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Monday, 17 February 2020

मलारना चौड़ में श्रेष्ठ कृषि योग्य भूमि व पर्याप्त पानी की उपलब्धता के बावजूद भी किसानों की खेती कार्य में गहरी रुचि ना होने से पैदावार को नहीं मिल रहा बढ़ावा।




सवाई माधोपुर@ रिपोर्टर चंद्रशेखर शर्मा। सवाई माधोपुर जिले के मलारना डूंगर उपखंड क्षेत्र के  मलारना चौड़ कस्बे में पानी की अधिकता को देखते हुए अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां पर कृषि की पैदावार का ग्राफ आसपास के क्षेत्र की अपेक्षा अधिक होगा। लेकिन यह सिर्फ उन लोगों का अनुमान भर है। जो ऐसा सोचते हैं, क्योंकि आसपास के क्षेत्र की अपेक्षा मलारना चौड़ कस्बे में भी तीनों ही (रबि खरीफ, जायद) फसलों का उत्पादन लगभग सामान्य स्तर पर ही है। जबकि कस्बे के चारों ओर छोटे बड़े सभी मिलाकर आधा दर्जन तालाब है जिनमें वर्ष पर्यंत पानी की उपलब्धता रहती है। किसी वर्ष अच्छी बरसात के चलते मोरेल बांध में पानी की अधिक आवक होने पर नहर द्वारा छोड़े जाने वाले पानी से जहां खेतों में फसलों की पिलाई/सिंचाई की जाती है वहीं अतिरिक्त पानी नालों के द्वारा बहकर कर वापिस तालाबों में आ भरता है। जिससे तालाबों का जलस्तर लगभग समान बना रहता है। लेकिन उचित जल प्रबंधन के अभाव एवं पानी के दुरुपयोग के चलते मलारना चौड़ कस्बे में पेयजल किल्लत एवं खेतों की सिंचाई के लिए पानी की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। जमीन के ऊपरी स्तर पर जल भराव क्षमता के हिसाब से मलारना चौड़ जिले में भले ही सर्वोपरि हो लेकिन खेती- किसानी में  जिलेभर में मलारना चौड़ का कोई खास वजूद नहीं हैं। इस सबके पीछे खास वजह है, पानी का का कुप्रबंधन एवं खेती और कृषि पैदावार के प्रति किसानों व लोगों की अरुचि।
जबकि क्षेत्र अंतर्गत  आस -पास के गांव के खेतों में पीली- लाल मिट्टी की बहुलता है, जो की खेती कार्य के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं है, वहीं मलारना चौड़ व उसके नजदीकी गांवों में काली दोमट मिट्टी पाई जाती है। जो खरीफ की फसल में मक्का व बाजरे के लिए तो रबी की फसल में गेहूं ,चना सरसों के साथ-साथ अलसी के लिए भी उपयुक्त और उपयोगी है ।
लेकिन यहाँ के किसान अक्सर खेतो को *सावणु* रखते है और एक ही फसल उगाते है। अधिक मूल्य प्राप्ति के चक्कर में किसानों द्वारा सरसों की खेती बहुत अधिक मात्रा में की जाती है।जिसके चलते खेती की उपजाऊता या मिट्टी के उपजाऊपन में भी अनवरत गिरावट महसूस की जा रही है। विगत एक दशक पर नजर डाली जाए तो पिछले दो-तीन सालों से पानी की उपलब्धता की स्थिति में इजाफा हुआ है। पर्याप्त जलभराव के चलते कुछ स्थिति खेती को लेकर जरूर बदली है। 2-3 वर्षों पर नजर डालें तो यहाँ दो फसलें उगाने का रिवाज अब चल पड़ा है। जिससे किसानों को कुछ हद तक फायदा भी मिलने लगा है । लेकिन काली दोमट (चिकनी मिट्टी) होने के कारण यहां नमी अधिक समय तक बनी रखती है , इसकी वजह से अत्यधिक बारिश होने के कारण खरीफ की फसलें अक्सर खराब हो जाती है। वर्षा अधिक होने के कारण इस वर्ष भी खरीफ की फसल को काफी नुकसान पहुंचा। और किसान खाद/बीज व मेहनत, मजदूरी पर खर्च करने के बावजूद भी  फसल गलने के कारण कर्ज के बोझ तले आ गये। लेकिन माना जाता है कि ईश्वर एक हाथ से लेता है तो दूसरे हाथ से अवश्य देता है , कमोबेश यही स्थिति यहां पर बन रही है, क्योंकि मोरेल बांध में पानी के भराव और नहरों में लगातार पानी की आवक के चलते इस बार रबि की फसल के बंपर पैदावार की उम्मीद  किसानों को जगी है। क्योंकि उनकी फसलों को सिंचाई हेतु पर्याप्त जल मिला है।फिर भी खेती और किसानी में  यहां का किसान अन्य क्षेत्र के किसानों की अपेक्षा मेहनतकशी के प्रति लापरवाह नजर आता है। इन सबके पीछे मुख्य वजह है, उसका आलसी स्वभाव। इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि  बाजारों में चाय की थड़ीयों पर किसान की मौजूदगी ,ताश- पत्तियों के खेल में बढ़ती रुचि तथा राजनीति के फेर में भी उसकी बढ़ती दिलचस्पी भी इसका एक कारण है। कृषि योग्य उपयुक्त मिट्टी/ भूमि और पर्याप्त मात्रा में जलभराव के बावजूद भी कृषि पैदावार में बढ़ोतरी नहीं होना  यहां सिर्फ और सिर्फ कम मेहनत को दर्शाता है।1-2 दशक पीछे की ओर झांक कर देखे तो यहां पर कृषि पैदावार कि काफी उन्नत स्थिति थी। लोग भी मेहनतकश थे। अब हालात बिल्कुल उलट है। कई स्वार्थी लोगों द्वारा भी तालाबों में भरे पानी का अपने खेतों में सिंचाई हेतु प्रशासन की रोकथाम के बावजूद भी अनर्गल तरीके से निकास किया जाता है। रात्रि काल में इंजनों द्वारा पानी की चोरी के चलते कई गैलन लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है। जिसके चलते तालाबों में गर्मी तक पानी की कमी हो जाती है। कई मर्तबा तो कुओं व हैंडपंपों का जलस्तर भी गहराई में चला जाता है ,तो  पशु - पक्षियों के लिए पानी की किल्लत ही नहीं, लोगों के सामने भी पीने के पानी की समस्या आ खड़ी होती है। इसका सीधा - सीधा असर नलकूपों और नलों द्वारा होने वाली पेयजल सप्लाई पर भी पड़ता है।इसलिए कई बार यहां पेयजल की भी समस्या लोगों के लिए सिरदर्द बन जाती है। धीरे-धीरे अब खेती के भी मायने बदलने लगे हैं। रबि, खरीफ व जायद की फसलों के प्रति घटती रुचि के चलते अब क्षेत्र के किसानों में फलों की पैदावार के प्रति जागरूकता बढ़ी है। इसलिए सवाई माधोपुर जिले के करमोदा कस्बे में बहुतायत में होने वाली अमरूद की खेती की बंपर पैदावार की नकल करते हुए  पिछले साल से कई कृषकों का रुझान *अमरूद*  की खेती की ओर बढ़ा है। गांव में सेकड़ो हेक्टेयर बगीचे पिछले साल लगाए गए हैं। मसलन अमरूद की खेती का चलन क्षेत्र में अब एक दूसरे की देखा- देखी के चलते और अधिक बढ़ चला है।
मलारना चौड़ में कस्बे में *माली व कीर जाति* पारम्परिक रूप से क्रमशः सब्जियां व सिंगाड़े व जायद की फसल उगाने लिये जानी जाती है।
कस्बे की शान कहे जाने वाले  दुर्गासागर तालाब में हर वर्ष पानी की उपलब्धता के चलते कीर(कहार) जाति के लोगों द्वारा सिघाड़े की खेती की जाती है। दो-तीन तालाबों में उनके द्वारा सिंघाड़े की बेल लगाकर सिंघाड़े उगाए जाते हैं। तालाब का जल एकदम शुद्ध होने के कारण यहाँ के सिंघाड़े अपने मीठेपन के लिये भी आसपास के क्षेत्र में बेहद प्रसिद्ध है। यहाँ से सिघाड़ों का निर्यात जिला मुख्यालय समेत गंगापुर सिटी, बौंली, जैसे विभिन्न भागों सहित दौसा व दौसा जिले के सीमावर्ती उपखंड मुख्यालय लालसोट तक किया जाता है।
रिकार्ड बारिश होने पर यहाँ के पांचों तालाब लालबल हो जाते है । जिससे कीर जाती जायद की फसल में ककड़ी, खरबूज ,तरबूज के अलावा टिंडा, करेला, भिण्डी, गंवार की फली आदि मौसमी सब्जियां भी उगाते है।।

कस्बे मलारना चौड़ में *मीणा, गद्दी, पूर्वीया व माली* प्रमुख मेहनतकश जातियां है। इनके अलावा अन्य जातियां भी खेती के काम से जुड़ी हुई है।।
*गौरतलब है कि मलारना चौड़ कस्बे  में 54 से अधिक जातियां व तीन धर्मो के लोग निवास करते हैं। जिनमें  परस्पर आपस में भाईचारे की भावना और सहयोगात्मक भाव का समावेश है।
फ़ोटो: में हीरालाल माली के खेत में मूली की बम्पर पैदावार, हाथ - पैर के बराबर मूली का आकार।

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