंत अपनी पीठ उसकी ओर कर दी । सब लोग यह देखकर चकित रह गये कि पंडित के चाबुक के निशान उनकी पीठ पर उभर आये थे । किंतु पंडित पर इसका कोई असर न हुआ ।

वह बोला : ‘‘इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । यह तो जादू से भी हो सकता है । *यदि तु इस भैंसे के मुँह से वेदमंत्र सुनवाओ, तो जानूँगा कि तुमें भी ज्ञान है । तब ज्ञानेश्वरजी भैंसे के पास गये और उसकी पीठ पर हाथ फेरकर कहा : ‘‘इस पंडित की आज्ञा का पालन करो। ज्यों ही उन्होंने ऐसा कहा, भैंसे ने गम्भीर मानवी वाणी में कहना शुरु किया : अग्निमीले पुरोहितम् यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारं रत्नधातजम्.....।

यह देखते ही उपस्थित जन और भी आश्चर्यचकित होकर रह गये । वह पंडित और अन्य शास्त्री ज्ञानेश्वरजी के चरणों पर गिर पड़े और उन्होंने कहा : ‘‘ज्ञानेश्वर ! मान गये । तु साक्षात् भगवान हो । अवश्य तु जगत का कल्याण करोगे । 
(2) प्रार्थना के कुछ लाभ बताईये ?
उत्तर : हृदय पवित्र बनता है ।

गृहकार्य : संत ज्ञानेश्वरजी के जीवन से जुड़ी पाँच
13:42

5 दिसंबर योगीराज अरविंद की पुण्यतिथि पर विशेष रिपोर्ट के सी शर्मा की कलम से




-के सी शर्मा*
क्रांतिकारी महर्षि अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता (बंगाल की धरती) में हुआ। उनके पिता के.डी. घोष एक डॉक्टर तथा अंग्रेजों के प्रशंसक थे। पिता अंग्रेजों के प्रशंसक लेकिन उनके चारों बेटे अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बन गए।

बंगाल के महान क्रांतिकारियों में से एक महर्षि अरविन्द देश की आध्यात्मिक क्रांति की पहली चिंगारी थे। उन्हीं के आह्वान पर हजारों बंगाली युवकों ने देश की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूम लिया था। सशस्त्र क्रांति के पीछे उनकी ही प्रेरणा थी।

देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया।

1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा कालेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी थी।

वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्घाटन हेतु आमन्त्रित किये जाने लगे थे।

लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा।

बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल ला कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका वन्देमातरम् का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को चालीस युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे ' अलीपुर षडयन्त्र केस ' के नाम से जानते है। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।|

अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये।

३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था ।

"जब मुझे आप लोगों के द्वारा आपकी सभा में कुछ कहने के लिए कहा गया तो में आज एक विषय हिन्दू धर्मं पर कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मैं अपना आशय पूर्ण कर पाउँगा या नहीं। जब में यहाँ बैठा था तो मेरे मन में आया कि मुझे आपसे बात करनी चाहिए। एक शब्द पूरे भारत से कहना चाहिये। यही शब्द मुझसे सबसे पहले जेल में कहा गया और अब यह आपको कहने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूँ।"

"एक साल हो गया है मुझे यहाँ आए हुए। पिछली बार आया था तो यहाँ राष्ट्रीयता के बड़े-बड़े प्रवर्तक मेरे साथ बैठे थे। यह तो वह सब था जो एकान्त से बाहर आया जिसे ईश्वर ने भेजा था ताकि जेल के एकान्त में वह इश्वर के शब्दों को सुन सके। यह तो वह ईश्वर ही था जिसके कारण आप यहाँ हजारों की संख्या में आये। अब वह बहुत दूर है हजारों मील दूर।"

वंदे मातरम्

Saturday, 30 November 2019

13:38

30 नवंबर जगदीश चंद्र बोस जी के जन्म दिवस पर विशेष


के सी शर्मा*
कोई भी व्यक्ति ऐसे ही महान नही बन जाता है उस महानता तक पहुचने के लिए कठोर परिश्रम और एक ही विश्वास पर अडिग रहना पड़ता है | जगदीश चन्द्र बोस भी ऐसे ही व्यक्ति थे उन्होंने कभी भी किसी भी समस्या से हार नही मानी

बोस का प्रारम्भिक जीवन |
 सर जगदीश चन्द्र बोस का जन्म बंगाल के मुंशीगंज इलाके (वर्तमान में बांग्लादेश में स्थित ) में 30 नवम्बर 1858 को हुआ था | उनके पिता भगवान चन्द्र बोस फरीदपुर में डिप्टी मजिस्ट्रेट और ब्रह्म समाज के नेता थे | बोस ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा वेर्नाकुलर स्कूल में हुयी थी क्योंकि उनके पिता का मानना था कि अंग्रेजी सीखने से पहले किसी को भी अपनी मातृभाषा सीखनी चाहिए | बोस ने 1869 में “हरे स्कूल” में प्रवेश लिया और उसके बाद कोलकाता की सेंत ज़ेवियर स्कूल में आगे की पढाई की |बोस को बचपन से ही पेड़ पौधों के बारे में जानने की इच्छा थी | उन्होंने पेड़ पौधों पर अध्यययन करना बचपन से ही शुरू कर दिया था | बचपन में जब उन्हें पेड़ पौधे के बाए में संतुष्ट करने वाले उत्तर नही मिले तो बड़े होकर वे इसकी खोज में लग गये |

1875 में बोस ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के लिए आयोजित प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और सेंट ज़ेवियर स्कूल में दाखिला लिया था | 1879 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की | बोस सिविल परीक्षा पुरी करने के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे लेकिन उनके पिता ने उन्हें नही जाने दिया | उनके पिता चाहते थे कि वो एक विद्वान बनकर दुसरो के लिए नही बल्कि अपने लिए काम करे | फिर भी बोस लन्दन विश्वविद्यालय में मेडिसिन की पढाई के लिए गये लेकिन खराब स्वास्थ्य की वजह से उन्हें वापस लौटना पड़ा |

इसके बाद 1884 में लन्दन विश्वविद्यालय से Bsc की और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से प्राकृतिक विज्ञान में डिग्री ली | कैम्ब्रिज में बोस के अध्यापको में माइकल फोस्टर , जेम्स डेवर और फ्रांसिस डार्विन जैसे महान वैज्ञानिक थे | जब  बोस कैम्ब्रिज में पढ़ रहे थे तब प्रफूल्ल चन्द्र रॉय एडिन्बुर्ग में छात्र थे | उन दोनों की मुलाकात लन्दन में हुयी और दोनों घनिष्ट मित्र बन गये | बोस ने बाद में एक सामाजिक कार्यकर्ता अबला बोस से विवाह किया था |

अंग्रेजो को अपने आत्मसम्मान के खातिर किया था परास्त

कोलकाता में भौतिकी का अध्ययन करने के बाद  बोस इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गये | वहा से स्नातक की उपाधि लेकर वो भारत लौट आये | उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्राध्यापक का पद ग्रहण कर लिया | उन दिनों अंग्रेज और भारतीय शिक्षको के बीच भेदभाव किया जाता था | अंग्रेज अध्यापको की तुलना में भारतीय अध्यापको को केवल दो तिहाई वेतन दिया जाता था |
 बोस अस्थाई पद पर थे इसलिए उन्हें केवल आधा वेतन ही मिलता था | वे इससे बहुत दुखी हुयी और उन्होंने घोषणा कर दी कि समान कार्य के लिए वे समान वेतन ही स्वीकार करेंगे “मै पूरा वेतन ही लूँगा अन्यथा वेतन नही लूँगा” | तीन साल तक बोस ने वेतन नही लिया | वे आर्थिक संकटो में पद गये और उन्हें शहर से दूर सस्ता मकान लेना पडा

कोलकाता काम पर आने के लिए वे अपनी पत्नी के साथ हुगली नदी में नाव खेते हुए आये थे | उनकी पत्नी नाव लेकर अकेली लौट जाती और शाम को वापस नाव लेकर उन्हें लेने आती | लम्बे समय तक पति पत्नी इसी प्रकार अपने आने जाने का खर्चा बचाते रहे | आखिरकार अंग्रेजो को उनके सामने झुकना पड़ा |बोस को अंग्रेज अध्यापको कके बराबर मिलने वाला वेतन देना स्वीकार कर लिया गया |

जब सफल हुआ प्रयोग

यह घटना उस समय कि है जब भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस Jagadish Chandra Bose इंग्लैंड में थे | उन दिनों वह इस बात की खोज में लगे हुए थे कि पौधों में भी जीवन है और वे भी हमारी तरह पीड़ा का अनुभव करते है | वह इसे सिद्ध करने के लिए दिन रात प्रयोग में जुटे हुए थे | आखिर वह दिन भी आ गया , जब उन्हें लोगो के सामने इस बात को सिद्ध करना था | उस दिन उनका प्रयोग देखने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और लोग एकत्रित थे |

बोस ने एक नजर भीड़ पर डाली , जो बेसब्री से उनके प्रयोग की प्रतीक्षा कर रही थी और दुसरी नजर उस पौधे पर जिसके माध्यम से वह प्रयोग करने वाले थे | उन्होंने इंजेक्शन द्वारा उस पौधे को जहर दिया | बसु के प्रयोग के अनुरूप जहरीले इंजेक्शन से पौधे को मुरझाना चाहिए था लेकिन कुछ समय बाद भी जब पौधा नही मुरझाया तो वहा उपस्थित लोग उनका मजाक उड़ाने लगे |

बसु के लिए यह अत्यंत कठिन घड़ी थी | वह अपने प्रयोग के प्रति पुरी तरह आश्वस्त थे | उन्हें लगा कि यदि जहरवाले इंजेक्शन से पौधे को नुकसान नही पहुचाया तो वह उन्हें भी नुक्सान हो सकता है | हो सकता है कि शीशी में जहर की बजाय कुछ ओर हो | यह सोचकर बोस ने जहर की शीशी उठाई और अपने मुह से लगा दिया | उन्हें ऐसा करते देख सभी चिल्लाने लगे और वहा भगदड़ मच गयी लेकिन बोस को वह जहर पीने पर भी कुछ नही हुआ |

यह देखकर एक व्यक्ति वहा आया और उन्हें शांत करता हुआ बोला कि इसी ने जहर वाली शीशी बदलकर उसी रंग के पानी की शीशी रख दी थी ताकि यह प्रयोग सही सिद्ध न हो पाए | इसके बाद बोस ने विषवाली शीशी से पौधे को पुनः इंजेक्शन दिया और देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में पौधा मुरझा गया | इस तरह यह प्रयोग सफल रहा |

प्रयोग और सफलता

Jagadish Chandra Bose जगदीश चन्द्र बोस ने सूक्ष्म तंरगों (Microwave) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य शुरू किया था | उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि पेड़ पौधों के भी जीवन होता है | पौधे भी सजीवो के समान सांस लेते है | सोते जगाते है और उनपर भी सुख-दुःख का असर होता है | उन्होंने ऐसा यंत्र बनाया जिससे पेड़ पौधों के गति अपने आप लिखी जाती थी | इस यंत्र को cresco graph कहा जाता है | लन्दन की रॉयल सोसाइटी ने उनके अविष्कार को एक अद्भुद खोज कहा और उन्हें रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनीत कर लिया |

बोस विज्ञान मन्दिर

बोस का निधन 23 नवम्बर 1937 को 78 वर्ष की उम्र में गिरीध (वर्तमान में झारखंड का हिस्सा ) में हुआ था | बोस ने अपना शोधकार्य किसी अच्छे और महंगे उपकरण और प्रयोगशाळा से नही किया था इसलिए जगदीश चन्द्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाळा बनाने  की सोच रहे थे | कोलकाता स्थित बोस विज्ञान मन्दिर इसी विचार से प्रेरित है जो विज्ञान में शोध कार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केंद्र है | उन्होंने हमेशा से ही इसका सपना देखा था | सर जगदीश चन्द्र बोस को न सिर्फ वैज्ञानिक उप्लब्ध्यियो के लिए जाना जाता है बल्कि दृढ़ निश्चयी प्रवृति के लिए भी जाना जाता है | वे एक वैज्ञानिक ही नही ,अच्छे लेखक और कुशल वक्ता भी थे | उनके व्यक्तित्व में कई ऐसी बाते थी जिन्हें छात्र जीवन में शामिल करना चाहिए |
13:31

30 नवंबर हमारे लिए हीरो पण्डित गेंदालाल दीक्षित के जन्म दिवस पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
प्रायः ऐसा कहा जाता है कि मुसीबत में अपनी छाया भी साथ छोड़ देती है। क्रांतिकारियों के साथ तो यह पूरी तरह सत्य था। जब कभी वे संकट में पड़े, तो उन्हें आश्रय देने के लिए सगे-संबंधी ही तैयार नहीं हुए। क्रांतिवीर पंडित गेंदालाल दीक्षित के प्रसंग से यह भली-भांति समझा जा सकता है।

पंडित गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवम्बर, 1888 को उत्तर प्रदेश में आगरा जिले की बाह तहसील के ग्राम मई में हुआ था। आगरा से हाईस्कूल कर वे डी.ए.वी. पाठशाला, औरैया में अध्यापक हो गये। बंग-भंग के दिनों में उन्होंने ‘शिवाजी समिति’ बनाकर नवयुवकों में देशप्रेम जाग्रत किया; पर इस दौरान उन्हें शिक्षित,  सम्पन्न और तथाकथित उच्च समुदाय से सहयोग नहीं मिला। अतः उन्होंने कुछ डाकुओं से सम्पर्क कर उनके मन में देशप्रेम की भावना जगाई और उनके माध्यम से कुछ धन एकत्र किया।

इसके बाद गेंदालाल जी अध्ययन के बहाने मुंबई चले गये। वहां से लौटकर ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद के साथ उन्होंने ‘मातृदेवी’ नामक संगठन बनाया और युवकों को शस्त्र चलाना सिखाने लगे। इस दल ने आगे चलकर जो काम किया, वह ‘मैनपुरी षड्यंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है। उस दिन 80 क्रांतिकारियों का दल डाका डालने के लिए गया। दुर्भाग्य से उनके साथ एक मुखबिर भी था। उसने शासन को इनके जंगल में ठहरने की जानकारी पहले ही दे रखी थी। अतः 500 पुलिस वालों ने उस क्षेत्र को घेर रखा था।

जब ये लोग वहां रुके, तो सबको बहुत भूख लगी थी। वह मुखबिर कहीं से पूड़ियां ले आया; पर उनमें जहर मिला था। खाते ही कई लोग धराशायी हो गये। मौका पाकर वह मुखबिर भागने लगा। यह देखकर ब्रह्मचारी जी ने उस पर गोली चला दी। गोली की आवाज सुनते ही पुलिस वाले भी आ गये और फिर सीधा संघर्ष शुरू हो गया, जिसमें दल के 35 व्यक्ति मारे गये। शेष लोग पकड़े गये। एक अन्य सरकारी गवाह सोमदेव ने पंडित गेंदालाल दीक्षित को इस योजना का मुखिया बताया। अतः उन्हें मैनपुरी लाया गया। तब तक उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ चुका था। इसके बाद भी वे एक रात मौका पाकर एक अन्य सरकारी गवाह रामनारायण के साथ फरार हो गये।

पंडित जी अपने एक संबंधी के पास कोटा पहुंचे; पर वहां भी उनकी तलाश जारी थी। इसके बाद वे किसी तरह अपने घर पहुंचे; पर वहां घर वालों ने साफ कह दिया कि या तो आप यहां से चले जाएं, अन्यथा हम पुलिस को बुलाते हैं। अतः उन्हें वहां से भी भागना पड़ा। तब तक वे इतने कमजोर हो चुके थे कि दस कदम चलने मात्र से मूर्छित हो जाते थे। किसी तरह वे दिल्ली आकर पेट भरने के लिए एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी करने लगे।

कुछ समय बाद उन्होंने अपने एक संबंधी को पत्र लिखा, जो उनकी पत्नी को लेकर दिल्ली आ गये। तब तक उनकी दशा और बिगड़ चुकी थी। पत्नी यह देखकर रोने लगी। वह बोली कि मेरा अब इस संसार में कौन है ? पंडित जी ने कहा - आज देश की लाखों विधवाओं, अनाथों, किसानों और दासता की बेड़ी में जकड़ी भारत माता का कौन है ? जो इन सबका मालिक है, वह तुम्हारी भी रक्षा करेगा।

उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। वहीं पर मातृभूमि को स्मरण करते हुए उन नरवीर ने 21 सितम्बर 1920 को प्राण त्याग दिये।
13:27

30 नवंबर हमारे रियल हीरो राजीव दीक्षित जी की पुण्यतिथि पर विशेष



के सी शर्मा*

दोस्तों राजीव दीक्षित जी के परिचय मे जितनी बातें कही जाए वो कम है ! कुछ चंद शब्दो मे उनके परिचय को बयान कर पाना असंभव है ! ये बात वो लोग बहुत अच्छे से समझ सकते है जिन्होने राजीव दीक्षित जी को गहराई से सुना और समझा है !! फिर भी हमने कुछ प्रयास कर उनके परिचय को कुछ शब्दो का रूप देने का प्रयत्न किया है ! परिचय शुरू करने से पहले हम आपको ये बात स्पष्ट करना चाहते हैं कि जितना परिचय राजीव भाई का हम आपको बताने का प्रयत्न करेंगे वो उनके जीवन मे किये गये कार्यो का मात्र 1% से भी कम ही होगा ! उनको पूर्ण रूप से जानना है तो आपको उनके व्याख्यानों को सुनना पडेगा !!

पूर्ण परिचय:-

राजीव दीक्षित जी का जन्म 30 नवम्बर 1967 को उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में पिता राधेश्याम दीक्षित एवं माता मिथिलेश कुमारी के यहाँ हुआ था। उन्होने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद जिले के एक स्कूल से प्राप्त की !! इसके उपरान्त उन्होने इलाहाबाद शहर के जे.के इंस्टीटयूट से बी. टेक. और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institute of Technology से एम. टेक. की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद राजीव भाई ने कुछ समय भारत CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) मे कार्य किया। तत्पश्चात उन्होंने किसी Research Project मे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के साथ भी कार्य किया !!

श्री राजीव जी इलाहाबाद के जे.के इंस्टीटयूट से बी.टेक. की शिक्षा लेते समय ही ‘‘आजादी बचाओ आंदोलन’’ से जुड गए जिसके संस्थापक श्री बनवारी लाल शर्मा जी थे जो कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही गणित विभाग के मुख्य शिक्षक थे ! इसी संस्था में राजीव भाई प्रवक्ता के पद पर थे, संस्था में श्री अभय प्रताप, संत समीर, केशर जी, राम धीरज जी, मनोज त्यागी जी तथा योगेश कुमार मिश्रा जी शोधकर्ता अपने अपने विषयों पर शोध कार्य किया करते थे जो कि संस्था द्वारा प्रकाशित ‘‘नई आजादी उद्घोष’’ नमक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ करते थे और राजीव भाई के ओजस्वी वाणी से देश के कोने-कोने में व्याख्यानों की एक विशाल श्रंखला-बद्ध वैचारिक क्रान्ति आने लगी राजीव जी ने अपने प्रवक्ता पद के दायित्वों को एक सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में निभाया जो कि अतुल्य है ……

बचपन से ही राजीव भाई में देश की समस्याओ को जानने की गहरी रुची थी ! प्रति मास 800 रूपये का खर्च उनका मैगजीनों, सभी प्रकार के अखबारो को पढने मे हुआ करता था! वे अभी नौवी कक्षा मे ही थे कि उन्होने अपने इतिहास के अध्यापक से एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब उस अध्यापक के पास भी नहीं था जैसा कि आप जानते है कि हमको इतिहास की किताबों मे पढाया जाता है कि अंग्रेजो का भारत के राजा से प्रथम युद्ध 1757 मे पलासी के मैदान मे रोबर्ट क्लाइव और बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला से हुआ था ! उस युद्ध मे रोबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दोला को हराया था और उसके बाद भारत गुलाम हो गया था !!

राजीव भाई ने अपने इतिहास के अध्यापक से पूछा कि सर मुझे ये बताइए कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले कितने सिपाही थें? तो अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम, तो राजीव भाई ने पूछा क्यों नहीं मालूम? तो कहते थे कि मुझे किसी ने नहीं पढाया तो मै तुमको कहाँ से पढा दू।

तो राजीव भाई ने उनको बराबर एक ही सवाल पूछा कि सर आप जरा ये बताईये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है ?? तो अध्यापक ने कहा नहीं ! तो फिर राजीव भाई ने पूछा फिर हमको ये क्यों नहीं पढाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही थे अंग्रेजो के पास ? और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल राजीव भाई ने पूछा था कि अच्छा ये बताईये कि अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालुम सिराजुद्दोला जो लड रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो अध्यापक ने कहा कि वो भी नहीं मालूम। तो खैर इस सवाल का जवाब बहुत बडा और गंभीर है कि आखिर इतना बडा भारत मुठी भर अंग्रेजो का गुलाम कैसे हो गया ?? यहाँ लिखेंगे तो बात बहुत बडी हो जाएगी ! इसका जवाब आपको राजीव भाई के एक व्याख्यान जिसका नाम आजादी का असली इतिहास मे मिल जाएगा।

तो देश की आजादी से जुडे ऐसे सैंकडों-सैंकडों सवाल दिन रात राजीव भाई के दिमाग मे घूमते रहते थे !! इसी बीच उनकी मुलाकात प्रो. धर्मपाल नाम के एक इतिहासकार से हुई जिनकी किताबें अमेरिका मे पढाई जाती है लेकिन भारत मे नहीं !! धर्मपाल जी को राजीव भाई अपना गुरु भी मानते है, उन्होने राजीव भाई के काफी सवालों का जवाब ढूंढने मे बहुत मदद की! उन्होने राजीव भाई को भारत के बारे मे वो दस्तावेज उपलब्ध करवाए जो इंग्लैंड की लाइब्रेरी हाउस आफ कामन्स मे रखे हुए थे जिनमे अंग्रेजो ने पूरा वर्णन किया था कि कैसे उन्होने भारत गुलाम बनाया ! राजीव भाई ने उन सब दस्तावेजो का बहुत अध्यन किया और ये जानकर उनके रोंगटे खडे हो गए कि भारत के लोगो को भारत के बारे मे कितना गलत इतिहास पढाया जा रहा है !! फिर सच्चाई को लोगो के सामने लाने के लिए राजीव भाई गाँव–गाँव, शहर–शहर जाकर व्याख्यान देने लगे ! और साथ-साथ देश की आजादी और देश के अन्य गंभीर समस्याओ का इतिहास और उसका समाधान तलाशने मे लगे रहते !!

इलाहबाद मे पढते हुए उनके एक खास मित्र हुआ करते थे जिनका नाम है योगेश मिश्रा जी उनके पिता जी इलाहबाद हाईकोर्ट मे वकील थे !! तो राजीव भाई और उनके मित्र अक्सर उनसे देश की आजादी से जुडी रहस्यमयी बातों पर वार्तालाप किया करते थे ! तब राजीव भाई को देश की आजादी के विषय मे बहुत ही गंभीर जानकारी प्राप्त हुई ! कि 15 अगस्त 1947 को देश मे कोई आजादी नहीं आई ! बल्कि 14 अगस्त 1947 की रात को अंग्रेज माउंट बेटन और नेहरू के बीच के समझोता हुआ था जिसे सत्ता का हस्तांतरण ( transfer of power agreement) कहते हैं ! इस समझोते के अनुसार अंग्रेज अपनी कुर्सी नेहरू को देकर जाएंगे लेकिन उनके द्वारा भारत को बर्बाद करने के लिए बनाए गये 34735 कानून वैसे ही इस देश मे चलेंगे !! और क्योकि आजादी की लडाई मे पूरे देश का विरोध अँग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था तो सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत छोड कर जाएगी और उसके साथ जो 126 कंपनिया और भारत को लुटने आए थी वो वैसे की वैसे ही भारत मे व्यापार करेगी ! लूटती रहेगी ! आज उन विदेशी कंपनियो की संख्या बढ कर 6000 को पार कर गई है !! (इस बारे मे और अधिक जानकरी उनके व्याख्यानों मे मिलेगी)

एक बात जो राजीव भाई को हमेशा परेशान करती रहती थी कि आजादी के बाद भी अगर भारत मे अँग्रेजी कानून वैसे के वैसे ही चलेंगे और आजादी के बाद भी विदेशी कंपनियाँ भारत को वैसे ही लूटेंगी जैसे आजादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी लूटा करती थी ! आजादी के बाद भी भारत मे वैसे ही गौ हत्या होगी जैसे अंग्रेजो के समय होती थी, तो हमारे देश की आजादी का अर्थ क्या है ??

तो ये सब जानने के बाद राजीव भाई ने इन विदेशी कंपनियो और भारत में चल रहे अँग्रेजी कानूनों के खिलाफ एक बार फिर से वैसा ही स्वदेशी आंदोलन शुरू करने का संकल्प लिया जैसा किसी समय मे बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजो के खिलाफ लिया था !! अपने राष्ट्र मे पूर्ण स्वतंत्रता लाने और आर्थिक महाशक्ति के रुप में खडा करने के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की और उसे जीवन पर्यन्त निभाया। वो गाँव-गाँव, शहर-शहर घूम कर लोगो को लोगो को भारत मे चल रहे अँग्रेजी कानून, आधी अधूरी आजादी का सच, विदेशी कंपनियो की भारत मे लूट आदि विषयो के बारे मे बताने लगे ! सन् 1999 में राजीव के स्वदेशी व्याख्यानों की कैसेटों ने समूचे देश में धूम मचा दी थी।!

1984 मे जब भारत मे भोपाल गैस कांड हुआ तब राजीव भाई ने इसके पीछे के षडयंत्र का पता लगाया और ये खुलासा किया कि ये कोई घटना नहीं थी बल्कि अमेरिका द्वारा किया गया एक परीक्षण था (जिसकी अधिक जानकारी आपको उनके व्याख्यानों मे मिलेगी) तब राजीव भाई यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया!

इसी प्रकार 1995-96 में टिहरी बाँध के बनने के खिलाफ ऐतिहासिक मोर्चे में भाग लिया और पुलिस लाठी चार्ज में काफी चोटें भी खायीं। !! और इसी प्रकार 1999 मे उन्होने राजस्थान के कुछ गांवसियों साथ मिलकर एक शराब बनाने वाली कंपनी जिसको सरकार ने लाइसेन्स दिया था और वो कंपनी रोज जमीन की नीचे बहुत अधिक मात्रा मे पानी निकाल कर शराब बनाने वाली थी उस कंपनी को भगाया !!

1991 भारत मे चले ग्लोबलाएशन, लिब्रलाइजेसशन को राजीव भाई स्वदेशी उद्योगो का सर्वनाश करने वाला बताया और पूरे आंकडों के साथ घंटो-घंटो इस पर व्याख्यान दिये और स्वदेशी व्यापारियो को इसके खिलाफ जागरूक किया !! फिर 1994 मे भारत सरकार द्वारा किए WTO समझोते का विरोध किया क्योकि ये समझोता भारत को एक बहुत बडी आर्थिक गुलामी की और धकेलने वाला था ! इस समझोते मे सैंकडों ऐसे शर्ते सरकार ने स्वीकार कर ली थी जो आज भारत मे किसानो की आत्महत्या करने का, रुपए का डालर की तुलना मे नीचे जाने का, देश बढ रही भूख और बेरोजगारी का, खत्म होते स्वदेशी उद्योगो का, बैंकिंग, इन्सुरेंस, वकालत सभी सर्विस सेक्टर मे बढ रही विदेशी कंपनियो का कारण है ! राजीव भाई के अनुसार इस समझोते के बाद सरकार देश को नहीं चलाएगी बल्कि इस समझोते के अनुसार देश चलेगा !! देश की सारी आर्थिक नीतियाँ इस समझौते को ध्यान मे रख कर बनाई जाएगी ! और भारत मे आज तक बनी किसी भी सरकार में हिम्मत नहीं जो इस WTO समझौते को रद्द करवा सके !!

उन्होने ने बताया कि कैसे WORLD BANK, IMF, UNO जैसे संस्थाये अमेरिका आदि देशो की पिठ्ठू है और विकासशील देशो की सम्पत्ति लूटने के लिए इनको पैदा किया गया है ! (WTO समझोते के बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के व्याख्यानों मे मिलेगी) इन राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ अपनी लडाई को और मजबूत करने लिए राजीव भाई अपने कुछ साथियो के साथ मिलकर पूरे देश मे विदेशी कम्पनियों, अँग्रेजी कानून, WTO, आदि के खिलाफ अभियान चलाने लगे !! ऐसे ही आर्थर डंकल नाम एक अधिकारी जिसने डंकल ड्राफ्ट बनाया था भारत मे लागू करवाने के लिए वो एक बार भारत आया तो राजीव भाई और बाकी कार्यकर्ता बहुत गुस्से मे थे तब राजीव भाई ने उसे एयरपोर्ट पर ही जूते से मार मार कर भगाया और फिर उनको जेल हुई !!

1999-2000 सन् मे उन्होने दो अमेरिकन कम्पनियाँ पेप्सी और कोकाकोला के खिलाफ प्रदर्शन किया और लोगो को बताया कि ये दोनों कम्पनियाँ पेय पदार्थ के नाम पर आप सबको जहर बेच रही है और हजारो करोड की लूट इस देश मे कर रही हैं ! और आपका स्वास्थ बिगाड रही हैं ! राजीव भाई ने लोगो से कोक ,पेप्सी और इसका विज्ञापन करने वाले क्रिकेट खिलाडियो और, फिल्मी स्टारों का बहिष्कार करने को कहा !! सन 2000 मे 9-11 की घटना घटी तो कुछ अखबार वाले राजीव भाई के पास भी उनके विचार जानने को पहुँचे ! तब राजीव भाई ने कहा की मुझे नहीं लगता कि ये दोनों टावर आतंकवादियो ने गिराये है ! तब उन्होने पूछा आपको क्या लगता है ? राजीव भाई ने कहा मुझे लगता है ये काम अमेरिका ने खुद ही करवाया है ! तो उन्होने कहा आपके पास क्या सबूत है ? राजीव भाई ने कहा समय दो जल्दी सबूत भी ला दूंगा !!

और 2007 मे राजीव भाई ने गुजरात के एक व्याख्यान मे इस 9-11 की घटना का पूरा सच लाइव प्रोजक्टर के माध्यम से लोगो के सामने रखा ! (जिसका विडियो youtube पर 9-11 was totally lie के नाम से उपलब्ध है) और 9 सितंबर 2013 को रूस ने भी एक विडियो जारी कर 9-11 की घटना को झूठा बताया! 2003-2004 मे राजीव भाई ने भारत सरकार द्वारा बनाये गये VAT कानून का विरोध किया और पूरे देश के व्यपरियो के समूह मे जाकर घंटो-घंटो व्याख्यान दिये और उन्होने जागरूक किया कि ये VAT का कानून आपकी आर्थिक लूट से ज्यादा आपके धर्म को कमजोर करने और भारत मे ईसाईयत को बढावा देने के लिए बनाया गया है !! (इस बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के VAT वाले व्याख्यान मे मिलेगी) देश मे हो रही गौ हत्या को रोकने के लिए भी राजीव भाई ने कडा संघर्ष किया ! राजीव भाई का कहना था कि जब तक हम गौ माता का आर्थिक मूल्यांकन कर लोगो को नहीं समझाएँगे ! तब तक भारत मे गौ रक्षा नहीं हो सकती ! क्योंकि कोई भी सरकार आजतक गौ हत्या के खिलाफ संसद मे बिल पास नहीं कर सकी ! उनका कहना था कि सरकारो का तो पता नहीं वो कब संसद मे गौ हत्या के खिलाफ बिल पास करें क्योकि कि आजादी के 64 साल मे तो उनसे बिल पास नहीं हुआ और आगे करेंगे इसका भरोसा नहीं !! इसलिए तब हमे खुद अपने स्तर पर ही गौ हत्या रोकने का प्रयास करना चाहिए !!
उन्होने देश भर मे घूम घूम कर अलग अलग जगह पर व्याख्यान कर लोगो को गौ माता की महत्वता और उसका आर्थिक महत्व बताया ! उन्होने 60 लाख से अधिक किसानो को देसी खेती (organic farming) करने के सूत्र बताये कि कैसे किसान रासायनिक खाद, यूरिया आदि खेतो मे डाले बिना गौ माता के गोबर और गौ मूत्र से खेती कर सकते है ! जिससे उनके उत्पादन का खर्चा लगभग शून्य होगा !! और उनकी आय मे बहुत बढोतरी होगी ! आज किसान 15-15 हजार रुपए लीटर कीटनाश्क खेत मे छिडक रहा है !! टनों टन महंगा यूरिया, रासायनिक खाद खेत मे डाल रहा है जिससे उसके उत्पादन का खर्चा बढता जा रहा है और उत्पादन भी कम होता जा रहा है !! रासायनिक खाद वाले फल सब्जियाँ खाकर लाखो लाखो लोग दिन प्रतिदिन बीमार हो रहे हैं ! राजीव भाई ने गरीब किसानो को गाय ना बेचने की सलाह दी और उसके गोबर और गौ मूत्र से खेती करने के सूत्र बताये !! किसानो ने राजीव भाई के बताये हुए देसी खेती के सूत्रो द्वारा खेती करना शुरू किया और उनकी आर्थिक समृद्धि बहुत बढीं !!

1998 मे राजीव भाई ने कुछ गौ समितियों के साथ मिलकर गौ हत्या रोकने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे मुकदमा दायर कर दिया कि गौ हत्या नहीं होनी चाहिए ! सामने बैठे कुरेशी कसाइयो ने कहा क्यों नहीं होनी चाहिए ? कोर्ट मे साबित ये करना था की गाय की हत्या कर मांस बेचने से ज्यादा लाभ है या बचाने से !! कसाइयो की तरफ से लड़ने वाले भारत के सभी बड़े-बड़े वकील जो 50-50 लाख तक फीस लेते हैं सोली सोराब्जी की बीस लाख की फीस है, कपिल सिब्बल 22 लाख की फीस है, महेश जेठ मालानी (राम जेठ मालानी का लड़का) जो फीस लेते है 32 लाख से 35 लाख सारे सभी बड़े वकील कसाइयों के पक्ष में ! और इधर राजीव भाई जैसे लोगो के पास कोई बडा वकील नहीं था क्योंकि इतना पैसा नहीं था ! तो इन लोगो ने अपना मुकदमा खुद ही लडा !!

(इस मुकद्दमे की पूरी जानकारी आपको राजीव भाई के व्याख्यान जिसका नाम गौ हत्या और राजनीति) मे मिल जाएगी!! हाँ इतना आपको जरूर बता दें 2005 मे मुकदमा राजीव भाई और उनके कार्यकर्ताओ ने जीत लिया !! राजीव भाई अदालत मे गाय के एक किलो गोबर से 33 किलो खाद तैयार करने का फॉर्मूला बताया और अदालत के सामने करके भी दिखया जिससे रोज की 1800 से 2000 रुपए की रोज की कमाई की जा सकती है !! ऐसे ही उन्होने गौ मूत्र से बनने वाली औषधियों का आर्थिक मूल्यांकन करके बताया !!! और तो और उन्होने सुप्रीम कोर्ट के जज की गाडी गोबर गैस से चलाकर दिखा दी !! जज ने तीन महीने गाडी चलाई और ये सब देख अपने दाँतो तले उंगली दबा ली!! अधिक जानकरी आपको राजीव भाई के व्याख्यान मे मिलेगी !! (Gau Hatya Rajniti Supreme Court mein ladai at Aurngabaad.mp3)

राजीव भाई को जब पता चला कि रासायनिक खाद बनाने वाली कंपनियो के बाद देश की सबसे अधिक हजारो करोड रुपए की लूट दवा बनाने वाली सैंकडों विदेशी कंपनियाँ कर रही है ! और इसके इलावा ये बडी बडी कंपनियाँ वो दवाये भारत मे बेच रहे है जो अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों मे बैन है और जिससे देश वासियो को भयंकर बीमारियाँ हो रही है तब राजीव भाई ने इन कंपनियो के खिलाफ भी आंदोलन शुरू कर दिया !! राजीव भाई ने आयुर्वेद का अध्यन किया और 3500 वर्ष पूर्व महाऋषि चरक के शिष्य वागभट्ट जी को महीनो महीनो तक पढा !! और बहुत ज्ञान अर्जित किया ! फिर घूम घूम कर लोगो को आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे मे बताना शुरू किया की कैसे बिना दवा खाये आयुर्वेद के कुछ नियमो का पालन कर हम सब बिना डॉक्टर के स्वस्थ रह सकते है और जीवन जी सकते है इसके अलावा हर व्यक्ति अपने शरीर की 85% चिकित्सा स्वंय कर सकता है !! राजीव भाई खुद इन नियमो का पालन 15 वर्ष से लगातार कर रहे थे जिस कारण वे पूर्ण स्वस्थ थे 15 वर्ष तक किसी डॉक्टर के पास नहीं गए थे !! वो आयुर्वेद के इतने बडे ज्ञाता हो गए थे कि लोगो की गम्भीर से गम्भीर बीमारियाँ जैसे शुगर, बीपी, दमा, अस्थमा, हार्ट ब्लोकेज, कोलेस्ट्रोल आदि का इलाज करने लगे थे और लोगो को सबसे पहले बीमारी होने का असली कारण समझाते थे और फिर उसका समाधान बताते थे !! लोग उनके हेल्थ के लेक्चर सुनने के लिए दीवाने हो गए थे इसके इलावा वो होमोपैथी चिकित्सा के भी बडे ज्ञाता थे होमोपैथी चिकित्सा मे तो उन्हे डिग्री भी हासिल थी !!

एक बार उनको खबर मिली कि उनके गुरु धर्मपाल जी को लकवा का अटैक आ गया है और उनके कुछ शिष्य उनको अस्पताल ले गए थे ! राजीव भाई ने जाकर देखा तो उनकी आवाज पूरी जा चुकी थी हाथ पाँव चलने पूरे बंद हो गए थे ! अस्पताल मे उनको बांध कर रखा हुआ था ! राजीव भाई धर्मपाल जी को घर ले आए और उनको एक होमियोपैथी दवा दी मात्र 3 दिन उनकी आवाज वापिस आ गई और एक सप्ताह मे वो वैसे चलने फिरने लगे कि कोई देखने वाला मानने को तैयार नहीं था कि इनको कभी लकवा का अटैक आया था !! कर्नाटक राज्य में एक बार बहुत भयंकर चिकन-गुनिया फैल गया हजारो की संख्या मे लोग मरे ! राजीव भाई अपनी टीम के साथ वहाँ पहुँच कर हजारो हजारो लोगो को इलाज करके मृत्यु से बचाया ! ये देख कर कर्नाटक सरकार ने अपनी डॉक्टरों की टीम राजीव भाई के पास भेजी और कहा कि जाकर देखो कि वो किस ढंग से इलाज कर रहे हैं !

(अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई के हेल्थ के लेक्चर सुन सकते हैं घंटो घंटो उन्होने स्वस्थ रहने और रोगो की चिकित्सा के व्याख्यान दिये है)

इसके इलावा राजीव भाई ने यूरोप और भारत की सभ्यता संस्कृति और इनकी भिन्नताओ पर गहरा अध्यन किया और लोगो को बताया कि कैसे भारतवासी यूरोप के लोगो की मजबूरी को अपना फैशन बना रहे है और कैसे उनकी नकल कर बीमारियो के शिकार हो रहे है !! राजीव भाई का कहना था कि देश मे आधुनिकीकरण के नाम पर पश्चिमीकरण हो रहा है ! और इसका एक मात्र कारण देश मे चल रहा अंग्रेज मैकॉले का बनाया हुआ indian education system है ! क्योकि आजाद भारत मे सारे कानून अंग्रेजो के चल रहे हैं इसीलिए ये मैकॉले द्वारा बनाया गया शिक्षा तंत्र भी चल रहा है !

राजीव भाई कहते थे कि इस अंग्रेज मैकॉले ने जब भारत का शिक्षा तंत्र का कानून बनाया और शिक्षा का पाठयक्रम तैयार किया तब इसने एक बात कही कि मैंने भारत का शिक्षा तंत्र ऐसा बना दिया है की इसमे पढ के निकलने वाला व्यक्ति शक्ल से तो भारतीय होगा पर अकल से पूरा अंग्रेज होगा ! उसकी आत्मा अंगेजों जैसी होगी उसको भारत की हर चीज मे पिछडापन दिखाई देगा !! और उसको अंग्रेज और अंग्रेजियत ही सबसे बढिया लगेगी !!

इसके इलावा राजीव भाई का कहना था कि इसी अंग्रेज मैकॉले ने भारत की न्याय व्यवस्था को तोड कर IPC, CPC जैसे कानून बनाये और उसके बाद ब्यान दिया की मैंने भारत की न्याय पद्धति को ऐसा बना दिया है कि इसमे किसी गरीब को इंसाफ नहीं मिलेगा ! सालों साल मुकदमे लटकते रहेंगे !! मुकदमो के सिर्फ फैंसले आएंगे न्याय नहीं मिलेगा !! इस अंग्रेज शिक्षा पद्धति और अँग्रेजी न्यायव्यवस्था के खिलाफ लोगो को जागरूक करने के लिए राजीव राजीव भाई ने मैकॉले शिक्षा और भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पर बहुत व्याख्यान दिये और इसके अतिरिक्त अपने एक मित्र आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता पवन गुप्ता जी के साथ मिल कर एक गुरुकुल की स्थापना की वहाँ वो फेल हुए बच्चो को ही दाखिल करते थे कुछ वर्ष उन बच्चो को उन्होने प्राचीन शिक्षा पद्धति से पढाया ! और बच्चे बाद मे इतने ज्ञानी हो गए की आधुनिक शिक्षा मे पढे बडे बडे वैज्ञानिक उनके आगे दाँतो तले उंगली दबाते थे !

राजीव जी ने रामराज्य की कल्पना को समझना चाहा ! इसके लिए वे भारत अनेकों साधू संतो,रामकथा करने वालों से मिले और उनसे पूछते थे की भगवान श्री राम रामराज्य के बारे क्या कहा है ?? लेकिन कोई भी उत्तर उनको संतुष्ट नहीं कर पाया ! फिर उन्होने भारत मे लिखी सभी प्रकार की रामायणों का अध्यन किया और खुद ये हैरान हुए कि रामकथा मे से भारत की सभी समस्याओ का समाधान निकलता है ! फिर राजीव भाई घूम घूम कर खुद रामकथा करने लगे और उनकी रामकथा सभी संत और बाबाओ से अलग होती वो सिर्फ उसी बात पर अधिक चर्चा करते जिसे अन्य संत तो बताते नहीं या वो खुद ही ना जानते है ! राजीव भाई लोगो को बताते कि किस प्रकार रामकथा मे भारत की सभी समस्याओ का समाधान निकलता है ! (इस बारे मे अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई की रामकथा वाला व्याख्यान सुन सकते हैं)

2009 मे राजीव भाई बाबा रामदेव के संपर्क मे आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओ और उनके समाधानो से परिचित करवाया और विदेशो मे जमा कालेधन आदि के विषय मे बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढाने का फैसला किया !! आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव भाई के इस निर्णय से सहमत नहीं थे !! फिर भी राजीव भाई ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नीव रखी !! जिसका मुख्य उदेश्य लोगो को अपनी विचार धारा से जोडना, उनको देश की मुख्य समस्याओ का कारण और समाधान बताना !! योग और आयुर्वेद से लोगो को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड कर 2014 मे देश से अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उदेश्य भारत मे चल रही अँग्रेजी व्यवस्थाओ को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशो मे जमा काला धन वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य मे कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था !!

राजीव भाई के व्याख्यान सुन कर मात्र ढाई महीने मे 6 लाख कार्यकर्ता पूरे देश मे प्रत्यक्ष रूप मे इस अंदोलन से जुड गए थे राजीव भाई पतंजलि मे भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओ के बीच व्याख्यान दिया करते थे जो पतंजलि योगपीठ के आस्था चैनल पर के माध्यम से भारत के लोगो तक पहुंचा करते थे इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से भारत स्वाभिमान अंदोलन के साथ 3 से 4 करोड लोग जुड गए थे ! फिर राजीव भाई भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रतिनिधि बनकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले गाँव-गाँव शहर-शहर जाया करते थे पहले की तरह व्याख्यान देकर लोगो को भारत स्वाभिमान से जुडने के लिए प्रेरित करते थे !!

लगभग आधे भारत की यात्रा करने के बाद राजीव भाई 26 नवंबर 2010 को उडीसा से छतीसगढ राज्य के एक शहर रायगढ पहुंचे वहाँ उन्होने 2 जन सभाओ को आयोजित किया ! इसके पश्चात अगले दिन 27 नवंबर 2010 को जंजगीर जिले मे दो विशाल जन सभाए की इसी प्रकार 28 नवंबर बिलासपुर जिले मे व्याख्यान देने से पश्चात 29 नवंबर 2010 को छतीसगढ के दुर्ग जिले मे पहुंचे ! उनके साथ छतीसगढ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे ! दुर्ग जिले मे उनकी दो विशाल जन सभाए आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा मे सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक थी! राजीव भाई ने विशाल जन सभा को आयोजित किया !! इसके बाद का कार्यक्रम साय 4 बजे दुर्ग मे था !! जिसके लिए वह दोपहर 2 बजे बेमेतरा तहसील से रवाना हुए !

(इसके बात की घटना विश्वास योग्य नहीं है इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छतीसगढ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियो द्वारा बताई गई है)

उन लोगो का कहना है गाडी मे बैठने के बाद उनका शरीर पसीना पसीना हो गया ! दयासागर ने राजीव जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोडी गैस सीने मे चढ गई है शोचालय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा ! फिर दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम मे ले गए वहाँ राजीव भाई शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज मे कहा गाडी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ ! जब काफी देर बाद राजीव भाई बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव भाई पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे ! उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिडका गया दयासागर ने उनको अस्पताल चलने को कहा ! राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे !

थोडी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाइयाँ दी ! फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई के सेक्टर 9 मे इस्पात स्वयं अस्पताल मे भर्ती किया गया ! इस अस्पताल मे अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको Apollo BSR मे भर्ती करवाया गया ! राजीव भाई एलोपेथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे ! उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल मे भर्ती नहीं होना चाहते थे ! उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपेथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू ? ! ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु मे भर्ती होने को कहा !

फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण मे आईसीयु भर्ती करवाएगे !! उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हे मृत घोषित किया !!

(बेमेतरा तहसील से रवाना होने के बाद की ये सारी घटना राज्य प्रभारी दयासागर और अन्य अधिकारियों द्वारा बताई गई है अब ये कितनी सच है या झूठ ये तो उनके नार्को टेस्ट करने ही पता चलेगा !!)

क्योकि राजीव जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया ! 30 नवंबर को उनके मृत शरीर को पतंजलि, हरिद्वार लाया गया जहां हजारो की संख्या मे लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे ! और 1 दिसंबर राजीव जी का दाह संस्कार कनखल हरिद्वार मे किया गया !!

राजीव भाई के चाहने वालों का कहना है कि अंतिम समय मे राजीव जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड गया था ! उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्ट्म नहीं करवाया गया !! राजीव भाई की मौत लगभग भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से मिलती जुलती है आप सबको याद होगा ताशकंद से जब शास्त्री जी का मृत शरीर लाया गया था तो उनके भी चेहरे का रंग नीला, काला पड गया था !! और अन्य लोगो की तरह राजीव भाई भी ये मानते थे कि शास्त्री जी को विष दिया गया था !! राजीव भाई और शास्त्री जी की मृत्यु मे एक जो समानता है कि दोनों का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था !!

राजीव भाई की मृत्यु से जुडे कुछ सवाल !!

किसके आदेश पर ये प्रचारित किया गया ? कि राजीव भाई की मृत्यु दिल का दौरा पडने से हुयी है ?

29 नवंबर दोपहर 2 बजे बेमेतरा से निकलने के पश्चात जब उनको गैस की समस्या हुए और रात 2 बजे जब उनको मृत घोषित किया गया इसके बीच मे पूरे 12 घंटे का समय था 12 घंटे मे मात्र एक गैस की समस्या का समाधान नहीं हो पाया ??

आखिर पोस्ट मार्टम करवाने मे क्या तकलीफ थी ??

राजीव भाई का फोन जो हमेशा आन रहता था उस 2 बजे बाद बंद क्यों था ??

राजीव भाई के पास एक थैला रहता था जिसमे वो हमेशा आयुर्वेदिक, होमियोपैथी दवाएं रखते थे वो थैला खाली क्यों था ??

30 नवंबर को जब उनको पतंजलि योगपीठ मे अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था उनके मुंह और नाक से क्या टपक रहा था उनके सिर को माथे से लेकर पीछे तक काले रंग के पालिथीन से क्यूँ ढका था ?

राजीव भाई की अंतिम विडियो जो आस्था चैनल पर दिखाई गई तो उसको एडिट कर चेहरे का रंग सफेद कर क्यों दिखाया गया ?? अगर किसी के मन को चोर नहीं था तो विडियो एडिट करने की क्या जरूरत थी ??

अंत पोस्टमार्टम ना होने के कारण उनकी मृत्यु आजतक एक रहस्य ही बन कर रह गई !!

राजीव भाई के कई समर्थक उनके जाने के बाद बाबा रामदेव से काफी खफा है क्योंकि बाबा रामदेव अपने एक व्याख्यान मे कहा कि राजीव भाई को हार्ट ब्लोकेज था, शुगर की समस्या थी, बी.पी. भी था राजीव भाई पतंजलि योगपीठ की बनी दवा मधुनाशनी खाते थे ! जबकि राजीव भाई खुद अपने एक व्याख्यान मे बता रहे हैं कि उनका शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल सब नार्मल है !! वे पिछले 20 साल से डॉक्टर के पास नहीं गए ! और अगले 15 साल तक जाने की संभावना नहीं !!

और राजीव भाई के चाहने वालो का कहना है कि हम कुछ देर के लिए राजीव भाई की मृत्यु पर प्रश्न नहीं उठाते लेकिन हमको एक बात समझ नहीं आती कि पतंजलि योगपीठ वालों ने राजीव भाई की मृत्यु के बाद उनको तिरस्कृत करना क्यों शुरू कर दिया ??

मंचो के पीछे उनकी फोटो क्यों नहीं लगाई जाती ??

आस्था चैनल पर उनके व्याख्यान दिखाने क्यों बंद कर दिये गए ?? कभी साल अगर उनकी पुण्यतिथि पर व्याख्यान दिखाये भी जाते है तो वो भी 2-3 घंटे के व्याख्यान को काट काट कर एक घंटे का बनाकर दिखा दिया जाता है !!

इसके अतिरिक्त उनके कुछ समर्थक कहते हैं कि भारत स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना जिस उदेश्य के लिए हुए थी राजीव भाई की मृत्यु के बाबा रामदेव उस राह हट क्यों गए ?

राजीव भाई और बाबा खुद कहते थे कि सब राजनीतिक पार्टियां एक जैसी है हम 2014 मे अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नया राजनीतिक विकल्प देंगे ! लेकिन राजीव भाई की मृत्यु के बाद बाबा रामदेव ने भारत स्वाभिमान के आंदोलन की दिशा बदल दी और राजीव की सोच के विरुद्ध आज वो भाजपा सरकार का समर्थन कर रहें !! इसलिए बहुत से राजीव भाई के चाहने वाले भारत स्वाभिमान से हट कर अपने अपने स्तर पर राजीव भाई का प्रचार करने मे लगे हैं !!

राजीव भाई ने अपने पूरे जीवन मे देश भर मे घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये! सन 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे !! उन्होने विदेशी कंपनियो की नाक मे दम कर रखा था !

भारत के किसी भी मीडिया चैनल ने उनको दिखाने का साहस नहीं किया !! क्योकि वह देश से जुडे ऐसे मुद्दो पर बात करते थे की एक बार लोग सुन ले तो देश मे 1857 से बडी क्रांति हो जाती ! वह ऐसे ओजस्वी वक्ता थे जिनकी वाणी पर माँ सरस्वती साक्षात निवास करती थी। जब वे बोलते थे तो स्रोता घण्टों मन्त्र-मुग्ध होकर उनको सुना करते थे ! 30 नवम्बर 1967 को जन्मे और 30 नवंबर 2010 को ही संसार छोडने वाले ज्ञान के महासागर श्री राजीव दीक्षित जी आज केवल आवाज के रूप मे हम सबके बीच जिंदा है उनके जाने के बाद भी उनकी आवाज आज देश के लाखो करोडो लोगो का मार्गदर्शन कर रही है और भारत को भारत की मान्यताओं के आधार पर खडा करने आखिरी उम्मीद बनी हुई है !

राजीव भाई को शत शत नमन !!



अंतिम शब्दों में एक भाव पूर्ण श्रद्धांजलि ….

~!~ शत् – शत् नमन है ~!~

जिसने भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया…..

भारत सोने की चिडिया था ..है….और आगे कैसे होगा

हम-सब को फिर से बता दिया ……

आज जब सत्य बोलना नामुमकिन हो ,

उसने उस डगर पे चलना हमे सिखा दिया ……

भारत का सोया स्वाभिमान जगा दिया…..

वो आया था ‘‘विवेकान्द’’ बन कर

अपने सत् कर्मो से बता दिया…….

पर अफसोस कि देश आज भरा गदारो से,

जिस कारण ‘‘माँ भारतीय के लाल को ,

‘‘शास्त्री जी’’ की तरह विदा किया30 नवम्बर
जन्म दिवस एवम पुण्यतिथि पर शत् शत् नमन
राजीव दीक्षित जी का परिचय

दोस्तों राजीव दीक्षित जी के परिचय मे जितनी बातें कही जाए वो कम है ! कुछ चंद शब्दो मे उनके परिचय को बयान कर पाना असंभव है ! ये बात वो लोग बहुत अच्छे से समझ सकते है जिन्होने राजीव दीक्षित जी को गहराई से सुना और समझा है !! फिर भी हमने कुछ प्रयास कर उनके परिचय को कुछ शब्दो का रूप देने का प्रयत्न किया है ! परिचय शुरू करने से पहले हम आपको ये बात स्पष्ट करना चाहते हैं कि जितना परिचय राजीव भाई का हम आपको बताने का प्रयत्न करेंगे वो उनके जीवन मे किये गये कार्यो का मात्र 1% से भी कम ही होगा ! उनको पूर्ण रूप से जानना है तो आपको उनके व्याख्यानों को सुनना पडेगा !!

पूर्ण परिचय:-

राजीव दीक्षित जी का जन्म 30 नवम्बर 1967 को उत्तर प्रदेश राज्य के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में पिता राधेश्याम दीक्षित एवं माता मिथिलेश कुमारी के यहाँ हुआ था। उन्होने प्रारम्भिक और माध्यमिक शिक्षा फिरोजाबाद जिले के एक स्कूल से प्राप्त की !! इसके उपरान्त उन्होने इलाहाबाद शहर के जे.के इंस्टीटयूट से बी. टेक. और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institute of Technology से एम. टेक. की उपाधि प्राप्त की। उसके बाद राजीव भाई ने कुछ समय भारत CSIR (Council of Scientific and Industrial Research) मे कार्य किया। तत्पश्चात उन्होंने किसी Research Project मे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के साथ भी कार्य किया !!

श्री राजीव जी इलाहाबाद के जे.के इंस्टीटयूट से बी.टेक. की शिक्षा लेते समय ही ‘‘आजादी बचाओ आंदोलन’’ से जुड गए जिसके संस्थापक श्री बनवारी लाल शर्मा जी थे जो कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही गणित विभाग के मुख्य शिक्षक थे ! इसी संस्था में राजीव भाई प्रवक्ता के पद पर थे, संस्था में श्री अभय प्रताप, संत समीर, केशर जी, राम धीरज जी, मनोज त्यागी जी तथा योगेश कुमार मिश्रा जी शोधकर्ता अपने अपने विषयों पर शोध कार्य किया करते थे जो कि संस्था द्वारा प्रकाशित ‘‘नई आजादी उद्घोष’’ नमक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ करते थे और राजीव भाई के ओजस्वी वाणी से देश के कोने-कोने में व्याख्यानों की एक विशाल श्रंखला-बद्ध वैचारिक क्रान्ति आने लगी राजीव जी ने अपने प्रवक्ता पद के दायित्वों को एक सच्चे राष्ट्रभक्त के रूप में निभाया जो कि अतुल्य है ……

बचपन से ही राजीव भाई में देश की समस्याओ को जानने की गहरी रुची थी ! प्रति मास 800 रूपये का खर्च उनका मैगजीनों, सभी प्रकार के अखबारो को पढने मे हुआ करता था! वे अभी नौवी कक्षा मे ही थे कि उन्होने अपने इतिहास के अध्यापक से एक ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब उस अध्यापक के पास भी नहीं था जैसा कि आप जानते है कि हमको इतिहास की किताबों मे पढाया जाता है कि अंग्रेजो का भारत के राजा से प्रथम युद्ध 1757 मे पलासी के मैदान मे रोबर्ट क्लाइव और बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला से हुआ था ! उस युद्ध मे रोबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दोला को हराया था और उसके बाद भारत गुलाम हो गया था !!

राजीव भाई ने अपने इतिहास के अध्यापक से पूछा कि सर मुझे ये बताइए कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजो की तरफ से लड़ने वाले कितने सिपाही थें? तो अध्यापक कहते थे कि मुझको नहीं मालूम, तो राजीव भाई ने पूछा क्यों नहीं मालूम? तो कहते थे कि मुझे किसी ने नहीं पढाया तो मै तुमको कहाँ से पढा दू।

तो राजीव भाई ने उनको बराबर एक ही सवाल पूछा कि सर आप जरा ये बताईये कि बिना सिपाही के कोई युद्ध हो सकता है ?? तो अध्यापक ने कहा नहीं ! तो फिर राजीव भाई ने पूछा फिर हमको ये क्यों नहीं पढाया जाता है कि युद्ध में कितने सिपाही थे अंग्रेजो के पास ? और उसके दूसरी तरफ एक और सवाल राजीव भाई ने पूछा था कि अच्छा ये बताईये कि अंग्रेजो के पास कितने सिपाही थे ये तो हमको नहीं मालुम सिराजुद्दोला जो लड रहा था हिंदुस्तान की तरफ से उनके पास कितने सिपाही थे? तो अध्यापक ने कहा कि वो भी नहीं मालूम। तो खैर इस सवाल का जवाब बहुत बडा और गंभीर है कि आखिर इतना बडा भारत मुठी भर अंग्रेजो का गुलाम कैसे हो गया ?? यहाँ लिखेंगे तो बात बहुत बडी हो जाएगी ! इसका जवाब आपको राजीव भाई के एक व्याख्यान जिसका नाम आजादी का असली इतिहास मे मिल जाएगा।

तो देश की आजादी से जुडे ऐसे सैंकडों-सैंकडों सवाल दिन रात राजीव भाई के दिमाग मे घूमते रहते थे !! इसी बीच उनकी मुलाकात प्रो. धर्मपाल नाम के एक इतिहासकार से हुई जिनकी किताबें अमेरिका मे पढाई जाती है लेकिन भारत मे नहीं !! धर्मपाल जी को राजीव भाई अपना गुरु भी मानते है, उन्होने राजीव भाई के काफी सवालों का जवाब ढूंढने मे बहुत मदद की! उन्होने राजीव भाई को भारत के बारे मे वो दस्तावेज उपलब्ध करवाए जो इंग्लैंड की लाइब्रेरी हाउस आफ कामन्स मे रखे हुए थे जिनमे अंग्रेजो ने पूरा वर्णन किया था कि कैसे उन्होने भारत गुलाम बनाया ! राजीव भाई ने उन सब दस्तावेजो का बहुत अध्यन किया और ये जानकर उनके रोंगटे खडे हो गए कि भारत के लोगो को भारत के बारे मे कितना गलत इतिहास पढाया जा रहा है !! फिर सच्चाई को लोगो के सामने लाने के लिए राजीव भाई गाँव–गाँव, शहर–शहर जाकर व्याख्यान देने लगे ! और साथ-साथ देश की आजादी और देश के अन्य गंभीर समस्याओ का इतिहास और उसका समाधान तलाशने मे लगे रहते !!

इलाहबाद मे पढते हुए उनके एक खास मित्र हुआ करते थे जिनका नाम है योगेश मिश्रा जी उनके पिता जी इलाहबाद हाईकोर्ट मे वकील थे !! तो राजीव भाई और उनके मित्र अक्सर उनसे देश की आजादी से जुडी रहस्यमयी बातों पर वार्तालाप किया करते थे ! तब राजीव भाई को देश की आजादी के विषय मे बहुत ही गंभीर जानकारी प्राप्त हुई ! कि 15 अगस्त 1947 को देश मे कोई आजादी नहीं आई ! बल्कि 14 अगस्त 1947 की रात को अंग्रेज माउंट बेटन और नेहरू के बीच के समझोता हुआ था जिसे सत्ता का हस्तांतरण ( transfer of power agreement) कहते हैं ! इस समझोते के अनुसार अंग्रेज अपनी कुर्सी नेहरू को देकर जाएंगे लेकिन उनके द्वारा भारत को बर्बाद करने के लिए बनाए गये 34735 कानून वैसे ही इस देश मे चलेंगे !! और क्योकि आजादी की लडाई मे पूरे देश का विरोध अँग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ था तो सिर्फ एक ईस्ट इंडिया कंपनी भारत छोड कर जाएगी और उसके साथ जो 126 कंपनिया और भारत को लुटने आए थी वो वैसे की वैसे ही भारत मे व्यापार करेगी ! लूटती रहेगी ! आज उन विदेशी कंपनियो की संख्या बढ कर 6000 को पार कर गई है !! (इस बारे मे और अधिक जानकरी उनके व्याख्यानों मे मिलेगी)

एक बात जो राजीव भाई को हमेशा परेशान करती रहती थी कि आजादी के बाद भी अगर भारत मे अँग्रेजी कानून वैसे के वैसे ही चलेंगे और आजादी के बाद भी विदेशी कंपनियाँ भारत को वैसे ही लूटेंगी जैसे आजादी से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी लूटा करती थी ! आजादी के बाद भी भारत मे वैसे ही गौ हत्या होगी जैसे अंग्रेजो के समय होती थी, तो हमारे देश की आजादी का अर्थ क्या है ??

तो ये सब जानने के बाद राजीव भाई ने इन विदेशी कंपनियो और भारत में चल रहे अँग्रेजी कानूनों के खिलाफ एक बार फिर से वैसा ही स्वदेशी आंदोलन शुरू करने का संकल्प लिया जैसा किसी समय मे बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजो के खिलाफ लिया था !! अपने राष्ट्र मे पूर्ण स्वतंत्रता लाने और आर्थिक महाशक्ति के रुप में खडा करने के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की और उसे जीवन पर्यन्त निभाया। वो गाँव-गाँव, शहर-शहर घूम कर लोगो को लोगो को भारत मे चल रहे अँग्रेजी कानून, आधी अधूरी आजादी का सच, विदेशी कंपनियो की भारत मे लूट आदि विषयो के बारे मे बताने लगे ! सन् 1999 में राजीव के स्वदेशी व्याख्यानों की कैसेटों ने समूचे देश में धूम मचा दी थी।!

1984 मे जब भारत मे भोपाल गैस कांड हुआ तब राजीव भाई ने इसके पीछे के षडयंत्र का पता लगाया और ये खुलासा किया कि ये कोई घटना नहीं थी बल्कि अमेरिका द्वारा किया गया एक परीक्षण था (जिसकी अधिक जानकारी आपको उनके व्याख्यानों मे मिलेगी) तब राजीव भाई यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ प्रदर्शन किया!

इसी प्रकार 1995-96 में टिहरी बाँध के बनने के खिलाफ ऐतिहासिक मोर्चे में भाग लिया और पुलिस लाठी चार्ज में काफी चोटें भी खायीं। !! और इसी प्रकार 1999 मे उन्होने राजस्थान के कुछ गांवसियों साथ मिलकर एक शराब बनाने वाली कंपनी जिसको सरकार ने लाइसेन्स दिया था और वो कंपनी रोज जमीन की नीचे बहुत अधिक मात्रा मे पानी निकाल कर शराब बनाने वाली थी उस कंपनी को भगाया !!

1991 भारत मे चले ग्लोबलाएशन, लिब्रलाइजेसशन को राजीव भाई स्वदेशी उद्योगो का सर्वनाश करने वाला बताया और पूरे आंकडों के साथ घंटो-घंटो इस पर व्याख्यान दिये और स्वदेशी व्यापारियो को इसके खिलाफ जागरूक किया !! फिर 1994 मे भारत सरकार द्वारा किए WTO समझोते का विरोध किया क्योकि ये समझोता भारत को एक बहुत बडी आर्थिक गुलामी की और धकेलने वाला था ! इस समझोते मे सैंकडों ऐसे शर्ते सरकार ने स्वीकार कर ली थी जो आज भारत मे किसानो की आत्महत्या करने का, रुपए का डालर की तुलना मे नीचे जाने का, देश बढ रही भूख और बेरोजगारी का, खत्म होते स्वदेशी उद्योगो का, बैंकिंग, इन्सुरेंस, वकालत सभी सर्विस सेक्टर मे बढ रही विदेशी कंपनियो का कारण है ! राजीव भाई के अनुसार इस समझोते के बाद सरकार देश को नहीं चलाएगी बल्कि इस समझोते के अनुसार देश चलेगा !! देश की सारी आर्थिक नीतियाँ इस समझौते को ध्यान मे रख कर बनाई जाएगी ! और भारत मे आज तक बनी किसी भी सरकार में हिम्मत नहीं जो इस WTO समझौते को रद्द करवा सके !!

उन्होने ने बताया कि कैसे WORLD BANK, IMF, UNO जैसे संस्थाये अमेरिका आदि देशो की पिठ्ठू है और विकासशील देशो की सम्पत्ति लूटने के लिए इनको पैदा किया गया है ! (WTO समझोते के बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के व्याख्यानों मे मिलेगी) इन राष्ट्र विरोधी ताकतों के खिलाफ अपनी लडाई को और मजबूत करने लिए राजीव भाई अपने कुछ साथियो के साथ मिलकर पूरे देश मे विदेशी कम्पनियों, अँग्रेजी कानून, WTO, आदि के खिलाफ अभियान चलाने लगे !! ऐसे ही आर्थर डंकल नाम एक अधिकारी जिसने डंकल ड्राफ्ट बनाया था भारत मे लागू करवाने के लिए वो एक बार भारत आया तो राजीव भाई और बाकी कार्यकर्ता बहुत गुस्से मे थे तब राजीव भाई ने उसे एयरपोर्ट पर ही जूते से मार मार कर भगाया और फिर उनको जेल हुई !!

1999-2000 सन् मे उन्होने दो अमेरिकन कम्पनियाँ पेप्सी और कोकाकोला के खिलाफ प्रदर्शन किया और लोगो को बताया कि ये दोनों कम्पनियाँ पेय पदार्थ के नाम पर आप सबको जहर बेच रही है और हजारो करोड की लूट इस देश मे कर रही हैं ! और आपका स्वास्थ बिगाड रही हैं ! राजीव भाई ने लोगो से कोक ,पेप्सी और इसका विज्ञापन करने वाले क्रिकेट खिलाडियो और, फिल्मी स्टारों का बहिष्कार करने को कहा !! सन 2000 मे 9-11 की घटना घटी तो कुछ अखबार वाले राजीव भाई के पास भी उनके विचार जानने को पहुँचे ! तब राजीव भाई ने कहा की मुझे नहीं लगता कि ये दोनों टावर आतंकवादियो ने गिराये है ! तब उन्होने पूछा आपको क्या लगता है ? राजीव भाई ने कहा मुझे लगता है ये काम अमेरिका ने खुद ही करवाया है ! तो उन्होने कहा आपके पास क्या सबूत है ? राजीव भाई ने कहा समय दो जल्दी सबूत भी ला दूंगा !!

और 2007 मे राजीव भाई ने गुजरात के एक व्याख्यान मे इस 9-11 की घटना का पूरा सच लाइव प्रोजक्टर के माध्यम से लोगो के सामने रखा ! (जिसका विडियो youtube पर 9-11 was totally lie के नाम से उपलब्ध है) और 9 सितंबर 2013 को रूस ने भी एक विडियो जारी कर 9-11 की घटना को झूठा बताया! 2003-2004 मे राजीव भाई ने भारत सरकार द्वारा बनाये गये VAT कानून का विरोध किया और पूरे देश के व्यपरियो के समूह मे जाकर घंटो-घंटो व्याख्यान दिये और उन्होने जागरूक किया कि ये VAT का कानून आपकी आर्थिक लूट से ज्यादा आपके धर्म को कमजोर करने और भारत मे ईसाईयत को बढावा देने के लिए बनाया गया है !! (इस बारे मे अधिक जानकारी राजीव भाई के VAT वाले व्याख्यान मे मिलेगी) देश मे हो रही गौ हत्या को रोकने के लिए भी राजीव भाई ने कडा संघर्ष किया ! राजीव भाई का कहना था कि जब तक हम गौ माता का आर्थिक मूल्यांकन कर लोगो को नहीं समझाएँगे ! तब तक भारत मे गौ रक्षा नहीं हो सकती ! क्योंकि कोई भी सरकार आजतक गौ हत्या के खिलाफ संसद मे बिल पास नहीं कर सकी ! उनका कहना था कि सरकारो का तो पता नहीं वो कब संसद मे गौ हत्या के खिलाफ बिल पास करें क्योकि कि आजादी के 64 साल मे तो उनसे बिल पास नहीं हुआ और आगे करेंगे इसका भरोसा नहीं !! इसलिए तब हमे खुद अपने स्तर पर ही गौ हत्या रोकने का प्रयास करना चाहिए !!
उन्होने देश भर मे घूम घूम कर अलग अलग जगह पर व्याख्यान कर लोगो को गौ माता की महत्वता और उसका आर्थिक महत्व बताया ! उन्होने 60 लाख से अधिक किसानो को देसी खेती (organic farming) करने के सूत्र बताये कि कैसे किसान रासायनिक खाद, यूरिया आदि खेतो मे डाले बिना गौ माता के गोबर और गौ मूत्र से खेती कर सकते है ! जिससे उनके उत्पादन का खर्चा लगभग शून्य होगा !! और उनकी आय मे बहुत बढोतरी होगी ! आज किसान 15-15 हजार रुपए लीटर कीटनाश्क खेत मे छिडक रहा है !! टनों टन महंगा यूरिया, रासायनिक खाद खेत मे डाल रहा है जिससे उसके उत्पादन का खर्चा बढता जा रहा है और उत्पादन भी कम होता जा रहा है !! रासायनिक खाद वाले फल सब्जियाँ खाकर लाखो लाखो लोग दिन प्रतिदिन बीमार हो रहे हैं ! राजीव भाई ने गरीब किसानो को गाय ना बेचने की सलाह दी और उसके गोबर और गौ मूत्र से खेती करने के सूत्र बताये !! किसानो ने राजीव भाई के बताये हुए देसी खेती के सूत्रो द्वारा खेती करना शुरू किया और उनकी आर्थिक समृद्धि बहुत बढीं !!

1998 मे राजीव भाई ने कुछ गौ समितियों के साथ मिलकर गौ हत्या रोकने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे मुकदमा दायर कर दिया कि गौ हत्या नहीं होनी चाहिए ! सामने बैठे कुरेशी कसाइयो ने कहा क्यों नहीं होनी चाहिए ? कोर्ट मे साबित ये करना था की गाय की हत्या कर मांस बेचने से ज्यादा लाभ है या बचाने से !! कसाइयो की तरफ से लड़ने वाले भारत के सभी बड़े-बड़े वकील जो 50-50 लाख तक फीस लेते हैं सोली सोराब्जी की बीस लाख की फीस है, कपिल सिब्बल 22 लाख की फीस है, महेश जेठ मालानी (राम जेठ मालानी का लड़का) जो फीस लेते है 32 लाख से 35 लाख सारे सभी बड़े वकील कसाइयों के पक्ष में ! और इधर राजीव भाई जैसे लोगो के पास कोई बडा वकील नहीं था क्योंकि इतना पैसा नहीं था ! तो इन लोगो ने अपना मुकदमा खुद ही लडा !!

(इस मुकद्दमे की पूरी जानकारी आपको राजीव भाई के व्याख्यान जिसका नाम गौ हत्या और राजनीति) मे मिल जाएगी!! हाँ इतना आपको जरूर बता दें 2005 मे मुकदमा राजीव भाई और उनके कार्यकर्ताओ ने जीत लिया !! राजीव भाई अदालत मे गाय के एक किलो गोबर से 33 किलो खाद तैयार करने का फॉर्मूला बताया और अदालत के सामने करके भी दिखया जिससे रोज की 1800 से 2000 रुपए की रोज की कमाई की जा सकती है !! ऐसे ही उन्होने गौ मूत्र से बनने वाली औषधियों का आर्थिक मूल्यांकन करके बताया !!! और तो और उन्होने सुप्रीम कोर्ट के जज की गाडी गोबर गैस से चलाकर दिखा दी !! जज ने तीन महीने गाडी चलाई और ये सब देख अपने दाँतो तले उंगली दबा ली!! अधिक जानकरी आपको राजीव भाई के व्याख्यान मे मिलेगी !! (Gau Hatya Rajniti Supreme Court mein ladai at Aurngabaad.mp3)

राजीव भाई को जब पता चला कि रासायनिक खाद बनाने वाली कंपनियो के बाद देश की सबसे अधिक हजारो करोड रुपए की लूट दवा बनाने वाली सैंकडों विदेशी कंपनियाँ कर रही है ! और इसके इलावा ये बडी बडी कंपनियाँ वो दवाये भारत मे बेच रहे है जो अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों मे बैन है और जिससे देश वासियो को भयंकर बीमारियाँ हो रही है तब राजीव भाई ने इन कंपनियो के खिलाफ भी आंदोलन शुरू कर दिया !! राजीव भाई ने आयुर्वेद का अध्यन किया और 3500 वर्ष पूर्व महाऋषि चरक के शिष्य वागभट्ट जी को महीनो महीनो तक पढा !! और बहुत ज्ञान अर्जित किया ! फिर घूम घूम कर लोगो को आयुर्वेदिक चिकित्सा के बारे मे बताना शुरू किया की कैसे बिना दवा खाये आयुर्वेद के कुछ नियमो का पालन कर हम सब बिना डॉक्टर के स्वस्थ रह सकते है और जीवन जी सकते है इसके अलावा हर व्यक्ति अपने शरीर की 85% चिकित्सा स्वंय कर सकता है !! राजीव भाई खुद इन नियमो का पालन 15 वर्ष से लगातार कर रहे थे जिस कारण वे पूर्ण स्वस्थ थे 15 वर्ष तक किसी डॉक्टर के पास नहीं गए थे !! वो आयुर्वेद के इतने बडे ज्ञाता हो गए थे कि लोगो की गम्भीर से गम्भीर बीमारियाँ जैसे शुगर, बीपी, दमा, अस्थमा, हार्ट ब्लोकेज, कोलेस्ट्रोल आदि का इलाज करने लगे थे और लोगो को सबसे पहले बीमारी होने का असली कारण समझाते थे और फिर उसका समाधान बताते थे !! लोग उनके हेल्थ के लेक्चर सुनने के लिए दीवाने हो गए थे इसके इलावा वो होमोपैथी चिकित्सा के भी बडे ज्ञाता थे होमोपैथी चिकित्सा मे तो उन्हे डिग्री भी हासिल थी !!

एक बार उनको खबर मिली कि उनके गुरु धर्मपाल जी को लकवा का अटैक आ गया है और उनके कुछ शिष्य उनको अस्पताल ले गए थे ! राजीव भाई ने जाकर देखा तो उनकी आवाज पूरी जा चुकी थी हाथ पाँव चलने पूरे बंद हो गए थे ! अस्पताल मे उनको बांध कर रखा हुआ था ! राजीव भाई धर्मपाल जी को घर ले आए और उनको एक होमियोपैथी दवा दी मात्र 3 दिन उनकी आवाज वापिस आ गई और एक सप्ताह मे वो वैसे चलने फिरने लगे कि कोई देखने वाला मानने को तैयार नहीं था कि इनको कभी लकवा का अटैक आया था !! कर्नाटक राज्य में एक बार बहुत भयंकर चिकन-गुनिया फैल गया हजारो की संख्या मे लोग मरे ! राजीव भाई अपनी टीम के साथ वहाँ पहुँच कर हजारो हजारो लोगो को इलाज करके मृत्यु से बचाया ! ये देख कर कर्नाटक सरकार ने अपनी डॉक्टरों की टीम राजीव भाई के पास भेजी और कहा कि जाकर देखो कि वो किस ढंग से इलाज कर रहे हैं !

(अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई के हेल्थ के लेक्चर सुन सकते हैं घंटो घंटो उन्होने स्वस्थ रहने और रोगो की चिकित्सा के व्याख्यान दिये है)

इसके इलावा राजीव भाई ने यूरोप और भारत की सभ्यता संस्कृति और इनकी भिन्नताओ पर गहरा अध्यन किया और लोगो को बताया कि कैसे भारतवासी यूरोप के लोगो की मजबूरी को अपना फैशन बना रहे है और कैसे उनकी नकल कर बीमारियो के शिकार हो रहे है !! राजीव भाई का कहना था कि देश मे आधुनिकीकरण के नाम पर पश्चिमीकरण हो रहा है ! और इसका एक मात्र कारण देश मे चल रहा अंग्रेज मैकॉले का बनाया हुआ indian education system है ! क्योकि आजाद भारत मे सारे कानून अंग्रेजो के चल रहे हैं इसीलिए ये मैकॉले द्वारा बनाया गया शिक्षा तंत्र भी चल रहा है !

राजीव भाई कहते थे कि इस अंग्रेज मैकॉले ने जब भारत का शिक्षा तंत्र का कानून बनाया और शिक्षा का पाठयक्रम तैयार किया तब इसने एक बात कही कि मैंने भारत का शिक्षा तंत्र ऐसा बना दिया है की इसमे पढ के निकलने वाला व्यक्ति शक्ल से तो भारतीय होगा पर अकल से पूरा अंग्रेज होगा ! उसकी आत्मा अंगेजों जैसी होगी उसको भारत की हर चीज मे पिछडापन दिखाई देगा !! और उसको अंग्रेज और अंग्रेजियत ही सबसे बढिया लगेगी !!

इसके इलावा राजीव भाई का कहना था कि इसी अंग्रेज मैकॉले ने भारत की न्याय व्यवस्था को तोड कर IPC, CPC जैसे कानून बनाये और उसके बाद ब्यान दिया की मैंने भारत की न्याय पद्धति को ऐसा बना दिया है कि इसमे किसी गरीब को इंसाफ नहीं मिलेगा ! सालों साल मुकदमे लटकते रहेंगे !! मुकदमो के सिर्फ फैंसले आएंगे न्याय नहीं मिलेगा !! इस अंग्रेज शिक्षा पद्धति और अँग्रेजी न्यायव्यवस्था के खिलाफ लोगो को जागरूक करने के लिए राजीव राजीव भाई ने मैकॉले शिक्षा और भारत की प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पर बहुत व्याख्यान दिये और इसके अतिरिक्त अपने एक मित्र आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता पवन गुप्ता जी के साथ मिल कर एक गुरुकुल की स्थापना की वहाँ वो फेल हुए बच्चो को ही दाखिल करते थे कुछ वर्ष उन बच्चो को उन्होने प्राचीन शिक्षा पद्धति से पढाया ! और बच्चे बाद मे इतने ज्ञानी हो गए की आधुनिक शिक्षा मे पढे बडे बडे वैज्ञानिक उनके आगे दाँतो तले उंगली दबाते थे !

राजीव जी ने रामराज्य की कल्पना को समझना चाहा ! इसके लिए वे भारत अनेकों साधू संतो,रामकथा करने वालों से मिले और उनसे पूछते थे की भगवान श्री राम रामराज्य के बारे क्या कहा है ?? लेकिन कोई भी उत्तर उनको संतुष्ट नहीं कर पाया ! फिर उन्होने भारत मे लिखी सभी प्रकार की रामायणों का अध्यन किया और खुद ये हैरान हुए कि रामकथा मे से भारत की सभी समस्याओ का समाधान निकलता है ! फिर राजीव भाई घूम घूम कर खुद रामकथा करने लगे और उनकी रामकथा सभी संत और बाबाओ से अलग होती वो सिर्फ उसी बात पर अधिक चर्चा करते जिसे अन्य संत तो बताते नहीं या वो खुद ही ना जानते है ! राजीव भाई लोगो को बताते कि किस प्रकार रामकथा मे भारत की सभी समस्याओ का समाधान निकलता है ! (इस बारे मे अधिक जानकारी के लिए आप राजीव भाई की रामकथा वाला व्याख्यान सुन सकते हैं)

2009 मे राजीव भाई बाबा रामदेव के संपर्क मे आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओ और उनके समाधानो से परिचित करवाया और विदेशो मे जमा कालेधन आदि के विषय मे बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढाने का फैसला किया !! आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव भाई के इस निर्णय से सहमत नहीं थे !! फिर भी राजीव भाई ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नीव रखी !! जिसका मुख्य उदेश्य लोगो को अपनी विचार धारा से जोडना, उनको देश की मुख्य समस्याओ का कारण और समाधान बताना !! योग और आयुर्वेद से लोगो को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड कर 2014 मे देश से अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उदेश्य भारत मे चल रही अँग्रेजी व्यवस्थाओ को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशो मे जमा काला धन वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य मे कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था !!

राजीव भाई के व्याख्यान सुन कर मात्र ढाई महीने मे 6 लाख कार्यकर्ता पूरे देश मे प्रत्यक्ष रूप मे इस अंदोलन से जुड गए थे राजीव भाई पतंजलि मे भारत स्वाभिमान के कार्यकर्ताओ के बीच व्याख्यान दिया करते थे जो पतंजलि योगपीठ के आस्था चैनल पर के माध्यम से भारत के लोगो तक पहुंचा करते थे इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से भारत स्वाभिमान अंदोलन के साथ 3 से 4 करोड लोग जुड गए थे ! फिर राजीव भाई भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रतिनिधि बनकर पूरे भारत की यात्रा पर निकले गाँव-गाँव शहर-शहर जाया करते थे पहले की तरह व्याख्यान देकर लोगो को भारत स्वाभिमान से जुडने के लिए प्रेरित करते थे !!

लगभग आधे भारत की यात्रा करने के बाद राजीव भाई 26 नवंबर 2010 को उडीसा से छतीसगढ राज्य के एक शहर रायगढ पहुंचे वहाँ उन्होने 2 जन सभाओ को आयोजित किया ! इसके पश्चात अगले दिन 27 नवंबर 2010 को जंजगीर जिले मे दो विशाल जन सभाए की इसी प्रकार 28 नवंबर बिलासपुर जिले मे व्याख्यान देने से पश्चात 29 नवंबर 2010 को छतीसगढ के दुर्ग जिले मे पहुंचे ! उनके साथ छतीसगढ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे ! दुर्ग जिले मे उनकी दो विशाल जन सभाए आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा मे सुबह 10 बजे से दोपहर 1 बजे तक थी! राजीव भाई ने विशाल जन सभा को आयोजित किया !! इसके बाद का कार्यक्रम साय 4 बजे दुर्ग मे था !! जिसके लिए वह दोपहर 2 बजे बेमेतरा तहसील से रवाना हुए !

(इसके बात की घटना विश्वास योग्य नहीं है इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छतीसगढ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियो द्वारा बताई गई है)

उन लोगो का कहना है गाडी मे बैठने के बाद उनका शरीर पसीना पसीना हो गया ! दयासागर ने राजीव जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोडी गैस सीने मे चढ गई है शोचालय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा ! फिर दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम मे ले गए वहाँ राजीव भाई शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज मे कहा गाडी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ ! जब काफी देर बाद राजीव भाई बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव भाई पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे ! उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिडका गया दयासागर ने उनको अस्पताल चलने को कहा ! राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे !

थोडी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाइयाँ दी ! फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई के सेक्टर 9 मे इस्पात स्वयं अस्पताल मे भर्ती किया गया ! इस अस्पताल मे अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको Apollo BSR मे भर्ती करवाया गया ! राजीव भाई एलोपेथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे ! उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल मे भर्ती नहीं होना चाहते थे ! उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपेथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू ? ! ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु मे भर्ती होने को कहा !

फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण मे आईसीयु भर्ती करवाएगे !! उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हे मृत घोषित किया !!

(बेमेतरा तहसील से रवाना होने के बाद की ये सारी घटना राज्य प्रभारी दयासागर और अन्य अधिकारियों द्वारा बताई गई है अब ये कितनी सच है या झूठ ये तो उनके नार्को टेस्ट करने ही पता चलेगा !!)

क्योकि राजीव जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया ! 30 नवंबर को उनके मृत शरीर को पतंजलि, हरिद्वार लाया गया जहां हजारो की संख्या मे लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे ! और 1 दिसंबर राजीव जी का दाह संस्कार कनखल हरिद्वार मे किया गया !!

राजीव भाई के चाहने वालों का कहना है कि अंतिम समय मे राजीव जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड गया था ! उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्ट्म नहीं करवाया गया !! राजीव भाई की मौत लगभग भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत से मिलती जुलती है आप सबको याद होगा ताशकंद से जब शास्त्री जी का मृत शरीर लाया गया था तो उनके भी चेहरे का रंग नीला, काला पड गया था !! और अन्य लोगो की तरह राजीव भाई भी ये मानते थे कि शास्त्री जी को विष दिया गया था !! राजीव भाई और शास्त्री जी की मृत्यु मे एक जो समानता है कि दोनों का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था !!

राजीव भाई की मृत्यु से जुडे कुछ सवाल !!

किसके आदेश पर ये प्रचारित किया गया ? कि राजीव भाई की मृत्यु दिल का दौरा पडने से हुयी है ?

29 नवंबर दोपहर 2 बजे बेमेतरा से निकलने के पश्चात जब उनको गैस की समस्या हुए और रात 2 बजे जब उनको मृत घोषित किया गया इसके बीच मे पूरे 12 घंटे का समय था 12 घंटे मे मात्र एक गैस की समस्या का समाधान नहीं हो पाया ??

आखिर पोस्ट मार्टम करवाने मे क्या तकलीफ थी ??

राजीव भाई का फोन जो हमेशा आन रहता था उस 2 बजे बाद बंद क्यों था ??

राजीव भाई के पास एक थैला रहता था जिसमे वो हमेशा आयुर्वेदिक, होमियोपैथी दवाएं रखते थे वो थैला खाली क्यों था ??

30 नवंबर को जब उनको पतंजलि योगपीठ मे अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था उनके मुंह और नाक से क्या टपक रहा था उनके सिर को माथे से लेकर पीछे तक काले रंग के पालिथीन से क्यूँ ढका था ?

राजीव भाई की अंतिम विडियो जो आस्था चैनल पर दिखाई गई तो उसको एडिट कर चेहरे का रंग सफेद कर क्यों दिखाया गया ?? अगर किसी के मन को चोर नहीं था तो विडियो एडिट करने की क्या जरूरत थी ??

अंत पोस्टमार्टम ना होने के कारण उनकी मृत्यु आजतक एक रहस्य ही बन कर रह गई !!

राजीव भाई के कई समर्थक उनके जाने के बाद बाबा रामदेव से काफी खफा है क्योंकि बाबा रामदेव अपने एक व्याख्यान मे कहा कि राजीव भाई को हार्ट ब्लोकेज था, शुगर की समस्या थी, बी.पी. भी था राजीव भाई पतंजलि योगपीठ की बनी दवा मधुनाशनी खाते थे ! जबकि राजीव भाई खुद अपने एक व्याख्यान मे बता रहे हैं कि उनका शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल सब नार्मल है !! वे पिछले 20 साल से डॉक्टर के पास नहीं गए ! और अगले 15 साल तक जाने की संभावना नहीं !!

और राजीव भाई के चाहने वालो का कहना है कि हम कुछ देर के लिए राजीव भाई की मृत्यु पर प्रश्न नहीं उठाते लेकिन हमको एक बात समझ नहीं आती कि पतंजलि योगपीठ वालों ने राजीव भाई की मृत्यु के बाद उनको तिरस्कृत करना क्यों शुरू कर दिया ??

मंचो के पीछे उनकी फोटो क्यों नहीं लगाई जाती ??

आस्था चैनल पर उनके व्याख्यान दिखाने क्यों बंद कर दिये गए ?? कभी साल अगर उनकी पुण्यतिथि पर व्याख्यान दिखाये भी जाते है तो वो भी 2-3 घंटे के व्याख्यान को काट काट कर एक घंटे का बनाकर दिखा दिया जाता है !!

इसके अतिरिक्त उनके कुछ समर्थक कहते हैं कि भारत स्वाभिमान आंदोलन की स्थापना जिस उदेश्य के लिए हुए थी राजीव भाई की मृत्यु के बाबा रामदेव उस राह हट क्यों गए ?

राजीव भाई और बाबा खुद कहते थे कि सब राजनीतिक पार्टियां एक जैसी है हम 2014 मे अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नया राजनीतिक विकल्प देंगे ! लेकिन राजीव भाई की मृत्यु के बाद बाबा रामदेव ने भारत स्वाभिमान के आंदोलन की दिशा बदल दी और राजीव की सोच के विरुद्ध आज वो भाजपा सरकार का समर्थन कर रहें !! इसलिए ब

Friday, 29 November 2019

12:59

29 नवंबर हमारे रियल हीरो सेवाव्रती ठक्कर बापा जी के जन्म दिवस पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
पूजा का अर्थ एकान्त में बैठकर भजन करना मात्र नहीं है। निर्धन और निर्बल, वन और पर्वतों में रहने वाले अपने भाइयों की सेवा करना भी पूजा ही है। अमृतलाल ठक्कर ने इसे अपने आचरण से सिद्ध कर दिखाया। उनका जन्म 29 नवम्बर, 1869 को भावनगर (सौराष्ट्र, गुजरात) में हुआ था। उनके पिता श्री विट्ठलदास ठक्कर धार्मिक और परोपकारी व्यक्ति थे। यह संस्कार अमृतलाल जी पर भी पड़ा और उन्हें सेवा में आनन्द आने लगा।

शिक्षा के बाद उन्हें पोरबन्दर राज्य में अभियन्ता की नौकरी मिली। वे रेल विभाग के साथ तीन साल के अनुबन्ध पर युगांडा गये। वहाँ से लौटे तो उनके क्षेत्र में दुर्भिक्ष फैला हुआ था। यह देखकर उनसे रहा नहीं गया और वे इनकी सेवा में जुट गयेे। यहीं से उनका नाम ‘ठक्कर बापा’ पड़ गया।

इसके बाद उन्होंने मुम्बई नगर निगम में काम किया। इस पद पर रहते हुए उन्हें सफाईकर्मियों के लिए उल्लेखनीय कार्य किये। 1909 में पत्नी के देहान्त के बाद निर्धनों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वे मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में बसे वनवासियों के बीच काम करने लगे।

यह काम करते समय उन्होंने देखा कि वहाँ विदेशों से आये मिशनरियों ने विद्यालय, चिकित्सालय आदि खोल रखे थे; पर वे वनवासियों की अशिक्षा, निर्धनता, अन्धविश्वास आदि का लाभ उठाकर उन्हें हिन्दू से ईसाई बना रहे थे। बापा ने इस दुश्चक्र को तोड़ने का निश्चय कर लिया। इसके लिए वे हरिकृष्ण देव के साथ ‘भारत सेवक समाज’ में सम्मिलित हो गये।

उन्होंने गांधी जी, गोपाल कृष्ण गोखले, देवधर दादा, सुखदेव भाई और श्रीनिवास शास्त्री के साथ भी काम किया; पर राजनीतिक कार्य उनके अनुकूल नहीं थे। इसलिए वे उधर से मन हटाकर पूरी तरह वनवासियों के बीच काम करने लगे। 1914 में मुंबई नगर निगम की स्थायी नौकरी छोड़कर वे ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी’ के माध्यम से पूरे समय काम में लग गये।

1920 में उड़ीसा के पुरी जिले में बाढ़ के समय ठक्कर बापा ने लम्बे समय तक काम किया। 1946 में नोआखाली में मुस्लिम गुंडो द्वारा किये गये हिन्दुओं के नरसंहार के बाद वहां जाकर भी उन्होंने सेवाकार्य किये। वे जिस काम में हाथ डालते, उसका गहन अध्ययन कर विभिन्न पत्रों में लेख लिखकर जनता से सहयोग मांगते थे। उनकी प्रतिष्ठा के कारण भरपूर धन उन्हें मिलता था। इसका सदुपयोग कर वे उसका ठीक हिसाब रखते थे।

ठक्कर बापा जहाँ भी जाते थे, वहाँ तात्कालिक समस्याओं के निदान के साथ कुछ स्थायी कार्य भी करते थे, जिससे उस क्षेत्र के लोगों का जीवन उन्नत हो सके। विद्यालय, चिकित्सालय और आश्रम इसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम थे। उन्होंने अनेक स्थानों पर प्रचलित बेगार प्रथा के विरोध में आन्दोलन चलाए। स्वतन्त्रता के बाद जब असम में भूकम्प आया, तब वहाँ के राज्यपाल के आग्रह पर अपने सहयोगियों के साथ वहाँ जाकर भी उन्होंने सेवा कार्य किये।

1932 में गांधी जी के आग्रह पर वे ‘हरिजन सेवक संघ’ के मंत्री बने। श्री घनश्याम दास बिड़ला ने इसका अध्यक्ष पद इसी शर्त पर स्वीकार किया कि ठक्कर बापा इसके मंत्री होंगे। बापा ने भील सेवा मंडल, अन्त्यज सेवा मंडल आदि संस्थाएं बनाकर इन वर्गों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति सुधारने के प्रयास किये। उन्हें सेवा कार्य में ही आनंद आता था। देश में कहीं भी, कैसी भी सेवा की आवश्यकता हो, वे वहां जाने को सदा तत्पर रहते थे।

19 जनवरी, 1951 को भावनगर में अपने परिजनों के बीच महान सेवाव्रती ठक्कर बापा का देहांत हुआ।

Thursday, 28 November 2019

10:09

28 नवंबर के हमारे रियल हीरो महान आत्मा ठाकुर गुरु जन सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
विश्व हिन्दू परिषद में कार्यरत वरिष्ठतम प्रचारक ठाकुर गुरजन सिंह का जन्म मार्गशीर्ष कृष्ण 13 (20 नवम्बर, 1918) को ग्राम खुरहुंजा (जिला चंदौली, उ.प्र.) में श्री शिवमूरत सिंह के घर में हुआ था। उनका मूल नाम दुर्जन सिंह था; पर सरसंघचालक श्री गुरुजी ने उसे गुरजन सिंह कर दिया।

बनारस के जयनारायण इंटर काॅलिज में उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई; पर उनकी पढ़ने में कुछ विशेष रुचि नहीं थी। उनके कुछ परिजन ‘शीला रंग कंपनी’   नामक उद्योग चलाते थे। अतः वे भी वहीं काम करने लगे। इसी दौरान वे वहां पास के एक अहाते में लगने वाली शाखा में जाने लगे। जब भाऊराव देवरस ने अपना केन्द्र काशी बनाया, तो दोनों अच्छे मित्र बन गये। दोनों एक ही साइकिल पर दिन भर शाखा विस्तार के लिए घूमते रहते थे। जब पूरा दिन इसमें लगने लगा, तो उन्होंने नौकरी छोड़नी चाही; पर उद्योग के मालिक उनके व्यवहार से इतने प्रभावित थे कि कई वर्ष तक उन्हें बिना काम के ही वेतन देते रहे।

1948 के प्रतिबंध के समय पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जेल में उनके साथ भाऊराव देवरस, अशोक सिंहल, दत्तराज कालिया आदि भी थे। प्रतिबंध समाप्ति के बाद गुरुजन जी अपना पूरा समय संघ के काम में ही लगाने लगे। वे 1955-56 में काशी के नगर कार्यवाह थे। इसके कुछ वर्ष बाद वे जिला प्रचारक तथा 1964 में काशी में ही विभाग प्रचारक बनाये गयेे।

गुरुजन सिंह जी का विवाह बालपन में ही हो गया था; पर संघ कार्य के बीच वे घर की ओर ध्यान ही नहीं दे पाते थे। जब उनके एकमात्र पुत्र का विवाह हुआ, तो सब व्यवस्था अन्य लोगों ने ही की। जब बारात चलने वाली थी, तब ही वे पहुंच सके। क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से उनके बहुत अच्छे संबंध थे। शचीन्द्र जी की बीमारी में गुरुजन जी ने उनकी बहुत सेवा की। सुभाष चंद्र बोस के काशी प्रवास में कोई कांग्रेसी उन्हें अपने घर ठहराने को तैयार नहीं था। ऐसे में गुरुजन सिंह जी के प्रयास से पहले रामकृष्ण आश्रम और फिर कांग्रेस के ही एक कार्यकर्ता शिवप्रसाद जी ने उन्हें अपने घर ठहराया।

गुरुजन सिंह जी ने ‘भारतीय किसान संघ’ की स्थापना से पूर्व 1971 से 78 तक स्वयंप्रेरणा से किसानों में काम किया। आपातकाल में वे साधुवेश में लगातार घूमते रहे। 1979 में प्रयागराज में हुए ‘द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन’ की व्यवस्थाओं के वे आधार स्तम्भ थे। इसके बाद तो फिर वे वि.हि.प. के काम में ही लगे रहे। संगम स्नान और गोसेवा के प्रति उनकी भक्ति अटूट थी।

गुरुजन जी सरलता की प्रतिमूर्ति थे। खादी का मोटा कुर्ता और धोती उनकी स्थायी वेशभूषा थी। वे किसी से पैर नहीं छुआते थे। कार्यालय पर आये अतिथि को वे स्वयं खाना बनाकर खिलाते थे। आयुर्वेद तथा प्राकृतिक चिकित्सा के उनके अनुभवसिद्ध ज्ञान का बहुतों ने लाभ उठाया। श्री गुरुजी का उन पर बहुत प्रेम था। वे अपना कमंडलु किसी को नहीं देते थे। जब वह कुछ खराब हुआ, तो उसकी मरम्मत के लिए उन्होंने वह गुरुजन जी को ही सौंपा।

गुरुजन सिंह जी का हृदय बहुत विशाल था। काशी में संघ कार्यालय के सामने बैठने वाले एक गरीब व अशक्त मुसलमान को वे प्रतिदिन भोजन कराते थे। इसी कारण श्री गुरुजी उन्हें ‘महात्मा’ कहते थे। गुरुजन सिंह जी की मेज पर सदा उनके आध्यात्मिक गुरु श्री सीताराम आश्रम तथा दादा गुरु दिगम्बरी संत श्री भास्करानंद जी महाराज के चित्र तथा अपने गुरुजी से प्राप्त ‘श्रीरामचरितमानस’ रहती थी। वे प्रतिदिन मानस का पारायण कर ही सोते थे।

वर्ष 2001 से उनका निवास प्रयाग में ‘महावीर भवन’ ही था। वे प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा से सदा दूर रहते थे। 20 नवम्बर, 2013 को 95 वर्ष पूरे होने पर उनकी अनिच्छा के बावजूद कार्यकर्ताओं ने यज्ञ एवं पूजा आदि की, पर उसके एक सप्ताह बाद 28 नवम्बर को ही उनका देहावसान हो गया।
10:03

28 नवंबर हमारे रियल हीरो जयपुर फुट के निर्माता डॉ प्रमोद करण सेठी जी के जन्म दिवस पर विशेष रिपोर्ट



के सी शर्मा*
यदि किसी व्यक्ति का कोई अंग जन्म से न हो, या किसी दुर्घटना में वह अपंग हो जाए, तो उसकी पीड़ा समझना बहुत कठिन है। अपने आसपास हँसते-खेलते, दौड़ते-भागते लोगों को देखकर उसका मन में भी यह सब करने की उमंग उठती है; पर शारीरिक विकलांगता के कारण वह यह कर नहीं सकता।

पैर से विकलांग हुए ऐसे लोगों के जीवन में आशा की तेजस्वी किरण बन कर आये डा. प्रमोद करण सेठी, जिन्होंने ‘जयपुर फुट’ का निर्माण कर हजारों विकलांगों को चलने योग्य बनाया तथा वैश्विक ख्याति प्राप्त की।
डा. सेठी का जन्म 28 नवम्बर, 1927 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक थे। अतः पढ़ने-लिखने का वातावरण उन्हें बचपन से ही मिला। प्रारम्भिक शिक्षा पूर्णकर उन्होंने सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा से 1949 में चिकित्सा स्नातक और फिर 1952 में परास्नातक की उपाधि प्राप्त की।

यों तो एक चिकित्सक के लिए यह डिग्रियाँ बहुत होती हैं; पर डा. सेठी की शिक्षा की भूख समाप्त नहीं हुई। उनकी रुचि शल्य चिकित्सा में थी, अतः उन्होंने विदेश का रुख किया और एडिनबर्ग के रॉयल मैडिकल कॉलिज ऑफ सर्जन्स में प्रवेश ले लिया। 1954 में यहाँ से एफ.आर.सी.एस. की उपाधि लेकर वे भारत लौटे और राजस्थान में जयपुर के सवाई मानसिंह चिकित्सा महाविद्यालय में शल्य क्रिया विभाग में प्राध्यापक बन गये।

1982 तक डा. सेठी इसी महाविद्यालय में काम करते रहे। इसके साथ ही उन्होंने सन्तोखबा दुरलाभजी स्मृति चिकित्सालय में अस्थियों पर विस्तृत शोध किया। इससे दूर-दूर तक उनकी ख्याति एक अस्थि विशेषज्ञ के रूप में हो गयी। जब डा. सेठी किसी पैर से अपंग व्यक्ति को देखते थे, तो उनके मन में बड़ी पीड़ा होती थी। अतः वे ऐसे कृत्रिम पैर के निर्माण में जुट गये, जिससे अपंग व्यक्ति भी स्वाभाविक रूप से चल सके।

धीरे-धीरे उनकी साधना रंग लाई और वे ऐसे पैर के निर्माण में सफल हो गये। उन्होंने इसेे ‘जयपुर फुट’ नाम दिया। कुछ ही समय में पूरी दुनिया में यह पैर और इसके निर्माता डा. सेठी का नाम विख्यात हो गया। इससे पूर्व लकड़ी की टाँग का प्रचलन था। इससे व्यक्ति पैर को मोड़ नहीं सकता था; पर जयपुर फुट में रबड़ का ऐसा घुटना भी बनाया गया, जिससे पैर मुड़ सकता था। थोड़े अभ्यास के बाद व्यक्ति इससे स्वाभाविक रूप से चलने लगता था और देखने वाले को उसकी विकलांगता का पता ही नहीं लगता था। इससे उसके आत्मविश्वास में बहुत वृद्धि होती थी।

जयपुर फुट का प्रयोग दुनिया के कई प्रमुख लोगों ने किया। इनमें भारत की प्रसिद्ध नृत्यांगना सुधा चन्द्रन भी है। एक फिल्म निर्माता ने उसकी अपंगता और फिर से कुशल नर्तकी बनने की कहानी को फिल्म ‘नाचे मयूरी’ के माध्यम से पर्दे पर उतारा। इससे डा. सेठी का नाम घर-घर में पहचाना जाने लगा।

इसके बाद भी उन्होंने विश्राम नहीं लिया। वे विकालांगों के जीवन को और सुविधाजनक बनाने के लिए इसमें संशोधन करते रहे। डा0 सेठी की इन उपलब्धियों के कारण उन्हें डा. बी.सी.राय पुरस्कार, रेमन मैगसेसे पुरस्कार, गिनीज पुरस्कार आदि अनेक विश्वविख्यात सम्मानों से अलंकृत किया गया।

लाखों विकलांगों के जीवन में नया उजाला भरने वाले डा. प्रमोद करण सेठी का निधन 6 जनवरी, 2008 को हुआ।