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Thursday, 20 May 2021

01:48

जाने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जीवन गाथा अरुण सिंह की जुबानी

आखिर कौन थे 
सम्राट पृथ्वीराज चौहान 

पुरा नाम :-          पृथ्वीराज चौहान 
अन्य नाम :-         राय पिथौरा 
माता/पिता :-       राजा सोमेश्वर चौहान/कमलादेवी
पत्नी :-               संयोगिता
जन्म :-               1149 ई.  
राज्याभिषेक :-     1169 ई.   
मृत्यु :-                1192 ई. 
राजधानी :-          दिल्ली, अजमेर
वंश :-                 चौहान (राजपूत)

आज की पिढी इनकी वीर गाथाओ के बारे मे..
 बहुत कम जानती है..!! 
तो आइए जानते है.. #सम्राट #पृथ्वीराज #चौहान से जुडा इतिहास एवं रोचक तथ्य,,,

''(1)  प्रथ्वीराज चौहान ने 12 वर्ष कि उम्र मे बिना किसी हथियार के खुंखार जंगली शेर का जबड़ा फाड़ 
ड़ाला था ।

(2) पृथ्वीराज चौहान ने 16 वर्ष की आयु मे ही
 महाबली नाहरराय को युद्ध मे हराकर माड़वकर पर विजय प्राप्त की थी।

(3) पृथ्वीराज चौहान ने तलवार के एक वार से जंगली हाथी का सिर धड़ से अलग कर दिया था ।

(4) महान सम्राट प्रथ्वीराज चौहान कि तलवार का वजन 84 किलो था, और उसे एक हाथ से चलाते थे ..सुनने पर विश्वास नहीं हुआ होगा किंतु यह सत्य है.. 

(5) सम्राट पृथ्वीराज चौहान पशु-पक्षियो के साथ बाते करने की कला जानते थे। 

(6) महान सम्राट पुर्ण रूप से मर्द थे ।
 अर्थात उनकी छाती पर स्तंन नही थे  ।

(8) प्रथ्वीराज चौहान 1166 ई.  मे अजमेर की गद्दी पर बैठे और तीन वर्ष के बाद यानि 1169 मे दिल्ली के सिहासन पर बैठकर पुरे हिन्दुस्तान पर राज किया।

(9) सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तेरह पत्निया थी। 
इनमे संयोगिता सबसे प्रसिद्ध है..

(10) पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को 16 बार युद्ध मे हराकर जीवन दान दिया था..
और 16 बार कुरान की कसम का खिलवाई थी ।

(11) गौरी ने 17 वी बार मे चौहान को धौके से बंदी बनाया और अपने देश ले जाकर चौहान की दोनो आँखे फोड दी थी ।
उसके बाद भी राजदरबार मे पृथ्वीराज चौहान ने अपना मस्तक नहीं झुकाया था।

(12) महमूद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर  अनेको प्रकार की पिड़ा दी थी और कई महिनो तक भुखा रखा था.. 
फिर भी सम्राट की मृत्यु न हुई थी ।

(13) सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी की...
जन्मसे शब्द भेदी बाण की कला ज्ञात थी।
जो की अयोध्या नरेश "राजा दशरथ" के बाद..
 केवल उन्ही मे थी। 

(14) पृथ्वीराज चौहान ने महमुद गौरी को उसी के भरे दरबार मे शब्द भेदी बाण से मारा था ।
 गौरी को मारने के बाद भी वह दुश्मन के हाथो नहीं मरे.. 
 अर्थार्त अपने मित्र चन्द्रबरदाई के हाथो मरे, दोनो ने एक दुसरे को कटार घोंप कर मार लिया.. क्योंकि और कोई विकल्प नहीं था ।

दुख होता है ये सोचकर कि वामपंथीयो ने इतिहास की पुस्तकों में टीपुसुल्तान, बाबर, औरँगजेब, अकबर जैसे हत्यारो के महिमामण्डन से भर दिया और पृथ्वीराज जैसे योद्धाओ को नई पीढ़ी को पढ़ने नही दिया बल्कि इतिहास छुपा दिया मैं अरुण सिंह चौहान सरकारों से व् उत्तर प्रदेश की सरकार से मांग करता हूँ कि पूर्वजों के इतिहास को ज्यादा से ज्यादा किताबों में पड़या जाए और चोर लुटेरों को इतिहास से मिटाया जाए 

अरुण सिंह चौहान भारतीय करणी सेना

Saturday, 15 May 2021

08:10

महान क्रांतिकारी सुखदेव थापर के बलिदान से युवाओं को लेनी चाहिए प्रेरणा-अमन मयंक शर्मा

बदायूँ /गोविंद राणा/गौरव क्लब एवं बदायूँ गौरव महोत्सव समिति के संयुक्त तत्वाधान में ऑनलाइन गोष्ठी आयोजित कर महान क्रांतिकारी सुखदेव की जयंती मनाई गई।ऑनलाइन गोष्ठी को संबोधित करते हुए बदायूँ गौरव क्लब के मुख्य सचिव एवं बदायूँ गौरव महोत्सव के मुख्य संयोजक अमन मयंक शर्मा ने कहा कि सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को हुआ था।उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत माता की सेवा में अर्पित कर दिया।23 मार्च 1931 को भगत सिंह एवं राजगुरु के साथ उन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए अपनी कुर्बानी दे दी।ऑल इंडिया आर्टिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हिलाल बदायूँनी ने कहा कि आज युवा पीढ़ी को सुखदेव थापर के बलिदान से प्रेरणा लेनी चाहिए।बदायूँ गौरव क्लब के संरक्षक अशोक सक्सेना ने कहा कि सुखदेव थापर जैसे महान क्रांतिकारियों के बलिदान से ही देश आजाद हुआ।ऑनलाइन गोष्ठी में बदायूँ गौरव क्लब के सहसचिव गौरव पाठक,रितेश उपाध्याय, विभांशु दत्त,असरार अहमद,ऋतुराज खुसारिया,आस मोहम्मद,निशांत पाठक,अहमद अमजदी,संजय सक्सेना सहित दर्जनों प्रबुध्द नागरिक उपस्थित रहे।

Wednesday, 5 May 2021

08:52

महानतम क्रांतिकारी कार्ल मार्क्स :मुनेश त्यागी


दुनिया के महानतम क्रांतिकारी कार्ल मार्क्स का मृत्यु दिवस १४ मार्च १८८३ है. उनका जन्म ५,मई १८१८ को ट्रीयर, जर्मनी में यहूदी परिवार में हुआ था। उनकी जन्मशताब्दि की २०० वीं वर्षगांठ पूरी दुनिया में मनायी  जा रही है। कार्ल मार्क्स दुनिया के महानतम क्रांतिकारियों में से एक हैं । मार्क्स  के विचारों के बाद दुनिया की चिंतन पद्धति ही बदल गई। 
     कार्ल मार्क्स ने दुनिया में फैले शोषण, अत्याचार अन्याय और जुल्म की पोल खोल दी और दुनिया को बताया यह शोषण, अत्याचार,  जुल्म और भेदभाव खत्म किए जा सकते हैं और किसी देश की किसानों मजदूरों की सरकार जनता की सरकार इनको खत्म कर सकती है। तभी से दुनिया के पूंजिपति, सामंत और संपत्तिवान वर्ग कार्ल मार्क्स से और उनके विचारों से नफरत और घृणा करने लगे। मगर कार्ल मार्क्स के विचारों की व्यापकता और गहनता देखिए कि दुनिया का कोई ऐसा कोना नहीं है, ऐसा देश नहीं है, जहां कार्ल मार्क्स के विचारों की दुनिया कायम करने की जद्दोजहद जारी नहीं हो। एक तरफ कार्ल मार्क्स को सबसे ज्यादा गालियां दी जाती है, भला बुरा कहा जाता है तो वहीं दूसरी तरफ कार्ल मार्क्स की दुनिया में सबसे ज्यादा इज्जत की जाती है मान सम्मान दिया जाता है उसे मुक्ति का मसीहा समझा जाता है जनता की आवाज समझा जाता है और तमाम दुनिया की समस्याओं का मुक्तिदाता समझा जाता है। आइए जानें कि मार्क्स क्या कहते और चाहते थे,,,,,,
   १.मार्क्स  ने बताया की वर्गसंघर्ष की उत्पत्ति के बाद, मनुष्य का अभी तक का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है यानी यहां दो  वर्ग हैं,  एक लुटेरा वर्ग है, एक लुटने वाला वर्ग। एक मालिक वर्ग है, दूसरा मजदूर वर्ग है मेहनतकशों का वर्ग है।पहला वर्ग  दूसरे को लूटता आया है और  यह  लूट समाजवादी समाज के आने तक जारी रहेगी।
    २.मार्क्स  ने आगे कहा कि  सर्वहारा  की सत्ता यानी कि मजदूर-वर्ग  की सत्ता और और सरकार ही अभी तक के शोषण,अन्याय ,भेदभाव और  गैरबराबरी को दूर कर सकती है ।सत्ता पर कब्जा किए बिना मजदूर वर्ग और किसान वर्ग का और आम जनता का कल्याण नहीं हो सकता ।
    ३.उन्होंने आगे कहा की साम्यवादी व्यवस्था कायम  करके ही मानवता का कल्याण हो सकता है जिसमें न वर्ग रहेंगे और ना राज रहेगा यानि जो वर्ग-विहीन और राज्य-विहीन होगी  यानी इसमें सब का राज होग, ना कोई शासित होगा, ना कोई शासक होगा, ना कोई शोषण करने वाला होगा, ना किसी का शोषण होगा। सब लोग काम करेंगे। किसी को काम करने के अधिकार से छूट नहीं मिलेगी। जो काम करेगा वही रोटी खाएगा। उन्होंने बताया कि अभी तक का समाज आदिम  साम्यवाद, गुलाम समाज, सामंती समाज, पूंजीवाद समाज रहा है। इसके बाद समाजवादी व्यवस्था आयेगी  और जब पूरी दुनिया में  समाजवादी व्यवस्था कायम हो जायेगी तो उसके बाद  साम्यवाद की व्यवस्था वाला समाज होगा।
     ४. उन्होंने नारा दिया था कि दुनिया भर के मजदूरों एक हो। यानी कि जब तक दुनिया के पैमाने पर मजदूरों, किसानों और मेहनत कशों कि सत्ता कायम न हो जाएगी, तब तक काम  चलने वाला नहीं है। इसलिए मनुष्य को अंतरराष्ट्रीयतावादी होना चाहिए। उसकी सोच पूरी दुनिया के कल्याण की होनी चाहिए ।मार्क्स  की यह  बहुत बड़ी देन है।
     ५. मार्क्स ने आगे बताया क धर्म एक  अफीम है। यह एक नशा है जिसमें दबे कुचले लोगों को अपना दुख दुख दर्द भुलाने में मदद मिलती है धर्म उन्हें दबाने  और उनका शोषण करने में मदद करता है। मार्क्स ने कहा था कि "धर्म दबे कुचले लोगों के लिए राहत है, हृदयविहीन दुनिया के लोगों का हृदय है और आत्महीनों की आत्मा है, यह जनता की अफीम है।" मार्क्स  की यह  बात आज भी उतनी ही सही है जितनी कि यह कहे जाने के समय थी।
       मार्क्स के विचार यानी मार्क्सवाद मानव मुक्ति का सूत्र है, मनुष्य के कल्याण का विज्ञान है। "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" जिसे मार्क्स और ऐंगेल्स  में मिलकर लिखा था, दुनिया के कम्युनिस्टों की बाईबिल है।मार्क्सवाद वैज्ञानिक समाजवाद की बात करता है। मार्क्स के द्वारा लिखी गई किताब "पूंजी" दुनिया भर में प्रसिद्ध है जो पूंजीवादी शोषण की पोल खोलती है।  मार्क्स ने 18 64 में अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ की स्थापना में अपनी महती भूमिका अदा की और इसमें योगदान दिया।
     उनका जीवन भयानक आर्थिक कष्टों और संकटों  में बीता। 6 संतानों में तीन बच्चियां ही जीवित रही। उनके तीन  बच्चे तो दवाई  के अभाव में ही दम तोड़ गए थे क्योंकि मार्क्स  के पास उनके इलाज का पूरा  पैसा जुटाना संभव नहीं था।
       मार्क्सवाद की देन,,,,,,, उपरोक्त पांच सूत्र दुनिया को बेहतर बनाने की मशाल के रूप में काम कर रहे हैं। मार्कस के विचारों के बाद काम के घंटे निर्धारित किए गए, साप्ताहिक अवकाश मिलना शुरू हुआ, रिटायरमेंट होने पर पेंशन का आगाज हुआ, बाल श्रम पर प्रतिबंध लगा, शिक्षा बच्चों का पहला हक बना।
       यह बात अलग है कि आज पूंजीपतियों ने इकट्ठा होकर अपनी उस लूट को, उस हड़पने की नीति को और तेज कर दिया है और समाजवाद के बाद मिले तमाम हक अधिकारों को मजदूरों किसानों और जनता से छीन लिया है और आज हमारे देश को आज से 70 साल पहले वाली स्थिति में पहुंचा दिया है। मजदूरों ने लड़ झगड़कर बलिदान करके जो कुछ  हासिल किया था, पूंजीवादी निजाम ने उसे छीन लिया है और धीरे-धीरे छीन रहा है।
     मगर यह  मार्क्सवाद ही  है जो एक दिन पूंजीवाद के शासन का अंत करेगा, पूंजीवादी लूट को समाप्त करेगा और एक ऐसी दुनिया बन कर रहेगी जिसमें सबको रोटी मिलेगी, सबको रोजी  मिलेगी, सबको काम मिलेगा, सबको घर मिलेगा, सबको सुरक्षा मिलेगी, सबको स्वच्छ पानी और हवा मिलेगी,सबको शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा मुहैया करायी जायेगी। 
     यह व्यवस्था  मार्क्सवादी विचारों की दुनिया  कायम होने पर ही हो सकता है ।यहां पर आकर मार्क्स दुनिया के सबसे बड़े विचारक और दार्शनिक बनकर  हमारे सामने आते हैं और वह अपने विचारों में आज भी जिंदा है। यह मार्क्स ही है जिन्होंने कहा था कि पूंजीवाद अपने आप में एक संकटग्रस्त व्यवस्था है जो मानव को शोषण, अन्याय, हिंसा, भेदभाव, असमानता और असुरक्षा से मुक्ति नहीं दिला सकती।  
    आज हम देख रहे हैं कि जब तक मार्क्स के विचारों की दुनिया कायम नही की जाती, तब तक दुनिया में अमन, सुरक्षा, न्याय, समता ,समानता,जनतंत्र ,गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैश्विकभाईचारा कायम नही हो  सकता है ।
      मार्क्स दुनिया के सबसे बड़े दार्शनिक बनकर हमारे सामने आते हैं जब वे समता, समानता, जनतंत्र और आदमी के साम्य की बात करते हैं। वे कहते हैं कि "इस दुनिया की अनेक दार्शनिकों और वितारकों ने व्याख्या की है, मगर असली सवाल इसे बदलने का है।"
     उन्होंने दर्शन की दरिद्रता की बात की है। उन्होंने दरिद्रता के समूल विनाश की बात की है। कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में मार्क्स और ऐंगेल्स ने कहा है कि "ओ मजदूरों तुम्हारे पैरों में जंजीरें बंधी हुई हैं, तुम्हारे पास अपनी जंजीरों के खोने के लिए कुछ भी नही है! दुनिया के मेहनतकशों एक हों।"
      मार्क्स का जीवन और दर्शन एक आदमी के बिना अधूरा ही रह जाता है और वह है फ्रेड्रिक ऐंगेल्स, जो उनके सह लेखक और आजीवन दोस्त रहे हैं। मार्क्सवाद ऐंगेल्स के बिना पूरा नही हो सकता। हम कह सकते हैं कि यदि ऐंगेल्स न होते तो मार्क्सवाद भी न होता। ऐंगेल्स ने सदा ही मार्क्स के परिवार की आर्थिक और मनोवैज्ञानिक और लेखकीय मदद की। 
       मार्क्स की पत्नी जैनी मार्क्स के बिना भी मार्क्स की दुनिया अधूरी ही कही जायेगी क्योंकि यह जैनी ही थीं जो मार्क्स की विपन्नता और दुरसमय में मार्क्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडी रहीं, बिना दवाईयों के अपने तीन बच्चों दो लडकों और एक लडकी को मौत के मुंह में समाते देखती रहीं, मगर मार्क्स के मुक्तिकारी और ऐतिहासिक काम में रोडा न अटकाया। 
       मार्क्स के विचारों की सर्वव्यापी विराटता देखिये कि दुनिया का कोई कोना नही है, दुनिया का कोई देश नही है जहां मार्क्स के विचारों ने दस्तक न दी हो। दुनिया का कौनसा शाषकवर्ग है जो पिछले डेढ सौ सालों में प्रभावित न हुआ हो और दुनिया का कौनसा देश है जहां कम्युनिस्ट पार्टियां मजदूरों, किसानों, छात्रों नौजवानों महिलाओं की, आदिवासियों की मुक्ति की लड़ाई न लड रही हों। 
    यही मार्क्स की विराटता और महानता है कि मार्क्स आज भी दुनिया के सबसे बड़ा क्रांतिकारी विचारक, दार्शनिक और लेखक बने हुए हैं। मार्क्स के साथ साथ हम ऐंगेल्स और लेनिन के क्रांतिकारी योगदान को नही भूल सकते हैं।
     यह महान लेनिन ही थे कि जिन्होंने 1917 में मार्क्स के विचारों को धरती पर उतारा और दुनिया में पहली समाजवादी क्रांति की और दुनिया में एक नए युग की यानी समाजवादी युग की शुरुआत की।  क्रांति के बाद कृषि की जमीन का, उत्पादन के साधनों का, विनिमय और वितरण के साधनों का राष्ट्रीयकरण और सामाजिकरण किया गया।सत्ता का प्रयोग किसान, मजदूर और मेहनतकशों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए क्या गया। 
     इसमें दिखाया कि कैसे सत्ता का इस्तेमाल एक आदमी के लिए नहीं बल्कि जनता के कल्याण के लिए किया जा सकता है। यह रूसी क्रांति ही थी जिसके बाद दुनिया में एक के बाद एक,दुनिया के एक तिहाई देशों में क्रांतियां हुई और किसान-मजदूर शासन में बैठे और उनका राज कायम हुआ और वहां उन्होंने जनता के कल्याण के लिए काम किया गया। यही मार्क्स की सबसे बड़ी विशेषता है कि उन्होंने जो कहा था मजदूर वर्ग के लोगों ने उसको धरती पर उतारा और कांतियां किं। 
      मार्क्स के जन्मदिवस के २०३वें साल में उन्हें शत शत नमन वंदन और क्रांतिकारी अभिनंदन ।

प्रस्तुति
गंगेश्वर दत्त शर्मा
माकपा नेता

Thursday, 18 February 2021

17:27

रियल हीरो का रोल निभाने वाली शिवरानी लोनिया और आशा बंसल

Tap news India deepak tiwari 
सतना सीधी बस हादसे में रियल हीरो का रोल निभाने वाली शिवरानी लोनिया और आशा बंसल ने बताया की  उन्होंने बस को नहर में गिरते देखा और दौड़ पड़े खुद की जान की चिंता किए बगैर पानी से भरी नहर में छलांग लगा दी इस दौरान बस की खिड़कियों से कुछ लोगों को निकलकर बहते देखा तो  उनकी तरफ गईं और एक-एक करके सात को बचा लिया। इनमें तीन पुरुष, तीन महिलाएं और एक बच्चा शामिल है।वही यह भी बताया की एक बच्चे को तेजी से बहते भी देखा। लेकिन बचा पाते तब तक वो काफी दूर निकल गया था।

सरदा गांव की शिवरानी लोनिया ने बताया की घटना लगभग ‘सुबह सात से साढ़े सात बजे की  होगी। मैं घर के बाहर बैठी थी। अचानक बस को नहर में गिरते देखा। भाई के साथ मिलकर नहर तरफ भागी और सीधे पानी में कूद गई। बस के पिछले हिस्से का दरवाजा खुला था। हमने एक के बाद छह से सात लोग बहते हुए नजर आने लगे। तैरकर उनके पीछे गईं और एक एक करके निकाला। तब तक गांव के और भी लोग आ गए थे। उनकी मदद से किनारे तक ले आए। बस में 50 के आसपास लोग रहे होंगे। वे बताती हैं कि यहां अकसर जाम रहने के कारण बसें निकलती रहती हैं।’ हादसे के बाद जिला प्रशासन  पुलिस को सुचना दी।

बता दे की देर रात तक 47 शव निकल लिए गए थे ,और सुबह होते ही 2 और शव निकाले गए है। अब तक मृतकों की संख्या 49 हो गई है। जिनमे 7 लोगों को बचाया गया।

Tuesday, 6 October 2020

16:24

गिनीज बुक में ऑक्साना के नाम पर दर्ज हुआ रिकार्ड जाने क्यों

deepak tiwari वैसे तो हाई हील पहनकर चलना किसी के लिए भी कंफर्टेबल नहीं होता लेकिन हाई हील के शूज जिनकी हील नीचे से पेंसिलनुमा हो, उसे पहनकर रस्सी पर चलना तो वाकई आश्चर्यजनक और जोखिम वाला काम होता है।
10 जुलाई 2014 को इटली के मिलान में लो शो देई रिकॉर्ड के सेट पर ऐसी ही एक स्पर्धा हुई थी। इसमें रूस की ऑक्साना सेरोशन ने हाई हील के शूज पहनकर पतली रस्सी पर 15 मीटर दूर तक चलकर दिखाया था। इसके बाद यह रिकार्ड गिनीज बुक में ऑक्साना के नाम पर दर्ज हो गया। इस रिकॉर्ड को अभी तक किसी ने चुनौती नहीं दी है।
गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने के लिए कुछ नियमों का पालन भी करना पड़ता है। इसके लिए ऑक्साना ने 7.5 मीटर की रस्सी पर दो बार इधर से उधर, फिर उधर से इधर चलकर दिखाया था। इस बीच टर्न होते वक्त और रस्सी हिलने से दो बार उनका बैलेंस बिगड़ा, लेकिन वे संभल गईं। संतुलन बनाने के लिए उन्होंने एक 'हाथ पंखा' पकड़ा हुआ था।

Sunday, 4 October 2020

18:43

स्टार्ट अप उत्कला के जरिये कोरोना काल में बनीं कारीगरों का सहारा TAP NEWS

उषाशी रथ ने पायलट बेटे को खोने का गम भुलाने के लिए काउंसिलिंग सेंटर खोलें, deepak tiwari अपने स्टार्ट अप 'उत्कला' के जरिये कोरोना काल में बनीं कारीगरों का सहारा उषाशी का संबंध एक ऐसे परिवार से हैं जहां अधिकांश लोग शिक्षक हैं। उन्होंने बचपन से अपने घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल देखा। वे 1986 में शादी के बाद अपने पति के साथ मुंबई आ गईं। वे घर में रहने के बजाय कुछ करना चाहती थीं। इसलिए मॉन्टेसरी ट्रेनिंग ली और एक प्री स्कूल में टीचर बन गईं। उसके बाद 2001 में नवी मुंबई क्षेत्र में खुद का प्री स्कूल शुरू किया जिसका नाम 'स्टेपिंग स्टोंस' रखा।
ये काम के प्रति उनकी लगन ही थी कि जल्दी ही इस स्कूल की दो ब्रांच खुली। वे स्कूल के बच्चों के साथ अपनी लाइफ को एंजॉय कर रहीं थी। 2009 में उन्हें नवी मुंबई में 'बेस्ट वुमन इंटरप्रेन्योर' के अवार्ड से सम्मानित किया गया। उसके बाद उषाशी की जिंदगी में वो दुखद पल भी आया जिसके बारे में खुद उसने कभी नहीं सोचा था। इसके आगे की कहानी जानिए उन्हीं की जुबानी :
मैंने अपने जीवन में इतनी मेहनत की जिसके चलते ये कभी सोचा भी नहीं था कि एक ऐसा पल आएगा जब जिंदगी थम जाएगी। मेरे साथ ऐसा उस वक्त हुआ जब मेरा 21 साल का पायलट बेटा इस दुनिया में नहीं रहा। उस वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे लिए सबकुछ खत्म हो गया है। मैं डिप्रेशन में थी। उन्हीं दिनों मैंने अपने दोनों स्कूल बंद कर दिए। मुझे लग रहा था जैसे जीवन में चारों ओर बस अंधेरा ही है।
तभी मेरे पति की जॉब अबूधाबी में लगी और उनके साथ मैं भी वहीं शिफ्ट हो गई। मैं अपनी जिंदगी के खालीपन को स्कूली बच्चों के साथ रहकर भरना चाहती थी। इसी इरादे से मैंने अबूधाबी के एक इंडियन स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। उन्हीं दिनों मैंने साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग में डिप्लोमा किया और मुंबई आकर खुद का साइकोलॉजिकल काउंसिलिंग सेंटर खोला। इस सेंटर का नाम 'नोशन' रखा।फिर वहां से वापिस मुंबई आने के बाद यहां की प्रतिष्ठित संस्थान से करिअर काउंसिलिंग में डिप्लोमा कोर्सेस किए। इसी के आधार पर मैंने काउंसिलिंग से जुड़े अपने दूसरे प्रोजेक्ट 'अन्वेषा' की शुरुआत की। मैं भुवनेश्वर के एक ऐसे एनजीओ में भी काउंसिलिंग करती हूं जहां अधिकांश दिव्यांग विद्यार्थी हैं।
इसी बीच मैं अपने पति के साथ भुवनेश्वर शिफ्ट हो गईं। यहां रहते हुए कुछ ही समय में मुझे इस बात का अहसास हुआ कि भुवनेश्वर और इसके आसपास बसे क्षेत्र में जो ओडिशी कारीगर और बुनकर इस कला को निखारने का काम करते हैं, उनकी स्थिति दयनीय है। तभी मुझे ये लगा कि इनके लिए मुझे अपनी ओर से प्रयास करना चाहिए। मैं अपने पति के साथ ऐसे कई गांव में गई जहां ओडिशी कला के प्रति कुशल कारीगर पूरी तरह समर्पित हैं। उनकी खराब आर्थिक स्थिति को देखकर खुद उनके बच्चे इस क्षेत्र में आगे बढ़ना नहीं चाहते।
इन कारीगरों के काम को सारी दुनिया तक पहुंचाने के लिए मैंने अपनी ई कॉमर्स वेबसाइट की शुरुआत की जिसे 'उत्कला डॉट कॉम' नाम दिया। इस वेबसाइट पर आप ओडिशा के हर क्षेत्र के हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम प्रोडक्ट देख सकते हैं। मैं अपने बेटे के गम को भुलाने के लिए हर उस काम को करने में यकीन रखती हूं, जो कर सकती हूं। उत्कला भी मेरे ऐसे ही प्रयासों में से एक है।
ओडिशा की हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने के अलावा यहां की महिला कारीगरों की भलाई के लिए मैं कार्य कर रही हूं। लॉकडाउन के दौरान पुरी के शिल्पकारों की मदद के लिए भी मैं प्रयासरत हूं। मेरी जिंदगी अगर इन कारीगरों की मदद करने में किसी भी तरह से काम आ जाए तो ये मेरी खुशनसीबी होगी। मेरी संस्थाएं उत्कला और अन्वेषा मेरे लिए बच्चों की तरह ही है। अपने बेटे को खो देने के बाद मैं इन दोनों प्रोजेक्ट्स पर दिन-रात मेहनत करते हुए अपनी जिंदगी बिताना चाहती हूं।
18:35

91 वर्षीय कांता स्वरूप कृष्ण सालों से चला रही हैं ब्लड डोनेशन कैंप deepak tiwari

91 वर्षीय कांता स्वरूप कृष्ण सालों से चला रही हैं ब्लड डोनेशन कैंप, deepak tiwari वे चाहती हैं अधिक से अधिक लोग ब्लड कैंप का आयोजन करें ताकि गरीबों को खून खरीदना न पड़े अपनी उम्र की वजह से कांता स्वरूप कृष्ण घर से अकेले कहीं जा नहीं पाती। लेकिन जिस काम को सालों से कर रही हैं, उसे इस उम्र में भी छोड़ पाना भी उनके लिए मुश्किल है। वे पिछले कई सालों से ब्लड डोनेशन कैंप का आयोजन कर रही हैं। कोरोना काल में आजकल वे फोन पर बात करके रक्त दान के लिए लोगों को जागरूक करती हैं।
वे ब्लड बैंक के लिए लोगों से आर्थिक मदद करने की अपील भी करती हैं ताकि कभी किसी गरीब को पैसा देकर खून खरीदने की जरूरत न पड़े। फिलहाल कांता के ब्लड बैंक से जुड़े सभी कामों को उनकी बेटी नीति सरीन संभालती हैं।
कांता स्वरूप को उनके द्वारा किए गए सराहनीय कार्यों की वजह से 1971 में पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है। कांता को इस बात का दुख है कि कोविड-19 की वजह से ब्लड डोनेशन कैंप का आयोजन कम हुआ है। जबकि यही वो दौर है जब लोगों को ब्लड की ज्यादा जरूरत है। इसलिए हर हाल में इस तरह के कैंप का आयोजन होना चाहिए।
कांता चाहती हैं कि अधिक से अधिक लोग ब्लड कैंप का आयोजन करें ताकि गरीबों की मदद हो सके। कांता ने 2004 में रोटरी क्लब की मदद से रोटरी और ब्लड बैंक सोसायटी रिसोर्सेस सेंटर की स्थापना की थी। यहां वे नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा तय किए गए मूल्य पर पेशेंट्स के लिए ब्लड उपलब्ध कराती थीं।
कांता अपने पति और बच्चों के साथ अंबाला से चंडीगढ़ आई थीं। वे कहती हैं - ''1964 में डॉ. जेली जोली उनके घर आए जो पीजीआई ब्लड बैंक के इंचार्ज थे। उन्होंने मुझे बताया कि आजकल ब्लड बेचने और खरीदने का धंधा चल रहा है। इससे कई लोगों की जान जा रही है। तब उन्होंने मुझे ब्लड डोनेशन अभियान चलाने को कहा। फिर मैं इस अभियान का हिस्सा बनी''। कांता को अब तक पद्मश्री के अलावा राजीव गांधी अवार्ड और मदर टेरेसा अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

Monday, 28 September 2020

02:56

भगत सिंह के जयंती पर विशेष TAP NEWS INDIA की रिपोर्ट

28 सितंबर आज पूरा देश शहीद ए आज़म भगत सिंह की जयंती मना रहा है। इस वीर योद्धा की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि जिनका विचार भगत सिंह के विचारों से ठीक उल्टा है वो भी इनको अपना आदर्श मानते हैं। कई लोग भगत सिंह के योगदान को बम-पिस्तौल, सोंडर्स की हत्या, जेल और फाँसी से ज़्यादा नहीं समझते। असल में भगत सिंह की वैचारिकी बिल्कुल साफ़ और स्पष्ट थी। वो कहते थे बम और पिस्तौल कभी इंक़लाब नहीं ला सकते। उनके इंक़लाब की समझ के अनुसार जब तक किसी एक मनुष्य का किसी दूसरे मनुष्य द्वारा शोषण हो रहा हो तब तक इंक़लाब की लड़ाई बाकी है। उनकी आज़ादी का मतलब सिर्फ़ अंग्रेजों को देश से भगा देने भर तक सीमित नहीं था वो व्यवस्था परिवर्तन की बात करते थे। जान बूझ कर भगत सिंह को हिंसा की बहस तक समेटने की साज़िश की गई ताकि भगत सिंह को गांधी के विरुद्ध खड़ा किया जा सके जबकि भगत सिंह कहते थे कि अगर जेल से निकल पाया तो देश की स्वतंत्रता के लिए और व्यवस्था परिवर्तन के लिए जन-आंदोलन में शामिल होऊँगा। भगत सिंह के जिन साथियों को फाँसी नहीं हुई उनमें से ज़्यादातर लोग उस वक़्त की कॉम्युनिस्ट पार्टी में शामिल भी हुए। उनके जेल के साथी अजय घोष तो बाद में भारतीय कॉम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी बने। शुरू से ही भगत सिंह पर समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव था। भगत सिंह हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी करने का प्रस्ताव लेकर आए थे। इनकी वैचारिक स्पष्टता एक बड़ी वजह थी कि अंग्रेज किसी भी सूरत में भगत सिंह को फाँसी पर चढ़ाना चाहते थे। जब उनको फाँसी पर चढ़ाने के लिए सिपाही लेने आए तो उन्होंने कहा “थोड़ा ठहर जाओ एक क्रांतिकारी दुसरे क्रांतिकारी से मिल रहा हैI” उस वक़्त वो लेनिन की किताब ‘राज्य और क्रांति’ पढ़ रहे थे। भगत सिंह की जेल डायरी को हर किसी को पढ़ना चाहिए ताकि इस महान योद्धा को समग्रता में समझा जा सके। वो समझ सकें कि आज अगर भगत सिंह होते तो किसानों के फसल के दाम के लिए, बेरोज़गारों के काम के लिए, हर आवाम के लिए इस बेरहम सत्ता के सामने सर उठा कर लड़ रहे होते। सत्ता के सामने झुक जाना, समझौता कर लेना, माफ़ी माँग लेना, ये भगत सिंह होने के विरुद्ध है। इसलिए साथियों, न्याय के लिए, बराबरी के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करना, किसानों के पक्ष में खड़ा होना, सबके रोज़गार के लिए लड़ना, किसी भी शोषण और अन्याय का डट कर मुक़ाबला करना ही शहीद ए आज़म भगत सिंह को सही मायनों में याद करना है। दरअसल भगत सिंह आज भी जनता के संघर्षों में ज़िंदा हैं।

हमारा अरमान, भगत सिंह के सपनों का हिंदुस्तान!

इंक़लाब ज़िंदाबाद।।

Thursday, 10 September 2020

18:03

मां तो आखिर मां होती है:deepak tiwari

मां तो आखिर मां होती है:deepak tiwari बेटा कट्टा लेकर मां को मारने के लिए खोज रहा है, और मां ने उसी बेटे की लंबी उम्र के लिए 36 घंटे का निर्जला व्रत रखा है
भागलपुर.लबों पर उसके बद्दुआ नहीं होती, बस एक मां है जग में जो खफा नहीं होती। जी हां, दरभंगा से अपने बेटे के खौफ से भागकर भागलपुर आई एक मां ने उसी की लंबी उम्र के लिए जिउतिया का व्रत रखा है। यहीं से वह अपने बेटे की सलामती की दुआ मांग रही है। उसने लगातार 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखा है... उसी बेटे के लिए जो कट्‌टा लेकर उनके खून का प्यासा बना हुआ है। उसी बेटे से जान बचाकर महिला को अपना घर छोड़ना पड़ा। इस दुनिया में इस महिला का और कोई नहीं है सो उसने वृंदावन के वृद्धाश्रम जाना तय किया है।
ये महिला दरभंगा जिले के लादौर की रहने वाली हैं। लाॅकडाउन में जब बेटे ने राेज प्रताड़ित किया ताे घर छाेड़ कर वृद्धाश्रम जाने के लिए वहां से भाग आईं। बेटे की ज्यादतियाें के निशान उनके शरीर पर जगह-जगह नीला दाग माैजूद है। किस्मत ऐसी कि इनकी एक बेटी बचपन में ही सांप काटने की वजह से मर गई। एक बेटा भी कम उम्र में बीमार हाेकर मर गया। पति लुधियाना में एक फैक्ट्री में मजदूरी करते थे। सात साल पहले ईश्वर ने वह सहारा भी छीन लिया। बेटा पहले लुधियाना और दिल्ली में काम करता था। महिला पिछले चार महीने से समाजसेवी सुजाता चाैधरी के घर में शरण लिए हुए है।
मां का खाैफ : मैं कहां हूं, उसे पता चल जाए ताे मेरी जान ले लेगा
बेटे के खाैफ के साये में वह मां जी रही हैं। इस मां ने कई बार अपने बेटे काे समझाने की काेशिश की। लेकिन बेटा बीते सात साल से कभी पैसा मांगता ताे कभी अपना तनाव इन्हें पीटकर खत्म करता। बैंक खाते में जाे भी पैसा था वह भी निकाल चुका। वह कहती हैं मेरा बेटा मुझे कमजाेर समझकर मुझ पर जुल्म करता है। मैं भाग आई हूं। एक साल पहले भी मैं उसकी मार से तंग आकर भाग गई थी। फिर मुझे लगा उसे मेरी याद आती हाेगी। वह सुधर गया हाेगा। मैं वापस उसके पास गई। लेकिन अब ताे वह और उग्र हाे गया। मेरी जान के पीछे पड़ गया है। अगर उसे पता चल जाए मैं कहां हूं, ताे मेरी जान ले लेगा।
मां की ममता : बेटा बुरा है मगर मैं मां हूं, उसका बुरा नहीं चाह सकती
महिला बताती है कि पहले ऐसा नहीं था। पति का जबसे देहांत हुआ तब से ये मुझपर हाथ उठाने लगा। मैं व्रत कर रही हूं क्याेंकि नाै महीने उसे अपनी खून से सींचा है, तीन साल तक उसे अपना दूध पिलाकर बड़ा किया है। वह मेरा अंश है। मैं उसका बुरा नहीं चाह सकती। मैं ताे अब भी उसके साथ रहना चाहती हूं, अफसाेस कि ये संभव नहीं है। मैंने पुलिस में शिकायत नहीं की क्याेंकि वह उसे मारेंगे। मेरे पास घर छाेड़ के भागने के अलावा काेई रास्ता नहीं था। आश्रम में मैं अपनी बची हुई जिंदगी काट लूंगी।

Tuesday, 25 August 2020

08:04

डॉ. अदिति मित्तल ने ड्राय फ्रूट्स से बनाए श्री गणेश, deepak tiwari

डॉ. अदिति मित्तल ने ड्राय फ्रूट्स से बनाए श्री गणेश,   deepak tiwari वे इसे कोविड-19 अस्पतालों में भर्ती मरीजों की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए बांटेंगी
हर साल की तरह इस साल भी गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्तियों को ईको फ्रेंडली बनाने के नए-नए रास्ते खोजे जा रहे हैं। इसी कड़ी में गुजरात के सूरत की डॉ. अदिति मित्तल सूखे मेवों से गणेश प्रतिमा बनाने के लिए चर्चा में हैं।
उन्होंने श्री गणेश की मूर्तियों को सिर्फ सूखे मेवों से बनाया है। गणेश समारोह के बाद वे इस मूर्ति को बनाने में उपयोग किए जाने वाले ड्राई फ्रूट्स को COVID-19 पेशेंट्स में बांटेंगी।
अदिति ने इन मूर्तियों को अखरोट, काजू, बादाम जैसे सूखे मेवों से बनाया है। इन मूर्तियों की ऊंचाई 20 इंच है। उन्होंने भगवान गणेश का पेट अखरोट से तो आंखों को काजू से बनाया है। इसी तरह उनके कान मूंगफली से बने हैं।
अदिति ने अपने ट्विटर पर गणेश जी की मूर्तियों को शेयर किया है। उन्होंने साथ में ये भी लिखा कि इन मूर्तियों को गणेश चतुर्थी के दौरान सूरत के कोविड अस्पताल 'अटल संवेदना' में रखा गया है। इन्हें 511 ड्राई फ्रूट्स का इस्तेमाल करके बनाया गया है।
गणेश चतुर्थी के बाद विध्नहर्ता के खुशहाल और सेहतमंद जिंदगी के आशीर्वाद के रूप में इसे वितरित कर दिया जाएगा। ये सूखे मेवे मरीजों की इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करेंगे।
सोशल मीडिया पर अदिति के काम की तारीफ हो रही है। लोग ये देखकर भी हैरान हैं कि अदिति ने इन ड्राई फ्रूट्स को आपस में चिपकाया किस तरह होगा। उन्होंने इस काम को पूरा करने में बहुत मेहनत की है।

Wednesday, 19 August 2020

05:37

नाटक लिखा तो जेल हो गई, लेकिन फिर सरकार ही बदल गई

  deepak tiwari 
 August 19, 2020

आज है ख्यात अभिनेता उत्पल दत्त की पुण्यतिथि
अभिनेता उत्पल दत्त फिल्मों के साथ थिएटर से भी जुड़े हुए थे, वे बंगाली राजनीति पर नाटक लिखते थे। सन् 1963 में उनके लिखे कल्लोल नाटक पर खूब हंगामा हुआ, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें जेल भेज दिया और जनता चुनाव में सरकार के कदम का विरोध करते हुए सरकार ही बदल
डाली थी।
एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुत अच्छे बने उत्पल दा को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता उत्पल दत्त की आज पुण्यतिथि है आज के दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। कॉमेडी फिल्मों के किंग कहे जाने वाले उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 में पूर्वी बंगाल के बारीसाल में हुआ था। उन्होंने अपने करियर में कई हिट और मजेदार फिल्में दीं। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने, उत्पल दा को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है।
यह थी दत्त के हास्य से भरपूर हिट फिल्में
गोलमाल, शौकिन, रंग‑बिरंगी, नरक, किसी से न कहना, पसंद अपनी अपनी, अमानुष, किराएदार, अपने पराएं, मेरा दामाद, बात बन जाए, अंगूर, साहेब, आनंद, गुड्डी, इन्कलाब, दो अनजाने, द ग्रेट गैंबलर, प्रेम विवाह, कत्र्तव्य, सदा सुहागन, उल्टा-सीधा आदि ।

Saturday, 15 August 2020

04:58

चन्द्रशेखर आजाद के विचारों की गौरव गाथा



आभार: चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) बैसवारा से थे। आजाद के पितापण्डित सीताराम तिवारी संवत् १८५६ में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों [मध्य प्रदेश] अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा [गाँव] में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ" के नाम से जाना जाता था।

*पहली घटना*
१९१९ में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। जब गांधीजी ने सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलनका फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है-

ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह 'भारत माता की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना
*झांसी में क्रांतिकारी गतिविधियां*
चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए झांसी को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे। अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी।

*क्रान्तिकारी संगठन*
असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में (चौरी चौरा) की घटना के पश्चात् बिना किसी से पूछे (गाँधीजी) ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में "विजयसिंह" का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। "एच० आर० ए०" के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं - बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था।

इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। जब शाहजहाँपुर में इस योजना के बारे में चर्चा करने के लिये मीटिंग बुलायी गयी तो दल के एक मात्र सदस्य अशफाक उल्ला खाँ ने इसका विरोध किया था। उनका तर्क था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओँ - पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ एवं ठाकुररोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर लटकाकर मार दिया गया। सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।

४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन" का नाम बदलकर "हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन" रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - "हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।"

*लाला लाजपतराय का बदला*
17 दिसम्बर, 1928 को चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह और राजगुरु ने संध्या के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर को जा घेरा। ज्यों ही जे. पी. सांडर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकला, पहली गोली राजगुरु ने दाग़ दी, जो साडंर्स के मस्तक पर लगी और वह मोटर साइकिल से नीचे गिर पड़ा। भगतसिंह ने आगे बढ़कर चार–छह गोलियाँ और दागकर उसे बिल्कुल ठंडा कर दिया। जब सांडर्स के अंगरक्षक ने पीछा किया तो चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली से उसे भी समाप्त कर दिया। लाहौर नगर में जगह–जगह परचे चिपका दिए गए कि लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया। समस्त भारत में क्रान्तिकारियों के इस क़दम को सराहा गया।

केन्द्रीय असेंबली में बम संपादित करें
चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया। यह विस्फोट किसी को भी नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं किया गया था। विस्फोट अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध में किया गया था। इस काण्ड के फलस्वरूप भी क्रान्तिकारी बहुत जनप्रिय हो गए। केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट करने के पश्चात भगति सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने स्वयं को गिरफ्तार करा लिया। वे न्यायालय को अपना प्रचार–मंच बनाना चाहते थे।

*चरम सक्रियता*
आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था। इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे। झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।

*बलिदान*
एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फ़रवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और २० फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें! अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद ने अंतिम गोली खुद को मार कर वीरगति प्राप्त की। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद के बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी।। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फ़रवरी १९३१ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेस बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे

Thursday, 23 July 2020

07:53

SVS नेता रामजी पांडे ने किया स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद को कोटि कोटि नमन


नोयडा श्रमिक  विकास संगठन SVS के गौतमबुद्ध नगर के जिला अध्यक्ष रामजी पांडे ने स्वतंत्रता आंदोलन के अमर शहीद  चंद्रशेखर आजाद की जन्म जयंती परआज उस पुण्य आत्मा को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि  आज देश को फिर से चन्द्रशेखर आजाद जैसे देशभक्त की जरूरत आन पड़ी है।रामजी पांडे ने कहा कि आज ही के दिन 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले का भाबरा में चन्द्र शेखर आजाद का जन्म हुआ था. 1920 में 14 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और तब जज ने आजाद जी के कांतिकारी तेवर देखकर उन्हें कड़ी सजा सुनाई  मौजूदा इतिहास के अनुसार चंद्रशेखर आजाद की निशानेबाजी बचपन से बहुत अच्छी थी. सन् 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया. जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आजाद भी इस दल में शामिल हो गए। इसके बाद

आजाद ने सशस्त्र क्रान्ति के माध्यम से देश को आजाद कराने वाले युवकों का एक दल बना लिया, जिसमें शचीन्द्रनाथ सान्याल, बटुकेश्वर दत्त, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, बिस्मिल, अशफाक, जयदेव, शिव प्रसाद गुप्त, दामोदर स्वरूप, आचार्य धरमवीर आदि उनके सहयोगी थे. बाद में काकोरी कांड, अंग्रेज अफसर जेपी सांडर्स की हत्या और दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट जैसी घटनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले आजाद प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को वीरगति को प्राप्त हुए थे। रामजी पांडे ने कहा कि चंदशेखर आजाद का सम्पूर्ण जीवन देश को समर्पित रहा।जिसने आजाद भारत को  देश भक्ति का सही मतलब समझाया ऐसी पुण्य आत्मा के श्री चरणों मे मेरा कोटि कोटि नमन।

Tuesday, 14 July 2020

23:53

शिक्षाप्रेमी सन्त स्वामी कल्याणदेव जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



स्वामी कल्याणदेव जी महाराज सच्चे अर्थों में सन्त थे। उनकी जन्मतिथि एवं शिक्षा-दीक्षा के बारे में निश्चित जानकारी किसी को नहीं है। एक मत के अनुसार जून 1876 में उनका जन्म ग्राम कोताना (जिला बागपत, उ.प्र.) के एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री फेरूदत्त जाँगिड़ तथा माता श्रीमती भोईदेवी थीं। कुछ लोग जिला मुजफ्फरनगर के मुण्डभर गाँव को उनकी जन्मस्थली मानते हैं। उनके बचपन का नाम कालूराम था।

धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण दस साल की अवस्था में उन्होंने घर छोड़ दिया था। 1900 ई0 में ऋषिकेश में स्वामी पूर्णदेव जी से दीक्षा लेकर वे हिमालय में तप एवं अध्ययन करने चले गये। 1902 में राजस्थान में खेतड़ी नरेश के बगीचे में स्वामी विवेकानन्द से उनकी भेंट हुई। विवेकानन्द ने उन्हें पूजा-पाठ के बदले निर्धनों की सेवा हेतु प्रेरित किया। इससे कल्याणदेव जी के जीवन की दिशा बदल गयी।

1915 में गान्धी जी से भेंट के बाद स्वामी जी स्वाधीनता संग्राम के साथ ही हिन्दी और खादी के प्रचार तथा अछूतोद्धार में जुट गये। इस दौरान उन्हें अनुभव आया कि निर्धनों के उद्धार का मार्ग उन्हें भिक्षा या अल्पकालीन सहायता देना नहीं, अपितु शिक्षा की व्यवस्था करना है। बस, तब से उन्होंने शिक्षा के विस्तार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

स्वामी जी ने मुजफ्फरनगर जिले में गंगा के तट पर बसे तीर्थस्थान शुकताल को अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया। यह वही स्थान है, जहाँ मुनि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को वटवृक्ष के नीचे पहली बार भागवत की कथा सुनायी थी। वह वटवृक्ष आज भी जीवित है। स्वामी जी ने इस स्थान का जीर्णाेद्धार कर उसे सुन्दर तीर्थ का रूप दिया। इसके बाद तो भक्तजन स्वामी जी को मुनि शुकदेव का अंशावतार मानने लगे। स्वामी जी ने गंगा तट पर बसे महाभारतकालीन हस्तिनापुर के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

सरलता और सादगी की प्रतिमूर्ति स्वामी जी का प्रेम एवं आशीर्वाद जिसे भी मिला, वही धन्य हो गया। इनमें भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर पण्डित नेहरू, नीलम संजीव रेड्डी, इन्दिरा गान्धी, डा. शंकरदयाल शर्मा, गुलजारीलाल नन्दा, के.आर. नारायणन, अटल बिहारी वाजपेयी आदि बड़े राजनेताओं से लेकर सामान्य ग्राम प्रधान तक शामिल हैं। स्वामी कल्याणदेव जी सबसे समान भाव से मिलते थे।

स्वामी जी ने अपने जीवनकाल में 300 से भी अधिक शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की। वे सदा खादी के मोटे भगवा वस्त्र ही पहनते थे। प्रायः उनके वस्त्रों पर थेगली लगी रहती थी। प्रारम्भ में कुछ लोगों ने इसे उनका पाखण्ड बताया; पर वे निर्विकार भाव से अपने कार्य में लगे रहे। वे सेठों से भी शिक्षा के लिए पैसा लेते थे; पर भोजन तथा आवास सदा निर्धन की कुटिया में ही करते थे। शाकाहार के प्रचारक इस सन्त को 1992 में पद्मश्री तथा 2000 ई. में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

13 जुलाई की अतिरात्रि में उन्होंने अपने शिष्यों से उन्हें प्राचीन वटवृक्ष एवं शुकदेव मन्दिर की परिक्रमा कराने को कहा। परिक्रमा पूर्ण होते ही 12.20 पर उन्होंने देहत्याग दी। तीन सदियों के द्रष्टा 129 वर्षीय इस वीतराग सन्त को संन्यासी परम्परा के अनुसार अगले दिन शुकताल में भूसमाधि दी गयी।
23:52

15 जुलाईहिंदी पत्रकारिता के पुरोधा प्रभाष जोशी जी का जन्मदिन पर विशेष-के सी शर्मा

स्वाधीन भारत में जिन पत्रकारों ने विशिष्ट पहचान बनाई, उनमें प्रभाष जोशी भी एक हैं। उनका जन्म 15 जुलाई 1937 को म.प्र. के मालवा क्षेत्र में हुआ था। छात्र जीवन से ही वे गांधी, सर्वोदय और विनोबा से जुड़ गये। उन्होंने विनोबा के साथ रहकर भूदान आंदोलन के समाचार जुटाये। फिर उन्होंने इंदौर से प्रकाशित ‘नई दुनिया’ में बाबा राहुल बारपुते की देखरेख में पत्रकारिता के गुर सीखे और भोपाल के ‘मध्य देश’ से जुड़े। 

जयप्रकाश नारायण ने जब 1972 में दस्यु माधोसिंह का आत्मसमर्पण कराया, तो प्रभाष जी भी साथ थे। सर्वोदय जगत, प्रजानीति, आसपास, इंडियन एक्सप्रेस आदि में वे अनेक दायित्वों पर रहे। हिन्दी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। लेखन में वे स्थानीय लोकभाषा के शब्दों का खूब प्रयोग करते थे।

1983 में एक्सप्रेस समूह ने प्रभाष जोशी के संपादकत्व में दिल्ली से ‘जनसत्ता’ प्रकाशित किया। प्रभाष जी ने युवा पत्रकारों की टोली बनाकर उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक काम करने दिया। शुद्ध और साहित्यिक, पर सरल हिन्दी जनसत्ता की विशेषता थी। उसमें साहित्य, कला व संस्कृति के साथ ही सामयिक विषयों पर मौलिक हिन्दी लेख छपते थे, अंग्रेजी लेखकों की जूठन नहीं। 

उन्होेंने हिन्दी अखबारों की भेड़चाल से अलग रहकर नागरी अंकावली का ही प्रयोग किया। सम्पादकीय विचार अलग होने पर भी समाचार वे निष्पक्ष रूप से देते थे। इससे शीघ्र ही जनसत्ता लोकप्रिय हो गया। धीरे-धीरे प्रभाष जोशी और जनसत्ता एक-दूसरे के पर्याय बन गये।

कबीर, क्रिकेट और कुमार गंधर्व के शास्त्रीय गायन के प्रेमी होने के कारण वे इन पर खूब लिखते थे। एक दिवसीय कोे 'फटाफट क्रिकेट' और 20 ओवर वाले मैच को उन्होंने 'बीसम बीस' की उपमा दी। जन समस्याओं को वे गोष्ठियों से लेकर सड़क तक उठाते थे। उनका प्रायः सभी बड़े राजनेताओें से संबंध थे। वे प्रशंसा के साथ ही उनकी खुली आलोचना भी करते थे। 

उन्होंने आपातकाल का तीव्र विरोध किया। राजीव गांधी के भ्रष्टाचार के विरोध में वी.पी. सिंह के बोफोर्स आंदोलन तथा फिर राममंदिर आंदोलन का उन्होंने साथ दिया। चुटीले एवं मार्मिक शीर्षक के कारण उनके लेख सदा पठनीय होते थे। जनसत्ता में हर रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ उनका लोकप्रिय स्तम्भ था। वे हंसी में स्वयं को ‘ढिंढोरची’ कहते थे, जो सब तक खबर पहुंचाता है।

राममंदिर आंदोलन में एक समय वे वि.हि.प. और सरकार के बीच कड़ी बन गये थे; पर 6 दिसम्बर, 1992 को अचानक हिन्दू युवाओं के आक्रोश से बाबरी ढांचा ध्वस्त हो गया। उन्हें लगा कि यह सब योजनाबद्ध था। इससे उन्होंने स्वयं को अपमानित अनुभव किया और फिर उनकी कलम और वाणी सदा संघ विचार के विरोध में ही चलती रही। धीरे-धीरे जनसत्ता वामपंथी स्वभाव का पत्र बन गया और उसकी लोकप्रियता घटती गयी। कुछ के मतानुसार भा.ज.पा. ने उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा, इससे वे नाराज थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में कई अखबारों ने प्रत्याशियों सेे पैसे लेकर विज्ञापन के रूप में समाचार छापे, इसके विरुद्ध उग्र लेख लिखकर उन्होंने पत्रकारों और जनता को जाग्रत किया।

प्रभाष जी का शरीर अनेक रोगों का घर था। उनकी बाइपास सर्जरी हो चुकी थी। 5 नवम्बर, 2009 को हैदराबाद में भारत और ऑस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच हुआ। प्रभाष जी उसे दूरदर्शन पर देख रहे थे। सचिन तेंदुलकर ने 175 रन बनाये, इससे वे बहुत प्रफुल्लित हुए; पर अचानक उसके आउट होने और तीन रन से भारत की हार का झटका उनका दिल नहीं सह सका और अस्पताल पहुंचने से पूर्व ही उनका प्राणांत हो गया। इस प्रकार एक प्रखर पत्रकार की वाणी और लेखनी सदा के लिए शांत हो गयी।।
23:50

15 जुलाईउत्कट स्वाभिमानी जयदेव पाठक जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा



संघ के वरिष्ठ जीवनव्रती प्रचारक श्री जयदेव पाठक का जन्म 1924 ई. की जन्माष्टमी वाले दिन हिण्डौन (राजस्थान) के ग्राम फाजिलाबाद में श्रीमती गुलाबोदेवी की गोद में हुआ था। उनके पिता का श्री जगनलाल शर्मा अध्यापक थे। जब वे केवल सात वर्ष के थे, तो उनकी माताजी का देहांत हो गया। 
हिण्डौन से कक्षा सात उत्तीर्ण कर वे जयपुर आ गये और 1942 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक किया। उन दिनों भारत छोड़ो आंदोलन का जोर था। अतः वे उसमें शामिल हो गये। इससे घर वाले बहुत नाराज हुए। इस पर जयदेव जी ने घर ही छोड़ दिया। वे इतने उत्कट स्वाभिमानी थे कि उसके बाद फिर घर गये ही नहीं।
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे निकटवर्ती गांव और नगरों में प्रचार के लिए जाते थे। उस समय उन्हें न भोजन की चिन्ता रहती थी, न विश्राम की। कई बार तो रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही सोकर वे रात बिता देते थे। जब वह आंदोलन समाप्त हुआ, तो देशभक्ति की वह आग उन्हें संघ की ओर खींच लाई और फिर वे तन-मन से संघ के लिए समर्पित हो गये।
1942 में जयपुर में संघ का काम ‘सत्संग’ के नाम से चलता था। चार अपै्रल, 1944 को जयदेव जी ने पहली बार इसमें भाग लिया। उन दिनों श्री बच्छराज व्यास नागपुर से प्रान्त प्रचारक होकर राजस्थान आये थे। जयदेव जी उनसे बहुत प्रभावित हुए और अति उत्साह के साथ संघ शाखाओं के विस्तार में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल दिये। उनके अत्यधिक उत्साह से कई लोगों को शक हुआ कि वे खुफिया विभाग के व्यक्ति हैं; पर क्रमशः शंका के बादल छंट गये और 1946 में वे प्रचारक बन कर कार्यक्षेत्र में कूद गये।
प्रथम प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद संघ भीषण आर्थिक संकट में आ गया। ऐसे में प्रचारकों को यह कहा गया कि यदि वे चाहें, तो वापस लौटकर कोई नौकरी या काम धंधा कर सकते हैं। अतः जयदेव जी भी 1950 में अध्यापक बन गये; पर उनके मन में तो संघ बसा था। अतः सरकारी नौकरी के अतिरिक्त शेष सारा समय वे शाखा विस्तार में ही लगाते थे। बारह वर्ष तक अध्यापन करने के बाद उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और फिर से प्रचारक बन गये।
प्रचारक जीवन में वे उदयपुर व डूंगरपुर में जिला प्रचारक तथा उदयपुर, जयपुर, सीकर व भरतपुर में विभाग प्रचारक रहे। इस बीच दो वर्ष उन पर राजस्थान प्रान्त के बौद्धिक प्रमुख की जिम्मेदारी भी रही। खूब प्रवास करने के बावजूद वे स्वभाव से बहुत मितव्ययी थे। अपने ऊपर संगठन का एक पैसा भी अधिक खर्च न हो, इसकी ओर उनका बहुत आग्रह एवं ध्यान रहता था।
1974 से 2002 तक उन पर राजस्थान में विद्या भारती और शिक्षक संघ के संगठन मंत्री का काम रहा। 28 वर्ष के इस कालखंड में उन्होंने राजस्थान शिक्षक संघ को राज्य का सबसे बड़ा और प्रभावी संगठन बना दिया। आदर्श विद्या मंदिरों की एक बड़ी श्रृंखला के निर्माण का श्रेय भी उन्हें ही है। जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण प्रवास में कठिनाई होने लगी, तब भी वे राजस्थान में विद्या भारती के मार्गदर्शक के नाते संस्था की देखभाल करते रहे।
जयदेव जी के मन में एक घंटे की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी। प्रतिदिन शाखा जाने का जो व्रत उन्होंने 1944 में लिया था, उसे आजीवन निभाया। परम पवित्र भगवा ध्वज को वे ईश्वर का साकार रूप मानते थे। अतः शाखा से लौटकर ही वे अन्न-जल ग्रहण करते थे। ऐसे कर्मठ एवं स्वाभिमानी प्रचारक का15 जुलाई, 2006 को निधन हुआ।

Monday, 13 July 2020

19:25

14 जुलाईसबके रज्जू भैया जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालकद प्रो0 राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी, 1922 को ग्राम बनैल (जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश) के एक सम्पन्न एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता कुँवर बलबीर सिंह  अंग्रेज शासन में पहली बार बने भारतीय मुख्य अभियन्ता थे। इससे पूर्व इस पद पर सदा अंग्रेज ही नियुक्त होते थे। राजेन्द्र सिंह को घर में सब प्यार से रज्जू कहते थे। आगे चलकर उनका यही नाम सर्वत्र लोकप्रिय हुआ।

रज्जू भैया बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उनके पिता की इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जायें। इसीलिए उन्हें पढ़ने के लिए प्रयाग भेजा गया; पर रज्जू भैया को अंग्रेजों की गुलामी पसन्द नहीं थी। उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम-एस.सी. उत्तीर्ण की और फिर वहीं भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गये। 

उनकी एम-एस.सी. की प्रयोगात्मक परीक्षा लेने नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 सी.वी.रमन आये थे। वे उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने साथ बंगलौर चलकर शोध करने का आग्रह किया; पर रज्जू भैया के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही था।

प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र, जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ, उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे। 

प्राध्यापक रहते हुए रज्जू भैया अब संघ कार्य के लिए अब पूरे उ.प्र.में प्रवास करने लगे। वे अपनी कक्षाओं का तालमेल ऐसे करते थे, जिससे छात्रों का अहित न हो तथा उन्हें सप्ताह में दो-तीन दिन प्रवास के लिए मिल जायें। पढ़ाने की रोचक शैली के कारण छात्र उनकी कक्षा के लिए उत्सुक रहते थे।

रज्जू भैया सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे। वे सदा तृतीय श्रेणी में ही प्रवास करते थे तथा प्रवास का सारा व्यय अपनी जेब से करते थे। इसके बावजूद जो पैसा बचता था, उसे वे चुपचाप निर्धन छात्रों की फीस तथा पुस्तकों पर व्यय कर देते थे। 1966 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय संघ को ही देने लगे। 

अब उन पर उत्तर प्रदेश के साथ बिहार का काम भी आ गया। वे एक अच्छे गायक भी थे। संघ शिक्षा वर्ग की गीत कक्षाओं में आकर गीत सीखने और सिखाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। सरल उदाहरणों से परिपूर्ण उनके बौद्धिक ऐसे होते थे, मानो कोई अध्यापक कक्षा ले रहा हो।

उनकी योग्यता के कारण उनका कार्यक्षेत्र क्रमशः बढ़ता गया। आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ। 

1977 में रज्जू भैया सह सरकार्यवाह, 1978 में सरकार्यवाह और 1994 में सरसंघचालक बने। उन्होंने देश भर में प्रवास कर स्वयंसेवकों को कार्य विस्तार की प्रेरणा दी। बीमारी के कारण उन्होंने 2000 ई0 में श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दे दिया। इसके बाद भी वे सभी कार्यक्रमों में जाते रहे।

अन्तिम समय तक सक्रिय रहते हुए 14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में रज्जू भैया का देहान्त हो गया।
19:24

बाजी प्रभु देशपाण्डे का बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिन्दू पद-पादशाही की स्थापना में जिन वीरों ने नींव के पत्थर की भांति स्वयं को विसर्जित किया, उनमें बाजीप्रभु देशपाण्डे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

एक बार शिवाजी 6,000 सैनिकों के साथ पन्हालगढ़ में घिर गये। किले के बाहर सिद्दी जौहर के साथ एक लाख सेना डटी थी। बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने अफजलखाँ के पुत्र फाजल खाँ के शिवाजी को पराजित करने में विफल होने पर उसे भेजा था। चार महीने बीत गये। एक दिन तेज आवाज के साथ किले का एक बुर्ज टूट गया। शिवाजी ने देखा कि अंग्रेजों की एक टुकड़ी भी तोप लेकर वहाँ आ गयी है। किले में रसद भी समाप्ति पर थी।

साथियों से परामर्श में यह निश्चय हुआ कि जैसे भी हो, शिवाजी 40 मील दूर स्थित विशालगढ़ पहुँचे। 12 जुलाई, 1660 की बरसाती रात में एक गुप्त द्वार से शिवाजी अपने विश्वस्त 600 सैनिकों के साथ निकल पड़े। भ्रम बनाये रखने के लिए अगले दिन एक दूत यह सन्धिपत्र लेकर सिद्दी जौहर के पास गया कि शिवाजी बहुत परेशान हैं, अतः वे समर्पण करना चाहते हैं।

यह समाचार पाकर मुगल सैनिक उत्सव मनाने लगे। यद्यपि एक बार उनके मन में शंका तो हुई; पर फिर सब शराब और शबाब में डूब गये। समर्पण कार्यक्रम की तैयारी होने लगी। उधर शिवाजी का दल तेजी से आगे बढ़ रहा था। अचानक गश्त पर निकले कुछ शत्रुओं की निगाह में वे आ गये। तुरन्त छावनी में सन्देश भेजकर घुड़सवारों की एक टोली उनके पीछे लगा दी गयी।

पर इधर भी योजना तैयार थी। एक अन्य पालकी लेकर कुछ सैनिक दूसरी ओर दौड़ने लगे। घुड़सवार उन्हें पकड़कर छावनी ले आये; पर वहाँ आकर उन्होंने माथा पीट लिया। उसमें से निकला नकली शिवाजी। नये सिरे से फिर पीछा शुरू हुआ। तब तक महाराज तीस मील पारकर चुके थे; पर विशालगढ़ अभी दूर था। इधर शत्रुओं के घोड़ों की पदचाप सुनायी देने लगी थी।

इस समय शिवाजी एक संकरी घाटी से गुजर रहे थे। अचानक बाजीप्रभु ने उनसे निवेदन किया कि मैं यहीं रुकता हूँ। आप तेजी से विशालगढ़ की ओर बढ़ें। जब तक आप वहाँ नहीं पहुँचेंगे, तब तक मैं शत्रु को पार नहीं होने दूँगा। शिवाजी के सामने असम॰जस की स्थिति थी; पर सोच-विचार का समय नहीं था। आधे सैनिक बाजीप्रभु के साथ रह गये और आधे शिवाजी के साथ चले। निश्चय हुआ कि पहुँच की सूचना तोप दागकर दी जाएगी।

घाटी के मुख पर बाजीप्रभु डट गये। कुछ ही देर में सिद्दी जौहर के दामाद सिद्दी मसूद के नेतृत्व में घुड़सवार वहाँ आ पहंँचे। उन्होंने दर्रे में घुसना चाहा; पर सिर पर कफन बाँधे हिन्दू सैनिक उनके सिर काटने लगे। भयानक संग्राम छिड़ गया। सूरज चढ़ आया; पर बाजीप्रभु ने उन्हें घाटी में घुसने नहीं दिया। 

एक-एक कर हिन्दू सैनिक धराशायी हो रहे थे। बाजीप्रभु भी सैकड़ों घाव खा चुके थे; पर उन्हें मरने का अवकाश नहीं था। उनके कान तोप की आवाज सुनने को आतुर थे। विशालगढ़ के द्वार पर भी शत्रु सेना का घेरा था। उन्हें काटते मारते शिवाजी किले में पहुँचे और तोप दागने का आदेश दिया।

इधर तोप की आवाज बाजीप्रभु के कानों ने सुनी, उधर उनकी घायल देह धरती पर गिरी। शिवाजी विशालगढ़ पहुँचकर अपने उस प्रिय मित्र की प्रतीक्षा ही करते रह गये; पर उसके प्राण तो लक्ष्य पूरा करते-करते अनन्त में विलीन हो चुके थे। बाजीप्रभु देशपाण्डे की साधना सफल हुई। तब से वह बलिदानी घाटी (खिण्ड) पावन खिण्ड कहलाती है।

Saturday, 11 July 2020

23:25

12 जुलाईकर्मठ कार्यकर्ता सदानंद काकड़े जी की पुण्यतिथि पर विशेष-के सी शर्मा

संगठन द्वारा निर्धारित कार्य में पूरी शक्ति झांेक देने वाले श्री सदाशिव नीलकंठ (सदानंद) काकड़े का जन्म 14 जून, 1921 को बेलगांव (कर्नाटक) में हुआ था। उनके पिता वहीं साहूकारी करते थे। बलिष्ठ शरीर वाले पांच भाई और नौ बहनों के इस परिवार की नगर में धाक थी। बालपन में उन्होंने रंगोली, प्रकृति चित्रण, तैल चित्र आदि में कई पारितोषिक लिये। वे नाखून से चित्र बनाने में भी निपुण थे। मेधावी छात्र होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलती रही। उन्हें तेज साइकिल चलाने में मजा आता था। वास्तु शास्त्र, हस्तरेखा विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, अंक ज्ञान आदि भी उनकी रुचि के विषय थे।

रसायन शास्त्र में स्नातक सदानंद जी 1938 में स्वयंसेवक और 1942 में प्रचारक बने। नागपुर में श्री यादवराव जोशी से हुई भेंट ने उनके जीवन में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रारम्भ में वे बेलगांव नगर और तहसील कार्यवाह रहे। प्रचारक बनने पर वे बेलगांव नगर, जिला और फिर गुलबर्गा विभाग प्रचारक रहे। 1969 में उन्हें 'विश्व हिन्दू परिषद' में भेजा गया।

उन दिनों विश्व हिन्दू परिषद का काम प्रारम्भिक अवस्था में था। सदानंद जी को कर्नाटक प्रान्त के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी। 1979 में प्रयाग में हुए द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन में वे 700 कार्यकर्ताओं को एक विशेष रेल से लेकर आये। 1983 तक वे प्रांत और 1993 तक दक्षिण भारत के क्षेत्रीय संगठन मंत्री रहे। 1993 में उनका केन्द्र दिल्ली हो गया और वे केन्द्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री, उपाध्यक्ष और फिर परामर्शदाता मंडल के सदस्य रहे। 1983 में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की शताब्दी मनाने के लिए उन्होंने श्रीलंका, इंग्लैंड और अमरीका की यात्रा भी की।

बेलगांव में सदानंद जी का सम्पर्क श्री जगन्नाथ राव जोशी से हुआ, जो आगे चलकर प्रचारक और फिर दक्षिण में जनसंघ और भाजपा के आधार स्तम्भ बने। 'इतिहास संकलन समिति' के श्री हरिभाऊ वझे और वि.हि.प. के श्री बाबूराव देसाई भी अपने प्रचारक जीवन का श्रेय उन्हें ही देते हैं। गांधी हत्या के बाद एक क्रुद्ध भीड़ ने बेलगांव जिला संघचालक अप्पा साहब जिगजिन्नी पर प्राणघातक हमला कर दिया। इस पर सदानंद जी भीड़ में कूद गये और अप्पा साहब के ऊपर लेटकर सारे प्रहार झेलते रहे। इससे वे सब ओर प्रसिद्ध हो गये।

प्रारम्भ में संघ की सब गतिविधियों का केन्द्र बेलगांव ही था। कई वर्ष तक उनकी देखरेख में संघ शिक्षा वर्ग लगातार वहीं लगा; पर उसमें कभी घाटा नहीं हुआ। गोवा मुक्ति आंदोलन के समय देश भर से लोग बेलगांव होकर ही गोवा जाते थे। वर्ष 1995 में हुई द्वितीय एकात्मता यात्रा के वे संयोजक थे। इसमें सात बड़े और 700 छोटे रथ थे, जिन पर भारत माता,गंगा माता और गोमाता की मूर्तियां लगी थीं। सभी बड़े रथों के रेशीम बाग, नागपुर में मिलन के समय निवर्तमान सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस, सरसंघचालक श्री रज्जू भैया और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे भी उपस्थित हुए।

बहुभाषी सदानंद जी ने हिन्दी और मराठी में कई पुस्तकें लिखीं। ‘हिन्दू, हिन्दुत्व, हिन्दू राष्ट्र’ नामक पुस्तक का देश की नौ भाषाओं में अनुवाद हुआ। जगन्नाथ राव जोशी से उनके संबंध बहुत मित्रतापूर्ण थे। जोशी जी के देहांत के बाद उन्होंने आग्रहपूर्वक पुणे के श्री अरविन्द लेले से उनका जीवन परिचय लिखवाया और श्री ओंकार भावे से उसका हिन्दी अनुवाद कराया।

वर्ष 2005 से वे अनेक रोगों से पीड़ित हो गये। कई तरह के उपचार के बावजूद प्रवास असंभव होने पर वे आग्रहपूर्वक अपनी जन्मभूमि बेलगांव ही चले गये। वहां एक अनाथालय का निर्माण उन्होंने किसी समय कराया था। उसमें रहते हुए 12 जुलाई, 2010 को उनका शरीरांत हुआ।
23:23

11 जुलाईपहाड़ी गांधी बाबा काशीराम जी का जन्म दिवस पर विशेष-के सी शर्मा

बाबा काशीराम का नाम हिमाचल प्रदेश के स्वतन्त्रता सेनानियों की सूची में शीर्ष पर लिया जाता है। उनका जन्म ग्राम पद्धयाली गुर्नाड़ (जिला कांगड़ा) में 11 जुलाई, 1888 को हुआ था। इनके पिता श्री लखनु शाह तथा माता श्रीमती रेवती थीं। श्री लखनु शाह और उनके परिवार की सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत प्रतिष्ठा थी।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में अनेक लोकगीतों और कविताओं ने राष्ट्रभक्ति की ज्वाला को प्रज्वलित करने में घी का काम किया। इन्हें गाकर लोग सत्याग्रह करते थे और प्रभातफेरी निकालते थे। अनेक क्रान्तिकारी ‘वन्दे मातरम्’ और ‘मेरा रंग दे बसन्ती चोला’ जैसे गीत गाते हुए फाँसी पर झूल गये। उन क्रान्तिवीरों के साथ वे गीत और उनके रचनाकार भी अमर हो गये।

इसी प्रकार बाबा काशीराम ने अपने गीत और कविताओं द्वारा हिमाचल प्रदेश की बीहड़ पहाड़ियों में पैदल घूम-घूम कर स्वतन्त्रता की अलख जगायी। उनके गीत हिमाचल प्रदेश की स्थानीय लोकभाषा और बोली में होते थे। पर्वतीय क्षेत्र में ग्राम देवताओं की बहुत प्रतिष्ठा है। बाबा काशीराम ने अपने काव्य में इन देवी-देवताओं और परम्पराओं की भरपूर चर्चा की। इसलिए वे बहुत शीघ्र ही आम जनता की जिह्ना पर चढ़ गये।

1937 में गद्दीवाला (होशियारपुर) में सम्पन्न हुए सम्मेलन में नेहरू जी ने इनकी रचनाएँ सुनकर और स्वतन्त्रता के प्रति इनका समर्पण देखकर इन्हें ‘पहाड़ी गान्धी’ कहकर सम्बोधित किया। तब ये इसी नाम से प्रसिद्ध हो गये। जीवन में अनेक विषमताओं से जूझते हुए बाबा काशीराम ने अपने देश, धर्म और समाज पर अपनी चुटीली रचनाओं द्वारा गहन टिप्पणियाँ कीं। इनमें कुणाले री कहाणी, बाबा बालकनाथ कनै फरियाद, पहाड़ेया कन्नै चुगहालियाँ आदि प्रमुख हैं। 

उन दिनों अंग्रेजों के अत्याचार चरम पर थे। वे चाहे जिस गाँव में आकर जिसे चाहे जेल में बन्द कर देते थे। दूसरी ओर स्वतन्त्रता के दीवाने भी हँस-हँसकर जेल और फाँसी स्वीकार कर रहे थे। ऐसे में बाबा ने लिखा -

भारत माँ जो आजाद कराणे तायीं
मावाँ दे पुत्र चढ़े फाँसियाँ
हँसदे-हँसदे आजादी ने नारे लाई।।

बाबा स्वयं को राष्ट्रीय पुरुष मानते थे। यद्यपि पर्वतीय क्षेत्र में जाति-बिरादरी को बहुत महत्त्व दिया जाता है; पर जब कोई बाबा से यह पूछता था, तो वे गर्व से कहते थे -

मैं कुण, कुण घराना मेरा, सारा हिन्दुस्तान ए मेरा
भारत माँ है मेरी माता, ओ जंजीराँ जकड़ी ए।
ओ अंग्रेजाँ पकड़ी ए, उस नू आजाद कराणा ए।।

उनकी सभी कविताओं में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना के स्वर सुनाई देते हैं

काशीराम जिन्द जवाणी, जिन्दबाज नी लाणी
इक्को बार जमणा, देश बड़ा है कौम बड़ी है।
जिन्द अमानत उस देस दी
कुलजा मत्था टेकी कने, इंकलाब बुलाणा।।

इसी प्रकार देश, धर्म और राष्ट्रीयता के स्वर बुलन्द करते हुए बाबा काशीराम 15 अक्तूबर, 1943 को इन दुनिया से विदा हो गये। हिमाचल प्रदेश में आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उनके गीत गाकर उन्हें याद किया जाता है।