नरसिंह प्राकट्योत्सव के पावन पर्व पर विशेष

हिन्दू पंचांग के अनुसार भगवान नरसिंह  प्राकट्योत्सव का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है।
 पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लेकर असुरों का अंत कर धर्म कि रक्षा की थी। तभी से भगवान नृसिंह का प्राकट्योत्सव संपूर्ण भारत वर्ष में धूम धाम से मनाया जाता है।

*नृसिंह मंत्र*


ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥

अर्थात:

हे क्रुद्ध एवं शूर-वीर महाविष्णु, तुम्हारी ज्वाला एवं ताप चतुर्दिक फैली हुई है। हे नरसिंहदेव, तुम्हारा चेहरा सर्वव्यापी है, तुम मृत्यु के भी यम हो और मैं तुम्हारे समक्षा आत्मसमर्पण करता हूँ।

*श्री नृसिंह स्तवः*


प्रहलाद ह्रदयाहलादं भक्ता विधाविदारण। शरदिन्दु रुचि बन्दे पारिन्द् बदनं हरि ॥१॥

नमस्ते नृसिंहाय प्रहलादाहलाद-दायिने। हिरन्यकशिपोर्ब‍क्षः शिलाटंक नखालये ॥२॥

इतो नृसिंहो परतोनृसिंहो, यतो-यतो यामिततो नृसिंह। बर्हिनृसिंहो ह्र्दये नृसिंहो, नृसिंह मादि शरणं प्रपधे ॥३॥

तव करकमलवरे नखम् अद् भुत श्रृग्ङं। दलित हिरण्यकशिपुतनुभृग्ङंम्। केशव धृत नरहरिरुप, जय जगदीश हरे ॥४॥

वागीशायस्य बदने लर्क्ष्मीयस्य च बक्षसि। यस्यास्ते ह्र्देय संविततं नृसिंहमहं भजे ॥५॥

श्री नृसिंह जय नृसिंह जय जय नृसिंह। प्रहलादेश जय पदमामुख पदम भृग्ह्र्म ॥६॥

*नृसिंह जी अवतरण कथा-!*


सतयुग में ऋषि कश्यप के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरणाकश्यप, हिरण्याक्ष भगवान ब्रह्म से मिले वरदान की वजह से बहुत अहंकारी हो गया था। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए वो भूदेवी को साथ लेकर पाताल में भगवान विष्णु की खोज में चला गया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार में उसके साथ युद्ध किया और उसका विनाश कर दिया। लेकिन संसार के लिए खतरा अभी टला नही था क्योंकि उसका भाई हिरणाकश्यप अपने भाई के मौत की बदला लेने को आतुर था उसने देवताओ से बदला लेने के लिए अपनी असुरो की सेना से देवताओ पर आक्रमण कर दिया। हिरणाकश्यप देवताओ से लड़ता लेकिन हर बार भगवान विष्णु उनकी मदद कर देते।
हिरणाकश्यप ने सोचा “अगर मुझे विष्णु को हराना है तो मुझे अपनी रक्षा के लिए एक वरदान की आवश्यकता है क्योंकि मै जब भी देवताओ और मनुष्यों पर आक्रमण करता हु , विष्णु मेरी सारी योजना तबाह कर देता है ……उससे लड़ने के लिए मुझे शक्तिशाली बनना पड़ेगा  ”|अपने दिमाग में ऐसे विचार लेकर वो वन की तरफ निकल पड़ता है और भगवान ब्रह्मा की तपस्या में लीन हो जाता हो वो काफी लम्बे समय तक तपस्या में इसलिए रहना चाहता था ताकि वो भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान मांग सके इस दौरान वो अपने ओर अपने साम्राज्य के बारे में भूलकर कठोर तपस्या में लग जाता है।

इस दौरान इंद्रदेव को ये ज्ञात होता है कि हिरणाकश्यप असुरो का नेतृत्व नही कर रहा है। इंद्रदेव सोचते है कि ” यदि इस समय असुरो को समाप्त कर दिया जाए तो फिर कभी वो आक्रमण नही कर पाएंगे   हिरणाकश्यप के बिना असुरो की शक्ति आधी है अगर इस समय इनको खत्म कर दिया जाए तो हिरणाकश्यप के लौटने पर उसका आदेश मानने वाला कोई शेष नही रहेगा| “” ये सोचते हुए इंद्र अपने दुसरे देवो के साथ असुरो के साम्राज्य पर आक्रमण कर देते है। इंद्रदेव के अपेक्षा के अनुसार हिरणाकश्यप के बिना असुर मुकाबले में कमजोर पड़ गये और युद्ध में हार गये। इंद्रदेव ने असुरो के कई समूहों को समाप्त कर दिया।

हिरणाकश्यप की राजधानी को तबाह कर इन्द्रदेव ने हिरणाकश्यप के महल में प्रवेश किया जहा पर उनको हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू नजर आयी इंददेव ने हिरणाकश्यप की पत्नी को बंदी बना लिया ताकि भविष्य में हिरणाकश्यप के लौटने पर उसके बंधक बनाने के उपयोग कर पाए इंद्रदेव जैसे ही कयाधू को इंद्र लोक लेकर जाने लगे महर्षि नारद प्रकट हुए और उसी समय इंद्र को कहा “इंद्रदेव  रुक जाओ  आप ये क्या कर रहे हो ”   महर्षि नारद  इंद्रदेव के कयाधू को अपने रथ में ले जाते देख क्रोधित हो गये इंददेव में नतमस्तक होकर महर्षि नारद से कहा “महर्षि हिरणाकश्यप के नेतृत्व के बिना असुरो पर आक्रमण किया है और मेरा मानना है कि असुरो के आतंक को समाप्त करने का यही समय है”

वहा के विनाश को देखकर महर्षि नारद ने क्रोधित स्वर में कहा “हा ये सत्य है मै देख सकता हु लेकिन ये औरत इसमें कहा से आयी , क्या इसने तुमसे युद्ध किया , मुझे ऐसा नही लग रहा है कि इसने तुम्हारे विरुद्ध कोई शस्र उठाया है फिर तुम उसको क्यों चोट पंहुचा रहे हो ? “इंद्रदेव ने महर्षि नारद  की तरफ देखते हुए जवाब दिया कि वो उसके शत्रु हिरणाकश्यप की पत्नी है जिसे वो बंदी बना करले जा रहा है ताकि हिरणाकश्यप कभी आक्रमण करे तो वो उसका उपयोग कर सके महर्षि नारद ने गुस्से में इन्द्रदेव को कहा कि केवल युद्ध जीतने के लिए दुसरे की पत्नी का अपहरण करोगे और इस निरपराध स्त्री को ले जाना महापाप होगा।

इंद्रदेव को महर्षि नारद  की बाते सुनने के बाद कयाधू को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नही था इंद्रदेव ने कयाधू को छोड़ दिया और महर्षि नारद को उसका जीवन बचाने के लिए धन्यवाद दिया महर्षि नारद ने पूछा कि असुरो के विनाश के बाद वो अब कहा रहेगी कयाधू उस समय गर्भवती थी और अपनी संतान की रक्षा के लिए उसने महर्षि नारद को उसकी देखभाल करने की प्रार्थना की महर्षि नारद  उसको अपने घर लेकर चले गये और उसकी देखभाल की इस दौरान वो कयाधू को विष्णु भगवान की कथाये भी सुनाया करते थे जिसको सुनकर कयाधू को भगवान विष्णु से लगाव हो गया था उसके गर्भ में पल रहे शिशु को भी विष्णु भगवान की कहानियों ने मोहित कर दिया था

समय गुजरता गया एक दिन स्वर्ग की वायु इतनी गर्म हो गयी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था कारण खोजने पर देवो को पता चला कि हिरणाकश्यप की तपस्या बहुत शक्तिशाली हो गयी थी जिसने स्वर्ग को भी गर्म कर दिय था इस असहनीय गर्मी को देखते हुए देव भगवान ब्रह्मा के पास  गये और मदद के लिए कहा  भगवान ब्रह्मा को हिरणाकश्यप से मिलने के लिए धरती पर प्रकट होना पड़ा भगवान ब्रह्मा हिरणाकश्यप की कठोर तपस्या से बहुत प्रस्सन हुए और उसे वरदान मांगने को कहा।

हिरणाकश्यप  ने नतमस्तक होकर कहा 
“भगवान मुझे अमर बना दो ”

भगवान ब्रह्मा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “पुत्र , जिनका जन्म हुआ है उनकी मृत्यु निश्चित है मै सृष्टि के नियमो को नही बदल सकता हु कुछ ओर मांग लो ”

हिरणाकश्यप अब सोच में पड़ गया क्योंकि जिस वरदान के लिए उसने तपस्या की वो प्रभु ने देने से मना कर दिया। हिरणाकश्यप अब विचार करने लगा कि अगर वो असंभव शर्तो पर म्रत्यु का वरदान मांगे तो उसकी साधना सफल हो सकती है। हिरणाकश्यप ने कुछ देर ओर सोचते हुए भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा।

“प्रभु मेरी इच्छा है कि मै ना तो मुझे मनुष्य मार सके और ना ही जानवर , ना मुझे कोई दिन में मार सके और ना ही रात्रि में , ना मुझे कोई स्वर्ग में मार सके और ना ही पृथ्वी पर , ना मुझे कोई घर में मार सके और ना ही घर के बाहर , ना कोई मुझे अस्त्र से मार सके और ना कोई शस्त्र से ”

हिरणाकश्यप का ये वरदान सुनकर एक बार तो ब्रह्मा खुडी चकित रह गये कि  हिरणाकश्यप  का ये वरदान बहुत विनाश करसकता है लेकिन उनके पास वरदान देने के अलावा ओर कोई विकल्प नही था। भगवान ब्रह्मा ने तथास्तु कहते हुए मांगे हुए वरदान के पूरा होने की बात कही और वरदान देते ही भगवान ब्रह्मा अदृश्य हो गये हिरणाकश्यप खुशी से अपने साम्राज्य लौट गया और इंद्रदेव द्वारा किये विनाश को देखकर बहुत दुःख हुआ। उसने इंद्रदेव से बदला लेने की ठान ली और अपने वरदान के बल पर इंद्रलोक पर आक्रमण कर दिया। इंद्रदेव  के पास कोई विकल्प ना होते हुए वो सभी देवो के साथ देवलोक चले गये हिरणाकश्यप अब इंद्रलोक का राजा बन गया।

हिरणाकश्यप अपनी पत्नी कयाधू को खोजकर घर लेकर आ गया कयाधू के विरोध करने के बावजूद हिरणाकश्यप मनुष्यों पर यातना ढाने लगा और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाला अब कोई नही था अब कयाधू ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रहलाद रखा गया जैसे जैसे प्रहलाद बड़ा होता गया वैसे वैसे हिरणाकश्यप ओर अधिक शक्तिशाली होता गया हालांकि प्रहलाद अपने पिता से बिलकुल अलग था और किसी भी जीव को नुकसान नही पहुचता था। वो भगवान विष्णु का अगाध भक्त था और जनता उसके अच्छे व्यवाहर की वजह से उससे प्यार करती थी।

एक दिन गुरु शुक्राचार्य प्रहलाद की शिकायत लेकर हिरणाकश्यप के पास पहुचे और कहा “महाराज , आपका पुत्र हम जो पढ़ाते है वो नही पढ़ता है और सारा समय विष्णु के नाम ने लगा रहता है  ” हिरणाकश्यप ने उसी समय गुस्से में प्रहलाद को बुलाया और पूछा कि वो दिन भर विष्णु का नाम क्यों लेता रहता है। प्रहलाद ने जवाब दिया “पिताश्री , भगवान विष्णु ही सारे जगत के पालनहार है इसलिए मै उनकी पूजा करता हु मै दुसरो की तरफ आपके आदेशो को मानकर आपकी पूजा नही कर सकता हुआ “।

हिरणाकश्यप ने अब शाही पुरोहितो से उसका ध्यान रखने को  कहा और विष्णु का जाप बंद कराने को कहा लेकिन कोई फर्क नही पड़ा इसके विपरीत गुरुकुल में प्रहलाद दुसरे शिष्यों को भी उसकी तरह भगवान विष्णु की आराधना करने के लिए प्रेरित करने लगा।

हिरणाकश्यप ने परेशान होकर फिर प्रहलाद को बुलाया और पूछा “पुत्र तुम्हे सबसे प्रिय क्या है ?”

प्रहलाद ने जवाब दिया “मुझे भगवान विष्णु का नाम लेना सबसे प्रिय लगता है ”

अब हिरणाकश्यप ने पूछा “इस सृष्टि में सबसे शक्तिमान कौन है ?”

प्रहलाद ने फिर उत्तर दिया “तीन लोको के स्वामी और जगत के पालनहार भगवान विष्णु सबसे सर्वशक्तिमान है  “

अब हिरणाकश्यप को अपने गुस्से पर काबू नही रहा और उसने अपने पहरेदारो से प्रहलाद को विष देने को कहा प्रहलाद ने विष का प्याला पूरा पी लिया लेकिन उसकी मृत्यु नही हुयी सभी व्यक्ति इस चमत्कार को देखकर अचम्भित रह गये। अब हिरणाकश्यप ने आदेश दिया कि प्रहलाद को बड़ी चट्टान से बांधकर समुद्र में फेंक दो लेकिन फिर चमत्कार हुआ और रस्सिया अपने आप खुल गयी भगवान विष्णु का नाम लेकर वो समुद्र जल से बाहर आ गया इसके बाद एक दिन जब प्रहलाद भगवान विष्णु के ध्यान में मग्न था तब उस  पर उन्मत्त हाथियों के झुण्ड को छोड़ दिया लेकिन वो हाथी उसके पास शांति से बैठ गये।

अब हिरणाकश्यप ने अपनी बहन होलिका और बुलाया और कहा “बहन तुम्हे भगवान से वरदान मिला है कि तुम्हे अग्नि से कोई नुकसान नही होगा , मै तुम्हारे इस वरदान क परखना चाहता हु , मेरा पुत्र प्रहलाद दिन भर विष्णु का नाम जपता रहता है और मुझसे सामना करता है …मै उसकी सुरत नही देखना चाहता हु …..मै उसे मारना चाहता हु क्योंकि वो मेरा पुत्र नही है …..मै चाहता हु कि तुम प्रहलाद को गोद में बिठाकर अग्नि पर बैठ जाओ   ”   होलिका ने अपने भाई की बात स्वीकार कर ली।
अब होलिका ने ध्यान करते हुए प्रहलाद को अपनी गोद में बिठाया और हिरणाकश्यप को आग लगाने को कहा हिरणाकश्यप प्रहलाद के भक्ति की शक्ति को नही जानता था फिर भी आग से प्रतिरक्षित होलिका जलने लग गयी और उसके पापो ने उसका नाश कर दिया जब आग बुझी तो प्रहलाद  उस जली हुयी जगह के मध्य अभी भी ध्यान में बैठा हुआ था जबकि होलिका कही भी नजर नही आयी।

अब हिरणाकश्यप भी घबरा गया और प्रहलाद को ध्यान से खीचते हुए ले गया और चिल्लाते हुए बोला “तुम कहते हो तुम्हारा विष्णु हर जगह पर है , बताओ अभी विष्णु कहा पर है  ? वो पेड़ के पीछे है या मेरे महल में है या इस स्तंभ में है बताओ ?

प्रहलाद ने अपने पिता की आँखों में आँखे मिलाकर कहा  “हां पिताश्री , भगवान विष्णु हर जगह पर है ”

क्रोधित हिरणाकश्यप ने अपने गदा से स्तम्भ पर प्रहार किया और गुस्से से कहा “तो बताओ वो कहा है “

हिरणाकश्यप दंग रह गया और देखा कि वो स्तम्भ चकनाचूर हो गया और उस स्तम्भ से एक क्रूर पशु निकला जिसका मुंह शेर का और शरीर मनुष्य जैसा था
। हिरणाकश्यप उस आधे पशु और आधे मानव को देखकर पीछे हट गया तभी उस आधे पशु और आधे मानव ने जोर से कहा “मै नारायण का अवतार नरसिंह हु और मै तुम्हारा विनाश करने आया हु “ हिरणाकश्यप उसे देखकर जैसे ही बच कर भागने लगा तभी नरसिंह ने पंजो से उसे जकड़ दिया हिरणाकश्यप ने अपने आप को छुडाने के बहुत कोशिश की लेकिन नाकाम रहा।

नरसिंह अब हिरणाकश्यप को घसीटते हुए दरवाजे की चौखट तक ले गया [जो ना घर में था और ना घर के बाहर ] और उसे अपनी गोद में  बिठा दिया [जो ना आकाश में था और ना ही धरती पर ] और सांझ के समय [ना ही दिन और ना ही रात ] हिरणाकश्यप को अपने पंजो [नाहे अस्त्र ना ही शस्त्र ] से उसका वध कर दिया| हिरणाकश्यप का वध करने के बाद दहाड़ते हुए नरसिंह सिंहासन पर बैठ गया।

सारे असुर ऐसे क्रूर पशु को देखकर भाग गये और देवताओ की भी नरसिंह के पास जाने की हिम्मत नही हुयी अब बिना डरे हुए प्रहलाद आगे बढ़ा और नरसिंहा से प्यार से कहा “प्रभु , मै जानता हु कि आप मेरी रक्षा के लिए आये हो ” नरसिंह ने मुस्कुराकर जवाब दिया “हां पुत्र मै तुम्हारे लिए ही आया हु , तुम चिंता मत करो तुम्हे इस कहानी का ज्ञान नही है कि तुम्हारे पिता मेरे द्वारपाल विजय है उन्हें एक श्राप के कारण पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा और तीन ओर जन्मो के पश्चात उसे फिर वैकुण्ठ में स्थान मिल जाएगा इसलिए तुम्हे चिंता करने की कोई आवश्यकता नही है ”।

प्रहलाद ने अपना सिर हिलाते हुए कहा “प्रभु अब मुझे कुछ नही चाहिए “

नरसिंह ने अपना सिर हिलाया और कहा “नही पुत्र तुम जनता पर राज करने के लिए बने हो  और तुम अपने जनता की सेवा करने के पश्चात वैकुण्ठ आना “

प्रहलाद अब असुरो का उदार शासक बन गया जिसने अपने शाशनकाल के दौरान प्रसिधी पायी और असुरो के पुराने क्रूर तरीके समाप्त कर दिए।

*भगवान नृसिंह की मृत्यु का रहस्य*


अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। लाल आंखें और क्रोध से लदे चेहरे के साथ वे इधर-उधर घूमने लगे। उन्हें देखकर हर कोई भयभीत हो गया।

भगवान नृसिंह के क्रोध से तीनों लोक कांपने लगे, इस समस्या के समाधान के लिए सभी देवता गण ब्रह्मा जी के साथ भगवान शिव के पास गए। उन्हें यकीन था कि भगवान शिव के पास इस समस्या का हल अवश्य होगा। सभी ने मिलकर महादेव से प्रार्थना की कि वे नृसिंह देव के क्रोध से बचाएं।

भगवान शिव ने पहले वीरभद्र को नृसिंह देव के पास भेजा, लेकिन ये युक्ति पूरी तरह नाकाम रही। वीरभद्र ने भगवान शिव से यह अपील की कि वे स्वयं इस मसले में हस्तक्षेप करें और व्यक्तिगत तौर पर इस समस्या का हल निकालें।

भगवान महेश, जिन्हें ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली माना जाता है, वे नृसिंह देव के सामने कमजोर पड़ने लगे। महादेव ने मानव, चील और सिंह के शरीर वाले भगवान सरबेश्वर का स्वरूप लिया।

शरभ उपनिषद के अनुसार भगवान शिव ने 64 बार अवतार लिया था, भगवान सरबेश्वर उनका 16वां अवतार माना जाता है। सरबेश्वर के आठ पैर, दो पंख, चील की नाक, अग्नि, सांप, हिरण और अंकुश, थामे चार भुजाएं थीं।

ब्रह्मांड में उड़ते हुए भगवान सरबेश्वर, नृसिंह देव के निकट आ पहुंचे और सबसे पहले अपने पंखों की सहायता से उन्होंने नृसिंह देव के क्रोध को शांत करने का प्रयत्न किया। लेकिन उनका यह प्रयत्न बेकार गया और उन दोनों के बीच युद्ध प्रारंभ हो गया। यह युद्ध करीब 18 दिनों तक चला।

जब भगवान सरबेश्वर ने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए अपने एक पंख में से देवी प्रत्यंकरा को बाहर निकाला, जो नृसिंह देव को निगलने का प्रयास करने लगीं। नृसिंह देव, उनके सामने कमजोर पड़ गए, उन्हें अपनी करनी पर पछतावा होने लगा, इसलिए उन्होंने देवी से माफी मांगी।

शरब के वार से आहत होकर नृसिंह ने अपने प्राण त्यागने का निर्णय लिया और फिर भगवान शिव से यह प्रार्थना की कि वह उनकी चर्म को अपने आसन के रूप में स्वीकार कर लें।

भगवान शिव ने नृसिंह देव को शांत कर सृष्टि को उनके कोप से मुक्ति दिलवाई थी। नृसिंह और ब्रह्मा ने सरबेश्वर के विभिन्न नामों का जाप शुरू किया जो मंत्र बन गए।

तब सरबेश्वर भगवान ने यह कहा कि उनका अवतरण केवल नृसिंह देव के कोप को शांत करने के लिए हुआ था। उन्होंने यह भी कहा कि नृसिंह और सरबेश्वर एक ही हैं। इसलिए उन दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।

अपने प्राण त्यागने के बाद नृसिंह भगवान विष्णु के तेज में शामिल हो गए और शिव ने उनकी चर्म को अपना आसन बना लिया। इस तरह भगवान नृसिंह की दिव्य लीला का समापन हुआ।

श्री लक्ष्मीनृसिंह अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र


।। ॐ श्रीं ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय नम: श्रीं ॐ।।

नारसिंहो महासिंहो दिव्यसिंहो महीबल:।
उग्रसिंहो महादेव: स्तंभजश्चोग्रलोचन:।।

रौद्र: सर्वाद्भुत: श्रीमान् योगानन्दस्त्रीविक्रम:।
हरि: कोलाहलश्चक्री विजयो जयवर्द्धन:।।

पञ्चानन: परंब्रह्म चाघोरो घोरविक्रम:।
ज्वलन्मुखो ज्वालमाली महाज्वालो महाप्रभु:।।

निटिलाक्ष: सहस्त्राक्षो दुर्निरीक्ष्य: प्रतापन:। 
महाद्रंष्ट्रायुध: प्राज्ञश्चण्डकोपी सदाशिव:।। 

हिरण्यकशिपुध्वंसी दैत्यदानवभञ्जन:।
गुणभद्रो महाभद्रो बलभद्र: सुभद्रक:।।

करालो विकरालश्च विकर्ता सर्वकर्तृक:।
शिंशुमारस्त्रिलोकात्मा ईश: सर्वेश्वरो विभु:।।

भैरवाडम्बरो दिव्याश्चच्युत: कविमाधव:। 
अधोक्षजो अक्षर: शर्वो वनमाली वरप्रद:।। 

विश्वम्भरो अद्भुतो भव्य: श्रीविष्णु: पुरूषोतम:।
अनघास्त्रो नखास्त्रश्च सूर्यज्योति: सुरेश्वर:।।

सहस्त्रबाहु: सर्वज्ञ: सर्वसिद्धिप्रदायक:।
वज्रदंष्ट्रो वज्रनखो महानन्द: परंतप:।।

सर्वयन्त्रैकरूपश्च सप्वयन्त्रविदारण:।
सर्वतन्त्रात्मको अव्यक्त: सुव्यक्तो भक्तवत्सल:।।

वैशाखशुक्ल भूतोत्थशरणागत वत्सल:।
उदारकीर्ति: पुण्यात्मा महात्मा चण्डविक्रम:।।

वेदत्रयप्रपूज्यश्च भगवान् परमेश्वर:।
श्रीवत्साङ्क: श्रीनिवासो जगद्व्यापी जगन्मय:।।

जगत्पालो जगन्नाथो महाकायो द्विरूपभृत्। 
परमात्मा परंज्योतिर्निर्गुणश्च नृकेसरी।।

परतत्त्वं परंधाम सच्चिदानंदविग्रह:। 
लक्ष्मीनृसिंह: सर्वात्मा धीर: प्रह्लादपालक:।।

इदं लक्ष्मीनृसिंहस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।
त्रिसन्ध्यं य: पठेद् भक्त्या सर्वाभीष्टंवाप्नुयात्।।

श्री भगवान महाविष्णु स्वरूप श्री नरसिंह के अंक में विराजमान माँ महालक्ष्मी के इस श्रीयुगल स्तोत्र का तीनो संध्याओं में पाठ करने से भय, दारिद्र, दुःख, शोक का नाश होता है और  अभीष्ट की प्राप्ति होती है। 

*नृसिंहमालामन्त्रः*

*विनियोग*



श्री गणेशाय नमः 

अस्य श्री नृसिंहमाला मन्त्रस्य नारदभगवान् ऋषिः, अनुष्टुभ् छन्दः, श्री नृसिंहोदेवता, आं बीजम्, लं शवित्तः, मेरुकीलकम्, श्रीनृसिंहप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ नमो नृसिंहाय ज्वलामुखग्निनेत्रय शङ्खचक्रगदाप्र्हस्ताय योगरूपाय हिरण्यकशिपुच्छेदनान्त्रमालाविभुषणाय हन हन दह दह वच वच रक्ष वो नृसिंहाय पुर्वदिषां बन्ध बन्ध रौद्रभसिंहाय दक्षिणदिशां बन्ध बन्ध पावननृसिंहाय पश्चिमदिशां बन्ध बन्ध दारुणनृसिंहाय उत्तरदिशां बन्ध बन्ध ज्वालानृसिंहाय आकाशदिशां बन्ध बन्ध लक्ष्मीनृसिंहाय पातालदिशां  बन्ध बन्ध कः कः कंपय कंपय आवेशय आवेशय अवतारय अवतारय शीघ्रं शीघ्रं, ॐ नमो नारसिंहाय नवकोटिदेवग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय अष्टकोटिगन्धर्व ग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय षट्कोटिशाकिनीग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय पंचकोटि पन्नगग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय चतुष्कोटि ब्रह्मराक्षसग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय द्विकोटिदनुजग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय कोटिग्रहोच्चाटनाय, ॐ नमो नारसिंहाय अरिमूरीचोरराक्षसजितिः वारं वारं, श्रीभय चोरभय व्याधिभय सकल भयकण्टकान् विध्वंसय विध्वंसय, शरणागत वज्रपंजराय विश्वहृदयाय प्रल्हादवरदाय क्षरौं श्रीं नृसिंहाय स्वाहा, ॐ नमो नारसिंहाय मुद्गल शङ्खचक्र गदापद्महस्ताय नीलप्रभांगवर्णाय भीमाय भीषणाय ज्वाला करालभयभाषित श्री नृसिंहहिरण्यकश्यपवक्षस्थलविदार्णाय, जय जय एहि एहि भगवन् भवन गरुडध्वज गरुडध्वज मम सर्वोपद्रवं वज्रदेहेन चूर्णय चूर्णय आपत्समुद्रं शोषय शोषय, असुरगन्धर्वयक्षब्रह्मराक्षस भूतप्रेत पिशाचदिन विध्वन्सय् विध्वन्सय्, पूर्वाखिलं मूलय मूलय, प्रतिच्छां स्तम्भय परमन्त्रपयन्त्र परतन्त्र परकष्टं छिन्धि छिन्धि भिन्धि हं फट् स्वाहा।

इति श्री अथर्वण वेदोवत्तनृसिंहमालामन्त्रः समाप्तः श्री नृसिम्हार्पणमस्तु ||

नृसिंह गायत्री


ॐ वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्ण दंष्ट्राय धीमहि तन्नो नरसिंह प्रचोदयात ।।

नृसिंह शाबर मन्त्र : 

ॐ नमो भगवते नारसिंहाय -घोर रौद्र महिषासुर रूपाय ,त्रेलोक्यडम्बराय रोद्र क्षेत्रपालाय ह्रों ह्रों क्री क्री क्री ताडय
ताडय मोहे मोहे द्रम्भी द्रम्भी क्षोभय क्षोभय आभि आभि साधय साधय ह्रीं हृदये आं शक्तये प्रीतिं ललाटे बन्धय बन्धय ह्रीं हृदये स्तम्भय स्तम्भय किलि किलि ईम ह्रीं डाकिनिं प्रच्छादय प्रच्छादय शाकिनिं प्रच्छादय प्रच्छादय भूतं प्रच्छादय प्रच्छादय
प्रेतं प्रच्छादय प्रच्छादय ब्रंहंराक्षसं सर्व योनिम प्रच्छादय प्रच्छादय राक्षसं प्रच्छादय 
प्रच्छादय सिन्हिनी पुत्रं प्रच्छादय प्रच्छादय
अप्रभूति अदूरि स्वाहा एते डाकिनी ग्रहं साधय साधय शाकिनी ग्रहं साधय साधय
अनेन मन्त्रेन डाकिनी शाकिनी भूत प्रेत पिशाचादि एकाहिक द्वयाहिक् त्र्याहिक चाथुर्थिक पञ्च वातिक पैत्तिक श्लेष्मिक संनिपात केशरि डाकिनी ग्रहादि मुञ्च मुञ्च स्वाहा मेरी भक्ति गुरु की शक्ति स्फ़ुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा ll

*श्री नरसिंह भगवान की आरती*

ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे।

स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, स्तम्भ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन का ताप हरे॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥
तुम हो दीन दयाला, भक्तन हितकारी, प्रभु भक्तन हितकारी।

अद्भुत रूप बनाकर, अद्भुत रूप बनाकर, प्रकटे भय हारी॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥

सबके ह्रदय विदारण, दुस्यु जियो मारी, प्रभु दुस्यु जियो मारी।
दास जान अपनायो, दास जान अपनायो, जन पर कृपा करी॥

ॐ जय नरसिंह हरे॥
ब्रह्मा करत आरती, माला पहिनावे, प्रभु माला पहिनावे।
शिवजी जय जय कहकर, पुष्पन बरसावे॥
ॐ जय नरसिंह हरे॥

*(2) आरती*

आरती कीजै नरसिंह कुँवर की।

वेद विमल यश गाऊँ मेरे प्रभुजी॥

पहली आरती प्रह्लाद उबारे,

हिरणाकुश नख उदर विदारे।

दूसरी आरती वामन सेवा,

 बलि के द्वार पधारे हरि देवा।

आरती कीजै नरसिंह कुँवर की।

तीसरी आरती ब्रह्म पधारे,

सहसबाहु के भुजा उखारे।

चौथी आरती असुर संहारे,

भक्त विभीषण लंक पधारे।

आरती कीजै नरसिंह कुँवर की।

पाँचवीं आरती कंस पछारे,

गोपी ग्वाल सखा प्रतिपाले।

तुलसी को पत्र कण्ठ मणि हीरा,

हरषि-निरखि गावें दास कबीरा।

आरती कीजै नरसिंह कुँवर की।

वेद विमल यश गाऊँ मेरे प्रभुजी॥