महर्षि अरविंद की धर्मपत्नी मृणालिनी देवी जी की पुण्यतिथि पर पर विशेष रिपोर्ट के सी शर्मा की कलम से




के सी शर्मा*
ऋषि अरविन्द को याद करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी साधना एवं प्रेरक जीवन के पीछे उनकी पत्नी मृणालिनी देवी का बहुत बड़ा योगदान था, जिनकी मूकसाधना ने सदा उनकी सहायता की। मृणालिनी का जन्म प्राकृतिक सुषमा से भरपूर शिलांग में 1888 में हुआ था। उनके पिता श्री भूपालचन्द्र बसु एक वरिष्ठ राजकीय अधिकारी थे, जो कुछ समय पूर्व ही इंग्लैण्ड से भारत वापस लौटे थे।

दूसरी ओर अरविन्द का जन्म भारत में हुआ था। दार्जिलिंग में कुछ समय बिताने के बाद उन्हें छोटी अवस्था में ही शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेज दिया गया। उन्हें शुरू से ही भारतीय संस्कृति और आचार व्यवहार से दूर रखा गया था; पर भारत लौटने पर अरविन्द को असीम शान्ति मिली और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ होने लगीं। जब उन्होंने विवाह की इच्छा प्रकट की, तो मृणालिनी के कोलकाता में अभिभावक गिरीशचन्द्र बोस ने उन्हें अपने घर बुलाया। वहाँ 29 वर्षीय अरविन्द ने 13 वर्षीय मृणालिनी को पसन्द कर लिया। कुछ समय बाद दोनों का विवाह हो गया।

विवाह का पहला साल दोनों के लिए सुखद रहा, फिर अरविन्द बड़ोदरा और मृणालिनी पिता के पास शिलांग चली गयी। इसके बाद वे दोनों साथ नहीं रह पाये। मृणालिनी या तो अपने पिता के पास शिलांग रहतीं या अरविन्द के मामा के पास देवघर में। यद्यपि कोलकाता में अरविन्द उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखते थे; पर वे अपनी पत्नी को समय नहीं दे पाते थे। फिर भी मृणालिनी ने कभी शिकायत नहीं की।

1908 में एक दिन पुलिस ने उनके घर छापा मारा और दक्षिणेश्वर से लायी गयी रेत को बम का मसाला कहकर अरविन्द को पकड़ लिया। इसका मृणालिनी के मन पर बहुत असर पड़ा। वे मूर्छित हो गयीं। ईश्वर से उनका विश्वास उठ गया; पर उनकी बालसखी सुधीरा उन्हें रामकृष्ण परमहंस की पत्नी सारदा देवी के पास ले गयीं। उनके समझाने से मृणालिनी शान्त हुईं।

मृणालिनी का अंग्रेजी-ज्ञान एवं उच्चारण बहुत अच्छा था। उन्हें फूलों से बहुत प्रेम था। पुष्प वाटिका में बैठकर वे प्रायः ध्यानमग्न हो जातीं थीं। अरविन्द की आध्यात्मिक रुचि को देखकर उन्होंने अपना जीवन भी साध्वी जैसा बना लिया। ध्यान, भक्ति साहित्य का अध्ययन, भजन सुनना एवं गाना, सादा भोजन और सादे वस्त्र ही वे धारण करती थीं।

रोगियों की सेवा करने में उन्हें विशेष सन्तोष मिलता था। अरविन्द कहते थे कि उनका सम्बन्ध कई जन्मों से है। वे स्वयं को भगवान् श्रीकृष्ण का पुत्र अनिरुद्ध तथा मृणालिनी को उसकी पत्नी (राजा बाणासुर की पुत्री उषा) के रूप में देखते थे।

अरविन्द उन्हें पत्र लिखते रहते थे। 17 साल के दीर्घ वियोग के बाद 1918 में उन्होंने लिखा कि अब मेरी साधना पूर्ण हो गयी है। मुझे अपना उद्देश्य और सिद्धि प्राप्त हो गयी है। अब तुम मेरे साथ आकर रह सकती हो। इस पत्र से सबको बहुत प्रसन्नता हुई। मृणालिनी के पिता ने उन्हें पाण्डिचेरी ले जाने के लए शासन से अनुमति भी ले ली; पर मृणालिनी को मलेरिया हो गया। उस रोग से ही 17 दिसम्बर, 1918 को उनका देहान्त हो गया। अन्तिम समय पर भी उनका ध्यान अरविन्द के स्मरण में ही था।

वस्तुतः मृणालिनी के सहयोग से ही अरविन्द उस आध्यात्मिक ऊँचाई तक पहुँच सके, जिसके लिए उन्हें याद किया जाता है।