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Thursday, 30 April 2020

17:47

1 मई 2020 का दैनिक राशिफल




मेष ----व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। कामकाज में वृद्धि के योग हैं। घर-बाहर सभी तरफ प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। व्यापार-व्यवसाय लाभदायक रहेगा। निवेश शुभ रहेगा। नौकरी में अधिकारी प्रसन्न रहेंगे।




वृष ----कार्यस्थल पर परिवर्तन व सुधार हो सकता है। योजना फलीभूत होगी। मित्रों तथा रिश्तेदारों का सहयोग कर पाएंगे। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। नए कार्य मिलेंगे। पार्टनरों का सहयोग मिलेगा। नौकरी में उच्चाधिकारी प्रसन्न रहेंगे।



मिथुन----- सत्संग का लाभ प्राप्त हो सकता है। पूजा-पाठ में मन लगेगा। कानूनी अड़चन दूर होकर स्थिति लाभदायक रहेगी। घर-बाहर सभी तरफ सफलता प्राप्त होगी। विरोधी सक्रिय रहेंगे। बाहर जाने का कार्यक्रम बन सकता है। धन प्राप्ति सुगमता से होगी।

कर्क----- क्रोध व उत्तेजना पर नियंत्रण रखें। चोट व दुर्घटना से शारीरिक हानि हो सकती है। लेन-देन में जल्दबाजी न करें। नौकरी में कार्यभार रहेगा। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। आय में वृद्धि हो सकती है, प्रयास करते रहें। कारोबार में अधिक ध्यान दें।




सिंह ----कानूनी अड़चन दूर होकर स्थिति अनुकूल होगी। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। भेंट व उपहार देना पड़ सकता है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। व्यापार-व्यवसाय अच्‍छा चलेगा। पारिवारिक चिंता रहेगी। प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी।

कन्या --स्थायी संपत्ति के बड़े सौदे बड़ा लाभ दे सकते हैं। नया कार्य प्रारंभ करने की योजना बनेगी। जोखिम उठाने का साहस कर पाएंगे। बेरोजगारी दूर करने के प्रयास सफल रहेंगे। विरोध होगा। व्यस्तता के चलते थकान रह सकतीहै


तुला---- रचनात्मक कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। संगीत इत्यादि में रुचि रहेगी। स्वादिष्ट भोजन का आनंद प्राप्त होगा। किसी पार्टी व पिकनिक का कार्यक्रम बन सकता है। पठन-पाठन व लेखन इत्यादि के कार्य सफल रहेंगे। भावना में बहकर निर्णय न लें।



वृश्चिक ---कोई बुरी सूचना मिल सकती है। नकारात्मकता रहेगी। वाणी पर नियंत्रण रखें। दुष्टजन हानि पहुंचा सकते हैं। सावधान रहें। लेन-देन में सावधानी आवश्यक है। दूसरों के बहकावे में न आएं। सोच-समझकर निर्णय लें। व्यापार से लाभ होगा।



धनु ---+पहले की गई मेहनत का फल प्राप्त होगा। रुके कार्य पूरे होंगे। लाभ में वृद्धि होगी। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। प्रसन्नता बनी रहेगी। असहाय लोगों की मदद करने की प्रेरणा प्राप्त होगी। सभी तरफ से सफलता मिलेगी। जल्दबाजी न करें


मकर -_आत्मसम्मान बना रहेगा। भूले-बिसरे साथियों से मुलाकात होगी। पारिवारिक आवश्यकताओं पर व्यय होगा। व्यापार-व्यवसाय अच्छा चलेगा। नौकरी में चैन रहेगा। उत्साहवर्धक सूचना प्राप्त होगी। जोखिम उठाने का साहस कर पाएंगे। उत्साह बना रहेगा


कुंभ ---नवीन वस्त्राभूषण पर व्यय होगा। बेरोजगारी दूर करने के प्रयास सफल रहेंगे। आय के नए स्रोत प्राप्त हो सकते हैं। मान-सम्मान मिलेगा। नौकरी में प्रमोशन मिल सकता है। घर-बाहर प्रसन्नता का वातावरण निर्मित होगा। जल्दबाजी न करें।

मीन --फालतू खर्च अधिक हो सकता है। विवाद को बढ़ावा न दें। दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप न करें। पुराना रोग उभर सकता है। व्यापार-व्यवसाय अच्छा चलेगा। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। नौकरी में कार्यभार रहेगा। जल्दबाजी न करें।
13:58

इरफान के बाद ऋषि कपूर ने कहा दुनिया को अलविदा, बॉलीवुड में दौड़ी शोक की लहर.

रामजी पांडे
नई दिल्ली -बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर ऋषि कपूर की तबियत काफी समय से खराब चल रही थी और वह बार-बार हॉस्पिटल में एडमिट हो रहे थे. वहीं अब खबर मिली है कि उनका निधन हो गया है.

ऋषि का निधन होने की खबर से पूरा बॉलीवुड जगत शोक में है. बीते दिनों ही बॉलीवुड में गाज गिरी थी जब इरफ़ान खान का निधन होने की खबर आई थी और अब ऋषि कपूर के निधन की खबर ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. ऋषि को बीते कल यानी बुधवार को मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है. इस बात की जानकारी खुद उनके बड़े भाई रणधीर कपूर ने दी थी

अमेरिका में कैंसर का उपचार कराने के बाद ऋषि कपूर पिछले साल सितंबर में भारत लौटे थे, लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्हें शहर के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है. आपको बता दें कि बीते समय में ही रणधीर कपूर ने बताया था कि, ''ऋषि कपूर को सांस लेने में परेशानी हो रही थी, जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. हालांकि, उनकी हालत अब स्थिर बताई गई थी.''

आप सभी को यह भी बता दें कि 67 वर्षीय ऋषि कपूर कैंसर से पीड़ित हैं और उन्हें सांस लेने में समस्या होने के कारण अस्पताल लाना पड़ा था. वैसे ऋषि कपूर को पहले दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती किया गया था. बीते समय में इस बारे में खुद एक्टर ने बताया था कि 'उन्हें इंफेक्शन हो गया है. लेकिन दिल्ली से मुंबई आने के बाद उन्हें वायरल फीवर की वजह से फिर से हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा.' आप जानते ही होंगे ऋषि कपूर अपनी फिल्मों के साथ-साथ अपने विचारों के लिए भी खूब जाने जाते थे वह किसी भी मामले में ट्वीट करने में कभी पीछे नहीं रहे थे।
वरिष्ठ पत्रकार के सी शर्मा की रिपोर्ट
09:07

खाटू श्रीश्यामजी मेले में उमड़ती है भक्तों की भीड़, जानिये मंदिर की महिमा और इतिहास -के सी शर्मा





श्याम बाबा की कहानी महाभारत काल से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे तथा पान्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी।

हमारे देश में बहुत से ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हीं मंदिरों में से एक है राजस्थान में शेखावाटी क्षेत्र के सीकर जिले का विश्व विख्यात प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर। यहां फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को श्याम बाबा का विशाल वार्षिक मेला भरता है जिसमें देश-विदेशों से आये करीबन 25 से 30 लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं। खाटू श्याम का मेला राजस्थान के बड़े मेलों में से एक है।


इस मंदिर में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की श्याम यानि कृष्ण के रूप में पूजा की जाती है। इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है उन्हें श्याम बाबा का नित नया रूप देखने को मिलता है। कई लोगों को तो इस विग्रह में कई बदलाव भी नजर आते हैं। कभी मोटा तो कभी दुबला। कभी हंसता हुआ तो कभी ऐसा तेज भरा कि नजरें भी नहीं टिक पातीं। श्याम बाबा का धड़ से अलग शीष और धनुष पर तीन बाण की छवि वाली मूर्ति यहां स्थापित की गई। कहते हैं कि मन्दिर की स्थापना महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से की थी।

श्याम बाबा की कहानी महाभारत काल से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे तथा पान्डव भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या अहिलवती के पुत्र थे। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त कर तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध हुये। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया जोकि उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।

कौरवों और पाण्डवों के मध्य महाभारत युद्ध का समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुआ तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुयी। जब वे अपनी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे तब मां को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। महाभारत के युद्ध में भाग लगने के लिये वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर धनुष व तीन बाणों के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की और अग्रसर हुये। सर्वव्यापी श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हंसी भी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकश में ही आयेगा। यदि उन्होंने तीनों बाणों को प्रयोग में ले लिया गया तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड़ के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनों खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया।

तीर ने क्षण भर में पेड़ के सभी पत्तों को भेद दिया और श्रीकृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था। तब बर्बरीक ने श्रीकृष्ण से कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये वर्ना ये आपके पैर को चोट पहुंचा देगा। श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी मां को दिये वचन दोहराते हुये कहा कि वह युद्ध में निर्बल हो और हार की ओर अग्रसर पक्ष की तरफ से भाग लेगा। श्रीकृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।


ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने बालक बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा। श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया परन्तु उसने अपने वचन की दृढ़ता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप में आने की प्रार्थना की और श्रीकृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।


उन्होंने बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमि की पूजा के लिये एक वीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यकता होती है। उन्होंने बर्बरीक को युद्ध में सबसे बड़े वीर की उपाधि से अलंकृत कर उनका शीश दान में मांगा। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है। श्रीकृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।


युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी खींचाव-तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है। उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्रीकृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं। उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जोकि शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली दुर्गा श्रीकृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।

श्रीकृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ होगा। ऐसा माना जाता है कि एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वत: ही बहा रही थी बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रकट हुआ। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था। मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर 1720 ई0 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर ने उस समय अपना वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठापित की गयी थी। मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बनी है।


खाटू श्याम मन्दिर की बहुत मान्यता होने के उपरान्त भी यहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहता है। मन्दिर में स्थान की कमी के कारण मेले के अवसर पर श्रद्धालुओं को दर्शन करने में आठ से दस घंटों तक का समय लग जाता है। मन्दिर ट्रस्ट निजी हाथों में होने से मन्दिर का विस्तार नहीं हो पा रहा है। सरकार को तिरूपति मन्दिर की तरह से यहां के प्रबन्धन का जिम्मा लेकर सरकारी स्तर पर कमेटी बनाकर यहां होने वाली आय को नियंत्रित कर उसी से यहां का समुचित विकास करवाना चाहिये।


Wednesday, 29 April 2020

11:59

जानिए भगवान गणेश के बारे में के सी शर्मा की कलम से



गणेशजी निराकार दिव्यता हैं जो भक्त के उपकार हेतु एक अलौकिक आकार में स्थापित हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, वह भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र है।

गण का अर्थ हे समूह । यह पूरी सृष्टि परमाणुओं और अलग अलग ऊर्जाओं का समूह है। यदि कोई सर्वोच्च नियम इस पूरी सृष्टि के भिन्न-भिन्न संस्थाओं के समूह पर शासन नहीं कर रहा होता तो इसमें बहुत उथल-पुथल हो जाती। इन सभी परमाणुओं और ऊर्जाओं के समूह के स्वामी हैं गणेशजी।

वे ही वह सर्वोच्च चेतना हैं जो सर्वव्यापी है और इस सृष्टि में एक व्यवस्था स्थापित करती है।

आदि शंकराचार्य ने गणेशजी के सार का बहुत ही सुंदरता से गणेश स्तोत्र में विवरण किया है।

हालाँकि गणेशजी की पूजा हाथी के सिर वाले भगवान के रूप में होती है, लेकिन यह आकार (स्वरुप ) वास्तव में उस निराकार (परब्रह्म रूप ) को प्रकट करता है। वे ‘अजं निर्विकल्पं निराकारमेकम’ हैं। अर्थात, गणेशजी अजं (अजन्मे) हैं, निर्विकल्प (बिना किसी गुण के) हैं, निराकार (बिना किसी आकार के) हैं और वे उस चेतना के प्रतीक हैं, जो सर्वव्यापी है।
गणेशजी वही ऊर्जा हैं जो इस सृष्टि का कारण है। यह वही ऊर्जा है, जिससे सब कुछ प्रत्यक्ष (प्रकट) होता है और जिसमें सब कुछ विलीन हो जायेगा।

भगवान गणेश के जन्म की कहानी :-

हम सभी उस कथा को जानते हैं, कि कैसे गणेशजी हाथी के सिर वाले भगवान बने। जब पार्वती शिव के साथ उत्सव क्रीड़ा कर रहीं थीं, तब उन पर थोड़ा मैल लग गया। जब उन्हें इस बात की अनुभूति हुई, तब उन्होंने अपने शरीर से उस मैल को निकल दिया और उससे एक बालक बना दिया। फिर उन्होंने उस बालक को कहा कि जब तक वे स्नान कर रहीं हैं, वह वहीं पहरा दे।

जब शिवजी वापिस लौटे, तो उस बालक ने उन्हें पहचाना नहीं, और उनका रास्ता रोका । तब भगवान शिव ने उस बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया और अंदर चले गए।

यह देखकर पार्वती बहुत हैरान रह गयीं। उन्होंने शिवजी को समझाया कि वह बालक तो उनका पुत्र था, और उन्होंने भगवान शिव से विनती करी, कि वे किसी भी कीमत पर उसके प्राण बचाएँ।

तब भगवान शिव ने अपने सहायकों को आज्ञा दी कि वे जाएँ और कहीं से भी कोई ऐसा मस्तक ले कर आये जो उत्तर दिशा की ओर मुहँ करके सो रहा हो। तब शिवजी के सहायक एक हाथी का सिर लेकर आये, जिसे शिवजी ने उस बालक के धड़ से जोड़ दिया और इस तरह भगवान गणेश का जन्म हुआ।

भगवान गणेश की कहानी में विचार के तथ्य:-

क्यों पार्वती के शरीर पर मैल था?: पार्वती प्रसन्न ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनके मैले होने का अर्थ है कि कोई भी उत्सव राजसिक हो सकता है, उसमें आसक्ति हो सकती है और आपको आपके केन्द्र से हिला सकता है। मैल अज्ञान का प्रतीक है, और भगवान शिव सर्वोच्च सरलता, शान्ति और ज्ञान के प्रतीक हैं।
क्या भगवान शिव, जो शान्ति के प्रतिक थे, इतने गुस्से वाले थे कि उन्होंने अपने ही पुत्र का सिर धड़ से अलग कर दिया? और भगवान गणेश के धड़ पर हाथी का सिर क्यों? तो जब गणेशजी ने भगवान शिव का मार्ग रोका, इसका अर्थ हुआ कि अज्ञान, जो कि मस्तिष्क का गुण है, वह ज्ञान को नहीं पहचानता, तब ज्ञान को अज्ञान से जीतना ही चाहिए। इसी बात को दर्शाने के लिए शिव ने गणेशजी के सिर को काट दिया था।

हाथी का सिर क्यों ? :-

हाथी ‘ज्ञान शक्ति’ और ‘कर्म शक्ति’, दोनों का ही प्रतीक है। एक हाथी के मुख्य गुण होते हैं – बुद्धि और सहजता। एक हाथी का विशालकाय सिर बुद्धि और ज्ञान का सूचक है। हाथी कभी भी अवरोधों से बचकर नहीं निकलते, न ही वे उनसे रुकते हैं। वे केवल उन्हें अपने मार्ग से हटा देते हैं और आगे बढ़ते हैं – यह सहजता का प्रतीक है। इसलिए, जब हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं, तो हमारे भीतर ये सभी गुण जागृत हो जाते हैं, और हम ये गुण ले लेते हैं।

गणेशजी के प्रतीक और उनका महत्व :-

गणेशजी का बड़ा पेट उदारता और संपूर्ण स्वीकार को दर्शाता है।
गणेशजी का ऊपर उठा हुआ हाथ रक्षा का प्रतीक है – अर्थात, ‘घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ’ और उनका झुका हुआ हाथ, जिसमें हथेली बाहर की ओर है,उसका अर्थ है, अनंत दान, और साथ ही आगे झुकने का निमंत्रण देना – यह प्रतीक है कि हम सब एक दिन इसी मिट्टी में मिल जायेंगे।
गणेशजी एकदन्त हैं , जिसका अर्थ है एकाग्रता। वे अपने हाथ में जो भी लिए हुए हैं, उन सबका भी कुछ अर्थ है।

वे अपने हाथों में अंकुश लिए हैं, जिसका अर्थ है – जागृत होना , और पाश – अर्थात नियंत्रण। जागृति के साथ, बहुत सी ऊर्जा उत्पन्न होती है और बिना किसी नियंत्रण के उससे व्याकुलता हो सकती है।
गणेशजी, हाथी के सिर वाले भगवान क्यों एक चूहे जैसे छोटे से वाहन पर चलते हैं? क्या यह बहुत अजीब नहीं है? फिर से, इसका एक गहरा रहस्य है। एक चूहा उन रस्सियों को काट कर अलग कर देता है जो हमें बांधती हैं। चूहा उस मन्त्र के समान है जो अज्ञान की अनन्य परतों को पूरी तरह काट सकता है, और उस परम ज्ञान को प्रत्यक्ष कर देता है जिसके भगवान गणेश प्रतीक हैं।

हमारे प्राचीन ऋषि इतने गहन बुद्धिशाली थे, कि उन्होंने दिव्यता को शब्दों के बजाय इन प्रतीकों के रूप में दर्शाया, क्योंकि शब्द तो समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन प्रतीक कभी नहीं बदलते। तो जब भी हम उस सर्वव्यापी का ध्यान करें, हमें इन गहरे प्रतीकों को अपने मन में रखना चाहिये, जैसे हाथी के सिर वाले भगवान, और उसी समय यह भी याद रखें, कि गणेशजी हमारे भीतर ही हैं । यही वह ज्ञान है जिसके साथ हमें गणेश चतुर्थी मनानी चाहिये।
07:13

स्वामी विवेकानंद जी पर विशेष-के सी शर्मा*



स्वामी विवेकानंद जी पर विशेष-के सी शर्मा*
मेरी नज़र में सवाल यह उठता है कि क्या आज के युवा को स्वामी विवेकानंद के जीवन संघर्षों, आदर्शों, विचारों और उनके सिद्धांतों का सही ज्ञान हो पाएगा?

मुझे स्वामी विवेकानंद से जुड़ा एक किस्सा याद आता है, जब उनसे पूछा गया की "वह अपने ज्यादातर भाषण विदेशों में क्यों देते हैं, भारत में क्यों नहीं?
 तो उन्होंने बड़ी शालीनता से कहा कि धर्म और ज्ञान की बातें मनुष्य के मस्तिष्क में तभी समाती हैं जब उनका पेट भरा होता है।
गरीबी और कष्ट को दूर किए बिना भारत के लोगों के लिए धर्म का प्रचार कोई मायने नहीं रखता है।
 उन्हें ज्ञान की बातें नहीं समझ आएंगी, परंतु विदेशों में लोगों के पेट भरे हुए हैं।
 इसीलिए मैं भारत के दीन दुखियों के लिए वहां से समाधान लाने की कोशिश कर रहा हूं।
मैं पश्चिम के सामने यह कहता हूं कि यदि भारत बीमार या तंदुरुस्त है तो इसका संबंध पूरी दुनिया से है।
 मैं वहां के लोगों को भारत के प्राचीन ज्ञान मोक्ष और त्याग के बारे में बताता हूं और वहां के लोगों से भारत के लिए नए अवसर और तकनीक लाने का प्रयास करता हूं।
"स्वामी विवेकानंद ऊंच-नीच जात-पात भेद-भाव जैसी चीजों से खुद को अछूता रखते थे और वे मानते थे कि ये अंधविश्वास भारत को पतन की ओर ले जाएंगे।
 स्वामी विवेकानंद की विचारधारा इतनी प्रगति शील थी कि वे गीता पाठ की बजाए शारीरिक कार्य करना जैसे फुटबॉल खेलना को ज्यादा महत्व देते थे।

स्वामी विवेकानंद के विचारों की आवश्यकता जितनी उस समय थी, उनकी प्रासंगिकता आज के समय में भी उतनी ही है।

 पर आज के युवा को यह समझना होगा की मात्र स्वामी विवेकानंद की फोटो लगा लेने से या उनके विचारों को कॉपी करके पेस्ट कर देने से वे विवेकानंद नहीं बन पाएंगे। विवेकानंद बनने के लिए आपको समाज की बुराइयों को समझना होगा अपने अंदर उनसे लड़ने के लिए बदलाव लाने होंगे और समाज के गरीब और पिछड़े तबके को मजबूत करने के लिए काम करना होगा ताकि वे भी भारत की तरक्की के लिए अपना योगदान दे सकें।

आज के युवा को समझना होगा कि ब्रांडेड कपड़े पहन लेना ही परम आनंद नहीं है, खुद की प्रोफाइल में राष्ट्रवादी हिंदू लिख लेना हिंदुइज्म नहीं है, और प्रतिदिन के डेढ़ जीबी फ्री डाटा से राष्ट्रप्रेम का सर्टिफिकेट दिखाना राष्ट्रभक्ति नहीं है।

स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत के सिरमौर हैं और उनकी शिक्षाएं हमेशा युवाओं के लिए पथ प्रदर्शक का कार्य करेंगी।
07:06

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ने की अपील की



सुनील मिश्रा नयी दिल्ली :
श्री रवि शंकर प्रसाद, केंद्रीय मंत्री,  इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय, भारत सरकार ने 28 अप्रैल 2020 को राज्यों के आईटी मंत्रियों के साथ विडिओ कॉन्फरेंसिंग से बैठक की। यह बैठक हरियाणा और सिक्किम के मुख्यमंत्रियों, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्रियों जो कि अपने राज्य में आईटी विभाग के भी प्रभार में हैं, के द्वारा शोभित रहा.  आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, असम, ओडिशा, गोवा, नागालैंड, मिज़ोरम, और मेघालय राज्यों के आईटी मंत्रियों ने भी भाग लिया। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व राज्य आईटी सचिवों द्वारा किया गया। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय, डाक विभाग और दूरसंचार विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया.

इस के एक भाग के रूप में, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय और उसके संस्थाओं ने  MyGov और सोशल मीडिया चैनलों एवं इन चैनलों पर उपलब्ध चैटबॉट के माध्यमों से कोविड -19 पर आरोग्य सेतु ऐप, इनोवेशन चैलेंज, जागरूकता और संचार के साथ राष्ट्रव्यापी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा, ई-ऑफिस, पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम, ग्रामीण इलाकों में कॉमन सर्विसेज सेंटर की सेवाएं, सी-डैक का ई-संजीवनी टेलीमेडिसिन आदि प्रस्तुत किया ।
डाक विभाग सचिव ने बताया कि 1.56 लाख डाकघर जुड़े हुए हैं और इसने 38,000 करोड़ रुपये मूल्य की  2.5 करोड़ डाकघर बचत बैंक लेनदेन सुविधा प्रदान की है। इस कठिन समय में इसने 43 लाख डाक और 250 टन आवश्यक दवाओं और कोविड- किट भी वितरित किए हैं ।
दूरसंचार विभाग सचिव (DoT)  ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान गुणवत्ता के साथ और निर्बाध रूप से दूरसंचार सेवाओं के लिए सभी प्रयास किए जा रहे हैं।  नए लॉन्च किए गए कोविड क्वारेंटाइन अलर्ट सिस्टम (CQAS) और सावधान सिस्टम को भी बताया गया। कोविड 19 समस्या के समाही में नागरिक केंद्रित सुविधाओं को प्रदान करने में इंडिया पोस्ट, कॉमन सर्विसेस सेंटर, दूरसंचार विभाग और आईटी मंत्रालय के द्वारा किये गए कार्यों को सभी राज्यों ने सराहा!
इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी राज्य मंत्री, श्री संजय धोत्रे ने टिप्पणी की कि इंटरनेट की कनेक्टिविटी और गुणवत्ता ग्रामीण क्षेत्रों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गई है और, केंद्र, राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र के बीच एक विश्वसनीय साझेदारी में ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं में सुधार करने की आवश्यकता है. समापन के समय, उन्होंने निम्नलिखित की घोषणा की::
केंद्र सरकार वर्क फ्रॉम होम ’के मानदंडों में छूट के लिए डीओटी की समय सीमा 30 अप्रैल से 31 जुलाई 2020 तक बढ़ाएगी.
उन्होंने राज्यों से अनुरोध किया कि एक मजबूत दूरसंचार नेटवर्क के विकास को बढ़ावा  देने में मुद्दों का सही दिशा में जांच करें।
राज्यों में से एक के दिए सुझाव पर कार्रवाई करते हुए, उन्होंने निर्देश दिया कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से एकत्रित कोविड-19 संबंधित सभी बेस्ट प्रैक्टिसेज पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय को  एक पोर्टल बनाये।
उन्होंने एक राज्य के आईटी मिनिस्टर द्वारा एक रणनीति समूह  के गठन का सुझाव भी स्वीकार किया जो कोविड 19 के बाद में इंडियन आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के रोडमैप पर काम करेगी।
उन्होंने 5 लाख डिजिटल गांवों जो डिजिटल शिक्षा, डिजिटल स्वास्थ्य, डिजिटल भुगतान आदि जैसी सुविधाओं के साथ आत्मनिर्भर हों, इनको वास्तविक करने के लिए अपना विजन व्यक्त किया। मंत्री ने अनाउंस किया कि ऐसा ही फीचर फ़ोन यूजर के लिए भी बनाया जा रहा है और जल्द ही लांच किया जाएगा।
भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स मैनुफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छा अवसर है और राज्यों को निवेशों को आकर्षित करने पर कार्य करने के लिए भी कहा . उन्होंने तीन योजनाएँ बताया, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव 2.0, इलेक्ट्रोनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स एंड सेमीकंडक्टर्स (स्पेसस) के निर्माण प्रोत्साहन के लिए एक 50,000 करोड़ रुपये परिव्यय वाले प्रोजेक्ट को भारत सरकार  के द्वारा नोटिफाई किया गया है.

उन्होंने राज्यों से  एकजुट होकर डिजिटल और भौतिक रूप से काम करने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के संसाधनों को कोविड-19 के खिलाफ लड़ने की अपील की

Tuesday, 28 April 2020

11:16

न्यूज पोर्टल पूर्णत वैध है और इसमें कार्यरत संवाददाता पत्रकार हैं जाने कैसे



पत्रकारिता का बदला दौर, अब बेब क्रान्ति व शोसल मीडिया बना पत्रकारो की अभिव्यक्ति का असली हथियार,*
न्यूज़ पोर्टल / यू ट्यूब चैनल के पत्रकार को तथाकथित फर्जी कहने वाले लोग एक बार जरा ध्यान दे
आज के इस तकनिकी युग में हर क्षेत्र में क्रांति आयी, जिसमे पत्रकारिता भी शामिल है , पत्रकारों को अपने विचारों व अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए एक नया क्रन्तिकारी मंच मिला जिसे आज हम “न्यूज पोर्टल” के नाम से जानते है. दुनिया भर में न्यूज पोर्टल की शुरुआत बड़ी तेजी से हुई न्यूज पोर्टल्स की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कई पुराने अख़बार व टीवी चैनलों ने भी अपना-अपना वेब पोर्टल चैनल शुरू किया लेकिन जहाँ एक ओर न्यूज पोर्टल से पत्रकारिता में एक नई क्रांति आ रही है वही दूसरी ओर कई बार ये खबर आए दिन चर्चा में रहती है कि न्यूज पोर्टल फर्जी है और न्यूज पोर्टल पर काम करने वाले संवाददाताओं, रिपोर्टर कैमरामैन तथाकथित / फर्जी है और सरकार और पुलिस प्रशासन उनको पत्रकार नहीं मानती,
इस तरह कि भ्रामक और झूठी खबरे आये दिन सोशल मीडिया में देखने को मिल जाती है. इतना ही नहीं कई अधिकारी भी इन ख़बरों पर सही कि मुहर लगा बैठते है,
ये जो लोग या अधिकारी गण ये मानते और कहते हैं कि न्यूज पोर्टल फ़र्ज़ी है और इनमे कार्यरत संवाददाताओं को सरकार पत्रकार नहीं मानती है, दर असल इन लोगों/ अधिकारीयों को न ही पत्रकारिता के विषय में कोई ज्ञान है और न ही पत्रकारिता के संघर्ष कि जानकारी,
ये पहली बार नहीं है जब किसी ऐसे मंच को मौन रखने कि साजिश रची जा रही है जिसका सम्बन्ध पत्रकारिता से हो,
*न्यूज पोर्टल्स फर्जी है या नहीं ये जानने से पहले एक नजर डालते है भारत में पत्रकारिता के इतिहास पर,*
भारत में पत्रकारिता का इतिहास बहुत ही उपेक्षा पूर्ण रहा है अगर हम इतिहास को देखें तो पाएंगे कि अंग्रेजी शासकों ने पत्रकारों को दबाने का बहुत प्रयास किये थे अंग्रेजी हुक्मरानो ने पत्रकारों कि आवाज दबाने के लिए भारतीय प्रेस पर तरह तरह के एक्ट पारित किये अंग्रेजों को सबसे ज्यादा तकलीफ हिंदी में प्रकाशित समाचार पत्रों से होती थी,
अंग्रेजी शासन काल में प्रैस पर क़ानूनी नियंत्रण की शुरुआत सबसे पहले तब हुई जब लॉर्ड वेलेजली ने प्रैस नियंत्रण अधिनियम द्धारा सभी समाचार- पत्रों पर नियंत्रण (सेंसर) लगा दिया।इसे प्रेस नियंत्रण अधिनियम,1799 के नाम से जाना जाता है,
*हिंदुस्तानी पत्रकारिता पर पूर्ण प्रतिबंध:*
गवर्नर जरनल जॉन एडम्स ने सन् 1823 में भारतीय प्रैस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया इस नियम के अनुसार मुद्रक तथा प्रकाशक को मुद्रणालय स्थापना करने के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था जिस कारणकि राजा राम मोहन रॉय को अपनी पत्रिका 'मिरात-उल-अख़बार' का प्रकाशन बंद करना पड़ा। मुंह बून्द करने वाला अधिनियम या सर्क्युलर प्रेस एक्ट,1878: लॉर्ड लिटन ने सर्क्युलर प्रैस एक्ट लागू किया इस एक्ट के प्रमुख प्रावधान थे,
प्रत्येक प्रैस को यह लिखित वचन देना होगा कि वह (अंग्रेजी) सरकार के विरुद्ध कोई लेख नहीं छापेगा,
प्रत्येक मुद्रक तथा प्रकाशक के लिए जमानत राशि जमा करना आवश्यक होगा,
इस संबंध में जिला मजिस्ट्रेट का निर्णय अंतिम होगा तथा उसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकेगी,
ये कुछ ऐसे एक्ट थे जिनका मुख्य उद्देश्य भारतीय प्रेस को पूर्ण रूप से मौन करना था,
आजादी के बाद सन 1966 में भारतीय प्रेस परिषद् कि स्थापना हुई जिसका उद्देश्य भारत में प्रैस के मानकों को बनाए रखने और सुधार की स्वतंत्रता का संरक्षण है,
लेकिन भारत में इमेरजंसी के दौरान एक बार फिर से पत्रकारिता को काले दिन देखने पड़े। सरकारी तानाशाही के चलते बहुत से समाचारों पत्रों ने दम तोड़ दिया फ़िलहाल किसी तरह से पत्रकारिता ने खुद को संभाला और तमाम सरकारी और काॅरपोरेट दबाव के बावजूद भी पत्रकारों ने पत्रकारिता के वजूद को जिन्दा रखा इस दौरान टीवी का युग आया और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जन्म हुआ शुरुआत में इलेक्ट्रिक मीडिया को भी तरह तरह कि उपेक्षाएँ सहनी झूलनी पड़ीं लेकिन धीरे धीरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को पीछे छोड़ दिया,
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने से भारत में जहाँ एक ओर नई क्रांति आई वही दूसरी ओर निजी /व्यवसाई कंपनियों के हस्तक्षेप से पत्रकारिता का स्तर भी गिरा इस सम्बन्ध में प्रैस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रहे जस्टिस काटजू ने कहा था कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकारिता कि गरिमा को भूल बैठी है उसे जन सरोकार से कोई मतलब नहीं बल्कि वो कॉरपोरेट और सरकारी प्रचारक कि तरह काम कर रहा है,
यह वह समय था जब भारतीय पत्रकारिता वाकई बुरे दौर से गुजर रही थी, इस समय एक नए युग की शुरुआत हो चुकी थी जिसे आज हम इनफार्मेशन / शोसल मीडिया टेक्नोलॉजी युग के नाम से जानते है, इस तकनिकी युग के आने के कुछ वर्षों बाद न्यूज पोर्टल्स कि शुरुआत हुई न्यूज पोर्टल्स ने काफी हद तक पत्रकारिता से सरकारी व् कॉरर्पोरेट दबाव को कम किया, अपने खुले विचार शोसल मीडिया के माध्यम से प्रसारण शुरू कर दिया,

*क्यों उड़ती है न्यूज पोर्टल्स के सम्बन्ध में अफवाहें,*
सरकारी व् कॉपोरेट दबाव न होने कि वजह से न्यूज पोर्टल के संवादाता व संपादक स्वतंत्र हो कर सरकारी व् निजी कंपनियों कि खामियों को उजागर कर उनका भांडाफोड़ करना शुरू कर दिया जिस कारण न्यूज पोर्टल्स इन लोगों की आंख की किरकिरी बन गया है इसलिए समय समय पर न्यूज पोर्टल के सम्बन्ध में इस प्रकार की फर्जी अफवाहें उड़ाई जाती है,
न्यूज पोर्टल्स के आने से सबसे ज्यादा नुकसान चाटुकार पत्रकारों व् भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों और अवैध व्यापार करने वालों को हुआ है  क्योंकि किसी विभाग की कमी, भ्रष्टाचार या किसी अवैध व्यापार की जानकारी किसी कलमचोर पत्रकार को हो जाती थी तो वो खबर लिखने से पहले उस अधिकारी/व्यापारी से बात करके मोटी रकम वसूल लेते थे और खबर गायब कर जाते थे। लेकिन न्यूज पोर्टल के समय में इन दलाल पत्रकारों व भ्रष्ट अधिकारीयों कि दाल नहीं गल पाती है इसीलिए यह लोग वेब पोर्टल को फर्जी बताते है क्यूंकि कलमचोर पत्रकारों कि सेटिंग होने से पहले ही वह खबर न्यूज पोर्टल/सोशल मीडिया में वायरल हो जाती है,
सरकार ने कभी नहीं कहा कि न्यूज पोर्टल का संवाददाता पत्रकार नहीं है वैसे तो कई बार देखने को मिलता है बहुत से अधिकारी गण भी ये फरमान जारी कर देतें है कि न्यूज पोर्टल को सरकार फर्जी मानती है, कई जनपदों में सूचना अधिकारी भी यही राग अलापते मिल जायेंगे लेकिन यदि इनसे मांग की जाए कि क्या इनके पास सरकार/ मिनिस्ट्री ऑफ़ इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग, प्रैस कौंसिल ऑफ इंडिया या प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो द्वारा जारी किया गया ऐसा कोई भी आदेश अथवा निर्देश है जिसमे में ये कहा गया हो कि सरकार न्यूज पोर्टल के संवाददाता को पत्रकार नहीं मानती। तो ये न तो आपको कोई लिखित आदेश दिखा पाएंगे और न ही कोई जिओ,
न्यूज पोर्टल्स पूर्णत: वैध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए गए स्वतंत्रता के मूल अंधिकार को प्रैस की स्वतंत्रता के समकक्ष माना गया है भारतीय नागरिक को न्यूज पोर्टल शुरू और संचालित करने कि स्वतंत्रता है,

*सरकार जल्दी ही लागू करने वाली है न्यूज पोर्टल हेतु नियमावली,*
*न्यूज पोर्टल य यू ट्यूब चैनल चलाने वाले पत्रकार भी असली पत्रकार होते है,*
न्यूज पोर्टल कि बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए 4 अप्रैल 2018 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से जारी एक आदेश में कहा गया है कि देश में चलने वाले टीवी चैनल और अखबारों के लिए नियम कानून बने हुए हैं और यदि वह इन कानूनों का उल्लंघन करते हैं तो उससे निपटने के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) जैसी संस्थाएं भी हैं, लेकिन ऑनलाइन मीडिया के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. इसे ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन मीडिया के लिए नियामक ढांचा बनाने के लिए एक समिति का गठन किया जायेगा दस लोगों की  एक समिति का गठन किया समिति के संयोजक सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव होंगे इस कमेटी में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एनबीए के सदस्य भी शामिल होंगे गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय के सचिव भी इस कमेटी का हिस्सा होंगे।
अब जब दस लोगों कि एक टीम निर्धारित कि गयी जो न्यूज पोर्टल को रेगुलेट करने सम्बन्धी नियम बनाने जा रही है, इस नियम के बनने के पहले यदि कोई यह फरमान जारी करे कि न्यूज पोर्टल फर्जी है तो या तो वह अलप ज्ञानी है या फिर वह सरकार से ऊपर की सोच रखने वाला है,
सरकार ने न्यूज पोर्टल्स को कभी भी फ़र्ज़ी नहीं माना यही कारण है कि दस सद्द्स्यीय समिति न्यूज पोर्टल हेतु नियमावली बना रही है,
न्यूज पोर्टल के विषय में किसी भी प्रकार कि अफवाह में न पड़ें. न्यूज पोर्टल पूर्णत: वैध है, और इसमें कार्यरत संवाददाता पत्रकार हैं।
08:50

जाने है क्यो हुए हनुमान जी पंचमुखी पंचमुखी हनुमानजी की विस्तृत कथा-के सी शर्मा




लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया। रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया।

रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई। रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं।

लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी। रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं।

रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे। यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी। युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए।

विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को सौंप दिया जाए।

राम-लक्ष्मण की कुटिया लंका में सुवेल पर्वत पर बनी थी। हनुमान जी ने भगवान श्री राम की कुटिया के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा खींच दिया। कोई जादू टोना तंत्र-मंत्र का असर या मायावी राक्षस इसके भीतर नहीं घुस सकता था।

अहिरावण और महिरावण श्री राम और लक्ष्मण को मारने उनकी कुटिया तक पहुंचे पर इस सुरक्षा घेरे के आगे उनकी एक न चली, असफल रहे। ऐसे में उन्होंने एक चाल चली। महिरावण विभीषण का रूप धर के कुटिया में घुस गया।

राम व लक्ष्मण पत्थर की सपाट शिलाओं पर गहरी नींद सो रहे थे। दोनों राक्षसों ने बिना आहट के शिला समेत दोनो भाइयों को उठा लिया और अपने निवास पाताल की और लेकर चल दिए।

विभीषण लगातार सतर्क थे। उन्हें कुछ देर में ही पता चल गया कि कोई अनहोनी घट चुकी है. विभीषण को महिरावण पर शक था, उन्हें राम-लक्ष्मण की जान की चिंता सताने लगी।

विभीषण ने हनुमान जी को महिरावण के बारे में बताते हुए कहा कि वे उसका पीछा करें। लंका में अपने रूप में घूमना राम भक्त हनुमान के लिए ठीक न था सो उन्होंने पक्षी का रूप धारण कर लिया और पक्षी का रूप में ही निकुंभला नगर पहुंच गये।

निकुंभला नगरी में पक्षी रूप धरे हनुमान जी ने कबूतर और कबूतरी को आपस में बतियाते सुना। कबूतर, कबूतरी से कह रहा था कि अब रावण की जीत पक्की है। अहिरावण व महिरावण राम-लक्ष्मण को बलि चढा देंगे। बस सारा युद्ध समाप्त।

कबूतर की बातों से ही बजरंग बली को पता चला कि दोनों राक्षस राम लक्ष्मण को सोते में ही उठाकर कामाक्षी देवी को बलि चढाने पाताल लोक ले गये हैं। हनुमान जी वायु वेग से रसातल की और बढे और तुरंत वहां पहुंचे।

हनुमान जी को रसातल के प्रवेश द्वार पर एक अद्भुत पहरेदार मिला। इसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था। उसने हनुमान जी को पाताल में प्रवेश से रोक दिया।

द्वारपाल हनुमान जी से बोला कि मुझ को परास्त किए बिना तुम्हारा भीतर जाना असंभव है। दोनों में लड़ाई ठन गयी। हनुमान जी की आशा के विपरीत यह बड़ा ही बलशाली और कुशल योद्धा निकला।

दोनों ही बड़े बलशाली थे। दोनों में बहुत भयंकर युद्ध हुआ परंतु वह बजरंग बली के आगे न टिक सका। आखिर कार हनुमान जी ने उसे हरा तो दिया पर उस द्वारपाल की प्रशंसा करने से नहीं रह सके।

हनुमान जी ने उस वीर से पूछा कि हे वीर तुम अपना परिचय दो। तुम्हारा स्वरूप भी कुछ ऐसा है कि उससे कौतुहल हो रहा है। उस वीर ने उत्तर दिया- मैं हनुमान का पुत्र हूं और एक मछली से पैदा हुआ हूं। मेरा नाम है मकरध्वज।

हनुमान जी ने यह सुना तो आश्चर्य में पड़ गए। वह वीर की बात सुनने लगे। मकरध्वज ने कहा- लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में अपनी अग्नि शांत करने पहुंचे। उनके शरीर से पसीने के रूप में तेज गिरा।

उस समय मेरी मां ने आहार के लिए मुख खोला था। वह तेज मेरी माता ने अपने मुख में ले लिया और गर्भवती हो गई। उसी से मेरा जन्म हुआ है। हनुमान जी ने जब यह सुना तो मकरध्वज को बताया कि वह ही हनुमान हैं। मकरध्वज ने हनुमान जी के चरण स्पर्श किए और हनुमान जी ने भी अपने बेटे को गले लगा लिया और वहां आने का पूरा कारण बताया। उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अपने पिता के स्वामी की रक्षा में सहायता करो

मकरध्वज ने हनुमान जी को बताया कि कुछ ही देर में राक्षस बलि के लिए आने वाले हैं। बेहतर होगा कि आप रूप बदल कर कामाक्षी कें मंदिर में जा कर बैठ जाएं। उनको सारी पूजा झरोखे से करने को कहें।

हनुमान जी ने पहले तो मधु मक्खी का वेश धरा और मां कामाक्षी के मंदिर में घुस गये। हनुमान जी ने मां कामाक्षी को नमस्कार कर सफलता की कामना की और फिर पूछा- हे मां क्या आप वास्तव में श्री राम जी और लक्ष्मण जी की बलि चाहती हैं ?

हनुमान जी के इस प्रश्न पर मां कामाक्षी ने उत्तर दिया कि नहीं। मैं तो दुष्ट अहिरावण व महिरावण की बलि चाहती हूं। यह दोनों मेरे भक्त तो हैं पर अधर्मी और अत्याचारी भी हैं। आप अपने प्रयत्न करो, सफल रहोगे।

मंदिर में पांच दीप जल रहे थे। अलग-अलग दिशाओं और स्थान पर मां ने कहा यह दीप अहिरावण ने मेरी प्रसन्नता के लिए जलाये हैं जिस दिन ये एक साथ बुझा दिए जा सकेंगे, उसका अंत सुनिश्चित हो सकेगा।

इस बीच गाजे-बाजे का शोर सुनाई पड़ने लगा। अहिरावण, महिरावण बलि चढाने के लिए आ रहे थे। हनुमान जी ने अब मां कामाक्षी का रूप धरा। जब अहिरावण और महिरावण मंदिर में प्रवेश करने ही वाले थे कि हनुमान जी का महिला स्वर गूंजा।

हनुमान जी बोले- मैं कामाक्षी देवी हूं और आज मेरी पूजा झरोखे से करो। झरोखे से पूजा आरंभ हुई ढेर सारा चढावा मां कामाक्षी को झरोखे से चढाया जाने लगा। अंत में बंधक बलि के रूप में राम लक्ष्मण को भी उसी से डाला गया। दोनों बंधन में बेहोश थे।

हनुमान जी ने तुरंत उन्हें बंधन मुक्त किया। अब पाताल लोक से निकलने की बारी थी पर उससे पहले मां कामाक्षी के सामने अहिरावण महिरावण की बलि देकर उनकी इच्छा पूरी करना और दोनों राक्षसों को उनके किए की सज़ा देना शेष था।

अब हनुमान जी ने मकरध्वज को कहा कि वह अचेत अवस्था में लेटे हुए भगवान राम और लक्ष्मण का खास ख्याल रखे और उसके साथ मिलकर दोनों राक्षसों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

पर यह युद्ध आसान न था। अहिरावण और महिरावण बडी मुश्किल से मरते तो फिर पाँच पाँच के रूप में जिदां हो जाते। इस विकट स्थिति में मकरध्वज ने बताया कि अहिरावण की एक पत्नी नागकन्या है।

अहिरावण उसे बलात हर लाया है। वह उसे पसंद नहीं करती पर मन मार के उसके साथ है, वह अहिरावण के राज जानती होगी। उससे उसकी मौत का उपाय पूछा जाये। आप उसके पास जाएं और सहायता मांगे।

मकरध्वज ने राक्षसों को युद्ध में उलझाये रखा और उधर हनुमान अहिरावण की पत्नी के पास पहुंचे। नागकन्या से उन्होंने कहा कि यदि तुम अहिरावण के मृत्यु का भेद बता दो तो हम उसे मारकर तुम्हें उसके चंगुल से मुक्ति दिला देंगे।

अहिरावण की पत्नी ने कहा- मेरा नाम चित्रसेना है। मैं भगवान विष्णु की भक्त हूं। मेरे रूप पर अहिरावण मर मिटा और मेरा अपहरण कर यहां कैद किये हुए है, पर मैं उसे नहीं चाहती। लेकिन मैं अहिरावण का भेद तभी बताउंगी जब मेरी इच्छा पूरी की जायेगी।

हनुमान जी ने अहिरावण की पत्नी नागकन्या चित्रसेना से पूछा कि आप अहिरावण की मृत्यु का रहस्य बताने के बदले में क्या चाहती हैं ? आप मुझसे अपनी शर्त बताएं, मैं उसे जरूर मानूंगा।

चित्रसेना ने कहा- दुर्भाग्य से अहिरावण जैसा असुर मुझे हर लाया. इससे मेरा जीवन खराब हो गया. मैं अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलना चाहती हूं। आप अगर मेरा विवाह श्री राम से कराने का वचन दें तो मैं अहिरावण के वध का रहस्य बताऊंगी।

हनुमान जी सोच में पड़ गए. भगवान श्री राम तो एक पत्नी निष्ठ हैं। अपनी धर्म पत्नी देवी सीता को मुक्त कराने के लिए असुरों से युद्ध कर रहे हैं। वह किसी और से विवाह की बात तो कभी न स्वीकारेंगे। मैं कैसे वचन दे सकता हूं ?

फिर सोचने लगे कि यदि समय पर उचित निर्णय न लिया तो स्वामी के प्राण ही संकट में हैं. असमंजस की स्थिति में बेचैन हनुमानजी ने ऐसी राह निकाली कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

हनुमान जी बोले- तुम्हारी शर्त स्वीकार है पर हमारी भी एक शर्त है. यह विवाह तभी होगा जब तुम्हारे साथ भगवान राम जिस पलंग पर आसीन होंगे वह सही सलामत रहना चाहिए। यदि वह टूटा तो इसे अपशकुन मांगकर वचन से पीछे हट जाऊंगा।

जब महाकाय अहिरावण के बैठने से पलंग नहीं टूटता तो भला श्रीराम के बैठने से कैसे टूटेगा ! यह सोच कर चित्रसेना तैयार हो गयी। उसने अहिरावण समेत सभी राक्षसों के अंत का सारा भेद बता दिया.

चित्रसेना ने कहा- दोनों राक्षसों के बचपन की बात है. इन दोनों के कुछ शरारती राक्षस मित्रों ने कहीं से एक भ्रामरी को पकड़ लिया। मनोरंज के लिए वे उसे भ्रामरी को बार-बार काटों से छेड रहे थे।

भ्रामरी साधारण भ्रामरी न थी। वह भी बहुत मायावी थी किंतु किसी कारण वश वह पकड़ में आ गई थी। भ्रामरी की पीड़ा सुनकर अहिरावण और महिरावण को दया आ गई और अपने मित्रों से लड़ कर उसे छुड़ा दिया।

मायावी भ्रामरी का पति भी अपनी पत्नी की पीड़ा सुनकर आया था। अपनी पत्नी की मुक्ति से प्रसन्न होकर उस भौंरे ने वचन दिया था कि तुम्हारे उपकार का बदला हम सभी भ्रमर जाति मिलकर चुकाएंगे।

ये भौंरे अधिकतर उसके शयन कक्ष के पास रहते हैं। ये सब बड़ी भारी संख्या में हैं। दोनों राक्षसों को जब भी मारने का प्रयास हुआ है और ये मरने को हो जाते हैं तब भ्रमर उनके मुख में एक बूंद अमृत का डाल देते हैं।

उस अमृत के कारण ये दोनों राक्षस मरकर भी जिंदा हो जाते हैं। इनके कई-कई रूप उसी अमृत के कारण हैं। इन्हें जितनी बार फिर से जीवन दिया गया उनके उतने नए रूप बन गए हैं. इस लिए आपको पहले इन भंवरों को मारना होगा।

हनुमान जी रहस्य जानकर लौटे। मकरध्वज ने अहिरावण को युद्ध में उलझा रखा था। तो हनुमान जी ने भंवरों का खात्मा शुरू किया। वे आखिर हनुमान जी के सामने कहां तक टिकते।

जब सारे भ्रमर खत्म हो गए और केवल एक बचा तो वह हनुमान जी के चरणों में लोट गया। उसने हनुमान जी से प्राण रक्षा की याचना की। हनुमान जी पसीज गए। उन्होंने उसे क्षमा करते हुए एक काम सौंपा।

हनुमान जी बोले- मैं तुम्हें प्राण दान देता हूं पर इस शर्त पर कि तुम यहां से तुरंत चले जाओगे और अहिरावण की पत्नी के पलंग की पाटी में घुसकर जल्दी से जल्दी उसे पूरी तरह खोखला बना दोगे।

भंवरा तत्काल चित्रसेना के पलंग की पाटी में घुसने के लिए प्रस्थान कर गया। इधर अहिरावण और महिरावण को अपने चमत्कार के लुप्त होने से बहुत अचरज हुआ पर उन्होंने मायावी युद्ध जारी रखा


भ्रमरों को हनुमान जी ने समाप्त कर दिया फिर भी हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों अहिरावण और महिरावण का अंत नहीं हो पा रहा था। यह देखकर हनुमान जी कुछ चिंतित हुए।

फिर उन्हें कामाक्षी देवी का वचन याद आया। देवी ने बताया था कि अहिरावण की सिद्धि है कि जब पांचो दीपकों एक साथ बुझेंगे तभी वे नए-नए रूप धारण करने में असमर्थ होंगे और उनका वध हो सकेगा।

हनुमान जी ने तत्काल पंचमुखी रूप धारण कर लिया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख।

उसके बाद हनुमान जी ने अपने पांचों मुख द्वारा एक साथ पांचों दीपक बुझा दिए। अब उनके बार बार पैदा होने और लंबे समय तक जिंदा रहने की सारी आशंकायें समाप्त हो गयीं थी। हनुमान जी और मकरध्वज के हाथों शीघ्र ही दोनों राक्षस मारे गये।

इसके बाद उन्होंने श्री राम और लक्ष्मण जी की मूर्च्छा दूर करने के उपाय किए। दोनो भाई होश में आ गए। चित्रसेना भी वहां आ गई थी। हनुमान जी ने कहा- प्रभो ! अब आप अहिरावण और महिरावण के छल और बंधन से मुक्त हुए।

पर इसके लिए हमें इस नागकन्या की सहायता लेनी पड़ी थी। अहिरावण इसे बल पूर्वक उठा लाया था। वह आपसे विवाह करना चाहती है। कृपया उससे विवाह कर अपने साथ ले चलें। इससे उसे भी मुक्ति मिलेगी।

श्री राम हनुमान जी की बात सुनकर चकराए। इससे पहले कि वह कुछ कह पाते हनुमान जी ने ही कह दिया- भगवन आप तो मुक्तिदाता हैं। अहिरावण को मारने का भेद इसी ने बताया है। इसके बिना हम उसे मारकर आपको बचाने में सफल न हो पाते।

कृपा निधान इसे भी मुक्ति मिलनी चाहिए। परंतु आप चिंता न करें। हम सबका जीवन बचाने वाले के प्रति बस इतना कीजिए कि आप बस इस पलंग पर बैठिए बाकी का काम मैं संपन्न करवाता हूं।

हनुमान जी इतनी तेजी से सारे कार्य करते जा रहे थे कि इससे श्री राम जी और लक्ष्मण जी दोनों चिंता में पड़ गये। वह कोई कदम उठाते कि तब तक हनुमान जी ने भगवान राम की बांह पकड़ ली।

हनुमान जी ने भावा वेश में प्रभु श्री राम की बांह पकड़कर चित्रसेना के उस सजे-धजे विशाल पलंग पर बिठा दिया। श्री राम कुछ समझ पाते कि तभी पलंग की खोखली पाटी चरमरा कर टूट गयी।

पलंग धराशायी हो गया। चित्रसेना भी जमीन पर आ गिरी। हनुमान जी हंस पड़े और फिर चित्रसेना से बोले- अब तुम्हारी शर्त तो पूरी हुई नहीं, इसलिए यह विवाह नहीं हो सकता। तुम मुक्त हो और हम तुम्हें तुम्हारे लोक भेजने का प्रबंध करते हैं।

चित्रसेना समझ गयी कि उसके साथ छल हुआ है। उसने कहा कि उसके साथ छल हुआ है। मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक उनके सामने किसी के साथ छल करें यह तो बहुत अनुचित है। मैं हनुमान को श्राप दूंगी।

चित्रसेना हनुमान जी को श्राप देने ही जा हे रही थी कि श्री राम का सम्मोहन भंग हुआ। वह इस पूरे नाटक को समझ गये। उन्होंने चित्रसेना को समझाया- मैंने एक पत्नी धर्म से बंधे होने का संकल्प लिया है। इस लिए हनुमान जी को यह करना पड़ा। उन्हें क्षमा कर दो।

क्रुद्ध चित्रसेना तो उनसे विवाह की जिद पकड़े बैठी थी। श्री राम ने कहा- मैं जब द्वापर में श्री कृष्ण अवतार लूंगा तब तुम्हें सत्यभामा के रूप में अपनी पटरानी बनाउंगा। इससे वह मान गयी।

हनुमान जी ने चित्रसेना को उसके पिता के पास पहुंचा दिया. चित्रसेना को प्रभु ने अगले जन्म में पत्नी बनाने का वरदान दिया था। भगवान विष्णु की पत्नी बनने की चाह में उसने स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया।

श्री राम और लक्ष्मण, मकरध्वज और हनुमान जी सहित वापस लंका में सुवेल पर्वत पर लौट आये। (स्कंद पुराण और आनंद रामायण के सारकांड की कथा)
08:44

28 अप्रैल क्रान्ति पुरोधा जोधासिंह अटैया जी के बलिदान दिवस पर विशेष-के सी शर्मा



भारत की स्वतन्त्रता का पावन उद्देश्य और अदम्य उत्साह 1857 की महान क्रान्ति का प्रमुख कारण ही नहीं, आत्माहुति का प्रथम आह्नान भी था। देश के हर क्षेत्र से हर वर्ग और आयु के वीरों और वीरांगनाओं ने इस आह्वान को स्वीकार किया और अपने रक्त से भारत माँ का तर्पण किया। उस मालिका के एक तेजस्वी पुष्प थे क्रान्ति पुरोधा जोधासिंह अटैया।

10 मई, 1857 को जब बैरकपुर छावनी में वीर मंगल पांडे ने क्रान्ति का शंखनाद किया, तो उसकी गूँज पूरे भारत में सुनायी दी। 10 जून, 1857 को फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) में क्रान्तिवीरों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिया। इनका नेतृत्व कर रहे थे जोधासिंह अटैया। फतेहपुर के डिप्टी कलेक्टर हिकमत उल्ला खाँ भी इनके सहयोगी थे। इन वीरों ने सबसे पहले फतेहपुर कचहरी एवं कोषागार को अपने कब्जे में ले लिया।

जोधासिंह अटैया के मन में स्वतन्त्रता की आग बहुत समय से लगी थी। बस वह अवसर की प्रतीक्षा में थे। उनका सम्बन्ध तात्या टोपे से बना हुआ था। मातृभूमि को मुक्त कराने के लिए इन दोनों ने मिलकर अंगे्रजों से पांडु नदी के तट पर टक्कर ली। आमने-सामने के संग्राम के बाद अंग्रेजी सेना मैदान छोड़कर भाग गयी। इन वीरों ने कानपुर में अपना झंडा गाड़ दिया।

जोधासिंह के मन की ज्वाला इतने पर भी शान्त नहीं हुई। उन्होंने 27 अक्तूबर, 1857 को महमूदपुर गाँव में एक अंग्रेज दरोगा और सिपाही को उस समय जलाकर मार दिया, जब वे एक घर में ठहरे हुए थे। सात दिसम्बर, 1857 को इन्होंने गंगापार रानीपुर पुलिस चैकी पर हमला कर अंग्रेजों के एक पिट्ठू का वध कर दिया। जोधासिंह ने अवध एवं बुन्देलखंड के क्रान्तिकारियों को संगठित कर फतेहपुर पर भी कब्जा कर लिया।

आवागमन की सुविधा को देखते हुए क्रान्तिकारियों ने खजुहा को अपना केन्द्र बनाया। किसी देशद्रोही मुखबिर की सूचना पर प्रयाग से कानपुर जा रहे कर्नल पावेल ने इस स्थान पर एकत्रित क्रान्ति सेना पर हमला कर दिया। कर्नल पावेल उनके इस गढ़ को तोड़ना चाहता था; पर जोधासिंह की योजना अचूक थी। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली का सहारा लिया, जिससे कर्नल पावेल मारा गया। अब अंग्रेजों ने कर्नल नील केे नेतृत्व में सेना की नयी खेप भेज दी। इससे क्रान्तिकारियों को भारी हानि उठानी पड़ी।

लेकिन इसके बाद भी जोधासिंह का मनोबल कम नहीं हुआ। उन्होंने नये सिरे से सेना के संगठन, शस्त्र संग्रह और धन एकत्रीकरण की योजना बनायी। इसके लिए उन्होंने छद्म वेष में प्रवास प्रारम्भ कर दिया; पर देश का यह दुर्भाग्य रहा कि वीरों के साथ-साथ यहाँ देशद्रोही भी पनपते रहे हैं। जब जोधासिंह  अटैया अरगल नरेश से संघर्ष हेतु विचार-विमर्श कर खजुहा लौट रहे थे, तो किसी मुखबिर की सूचना पर ग्राम घोरहा के पास अंग्रेजों की घुड़सवार सेना ने उन्हें घेर लिया। थोड़ी देर के संघर्ष के बाद ही जोधासिंह अपने 51 क्रान्तिकारी साथियों के साथ बन्दी बना लिये गये।

जोधासिंह और उनके देशभक्त साथियों को अपने किये का परिणाम पता ही था। 28 अप्रैल, 1858 को मुगल रोड पर स्थित इमली के पेड़ पर उन्हें अपने 51 साथियों के साथ फाँसी दे दी गयी। बिन्दकी और खजुहा के बीच स्थित वह इमली का पेड़ (बावनी इमली) आज शहीद स्मारक के रूप में स्मरण किया जाता है।
07:44

इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से मिलता है मोक्ष-के सी शर्मा




श्रीमद् भागवत और पुराणों में भी है इन सरोवरों का वर्णन..ल

सनातनधर्म में जैसे नदियों को पवित्र व मां समान बताया गया है, उसी प्रकार कई सरोवरों को भी अत्यधिक पवित्र का दर्जा दिया गया है। एक ओर जहां गंगा को देवी का स्थान दिया गया है। वहीं धर्मशास्त्रों में यमुना को सूर्य की पुत्री व यमराज की बहन का दर्जा प्राप्त है।

इसी तरह शास्त्रों में ऐसे सरोवरों के बारे में भी बताया गया है,जिनके बारे में यह कहा गया है कि यहां स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। जानकारों की मानें तो 'सरोवर' का अर्थ तालाब, कुंड या ताल नहीं होता। बल्कि यह एक तरह की झील हैं। भारत में सैकड़ों झीलें हैं लेकिन उनमें से कुछ का ही धार्मिक महत्व है। श्रीमद् भागवत और पुराणों में भी प्राचीनकालीन ऐसे 5 पवित्र ऐतिहासिक सरोवरों का वर्णन मिलता है।

वैसे तो कलयुग में केवल राम नाम आपको मोक्ष दिलवा सकता है लेकिन इस सरोवरों का विशेष धार्मिक महत्व है। इन सरोवरों के बारे में बताया जाता है कि यहां स्नान करने से सभी पापों का अंत हो जाता है और ईश्वर का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। इन सरोवरों में देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की निशानियां मिल जाएंगी और साथ में ईश्वर के होने के प्रमाण भी।

*ये हैं सनातन धर्म के 5 पवित्र सरोवर :-*

1. कैलाश मानसरोवर

यह एक ऐसा धार्मिक सरोवर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं पर माता पार्वती स्नान करती थीं। साथ ही पुराणों में इसे देवताओं की झील कहा गया है। यह मानसरोवर भगवान शंकर के निवास स्थान कैलाश पर्वत के पास स्थित है।

यह एकमात्र ऐसा सरोवर है, जो अपनी पवित्र अवस्था में आज भी मौजूद है, वहीं यह आज चीन के अधीन है। कैलाश मानसरोवर को सरोवरों में प्रथम पायदान पर रखा जाता है।

कैलाश पर्वत को शिव का धाम माना जाता है और मानसरोवर इसी के पास स्थित हैं। यह हिन्दुओं के लिए प्रमुख तीर्थस्थल है। संस्कृत शब्द 'मानसरोवर', मानस तथा सरोवर को मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- 'मन का सरोवर'। हजारों रहस्यों से भरे इस सरोवर के बारे में जितना कहा जाए, कम होगा।

शिवपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि कई ग्रंथों और शास्त्रों में इस सरोवर की महिमा का गुणगान किया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान ब्रह्माजी के मन से यह सरोवर उत्पन्न हुआ था। यहीं पर देवी सती का दायां हाथ गिरा था, इसलिए पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा की जाती है।

2. बिंदु सरोवर (गुजरात)

गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से 130 किमी दूर बिंदु सरोवर को विशेष महत्व है। यहां कपिलजी के पिता कर्दम ऋषि ने 10,000 साल तक तपस्या की थी। यहां पर उनका आश्रम भी है, जो द्वापर का तीर्थ तो था ही आज भी तीर्थ है।

कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता और भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इस स्थल का वर्णन ऋग्वेद की ऋचाओं, रामायण और महाभारत में मिलता है। यहां पर भगवान परशुराम ने अपनी माता का श्राद्ध किया था।

इस स्थल का वर्णन ऋग्वेद की ऋचाओं में मिलता है जिसमें इसे सरस्वती और गंगा के मध्य अवस्थित बताया गया है। संभवतः सरस्वती और गंगा की अन्य छोटी धाराएं पश्चिम की ओर निकल गई होंगी। इस सरोवर का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है।

3. पुष्कर सरोवर (अजमेर)

राजस्थान के अजमेर में स्थित पुष्कर सरोवर का संबंध भगवान ब्रह्मा से है। पुराणों में बताया गया है कि यह कई प्राचीन ऋषियों की तपोभूमि भी रहा है। यहां विश्व का प्रसिद्ध पुष्कर मेला लगता है।

इस सरोवर के पास भगवान ब्रह्माजी का एकमात्र मंदिर है। इस सरोवर के पास भगवान ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था, जिसके कारण इस सरोवर को मोक्ष दायक माना गया। मान्यता है कि भगवान राम ने भी अपने पिता का श्राद्ध भी यहीं किया था।

पुष्कर के उद्भव का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। पुष्कर का उल्लेख रामायण में भी हुआ है। विश्वामित्र के यहां तप करने की बात कही गई है। अप्सरा व मेनका यहां के पावन जल में स्नान के लिए आई थीं। सांची स्तूप दानलेखों में इसका ‍वर्णन मिलता है।

झील की उत्पत्ति के बारे में किंवदंती है कि ब्रह्माजी के हाथ से यहीं पर कमल पुष्प गिरने से जल प्रस्फुटित हुआ जिससे इस झील का उद्भव हुआ। यह मान्यता भी है कि इस झील में डुबकी लगाने से पापों का नाश होता है।

4. नारायण सरोवर (गुजरात)

गुजरात के कच्छ जिले में स्थिति नारायण सरोवर को लेकर मान्यता है कि यहां भगवान विष्णु ने स्नान किया था। पवित्र सरोवर के पास भगवान आदिनारयण और कोटेश्वर शिव मंदिर है। यहां लोग अपने पितरों का श्राद्ध भी करते हैं। यहां सिंधु नदी का सागर से संगम होता है।

इस पवित्र नारायण सरोवर की चर्चा श्रीमद् भागवत में मिलती है। इस पवित्र सरोवर में प्राचीनकालीन अनेक ऋषियों के आने के प्रसंग मिलते हैं।चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस सरोवर की चर्चा अपनी पुस्तक 'सीयूकी' में की है।

श्रीमद् भागवत समेत कई पुराणों और ग्रंथों में इस सरोवर के महत्व के बारे में वर्णन किया है। यहां आदि शंकराचार्य भी यहां आए थे।

5. पंपा सरोवर (मैसूर)

मैसूर के पास स्थित पंपा सरोवर का एतिहासिक महत्व है। कहा जाता है रामायण काल में वर्णित किष्किंधा यहीं है। पंपा सरोवर के आसपास का स्थान राम कथा से जुड़ा है। यहां सीता कुंड व एक अन्य सरोवर मानसरोवर है।

वहीं हंपी के निकट बसे हुए ग्राम अनेगुंदी को रामायणकालीन किष्किंधा माना जाता है। माना जाता है कि वास्तव में रामायण में वर्णित विशाल पंपा सरोवर यही है, जो आजकल हास्पेट नामक कस्बे में स्थित है।

पंपा सरोवर के निकट पश्चिम में पर्वत के ऊपर कई जीर्ण-शीर्ण मंदिर हैं। सरोवर के पास में एक पर्वत पर गुफा भी है, जिसे शबरी की गुफा कहते हैं। बताया जाता है यह वही गुफा है, जहां शबरी ने भगवान राम और लक्ष्मण को बेर खिलाए थे। मान्यता के अनुसार इसी के निकट शबरी के गुरु मतंग ऋषि के नाम पर प्रसिद्ध 'मतंगवन' था।
07:40

इस दुनिया को बनाने वाले सबसे बड़े इंजीनियर हैं भगवान विश्वकर्मा पर विशेष- के सी शर्मा



हिंदू धर्म में मानव विकास को धार्मिक व्यवस्था के रूप में जीवन से जोड़ने के लिए विभिन्न अवतारों का विधान मिलता है. इन्हीं अवतारों में से एक भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का इंजीनियर माना गया है. इसका मतलब यह है कि पूरी दुनिया का ढांचा उन्होंने ही तैयार किया है. वे ही प्रथम आविष्कारक थे.

हिंदू धर्म में मानव विकास को धार्मिक व्यवस्था के रूप में जीवन से जोड़ने के लिए विभिन्न अवतारों का विधान मिलता है. इन्हीं अवतारों में से एक भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का इंजीनियर माना गया है. इसका मतलब यह है कि पूरी दुनिया का ढांचा उन्होंने ही तैयार किया है. वे ही प्रथम आविष्कारक थे.

हिंदू धर्म ग्रंथों में यांत्रिक, वास्तुकला, धातुकर्म, प्रक्षेपास्त्र विद्या, वैमानिकी विद्या आदि का जो प्रसंग मिलता है, इन सबके अधिष्ठाता विश्वकर्मा माने जाते हैं.

 विश्वकर्मा ने मानव को सुख-सुविधाएं प्रदान करने के लिए अनेक यंत्रों व शक्ति संपन्न भौतिक साधनों का निर्माण किया. इन्हीं साधनों द्वारा मानव समाज भौतिक सुख प्राप्त करता रहा है.
प्राचीन शास्त्रों में वैमानकीय विद्या, नवविद्या, यंत्र निर्माण विद्या आदि का उपदेश भगवान विश्वकर्मा ने दिया. माना जाता है कि प्राचीन समय में स्वर्ग लोक, लंका, द्वारिका और हस्तिनापुर जैसे नगरों के निर्माणकर्ता भी विश्वकर्मा ही थे.

माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही इंद्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी और शिवमंडलपुरी आदि का निर्माण किया. पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं भी इनके द्वारा निर्मित हैं. कर्ण का कुंडल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, शंकर का त्रिशूल और यमराज का कालदंड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है.

एक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम नारायण अर्थात् विष्णु भगवान क्षीर सागर में शेषशय्या पर आविर्भूत हुए. उनके नाभि-कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे. ब्रह्मा के पुत्र ‘धर्म’ तथा धर्म के पुत्र ‘वास्तुदेव’ हुए.

कहा जाता है कि धर्म की ‘वस्तु’ नामक स्त्री से उत्पन्न ‘वास्तु’ सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे. उन्हीं वास्तुदेव की ‘अंगिरसी’ नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे. अपने पिता की भांति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने.

भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं. उन्हें कहीं पर दो बाहु, कहीं चार, कहीं पर दस बाहुओं तथा एक मुख और कहीं पर चार मुख व पंचमुखों के साथ भी दिखाया गया है. उनके पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं.

यह भी मान्यता है कि ये पांचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार भी वैदिक काल में किया. इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चांदी से जोड़ा जाता है.

हिंदू धर्मशास्त्रों और ग्रथों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है:
विराट विश्वकर्मा: सृष्टि के रचयिता
धर्मवंशी विश्वकर्मा: शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र
अंगिरावंशी विश्वकर्मा: आदि विज्ञान विधाता और वसु पुत्र
सुधन्वा विश्वकर्मा: विज्ञान के जन्मदाता (अथवी ऋषि के पौत्र)
भृंगुवंशी विश्वकर्मा: उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)

विश्वकर्मा के विषय में कई भ्रांतियां हैं. बहुत से विद्वान विश्वकर्मा नाम को एक उपाधि मानते हैं, क्योंकि संस्कृत साहित्य में भी समकालीन कई विश्वकर्माओं का उल्लेख है. कुछ विद्वान अंगिरा पुत्र सुधन्वा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं, तो कुछ भुवन पुत्र भौवन विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं.
ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाएं लिखी हुई हैं. यही सूक्त यजुर्वेद अध्याय 17, सूक्त मंत्र 16 से 31 तक 16 मंत्रों में आया है. ऋग्वेद में विश्वकर्मा शब्द इंद्र व सूर्य का विशेषण बनकर भी प्रयुक्त हुआ है.

महाभारत के खिल भाग सहित सभी पुराणकार प्रभात पुत्र विश्वकर्मा को आदि विश्वकर्मा मानते हैं. स्कंद पुराण प्रभात खंड के इस श्लोक की भांति किंचित पाठभेद से सभी पुराणों में यह श्लोक मिलता है:
बृहस्पते भगिनी भुवना ब्रह्मवादिनी.
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूनामष्टमस्य च.
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति:.

महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रह्मविद्या जानने वाली थी, वह अष्टम वसु महर्षि प्रभास की पत्नी बनी और उससे संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ.

भारत में शिल्प संकायों, कारखानों और उद्योगों में प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा पूजनोत्सव का आयोजन किया जाता है.
07:36

दीवानापन न हो तो प्रार्थना कैसी-ओशो"


अकबर एक सांझ जंगल में शिकार खेलने गया था। लौट रहा था, सांझ हो गयी, नमाज पढ़ने बैठा। जब नमाज पढ़ रहा था, अपना दस्तरखान बिछा कर, एक युवती भागती हुई निकली। अल्हड़ युवती रही होगी। थी युवती कि मुझे मिल जाती तो मेरी संन्यासिनी होती। एक धक्का मार दिया अकबर को। वे बेचारे बैठे थे अपना नमाज पढ़ने, धक्का खा कर गिर पड़े। मगर नमाज में बीच में बोलना ठीक भी नहीं। बीच में बोलना तो बहुत चाहा, दिल तो हुआ कि गर्दन पकड़ कर दबा दें इस औरत की, कि गर्दन उतार दें, मगर नमाज बीच में तोड़ी नहीं जा सकती। इसलिए पी गए जहर का घूंट। और युवती जब लौट रही थी तो नमाज तो खत्म हो गयी, अकबर राह देख रहा था उसकी। जब वह लौटी तो अकबर ने कहा कि रूक बदतमीज! तुझे इतनी भी तमीज नहीं कि कोई नमाज पढ़ता हो तो उसे धक्का मारना चाहिए? फिर तुझे यह भी नहीं दिखाई पड़ता कि मैं सम्राट हूं! साधारण आदमी को भी नमाज पढ़ने में धक्का नहीं मारना चाहिए, सम्राट को धक्का मारा!

 युवती ने कहा: ‘क्षमा करें, अगर आप को धक्का लगा हो! मुझे कुछ याद नहीं। बहुत दिनों बाद मेरा प्रेमी आ रहा था। मैं तो उसका स्वागत करने भागी चली जा रही थी। मुझे कुछ ओर दिखाई पड़ नहीं रहा था सिवाए उसके। मुझे याद भी नहीं। आप कहते हैं तो जरूर धक्का लगा होगा। हालांकि जब आपको धक्का लगा तो मुझको भी लगा होगा, क्योंकि हम दोनों टकराए होंगे; मगर मुझे कुछ याद नहीं। मुझे क्षमा कर दें, या जो दंड देना हो दे दें। मैं दीवानी हूं! मैं प्रेमी के पागलपन में चली जा रही थी भागी, मुझे पता नहीं कौन नमाज पढ़ रहा था, कौन नहीं पढ़ रहा था, कौन रास्तें में था, कौन नहीं था, किससे टकरायी, किससे नहीं टकरायी। लेकिन एक बात आपसे पूछती हूं, सजा जो देनी हो दे दें, एक बात का जवाब मुझे जरूर दे दें। मैं अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी और इतनी दीवानी थी और आप परमात्मा से मिलने गए हुए थे और मेरा धक्का आपको याद आ गया! और मेरा धक्का आपको दिखाई पड़ गया! और मेरे धक्के का आपको पता चल गया! मैं तो अपने साधारण से प्रेमी से मिलने जा रही थी-एक साधारण भौतिक-सी बात; और आप तो आध्यात्मिक नमाज में थे, प्रार्थना में थे; पूजा में थे, ध्यान में थे! आप तो परमात्मा से मिलन कर रहे थे! आपको मेरा धक्का पता चल गया! यह बात मेरी समझ में नहीं आती।’

 कहते हैं अकबर का सिर झुक गया शर्म से। उसने अपने जीवन में उल्लेख करवाया है कि उस युवती ने मुझे पहली दफा बताया कि मेरी नमाज सब थोथी है, औपचारिक है। बस करता हूं, क्योंकि करनी चाहिए। उस युवती से मैंने पहली दफा जाना कि नमाज में एक दीवानापन होना चाहिए, एक मस्ती होनी चाहिए। अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी तो कैसी मस्त थी, कैसी अल्हड़ थी! और मैं परमात्मा से मिलने जा रहा था, क्या खाक मिलने कहीं गए थे! वहीं बैठे थे, नाहक आंखें बंद किए

Monday, 27 April 2020

18:58

अनपरा-एडिशनल एसपी ने लिया लॉकडाउन की व्यवस्थाओं का जायजा




अनपरा-सोनभद्र।
एडिशनल एसपी ओपी सिंह ने कोतवाली अनपरा चौकी रेनुसागर सहित शक्तिनगर कोतवाली का आकस्मिक निरीक्षण किया इस दौरान उन्होंने लॉकडाउन में की जा रही व्यवस्थाओं का जायजा लिया।

निरीक्षण के दौरान ओपी सिंह ने पुलिस कर्मियों को लोगों से लॉकडाउन का पूर्ण पालन करवाने और ड्यूटी के दौरान साफ़ सफाई,मास्क व सेनिटाइजर का इस्तेमाल करते हुए सामाजिक दूरी का पालन करने के निर्देश दिए साथ ही क्षेत्र अंतर्गत सभी वाहनों की अनिवार्य रूप से चेकिंग करने को कहा पास वाले वाहनों में दो से अधिक लोग पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई करने के लिए निर्देशित किया ओपी सिंह ने कहा कि किसी को भी लॉकडाउन तोड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
18:44

होंडा कार्स इंडिया ने पेश किया ऑनलाइन बुकिंग प्‍लेटफॉर्म ‘होंडा फ्रॉम होम’



सुनील मिश्रा नई दिल्ली : भारत में प्रीमियम कारों की अग्रणी निर्माता कंपनी होंडा कार्स इंडिया लिमिटेड (एचसीआईएल) ने अपने उपभोक्‍ताओं को एक सुविधाजनक खरीदारी अनुभव प्रदान करने के अपने प्रयासों के तहत आज अपनी कॉरपोरेट वेबसाइट https://www.hondacarindia.com/honda-from-home के जरिये ‘होंडा फ्रॉम होम’ ऑनलाइन बुकिंग प्‍लेटफॉर्म को पेश करने की घोषणा की है।


उपभोक्‍ता बिना डीलर के पास जाए अपने घर पर रहकर 5 आसान चरणों में निर्बाध और सुरक्षित ऑनलाइन कार बुकिंग अनुभव के साथ अपनी कार को खरीद सकते हैं।
इस डिजिटल समाधान के साथ,
यह प्‍लेटफॉर्म उपभोक्‍ताओं को प्रोडक्‍ट ऑप्‍शन के जरिये ब्राउज करने, अपने पसंदीदा डीलरशिप को चुनने और अपनी कार को ऑनलाइन बुक करने की अनुमति देता है। किसी भी स्‍थान से चौबीसों घंटे पहुंच प्रदान करने के जरिये बुकिंग प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए डिजाइन किया गया यह डिजिटल बुकिंग प्‍लेटफॉर्म शीघ्र ही एचसीआईएल के भारत में सभी डीलरशिप को एकीकृत करेगा।
श्री राजेश गोयल, वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष और निदेशक, बिक्री एवं विपणन, होंडा कार्स इंडिया लिमिटेड ने कहा, “होंडा में, अपने उपभोक्‍ताओं को ‘खरीद का आनंद’ प्रदान करना हमारे कॉरपोरेट दर्शन का मूल है। हमारी नई पेश की गई ‘होंडा फ्रॉम होम’ डिजिटल उपभोक्‍ताओं, को  को  आसान और सुरक्षित अनुभव उपलब्‍ध कराती है। उपभोक्‍ता अब  घर पर आराम से बैठकर अपनी होंडा कार को बुक कर सकते हैं। इच्‍छुक उपभोक्‍ता होंडा कार्स इंडिया की वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं और बुक नाउ ऑप्‍शन को चुन सकते हैं। उपभोक्‍ता जानकारी सत्‍यापन के बाद, वे अपनी पसंद के कार मॉडल को उसके वेरिएंट्स/फ्यूल टाइप, ट्रांसमिशन (एटी/एमटी) और कलर के साथ चुन सकते हैं। उपभोक्‍ता अपनी मर्ज़ी से खरीदारी की जगह और डीलरशिप का चयन कर सकते हैं। जानकारी सारांश पेज को सत्‍यापित करने के बाद, उपभोक्‍ता पेमेंट गेटवे पर आगे बढ़ सकते हैं, एक भुगतान विकल्‍प का चयन करें और ऑनलाइन बुक करें। इसके बाद एक बुकिंग कन्‍फर्मेशन आईडी जनरेट होगी, जिसे एसएमएस या ईमेल के जरिये ग्राहक को भेजा जाता है और चयनित डीलर को बुकिंग आईडी सहित उपभोक्‍ता की पूरी जानकारी प्राप्‍त करवाई जाती है। अगले चरण में एक बिक्री कार्यकारी शामिल है- चुने गए एचसीआईएल डीलरशिप की ओर से- जो आगे की कागजी कार्रवाई और फाइनेंस या भुगतान विकल्‍प पर चर्चा के लिए उपभोक्‍ता से संपर्क करेगा। डॉक्‍यूमेंटेंशन और भुगतान संबंधी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, कार को उपभोक्‍ता के घर पर पहुंचाया जाएगा।
17:29

गरीब मजदूर बेरोजगार को भोजन देने में नाकाम रही सरकार... - कामरेड संजय नामदेव



कामरेड संजय नामदेव ने कहा कि कोरोना महामारी के चलते  समूचा देश सहित मध्य प्रदेश विगत एक माह से लॉकडाउन है प्रदेशवासी घरों में कैद हैं ऐसे हालातों पर प्रदेश का गरीब मजदूर मध्यमवर्गीय परिवार बेसहारा अनाथ विकलांग भूमिहीन खेतिहर मजदूर  अंत्योदय योजना पात्र बीपीएल धारी फेरीवाले रिक्शा चालक ठेला चालक कुली बीड़ी श्रमिक भूमिहीन कोटवार बढ़ई वाहन मिस्त्री कुटीर उद्योग मजदूर मंदबुद्धि व्यक्ति मत्स्य  पालनकर्ता मजदूर  छोटे कर्मचारी एवं घुमक्कड़ जातियों के  लोगों के पास आज रोटी का संकट है जिसके चलते केंद्र सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 मार्च को देश के 80 करोड़ नागरिकों के लिए 3 महीने तक मुक्त भोजन दिए जाने की घोषणा किया था  केंद्रीय वित्त मंत्री के घोषणा उपरांत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी यही घोषणा किया था लेकिन  कोरोना महामारी फैले  एक माह हो गया है शासकीय गोदामों में गेहूं चावल सड़ रहा है लेकिन अभी तक सरकार ने  15 फ़ीसदी  भी पात्र व्यक्तियों को खाद्यान्न  उपलब्ध कराने में नाकाम रही है केंद्र एवं प्रदेश सरकार पर यह आरोप लगाते हुए कहा कि देश के कमजोर पीड़ित लोगों को भूख से बचाने दान भी देशवासी कर रहे हैं रोजगार भी जनता का खराब है घरों में जनता ही कैद है खाने का पैकेट देश के समाजसेवी बांट रहे हैं तो फिर सरकार जंग लड़ने की बात कैसे कर रही हैं समझ से परे है आज  कोरोना महामारी में जो दानवीर  पीएम फंड में रुपए दान किए हैं वह देश की  137 करोड़ जनसंख्या पर वितरित किया जाए तो प्रति व्यक्ति एक लाख रुपए  से अधिक आता है लेकिन आज नागरिकों के पैसे पर  व्यापक भ्रष्टाचार किया जा रहा है आज भूख से  पीड़ित व्यक्तियों को प्रदेश के अंदर सड़ा गेहूं एवं किनकी युक्त चावल का वितरण किया जा रहा है उनके थाली से दाल एवं सब्जी गायब है  सरकार के पोस्टिक आहार देने की घोषणा सिर्फ दस्तावेजों तक सीमित है  सीएम  से सवाल करते हुए कहा कि गरीब का पेट क्या मात्र रोटी व चावल से भरेगा क्या ऐसे भोजन  से उसके शरीर को पोषक तत्व मिलेंगे  तो  फिर आप दर्जनों व्यंजन रूपी थाली का उपयोग क्यों करते हैं  यदि सच्चे जनसेवक हैं तो आप भी रोटी और चावल का मात्र उपयोग करें और  रोजाना मीडिया के माध्यम से अपनी थाली को प्रदेश की जनता के सामने सार्वजनिक करें  अन्यथा जनता के सच्चे सेवक होने का ढिंढोरा पीटना बंद करें l
17:24

संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ- भारत" ने "प्रधानमंत्री" को पत्र लिख "खबरपालिका" गठन की मांग-रष्ट्रीय अध्यक्ष- रमेन्द्र पांडेय




आल इंडिया यूनाइटेड वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन( संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ भारत) ने भारत के प्रधान मन्त्री को म प्र के मुख्यमंत्री के माध्यम से पत्र लिख "खबर पालिका" के गठन की मांग की है।
भेजे गए पत्र में 25 सूत्रीय मांगों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए उसके समाधान की मांगी है।अन्यथा देश व्यापी आंदोलन की चेतावनी भी दी है।पत्र की प्रतिलिपि सूचना प्रसारण मंत्री एवं राज्यपाल को भी भेजी गई है। नीचे देखे पत्र में क्या उल्लेख है।

*(  मजदूर दिवस एक मई पर विशेष  )*
                                                                   *प्रतिष्ठा में,
प्रधानमंत्री महोदय
पी एम ओ  , नई दिल्ली ,भारत*

       *द्वारा - प्रति, मुख्य मंत्री माननीय शिवराज सिंह चौहान जी म. प्र*.

विषय:-खबर पालिका गठन,पत्रकारिता को लोकतांत्रिक स्तम्भ का संवैधानिक दर्जा मान्य करने,केन्द्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने तथा अन्य प्रमुख मांगों की मंजूरी बावत ꫰

संदर्भ:-संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ का राष्ट्रव्यापी महा आंदोलन ꫰

महानुभाव,
सादर सविनम्र विनय है कि  भारत गणराज्य में लागू संविधान के तहत लोकतांत्रिक प्रणाली के अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थायी स्तम्भ के रूप में सर्वमान्य पत्रकारिता को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर कानूनी मान्यता देने खबर पालिका गठित करना अनिवार्य है ꫰
मान्यवर,
   स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात अन्य स्तम्भों की वैधानिक व्यवस्था के वक्त ही चौखम्भा राज में पत्रकारिता को चतुर्थ स्तम्भ न स्वीकारने की तत्समय हुई ऐतिहासिक भारी भूल को सुधारने का यही सबसे सही समय है ꫰
महोदय,
   पत्रकारों की हत्या ,हमला ,प्रताड़ना ,जान-माल की क्षति तथा असुरक्षा की गंभीर स्थिति को देखते हुये पत्रकार सुरक्षा कानून तत्काल लागू करना अत्यावश्यक है ꫰
महोदय,
   संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ उपरोक्त मांगों सहित पत्रकार,पत्रकारिता एवं समाचार पत्र व मीडिया संस्थाओं,संस्थानों तथा प्रतिष्ठानों से सम्बद्ध विभिन्न यथार्थ मुद्दों और ज्वलन्त समस्याओं के समाधान से जुड़ी कई प्रमुख मांगों को लेकर राष्ट्रव्यापी महा आंदोलन शांतिपूर्ण अहिंसक लोकतांत्रिक ढंग से संचालित कर रहा है ꫰। अब तक कई बार केन्द्र व राज्य शासन-प्रशासन को मांग पत्र/ज्ञापन देकर वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया,किन्तु अपेक्षित फल-प्रतिफल अप्राप्त ही है ꫰।
  अतएव प्रस्तुत ज्ञापन/ मांग पत्र के विषय विंदुओं पर विधि सम्मत व प्रक्रिया संगत कार्यवाही की जाकर माँगों को पूरा कराने की अहैतुकी महती कृपा की जाय और तत्सम्बन्धी प्रगति से अवगत भी कराने की महान दया की जाय ꫰
  प्रमुख माँगें इस प्रकार हैं:-
1-खबर पालिका गठित की जाय तथा पत्रकारिता को लोकतंत्र के प्राथमिक आधारभूत स्थायी स्तम्भ का संवैधानिक दर्जा देकर कानूनी मान्यता दी जाय ꫰
2:-केन्द्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून तत्काल लागू किया जाय ꫰
3:-पत्रकारिता विकास निगम व मिशन बनाया जाय ꫰
4:-समाचार पत्रों ,मीडिया संस्थानों एवं सूचना संचार प्रचार-प्रसार माध्यमों को स्वायत्त,स्वावलम्बी तथा आत्म निर्भर बनाया जाय ꫰
5:-अखबार व मीडिया की वैयक्तिक वंशानुगत स्वत्वाधिकार कुप्रथा समाप्त कर कार्यरत पत्रकारों समाचार पत्र-मीडिया कर्मियों की सहकारी प्रकाशन व प्रसारण समिति को प्रबंधन एवं संचालन व्यवस्था सौंपी जाय ꫰
6:-पत्रकारों की माँगों पर विचार करने तथा पत्रकारिता के सर्वांगीण विकास के लिये मंत्रिमण्डलीय समिति का गठन किया जाय ꫰
7:-पत्रकारों को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर विभिन्न स्तरीय अधिमान्यता देने की सुस्पष्ट सरल पारदर्शी प्रक्रियाअपनायी जाय,नियम व पात्रता को आसान एवं व्यवहारिक बनाया जाय तथा पात्र पत्रकारों को अधिमान्यता प्रदान की जाय ꫰साथ ही शासन की घोषणानुसार दो-दो वर्षीय ही अधिमान्यता देने व नवीनीकरण की स्वत: व्यवस्था की जाये ।
8:-पत्रकार पेंशन केन्द्र व प्रदेश स्तर पर दी जाय तथा म.प्र.में जारी श्रद्धा निधि के लिये पात्रता  10वर्षीय लगातार अधिमान्यता      की शर्त अवधि को घटाकर 5वर्ष किया जाय और राशि बढ़ाकर न्यूनतम 15हजार रु.मासिक की जाय एवं आजीवन प्रदान करने के अतिरिक्त मृत्यु पर पत्नी या पति को जीवन काल का गुजारा दिया जाय ꫰
9:-पत्रकार आवास सुविधा दी जाय एवं भूखण्ड व भवन उपलब्धता सुनिश्चित कर मालिकाना हक देने हेतु सरकार की गारण्टी पर ब्याज मुक्त रियायती ऋण दीर्घावधि की न्यूनतम आसान किश्तों में वापसी सुविधा पूर्वक दिया जाय ।             10:-जीवन बीमा,समूह दुर्घटना बीमा की राशि बढ़ाकर १०लाख रु.की जाय तथा प्रीमियम की पूरी रकम शासन द्वारा अदा की जाय और कैशलेस चिकित्सा की सीमा भी १०लाख रु.की जाय ꫰
11:-पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित पुरस्कारों तथा सम्मानों की संख्या व राशि बढ़ाई जाय एवं चयन की निष्पक्ष पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाय ꫰प्रकाशित व प्रसारित खबर अग्रलेख आलेख आदि का स्वस्फूर्त आकलन मूल्यांकन कर बगैर आवेदन या दावा के पुरस्कार तथा सम्मान देने का निर्णय लिया जाय ।
12:-पत्रकारों की मृत्यु ,हमला या दुर्घटना में अपंगता की दशा में अथवा  प्रताड़ना के मामलों में पीड़ित व प्रभावित पत्रकार को  समुचित क्षतिपूर्ति राहत सहायता राशि प्रदान की जाय ꫰।
13:-शासकीय व अर्ध शासकीय समितियों संस्थाओं एवं निकायों में हर स्तर पर पत्रकारों को समुचित प्रतिनिधित्व दिया जाय ꫰
14:-पत्रकारों के बच्चों को नि:शुल्क उच्च शिक्षा सुविधा दी जाय तथा शीर्ष शिक्षा संस्थानों में प्रवेश हेतु कुछ स्थान सुरक्षित रखा जाय ꫰।
15:-सभी शासकीय सेवाओं तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में पत्रकार परिवार को विशेष प्राथमिकता प्रदान कर कुछ स्थान आरक्षित रखा जाय ꫰
16:-पत्रकार प्रशिक्षण कार्यशाला,शोध,अध्ययन,भ्रमण ,खोज हेतु प्रोत्साहन देकर व्यय भार वहन करने के साथ ही प्रकाशन-प्रसारण में आर्थिक सहायता दी जाय ꫰
17:-राज्य,संभाग व जिला स्तर पर त्रिपक्षीय बैठकों का नियमित आयोजन हो। ꫰१७:-म.प्र.शासन द्वारा पत्रकार पंचायत बुलाई जाय ꫰
18:-हर स्तर पर अधिमान्यता समितियों का पुनर्गठन हो तथा वास्तविक पत्रकारों का प्रतिनिधित्व हो ꫰।
19:-नई विज्ञापन नीति बने तथा लघु/मध्यम दैनिक -साप्ताहिक पाक्षिक मासिक पत्र-पत्रिकाओं को विशेष प्रोत्साहन विज्ञापन दिया जाय ꫰।
20:-पत्रकारों से जुड़े मामलों पर जाँच कार्यवाही बावत गृह मंत्रालय के पूर्व परिपत्र को अद्यतन कर पुन:जारी किया जाय ꫰
21:-श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम पर आधारित नियमों का पालन हो,मजीठिया वेतन मान सुविधा दी जाय और नया वेतन आयोग गठित किया जाय तथा संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ को मान्यता प्रदान कर सब भाँति महत्व दिया जाय । 22:- पत्रकारों को तहसील, जिला, राज्य स्तरीय अधिमान्यता का उन्नयन कर राष्ट्रीय स्तर की भी अधिमान्यता प्रदान की जाये ।
23:- अधिमान्य पत्रकारों को रेल यात्रा की भांति विशेष रियायती विमान यात्रा सुविधा भी प्रदान की जाये ।
24:- सरकारी बसों में रियायती यात्रा सुविधा दी जाये और निजी बस/टैक्सी से यात्रा व्यय की प्रतिपूर्ति की जाय ।
25 :- शासन - प्रशासन और पत्रकारों के बीच समन्वय हेतु उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की जाकर पत्रकार महासंघ का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाय ।
अत: ज्ञापन प्रस्तुत कर उपरोक्त मांगों की शीघ्रातिशीघ्र पूर्ति का पुनश्च अनुनय अनुरोध है ꫰।
एतदर्थ हम कृतज्ञता पूर्ण चिर अनुग्रहीत रहेंगे ꫰।
सधन्यवाद,आभार ꫰।
द्वारा:-संभागीय आयुक्त / जिलाध्यक्ष 

प्रतिलिपि:-
1:-प्रधान मंत्री भारत सरकार नई दिल्ली ꫰
2:-सूचना एवं प्रसारण मंत्री,भारत सरकार नई दिल्ली ꫰
3:-महा महिम राज्यपाल महोदय
राज भवन भोपाल म.प्र.।
4:-मुख्य मंत्री महोदय
म.प्र.शासन मंत्रालय बल्लभ भवन भोपाल म.प्र.।

स्थान           दिनांक
   रीवा  01. 05.2020  राष्ट्रीय अध्यक्ष/महासचिव
संयुक्त श्रमजीवी पत्रकार महासंघ (भारत)
17:04

मानव सेवा सबसे बड़ा धर्म इस धर्म के लिए हम दिन रात तत्पर गंगेश्वर दत्त शर्मा सीटू




नोएडा, सीटू जिलाध्यक्ष दत्त शर्मा ने कहा कि कोविड-19 लॉक  डाउन से प्रभावित गरीब असहाय मजदूरों को भुखमरी से बचाने के लिए मजदूर यूनियन सीटू नोएडा के कार्यकर्ता दिन-रात अपनी और अपने परिवार की परवाह किए बगैर पूरे जी-जान से लगातार गरीब लोगों की मदद कर मानव धर्म निभा रहे हैं।
प्रत्येक दिन की भांति सोमवार 27 अप्रैल 2020 को भी  कई गांव, मजदूर बस्तियों/ स्थानों पर सैकड़ों लोगों को एक हफ्ते के लिए राशन की किट देकर मदद किया। साथ ही उन्होंने कहा कि मजदूरों को सहयोग करने का अभियान आगे भी निरंतर जारी रहेगा।
राहत अभियान का नेतृत्व सीटू नेता रामसागर विनोद कुमार गंगेश्वर दत्त शर्मा मदन प्रसाद आदि ने किया।


विनोद कुमार
जिला सचिव
सीटू जिला कमेटी गौतम बुध नगर

सीटू राष्द्रीय राजधानी क्षेत्र कोविद-19 सहायता नंबर-9205092019
05:23

जिला कलेक्टर की निजी अस्पतालों को हिदायत, परिस्थितियों का नहीं उठावें अनावश्यक लाभ नही तो होगी कार्यवाही



सवाई माधोपुर@रिपोर्ट चंद्रशेखर शर्मा। कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच एक और जहां लोग आपदा की इस घड़ी में  भामाशाह व समाजसेवी के रूप में जरूरतमंदों गरीब व असहायों के लिए दिल खोलकर दान- पुण्य कर उनकी सेवा कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य कर्मी, पुलिस कर्मी, सफाई कर्मी आदि भी भगवान का रूप धारण कर दिन- रात मरीजों की सेवा व सुरक्षा में महती भूमिका निभा रहे हैं हैं। इससे भिन्न समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो लालची प्रवृत्ति के होने के साथ-साथ संवेदनहीन भी कहे जा सकते  हैं। कुछ ऐसे ही लोग जो हर वक्त  व्यापारिक दृष्टिकोण को तवज्जो देते हैं। विपदा की इस घड़ी में उन लोगों द्वारा आज भी मरीजों का शोषण करने में तनिक भी शर्म महसूस नहीं की जा रही है । अतिरिक्त मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा कोरोना वायरस (कोविड-19) संक्रमण को पैनडेमिक घोषित करने से उत्पन्न स्थिति के परिपेक्ष्य में सामान्य चिकित्सा सेवाओं में प्रभाव पड़ा है।
जिला कलेक्टर नन्नूमल पहाड़िया ने बताया कि इस संबंध में गर्भवती महिलाओं को कई जगह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। प्रसव के लिए महिलाएं राजकीय व निजी चिकित्सा संस्थाओं पर जाती है। परन्तु यह देखने में आया है कि कुछ निजी चिकित्सालय इस परिस्थिति का मानवता से परे जाकर आर्थिक लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रसूता के परिजनों से पीपीई किट एवं स्टॉफ के नाम पर अनावश्यक राशि वसूलने के प्रयास कर रहे है। सामान्य प्रसव को भी अति आवश्यक बताकर सिजेरियन प्रसव कराने की शिकायत भी प्राप्त हो रही है। कलेक्टर ने बताया कि यह पूर्णतया अनुचित है जबकि ए.बी.-एम.जी.आर.एस.बी.वाई. के अन्तर्गत निजी चिकित्सालय एनएफएसए एवं एसईसीसी श्रेणी के लाभार्थियों को निःशुल्क चिकित्सा सेवायें प्रदान करने के लिए अनुबन्ध के आधार पर प्रतिबद्ध है। साथ ही अन्य लोगो से तय राशि अनुसार ही निर्धारित शुल्क लिया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सवाई माधोपुर को निर्देशित किया गया कि वे समस्त निजी चिकित्सालयों को पाबन्द करावें। साथ ही रेन्डम बेसिस पर इन चिकित्सालयों में भर्ती प्रसूताओं एवं अन्य महिलाओं से वार्ता कर अनावश्यक ली गई राशि के बारे में ज्ञात करें। साथ ही इस अवधि में अप्रत्याशित सिजेरियन प्रसव संख्या अधिक पाई जाती है, तो तत्काल पाबन्द करें। जिले में सभी निजी चिकित्सालयों के परिसर में जिला स्तरीय कन्ट्रोल रूम के फोन नम्बर भी चस्पा कराने के निर्देश दिए है तथा इस प्रकार के प्रकरणों की कहीं भी शिकायत आती है तो प्रभावी कार्यवाही करने के लिए निर्देशित किया हैं।
05:15

ईश्वरी शक्ति युक्ति और मुक्ति केसी शर्मा की कलम से





सनातन धर्म में “कण-कण में भगवान” का सुंदर भाव हृदय को सदैव से आनंदित करता रहा है।
शास्त्र और संतों के अनुसार इस जगत में जो कुछ भी चराचर रूप देख पा रहे हैं उसकी उत्पत्ति, प्रकृति रूपी माँ ‘योगमाया’ की कृपा से और विनाश भी माँ की रुष्टता से ही है।
प्राचीन काल से ही सनातन धर्म की समृद्ध परम्पराओं एवं ज्ञान ने प्रकृति के अनुरूप धार्मिक एवं सामाजिक नियम एवं दायित्व निर्धारित किए हैं। प्रकृति और सनातन धर्म को पृथक करके नहीं देख सकते अपितु सनातन धर्म का मूल भाव या कहें आधार प्रकृति पर ही टिका है।

जीवन के लिए भोजन एवं भोग सभी प्रकृति से ही तो प्राप्त हो रहा है।
 वास्तव में जो भी चराचर का दर्शन अथवा भोग कर रहे हैं, सब प्रकृति से ही तो ले रहे हो, अतः सनातन धर्म में कण कण में भगवान का भाव, प्रकृति और परमात्मा के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन भी है।
 प्रभु ने भाव के प्रभाव में अनेकानेक लीलाएँ भी प्रकट की हैं। शास्त्र, श्रुति, स्मृतियों में भी इस भाव के बड़े ही सुंदर दर्शन होते हैं। ऐसे प्रसंगों से कण कण में भगवान की जो अवधारणा सनातन धर्म में विद्यमान है, बलवती होती है।
भक्तों के दृढ़ विश्वास और प्रेम ने प्रभु का आसन भी हिला दिया था, ऐसे भी अनेकानेक दिव्य प्रसंग हैं।

संत एकनाथ जी, संतों की एक टोली के साथ प्रयागराज के पवित्र जल से ज्योतिर्लिंग रामेश्वर (मतान्तर से बैधनाथ धाम) में जलाभिषेक की अभिलाषा लिए निरन्तर नाम संकीर्तन करते चले जा रहे थे। दूर से मंदिर के शिखर के दर्शन होते ही संतों का उत्साह और भी प्रबल हो उठा।
संतगण उद्दाम संकीर्तन करते आगे बढ़ रहे थे कि तभी संतों की दृष्टि सड़क किनारे प्यास से व्याकुल बीमार गधे पर पड़ी। करुणा तो सभी संतों के हृदय में जाग्रत हुई, किंतु वह हृदय में ही क्षमा माँगते हुए आगे चल दिए। अरे यह तीर्थ का जल तो भोले बाबा के निमित्त दूर से ला रहे हैं। यदि हमने इस जीव को पिला दिया तो संकल्प की हानि हो सकती है।

अपनी धुन में मग्न संत एकनाथ जी महाराज की दृष्टि प्यास से व्याकुल, जीभ निकाले, ज़मीन पर सर पटकते गधे पर पड़ी, संत हृदय व्याकुल हो उठा।
जीव में ही शिव के दर्शन होने लगे।
मंदिर शिखर को प्रणाम कर कहा, हे सर्वव्यापी नाथ आप स्वयं रूप समस्त चराचर में व्याप्त हैं, आप ही तो सृष्टि के कण कण में निवास करते हो। ऐसा ध्यान कर जल कलश ले कर गधे के समीप पहुँचे, हृदय में शिव का ध्यान और मुख में अखंड जप अनवरत चल रहा था, चूँकि संत एकनाथ जानते थे कि गर्दभ बहुत प्यासा है और कहीं पिलाते समय जल छलक कर व्यर्थ न हो जाए, अतः अपनी जंघा पर गर्दभ का सिर रखा और तीर्थ का जल गधे को बड़े ही प्रेम से पिलाने लगे।

संतजन बताते हैं क‍ि संत एकनाथ अभिभूत हो उठे जब उन्होंने गर्दभ के स्थान पर, अपनी जंघा पर सिर रखे जल ग्रहण करते, भगवान भोले नाथ के दर्शन किए।
भगवान की ऐसी दुर्लभ कृपा अनन्य समदर्शी और कण-कण में भगवान के भाव को धारण करने से ही सम्भव हुई। यही वह भाव है जो कण कण में भगवत् तत्व को उद्घाटित करता है।

अब शिव दर्शन की कामना में यदि हम जल कलश लेकर प्यासे गधे को खोजते फिरें तो क्या शिव के दर्शन कर पाएँगे? नहीं क्योंकि यहाँ भाव लुप्त हो गया है और हमने इस प्रसंग से युक्ति खोज ली है। भगवान की प्राप्ति भाव से ही सम्भव है। युक्ति से नहीं। यही है सनातन धर्म की विशेषता।
 यही है सनातन धर्म का भाव, सनातन धर्म की विशालतासनातन धर्म की सुंदरता। कण कण में जहां बसते हैं राम।

मंदिर के रास्ते में कोई बन्दर प्रेम से अपने एक हाथ से तुम्हारा हाथ पकड़ कर दूसरे हाथ से भोग के लड्डू छीन ले तो तुम्हारी चीख़ निकलेगी या प्रेम छलकेगा ?
भय के भाव के साथ तो प्रेम प्रकट ही नहीं हो सकता और प्रयास के बाद भी यदि लड्डू नहीं बचा सके तो कण कण में भगवान तो हैं ही !
लड्डू तो गए, अब बन्दर में भी भगवान के दर्शन कर पुण्य कमा लें तो अच्छा ही है। यह भाव है या चतुराई? गाय अगर तुम्हारी तरफ़ भोजन की अभिलाषा में गति से लपके, तो “भागो “ का भाव आएगा या संत एकनाथ की कथा याद आएगी।

ध्यान से देखोगे तो समझ जाओगे कि जो सारी धारणाएँ और ज्ञान चारों ओर देख-सुन रहे हो! इसका कोई बहुत अर्थ सांसारिक जीवन में है नहीं, क्योंकि आचरण और व्यवहार परिस्थिति और व्यक्ति की सामर्थ के अनुरूप बदल जाता है।
जीवन इतना प्रपंची हो गया है कि प्रेम अथवा क्रोध भी बिना स्वार्थ के प्रकट नहीं हो रहा है। कथनी और करनी पर स्वार्थ का ऐसा रंग चढ़ा है कि आत्मा की आवाज़ तो भ्रम और मिथ्या ही लगती है।
वैसे अपनी अनुकूलता और स्वयं की प्रसन्नता के लिए हम अपने जीवन की असहज अथवा विशेष घटनाओं के घटित होते समय, आत्म संतुष्टि के लिए उन घटनाओं को मीरा बाई, सूरदास, कबीरदास, एकनाथ जी आदि अनेक महापुरुषों से जोड़ लेते हैं। भाव सबके लिए सम है, किससे जुड़े, यह तो उस समय जो स्मृति में आ गया। बन बैठे उसी के।

निन्यानवे के फेर में, गंगा स्नान को नहीं जा पा रहे! “मन चंगा तो कठोती में गंगा” के भाव में लगाने लगे गोते! संत रविदास जी महाराज पधार गए हृदय में।
तथागत महात्मा बुद्ध ने भी मध्यमार्ग को ही कल्याणकारी बताया है।
अनेकानेक महापुरुषों एवं संतों ने यथासम्भव पाखंड और आडम्बर से बचने की ही सीख दी है। यदि झांकें अपने भीतर तो जो भी थोड़ा बहुत ज्ञान है वो भी पाखंड, अहंकार, स्वार्थ और लोभ के रंग में सराबोर ही दिखेगा।

संसार में सांसारिक विधान और नियमों के अंतर्गत ही जीवन जी सकते हो। सांसारिक व्यवस्थाओं और नियमों का पालन आवश्यक हो सकता है किंतु प्रयास यही रहना चाहिए कि धर्म और परमात्मा के समक्ष सत्य निष्ठ भाव बना रहे, अर्थात् संसार और आध्यात्मिक जगत दोनों की कुछ मर्यादाएँ एवं नियम हैं।
यथासंभव दोनों को आदर देना ही धर्म है। धर्म ही इस नश्वर संसार का आधार है। यदि धर्म ही नहीं है तो संसार मात्र भोग और रोग ही दे सकता है।

द्वारिकाधीश भगवान कृष्ण ने दुर्योधन के यहाँ भोजन प्रसाद न लेकर विदुर जी के यहाँ रूखा सूखा प्रसाद लिया था। भगवान वैभव में नहीं हैं – भाव में अवस्थित हैं। जहां तक सम्भव हो जीवन में कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए। यदि लोक-परलोक में मंगल की कामना है तो धार्मिक और जनसेवा के कार्यों में तो और भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए।
05:03

जानिए रावण ने लक्ष्मण को क्या बताए थे अपने कुल के पतन के तीन कारण केसी शर्मा




जिस समय रावण मरणासन्न अवस्था में था, उस समय भगवान  श्रीराम ने लक्षमण से कहा कि इस संसार से नीति, राजनीति और शक्ति का महान् पंडित विदा ले रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता। श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के सिर के नजदीक जाकर खड़े हो गए।

रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मणजी वापस रामजी के पास लौटकर आए। तब भगवान ने कहा कि यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना हो तो उसके चरणों के पास खड़े होना चाहिए न कि सिर की ओर। यह बात सुनकर लक्ष्मण जाकर इस रावण के पैरों की ओर खड़े हो गए। उस समय महापंडित रावण ने लक्ष्मण को तीन बातें बताई जो जीवन में सफलता की कुंजी है।

1- पहली बात जो रावण ने लक्ष्मण को बताई वह ये थी कि शुभ कार्य जितनी जल्दी हो कर डालना और अशुभ को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए यानी शुभस्य शीघ्रम्।
 मैं श्रीराम को पहचान नहीं सका और उनकी शरण में आने में देरी कर दी, इसी कारण मेरी यह हालत हुई।

2- दूसरी बात यह कि अपने प्रतिद्वंद्वी, अपने शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए, मैं यह भूल कर गया। मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके ऐसा कहा था क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था। यह मेरी गलती थी।

3- रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम बात ये बताई कि अपने जीवन का कोई राज हो तो उसे किसी को भी नहीं बताना चाहिए। यहां भी मैं चूक गया क्योंकि विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था। ये मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती थी।

ये है वो तीन बातें जो रावण ने लक्ष्मण को कही  थी। ये वही बातें है जिनकी वजह से रावण हार गया और गलती कर गया था। ऐसा कहा जाता है कि रावण हर बात का प्रकांड पंडित हुआ करता था लेकिन ये तीन गलतियाँ करके वो मृत्युशय्या तक पहुँच गया। आज भी ये बातें उतनी ही कारगर है, इसलिए हमें इन तीन बातों का ध्यान अपने जीवन में जरुर रखना चाहिये।
04:57

जानिए कांगला दुर्ग का पतन का कारण-के सी शर्मा




1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ भी कहते हैं।

उनका जन्म 29 दिसम्बर, 1856 को हुआ था। वे राजा चन्द्रकीर्ति के चौथे पुत्र थे। राजा की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र सूरचन्द्र राजा बने। दूसरे और तीसरे पुत्रों को क्रमशः पुलिस प्रमुख तथा सेनापति बनाया गया। कुछ समय बाद सेनापति झलकीर्ति की मृत्यु हो जाने से टिकेन्द्रजीत सिंह सेनापति बनाये गये।

राजवंशों में आपसी द्वेष व अहंकार के कारण सदा से ही गुटबाजी होती रही है। मणिपुर में भी ऐसा ही हुआ। अंग्रेजों ने इस स्थिति का लाभ उठाना चाहा। टिकेन्द्रजीत सिंह ने राजा सूरचन्द्र को कई बार सावधान किया; पर वे उदासीन रहे। इससे नाराज होकर टिकेन्द्रजीत सिंह ने अंगसेन, जिलंगाम्बा आदि कई वीर व स्वदेशप्रेमी साथियों सहित 22 सितम्बर, 1890 को विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह से डरकर राजा भाग गया। अब कुलचन्द्र को राजा तथा टिकेन्द्रजीत सिंह को युवराज व सेनापति बनाया गया। पूर्व राजा सूरचन्द्र ने टिकेन्द्रजीत सिंह को सूचना दी कि वे राज्य छोड़कर सदा के लिए वृन्दावन जाना चाहते हैं; पर वे वृन्दावन की बजाय कलकत्ता में ब्रिटिश वायसराय लैंसडाउन के पास पहुंच गये और अपना राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की।

इस पर वायसराय ने असम के कमिश्नर जे.डब्ल्यू. क्विंटन को मणिपुर पर हमला करने को कहा। उनकी इच्छा टिकेन्द्रजीत सिंह को पकड़ने की थी। चूंकि इस शासन के निर्माता तथा संरक्षक वही थे। क्विंटन 22 मार्च, 1891 को 400 सैनिकों के साथ मणिपुर जा पहुंचा। इस दल का नेतृत्व कर्नल स्कैन कर रहा था। उसने राजा कुलचंद्र को कहा कि हमें आपसे कोई परेशानी नहीं है। आप स्वतंत्रतापूर्वक राज्य करें; पर युवराज टिकेन्द्रजीत सिंह को हमें सौंप दें।

पर स्वाभिमानी राजा तैयार नहीं हुए। अंततः क्विंटन ने 24 मार्च को राजनिवास ‘कांगला दुर्ग’ पर हमला बोल दिया। उस समय दुर्ग में रासलीला का प्रदर्शन हो रहा था। लोग दत्तचित्त होकर उसे देख रहे थे।इस असावधान अवस्था में ही क्विंटन ने सैकड़ों पुरुषों, महिलाओं तथा बच्चों को मार डाला; पर थोड़ी देर में ही दुर्ग में स्थित सेना ने भी मोर्चा संभाल लिया। इससे अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। क्रोधित नागरिकों ने पांच अंग्रेज अधिकारियों को पकड़कर फांसी दे दी। इनमें क्विंटन तथा उनका राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड भी था।

अंग्रेज सेना की इस पराजय की सूचना मिलते ही कोहिमा, सिलचर और तामू से तीन बड़ी सैनिक टुकडि़यां भेज दी गयीं। 31 मार्च, 1891 को अंग्रेजों ने मणिपुर शासन से युद्ध घोषित कर दिया। टिकेन्द्रजीत सिंह ने बड़ी वीरता से अंग्रेज सेना का मुकाबला किया; पर उनके साधन सीमित थे। अंततः 27 अप्रैल, 1891 को अंग्रेज सेना ने कांगला दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेजों ने राजवंश के एक बालक चारुचंद्र सिंह को राजा तथा मेजर मैक्सवेल को उनका राजनीतिक सलाहकार बनाकर मणिपुर को अपने अधीन कर लिया। टिकेन्द्रजीत सिंह भूमिगत हो गये; पर अंततः 23 मई को वे भी पकड़ लिये गये। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाकर उन्हें और उनके साथी जनरल थंगल को 13 अगस्त, 1891 को इम्फाल के पोलो मैदान (वर्तमान वीर टिकेन्द्रजीत सिंह मैदान) में फांसी दे दी।
04:50

क्या आप जानते है भोलेनाथ शिव शंकर जी ने मस्तक पर चन्दमा क्यों धारण कर रखा है - के सी शर्मा



शिव, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, महाकाल आदि असंख्य नामों से पूजे जाते हैं भोलेभंडारी। इनका एक नाम शशिधर भी है। शिवजी अपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है इसी वजह से इन्हें शशिधर के नाम से भी जाना जाता है। भोलेनाथ ने मस्तक पर चंद्र को क्यों धारण कर रखा है? इस संबंध में शिव पुराण में उल्लेख है कि जब देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तब 14 रत्नों के मंथन से प्रकट हुए। इस मंथन में सबसे विष निकला। विष इतना भयंकर था कि इसका प्रभाव पूरी सृष्टि पर फैलता जा रहा था परंतु इसे रोक पाना किसी भी देवी-देवता या असुर के बस में नहीं था।

इस समय सृष्टि को बचाने के उद्देश्य से शिव ने वह अति जहरीला विष पी लिया। इसके बाद शिवजी का शरीर विष प्रभाव से अत्यधिक गर्म होने लगा। शिवजी के शरीर को शीतलता मिले इस वजह से उन्होंने चंद्र को धारण किया। चंद्र को धारण कर क्या संदेश देते हैं शिव? शिवजी को अति क्रोधित स्वभाव का बताया गया है। कहते हैं कि जब शिवजी अति क्रोधित होते हैं तो उनका तीसरा नेत्र खुल जाता हैं तो पूरी सृष्टि पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही विषपान के बाद शिवजी का शरीर और अधिक गर्महो गया जिसे शीतल करने के लिए उन्होंने चंद्र आदि को धारण किया। चंद्र को धारण करके शिवजी यही संदेश देते हैं कि आपका मन हमेशा शांत रहना चाहिए। आपका स्वभाव चाहे जितना क्रोधित हो परंतु आपका मन हमेशा ही चंद्र की तरह ठंडक देने वाला रहना चाहिए। जिस तरह चांद सूर्य से उष्मा लेकर भी हमें शीतलता ही प्रदान करता है उसी तरह हमें भी हमारा स्वभाव बनाना चाहिए।

 जय महाकाल

Sunday, 26 April 2020

08:06

जाने, प्राचीन कैलास मंदिर का रहस्य - आप जानकर आआश्चर्यचकित रह जायेंगे-के सी शर्मा



आपने अनेकों रहस्यमयी स्थानों के बारे में सुना होगा, कुछ जगहें भूतिया होने से मशहूर हैं, तो कुछ पुरातन होने की वजह से मशहूर, हमारा देश ऐसे अनेक रहस्यों से भरा हुआ है,आज मैं आपको एक ऐसे रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताने जा रहा हूं, जो प्राचीन होने के साथ साथ रहस्यमयी भी है।

कुछ वैज्ञानिकों का यह भी मानना है की इस मंदिर का निर्माण एलियन ने किया था, लेकिन इसकी सच्चाई क्या है ये कोई नहीं जान पाया है, उस मंदिर का नाम है, कैलास मंदिर, ये मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित है, इस स्थान पर अनेकों गुफाएं है, उनमे से कुछ बौद्ध गुफाएं है, कुछ जैन गुफाएं है और कुछ हिन्दू गुफाएं है एस कुल ३४ गुफाएं मौजूद है।

इस स्थान को विश्व में
 *"एल्लोरा केव्स"*
के नाम से जाना जाता है, इन्ही गुफाओ में से १६ वीं गुफा में स्थित है कैलास मंदिर, सुन्दर कलाकृतियों का ये नमूना है, इस मंदिर को हर साल दुनिया भर से लोग देखने आते है, अनेक शोधकर्ता इस मंदिर के निर्माण के रहस्य को जानने के लिए आते है।

इस मंदिर को बनाने में कितना समय लगा होगा ये बता पाना आसन नहीं है, कुछ लोगो का मानना है की करीब करीब १५० से ज्यदा साल लगे होंगे। सिर्फ हतोड़ीऔर छैनी से इस पूरे मंदिर का निर्माण करना जैसे नामुमकिन सा लगता है, आज की टेक्नोलॉजी का सहारा लिया जाये तो भी यह कार्य मुमकिन नहीं है, कहा जाता है की कुल २ लाख टन पत्थर काट कर बहार निकला गया है।

 सबसे चौका देने वाली बात है की, आम तौर पर किसी भी वास्तु या मंदिर का निर्माण नीचे से ऊपर किया जाता है, लेकिन इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे किया हुआ है, जब आप इस मंदिर के ऊपर खड़े होक नीचे देखेंगे और गहराई नापने की कोशिश करेंगे तो आपके पसीने छूट जायेंगे।

जब हम इस मंदिर का निरीक्षण कर रहे थे, तब हमने देखा की बहुत सी मुर्तिया टूटी हुयी थी, इसका कारण जानने के लिए जब हमें स्थानिक प्रशासन से जानकारी ली तो पता चला की औरंगजेब नामक मुग़ल शासक ने इस मंदिर को ३ साल तक तोड़ने की कोशिश की थी, उसने हजारो लोगो को काम पे लगाया था, लेकिन वो इस मंदिर को तोड़ नहीं पाया, सिर्फ कुछ मूर्तियों को वे तोड़ पायें।

इस मंदिर में भगवान शिव का निवास स्थान कैलास का स्वरुप देने की कोशिश की गयी है, अनेक उल्लेखनीय कलाकृतियां नजर आती है, तीनो देवियों की सभा भी इस मंदिर में आप देख सकते है।

हाथी को हिन्दू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है, और इसी कारण से उस जगह हाथी की बड़ी प्रतिमा नजर आती है, लेकिन वह टूटी हुई है।

भगवान् शिव के साथ साथ आपको अनेक देवताओं की भी मूर्तियां नजर आएँगी, भगवन विष्णु जी के अनेक अवतारों को यहापर दिखाया गया है, वराह अवतार, नरसिंह अवतार, वामन अवतार, राम अवतार, परशुराम अवतार, कुर्म अवतार, मत्स्य अवतार, ऐसे अनेक अवतारों को दिखाया गया है,अनेक जगह पर भगवन शिव और पार्वती संवाद करती हुयी दिखाई देती है, इन मूर्तियों में भगवान शिव, देवी पार्वती जी को ज्ञान दे रहे है।

उसी के साथ साथ इस मंदिर में रावण को भी दिखाया गया, है कैलास पर्वत को उठाते हुए रावन की मूर्तियां दीवारों में बनायीं गयी है, ये काम इतना सुन्दर है की देखने वाले लोगो का मन प्रसन्न हो जाता है।

इस भव्य मंदिर के मध्य में भगवन शिव का लिंग प्रस्थापित है, सभी लोग उसके दर्शन करने जाते है।

कुछ जगहों पर महाभारत के युद्ध और महाभारत की अनेक घटनाओं का उल्लेख करते हुए चित्र बनाये गए है।
मंदिर के ऊपर एक भव्य कमल पुष्प का निर्माण किया है, और उसके ऊपर ४ शेरों की मूर्तियां नजर आती है, स्थानीय लोग कहते है की ये शेर मंदिर के रक्षा कवच की तरह काम करते है।

लेकिन किसने किया ये सब, इस नामुमकिन से काम को आखिर बनाया किस तरीके से, कुछ शोध करता कहते है, की आज की टेक्नोलॉजी से किसी विकसित टेक्नोलॉजी ने बनाया हुआ है,  इतनी सीधी रेखा में पत्थर काटना आज भी मुश्किल जाता हा, केवल हतोड़ी और छैनी से किया कैसे होगा, ये किसी एलियन टेक्नोलॉजी का काम है। क्यूं की इस मंदिर में कुछ छेड़ इतने छोटे है की कोई भी मनुष्य उसमे जा नहीं सकता है, उसके अन्दर भी  काम दिखाई देता है, ऐसा काम करने के लिए आज की टेक्नोलॉजी को कम्प्युटेरिसेड मशीनों की जरुरत है।

और दूसरी तरफ यह मान्यता है की इस मंदिर के निर्माण पूर्व एक महायज्ञ किया गया, वैदिक मंत्रो के उच्चारण से जल, धरती पत्थर से आग ली गयी। कहा जाता है की वैदिक मंत्रो को सही ध्वनि में उच्चारण से और विशिष्ट तरंगो के उत्पादन से ये पत्थर जीवित हो उठाते है और भगवन विश्वकर्मा को आराधना करके कार्य निर्माण करने की वजह से, ये कार्य आसन हो सका।

"अथर्व वेद" में अनेक मन्त्र मिलते हैं, जिसे अगर आप गृह निर्माण से पहले उनका उच्चारण करेंगे, तो आपके घर में कभी निराशा नहीं होगी।

लेकिन फिर भी ये मंदिर आज भी एक रहस्य ही बना हुआ है, अनेक वैज्ञानिक हर साल आते है, घंटो काम करते है, चर्चा करते है, लेकिन निराश होकर वापिस चले जाते है, लेकिन इसका रहस्य आज तक कोई खोज नहीं पाया है।